चांदनी रात का अंधियारा — पार्ट 1
गांव से थोड़ी दूर एक पुरानी हवेली थी। दिन में वह हवेली जितनी शांत और साधारण दिखाई देती, रात होते ही उतनी ही रहस्यमयी लगने लगती थी। गांव के लोग शाम ढलने के बाद उस रास्ते पर जाना पसंद नहीं करते थे।
कहते थे कि हर पूर्णिमा की रात हवेली की सबसे ऊपरी खिड़की में एक दीपक अपने आप जल उठता था।
किसी ने उस दीपक को जलाते हुए कभी नहीं देखा था।
गांव के बड़े-बुजुर्ग कहते थे, “उस हवेली से दूर रहना ही अच्छा है।”
लेकिन गांव की अठारह साल की चांदनी इन बातों को सिर्फ पुरानी कहानियां मानती थी।
चांदनी का असली नाम चांदनी ही था। उसके पिता बचपन से उसे इसी नाम से पुकारते थे, क्योंकि उसके जन्म की रात आसमान में बहुत बड़ा चांद निकला था।
वह हंसमुख और थोड़ी जिद्दी लड़की थी।
एक शाम उसकी मां ने उससे कहा, “चांदनी, सूरज ढलने वाला है। जल्दी घर आ जाना।”
चांदनी ने हंसकर कहा, “मां, मैं बस कुएं तक जा रही हूं।”
“कुएं तक ठीक है, लेकिन हवेली की तरफ मत जाना।”
चांदनी रुक गई।
“आपको अभी भी उस हवेली से डर लगता है?”
मां ने गंभीर होकर कहा, “डर की बात नहीं है। बस वहां जाना ठीक नहीं है।”
“लेकिन क्यों?”
मां ने जवाब नहीं दिया।
चांदनी ने फिर पूछा, “मां, आखिर वहां हुआ क्या था?”
मां कुछ पल चुप रहीं।
“तुम्हें जितना पता है, उतना ही रहने दो।”
चांदनी को यह जवाब बिल्कुल पसंद नहीं आया।
वह कुएं की तरफ चली गई, लेकिन उसके दिमाग में हवेली की बात घूमती रही।
रास्ते में उसकी मुलाकात उसकी सहेली गौरी से हुई।
गौरी ने पूछा, “क्या सोच रही हो?”
चांदनी बोली, “तुम्हें हवेली के बारे में कुछ पता है?”
गौरी का चेहरा तुरंत बदल गया।
“उसका नाम मत लो।”
“क्यों?”
“मेरी दादी कहती हैं कि पूर्णिमा की रात वहां कोई खिड़की से बाहर देखता है।”
चांदनी हंस पड़ी।
“कोई इंसान?”
गौरी ने धीरे से कहा, “पता नहीं।”
चांदनी ने मजाक किया, “तो आज रात चलकर देख लेते हैं।”
गौरी ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।
“पागल हो गई हो क्या?”
चांदनी हंसती हुई बोली, “मैं मजाक कर रही हूं।”
लेकिन उसके मन में अब वही बात बैठ गई थी।
उस रात पूर्णिमा थी।
आसमान बिल्कुल साफ था और चांद की रोशनी पूरे गांव में फैली हुई थी।
चांदनी अपनी छत पर बैठी थी।
अचानक उसकी नजर दूर हवेली की तरफ गई।
वहां ऊपरी मंजिल की एक खिड़की में हल्की रोशनी दिखाई दे रही थी।
चांदनी खड़ी हो गई।
“ये क्या है?”
उसने ध्यान से देखा।
रोशनी सच में थी।
उसे अपनी मां की बात याद आई।
फिर उसे गौरी की दादी की कहानी याद आई।
चांदनी ने खुद को समझाया।
“कोई दीपक जलाकर गया होगा।”
वह वापस बैठ गई।
लेकिन कुछ मिनट बाद रोशनी गायब हो गई।
चांदनी फिर खड़ी हुई।
“अजीब है।”
अगली सुबह उसने अपनी मां से पूछा, “मां, क्या हवेली में कोई रहता है?”
मां ने चौंककर उसकी तरफ देखा।
“तुम ये क्यों पूछ रही हो?”
“बस ऐसे ही।”
मां ने कहा, “नहीं। वहां कोई नहीं रहता।”
चांदनी ने पूछा, “फिर रात को वहां रोशनी क्यों थी?”
मां के हाथ से गिलास लगभग छूट गया।
“तुमने क्या देखा?”
“ऊपर की खिड़की में दीपक जल रहा था।”
मां कुछ पल चुप रहीं।
फिर बोलीं, “आज के बाद उस हवेली की तरफ मत देखना।”
चांदनी को अब यकीन हो गया था कि उसकी मां कुछ छिपा रही हैं।
उसी दिन दोपहर में वह अपनी दादी के पास गई।
दादी आंगन में बैठी थीं।
चांदनी उनके पास बैठ गई।
“दादी, आप मुझे हवेली के बारे में सच-सच बताइए।”
दादी ने उसकी तरफ देखा।
“किसने कहा तुम्हें उसके बारे में पूछने को?”
“किसी ने नहीं। मैंने खुद देखा।”
दादी की आंखों में चिंता आ गई।
“क्या देखा?”
“पूर्णिमा की रात खिड़की में दीपक।”
दादी ने लंबी सांस ली।
“बहुत साल पहले उस हवेली में एक परिवार रहता था। घर के मालिक की एक बेटी थी। उसका नाम भी चांदनी था।”
चांदनी हैरान रह गई।
“मेरे जैसा?”
दादी ने सिर हिलाया।
“हां। वह लड़की बहुत शांत थी। उसे रात में छत पर बैठकर चांद देखना पसंद था।”
“फिर क्या हुआ?”
दादी ने धीरे से कहा, “एक पूर्णिमा की रात वह अचानक गायब हो गई।”
“कहां गई?”
“किसी को नहीं पता।”
“उसके परिवार ने उसे ढूंढा?”
“बहुत ढूंढा। लेकिन उसका कोई पता नहीं चला।”
चांदनी ने पूछा, “फिर हवेली बंद क्यों हो गई?”
दादी बोलीं, “उसके बाद हवेली में अजीब घटनाएं होने लगीं। कभी दरवाजे अपने आप खुल जाते, कभी ऊपर की खिड़की में दीपक जलता दिखाई देता।”
चांदनी कुछ देर चुप रही।
“लेकिन दादी, इसका मतलब यह नहीं कि वहां कुछ डरावना है।”
दादी ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा, “बेटी, हर रहस्य को जानना जरूरी नहीं होता।”
चांदनी ने कुछ जवाब नहीं दिया।
लेकिन उसके मन में एक सवाल लगातार घूमता रहा—
अगर वह लड़की सालों पहले गायब हो गई थी, तो हर पूर्णिमा की रात दीपक कौन जलाता था?
उस रात चांदनी देर तक सो नहीं सकी।
आधी रात के करीब उसे बाहर से हल्की-सी आवाज सुनाई दी।
“चांदनी…”
वह तुरंत उठकर बैठ गई।
कमरे में कोई नहीं था।
उसने सोचा शायद उसका भ्रम होगा।
फिर आवाज आई।
“चांदनी…”
इस बार आवाज बिल्कुल साफ थी।
वह खिड़की के पास गई।
बाहर पूरा आंगन चांदनी से भरा हुआ था।
उसने दूर हवेली की तरफ देखा।
ऊपर वही खिड़की दिखाई दे रही थी।
और इस बार वहां दीपक जल रहा था।
चांदनी के दिल की धड़कन तेज हो गई।
तभी खिड़की के पास एक परछाईं दिखाई दी।
एक लड़की जैसी परछाईं।
चांदनी ने आंखें मलीं।
परछाईं गायब हो चुकी थी।
अगली सुबह उसने गौरी को सब बताया।
गौरी ने कहा, “तुम्हें वहां नहीं जाना चाहिए।”
चांदनी बोली, “मुझे लगता है वहां कोई रहस्य है।”
“तो क्या करोगी?”
चांदनी ने दृढ़ होकर कहा, “आज रात हवेली जाऊंगी।”
गौरी ने डरते हुए पूछा, “अकेली?”
चांदनी ने कहा, “तुम साथ चलोगी।”
“बिल्कुल नहीं!”
चांदनी हंस पड़ी।
“ठीक है, मैं अकेली चली जाऊंगी।”
गौरी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“नहीं! मैं भी चलूंगी।”
रात होते ही दोनों चुपचाप गांव से बाहर निकल पड़ीं।
चांदनी के हाथ में एक छोटी टॉर्च थी।
हवेली का रास्ता चांद की रोशनी में साफ दिखाई दे रहा था।
जैसे-जैसे वे हवेली के करीब पहुंचीं, हवा ठंडी होती गई।
गौरी ने धीमे से कहा, “मुझे अच्छा नहीं लग रहा।”
चांदनी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“डर मत। मैं हूं।”
दोनों हवेली के बड़े दरवाजे के सामने पहुंचीं।
दरवाजा बंद था।
चांदनी ने उसे हल्का-सा धक्का दिया।
किर्रर्र…
दरवाजा अपने आप खुल गया।
गौरी पीछे हट गई।
“चांदनी… हमने इसे खोला नहीं।”
चांदनी ने धीरे से अंदर देखा।
अंदर पूरा अंधेरा था।
लेकिन सीढ़ियों के ऊपर से हल्की चांदनी आ रही थी।
तभी ऊपर से किसी के चलने की आवाज आई।
ठक…
ठक…
ठक…
दोनों ने एक-दूसरे का हाथ कसकर पकड़ लिया।
चांदनी ने ऊपर देखा।
सीढ़ियों के आखिरी छोर पर एक लड़की खड़ी थी।
उसने सफेद कपड़े पहन रखे थे।
चेहरा चांदनी को साफ दिखाई नहीं दे रहा था।
लड़की ने धीरे से अपना हाथ उठाया और ऊपर की खिड़की की तरफ इशारा किया।
फिर अचानक गायब हो गई।
गौरी ने कांपते हुए कहा, “चलो यहां से!”
लेकिन चांदनी ने सीढ़ियों की तरफ कदम बढ़ा दिए।
“नहीं।”
“क्यों?”
चांदनी ने धीमी आवाज में कहा—
“क्योंकि मुझे लगता है… वो हमें डराने नहीं, कुछ बताने आई थी।”
दोनों धीरे-धीरे सीढ़ियां चढ़ने लगीं।
ऊपर पहुंचकर उन्हें एक पुराना कमरा दिखाई दिया।
दरवाजा आधा खुला था।
चांदनी ने दरवाजा खोला।
कमरे के बीच एक पुरानी मेज थी।
मेज पर एक तस्वीर रखी थी।
चांदनी ने टॉर्च की रोशनी तस्वीर पर डाली।
तस्वीर देखते ही उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।
तस्वीर में वही लड़की थी जिसे उन्होंने सीढ़ियों पर देखा था।
और तस्वीर के नीचे लिखा था—
“चांदनी — इस घर की आखिरी बेटी।”
चांदनी कुछ समझ पाती, उससे पहले कमरे का दरवाजा अपने आप बंद हो गया।
गौरी चीख पड़ी।
और उसी पल कमरे के अंधेरे में किसी लड़की की धीमी आवाज गूंजी—
“तुम… आखिर आ ही गईं।”
चांदनी ने कांपते हुए पूछा—
“कौन हो तुम?”
अंधेरे से जवाब आया—
“तुम्हें अपने घर का सच नहीं पता…”
और कमरे में रखा पुराना दीपक अचानक जल उठा।

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं
प्रातिक्रिया दे