Part 5
No love clause
अग्नि हँस पड़ा। लेकिन उसकी हँसी में खुशी नहीं थी। “ये कोई जवाब नहीं है।”
विक्रम जी चुप रहे। अग्नि ने आगे झुककर कहा,
“आप जानते हैं कि मैं शादी क्यों नहीं करना चाहता।”
विक्रम जी की आँखों में एक पल के लिए पुराना दर्द उभरा। “जानता हूँ।”
“तो फिर?” अग्नि की आवाज़ थोड़ी ऊँची हो गई।
“मैंने अपने माता-पिता का रिश्ता अपनी आँखों के सामने टूटते देखा है। मैंने देखा है कि एक शादी किस तरह दो लोगों को एक-दूसरे का दुश्मन बना सकती है। मैंने अपनी माँ को हर रात रोते देखा है।”
विक्रम जी की आँखें झुक गईं। अग्नि ने गहरी साँस ली।
“और अब आप चाहते हैं कि मैं भी वही गलती करूँ? मैं किसी लड़की की जिंदगी बर्बाद नहीं करना चाहता।”
कुछ पल तक विक्रम जी उसे देखते रहे।
फिर उन्होंने बहुत धीमे स्वर में कहा, “तुम्हें ऐसा क्यों लगता है कि तुम अपने बाप की तरह खुदगर्ज निकलोगे।”
अग्नि ने तुरंत जवाब दिया, “ क्योंकि मेरी रगो में उस आदमी का खून दौड़ रहा है दादा जी।”
“नहीं! अग्नि!” विक्रम जी के शब्द सख्त थे, “ तुम्हारी रगो में जितना मेरे बेटे का खून है उतना ही तुम्हारी मां मेरी बहू का भी है। और हमारे दिए हुए संस्कार हैं। इसलिए मुझे पूरा यकीन है तुम एक बेहतर जीवन साथी बनोगे।”
अग्नि बोला, “लेकिन दादा जी ये शादी मेरे लिए एक जिम्मेदारी होगी। और मैं वो जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार नहीं हूँ।”
विक्रम जी की आँखों में हल्की-सी मुस्कान आई। “फिर भी शादी करोगे?”
अग्नि कुछ पल चुप रहा। फिर बोला, “आपकी शर्त है। आपके पास मुझे मजबूर करने की वजह है। तो ठीक है… मैं शादी करूँगा।”
विक्रम जी ने राहत की साँस ली। लेकिन अग्नि ने तुरंत अपनी बात पूरी की। “मगर मेरी शर्त पर।”
विक्रम जी ने सिर उठाया। “लड़की मैं खुद चुनूँगा और आप उस लड़की के बारे में कोई सवाल नहीं करेंगे।”
विक्रम जी ने कुछ क्षण उसे देखा। फिर बोले, “मंजूर है।”
अग्नि को उनके इतनी आसानी से मान जाने पर थोड़ी हैरानी हुई। “बस?”
विक्रम जी हल्की मुस्कान के साथ, “बस।”
अग्नि, “आपको कोई आपत्ति नहीं होगी?”
विक्रम जी “नहीं।”
अग्नि हैरानी से, “चाहे लड़की कोई भी हो?”
विक्रम जी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “बस वो लड़की तुम्हें इंसान बनाना जानती हो।”
अग्नि की भौंहें सिकुड़ गईं। “मैं कोई बिगड़ा हुआ बच्चा नहीं हूँ।”
विक्रम जी हँस पड़े। “ये बात अपनी माँ को जाकर बताना।”
अग्नि का चेहरा तुरंत बदल गया। उसके चेहरे पर आई हल्की नरमी एक पल में गायब हो गई। “मुझे उनके बारे में बात नहीं करनी।”
विक्रम जी समझ गए। उन्होंने विषय बदल दिया। “ठीक है।”
फिर कुछ पल बाद बोले, “लेकिन एक बात याद रखना।”
अग्नि ने उनकी तरफ देखा। “तुम्हारे पास बहुत कम समय है।”
अग्नि “मैं जानता हूँ।”
“नहीं…” विक्रम जी ने गंभीरता से कहा, “तुम जितना समझ रहे हो, उससे भी कम।”
अग्नि कुछ पल उन्हें देखता रहा। “आप आखिर कहना क्या चाहते हैं?”
विक्रम जी ने सीधे कोई जवाब नहीं दिया।
बस इतना कहा, “समय आने पर सब समझ जाओगे।”
अग्नि को उनका जवाब बिल्कुल पसंद नहीं आया।
वह कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। “ठीक है।”
उसने फाइल मेज पर रखी। “मैं शादी करूँगा।”
फिर उसने विक्रम जी की आँखों में देखते हुए कहा,
“लेकिन लड़की मैं खुद चुनूँगा।”
विक्रम जी ने सिर हिला दिया। “जैसी तुम्हारी मर्जी।”
अग्नि दरवाजे की तरफ बढ़ा। लेकिन कुछ कदम चलने के बाद रुक गया। उसने पीछे मुड़कर अपने दादा जी को देखा। “दादा जी…”
विक्रम जी, “हूँ?”
अग्नि, “अगर मैं शादी कर भी लूँ…” वह कुछ पल रुका।
“तो इसका मतलब ये नहीं कि मैं इस घर का हिस्सा बन जाऊँगा।”
विक्रम जी के चेहरे पर हल्की उदासी छा गई। “मुझे पता है।”
अग्नि ने कुछ नहीं कहा। वह दरवाजा खोलकर बाहर निकल गया। दरवाजा बंद होते ही विक्रम जी अपनी कुर्सी पर पीछे टिक गए।
उनकी नजर सामने लगी उसी पुरानी तस्वीर पर चली गई।
छोटा-सा अग्नि… उनकी उंगली पकड़े मुस्कुरा रहा था।
विक्रम जी की आँखों में नमी उतर आई।
उन्होंने तस्वीर की तरफ देखते हुए बहुत धीमे स्वर में कहा, “तू चाहे जितना दूर भाग ले अग्नि… लेकिन इस बार मैं तुझे अकेला नहीं छोड़ूँगा।”
नीचे… अग्नि सीढ़ियाँ उतरकर हॉल में आया।
अब वहाँ पहले जैसे भीड़ भाड़ नहीं थी।
अग्नि ने एक नजर सिटिंग एरिया पर डाली फिर सीधे बाहर की तरफ कदम बढ़ा दिए।
जैसे ही सविता जी की नजर उस पर पड़ी, उनके चेहरे पर उम्मीद जाग गई।
अग्नि सीधे मुख्य दरवाजे की तरफ बढ़ने लगा।
“अग्नि…”
सविता जी की आवाज़ सुनकर उसके कदम रुक गए।
उसने धीरे से पीछे मुड़कर देखा। सविता जी उसकी तरफ ही आ रही थी।
उनकी आँखों में एक अजीब-सी उम्मीद थी। “इतने समय बाद तुम यहाँ आए हो…” उन्होंने धीमे स्वर में कहा, “कम से कम कुछ देर रुककर तो जा सकते हो।”
अग्नि कुछ पल उन्हें देखता रहा। फिर बोला,
“माँ… आप जानती हैं मुझे यहाँ आना बिल्कुल पसंद नहीं।”
सविता जी की आँखों की चमक थोड़ी कम हो गई, उन्होंने बस सिर हिला दिया, “अगर आप मुझसे मिलना ही चाहती हैं तो मेरे विला आ सकती हैं।”
अग्नि ने बेहद सामान्य स्वर में कहा, “वो घर भी आपका ही है।”
सविता जी के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आई। “कुछ ही देर में डिनर का टाइम होने वाला है।”
उन्होंने उम्मीद भरी नजरों से उसे देखा। “कम से कम डिनर करके जाना।”
अग्नि ने तुरंत कहा, “नहीं।”
सिर्फ़ एक शब्द। फिर वह मुड़ गया।
“अग्नि…” इस बार उसकी माँ की आवाज़ और धीमी थी।
लेकिन वह नहीं रुका। कुछ ही पलों में मुख्य दरवाजा बंद हो गया। सविता जी वहीं खड़ी रह गईं।
उनकी आँखों से एक आँसू निकलकर गाल पर आ गया। उन्होंने तुरंत पल्लू से उसे पोंछ लिया।
लेकिन तभी पीछे से सुमित्रा की आवाज़ आई। “कितनी बेकार किस्मत है ना दीदी आपकी।”
सविता जी ने पीछे मुड़कर देखा।।सुमित्रा के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान थी। “आपको ना पति का प्यार मिला…” वह थोड़ा रुकी। “और ना ही बेटे का।”
सविता जी ने कुछ नहीं कहा। सुमित्रा उनके करीब आई। “इतने साल हो गए, लेकिन अग्नि आज भी आपको माफ नहीं कर पाया।”
सविता जी ने धीमे स्वर में कहा, “वो मुझे माफ करे या ना करे…” उन्होंने दरवाजे की तरफ देखा। “मैं उसकी माँ हूँ। और माँ अपने बच्चे से उम्मीद करना नहीं छोड़ती।”
सुमित्रा के चेहरे पर एक पल के लिए चुप्पी छा गई।
लेकिन सविता जी की आँखों में उस वक्त सिर्फ़ दर्द नहीं था।
वहाँ उम्मीद भी थी। बहुत पुरानी… बहुत गहरी… और शायद उतनी ही मजबूत। उधर… राजावत मेंशन से बाहर निकलते ही अग्नि अपनी कार में बैठ गया।
ड्राइवर ने पूछा, “सर, विला?”
अग्नि ने कुछ नहीं कहा। उसकी नजर सामने सड़क पर थी। लेकिन उसके दिमाग में सिर्फ़
एक ही बात घूम रही थी… शादी।
कहानी आगे जारी रहेगी।
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मेरा नाम नेहा गोयल है।
और पिछले दो वर्ष से मैं प्रतिलिपि पर कहानियां लिखती आ रही हूँ।
मुझे लेखन करते हुए बहुत ही अच्छा लगता है।
वैसे मुझे लिखने से पढ़ना ज्यादा पसंद है।


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