चांदनी रात का अंधियारा — पार्ट 2: बंद कमरे का सच
कमरे में अचानक दीपक जलते ही चांदनी और गौरी कुछ पल के लिए बिल्कुल शांत हो गईं।
अंधेरे में जो आवाज गूंजी थी, वह अभी भी उनके कानों में गूंज रही थी।
“तुम्हें अपने घर का सच नहीं पता…”
चांदनी ने कांपती आवाज में पूछा, “कौन हो तुम?”
कमरे में कोई दिखाई नहीं दे रहा था।
गौरी ने चांदनी का हाथ पकड़ लिया।
“चांदनी, चलो यहां से। मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा।”
चांदनी ने सिर हिलाया।
“पहले पता करते हैं कि ये आवाज किसकी है।”
“तुम्हें हर चीज की सच्चाई जाननी जरूरी है क्या?”
“हां।”
गौरी ने परेशान होकर कहा, “तुम्हारी यही आदत एक दिन हमें बड़ी मुसीबत में डाल देगी।”
चांदनी कुछ बोलती, उससे पहले दीपक की लौ अचानक तेज हुई।
दीवार पर एक परछाईं बनी।
वही लड़की जैसी परछाईं।
चांदनी ने डरते हुए उसकी तरफ देखा।
“तुम कौन हो?”
इस बार कोई जवाब नहीं आया।
बस परछाईं धीरे-धीरे दीवार पर आगे बढ़ी और एक पुराने चित्र के पास जाकर रुक गई।
चांदनी उस चित्र के पास गई।
चित्र में एक परिवार खड़ा था।
एक आदमी, एक औरत और उनके बीच एक छोटी लड़की।
चांदनी ने चित्र को ध्यान से देखा।
उस लड़की का चेहरा देखकर वह चौंक गई।
“ये तो वही लड़की है।”
गौरी ने पूछा, “जिसे हमने नीचे देखा था?”
चांदनी ने सिर हिलाया।
चित्र के नीचे नाम लिखा था—
“रघुवीर सिंह का परिवार।”
चांदनी ने धीरे से कहा, “तो इस हवेली के मालिक का नाम रघुवीर सिंह था।”
तभी मेज पर रखी तस्वीर हवा से हिलने लगी।
तस्वीर के पीछे से एक छोटा कागज नीचे गिरा।
चांदनी ने उसे उठाया।
उस पर लिखा था—
“जिसे तुम ढूंढ रही हो, उसका जवाब इस घर में नहीं, तुम्हारे अपने घर में छिपा है।”
चांदनी की सांस रुक गई।
“मेरे घर में?”
गौरी बोली, “ये क्या मतलब हुआ?”
चांदनी ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसके दिमाग में अपनी मां की बातें घूमने लगीं।
मां हमेशा इस हवेली का नाम सुनते ही चुप क्यों हो जाती थीं?
दादी ने भी उसे आधा सच ही क्यों बताया?
और सबसे बड़ी बात—हवेली की लड़की का नाम भी चांदनी क्यों था?
तभी नीचे से किसी दरवाजे के बंद होने की आवाज आई।
धड़ाम!
गौरी घबरा गई।
“कोई अंदर आया है!”
चांदनी ने दीपक उठा लिया।
दोनों कमरे से बाहर निकलीं।
सीढ़ियों के नीचे कोई दिखाई नहीं दे रहा था।
लेकिन मुख्य दरवाजा खुला हुआ था।
गौरी ने फुसफुसाकर कहा, “जब हम आए थे तब दरवाजा बंद था।”
चांदनी ने कहा, “हमें यहां से निकलना चाहिए।”
दोनों तेजी से नीचे आईं और हवेली से बाहर निकल गईं।
घर लौटते समय चांदनी बिल्कुल चुप थी।
गौरी ने पूछा, “क्या सोच रही हो?”
“मुझे लगता है मेरी मां कुछ जानती हैं।”
अगली सुबह चांदनी ने मां से सीधे सवाल किया।
“मां, क्या आपका इस हवेली से कोई संबंध है?”
मां के हाथ रुक गए।
“तुम ये क्यों पूछ रही हो?”
“क्योंकि मैं कल रात वहां गई थी।”
मां के चेहरे का रंग उड़ गया।
“तुम हवेली गई थीं?”
“हां।”
मां ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।
“तुम्हें वहां नहीं जाना चाहिए था!”
“क्यों?”
“क्योंकि वहां जो हुआ था, उसे दोबारा छेड़ना ठीक नहीं है।”
चांदनी की आंखें भर आईं।
“मां, मुझे सच जानने का हक है।”
मां कुछ देर चुप रहीं।
फिर बोलीं, “तुम्हारे जन्म से पहले की बात है।”
चांदनी ध्यान से सुनने लगी।
“जब मैं छोटी थी, तब उस हवेली में रघुवीर सिंह का परिवार रहता था। उनकी एक बेटी थी। उसका नाम चांदनी था।”
“फिर?”
“एक रात वह लड़की गायब हो गई।”
“और?”
मां ने नजरें झुका लीं।
“उस रात तुम्हारे नाना वहां गए थे।”
चांदनी चौंक गई।
“नाना?”
“हां। उन्होंने कुछ देखा था। लेकिन उन्होंने कभी किसी को नहीं बताया।”
“क्या देखा था?”
मां ने सिर हिलाया।
“मुझे नहीं पता।”
चांदनी को यकीन नहीं हुआ।
“मां, आप कुछ छिपा रही हैं।”
मां की आंखों में आंसू आ गए।
“मैं तुम्हें बचाना चाहती हूं।”
“किससे?”
मां ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसी समय दरवाजे पर दस्तक हुई।
दोनों चुप हो गईं।
बाहर दादी खड़ी थीं।
दादी अंदर आईं और चांदनी को देखते ही समझ गईं कि अब बात छिपाना मुश्किल है।
उन्होंने कहा, “अब इसे सच बता देना चाहिए।”
मां ने कहा, “लेकिन मां…”
दादी बोलीं, “अगर इसे सच नहीं बताया तो ये खुद उसे ढूंढने जाएगी।”
चांदनी ने दादी का हाथ पकड़ लिया।
“आपको सब पता है?”
दादी ने धीरे से सिर हिलाया।
“हां।”
फिर उन्होंने अपनी पुरानी संदूकची खोली।
उसमें से एक कपड़े में लिपटी हुई छोटी-सी चीज निकाली।
वह एक चांदी की पायल थी।
चांदनी ने पायल देखते ही कहा, “ये तो…”
दादी बोलीं, “ये उसी लड़की की थी।”
चांदनी ने पायल हाथ में ले ली।
उसी पल उसे रात का दृश्य याद आया।
वह लड़की सीढ़ियों पर खड़ी थी।
उसके पैर में एक पायल थी।
चांदनी के हाथ कांपने लगे।
“लेकिन ये पायल आपके पास कैसे आई?”
दादी ने कहा, “तुम्हारे नाना इसे हवेली से लेकर आए थे।”
“क्यों?”
“क्योंकि उन्हें लगा था कि लड़की शायद किसी मुसीबत में थी।”
चांदनी ने पूछा, “क्या वह जिंदा थी?”
दादी कुछ पल चुप रहीं।
“हमें कभी पता नहीं चला।”
चांदनी की आंखों में डर और सवाल दोनों थे।
“तो फिर हर पूर्णिमा की रात जो दिखाई देती है… वो कौन है?”
दादी ने जवाब नहीं दिया।
उस रात चांदनी ने पायल अपने पास रख ली।
उसे नींद नहीं आई।
आधी रात को अचानक पायल से हल्की-सी आवाज आई।
छन…
चांदनी उठकर बैठ गई।
पायल खुद-ब-खुद हिल रही थी।
वह डरते हुए उसके पास गई।
पायल के नीचे एक छोटा कागज रखा था।
उसने कागज खोला।
उस पर लिखा था—
“पुराने कुएं के पास आओ।”
चांदनी ने तुरंत खिड़की से बाहर देखा।
दूर वही लड़की खड़ी थी।
वह कुछ पल चांदनी को देखती रही।
फिर मुड़कर गांव के पुराने कुएं की तरफ चल दी।
चांदनी ने बिना किसी को जगाए घर से निकलने का फैसला किया।
लेकिन इस बार वह अकेली नहीं थी।
गौरी पहले से बाहर उसका इंतजार कर रही थी।
“मुझे पता था तू जाएगी।”
चांदनी मुस्कुराई।
“चल।”
दोनों पुराने कुएं तक पहुंचीं।
वहां कोई नहीं था।
लेकिन जमीन पर मिट्टी थोड़ी उखड़ी हुई थी।
चांदनी नीचे बैठी और हाथों से मिट्टी हटाने लगी।
कुछ देर बाद उसे लकड़ी का एक छोटा संदूक मिला।
उसने संदूक खोला।
अंदर पुराने कागज, एक तस्वीर और एक पत्र था।
तस्वीर में रघुवीर सिंह की बेटी थी।
उसके साथ एक छोटी लड़की भी खड़ी थी।
चांदनी ने तस्वीर पलटी।
पीछे लिखा था—
“मेरी बेटी के बाद उसकी छोटी बहन की जिम्मेदारी मेरी दोस्त की बेटी संभालेगी।”
चांदनी का दिल तेजी से धड़कने लगा।
“दोस्त की बेटी?”
गौरी ने पूछा, “कौन?”
चांदनी ने पत्र खोला।
पहली ही पंक्ति पढ़ते ही उसके हाथ कांपने लगे।
पत्र में लिखा था—
“अगर कभी मेरी बेटी चांदनी वापस न आए, तो उसकी छोटी बहन को मेरी सबसे भरोसेमंद दोस्त के पास भेज देना।”
चांदनी ने धीरे से कहा—
“लेकिन रघुवीर सिंह की तो सिर्फ एक बेटी थी…”
तभी पीछे से वही धीमी आवाज आई—
“नहीं… दो बेटियां थीं।”
चांदनी और गौरी ने एक साथ पीछे देखा।
वही लड़की उनके सामने खड़ी थी।
चांदनी की सांस अटक गई।
लड़की ने धीरे से कहा—
“और दूसरी बेटी… तुम्हारी मां है।”
चांदनी के हाथ से पत्र जमीन पर गिर गया।
उसके सामने अब सिर्फ हवेली का नहीं…
बल्कि उसके अपने परिवार का सबसे बड़ा राज खुलने वाला था।

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं
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