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कान्हा और पेड़ की अटकी पतंग

पढ़ने का समय : 7 मिनट

 नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

— कान्हा और पेड़ पर अटकी पतंग

 

अगली सुबह कान्हा अपने दोस्तों के साथ यमुना किनारे पहुँचे। आज सबके हाथों में रंग-बिरंगी पतंगें थीं। किसी की पतंग लाल थी, किसी की पीली, तो किसी की नीली।

 

कान्हा के हाथ में पीले रंग की एक सुंदर पतंग थी।

 

एक दोस्त ने पूछा—

 

“कान्हा, तुम्हारी पतंग सबसे ऊपर जाएगी?”

 

कान्हा मुस्कुराए।

 

“सबसे ऊपर!”

 

दूसरा दोस्त बोला—

 

“पहले उड़ाकर तो देखो।”

 

कान्हा ने डोर पकड़ी और दोस्त ने पतंग हवा में छोड़ दी।

 

हवा तेज थी, इसलिए पतंग तुरंत ऊपर उठने लगी।

 

“छोड़ो!”

 

कान्हा ने डोर खींची।

 

पतंग आसमान में ऊपर जाने लगी।

 

सभी बच्चे खुशी से चिल्लाए—

 

“उड़ गई!”

 

कान्हा बहुत खुश थे।

 

वह कभी पतंग को ऊपर करते, कभी नीचे लाते।

 

तभी एक तेज हवा का झोंका आया।

 

पतंग अचानक दूसरी दिशा में मुड़ गई।

 

कान्हा ने डोर संभालने की कोशिश की।

 

“अरे! इधर आओ!”

 

लेकिन पतंग तेजी से एक बड़े पेड़ की तरफ जाने लगी।

 

एक दोस्त चिल्लाया—

 

“कान्हा! पेड़!”

 

कान्हा ने डोर खींची।

 

लेकिन बहुत देर हो चुकी थी।

 

फटाक!

 

पतंग पेड़ की ऊँची शाखाओं में फँस गई।

 

सभी बच्चे कुछ पल चुप रहे।

 

कान्हा ने ऊपर देखा।

 

उनकी प्यारी पतंग एक शाखा पर अटकी हुई थी।

 

एक दोस्त बोला—

 

“अब गई पतंग।”

 

कान्हा ने कहा—

 

“नहीं। मैं इसे वापस लाऊँगा।”

 

दोस्त ने पेड़ को देखा।

 

“लेकिन ये बहुत ऊँची है।”

 

कान्हा ने पेड़ के तने को छुआ।

 

“इतनी भी ऊँची नहीं।”

 

एक दोस्त बोला—

 

“तुम चढ़ोगे?”

 

कान्हा मुस्कुराए।

 

“हाँ।”

 

वह पेड़ पर चढ़ने ही वाले थे कि पीछे से आवाज आई—

 

“कान्हा!”

 

कान्हा रुक गए।

 

वहाँ नंद बाबा खड़े थे।

 

“क्या करने वाले हो?”

 

कान्हा ने ऊपर देखा।

 

“मेरी पतंग फँस गई है।”

 

नंद बाबा ने पेड़ की तरफ देखा।

 

“पतंग के लिए पेड़ पर मत चढ़ो। गिर सकते हो।”

 

कान्हा ने कहा—

 

“लेकिन बाबा, मेरी पतंग…”

 

नंद बाबा मुस्कुराए।

 

“पतंग फिर मिल जाएगी। तुम्हारी सुरक्षा ज्यादा जरूरी है।”

 

कान्हा थोड़ा उदास हो गए।

 

“लेकिन ये मेरी पसंदीदा पतंग है।”

 

नंद बाबा ने कहा—

 

“चलो, पहले सोचते हैं कि इसे बिना चढ़े कैसे निकाला जाए।”

 

सभी बच्चे पेड़ के नीचे बैठकर सोचने लगे।

 

एक दोस्त बोला—

 

“हम लंबी लकड़ी से इसे नीचे कर सकते हैं।”

 

दूसरा बोला—

 

“लेकिन लकड़ी इतनी लंबी नहीं है।”

 

तीसरा बोला—

 

“हम पत्थर फेंककर डोर गिरा सकते हैं।”

 

कान्हा ने तुरंत कहा—

 

“नहीं! पत्थर से किसी को चोट लग सकती है।”

 

सब चुप हो गए।

 

कान्हा ने पेड़ को ध्यान से देखा।

 

एक लंबी सूखी डाल नीचे पड़ी थी।

 

उन्होंने उसे उठाया।

 

“अगर इसे बाँस के साथ बाँध दें तो शायद ऊपर तक पहुँच जाए।”

 

नंद बाबा ने कहा—

 

“अच्छा विचार है। लेकिन सावधानी से।”

 

कुछ बड़े बच्चों ने बाँस और लकड़ी को जोड़ दिया।

 

कान्हा नीचे खड़े होकर उसे धीरे-धीरे ऊपर करने लगे।

 

पहली बार लकड़ी पतंग तक नहीं पहुँची।

 

दूसरी बार भी नहीं।

 

तीसरी बार लकड़ी पतंग की डोर से टकराई।

 

छपाक!

 

पतंग थोड़ा हिली, लेकिन नीचे नहीं आई।

 

कान्हा बोले—

 

“थोड़ा और ऊपर!”

 

एक दोस्त ने कहा—

 

“धीरे!”

 

कान्हा ने फिर कोशिश की।

 

इस बार डोर लकड़ी में उलझ गई।

 

कान्हा ने धीरे से उसे खींचा।

 

पतंग शाखा से निकलकर नीचे गिरने लगी।

 

“मिल गई!”

 

सभी बच्चे खुशी से चिल्लाए।

 

कान्हा ने पतंग पकड़ ली।

 

लेकिन पतंग का एक कोना फट गया था।

 

कान्हा उसे देखकर थोड़ा उदास हुए।

 

“मेरी पतंग टूट गई।”

 

एक दोस्त बोला—

 

“कोई बात नहीं। इसे ठीक कर लेंगे।”

 

दूसरे ने कहा—

 

“हाँ, हमारे पास कागज है।”

 

नंद बाबा बोले—

 

“चलो, घर जाकर इसे ठीक करते हैं।”

 

कान्हा ने पतंग को सीने से लगा लिया।

 

“मैं इसे खुद ठीक करूँगा।”

 

वापस लौटते समय कान्हा चुपचाप चल रहे थे।

 

दोस्त ने पूछा—

 

“क्या हुआ?”

 

कान्हा बोले—

 

“सोच रहा हूँ, हवा पतंग को इतनी दूर क्यों ले गई?”

 

दोस्त हँसा।

 

“क्योंकि हवा को भी शरारत करनी थी।”

 

कान्हा भी हँस पड़े।

 

नंद बाबा ने कहा—

 

“पतंग की तरह मन भी होता है। कभी-कभी बहुत दूर जाने लगता है। उसे संभालने के लिए समझदारी की डोर चाहिए।”

 

कान्हा ने पूछा—

 

“और अगर डोर टूट जाए?”

 

नंद बाबा बोले—

 

“तो उसे फिर से जोड़ना पड़ता है।”

 

कान्हा ने मुस्कुराकर कहा—

 

“जैसे मेरी पतंग की डोर?”

 

“बिल्कुल।”

 

घर पहुँचकर कान्हा सीधे यशोदा मैया के पास गए।

 

“मैया देखो!”

 

उन्होंने फटी हुई पतंग दिखाई।

 

यशोदा ने पूछा—

 

“ये कैसे फटी?”

 

कान्हा ने पूरी कहानी सुनाई।

 

यशोदा ने राहत की साँस ली।

 

“अच्छा हुआ तुम पेड़ पर नहीं चढ़े।”

 

कान्हा बोले—

 

“पहले तो मैं चढ़ने वाला था।”

 

यशोदा ने आँखें बड़ी कर लीं।

 

“कान्हा!”

 

कान्हा हँस पड़े।

 

“लेकिन बाबा ने रोक दिया।”

 

यशोदा ने कहा—

 

“तुम्हें पता है, छोटी सी लापरवाही से चोट लग सकती थी।”

 

कान्हा ने सिर झुका लिया।

 

“अब नहीं चढ़ूँगा।”

 

यशोदा मुस्कुराईं।

 

“अच्छा बच्चा।”

 

फिर उन्होंने पतंग उठाई।

 

“इसे हम दोनों मिलकर ठीक करेंगे।”

 

कान्हा खुशी से बोले—

 

“सच?”

 

“हाँ।”

 

यशोदा ने रंगीन कागज निकाला।

 

कान्हा ने पतंग का फटा हिस्सा पकड़ा और मैया ने धीरे-धीरे उसे ठीक करना शुरू किया।

 

कान्हा बहुत ध्यान से देखते रहे।

 

“मैया, अब ये पहले जैसी हो जाएगी?”

 

“थोड़ी अलग होगी।”

 

“तो क्या ये खराब हो गई?”

 

यशोदा ने कहा—

 

“नहीं। कभी-कभी टूटने के बाद चीजें पहले से भी सुंदर लगती हैं।”

 

कान्हा ने पतंग को देखा।

 

उस पर अब नीले रंग का छोटा सा कागज लगा था।

 

कान्हा मुस्कुराए।

 

“अब तो ये और अच्छी लग रही है।”

 

शाम को कान्हा फिर दोस्तों के साथ बाहर गए।

 

उन्होंने पतंग हाथ में ली।

 

एक दोस्त बोला—

 

“आज फिर उड़ाएँगे?”

 

कान्हा ने कहा—

 

“हाँ, लेकिन आज पेड़ से दूर।”

 

सब हँस पड़े।

 

कान्हा ने पतंग आसमान में छोड़ी।

 

इस बार हवा शांत थी।

 

पतंग धीरे-धीरे ऊपर उठने लगी।

 

कान्हा डोर संभालते हुए बोले—

 

“धीरे… धीरे…”

 

पतंग ऊँची जाती गई।

 

कान्हा के चेहरे पर खुशी थी।

 

तभी उन्हें कल की बात याद आई।

 

उन्होंने डोर को थोड़ा ढीला किया।

 

पतंग हवा के साथ चलने लगी।

 

एक दोस्त ने पूछा—

 

“तुम डोर ढीली क्यों कर रहे हो?”

 

कान्हा बोले—

 

“हर चीज को अपनी मर्जी से खींचना जरूरी नहीं। कभी-कभी उसे हवा के साथ चलने देना चाहिए।”

 

दोस्त उसकी बात सुनकर चुप हो गया।

 

कुछ देर बाद पतंग आसमान में बहुत ऊँची दिखाई देने लगी।

 

कान्हा खुशी से बोले—

 

“देखो! मेरी पतंग सबसे ऊपर है!”

 

सभी बच्चे तालियाँ बजाने लगे।

 

दूर खड़ी यशोदा मैया उन्हें देख रही थीं।

 

उनके चेहरे पर मुस्कान थी।

 

उन्हें लगा जैसे उनका नन्हा कान्हा हर छोटी शरारत से कोई न कोई नई बात सीख रहा है।

 

रात को कान्हा अपनी पतंग लेकर सोने की जिद करने लगे।

 

यशोदा ने कहा—

 

“पतंग लेकर सोओगे तो वो फिर फट जाएगी।”

 

कान्हा ने तुरंत उसे सुरक्षित जगह रख दिया।

 

“ठीक है। इसे कल फिर उड़ाएँगे।”

 

वह सोने लगे।

 

तभी बाहर से किसी के दौड़ने की आवाज आई।

 

एक दोस्त घबराया हुआ नंद भवन के आँगन में आया।

 

“कान्हा!”

 

कान्हा उठकर बैठ गए।

 

“क्या हुआ?”

 

दोस्त ने हाँफते हुए कहा—

 

“यमुना किनारे एक छोटी नाव बहकर दूर चली गई है… और उसमें हमारी गेंद पड़ी है!”

 

कान्हा की आँखें चमक उठीं।

 

“गेंद?”

 

दोस्त ने सिर हिलाया।

 

कान्हा तुरंत उठ खड़े हुए।

 

“चलो!”

 

लेकिन उन्हें क्या पता था कि यमुना किनारे इस बार उनका सामना एक बहुत तेज बहाव से होने वाला था।

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