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मां का छिपा सच

पढ़ने का समय : 7 मिनट

चांदनी रात का अंधियारा — पार्ट 3: मां का छिपा हुआ सच

 

“और दूसरी बेटी… तुम्हारी मां है।”

 

उस लड़की की बात सुनकर चांदनी और गौरी जैसे पत्थर की हो गईं।

 

चांदनी कुछ पल तक उसे देखती रही। उसके हाथ में पकड़ा पत्र कांप रहा था।

 

“मेरी मां… रघुवीर सिंह की बेटी?”

 

लड़की ने धीरे से सिर हिलाया।

 

“हां।”

 

चांदनी ने तुरंत पूछा, “लेकिन मेरी मां ने मुझे कभी इसके बारे में क्यों नहीं बताया?”

 

लड़की ने कोई जवाब नहीं दिया। वह बस कुएं के पास रखे पुराने संदूक की तरफ देखने लगी।

 

चांदनी ने फिर पूछा, “तुम कौन हो?”

 

लड़की ने उसकी तरफ देखा।

 

“मेरा नाम भी चांदनी था।”

 

चांदनी का दिल जोर से धड़कने लगा।

 

“मतलब… तुम वही लड़की हो जो सालों पहले गायब हो गई थी?”

 

लड़की ने कुछ पल उसकी आंखों में देखा।

 

“गायब हुई थी… लेकिन मरी नहीं थी।”

 

गौरी ने हैरानी से पूछा, “फिर इतने साल कहां थीं?”

 

लड़की ने कुएं की तरफ देखा।

 

“इसका जवाब तुम्हारी मां के पास है।”

 

चांदनी के मन में हजारों सवाल उठ रहे थे।

 

“तुम मुझे डराने के लिए यहां क्यों आई हो?”

 

लड़की ने कहा, “मैं तुम्हें डराने नहीं आई। मैं चाहती हूं कि तुम्हें सच पता चले। क्योंकि अब वही लोग दोबारा इस रहस्य के पीछे हैं।”

 

“कौन लोग?”

 

लड़की ने जवाब देने के बजाय दूर गांव की तरफ देखा।

 

“तुम्हें सुबह होने से पहले घर लौट जाना चाहिए।”

 

चांदनी ने कहा, “नहीं। मैं अब बिना सच जाने वापस नहीं जाऊंगी।”

 

लड़की ने पहली बार हल्की मुस्कान दी।

 

“तुम बिल्कुल अपनी मां जैसी हो।”

 

इतना कहकर वह धीरे-धीरे पीछे हटने लगी।

 

चांदनी ने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की, लेकिन अगले ही पल वह धुंधली रोशनी में गायब हो गई।

 

गौरी ने कांपते हुए पूछा, “ये क्या था?”

 

चांदनी ने जमीन पर पड़े पत्र को उठाया।

 

“मुझे मां से बात करनी होगी।”

 

दोनों घर लौट आईं।

 

सुबह होते ही चांदनी ने मां के सामने वह पत्र रख दिया।

 

मां ने पत्र देखा और उनका चेहरा सफेद पड़ गया।

 

“ये तुम्हें कहां मिला?”

 

“पुराने कुएं के पास।”

 

मां ने कांपते हाथों से कुर्सी पकड़ ली।

 

“तुम वहां भी गई थीं?”

 

“हां।”

 

“मैंने तुम्हें मना किया था।”

 

चांदनी की आवाज में इस बार गुस्सा था।

 

“आपने मुझे सच क्यों नहीं बताया?”

 

मां की आंखों में आंसू आ गए।

 

“क्योंकि मैं चाहती थी कि तुम इस सब से दूर रहो।”

 

“लेकिन मैं पहले ही इस सब के बीच आ चुकी हूं।”

 

कुछ देर तक कमरे में खामोशी रही।

 

फिर मां ने धीरे से कहना शुरू किया।

 

“हां, मैं रघुवीर सिंह की बेटी हूं।”

 

चांदनी की आंखें भर आईं।

 

“आपने इतने साल ये बात हमसे छिपाई?”

 

“मेरे पास कोई रास्ता नहीं था।”

 

मां ने बताया कि उनका असली नाम राधिका था। बचपन में वह अपनी बड़ी बहन चांदनी के साथ उसी हवेली में रहती थीं।

 

दोनों बहनों में बहुत प्यार था।

 

लेकिन एक रात हवेली में अचानक हंगामा हुआ।

 

उनके पिता किसी से बहस कर रहे थे।

 

राधिका को उनकी बातों का मतलब समझ नहीं आया।

 

उसी रात उनकी बड़ी बहन चांदनी गायब हो गई।

 

“मैंने उसे बहुत ढूंढा,” राधिका ने कहा, “लेकिन वह नहीं मिली।”

 

“फिर आप गांव में कैसे आईं?”

 

“मेरे पिता के दोस्त ने मुझे अपनी बेटी की तरह पाला। उन्होंने मेरा नाम बदल दिया ताकि कोई मुझे पहचान न सके।”

 

चांदनी ने पूछा, “लेकिन मेरी बहन कहां थी?”

 

मां ने सिर झुका लिया।

 

“मुझे नहीं पता।”

 

“लेकिन वह तो कल रात मेरे सामने थी।”

 

मां अचानक चौंक गईं।

 

“तुमने उसे देखा?”

 

चांदनी ने सिर हिलाया।

 

मां की आंखों में डर उतर आया।

 

“तो इसका मतलब… वो वापस आ गई है।”

 

चांदनी ने पूछा, “मां, आपको किस बात का डर है?”

 

मां ने तुरंत जवाब नहीं दिया।

 

दादी कमरे में आईं।

 

उन्होंने कहा, “अब इससे कुछ मत छिपाओ।”

 

मां ने दादी की तरफ देखा।

 

दादी बोलीं, “इतने साल हमने चुप रहकर गलती की है।”

 

चांदनी ने कहा, “मुझे सब जानना है।”

 

दादी ने गहरी सांस ली।

 

“तुम्हारे नाना का मानना था कि हवेली में सिर्फ परिवार का झगड़ा नहीं हुआ था। किसी ने उनकी संपत्ति हड़पने की कोशिश की थी।”

 

“किसने?”

 

“उनके सबसे करीबी आदमी ने।”

 

चांदनी ने पूछा, “क्या वह आदमी अभी जिंदा है?”

 

दादी ने धीरे से सिर हिलाया।

 

“हां।”

 

चांदनी और गौरी एक-दूसरे को देखने लगीं।

 

“कौन?”

 

दादी ने नाम लिया—

 

“देवराज।”

 

चांदनी ने यह नाम पहली बार सुना था।

 

मां बोलीं, “देवराज तुम्हारे नाना का भरोसेमंद आदमी था। वह घर के सारे काम और संपत्ति के कागज संभालता था।”

 

“और फिर?”

 

“एक रात तुम्हारे नाना ने उसे कुछ कागजों के साथ पकड़ लिया। शायद वह संपत्ति अपने नाम करवाने की कोशिश कर रहा था।”

 

“फिर मेरी मौसी… यानी बड़ी चांदनी?”

 

मां ने कहा, “उसी रात वह गायब हुई।”

 

चांदनी के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

 

“क्या देवराज ने उसे…?”

 

मां ने तुरंत कहा, “हमें नहीं पता। लेकिन तुम्हारे नाना ने उसके बाद देवराज पर भरोसा नहीं किया।”

 

दादी ने कहा, “और कुछ ही दिनों बाद तुम्हारे नाना भी गायब हो गए।”

 

कमरे में फिर खामोशी छा गई।

 

चांदनी को अचानक पिछली रात की बात याद आई।

 

वह लड़की बार-बार कह रही थी कि सच उसके अपने घर में छिपा है।

 

“मां, अगर मौसी जिंदा हैं तो वह अब तक हवेली में क्यों थीं?”

 

मां ने कहा, “शायद वह किसी वजह से वापस नहीं आ सकीं।”

 

तभी बाहर किसी चीज के गिरने की आवाज आई।

 

धड़ाम!

 

सभी चौंक गए।

 

चांदनी खिड़की के पास गई।

 

बाहर आंगन में कोई नहीं था।

 

लेकिन जमीन पर एक पुराना कागज पड़ा था।

 

चांदनी बाहर गई और उसे उठा लाई।

 

कागज पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

 

“जिसे तुम ढूंढ रही हो, वह हवेली में नहीं है।”

 

चांदनी ने कागज पलटा।

 

पीछे एक पुराने मंदिर का नाम लिखा था।

 

गौरी ने पूछा, “ये क्या है?”

 

चांदनी बोली, “शायद अगला सुराग।”

 

मां ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“तुम कहीं नहीं जाओगी।”

 

“लेकिन मां—”

 

“नहीं!”

 

मां की आवाज में पहली बार इतना डर था कि चांदनी चुप हो गई।

 

दादी ने मां को देखा।

 

“राधिका, अब इसे रोकना मुश्किल है।”

 

मां की आंखों में आंसू थे।

 

“मुझे डर है कि अगर उसने सच जान लिया तो…”

 

चांदनी ने पूछा, “तो क्या?”

 

मां ने कोई जवाब नहीं दिया।

 

उस रात चांदनी अपने कमरे में बैठी रही।

 

उसके पास अब तीन चीजें थीं—पुरानी पायल, वह पत्र और मंदिर का नाम।

 

आधी रात के करीब पायल फिर से हिली।

 

छन…

 

चांदनी ने उसे उठाया।

 

इस बार पायल के नीचे एक बहुत छोटा कागज था।

 

उस पर लिखा था—

 

“मुझ पर भरोसा करो। मंदिर के पीछे पुराने पीपल के पेड़ के नीचे तुम्हारे नाना का आखिरी राज है।”

 

चांदनी ने कागज पढ़ा।

 

तभी खिड़की के बाहर किसी की परछाईं दिखाई दी।

 

वह तुरंत खिड़की तक गई।

 

बाहर कोई नहीं था।

 

लेकिन आंगन के रास्ते पर मिट्टी में पैरों के निशान थे।

 

वे निशान घर से बाहर नहीं…

 

बल्कि घर के अंदर की तरफ जा रहे थे।

 

चांदनी का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

 

वह धीरे-धीरे पीछे मुड़ी।

 

कमरे का दरवाजा खुला था।

 

और दरवाजे के पास एक आदमी खड़ा था।

 

चेहरा अंधेरे में छिपा हुआ था।

 

उसने धीमी आवाज में कहा—

 

“बहुत खोज लिया तुमने।”

 

चांदनी पीछे हट गई।

 

“कौन हो तुम?”

 

आदमी ने एक कदम आगे बढ़ाया।

 

“जिस सच को तुम्हारा परिवार इतने सालों से छिपाता आया है… उसे जानने की कीमत बहुत बड़ी है।”

 

चांदनी ने हिम्मत करके पूछा—

 

“क्या तुम देवराज हो?”

 

आदमी कुछ पल चुप रहा।

 

फिर उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।

 

“तुम्हें मेरा नाम किसने बताया?”

 

चांदनी समझ गई कि उसके सामने वही आदमी था, जिसका नाम दादी ने लिया था।

 

लेकिन वह कुछ और पूछ पाती, उससे पहले कमरे की खिड़की जोर से बंद हुई।

 

दीपक बुझ गया।

 

और अंधेरे में एक लड़की की आवाज गूंजी—

 

“चांदनी… भागो!”

 

चांदनी ने पीछे मुड़कर देखा।

 

वही उसकी बड़ी बहन खड़ी थी।

 

लेकिन इस बार उसके चेहरे पर डर था।

 

और उसकी नजर सीधे देवराज पर थी।

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