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ज़िंदगी

पढ़ने का समय : 5 मिनट

जिंदगी अनमोल है, इसे ऐसे बर्बाद मत करो — भाग 2

 

आरव घर पहुँचा तो उसकी माँ दरवाजे पर ही खड़ी थीं।

 

उसे देखते ही माँ ने पूछा—

 

“बेटा, खाना खाएगा?”

 

आरव ने सिर हिलाया।

 

“हाँ माँ।”

 

माँ ने कुछ नहीं पूछा।

 

वह समझ गई थीं कि आज उनका बेटा पहले से थोड़ा बेहतर है।

 

रात को खाना खाने के बाद आरव अपनी माँ के पास बैठ गया।

 

काफी देर तक दोनों चुप रहे।

 

फिर आरव ने कहा—

 

“माँ, क्या आपको कभी लगा कि मैं नाकाम हो गया हूँ?”

 

माँ ने तुरंत उसकी तरफ देखा।

 

“कभी नहीं।”

 

“लेकिन मैं तो बार-बार हार रहा हूँ।”

 

माँ ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“हारने वाला इंसान वह नहीं होता जो कोशिश करके असफल हो जाए। हारने वाला वह होता है जो अपनी जिंदगी की सारी उम्मीद छोड़ दे।”

 

आरव की आँखों में आँसू आ गए।

 

“मुझे बहुत डर लगता है माँ।”

 

“किस बात से?”

 

“इस बात से कि मैं कभी सफल नहीं हो पाऊँगा।”

 

माँ ने कहा—

 

“भविष्य की चिंता में आज की जिंदगी मत खो देना।”

 

ये बात आरव के दिल में उतर गई।

 

अगले दिन वह फिर उसी पार्क में गया।

 

वही बुजुर्ग वहाँ बैठे थे।

 

आरव ने मुस्कुराकर कहा—

 

“मैं वापस आ गया।”

 

बुजुर्ग ने कहा—

 

“मुझे उम्मीद थी।”

 

आरव उनके पास बैठ गया।

 

“मैंने फैसला किया है कि मैं फिर कोशिश करूँगा। लेकिन इस बार सिर्फ एक परीक्षा के भरोसे नहीं बैठूँगा। मैं कोई काम भी सीखूँगा।”

 

बुजुर्ग मुस्कुराए।

 

“अब तुम सही रास्ते पर हो।”

 

आरव ने अपनी पढ़ाई दोबारा शुरू की।

 

सुबह पढ़ाई करता, दोपहर में एक दुकान पर काम सीखता और शाम को अपने दोस्त रोहित से मिलता।

 

धीरे-धीरे उसका जीवन बदलने लगा।

 

समस्याएँ खत्म नहीं हुई थीं।

 

पैसे अभी भी कम थे।

 

परीक्षा का डर अभी भी था।

 

लेकिन अब आरव हर समस्या को अपनी पूरी जिंदगी नहीं समझता था।

 

एक दिन रोहित ने पूछा—

 

“तुझे याद है कुछ महीने पहले तू कितना परेशान था?”

 

आरव हँसते हुए बोला—

 

“हाँ। लगता था मेरी जिंदगी में कुछ बचा ही नहीं।”

 

रोहित ने कहा—

 

“और अब?”

 

आरव ने आसमान की तरफ देखा।

 

“अब लगता है कि जिंदगी में बहुत कुछ बाकी है।”

 

कुछ महीनों बाद आरव ने अपनी मेहनत से एक छोटा ऑनलाइन काम शुरू किया। उसे शुरुआत में बहुत कम पैसे मिले।

 

लेकिन उसने हार नहीं मानी।

 

उसने नई चीजें सीखीं, गलतियाँ कीं और फिर उन्हें सुधारा।

 

एक साल बाद उसकी आमदनी इतनी हो गई कि वह घर के खर्च में माँ की मदद करने लगा।

 

पिता भी धीरे-धीरे अपना काम शुरू करने लगे।

 

आरव की छोटी बहन की पढ़ाई जारी रही।

 

एक शाम आरव उसी पार्क में बैठा था।

 

वही बुजुर्ग उसके पास आए।

 

उन्होंने पूछा—

 

“अब भी लगता है कि जिंदगी बेकार है?”

 

आरव हँस पड़ा।

 

“नहीं। अब तो लगता है कि जिंदगी बहुत बड़ी है।”

 

बुजुर्ग ने कहा—

 

“यही समझ सबसे जरूरी है।”

 

आरव कुछ देर चुप रहा।

 

फिर उसने कहा—

 

“अगर उस दिन मैं आपसे नहीं मिला होता तो शायद मैं अपनी परेशानी किसी से नहीं कहता।”

 

बुजुर्ग ने गंभीर होकर कहा—

 

“इसलिए हमेशा याद रखना, जब मन बहुत भारी हो जाए तो अकेले मत रहना। अपने परिवार, दोस्त, शिक्षक या किसी भरोसेमंद बड़े इंसान से बात करना। मदद माँगना कमजोरी नहीं है।”

 

आरव ने सिर हिलाया।

 

उसे अब समझ आ चुका था कि मुश्किल समय में सबसे जरूरी चीज समाधान नहीं, बल्कि साथ और बातचीत भी होती है।

 

कुछ दिनों बाद आरव ने अपने मोहल्ले के बच्चों के लिए एक छोटी-सी पढ़ाई की कक्षा शुरू की।

 

वह उन्हें पढ़ाने लगा।

 

एक दिन एक बच्चा उससे बोला—

 

“भैया, मैं गणित में बहुत कमजोर हूँ। मुझसे नहीं होगा।”

 

आरव मुस्कुराया।

 

“ऐसा मत बोलो। अभी नहीं आता, इसका मतलब ये नहीं कि कभी नहीं आएगा।”

 

बच्चे ने पूछा—

 

“अगर मैं फेल हो गया तो?”

 

आरव ने कहा—

 

“तो फिर से कोशिश करेंगे। एक नतीजा तुम्हारी पूरी जिंदगी तय नहीं करता।”

 

बच्चा मुस्कुराया।

 

आरव ने उसे देखकर सोचा—

 

“काश मैंने ये बात खुद को भी उस समय समझाई होती।”

 

समय बीतता गया।

 

आरव ने अपनी जिंदगी में बहुत कुछ हासिल किया, लेकिन उसने अपनी पुरानी डायरी संभालकर रखी।

 

उसके पहले पन्ने पर आज भी वही लाइन लिखी थी—

 

“मैं एक दिन अपने परिवार को बहुत खुश रखूँगा।”

 

उसने उसके नीचे एक नई लाइन जोड़ दी—

 

“और रास्ता कितना भी मुश्किल हो, मैं अपनी जिंदगी को बेकार नहीं जाने दूँगा।”

 

उस दिन आरव ने अपनी कहानी बच्चों को सुनाई।

 

उसने कहा—

 

“जिंदगी हमेशा हमारे हिसाब से नहीं चलती। कभी हम सफल होते हैं, कभी असफल। कभी लोग हमारा साथ छोड़ देते हैं, कभी परिस्थितियाँ हमारे खिलाफ हो जाती हैं। लेकिन इन सबका मतलब ये नहीं कि हमारी जिंदगी की कीमत कम हो गई।”

 

बच्चे ध्यान से सुन रहे थे।

 

आरव ने आगे कहा—

 

“अगर कभी तुम्हें लगे कि तुम बहुत ज्यादा परेशान हो, तो अकेले मत रहना। किसी भरोसेमंद इंसान से बात करना। अपने मन की बात कहना। मदद माँगना। एक मुश्किल दिन को अपनी पूरी जिंदगी का फैसला मत बनने देना।”

 

पार्क की वही बेंच दूर दिखाई दे रही थी।

 

आरव मुस्कुराया।

 

उसे याद आया कि कभी वह उसी बेंच पर बैठकर सोचता था कि उसकी जिंदगी में कुछ नहीं बचा।

 

आज उसे पता था—

 

बहुत कुछ बचा था।

 

सपने बाकी थे।

 

परिवार बाकी था।

 

दोस्त बाकी थे।

 

नई शुरुआत बाकी थी।

 

और सबसे जरूरी—

 

जिंदगी बाकी थी।

 

इसलिए जिंदगी में चाहे कितनी भी मुश्किलें आएँ, खुद को अकेला मत समझो। किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात करो, मदद लो और धीरे-धीरे आगे बढ़ो।

 

क्योंकि जिंदगी में बुरे दिन आ सकते हैं, लेकिन वे हमेशा नहीं रहते।

 

जिंदगी सच में अनमोल है। इसे किसी एक हार, एक गलती या एक बुरे दौर के नाम मत कर दो।

 

कहानी समाप्त।

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