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वो आ गया…

पढ़ने का समय : 7 मिनट

वो आ गया…

 

रात के करीब ग्यारह बज रहे थे। शहर के आखिरी छोर पर बने छोटे-से मोहल्ले में लगभग हर घर की बत्तियां बुझ चुकी थीं। सड़क बिल्कुल शांत थी। कभी-कभी किसी दूर जाती गाड़ी की आवाज आती और फिर सब कुछ पहले जैसा खामोश हो जाता।

 

उसी मोहल्ले में आरव अपने माता-पिता और छोटी बहन रिया के साथ रहता था।

 

उस रात उसके माता-पिता एक रिश्तेदार के घर गए हुए थे और रिया अपनी सहेली के घर रुक गई थी। घर में सिर्फ आरव था।

 

आरव पढ़ाई कर रहा था कि अचानक बाहर से किसी के दरवाजा खटखटाने की आवाज आई।

 

ठक… ठक… ठक…

 

आरव ने घड़ी देखी।

 

“इस वक्त कौन आया?”

 

वह कुर्सी से उठा और दरवाजे के पास गया।

 

“कौन है?”

 

बाहर से कोई जवाब नहीं आया।

 

आरव ने फिर पूछा—

 

“कौन?”

 

कुछ सेकंड तक बिल्कुल शांति रही।

 

फिर…

 

ठक… ठक… ठक…

 

इस बार आवाज पहले से थोड़ी तेज थी।

 

आरव ने दरवाजे की छोटी खिड़की से बाहर देखा।

 

सामने का बरामदा खाली था।

 

“शायद कोई शरारत कर रहा है।”

 

वह वापस कमरे में चला गया।

 

लेकिन जैसे ही उसने किताब खोली, उसका फोन बज उठा।

 

स्क्रीन पर रिया का नाम था।

 

आरव ने फोन उठाया।

 

“हां, बोल।”

 

रिया की आवाज बहुत धीमी थी—

 

“भैया… दरवाजा मत खोलना।”

 

आरव का चेहरा गंभीर हो गया।

 

“क्यों?”

 

“मेरी सहेली के घर के बाहर कोई बहुत देर से खड़ा है।”

 

आरव ने पूछा—

 

“कौन?”

 

“पता नहीं। वो बस सड़क की तरफ देख रहा है।”

 

आरव खिड़की के पास गया।

 

बाहर फिर वही सुनसान सड़क थी।

 

“तुम घबराओ मत। अपनी सहेली के घर में ही रहना।”

 

“भैया…”

 

“हां?”

 

रिया कुछ बोलना चाहती थी, लेकिन अचानक फोन कट गया।

 

आरव ने दोबारा फोन किया।

 

फोन बंद था।

 

उसने बेचैनी में मोबाइल मेज पर रखा।

 

तभी उसके घर के बाहर से आवाज आई—

 

“आरव…”

 

उसके हाथ से फोन लगभग गिर गया।

 

आवाज बहुत धीमी थी।

 

लेकिन वह साफ सुन सकता था।

 

किसी ने उसका नाम लिया था।

 

आरव धीरे-धीरे दरवाजे की तरफ बढ़ा।

 

“कौन है?”

 

कोई जवाब नहीं।

 

फिर आवाज आई—

 

“आरव…”

 

इस बार आवाज घर के पीछे से आई थी।

 

आरव तुरंत पीछे मुड़ा।

 

घर के पीछे वाला कमरा कई महीनों से बंद पड़ा था। वहां पुराने सामान के अलावा कुछ नहीं था।

 

उस कमरे का दरवाजा अचानक अपने आप थोड़ा खुल गया।

 

चर्ररर…

 

आरव कुछ पल उसे देखता रहा।

 

फिर उसने हिम्मत करके दरवाजा बंद कर दिया।

 

“बस बहुत हो गया।”

 

वह अपने कमरे में लौट आया।

 

तभी ऊपर की मंजिल से कुछ गिरने की आवाज आई।

 

धड़ाम!

 

आरव का दिल जोर से धड़कने लगा।

 

“ऊपर तो कोई नहीं है…”

 

वह सीढ़ियों के पास पहुंचा।

 

ऊपर पूरा अंधेरा था।

 

उसने मोबाइल की टॉर्च जलाई।

 

सीढ़ियों पर एक-एक कदम रखते हुए ऊपर जाने लगा।

 

पहली मंजिल पर पहुंचकर उसने देखा कि गलियारे के आखिरी कमरे का दरवाजा खुला था।

 

यह कमरा उसके दादा का था।

 

दादा की मृत्यु को कई साल हो चुके थे और तब से कमरा लगभग बंद ही रहता था।

 

आरव धीरे-धीरे अंदर गया।

 

कमरे में रखी पुरानी अलमारी खुली हुई थी।

 

फर्श पर कुछ पुराने कागज बिखरे थे।

 

एक कागज पर उसकी नजर पड़ी।

 

उस पर लिखा था—

 

“जब वह आए, तो उसका नाम मत लेना।”

 

आरव की रीढ़ में सिहरन दौड़ गई।

 

“वह कौन?”

 

तभी पीछे से धीमी आवाज आई—

 

“मैं…”

 

आरव ने झटके से पीछे देखा।

 

कोई नहीं था।

 

उसने तुरंत कमरे से बाहर निकलने की कोशिश की।

 

लेकिन दरवाजा बंद था।

 

उसने हैंडल घुमाया।

 

“खुलो!”

 

दरवाजा नहीं खुला।

 

फिर कमरे की खिड़की पर किसी की परछाईं दिखाई दी।

 

आरव कुछ कदम पीछे हट गया।

 

परछाईं धीरे-धीरे खिड़की से हट गई।

 

फिर कमरे के बाहर से कदमों की आवाज आने लगी।

 

ठक…

 

ठक…

 

ठक…

 

आरव ने सांस रोक ली।

 

कदमों की आवाज दरवाजे के ठीक बाहर आकर रुक गई।

 

कुछ सेकंड बाद किसी ने दरवाजे पर हाथ रखा।

 

आरव ने दरवाजा खोलने की कोशिश नहीं की।

 

तभी बाहर से एक आवाज आई—

 

“तुम्हारे दादा ने मुझे यहां आने से रोका था।”

 

आरव के चेहरे का रंग उड़ गया।

 

“तुम कौन हो?”

 

बाहर से कोई जवाब नहीं आया।

 

फिर आवाज आई—

 

“लेकिन अब वो नहीं हैं।”

 

अचानक दरवाजा खुल गया।

 

आरव पीछे हट गया।

 

गलियारा खाली था।

 

वह भागकर सीढ़ियों की तरफ आया।

 

तभी नीचे से मुख्य दरवाजा खुलने की आवाज आई।

 

चर्ररर…

 

आरव वहीं रुक गया।

 

दरवाजे के पास एक लंबी परछाईं दिखाई दी।

 

वह धीरे-धीरे अंदर आ रही थी।

 

आरव ने तुरंत अपने कमरे का दरवाजा बंद किया और बिस्तर के पास बैठ गया।

 

उसका फोन फिर बजा।

 

इस बार रिया का फोन था।

 

“भैया!”

 

“रिया! तुम ठीक हो?”

 

“हां, लेकिन आप घर में अकेले हो?”

 

“हां।”

 

रिया कुछ पल चुप रही।

 

फिर बोली—

 

“भैया… अभी मैं घर के बाहर खड़ी हूं।”

 

आरव का दिल जैसे रुक गया।

 

“क्या?”

 

“मैं अभी घर पहुंची हूं।”

 

आरव ने घबराकर पूछा—

 

“लेकिन तुमने तो कहा था कि तुम अपनी सहेली के घर हो!”

 

रिया बोली—

 

“मैं थी। लेकिन मुझे लगा कोई मुझे घर तक छोड़ने आया है।”

 

“कौन?”

 

रिया ने धीरे से कहा—

 

“वही आदमी जो हमारे घर के बाहर खड़ा है।”

 

आरव ने कमरे की खिड़की से बाहर देखा।

 

सड़क पर रिया खड़ी थी।

 

उसके पीछे एक लंबी परछाईं थी।

 

आरव ने घबराकर दरवाजा खोला और बाहर जाने लगा।

 

तभी उसके दादा के कमरे से फिर वही आवाज आई—

 

“उसे अंदर मत आने देना।”

 

आरव रुक गया।

 

उसने पीछे देखा।

 

कमरे के अंदर रखी पुरानी मेज पर एक डायरी खुली हुई थी।

 

वह दौड़कर उसके पास गया।

 

डायरी के आखिरी पन्ने पर लिखा था—

 

“वो इंसान नहीं है। वह उन लोगों के घर आता है, जहां पुराने घर का एक राज छिपा हो। उसे रोकने का एक ही तरीका है—उस राज को स्वीकार करना।”

 

आरव ने तेजी से पुराने कागज देखे।

 

उसे पता चला कि वर्षों पहले उनके घर की जमीन को लेकर एक बड़ा विवाद हुआ था। उसके दादा ने किसी निर्दोष परिवार को उनका हक दिलाने की कोशिश की थी, लेकिन वह परिवार गांव छोड़कर चला गया था।

 

शायद उसी अधूरे अन्याय की वजह से यह रहस्य इतने वर्षों से घर से जुड़ा था।

 

आरव ने डायरी हाथ में ली और बाहर आ गया।

 

सामने वह परछाईं खड़ी थी।

 

आरव ने कांपती आवाज में कहा—

 

“मैं सच जानता हूं।”

 

परछाईं रुक गई।

 

“मेरे दादा ने जो गलती की थी, मैं उसे छिपाऊंगा नहीं।”

 

कुछ पल तक सन्नाटा रहा।

 

फिर वह परछाईं धीरे-धीरे पीछे हटने लगी।

 

रिया दौड़कर आरव के पास आ गई।

 

“भैया!”

 

आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

परछाईं सड़क के आखिरी छोर तक गई और अचानक गायब हो गई।

 

सुबह मोहल्ले के बुजुर्गों को सारी बात बताई गई।

 

पुराने कागजों की जांच हुई और सच सामने आया कि कई साल पहले जमीन का अधिकार वास्तव में दूसरे परिवार का था।

 

आरव के परिवार ने वह जमीन उन्हें वापस कर दी।

 

उस दिन के बाद घर में कभी कोई अजीब आवाज नहीं आई।

 

कई महीनों बाद आरव उसी कमरे में बैठा दादा की डायरी पढ़ रहा था।

 

अचानक खिड़की से ठंडी हवा आई।

 

डायरी का आखिरी पन्ना अपने आप पलटा।

 

उस पर सिर्फ तीन शब्द लिखे थे—

 

“अब मैं जा रहा हूं।”

 

आरव ने खिड़की की तरफ देखा।

 

बाहर कोई नहीं था।

 

बस दूर सड़क पर एक परछाईं धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी।

 

और उस रात के बाद मोहल्ले में किसी ने उसे दोबारा नहीं देखा।

 

लेकिन आज भी जब कभी उस पुराने घर के पास रात में हवा अचानक ठंडी हो जाती है, लोग कहते हैं—

 

“डरना मत… वो आ गया था, अपना सच लेने… और सच मिलते ही चला गया।”

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