भाग~53 क्या अब सब ठीक होगा?
रूहानी के हाथ में थमा चम्मच अब भी उस प्लेट में अटका हुआ था, लेकिन उसका ध्यान बिल्कुल भी वहां नहीं था। अद्वैत के पूछे सवाल और उसके जवाब ने जैसे दिल के भीतर किसी पुराने दरवाज़े की चिटकनी फिर से खोल दी हो।
“हाँ… नहीं… मेरा मतलब… अपने छोटे भाई से मिलने का तो मन बहुत है,” उसने नज़रें बचाकर कहा, “लेकिन मेरी वजह से अगर वहाँ कोई सीन create हो गया तो यश का birthday spoil हो जाएगा।”
उसकी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। उसमें डर नहीं था, बस एक गहरी जिम्मेदारी थी….. जैसे वो अब सिर्फ अपनी नहीं, अपने अतीत की भी रखवाली कर रही हो।
अद्वैत ने उसकी आँखों में देख कर सिर्फ ‘ठीक है’ कहा, फिर थोड़ा मुस्कुराते हुए बोला, “तुम ब्रेकफास्ट कर लो, मैं तुम्हें स्टूडियो छोड़ देता हूँ।”
रूहानी ने तुरंत मना किया, “नहीं अद्वैत, मैं cab…..”
लेकिन अद्वैत ने बीच में ही टोकते हुए कहा, “तुम जब तक car चलाना सीख नहीं लेती, तब तक अगर मैं घर पर रहूँ, तो तुम्हें studio पहुँचाता रहूँगा। और तुम अपनी schedule देख लेना… ताकि मैं तुम्हें जल्दी से car drive करना सिखा दूँ।”
इतना कहकर वो पलटा और सीढ़ियाँ चढ़ते हुए ऊपर अपने कमरे की ओर चला गया।
रूहानी कुछ पल तक वहीं बैठी रह गई। इस सोच में की अभी तक किसी ने उसकी इस ज़िन्दगी में self-independent होने के लिए नहीं कहा, जो किया उसने अपनी ज़िद पर।
“कितनी अजीब बात है…” उसने बुदबुदाते हुए खुद से कहा, “…जो इंसान कभी मेरे लिए एक राह जैसा लगा करता था, आज वही एक अस्थायी पड़ाव बन गया है। एक साल बाद… हम फिर से अजनबी हो जाएंगे और मैं नहीं चाहती कि इस एक साल की मुलाक़ात में कोई ऐसा एहसास बन जाए जो फिर से मुझे खुद को खो देना पड़े।”
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शाम होते ही रूहानी ने जैसे ही स्टूडियो का दरवाज़ा बंद किया, बाहर खड़ी गाड़ी की तरफ़ नज़र गई और उसके क़दम ठिठक गए।
अद्वैत ड्राइवर सीट के बजाय कार के दरवाज़े से टिक कर खड़ा था, गहरे नीले कोट और हल्की चमकती शर्ट में, बाल थोड़े बिखरे हुए लेकिन चेहरे पर वही पुराना सधा हुआ सुकून।
कार की पिछली सीट पर खूबसूरत बुके और कई रंग-बिरंगे गिफ्ट्स रखे थे, जैसे किसी फिल्म का सेट रियलिटी में उतर आया हो।
रूहानी के माथे पर हल्की सी सलवट पड़ी और उसने पूछा, “ये सब क्या है अद्वैत?”
अद्वैत ने अपने दोनों हाथों को साइन के पास बांधते हुए गाड़ी के दरवाज़े पर पीठ टिकाई और नाटकीय अंदाज़ में बोला, “मुझे मेरी प्यारी बीवी के और भी प्यारे भाई ने स्पेशली अपने बर्थडे पार्टी में invite किया है, तो मैंने सोचा क्यों न आपसे भी पूछ लूं… क्या आप मेरे साथ चलेंगी, मैडम?”
रूहानी की आँखें बड़ी हो गईं, फिर आँखों में हल्की मुस्कान थी, लेकिन भीतर कहीं कुछ काँप रहा था। अद्वैत के शब्दों ने उसे कुछ ऐसा महसूस कराया जो उसने बहुत वक़्त से नहीं किया था, जैसे कोई सच में उसकी परवाह करता है, बिना किसी शर्त के, बिना किसी स्वार्थ के।
वो बोली, “अगर मैं न आना चाहूं तो…?”
अद्वैत ने पहले एक पल रुककर उसकी आँखों में झाँका, फिर बिना जल्दबाज़ी के कुछ कदम उसकी ओर बढ़ाया अपने दोनों हाथों को पीछे की तरफ बांधे हुए।
“आपकी इच्छा मेरे लिए हुक्म के बराबर है, मिसेज रूहानी चौहान,” अद्वैत ने मुस्कुराते हुए कहा, “ये बंदा आपको अभी घर छोड़ सकता है… लेकिन वो क्या है ना, वहाँ कोई आपकी राह तक रहा होगा….. दस साल छोटा, प्यारा, इकलौता भाई। जिसने आज पहली बार अपनी दीदी को invite किया है, और वो भी इस अद्वैत के ज़रिए…”
रूहानी की आँखों में कुछ चमकने लगा था। अद्वैत का ये अंदाज़…. थोड़ा चुलबुला, थोड़ा नरम, और पूरी तरह दिल से….. उसके लिए एकदम नया था।
वो हल्के से मुस्कुरा कर बोली, “ठीक है, ठीक है… इतनी ड्रामा की ज़रूरत नहीं है, मैं भी चल रही हूँ।”
लेकिन जैसे ही उसने अपने पहनावे पर नज़र डाली…. टी-शर्ट और जींस….. उसकी मुस्कान हल्की सी सिकुड़ गई। “माँ-पापा अगर मुझे इन कपड़ों में देखेंगे तो मार ही डालेंगे।”
अद्वैत ने फौरन जवाब दिया, “क्यों घबरा रही हो, रूहानी? वहाँ तुम मिसेज रूहानी चौहान बनकर जा रही हो और मिस्टर अद्वैत अवस्थी की पत्नी को जो अच्छा लगे वो पहने, उसे किसी के भी छोटी सोच के बारे में नहीं सोचना चाहिए।”
रूहानी की साँस जैसे थोड़ी रुक गई। उसकी नज़र अद्वैत के चेहरे पर टिक गई…. उस आवाज़ पर जिसमें न कोई बनावट थी, न कोई झूठ। “लेकिन…” उसने धीमे से कहा, “मेरे कपड़े पार्टी लुक के नहीं हैं।”
अद्वैत ने उसकी बात बीच में काटते हुए कार का दरवाज़ा खोला, “तो चलो, अभी भी देर नहीं हुई है, खरीद लेते हैं।”
रूहानी ने हल्का सा विरोध किया, “फिजूलखर्ची क्यों करनी? घर चलो, मैं अपने कपड़ों में से कुछ पहन लूंगी।”
लेकिन अद्वैत ने उसकी बात सुनकर सिर हल्के से हिलाया और एक सादगी भरी गंभीरता से बोला, “तुम्हारे भाई का बर्थडे है, रूहानी… प्लीज़, चलो शॉप पर। सिर्फ तुम्हारे लिए नहीं, उसके लिए भी जो शायद आज तुम्हें देखकर बेइंतहा ख़ुशी महसूस करेगा।”
वो एक पल के लिए चुप रही, फिर कुछ सोचते हुए धीरे से कार में बैठ गई। उसकी आँखों में पहली बार कोई बहस नहीं थी…. सिर्फ एक गहरा सन्नाटा और उस सन्नाटे में अद्वैत की बातों की गूंज।
कभी-कभी कोई अजनबी एक दिन में वो भरोसा दे जाता है, जो अपनों ने सालों में नहीं दिया होता…..
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शाम की परछाइयाँ धीरे-धीरे ज़मीन पर उतर रही थीं। आसमान पर फीकी नारंगी रेखाएँ नीले रंग में घुलने लगी थीं और बाज़ार की दुकानों में बत्तियाँ एक-एक कर जल उठी थीं। हल्की हवा में गुलमोहर के पत्ते सरसराते हुए जैसे किसी भूले-बिसरे गीत की धुन छेड़ रहे थे।
रेडीमेड शॉप के बाहर खड़ी अद्वैत की गाड़ी में ड्राइविंग सीट पर बैठे अद्वैत के बगल वाली सीट पर रूहानी बैठी थी, जिसने एक नरम lavender shade का अनारकली सूट खरीद कर पहना था, जिसके look में उसे कोई पुराना अहसास मिल गया था।
“तुम्हें यही पसंद आया?” अद्वैत ने पूछा, तो रूहानी ने ड्रेस पर नज़र गड़ाते हुए सिर हिलाया।
“हाँ… यही ठीक लगेगा आज के लिए,” उसकी आवाज़ में भावनाओं की तहें थीं…. कुछ गहरी, कुछ छुपी हुई।
अद्वैत ने बिना कुछ कहे गाड़ी स्टार्ट की। एक पल को दोनों खामोश रहे, जैसे किसी और की याद के लिए एक छोटा-सा मौन रख रहे हों।
जैसे ही गाड़ी ने बाज़ार की रौशनी को पीछे छोड़ा और सड़क अब रूहानी के पापा के घर की ओर मुड़ चुकी थी, हवा थोड़ी ठंडी और एहसास थोड़ा भारी हो गया।
रूहानी के मम्मी-पापा के घर की चौखट पर जब गाड़ी का इंजन बंद हुआ। सन्नाटा उतर आया, पर दिल की धड़कनें तेज़ थीं।
अद्वैत ने धीरे से कहा, “चलो…?”
रूहानी ने सिर झुकाकर कपड़े की तहें ठीक कीं, दुपट्टे पर उँगलियाँ फिराईं।
यश की कही बात उसका मन दोहराया जा रहा था,“तुम ethnic पहनती हो तो लगती नहीं जैसे इस दौर की हो…”
उन्होंने दरवाज़ा खोला। बाहर की हवा में रात की सीलन और किसी भूले अल्फाज़ की गंध थी।
दरवाज़े तक पहुँचते हुए रूहानी का हाथ काँपा, उसके wristwatch की सूई अब भी 6:57 पर रुकी थी…. वही वक़्त जब सब थम गया था।
अद्वैत ने दरवाज़े की घंटी की तरफ हाथ बढ़ाया।
उसने रूहानी की तरफ देखा, उसकी आँखों में एक सवाल था… “क्या तुम तैयार हो?”
रूहानी की धड़कनों की गति बढ़ चुकी थीं। उसने बिना कुछ कहे सिर हिला दिया।
और फिर… अद्वैत ने घंटी दबाई।
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“क्या वक़्त सच में थम गया है… या आज की रात वो सूई फिर से चलने वाली है?”
“रूहानी तैयार तो है… लेकिन किसके लिए? अपने भाई से मिलने के लिए, या उन सवालों का सामना करने के लिए जो अब तक अनकहे थे?”

लिखकर रूह छूने की कोशिश…..
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