नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ
कान्हा और यशोदा मैया की छुपी हुई मटकी
वृंदावन में उस दिन सुबह से ही बहुत चहल-पहल थी। गोपियाँ अपने-अपने घरों में दूध-दही का काम कर रही थीं। कहीं मटकी में दही जम रहा था तो कहीं मक्खन निकाला जा रहा था। नंद भवन में भी यशोदा मैया सुबह से काम में लगी हुई थीं।
यशोदा मैया को अब अपने कान्हा की माखन चोरी की आदत अच्छी तरह पता चल चुकी थी।
इसलिए उन्होंने आज एक नई योजना बनाई।
उन्होंने खूब सारा ताजा माखन निकाला और उसे एक बड़ी मटकी में भर दिया। फिर उस मटकी को घर के ऐसे कमरे में रख दिया जहाँ कान्हा की नजर आसानी से न पहुँच सके।
यशोदा ने मन ही मन कहा—
“आज देखती हूँ मेरा नटखट कान्हा माखन कैसे ढूँढ़ता है।”
उन्हें क्या पता था कि कान्हा को रोकना इतना आसान नहीं था।
उसी समय कान्हा अपने दोस्तों के साथ आँगन में खेल रहे थे।
एक दोस्त दौड़ता हुआ आया और बोला—
“कान्हा! आज मैया ने माखन कहीं छिपा दिया है।”
कान्हा ने खेलना छोड़ दिया।
“सच?”
“हाँ। मैंने देखा है। मैया मटकी लेकर अंदर गई थीं।”
कान्हा ने आँखें सिकोड़कर कहा—
“तो आज माखन ढूँढ़ने का खेल खेलेंगे।”
सभी बच्चे खुश हो गए।
एक दोस्त बोला—
“लेकिन अगर यशोदा मैया ने पकड़ लिया तो?”
कान्हा हँस पड़े।
“पकड़ लिया तो कह देंगे हम तो छुपन-छुपाई खेल रहे थे।”
सब बच्चे धीरे-धीरे घर के अंदर जाने लगे।
कान्हा सबसे आगे थे।
उन्होंने पहले रसोई में देखा।
वहाँ कुछ नहीं था।
फिर उन्होंने अनाज वाले कमरे में देखा।
वहाँ भी कुछ नहीं मिला।
फिर एक छोटे कमरे में गए।
कान्हा ने चारों तरफ देखा।
“यहाँ भी नहीं।”
एक दोस्त बोला—
“कहीं मैया ने मटकी बाहर तो नहीं रख दी?”
कान्हा ने सिर हिलाया।
“नहीं। माखन घर के अंदर ही है। मुझे इसकी खुशबू आ रही है।”
बच्चे हँसने लगे।
कान्हा धीरे-धीरे आगे बढ़े।
तभी उन्हें एक बंद दरवाजा दिखाई दिया।
उन्होंने दरवाजा खोलने की कोशिश की।
दरवाजा बंद था।
कान्हा बोले—
“यही है!”
एक दोस्त डरते हुए बोला—
“कान्हा, इसे मत खोलो।”
कान्हा ने कहा—
“माखन यहीं है।”
उन्होंने दरवाजा खटखटाया।
अंदर से कोई आवाज नहीं आई।
कान्हा ने अपने दोस्तों से कहा—
“तुम सब पीछे हटो।”
फिर उन्होंने धीरे से दरवाजे की कुंडी उठाई।
दरवाजा खुल गया।
अंदर अंधेरा था।
कान्हा धीरे-धीरे अंदर गए।
एक कोने में बड़ी सी मटकी रखी थी।
कान्हा के चेहरे पर चमक आ गई।
“मिल गया!”
सभी बच्चे खुशी से उछल पड़े।
कान्हा मटकी के पास गए।
उन्होंने ढक्कन हटाया।
ताजा सफेद माखन देखकर उनकी आँखें चमकने लगीं।
एक दोस्त बोला—
“कान्हा, जल्दी करो। मैया आ जाएँगी।”
कान्हा ने कहा—
“पहले सबको मिलेगा।”
उन्होंने हाथ से माखन निकाला और दोस्तों को देने लगे।
तभी बाहर से यशोदा मैया की आवाज आई—
“कान्हा!”
सभी बच्चों के चेहरे का रंग उड़ गया।
एक बच्चा बोला—
“अब क्या होगा?”
कान्हा ने जल्दी से कहा—
“सब छिप जाओ!”
कोई परदे के पीछे छिप गया।
कोई संदूक के पीछे।
कान्हा खुद मटकी के पीछे बैठ गए।
यशोदा कमरे के पास पहुँचीं।
उन्होंने देखा कि दरवाजा खुला हुआ है।
वह समझ गईं कि उनकी योजना पकड़ ली गई है।
उन्होंने अंदर जाकर कहा—
“कान्हा, बाहर आ जाओ।”
कोई जवाब नहीं आया।
“मुझे पता है तुम यहीं हो।”
फिर भी चुप्पी।
यशोदा ने मुस्कुराते हुए कहा—
“अच्छा, अगर कान्हा नहीं निकले तो मैं ये माखन किसी और को दे दूँगी।”
मटकी के पीछे से तुरंत आवाज आई—
“नहीं!”
यशोदा हँस पड़ीं।
“मिल गए!”
कान्हा धीरे-धीरे बाहर निकले।
उनके हाथ और गाल माखन से भरे थे।
यशोदा ने दोनों हाथ कमर पर रखे।
“तो तुम यहाँ माखन ढूँढ़ रहे थे?”
कान्हा ने सिर झुका लिया।
“जी मैया।”
“मैंने माखन छिपाया था।”
“मुझे पता है।”
“फिर भी तुमने ढूँढ़ लिया?”
कान्हा मुस्कुराए।
“मैया, आप माखन छिपा सकती हो, लेकिन उसकी खुशबू नहीं।”
यशोदा अपनी हँसी रोक नहीं पाईं।
उन्होंने पूछा—
“और ये सारे बच्चे?”
कान्हा ने पीछे देखा।
सभी बच्चे धीरे-धीरे बाहर आ गए।
एक बच्चा बोला—
“मैया, गलती हमारी नहीं थी। कान्हा हमें लेकर आए थे।”
कान्हा ने तुरंत कहा—
“अरे! दोस्ती में सबकी गलती बराबर होती है।”
यशोदा ने कहा—
“अच्छा! अब दोस्ती भी याद आ रही है?”
कान्हा मुस्कुरा दिए।
यशोदा ने माखन की कटोरी उठाई।
“ठीक है। आज मैं तुम्हें माखन दूँगी।”
कान्हा खुश हो गए।
“सच?”
“हाँ। लेकिन एक शर्त है।”
“क्या?”
“पहले तुम मेरे लिए एक काम करोगे।”
कान्हा ने पूछा—
“कौन सा?”
“आँगन में जो मटके पड़े हैं, उन्हें सही जगह रखना होगा।”
कान्हा कुछ पल चुप रहे।
फिर बोले—
“माखन कितना मिलेगा?”
यशोदा हँसते हुए बोलीं—
“काम के हिसाब से।”
कान्हा ने तुरंत अपने दोस्तों को बुलाया।
“चलो, काम करते हैं।”
बच्चे मटके उठाने लगे।
कुछ ही देर में आँगन साफ हो गया।
यशोदा ने देखा तो उन्हें बहुत खुशी हुई।
उन्होंने सब बच्चों को माखन और मिश्री दी।
कान्हा ने अपना हिस्सा लिया और आधा अपने दोस्तों को दे दिया।
यशोदा ने पूछा—
“तुम अपना माखन भी बाँट देते हो?”
कान्हा बोले—
“अकेले खाने में क्या मजा है?”
एक दोस्त बोला—
“कान्हा, तुम बहुत अच्छे हो।”
कान्हा ने तुरंत कहा—
“लेकिन ये बात मैया को मत बताना।”
यशोदा हँस पड़ीं।
“मैंने सुन लिया है।”
सभी बच्चे खिलखिलाकर हँसने लगे।
शाम को जब नंद बाबा घर लौटे तो उन्होंने देखा कि आँगन बहुत साफ था।
उन्होंने पूछा—
“आज क्या हुआ?”
यशोदा बोलीं—
“आपके बेटे ने आज माखन चुराया भी और घर का काम भी किया।”
नंद बाबा हँस पड़े।
उन्होंने कान्हा को पास बुलाया।
“क्यों बेटा, आज क्या कारनामा किया?”
कान्हा ने मासूमियत से कहा—
“कुछ नहीं बाबा।”
यशोदा बोलीं—
“मटकी ढूँढ़ निकाली।”
नंद बाबा ने कहा—
“वाह! तुम्हारी नाक तो बहुत तेज है।”
कान्हा बोले—
“बाबा, माखन की खुशबू मुझे दूर से बुलाती है।”
नंद बाबा हँसने लगे।
रात को कान्हा यशोदा की गोद में सिर रखकर लेटे थे।
यशोदा उनके बाल सहला रही थीं।
उन्होंने पूछा—
“कान्हा, तुम इतना माखन क्यों खाते हो?”
कान्हा कुछ देर सोचते रहे।
फिर बोले—
“क्योंकि माखन मीठा होता है।”
यशोदा मुस्कुराईं।
“और माँ का प्यार?”
कान्हा ने तुरंत कहा—
“वो माखन से भी ज्यादा मीठा है।”
यशोदा की आँखें भर आईं।
उन्होंने कान्हा को सीने से लगा लिया।
कान्हा ने आँखें बंद कर लीं।
लेकिन सोने से पहले उन्होंने धीरे से पूछा—
“मैया?”
“हाँ बेटा?”
“कल माखन कहाँ छिपाओगी?”
यशोदा ने हँसते हुए कहा—
“अब तो मैं तुम्हारे सामने ही रखूँगी।”
कान्हा मुस्कुराए।
“तो फिर कल चोरी करने में मजा नहीं आएगा।”
यशोदा बोलीं—
“तुम्हारी शरारतें भी ना!”
कान्हा हँसते हुए माँ से लिपट गए।
उस रात नंद भवन में शांति थी।
लेकिन यशोदा जानती थीं कि अगले दिन उनका नन्हा कान्हा फिर कोई नई शरारत करने वाला है।
और इस बार उसकी शरारत सिर्फ माखन की मटकी तक सीमित नहीं रहने वाली थी।

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं
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