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टैग: #दर्द # इमोशनल

  • ज़िंदगी

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    जिंदगी अनमोल है, इसे ऐसे बर्बाद मत करो — भाग 2

     

    आरव घर पहुँचा तो उसकी माँ दरवाजे पर ही खड़ी थीं।

     

    उसे देखते ही माँ ने पूछा—

     

    “बेटा, खाना खाएगा?”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ माँ।”

     

    माँ ने कुछ नहीं पूछा।

     

    वह समझ गई थीं कि आज उनका बेटा पहले से थोड़ा बेहतर है।

     

    रात को खाना खाने के बाद आरव अपनी माँ के पास बैठ गया।

     

    काफी देर तक दोनों चुप रहे।

     

    फिर आरव ने कहा—

     

    “माँ, क्या आपको कभी लगा कि मैं नाकाम हो गया हूँ?”

     

    माँ ने तुरंत उसकी तरफ देखा।

     

    “कभी नहीं।”

     

    “लेकिन मैं तो बार-बार हार रहा हूँ।”

     

    माँ ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “हारने वाला इंसान वह नहीं होता जो कोशिश करके असफल हो जाए। हारने वाला वह होता है जो अपनी जिंदगी की सारी उम्मीद छोड़ दे।”

     

    आरव की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “मुझे बहुत डर लगता है माँ।”

     

    “किस बात से?”

     

    “इस बात से कि मैं कभी सफल नहीं हो पाऊँगा।”

     

    माँ ने कहा—

     

    “भविष्य की चिंता में आज की जिंदगी मत खो देना।”

     

    ये बात आरव के दिल में उतर गई।

     

    अगले दिन वह फिर उसी पार्क में गया।

     

    वही बुजुर्ग वहाँ बैठे थे।

     

    आरव ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “मैं वापस आ गया।”

     

    बुजुर्ग ने कहा—

     

    “मुझे उम्मीद थी।”

     

    आरव उनके पास बैठ गया।

     

    “मैंने फैसला किया है कि मैं फिर कोशिश करूँगा। लेकिन इस बार सिर्फ एक परीक्षा के भरोसे नहीं बैठूँगा। मैं कोई काम भी सीखूँगा।”

     

    बुजुर्ग मुस्कुराए।

     

    “अब तुम सही रास्ते पर हो।”

     

    आरव ने अपनी पढ़ाई दोबारा शुरू की।

     

    सुबह पढ़ाई करता, दोपहर में एक दुकान पर काम सीखता और शाम को अपने दोस्त रोहित से मिलता।

     

    धीरे-धीरे उसका जीवन बदलने लगा।

     

    समस्याएँ खत्म नहीं हुई थीं।

     

    पैसे अभी भी कम थे।

     

    परीक्षा का डर अभी भी था।

     

    लेकिन अब आरव हर समस्या को अपनी पूरी जिंदगी नहीं समझता था।

     

    एक दिन रोहित ने पूछा—

     

    “तुझे याद है कुछ महीने पहले तू कितना परेशान था?”

     

    आरव हँसते हुए बोला—

     

    “हाँ। लगता था मेरी जिंदगी में कुछ बचा ही नहीं।”

     

    रोहित ने कहा—

     

    “और अब?”

     

    आरव ने आसमान की तरफ देखा।

     

    “अब लगता है कि जिंदगी में बहुत कुछ बाकी है।”

     

    कुछ महीनों बाद आरव ने अपनी मेहनत से एक छोटा ऑनलाइन काम शुरू किया। उसे शुरुआत में बहुत कम पैसे मिले।

     

    लेकिन उसने हार नहीं मानी।

     

    उसने नई चीजें सीखीं, गलतियाँ कीं और फिर उन्हें सुधारा।

     

    एक साल बाद उसकी आमदनी इतनी हो गई कि वह घर के खर्च में माँ की मदद करने लगा।

     

    पिता भी धीरे-धीरे अपना काम शुरू करने लगे।

     

    आरव की छोटी बहन की पढ़ाई जारी रही।

     

    एक शाम आरव उसी पार्क में बैठा था।

     

    वही बुजुर्ग उसके पास आए।

     

    उन्होंने पूछा—

     

    “अब भी लगता है कि जिंदगी बेकार है?”

     

    आरव हँस पड़ा।

     

    “नहीं। अब तो लगता है कि जिंदगी बहुत बड़ी है।”

     

    बुजुर्ग ने कहा—

     

    “यही समझ सबसे जरूरी है।”

     

    आरव कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर उसने कहा—

     

    “अगर उस दिन मैं आपसे नहीं मिला होता तो शायद मैं अपनी परेशानी किसी से नहीं कहता।”

     

    बुजुर्ग ने गंभीर होकर कहा—

     

    “इसलिए हमेशा याद रखना, जब मन बहुत भारी हो जाए तो अकेले मत रहना। अपने परिवार, दोस्त, शिक्षक या किसी भरोसेमंद बड़े इंसान से बात करना। मदद माँगना कमजोरी नहीं है।”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    उसे अब समझ आ चुका था कि मुश्किल समय में सबसे जरूरी चीज समाधान नहीं, बल्कि साथ और बातचीत भी होती है।

     

    कुछ दिनों बाद आरव ने अपने मोहल्ले के बच्चों के लिए एक छोटी-सी पढ़ाई की कक्षा शुरू की।

     

    वह उन्हें पढ़ाने लगा।

     

    एक दिन एक बच्चा उससे बोला—

     

    “भैया, मैं गणित में बहुत कमजोर हूँ। मुझसे नहीं होगा।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “ऐसा मत बोलो। अभी नहीं आता, इसका मतलब ये नहीं कि कभी नहीं आएगा।”

     

    बच्चे ने पूछा—

     

    “अगर मैं फेल हो गया तो?”

     

    आरव ने कहा—

     

    “तो फिर से कोशिश करेंगे। एक नतीजा तुम्हारी पूरी जिंदगी तय नहीं करता।”

     

    बच्चा मुस्कुराया।

     

    आरव ने उसे देखकर सोचा—

     

    “काश मैंने ये बात खुद को भी उस समय समझाई होती।”

     

    समय बीतता गया।

     

    आरव ने अपनी जिंदगी में बहुत कुछ हासिल किया, लेकिन उसने अपनी पुरानी डायरी संभालकर रखी।

     

    उसके पहले पन्ने पर आज भी वही लाइन लिखी थी—

     

    “मैं एक दिन अपने परिवार को बहुत खुश रखूँगा।”

     

    उसने उसके नीचे एक नई लाइन जोड़ दी—

     

    “और रास्ता कितना भी मुश्किल हो, मैं अपनी जिंदगी को बेकार नहीं जाने दूँगा।”

     

    उस दिन आरव ने अपनी कहानी बच्चों को सुनाई।

     

    उसने कहा—

     

    “जिंदगी हमेशा हमारे हिसाब से नहीं चलती। कभी हम सफल होते हैं, कभी असफल। कभी लोग हमारा साथ छोड़ देते हैं, कभी परिस्थितियाँ हमारे खिलाफ हो जाती हैं। लेकिन इन सबका मतलब ये नहीं कि हमारी जिंदगी की कीमत कम हो गई।”

     

    बच्चे ध्यान से सुन रहे थे।

     

    आरव ने आगे कहा—

     

    “अगर कभी तुम्हें लगे कि तुम बहुत ज्यादा परेशान हो, तो अकेले मत रहना। किसी भरोसेमंद इंसान से बात करना। अपने मन की बात कहना। मदद माँगना। एक मुश्किल दिन को अपनी पूरी जिंदगी का फैसला मत बनने देना।”

     

    पार्क की वही बेंच दूर दिखाई दे रही थी।

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    उसे याद आया कि कभी वह उसी बेंच पर बैठकर सोचता था कि उसकी जिंदगी में कुछ नहीं बचा।

     

    आज उसे पता था—

     

    बहुत कुछ बचा था।

     

    सपने बाकी थे।

     

    परिवार बाकी था।

     

    दोस्त बाकी थे।

     

    नई शुरुआत बाकी थी।

     

    और सबसे जरूरी—

     

    जिंदगी बाकी थी।

     

    इसलिए जिंदगी में चाहे कितनी भी मुश्किलें आएँ, खुद को अकेला मत समझो। किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात करो, मदद लो और धीरे-धीरे आगे बढ़ो।

     

    क्योंकि जिंदगी में बुरे दिन आ सकते हैं, लेकिन वे हमेशा नहीं रहते।

     

    जिंदगी सच में अनमोल है। इसे किसी एक हार, एक गलती या एक बुरे दौर के नाम मत कर दो।

     

    कहानी समाप्त।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • जुड़वां बहने

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     जुड़वां बहनें

     

    बरसों पहले एक छोटे से शहर में एक ही दिन, एक ही समय पर जुड़वां बेटियों का जन्म हुआ। पूरे घर में खुशियाँ थीं। पिता ने दोनों का नाम रखा—नेहा और नैना।

     

    दोनों का चेहरा बिल्कुल एक जैसा था, लेकिन किस्मत बिल्कुल अलग।

     

    माँ सविता जाने क्यों बचपन से ही नेहा पर जान छिड़कती थी। वह उसे गोद में खिलाती, नए कपड़े पहनाती, उसकी हर छोटी-बड़ी बात पर मुस्कुराती। लेकिन नैना को हमेशा अपने से दूर रखती। अगर नैना गोद में आने की कोशिश करती तो वह कह देती, “जा, अपनी दादी के पास जा।”

     

    नैना तब बहुत छोटी थी। उसे समझ नहीं आता था कि माँ उसे प्यार क्यों नहीं करती।

     

    समय बीतता गया।

     

    दोनों बहनें स्कूल जाने लगीं। हर सुबह सविता नेहा के बाल बड़े प्यार से बनाती, उसके टिफिन में उसकी पसंद का खाना रखती। वहीं नैना को खुद ही अपने बाल बनाने पड़ते। कई बार उसका टिफिन भी खाली रह जाता।

     

    एक दिन स्कूल में टीचर ने पूछा, “तुम दोनों जुड़वां हो?”

     

    नेहा मुस्कुराकर बोली, “जी मैडम।”

     

    टीचर ने नैना से कहा, “तुम इतनी उदास क्यों रहती हो?”

     

    नैना बस हल्का-सा मुस्कुरा दी। वह किसी से अपने दिल की बात नहीं कह पाती थी।

     

    घर लौटते ही सविता ने नेहा को गले लगा लिया।

     

    “आ गई मेरी राजकुमारी?”

     

    फिर उसने नैना की तरफ देखा और बोली, “इतनी देर क्यों लगा दी? कोई काम समय पर नहीं होता तुमसे।”

     

    नैना चुपचाप अपना बैग रखकर कमरे में चली गई।

     

    उस रात वह तकिए में मुँह छिपाकर बहुत रोई।

     

    धीरे-धीरे दोनों बड़ी होने लगीं।

     

    नेहा को जो चाहिए होता, माँ तुरंत दिला देती। नया मोबाइल, नए कपड़े, महँगे जूते…

     

    लेकिन जब नैना कुछ माँगती तो जवाब मिलता, “इतने पैसे नहीं हैं।”

     

    एक दिन पिता ने यह सब देखा।

     

    उन्होंने सविता से कहा, “दोनों हमारी बेटियाँ हैं। इतना फर्क क्यों करती हो?”

     

    सविता गुस्से में बोली, “मुझे मत सिखाइए कि बच्चों को कैसे पालते हैं।”

     

    पिता चुप हो गए, लेकिन उनका दिल टूट गया।

     

    नैना पढ़ाई में बहुत तेज थी। उसने हर परीक्षा में पहला स्थान हासिल किया।

     

    जब रिजल्ट आया तो पूरे स्कूल ने उसकी तारीफ की।

     

    प्रिंसिपल ने सविता को बुलाया और कहा, “आपको अपनी बेटी पर गर्व होना चाहिए।”

     

    सविता ने बस इतना कहा, “ठीक है।”

     

    घर लौटकर उसने नैना से सिर्फ एक बात कही, “इससे कोई बड़ा काम नहीं हो गया।”

     

    वहीं अगर नेहा छोटी-सी प्रतियोगिता भी जीत जाती तो पूरा घर मिठाई से भर जाता।

     

    नैना हर बार यही सोचती…

     

    “क्या मैं सच में इतनी बुरी हूँ?”

     

    समय के साथ नेहा भी समझने लगी कि माँ दोनों के साथ बराबरी नहीं करती।

     

    एक दिन उसने माँ से पूछा, “आप नैना दीदी को प्यार क्यों नहीं करती?”

     

    सविता ने बात टाल दी।

     

    लेकिन नेहा के मन में सवाल रह गया।

     

    कॉलेज का समय आया।

     

    नैना ने छात्रवृत्ति हासिल कर ली।

     

    उसने अपनी मेहनत से पढ़ाई पूरी की और एक बड़ी कंपनी में नौकरी पा ली।

     

    पहली तनख्वाह मिलने पर वह सबसे पहले घर आई।

     

    उसने माँ के लिए सुंदर-सी साड़ी खरीदी।

     

    मुस्कुराकर बोली, “माँ… ये आपके लिए।”

     

    सविता ने बिना देखे कहा, “रख दो।”

     

    उसके चेहरे पर खुशी की जगह कोई भाव ही नहीं था।

     

    नैना मुस्कुराने की कोशिश करती रही, लेकिन उसकी आँखें नम हो गईं।

     

    कुछ महीनों बाद नेहा की नौकरी नहीं लग पा रही थी।

     

    वह बहुत परेशान रहने लगी।

     

    तब नैना ने अपने ऑफिस में उसकी सिफारिश की।

     

    कुछ समय बाद नेहा को भी नौकरी मिल गई।

     

    उसने खुशी से नैना को गले लगा लिया।

     

    “दीदी… अगर तुम नहीं होती तो मैं कभी सफल नहीं हो पाती।”

     

    नैना मुस्कुरा दी।

     

    “हम बहनें हैं… एक-दूसरे का साथ देना ही हमारा रिश्ता है।”

     

    नेहा की आँखें भर आईं।

     

    उसे पहली बार महसूस हुआ कि जिसे माँ ने हमेशा कम समझा, वही सबसे बड़ी इंसान निकली।

     

    एक दिन अचानक सविता की तबीयत बहुत खराब हो गई।

     

    उन्हें अस्पताल में भर्ती करना पड़ा।

     

    डॉक्टर ने कहा, “कुछ दिन इन्हें पूरी देखभाल की ज़रूरत होगी।”

     

    नेहा नौकरी के कारण ज्यादा समय नहीं दे पाती थी।

     

    लेकिन नैना ने छुट्टी ले ली।

     

    वह दिन-रात अस्पताल में माँ के पास बैठी रहती।

     

    समय पर दवाइयाँ देना, खाना खिलाना, डॉक्टर से बात करना…

     

    वह सब कुछ अकेले संभाल रही थी।

     

    एक रात सविता की आँख खुली।

     

    उन्होंने देखा कि नैना कुर्सी पर बैठे-बैठे ही सो गई थी। उसके हाथ में अभी भी माँ की दवा थी।

     

    सविता की आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    उन्होंने पहली बार महसूस किया कि जिसे उन्होंने हमेशा ठुकराया, वही सबसे ज्यादा उनका साथ निभा रही है।

     

    अस्पताल से घर लौटने के बाद भी नैना ने उनकी सेवा में कोई कमी नहीं छोड़ी।

     

    एक शाम सविता ने नैना को अपने पास बुलाया।

    काँपती आवाज़ में बोलीं,

    “बेटा… क्या तुम मुझे माफ़ कर दोगी?”

     

    नैना चौंक गई।

    “माफ़? किस बात के लिए, माँ?”

    सविता रो पड़ीं।

     

    “मैंने तुम्हें कभी बेटी का प्यार नहीं दिया। हर बार तुम्हें गलत ठहराया। तुम्हारी हर खुशी को नजरअंदाज किया। मुझे नहीं पता मैंने ऐसा क्यों किया… लेकिन मैंने तुम्हारे साथ बहुत बड़ा अन्याय किया।”

    नैना की आँखें भी भर आईं।

     

    वह धीरे से माँ के पास बैठ गई।

    “माँ… मुझे हमेशा आपके प्यार की कमी महसूस हुई। हर रात यही सोचकर रोती थी कि शायद मुझसे कोई गलती हो गई है। लेकिन आज आपने मुझे अपनी बेटी कहकर बुलाया… मेरे लिए यही सबसे बड़ा तोहफा है।”

     

    सविता ने उसे कसकर गले लगा लिया।

     

    सालों का जमा हुआ दर्द आँसुओं के साथ बह गया।

    नेहा भी पास आ गई।

     

    उसने दोनों को गले लगा लिया।तीनों देर तक रोती रहीं।

     

    उस दिन पहली बार उस घर में किसी के साथ भेदभाव नहीं था।

    कुछ दिनों बाद परिवार एक साथ बैठा था।

     

    सविता ने दोनों बेटियों का हाथ अपने हाथों में लिया और बोलीं,

    “आज से मेरे लिए तुम दोनों बराबर हो। मैंने बहुत देर कर दी, लेकिन अब कभी किसी के साथ फर्क नहीं करूँगी।”

    नैना मुस्कुराई।

     

    “माँ, देर से मिला प्यार भी बहुत कीमती होता है।”

    घर में फिर से हँसी लौट आई।

     

    हम सब जानते हैं कि माँ का प्यार सबसे बड़ा होता है, लेकिन अगर वही प्यार किसी एक बच्चे से छिन जाए तो उसका दर्द पूरी जिंदगी साथ रहता है। फिर भी सच्चा दिल कभी नफरत नहीं सीखता। नैना ने अपने व्यवहार से साबित कर दिया कि प्रेम और क्षमा, दोनों मिलकर सबसे गहरे रिश्तों के घाव भी भर सकते हैं।

     

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • कैद की दुल्हन

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    कैद की दुल्हन

     

    विराज सिंघानिया शहर के सबसे बड़े उद्योगपतियों में गिना जाता था। उसके पास आलीशान बंगले, महंगी गाड़ियाँ, दौलत और रसूख की कोई कमी नहीं थी। लोग उसके नाम से ही डरते थे। लेकिन उसके स्वभाव में एक ऐसी कमी थी जिसने उसे कभी किसी का अपना नहीं बनने दिया। उसे बचपन से आदत थी कि जो चीज़ उसे पसंद आ जाए, वह किसी भी कीमत पर उसकी होनी चाहिए।

     

    दूसरी तरफ थी सोनल। एक छोटे से घर में रहने वाली, बेहद मासूम और सादगी पसंद लड़की। उसके पिता एक सरकारी स्कूल में चपरासी थे और माँ सिलाई करके घर चलाने में उनका हाथ बँटाती थीं। सोनल कॉलेज में पढ़ती थी। उसका सपना था कि पढ़-लिखकर अपने माता-पिता का जीवन आसान बनाए। वह रोज़ बस से कॉलेज जाती और लौटते समय मंदिर में माथा टेकना कभी नहीं भूलती थी।

     

    एक दिन विराज अपनी लग्ज़री कार में किसी मीटिंग के लिए जा रहा था। तभी ट्रैफिक सिग्नल पर उसकी नज़र बस स्टॉप पर खड़ी सोनल पर पड़ी। साधारण सूट, कंधे पर बैग और चेहरे पर मासूम मुस्कान। पहली बार किसी लड़की ने उसके मन को इस तरह बेचैन कर दिया।

     

    उस दिन के बाद विराज रोज़ उसी रास्ते से गुजरने लगा। उसने अपने लोगों से सोनल की पूरी जानकारी निकलवा ली—वह कहाँ रहती है, किस कॉलेज में पढ़ती है, कब घर से निकलती है और कब लौटती है।

     

    उसका दोस्त कबीर बोला, “अगर सच में पसंद है तो उसके घर रिश्ता भेज दे।”

     

    विराज हल्का-सा मुस्कुराया।

     

    “मैं इंतज़ार नहीं करता। जो मुझे पसंद आ जाए, उसे हासिल कर लेता हूँ।”

     

    कबीर ने समझाया, “किसी इंसान को चीज़ मत समझ।”

     

    लेकिन विराज ने उसकी बात अनसुनी कर दी।

     

    उधर सोनल को इस बात का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि कोई उसकी हर हरकत पर नज़र रख रहा है।

     

    एक शाम कॉलेज से लौटते समय सड़क सुनसान थी। तभी एक काली एसयूवी उसके सामने आकर रुकी। चार आदमी बाहर निकले।

     

    “कौन हो तुम लोग?” सोनल घबराकर बोली।

     

    उसके जवाब देने से पहले ही उन्होंने उसे जबरदस्ती गाड़ी में बैठा लिया। सोनल चीखती रही, लेकिन सुनसान सड़क पर उसकी आवाज़ किसी तक नहीं पहुँची।

     

    जब उसकी आँखों से पट्टी हटाई गई तो उसने खुद को एक विशाल और आलीशान बंगले के कमरे में पाया। कमरा किसी महल से कम नहीं था, लेकिन उसके लिए वह एक सुनहरा पिंजरा था।

     

    दरवाज़ा खुला।

     

    अंदर विराज आया।

     

    “डरो मत, यहाँ तुम्हें कोई तकलीफ़ नहीं होगी।”

     

    सोनल काँपती हुई बोली, “मुझे यहाँ क्यों लाए हो? मेरे माँ-पापा मेरा इंतज़ार कर रहे होंगे।”

     

    विराज ने शांत आवाज़ में कहा, “क्योंकि मैं तुमसे प्यार करता हूँ।”

     

    सोनल की आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    “जिस प्यार में मेरी मर्ज़ी ही नहीं, वह प्यार नहीं हो सकता। मुझे घर जाने दो।”

     

    विराज ने सिर्फ इतना कहा, “अब यही तुम्हारा घर है।”

     

    उधर सोनल के घर में मातम जैसा माहौल था। उसके माता-पिता ने पूरी रात उसे ढूँढा। पुलिस में शिकायत दर्ज हुई, लेकिन कोई सुराग नहीं मिला। माँ रो-रोकर बेहोश हो जातीं और पिता हर आने-जाने वाले से बेटी के बारे में पूछते।

     

    बंगले में सोनल कई बार भागने की कोशिश करती, लेकिन हर बार सुरक्षा कर्मी उसे पकड़ लेते। उसके मोबाइल से लेकर हर सामान तक उससे ले लिया गया था। बाहर की दुनिया से उसका हर रिश्ता तोड़ दिया गया।

     

    कुछ दिनों बाद विराज ने पूरे परिवार के सामने घोषणा कर दी कि वह सोनल से शादी करेगा।

     

    उसकी माँ ने कहा, “बेटा, जबरदस्ती से कोई रिश्ता नहीं बनता।”

     

    लेकिन विराज के सिर पर जुनून सवार था।

     

    उसने पंडित बुला लिया। सोनल लाख मिन्नतें करती रही।

     

    “मुझे जाने दो… मैं तुम्हारे हाथ जोड़ती हूँ।”

     

    लेकिन उसकी एक न सुनी गई।

     

    कुछ समय बाद दोनों की शादी करवा दी गई। शादी के मंडप में सोनल की आँखों में आँसू थे। उसके चेहरे पर दुल्हन की खुशी नहीं, बल्कि कैद का दर्द था।

     

    शादी के बाद भी कुछ नहीं बदला। बंगले के हर दरवाज़े पर पहरा था। सोनल बाहर नहीं जा सकती थी। उसके कमरे की खिड़की से दूर दिखाई देता खुला आसमान उसे हर दिन अपनी आज़ादी की याद दिलाता।

     

    विराज रोज़ उसके लिए महंगे कपड़े, गहने और तोहफ़े लाता।

     

    एक दिन उसने हीरे का हार बढ़ाते हुए कहा, “ये तुम्हारे लिए।”

     

    सोनल ने हार की तरफ देखे बिना जवाब दिया,

     

    “जिस इंसान के पास आज़ादी नहीं होती, उसके लिए हीरे भी बेड़ियाँ लगते हैं।”

     

    विराज पहली बार निरुत्तर हो गया।

     

    दिन बीतते गए। सोनल पहले जैसी हँसमुख लड़की नहीं रही। उसने ठीक से खाना छोड़ दिया। वह चुपचाप घंटों खिड़की के पास बैठी रहती।

     

    एक दिन उसकी तबीयत बहुत बिगड़ गई। डॉक्टर ने जाँच के बाद कहा,

     

    “इन्हें बीमारी से ज़्यादा मानसिक तनाव है। अगर ये ऐसे ही रहीं तो इनकी हालत और खराब हो सकती है।”

     

    उस रात विराज सो नहीं पाया। उसे पहली बार अपने किए पर पछतावा होने लगा। उसने सोचा, “क्या सच में मैं इससे प्यार करता हूँ? अगर करता हूँ, तो यह मेरे साथ खुश क्यों नहीं है?”

     

    अगली सुबह वह सोनल के कमरे में गया।

     

    “अगर मैं तुम्हें आज़ाद कर दूँ… क्या तुम मुझे माफ़ कर पाओगी?”

     

    सोनल ने उसकी ओर देखा।

     

    “माफ़ करना मुश्किल नहीं होता, लेकिन जो भरोसा कभी बना ही नहीं, उसे लौटाना नामुमकिन होता है।”

     

    विराज की आँखें झुक गईं।

     

    वह धीरे से उठा, कमरे का दरवाज़ा खोला और अपनी जेब से बंगले के मुख्य गेट की चाबी निकालकर सोनल के हाथ में रख दी।

     

    “आज से तुम आज़ाद हो। तुम्हें कोई नहीं रोकेगा।”

     

    सोनल कुछ पल तक उसे देखती रही। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि यह सच है।

     

    वह धीरे-धीरे बंगले से बाहर निकली। कई दिनों बाद उसने खुली हवा में साँस ली। उसकी आँखों से आँसू बह निकले। उसे लगा जैसे किसी ने उसके पैरों की अदृश्य ज़ंजीरें खोल दी हों।

     

    वह अपने घर पहुँची।

     

    दरवाज़ा खुलते ही उसकी माँ ने उसे देखा और दौड़कर गले लगा लिया। पिता की आँखों से भी आँसू बहने लगे। वह पल पूरे परिवार के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था।

     

    कुछ दिनों बाद पुलिस ने विराज को पूछताछ के लिए बुलाया। उसने अपने अपराध को छिपाने की कोशिश नहीं की। उसने माना कि उसने सोनल को उसकी इच्छा के विरुद्ध अपने पास रखा था। कानून ने अपना काम किया और उसे अपने किए की सज़ा मिली।

     

    सोनल ने धीरे-धीरे अपने जीवन को फिर से सँभाला। उसने अपनी पढ़ाई पूरी की, नौकरी की और अपने माता-पिता का सहारा बनी। उस दर्द ने उसे कमजोर नहीं, बल्कि पहले से कहीं अधिक मजबूत बना दिया।

     

    विराज ने जेल में रहते हुए कई बार अपने फैसलों पर पछतावा किया। उसे समझ में आ गया कि प्यार किसी को अपनी मर्ज़ी से बाँध लेने का नाम नहीं है। अगर किसी रिश्ते में सम्मान, भरोसा और दोनों की सहमति न हो, तो वह रिश्ता नहीं, केवल कैद बनकर रह जाता है।

     

    सालों बाद जब विराज जेल से बाहर निकला, उसने दूर से एक कार्यक्रम में सोनल को देखा। वह आत्मविश्वास से मंच पर खड़ी थी और महिलाओं की सुरक्षा तथा आत्मसम्मान पर भाषण दे रही थी। विराज बिना उससे मिले वापस लौट गया। उसे महसूस हुआ कि कुछ गलतियाँ ऐसी होती हैं जिन्हें जीवन भर का पछतावा भी पूरी तरह मिटा नहीं सकता।

     

    उस दिन के बाद दोनों की राहें फिर कभी नहीं मिलीं। लेकिन उनकी कहानी हर उस इंसान के लिए एक सीख बन गई कि सच्चा प्यार किसी पर अधिकार जमाने में नहीं, बल्कि उसकी इच्छा, सम्मान और आज़ादी की कद्र करने में होता है।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं