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टैग: #सस्पेंस#हॉरर

  • चांदनी रात का अंधियारा

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    चांदनी रात का अंधियारा — पार्ट 1

     

    गांव से थोड़ी दूर एक पुरानी हवेली थी। दिन में वह हवेली जितनी शांत और साधारण दिखाई देती, रात होते ही उतनी ही रहस्यमयी लगने लगती थी। गांव के लोग शाम ढलने के बाद उस रास्ते पर जाना पसंद नहीं करते थे।

     

    कहते थे कि हर पूर्णिमा की रात हवेली की सबसे ऊपरी खिड़की में एक दीपक अपने आप जल उठता था।

     

    किसी ने उस दीपक को जलाते हुए कभी नहीं देखा था।

     

    गांव के बड़े-बुजुर्ग कहते थे, “उस हवेली से दूर रहना ही अच्छा है।”

     

    लेकिन गांव की अठारह साल की चांदनी इन बातों को सिर्फ पुरानी कहानियां मानती थी।

     

    चांदनी का असली नाम चांदनी ही था। उसके पिता बचपन से उसे इसी नाम से पुकारते थे, क्योंकि उसके जन्म की रात आसमान में बहुत बड़ा चांद निकला था।

     

    वह हंसमुख और थोड़ी जिद्दी लड़की थी।

     

    एक शाम उसकी मां ने उससे कहा, “चांदनी, सूरज ढलने वाला है। जल्दी घर आ जाना।”

     

    चांदनी ने हंसकर कहा, “मां, मैं बस कुएं तक जा रही हूं।”

     

    “कुएं तक ठीक है, लेकिन हवेली की तरफ मत जाना।”

     

    चांदनी रुक गई।

     

    “आपको अभी भी उस हवेली से डर लगता है?”

     

    मां ने गंभीर होकर कहा, “डर की बात नहीं है। बस वहां जाना ठीक नहीं है।”

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    मां ने जवाब नहीं दिया।

     

    चांदनी ने फिर पूछा, “मां, आखिर वहां हुआ क्या था?”

     

    मां कुछ पल चुप रहीं।

     

    “तुम्हें जितना पता है, उतना ही रहने दो।”

     

    चांदनी को यह जवाब बिल्कुल पसंद नहीं आया।

     

    वह कुएं की तरफ चली गई, लेकिन उसके दिमाग में हवेली की बात घूमती रही।

     

    रास्ते में उसकी मुलाकात उसकी सहेली गौरी से हुई।

     

    गौरी ने पूछा, “क्या सोच रही हो?”

     

    चांदनी बोली, “तुम्हें हवेली के बारे में कुछ पता है?”

     

    गौरी का चेहरा तुरंत बदल गया।

     

    “उसका नाम मत लो।”

     

    “क्यों?”

     

    “मेरी दादी कहती हैं कि पूर्णिमा की रात वहां कोई खिड़की से बाहर देखता है।”

     

    चांदनी हंस पड़ी।

     

    “कोई इंसान?”

     

    गौरी ने धीरे से कहा, “पता नहीं।”

     

    चांदनी ने मजाक किया, “तो आज रात चलकर देख लेते हैं।”

     

    गौरी ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “पागल हो गई हो क्या?”

     

    चांदनी हंसती हुई बोली, “मैं मजाक कर रही हूं।”

     

    लेकिन उसके मन में अब वही बात बैठ गई थी।

     

    उस रात पूर्णिमा थी।

     

    आसमान बिल्कुल साफ था और चांद की रोशनी पूरे गांव में फैली हुई थी।

     

    चांदनी अपनी छत पर बैठी थी।

     

    अचानक उसकी नजर दूर हवेली की तरफ गई।

     

    वहां ऊपरी मंजिल की एक खिड़की में हल्की रोशनी दिखाई दे रही थी।

     

    चांदनी खड़ी हो गई।

     

    “ये क्या है?”

     

    उसने ध्यान से देखा।

     

    रोशनी सच में थी।

     

    उसे अपनी मां की बात याद आई।

     

    फिर उसे गौरी की दादी की कहानी याद आई।

     

    चांदनी ने खुद को समझाया।

     

    “कोई दीपक जलाकर गया होगा।”

     

    वह वापस बैठ गई।

     

    लेकिन कुछ मिनट बाद रोशनी गायब हो गई।

     

    चांदनी फिर खड़ी हुई।

     

    “अजीब है।”

     

    अगली सुबह उसने अपनी मां से पूछा, “मां, क्या हवेली में कोई रहता है?”

     

    मां ने चौंककर उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम ये क्यों पूछ रही हो?”

     

    “बस ऐसे ही।”

     

    मां ने कहा, “नहीं। वहां कोई नहीं रहता।”

     

    चांदनी ने पूछा, “फिर रात को वहां रोशनी क्यों थी?”

     

    मां के हाथ से गिलास लगभग छूट गया।

     

    “तुमने क्या देखा?”

     

    “ऊपर की खिड़की में दीपक जल रहा था।”

     

    मां कुछ पल चुप रहीं।

     

    फिर बोलीं, “आज के बाद उस हवेली की तरफ मत देखना।”

     

    चांदनी को अब यकीन हो गया था कि उसकी मां कुछ छिपा रही हैं।

     

    उसी दिन दोपहर में वह अपनी दादी के पास गई।

     

    दादी आंगन में बैठी थीं।

     

    चांदनी उनके पास बैठ गई।

     

    “दादी, आप मुझे हवेली के बारे में सच-सच बताइए।”

     

    दादी ने उसकी तरफ देखा।

     

    “किसने कहा तुम्हें उसके बारे में पूछने को?”

     

    “किसी ने नहीं। मैंने खुद देखा।”

     

    दादी की आंखों में चिंता आ गई।

     

    “क्या देखा?”

     

    “पूर्णिमा की रात खिड़की में दीपक।”

     

    दादी ने लंबी सांस ली।

     

    “बहुत साल पहले उस हवेली में एक परिवार रहता था। घर के मालिक की एक बेटी थी। उसका नाम भी चांदनी था।”

     

    चांदनी हैरान रह गई।

     

    “मेरे जैसा?”

     

    दादी ने सिर हिलाया।

     

    “हां। वह लड़की बहुत शांत थी। उसे रात में छत पर बैठकर चांद देखना पसंद था।”

     

    “फिर क्या हुआ?”

     

    दादी ने धीरे से कहा, “एक पूर्णिमा की रात वह अचानक गायब हो गई।”

     

    “कहां गई?”

     

    “किसी को नहीं पता।”

     

    “उसके परिवार ने उसे ढूंढा?”

     

    “बहुत ढूंढा। लेकिन उसका कोई पता नहीं चला।”

     

    चांदनी ने पूछा, “फिर हवेली बंद क्यों हो गई?”

     

    दादी बोलीं, “उसके बाद हवेली में अजीब घटनाएं होने लगीं। कभी दरवाजे अपने आप खुल जाते, कभी ऊपर की खिड़की में दीपक जलता दिखाई देता।”

     

    चांदनी कुछ देर चुप रही।

     

    “लेकिन दादी, इसका मतलब यह नहीं कि वहां कुछ डरावना है।”

     

    दादी ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा, “बेटी, हर रहस्य को जानना जरूरी नहीं होता।”

     

    चांदनी ने कुछ जवाब नहीं दिया।

     

    लेकिन उसके मन में एक सवाल लगातार घूमता रहा—

     

    अगर वह लड़की सालों पहले गायब हो गई थी, तो हर पूर्णिमा की रात दीपक कौन जलाता था?

     

    उस रात चांदनी देर तक सो नहीं सकी।

     

    आधी रात के करीब उसे बाहर से हल्की-सी आवाज सुनाई दी।

     

    “चांदनी…”

     

    वह तुरंत उठकर बैठ गई।

     

    कमरे में कोई नहीं था।

     

    उसने सोचा शायद उसका भ्रम होगा।

     

    फिर आवाज आई।

     

    “चांदनी…”

     

    इस बार आवाज बिल्कुल साफ थी।

     

    वह खिड़की के पास गई।

     

    बाहर पूरा आंगन चांदनी से भरा हुआ था।

     

    उसने दूर हवेली की तरफ देखा।

     

    ऊपर वही खिड़की दिखाई दे रही थी।

     

    और इस बार वहां दीपक जल रहा था।

     

    चांदनी के दिल की धड़कन तेज हो गई।

     

    तभी खिड़की के पास एक परछाईं दिखाई दी।

     

    एक लड़की जैसी परछाईं।

     

    चांदनी ने आंखें मलीं।

     

    परछाईं गायब हो चुकी थी।

     

    अगली सुबह उसने गौरी को सब बताया।

     

    गौरी ने कहा, “तुम्हें वहां नहीं जाना चाहिए।”

     

    चांदनी बोली, “मुझे लगता है वहां कोई रहस्य है।”

     

    “तो क्या करोगी?”

     

    चांदनी ने दृढ़ होकर कहा, “आज रात हवेली जाऊंगी।”

     

    गौरी ने डरते हुए पूछा, “अकेली?”

     

    चांदनी ने कहा, “तुम साथ चलोगी।”

     

    “बिल्कुल नहीं!”

     

    चांदनी हंस पड़ी।

     

    “ठीक है, मैं अकेली चली जाऊंगी।”

     

    गौरी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “नहीं! मैं भी चलूंगी।”

     

    रात होते ही दोनों चुपचाप गांव से बाहर निकल पड़ीं।

     

    चांदनी के हाथ में एक छोटी टॉर्च थी।

     

    हवेली का रास्ता चांद की रोशनी में साफ दिखाई दे रहा था।

     

    जैसे-जैसे वे हवेली के करीब पहुंचीं, हवा ठंडी होती गई।

     

    गौरी ने धीमे से कहा, “मुझे अच्छा नहीं लग रहा।”

     

    चांदनी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “डर मत। मैं हूं।”

     

    दोनों हवेली के बड़े दरवाजे के सामने पहुंचीं।

     

    दरवाजा बंद था।

     

    चांदनी ने उसे हल्का-सा धक्का दिया।

     

    किर्रर्र…

     

    दरवाजा अपने आप खुल गया।

     

    गौरी पीछे हट गई।

     

    “चांदनी… हमने इसे खोला नहीं।”

     

    चांदनी ने धीरे से अंदर देखा।

     

    अंदर पूरा अंधेरा था।

     

    लेकिन सीढ़ियों के ऊपर से हल्की चांदनी आ रही थी।

     

    तभी ऊपर से किसी के चलने की आवाज आई।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    दोनों ने एक-दूसरे का हाथ कसकर पकड़ लिया।

     

    चांदनी ने ऊपर देखा।

     

    सीढ़ियों के आखिरी छोर पर एक लड़की खड़ी थी।

     

    उसने सफेद कपड़े पहन रखे थे।

     

    चेहरा चांदनी को साफ दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    लड़की ने धीरे से अपना हाथ उठाया और ऊपर की खिड़की की तरफ इशारा किया।

     

    फिर अचानक गायब हो गई।

     

    गौरी ने कांपते हुए कहा, “चलो यहां से!”

     

    लेकिन चांदनी ने सीढ़ियों की तरफ कदम बढ़ा दिए।

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    चांदनी ने धीमी आवाज में कहा—

     

    “क्योंकि मुझे लगता है… वो हमें डराने नहीं, कुछ बताने आई थी।”

     

    दोनों धीरे-धीरे सीढ़ियां चढ़ने लगीं।

     

    ऊपर पहुंचकर उन्हें एक पुराना कमरा दिखाई दिया।

     

    दरवाजा आधा खुला था।

     

    चांदनी ने दरवाजा खोला।

     

    कमरे के बीच एक पुरानी मेज थी।

     

    मेज पर एक तस्वीर रखी थी।

     

    चांदनी ने टॉर्च की रोशनी तस्वीर पर डाली।

     

    तस्वीर देखते ही उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    तस्वीर में वही लड़की थी जिसे उन्होंने सीढ़ियों पर देखा था।

     

    और तस्वीर के नीचे लिखा था—

     

    “चांदनी — इस घर की आखिरी बेटी।”

     

    चांदनी कुछ समझ पाती, उससे पहले कमरे का दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

     

    गौरी चीख पड़ी।

     

    और उसी पल कमरे के अंधेरे में किसी लड़की की धीमी आवाज गूंजी—

     

    “तुम… आखिर आ ही गईं।”

     

    चांदनी ने कांपते हुए पूछा—

     

    “कौन हो तुम?”

     

    अंधेरे से जवाब आया—

     

    “तुम्हें अपने घर का सच नहीं पता…”

     

    और कमरे में रखा पुराना दीपक अचानक जल उठा।

  • इंसानी हैवान

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    इंसानी हैवान

     

    शहर के सबसे अमीर परिवारों में अगर किसी का नाम लिया जाता था, तो सबसे पहले रुद्र प्रताप सिंह का नाम आता था।

     

    करोड़ों की संपत्ति, आलीशान हवेली और शहर में हर जगह उनका दबदबा था। लेकिन उस परिवार का बड़ा बेटा रुद्र लोगों के बीच अपनी दौलत के लिए नहीं, बल्कि अपने अजीब और डरावने व्यवहार के लिए जाना जाता था।

     

    रुद्र अपने घर में भी किसी से बात नहीं करता था।

     

    न पिता से।

     

    न मां से।

     

    न अपने छोटे भाई रोहन से।

     

    कई बार उसकी मां उसके कमरे के बाहर घंटों खड़ी रहती, लेकिन दरवाजा खुलता ही नहीं था।

     

    रोहन की शादी तय हो चुकी थी। घर में खुशी का माहौल था, लेकिन उसके माता-पिता की एक ही चिंता थी।

     

    “रोहन की शादी कैसे हो सकती है?” पिता ने कहा, “जब तक रुद्र की शादी नहीं होगी, लोग क्या कहेंगे?”

     

    मां ने धीमे से कहा, “लेकिन रुद्र को कौन लड़की पसंद करेगी?”

     

    दोनों चुप हो गए।

     

    आखिर पूरे शहर में रुद्र को लोग इंसानी हैवान कहते थे।

     

    उसकी आंखों में हमेशा एक अजीब सी कठोरता रहती थी। किसी से बात करते समय उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं आता था।

     

    फिर एक दिन उसके पिता को एक गरीब परिवार के बारे में पता चला।

     

    उस परिवार की बेटी थी मीरा।

     

    मीरा के पिता पर बहुत कर्ज था और घर की हालत खराब थी। रुद्र के पिता ने उसके परिवार के सामने शादी का प्रस्ताव रखा।

     

    “तुम्हारे सारे कर्ज हम चुका देंगे।”

     

    मीरा के पिता ने मजबूरी में हामी भर दी।

     

    मीरा को जब पता चला तो उसने पूछा, “मुझे किससे शादी करनी है?”

     

    उसकी मां की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “रुद्र से।”

     

    मीरा ने पहली बार उसका नाम सुना था।

     

    शादी हो गई।

     

    लेकिन शादी के बाद दोनों के बीच अजीब सी खामोशी थी।

     

    एक ही घर।

     

    एक ही कमरा।

     

    लेकिन दोनों के बीच जैसे कई दीवारें थीं।

     

    रुद्र रात को कमरे में आता, कुछ देर खिड़की के पास खड़ा रहता और फिर बिना कुछ कहे बाहर चला जाता।

     

    मीरा भी उससे सवाल नहीं करती।

     

    एक रात मीरा ने हिम्मत करके पूछा,

     

    “आप रात में कहां जाते हैं?”

     

    रुद्र अचानक उसकी तरफ मुड़ा।

     

    उसकी आंखों में ऐसी सख्ती थी कि मीरा सहम गई।

     

    “जहां मुझे जाना होता है।”

     

    बस इतना कहकर वह चला गया।

     

    मीरा ने उस रात पहली बार महसूस किया कि उसके पति के भीतर कुछ ऐसा था, जिसे वह किसी से छिपा रहा था।

     

    दिन बीतते गए।

     

    रुद्र का व्यवहार वैसा ही रहा।

     

    लेकिन मीरा ने एक चीज नोटिस की।

     

    हर रात ठीक बारह बजे के बाद रुद्र घर से निकलता था।

     

    और सुबह होने से पहले वापस आ जाता था।

     

    एक रात मीरा की नींद अचानक खुली।

     

    कमरे में रुद्र नहीं था।

     

    दरवाजा खुला हुआ था।

     

    मीरा उठकर बाहर आई।

     

    हवेली में पूरी तरह सन्नाटा था।

     

    तभी उसे दूर से किसी लोहे की चीज के घिसटने जैसी आवाज सुनाई दी।

     

    छन्न… छन्न…

     

    मीरा का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    उसने देखा, रुद्र पीछे के दरवाजे से बाहर जा रहा था।

     

    मीरा ने चुपचाप उसका पीछा करने का फैसला किया।

     

    रुद्र हवेली के पीछे बने पुराने हिस्से की तरफ जा रहा था।

     

    वह जगह सालों से बंद थी।

     

    मीरा एक पेड़ के पीछे छिप गई।

     

    रुद्र ने अपनी जेब से एक पुरानी चाबी निकाली और दीवार में बने छोटे से दरवाजे का ताला खोल दिया।

     

    दरवाजा खुलते ही अंदर से ठंडी हवा का झोंका आया।

     

    रुद्र अंदर चला गया।

     

    मीरा भी कुछ देर बाद डरते-डरते दरवाजे तक पहुंची।

     

    अंदर अंधेरा था।

     

    दीवारों पर नमी थी।

     

    जैसे वह कोई कमरा नहीं बल्कि पुरानी कालकोठरी हो।

     

    मीरा ने धीरे से आगे कदम बढ़ाया।

     

    तभी अंदर से लोहे की आवाज आई।

     

    छन्न…!

     

    मीरा ने सामने देखा और उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    कमरे के बीचोंबीच रुद्र बैठा था।

     

    उसके हाथ और पैर मोटी लोहे की जंजीरों से बंधे हुए थे।

     

    मीरा के मुंह से चीख निकलने ही वाली थी कि उसने अपना मुंह दबा लिया।

     

    “ये… ये क्या है?”

     

    रुद्र ने अचानक सिर उठाया।

     

    उसकी नजर मीरा पर पड़ी।

     

    कुछ सेकंड तक दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    फिर रुद्र ने बेहद धीमी आवाज में कहा,

     

    “तुम यहां क्यों आई?”

     

    मीरा डरते हुए बोली,

     

    “आप खुद को जंजीरों से क्यों बांधते हैं?”

     

    रुद्र ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    मीरा उसके पास जाने लगी।

     

    तभी दीवार के पीछे से किसी के फुसफुसाने की आवाज आई।

     

    “उसे मत खोलना…”

     

    मीरा वहीं रुक गई।

     

    उसने घबराकर चारों तरफ देखा।

     

    “कौन है?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    रुद्र ने जोर से कहा,

     

    “मीरा! यहां से चली जाओ!”

     

    लेकिन तभी कमरे के एक कोने में रखा पुराना आईना अपने आप हिलने लगा।

     

    मीरा की नजर उसमें पड़ी।

     

    आईने में उसे रुद्र दिखाई दे रहा था।

     

    लेकिन उसके पीछे…

     

    एक काली परछाई खड़ी थी।

     

    मीरा ने पलटकर देखा।

     

    वहां कोई नहीं था।

     

    उसने फिर आईने में देखा।

     

    परछाई अब रुद्र के बिल्कुल पीछे थी।

     

    मीरा चीख पड़ी।

     

    रुद्र ने अपनी जंजीर खींचते हुए कहा,

     

    “मत देखो!”

     

    लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।

     

    आईने में परछाई ने धीरे-धीरे अपना चेहरा उठाया।

     

    और मीरा ने देखा…

     

    वह चेहरा रुद्र जैसा ही था।

     

    मीरा पीछे हट गई।

     

    “ये कौन है?”

     

    रुद्र ने आंखें बंद कर लीं।

     

    काफी देर बाद उसने कहा,

     

    “वो मैं हूं।”

     

    मीरा के होश उड़ गए।

     

    “क्या?”

     

    रुद्र ने भारी आवाज में कहा,

     

    “मेरे अंदर कुछ है… जो मुझे खुद भी नहीं पता कि इंसान है या कुछ और।”

     

    मीरा चुप रही।

     

    रुद्र ने आगे कहा,

     

    “जब मैं छोटा था, इस हवेली में एक हादसा हुआ था। उसके बाद से मेरे अंदर ये अजीब बदलाव शुरू हुए। रात होते ही मुझे कुछ याद नहीं रहता। सुबह उठता हूं तो कई बार घर की चीजें टूटी मिलती हैं।”

     

    “तो आप खुद को यहां क्यों बांधते हैं?”

     

    रुद्र ने उसकी तरफ देखा।

     

    “ताकि रात में मैं किसी और को नुकसान न पहुंचा सकूं।”

     

    मीरा की आंखों में डर के साथ अब हैरानी भी थी।

     

    तभी बाहर से दरवाजा जोर से बंद होने की आवाज आई।

    धड़ाम!

    दोनों चौंक गए।

     

    रुद्र ने तुरंत कहा,“मीरा, भागो!”

    “लेकिन आप?”

    “मेरी चिंता मत करो!”

     

    अचानक जंजीरें अपने आप हिलने लगीं।

     

    छन्न… छन्न… छन्न…

    रुद्र का चेहरा बदलने लगा।

     

    उसकी आंखों में अजीब सी चमक आ गई।

     

    मीरा पीछे हट गई।

    रुद्र ने दांत भींचकर कहा,

    “मैंने कहा था… भागो!”

     

    लेकिन मीरा भागी नहीं।

    उसने देखा कि रुद्र जंजीरों को तोड़ने की कोशिश नहीं कर रहा था।

     

    बल्कि उन्हें और कसकर पकड़ रहा था।

    जैसे वह अपने ही शरीर से लड़ रहा हो।

     

    तभी दीवार पर लगी एक पुरानी तस्वीर नीचे गिर गई।

    मीरा ने तस्वीर उठाई।

     

    तस्वीर में रुद्र के पिता, मां और एक छोटा बच्चा खड़े थे।

    लेकिन तस्वीर के पीछे हाथ से कुछ लिखा था।

     

    मीरा ने पढ़ा“रुद्र वह नहीं है जिसे तुम समझ रहे हो।”

    मीरा का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    उसने तस्वीर को पलटा।

    पीछे एक और लाइन थी।

     

    “असली राज हवेली के मालिक के कमरे में छिपा है।”

    मीरा ने धीरे से रुद्र की तरफ देखा।

     

    रुद्र अब बिल्कुल शांत था।

    उसने धीमे से कहा,

     

    “अब तुम्हें सच जानना ही होगा।”

     

    मीरा ने पूछा,“कौन सा सच?”

    रुद्र ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

     

    “जिस दिन तुम इस घर में आई थीं… उसी दिन से तुम्हारी जिंदगी खतरे में थी।”

     

    मीरा के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    रुद्र ने आगे कहा,“और सबसे बड़ा सवाल ये नहीं है कि मैं रात में खुद को जंजीरों से क्यों बांधता हूं…”

     

    वह कुछ पल के लिए रुका।

     

    फिर बोला“सवाल ये है कि हर रात बारह बजे मुझे यहां कौन लाता है?”

    मीरा की नजर दरवाजे पर गई।दरवाजा बाहर से बंद था।

    और तभी बाहर किसी के कदमों की आवाज आने लगी।

    धीरे-धीरे…बहुत धीरे…

    कोई कालकोठरी की तरफ बढ़ रहा था।ठक… ठक… ठक…

    रुद्र ने पहली बार डरकर दरवाजे की तरफ देखा।

    “वो आ गया…”मीरा ने पूछा,

    “कौन?”

    रुद्र ने फुसफुसाकर कहा “मेरे पिता।”