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“तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 22

पढ़ने का समय : 9 मिनट

एपिसोड – 22 : जिसे भाई समझा, वही सबसे बड़ा राज था

 

नीलगिरी हवेली के उस गुप्त कमरे में अचानक ऐसी खामोशी छा गई थी कि सबकी सांसों की आवाज तक साफ सुनाई दे रही थी।

 

सामने खड़ा आदमी खुद को शेखर का भाई बता रहा था।

 

आरव उसकी तरफ देखता रह गया।

 

“तुम… शेखर के भाई हो?”

 

उस आदमी के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।

 

“हां।”

 

राघव ने गुस्से में कहा,

 

“झूठ बोलना बंद करो!”

 

आदमी ने उसकी तरफ देखा।

 

“राघव, तुम अब भी मुझे पहचानने से इनकार कर रहे हो?”

 

राघव की आंखें फैल गईं।

 

“तुम…”

 

माधवी ने कांपते हुए कहा,

 

“विक्रम…”

 

आरोही ने हैरानी से पूछा,

 

“विक्रम कौन?”

 

माधवी ने धीमे से कहा,

 

“शेखर का छोटा भाई।”

 

आरव की नजर उस आदमी पर टिक गई।

 

“अगर तुम विक्रम हो… तो इतने सालों तक कहां थे?”

 

विक्रम हंस पड़ा।

 

“जहां मुझे होना चाहिए था।”

 

“कहां?”

 

“तुम्हारे आसपास।”

 

आरव के चेहरे पर उलझन थी।

 

“मतलब?”

 

विक्रम ने एक कदम आगे बढ़ाया।

 

“तुम्हें लगता है तुम्हारी जिंदगी में जो कुछ हुआ, वो सब अचानक हुआ?”

 

आरव ने कुछ नहीं कहा।

 

विक्रम बोला,

 

“तुम्हारी हर परेशानी, हर हादसा, हर वो इंसान जो अचानक तुम्हारी जिंदगी में आया… उसके पीछे किसी न किसी का हाथ था।”

 

आरोही ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“तो तुमने हमें कब से देखा?”

 

विक्रम ने कहा,

 

“बहुत पहले से।

 

राघव ने गुस्से में कहा,

 

“तुमने इतने सालों तक हमें क्यों नहीं छोड़ा?”

 

विक्रम ने कहा,

 

“क्योंकि मुझे शेखर की तलाश थी।”

 

“तुम्हें शेखर से क्या चाहिए था?”

 

“उसकी मौत।”

 

माधवी चौंक गईं।

 

“तुम अपने ही भाई को मारना चाहते थे?”

 

विक्रम की आंखों में गुस्सा भर आया।

 

“क्योंकि उसने मेरे साथ धोखा किया था।”

 

आरव ने पूछा,

 

“कैसा धोखा?”

 

विक्रम ने कुछ पल उसे देखा।

 

“तुम्हें सच जानना है?”

 

“हां।”

 

“तो पहले ये समझो कि तुम्हारे पिता सिर्फ तुम्हारे पिता नहीं थे।”

 

“फिर?”

 

“वो उस संगठन के मुखिया थे जिसने हमारे पूरे परिवार की जिंदगी बदल दी।”

 

आरव ने पूछा,

 

“कौन-सा संगठन?”

 

विक्रम चुप रहा।

 

अर्जुन ने कहा,

 

“विक्रम, अब ये सब बताने का समय आ गया है।”

 

विक्रम ने उनकी तरफ देखा।

 

“तुम भी यहां हो?”

 

अर्जुन ने कहा,

 

“हां।”

 

विक्रम हंस पड़ा।

 

“तो फिर आज बहुत सारे पुराने हिसाब पूरे होंगे।”

 

विक्रम ने दीवार पर लगे पुराने प्रोजेक्टर को देखा।

 

उसने एक बटन दबाया।

 

स्क्रीन फिर से जल उठी।

 

इस बार शेखर सामने नहीं थे।

 

बल्कि एक पुरानी तस्वीर दिखाई दी।

 

उसमें शेखर, विक्रम, राघव और अर्जुन एक साथ खड़े थे।

 

आरव ने तस्वीर देखकर पूछा,

 

“आप सब एक-दूसरे को पहले से जानते थे?”

 

राघव ने कहा,

 

“हां।”

 

“कितने सालों से?”

 

“तुम्हारे जन्म से भी पहले।”

 

आरोही ने पूछा,

 

“फिर ये सब छुपाया क्यों गया?”

 

राघव ने कहा,

 

“क्योंकि हम सबने एक गलती की थी।”

 

“क्या?”

 

राघव ने सिर झुका लिया।

 

“हमने शेखर पर भरोसा किया।”

 

विक्रम ने कड़वाहट से कहा,

 

“और वही हमारी सबसे बड़ी गलती थी।”

 

आरव ने पूछा,

 

“शेखर ने क्या किया?”

 

विक्रम ने कहा,

 

“उसने अपनी मौत का नाटक किया।”

 

आरव चौंक गया।

 

“क्या?”

 

“हां।”

 

“लेकिन क्यों?”

 

“क्योंकि उसे पता चल गया था कि कोई उसके पीछे पड़ा है।”

 

अर्जुन ने कहा,

 

“वो सिर्फ अपने लिए नहीं छिपा था।”

 

विक्रम ने तुरंत कहा,

 

“हां! वो आरव और आरोही को बचाने के लिए छिपा था।”

 

आरोही ने हैरानी से पूछा,

 

“मुझे भी?”

 

विक्रम ने उसकी तरफ देखा।

 

“हां।”

 

विक्रम ने एक पुरानी फाइल निकाली।

 

“तुम दोनों का जन्म एक ही रात हुआ था।”

 

आरव और आरोही एक-दूसरे को देखने लगे।

 

“लेकिन तुम्हें नहीं पता कि उसी रात क्या हुआ था।”

 

विक्रम ने फाइल खोली।

 

“अस्पताल में आग लगाई गई थी।”

 

माधवी की आंखों से आंसू निकल आए।

 

“हां।”

 

आरोही ने पूछा,

 

“किसने?”

 

विक्रम ने कहा,

 

“विराज ने।”

 

आरव ने गुस्से में कहा,

 

“लेकिन वो क्यों?”

 

“क्योंकि उस अस्पताल में तुम्हारे जन्म का रिकॉर्ड था।”

 

“सिर्फ हमारा रिकॉर्ड?”

 

“नहीं।”

 

विक्रम ने फाइल का एक पन्ना उठाया।

 

“एक ऐसा रिकॉर्ड भी था जो साबित कर सकता था कि विराज ने करोड़ों रुपये का घोटाला किया था।”

 

कबीर ने कहा,

 

“इसलिए उसने अस्पताल में आग लगाई।”

 

“हां।”

 

आरव ने पूछा,

 

“लेकिन हम दोनों को किसने बचाया?”

 

विक्रम ने कहा,

 

“तुम्हारी मां माधवी और नंदिनी ने।”

 

आरोही ने मां की तरफ देखा।

 

“मां?”

 

नंदिनी ने उसकी तरफ देखा।

 

“उस रात मैं तुम्हें लेकर भागी थी।”

 

माधवी बोलीं,

 

“और मैं आरव को लेकर।”

 

आरोही की आंखों से आंसू बहने लगे।

 

“फिर?”

 

नंदिनी ने कहा,

 

“फिर हम अलग हो गए।”

 

आरव ने अपनी मां का हाथ पकड़ लिया।

 

“मां, आपने मुझे इतने साल क्यों नहीं बताया?”

 

माधवी ने रोते हुए कहा,

 

“क्योंकि हमें डर था कि अगर तुम्हें सच पता चला तो वो लोग तुम्हें फिर ढूंढ लेंगे।”

 

“कौन लोग?”

 

माधवी ने विक्रम की तरफ देखा।

 

विक्रम ने कहा,

 

“वही लोग जिनके लिए आज भी तुम दोनों सबसे बड़ा खतरा हो।”

 

आरव ने कहा,

 

“लेकिन अब मैं डरूंगा नहीं।”

 

विक्रम मुस्कुराया।

 

“यही तो देखना चाहता था।”

 

आरोही ने पूछा,

 

“क्या?”

 

“कि तुम दोनों डरते हो या लड़ते हो।”

 

आरव ने कहा,

 

“हम लड़ेंगे।”

 

विक्रम ने कहा,

 

“तो फिर तुम्हें शेखर तक पहुंचना होगा।”

 

आरव ने तुरंत पूछा,

 

“वो कहां हैं?”

 

विक्रम ने कहा,

 

“यहीं।”

 

विक्रम उन्हें हवेली के एक पुराने हिस्से में ले गया।

 

वहां एक बड़ी किताबों की अलमारी थी।

 

उसने एक किताब निकाली।

 

अलमारी धीरे-धीरे पीछे हट गई।

 

पीछे एक संकरी सीढ़ी दिखाई दी।

 

आरोही ने पूछा,

 

“ये रास्ता कहां जाता है?”

 

विक्रम ने कहा,

 

“उस कमरे तक जहां शेखर पिछले दो सालों से छिपा है।”

 

आरव की धड़कन तेज हो गई।

 

“दो साल?”

 

“हां।”

 

“और आपने हमें क्यों नहीं बताया?”

 

विक्रम ने कहा,

 

“क्योंकि पहले मुझे यकीन करना था कि तुम सच में उसके बेटे हो।”

 

आरव ने पूछा,

 

“तुम्हें अब यकीन है?”

 

विक्रम ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

 

“अब पूरा यकीन है।”

 

सब लोग सीढ़ियों से नीचे उतरने लगे।

 

सबसे आगे विक्रम था।

 

उसके पीछे आरव और आरोही।

 

फिर राघव, माधवी, नंदिनी, अर्जुन और कबीर।

 

सीढ़ियों के आखिर में एक लोहे का दरवाजा था।

 

विक्रम ने दरवाजे पर तीन बार दस्तक दी।

 

ठक… ठक… ठक…

 

अंदर से कोई जवाब नहीं आया।

 

विक्रम ने फिर दस्तक दी।

 

इस बार अंदर से आवाज आई “कौन?”

 

विक्रम ने कहा,

 

“मैं हूं।”

 

कुछ पल खामोशी रही।

 

फिर आवाज आई “तुम अकेले हो?”

 

विक्रम ने कहा,

 

“नहीं।”

 

“कौन है?”

 

विक्रम ने आरव की तरफ देखा।

 

“तुम्हारा बेटा।”

 

दरवाजे के पीछे अचानक खामोशी छा गई।

 

फिर…

 

क्लिक।

 

दरवाजा खुल गया।

 

कमरे में बहुत कम रोशनी थी।

 

एक आदमी खिड़की के पास खड़ा था।

 

उसके बाल थोड़े सफेद हो चुके थे।

 

चेहरा थका हुआ था।

 

लेकिन आंखें…

 

आरव की आंखों जैसी।

 

आरोही ने धीरे से कहा,

 

“शेखर…”

 

आदमी पलटा।

 

आरव और शेखर की नजरें मिलीं।

 

दोनों कुछ पल तक कुछ नहीं बोले।

 

फिर शेखर की आंखों से आंसू निकल पड़े।

 

“आरव…”

 

आरव के कदम वहीं रुक गए।

 

शेखर धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़े।

 

“मैंने तुम्हें पहली बार देखा था… जब तुम सिर्फ कुछ घंटे के थे।”

 

आरव की आंखें भर आईं।

 

“फिर मुझे छोड़ क्यों दिया?”

 

शेखर ने कहा,

 

“मैंने तुम्हें नहीं छोड़ा।”

 

“फिर?”

 

“मैंने तुम्हें बचाया।”

 

आरव की आवाज भर्रा गई।

 

“मेरे बिना रहे?”

 

“हर दिन।”

 

शेखर ने उसकी तरफ हाथ बढ़ाया।

 

आरव कुछ पल खड़ा रहा।

 

फिर उसने धीरे से उनका हाथ पकड़ लिया।

 

शेखर ने उसे अपने सीने से लगा लिया।

 

दोनों की आंखों से आंसू बहने लगे।

 

माधवी यह देखकर रो पड़ीं।

 

राघव भी नजरें झुका गए।

 

आरोही चुपचाप दोनों को देखती रही।

 

कुछ देर बाद शेखर ने आरव से कहा,

 

“मुझे माफ कर दो।”

 

आरव ने पूछा,

 

“किस बात के लिए?”

 

“तुम्हारा बचपन तुमसे छीनने के लिए।”

 

आरव ने सिर हिलाया।

 

“आपने मुझे बचाया था।”

 

शेखर ने कहा,

 

“लेकिन अब एक और सच तुम्हें जानना होगा।”

 

आरव ने उनकी तरफ देखा।

 

“क्या?”

 

शेखर ने कहा,

 

“तुम्हारे जन्म के बाद मैंने तुम्हें एक नाम दिया था।”

 

“कौन सा?”

 

शेखर ने कहा “आरव राजवंशी नहीं।”

 

कमरे में सन्नाटा छा गया।

 

शेखर ने आगे कहा,

 

“तुम्हारा असली नाम था…”

 

अचानक कमरे की लाइट बंद हो गई।

 

सब चौंक गए।

 

कबीर ने तुरंत दरवाजा बंद किया।

 

बाहर से गोली चलने की आवाज आई।

 

धांय!

 

शेखर ने आरव को नीचे खींच लिया।

 

“सब नीचे!”

 

अगली गोली दीवार में जा लगी।

 

आरोही चीख उठी।

 

“आरव!”

 

आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“मैं ठीक हूं।”

 

शेखर ने खिड़की से बाहर देखा।

 

“वो यहां तक पहुंच गए।”

 

विक्रम ने पूछा,

 

“कौन?”

 

शेखर ने गंभीर आवाज में कहा “विराज नहीं…”

 

उन्होंने बाहर अंधेरे में देखा।

 

“इस बार… खुद शेखर को मारने वाला आया है।”

 

आरव ने चौंककर पूछा,

 

“कौन?”

 

शेखर ने धीरे से उसकी तरफ देखा।

 

उनकी आंखों में डर था।

 

“तुम्हारा दूसरा पिता।”

 

आरव स्तब्ध रह गया।

 

“दूसरा… पिता?”

 

शेखर ने कहा “तुम्हें ये जानना होगा कि तुम्हें जन्म देने वाला कौन था… और तुम्हें पालने वाला कौन।”

 

आरोही ने हैरानी से पूछा,

 

“मतलब?”

 

शेखर ने जवाब दिया “आरव का जन्म दो परिवारों के राज से हुआ था।”

 

तभी दरवाजा जोर से हिलने लगा।

 

धड़ाम!

 

कोई बाहर से उसे तोड़ने की कोशिश कर रहा था।

 

शेखर ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

 

“अगर मैं आज नहीं बचा… तो नीलगिरी हवेली के नीचे छुपी लाल फाइल ढूंढना।”

 

आरव ने पूछा,

 

“उसमें क्या है?”

 

शेखर ने कहा “तुम्हारे जन्म का वो सच… जो तुम्हें और आरोही को हमेशा के लिए एक-दूसरे से अलग भी कर सकता है।”

 

आरोही का चेहरा सफेद पड़ गया।

 

“क्या?”

 

और तभी…

 

दरवाजा टूटकर जमीन पर गिर गया।

 

धुएं के बीच एक परिचित चेहरा सामने आया।

 

आरव की आंखें फैल गईं।

 

वह आदमी मुस्कुराया और बोला “बहुत हो गया पिता-पुत्र का मिलन… अब मेरी बेटी को मेरे साथ भेज दो।”

 

आरोही के पैरों तले जमीन खिसक गई।

 

“बेटी…?”

 

शेखर ने घबराकर कहा “आरोही… इसके पास मत जाना। यही तुम्हारा असली पिता है।”

 

जारी रहेगा…

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