एपिसोड – 20 : विराज की वापसी और आरव की जिंदगी का सबसे बड़ा सच
मंदिर के अंदर धुआं फैल चुका था।
टूटा हुआ दरवाजा जमीन पर पड़ा था और उसके पीछे खड़ा था वही शख्स, जिसे सब पच्चीस साल पहले मर चुका समझते थे।
विराज सूद।
आरोही ने उसे देखते ही आरव का हाथ कसकर पकड़ लिया।
“आरव… ये वही है?”
आरव की आंखें गुस्से से लाल हो गईं।
“हां।”
विराज धीरे-धीरे मंदिर के अंदर आया।
उसके चेहरे पर एक अजीब-सी मुस्कान थी।
“इतने सालों बाद आखिर हम आमने-सामने हैं।”
आरव ने कहा,
“तुम्हें तो मर जाना चाहिए था।”
विराज हंस पड़ा।
“लोगों को यही विश्वास दिलाना जरूरी था।”
अर्जुन उसके सामने आकर खड़े हो गए।
“विराज, अब बहुत हो चुका।”
विराज ने उनकी तरफ देखा।
“अर्जुन… तुम अब भी जिंदा हो?”
अर्जुन ने जवाब दिया,
“तुम्हारी तरह।”
विराज ने ताली बजाई।
“वाह! पच्चीस साल बाद भी तुम्हारी हिम्मत कम नहीं हुई।”
राघव ने गुस्से में कहा,
“तुमने हमारे परिवार की जिंदगी बर्बाद कर दी।”
विराज ने उसकी तरफ देखा।
“नहीं राघव… मैंने सिर्फ वही किया जो मुझे करना था।”
“तुमने माधवी को हमसे अलग किया।”
“हां।”
“नंदिनी को गायब किया।”
“हां।”
“और आरव और आरोही की जिंदगी बर्बाद की।”
विराज मुस्कुराया।
“अभी तो उनकी जिंदगी शुरू हुई है।”
आरव ने उसकी तरफ कदम बढ़ाया।
“अगर आरोही को छूने की कोशिश भी की तो…”
विराज ने बीच में कहा,
“तो क्या करोगे?”
आरव कुछ कहता, उससे पहले आरोही ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“आरव, नहीं।”
विराज दोनों को देखकर मुस्कुराया।
“यही तो मुझे चाहिए था।”
आरव ने भौंहें सिकोड़ लीं।
“क्या?”
“तुम दोनों का एक-दूसरे के लिए इतना प्यार।”
अर्जुन ने कहा,
“तुम्हें फाइल चाहिए, है ना?”
विराज ने सिर हिलाया।
“हां।”
“तो यहां से चले जाओ।”
“फाइल दो और मैं चला जाऊंगा।”
अर्जुन ने लोहे का बॉक्स अपने पीछे कर लिया।
“तुम्हें वो कभी नहीं मिलेगी।”
विराज ने बंदूक निकाल ली।
“फिर किसी एक की जान जाएगी।”
माधवी आगे बढ़ीं।
“विराज!”
विराज ने उनकी तरफ देखा।
“माधवी… तुम भी जिंदा हो।”
माधवी ने कहा,
“तुमने बहुत कुछ छीन लिया।”
“लेकिन तुम्हारा बेटा मैंने नहीं छीना।”
आरव ने कहा,
“मेरी जिंदगी में जो कुछ हुआ, उसके पीछे तुम थे।”
विराज मुस्कुराया।
“तुम्हारी जिंदगी में जो कुछ हुआ, उसके पीछे तुम्हारे अपने लोग थे।”
आरव ने राघव की तरफ देखा।
“क्या मतलब?”
विराज ने कहा,
“तुम्हें सच अपने पिता से पूछना चाहिए।”
राघव ने नजरें झुका लीं।
आरव उनके पास गया।
“पापा?”
राघव चुप रहे।
“आपको क्या पता है?”
विराज ने कहा,
“उसे सब पता है।”
आरव ने राघव का कंधा पकड़ लिया।
“सच बताइए।”
राघव की आंखों में आंसू आ गए।
“आरव…”
“हां?”
“मैंने तुम्हें बचाने के लिए एक बहुत बड़ा झूठ बोला था।”
आरव ने पूछा,
“कौन सा?”
राघव ने कहा “विराज तुम्हारा दुश्मन जरूर है… लेकिन तुम्हारे पिता का कातिल नहीं।”
आरव जैसे पत्थर का हो गया।
“तो मेरी जिंदगी किसने बर्बाद की?”
राघव ने आंखें बंद कर लीं।
“मैंने।”
“आपने?”
आरव की आवाज टूट गई।
राघव ने सिर झुका लिया।
“हां।”
आरोही तुरंत आरव के पास आई।
“आरव…”
आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया लेकिन उसकी नजरें राघव पर थीं।
“आपने मुझसे क्या छुपाया?”
राघव ने कहा,
“तुम्हारी असली पहचान।”
“मैं कौन हूं?”
“तुम मेरे बेटे हो।”
“ये तो मुझे पता है।”
“लेकिन तुम्हारे जन्म से पहले… तुम्हें लेकर एक फैसला हुआ था।”
“कैसा फैसला?”
राघव ने कहा,
“तुम्हें इस दुनिया से गायब कर देने का।”
आरव की सांसें थम गईं।
“किसने?”
राघव ने जवाब देने से पहले अर्जुन की तरफ देखा।
अर्जुन ने धीरे से कहा,
“राघव, अब सच छुपाने का कोई फायदा नहीं।”
राघव ने आखिरकार कहा “तुम्हें मारने का आदेश… तुम्हारे असली पिता ने दिया था।”
आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।
“मेरे… असली पिता?”
माधवी रो पड़ीं।
“आरव…”
आरव ने उनकी तरफ देखा।
“मां, मुझे सब जानना है।”
माधवी ने कहा,
“तुम्हारे पिता का नाम…”
वह रुक गईं।
आरव ने उनका हाथ पकड़ लिया।
“कहिए।”
माधवी की आंखों से आंसू गिर पड़े।
“तुम्हारे पिता… राघव नहीं हैं।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
आरोही ने हैरानी से राघव की तरफ देखा।
आरव पीछे हट गया।
“तो आप मेरे पिता नहीं हैं?”
राघव की आंखें भर आईं।
“खून से नहीं… लेकिन दिल से तुम हमेशा मेरे बेटे रहे हो।”
आरव ने पूछा,
“मेरे असली पिता कौन हैं?”
माधवी ने धीरे से कहा “शेखर राजवंशी।”
अर्जुन ने आंखें बंद कर लीं।
आरोही ने हैरानी से पूछा,
“शेखर कौन?”
अर्जुन ने कहा,
“राजवंशी परिवार का वो आदमी… जिसे दुनिया ने पच्चीस साल पहले सबसे बड़ा अपराधी माना था।”
आरव ने पूछा,
“उन्होंने क्या किया था?”
विराज पहली बार गंभीर हुआ।
“उन्होंने मेरी पूरी दुनिया खत्म करने की कोशिश की थी।”
आरव ने उसकी तरफ देखा।
“और फिर?”
विराज ने कहा,
“वो मारे गए।”
माधवी ने धीरे से कहा,
“नहीं।”
सबने उनकी तरफ देखा।
“शेखर मरे नहीं थे।”
आरव की आंखें फैल गईं।
“तो?”
माधवी ने कहा,
“वो गायब हो गए थे।”
“कहां?”
माधवी ने सिर हिलाया।
“मुझे नहीं पता।”
आरव ने कहा,
“तो मेरे पिता जिंदा हैं?”
माधवी ने जवाब दिया,
“शायद।”
विराज ने हंसकर कहा,
“नहीं।”
आरव उसकी तरफ मुड़ा।
विराज ने कहा,
“शेखर मर चुका है।”
माधवी ने कहा,
“तुम झूठ बोल रहे हो।”
विराज ने अपनी जेब से एक तस्वीर निकाली।
“अगर मैं झूठ बोल रहा हूं तो ये देखो।”
उसने तस्वीर आरव की तरफ फेंकी।
आरव ने तस्वीर उठाई।
तस्वीर में एक आदमी अस्पताल के बिस्तर पर लेटा था।
और उसके नीचे तारीख लिखी थी दो साल पहले।
आरव की सांसें रुक गईं।
“ये…”
माधवी ने तस्वीर देखी और पीछे हट गईं।
“नहीं…”
आरव ने पूछा,
“मां, आप इसे पहचानती हैं?”
माधवी ने कांपते हुए कहा “हां… ये तुम्हारे पिता हैं।”
आरव की आंखों के सामने जैसे सब धुंधला हो गया।
उसने तस्वीर सीने से लगा ली।
“तो वो जिंदा हैं।”
आरोही उसके पास आई।
“हम उन्हें ढूंढेंगे।”
आरव ने उसकी तरफ देखा।
“अगर उन्होंने मुझे कभी अपना बेटा माना ही नहीं तो?”
आरोही ने कहा,
“तो भी तुम उनके बेटे हो।”
“अगर उन्होंने मुझे छोड़ दिया हो?”
“तो मैं तुम्हें नहीं छोड़ूंगी।”
आरव की आंखों में आंसू आ गए।
“तुम हर बार मेरे टूटने से पहले मुझे संभाल लेती हो।”
आरोही ने धीरे से कहा,
“क्योंकि तुम मेरे लिए सिर्फ एक कहानी नहीं हो, आरव।”
आरव ने पूछा,
“फिर?”
आरोही ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा “तुम मेरी जिंदगी हो।”
कुछ पल के लिए दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।
मंदिर के उस डरावने माहौल में भी उनके बीच एक अजीब-सी शांति थी।
विराज ने उन्हें देखते हुए कहा,
“यही प्यार तुम्हारी सबसे बड़ी कमजोरी बनेगा।”
आरव ने आरोही का हाथ और कसकर पकड़ लिया।
“नहीं।”
“क्या?”
“यही हमारा सबसे बड़ा हथियार है।”
कबीर ने अचानक फाइल के आखिरी पन्ने पलटे।
“रुको।”
सब उसकी तरफ देखने लगे।
“यहां कुछ लिखा है।”
उसने पन्ना आरव के सामने किया।
उस पर लिखा था “शेखर राजवंशी – अंतिम लोकेशन: नीलगिरी हवेली।”
अर्जुन ने कहा,
“ये नाम यहां कैसे?”
राघव ने फाइल देखते ही कहा,
“ये रिकॉर्ड मैंने कभी नहीं देखा।”
देवेंद्र ने कहा,
“क्योंकि इसे आखिरी वक्त पर बदला गया था।”
आरव ने पूछा,
“नीलगिरी हवेली कहां है?”
अर्जुन ने कहा,
“समुद्र के किनारे।”
आरोही ने पूछा,
“वहां कौन रहता है?”
अर्जुन ने गंभीर आवाज में कहा,
“कोई नहीं।”
कबीर ने कहा,
“फिर वहां जाएंगे।”
अर्जुन ने तुरंत कहा,
“नहीं।”
“क्यों?”
“क्योंकि नीलगिरी हवेली में जो भी गया… वापस नहीं आया।”
आरव ने कहा,
“मैं जाऊंगा।”
राघव ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“नहीं।”
“इस बार कोई मुझे रोक नहीं सकता।”
आरोही उसके पास आकर खड़ी हो गई।
“मैं भी चलूंगी।”
राघव ने कहा,
“तुम दोनों नहीं समझते कि वहां कितना खतरा है।”
आरोही ने कहा,
“हमने अपने परिवार का सच जानने के लिए इतना कुछ सहा है।”
आरव ने कहा,
“अब पीछे नहीं हटेंगे।”
विराज चुपचाप उनकी बातें सुन रहा था।
अचानक उसने बंदूक नीचे कर दी।
“जाओ।”
आरव ने उसकी तरफ देखा।
“क्या?”
“नीलगिरी हवेली जाओ।”
“तुम हमें जाने दे रहे हो?”
विराज मुस्कुराया।
“हां।”
आरव को शक हुआ।
“क्यों?”
विराज ने कहा,
“क्योंकि वहां तुम्हें वो मिलेगा जिसे तुम ढूंढ रहे हो।”
“मेरे पिता?”
“शायद।”
“और अगर तुमने झूठ बोला?”
विराज ने कहा,
“तो तुम वापस आकर मुझे मार देना।”
आरव ने उसकी आंखों में देखा।
“मैं जरूर लौटूंगा।”
विराज ने कहा,
“मुझे पता है।”
सुबह होने लगी थी।
आसमान हल्का नीला हो चुका था।
सभी मंदिर से बाहर निकल आए।
आरव और आरोही थोड़ी दूरी पर खड़े थे।
आरोही ने पूछा,
“तुम ठीक हो?”
आरव ने कहा,
“पता नहीं।”
“तुम्हें डर लग रहा है?”
“हां।”
“मुझे भी।”
आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“लेकिन हम जाएंगे।”
आरोही ने सिर हिलाया।
“साथ।”
“साथ।”
तभी मंदिर के अंदर से अचानक जोरदार आवाज आई।
सब पलटकर देखने लगे।
लोहे का बॉक्स अपने आप बंद हो गया था।
और उसके ऊपर रखी फाइल के आखिरी पन्ने पर एक नई लाइन दिखाई दे रही थी।
कबीर ने पन्ना उठाया।
उस पर लिखा था “जिसे तुम अपना पिता समझ रहे हो, वह तुम्हारा पिता नहीं है।”
आरव ने हैरानी से कहा,
“ये अभी यहां नहीं था।”
अर्जुन ने पन्ना देखा।
उनके चेहरे का रंग उड़ गया।
“ये…”
आरोही ने पूछा,
“क्या हुआ?”
अर्जुन ने कांपते हुए कहा “इस लिखावट को मैं पहचानता हूं।”
“किसकी है?”
अर्जुन ने धीरे से जवाब दिया “शेखर की।”
आरव की धड़कन तेज हो गई।
“मतलब?”
अर्जुन ने फाइल को देखते हुए कहा “शेखर जिंदा है… और वो चाहता है कि तुम उसे ढूंढो।”
उसी समय आरव के फोन पर एक वीडियो आया।
वीडियो में एक अंधेरा कमरा था।
कुर्सी पर एक आदमी बैठा था।
चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।
फिर उस आदमी ने धीरे-धीरे अपना चेहरा कैमरे की तरफ उठाया।
आरव की आंखें फैल गईं।
उस आदमी ने कहा “आरव… अगर तुम सच में अपने पिता को ढूंढना चाहते हो, तो नीलगिरी हवेली आओ।”
कुछ सेकंड की खामोशी के बाद उसने कहा “लेकिन अकेले आना… क्योंकि आरोही को साथ लाए, तो अगली बार तुम्हारी मां जिंदा नहीं बचेगी।”
वीडियो बंद हो गया।
आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।
आरोही ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“क्या हुआ?”
आरव ने कुछ नहीं कहा।
उसने सिर्फ फोन उसकी तरफ बढ़ा दिया।
वीडियो देखकर आरोही की आंखों में आंसू आ गए।
और तभी पीछे खड़ी माधवी चीख उठीं “नहीं! आरव वहां अकेला नहीं जाएगा… क्योंकि नीलगिरी हवेली में सिर्फ शेखर नहीं है…”
सब उनकी तरफ देखने लगे।
माधवी ने कांपती आवाज में कहा “वहां नंदिनी भी कैद है।”
जारी रहेगा…

NSW अनुभवी लेखक -🥇

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