कमरे का दरवाजा बंद होते ही अमन ने पूरी ताकत से उसे खींचा, लेकिन दरवाजा जैसे पत्थर का हो गया था।
सामने कुर्सी पर बैठा असली राघव कांप रहा था। उसके हाथ रस्सी से बंधे थे और चेहरे पर चोट के निशान थे।
अमन उसके पास पहुंचा।
“राघव, ये सब क्या है?”
राघव ने जवाब देने के बजाय अपनी उंगली होंठों पर रख दी।
“धीरे बोल… वह सुन रही है।”
अमन ने कमरे में चारों तरफ देखा।
कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।
तभी छत से पानी की एक बूंद उसके माथे पर गिरी।
उसने हाथ लगाया।
पानी नहीं था।
खून था।
अमन ने ऊपर देखा।
छत खाली थी।
लेकिन कुछ ही सेकंड बाद छत से एक लड़की के लंबे बाल नीचे लटकने लगे।
अमन पीछे हट गया।
राघव ने घबराकर कहा, “नीचे मत देखना!”
अमन ने उसकी बात नहीं मानी।
जैसे ही उसने नीचे देखा, कमरे के फर्श पर एक औरत खड़ी थी।
उसका चेहरा बालों से ढका हुआ था।
वह बिल्कुल अमन के पीछे खड़ी थी।
अमन चीखते हुए पीछे मुड़ा।
वहाँ कोई नहीं था।
राघव चिल्लाया—
“उसकी तरफ मत देखना!”
लेकिन देर हो चुकी थी।
कमरे की सारी खिड़कियाँ अचानक खुल गईं।
तेज हवा अंदर आने लगी।
दीवारों पर लगी पुरानी तस्वीरें एक-एक करके जमीन पर गिरने लगीं।
धड़ाम! धड़ाम! धड़ाम!
अचानक एक तस्वीर अमन के पैरों के पास आकर गिरी।
उसने तस्वीर उठाई।
तस्वीर में ठाकुर रुद्रप्रताप, उसकी पत्नी, उनका बच्चा और नौकर खड़े थे।
लेकिन अब तस्वीर में एक और चीज दिखाई दे रही थी।
उन सबके पीछे एक काली परछाई खड़ी थी।
उस परछाई का चेहरा नहीं था।
अमन ने तस्वीर पलट दी।
पीछे पुराने अक्षरों में लिखा था—
“जिस दिन पाँचवीं परछाई जन्म लेगी, बंगला फिर से जाग जाएगा।”
अमन ने राघव की ओर देखा।
“पाँचवीं परछाई का मतलब क्या है?”
राघव ने धीरे-धीरे कहा—
“मैं नहीं जानता। लेकिन मुझे इतना पता है कि इस बंगले में जो भी मरता है, उसकी आत्मा यहाँ कैद हो जाती है।”
“और वह औरत?”
“वह आत्मा नहीं है।”
अमन की धड़कन रुक-सी गई।
“तो फिर क्या है?”
राघव ने कहा—
“वह इस बंगले की मालकिन नहीं… इस बंगले की रक्षक है।”
अमन कुछ समझ नहीं पाया।
राघव ने बताया कि उसके दादा ने मरने से पहले उसे इस बंगले के बारे में बताया था।
पचास साल पहले ठाकुर रुद्रप्रताप ने जंगल में एक पुरानी सुरंग खोजी थी। उस सुरंग के अंदर उसे एक पत्थर की मूर्ति मिली थी।
कहा जाता था कि वह मूर्ति किसी प्राचीन शक्ति की थी।
ठाकुर ने उस मूर्ति को बंगले में ला दिया।
उसके बाद घर में अजीब घटनाएँ शुरू हो गईं।
रात में किसी के चलने की आवाज आती।
बंद कमरों से रोने की आवाजें सुनाई देतीं।
और सबसे डरावनी बात—
घर में रहने वाले लोगों की परछाइयाँ कभी-कभी उनके शरीर से अलग होकर चलने लगती थीं।
एक रात ठाकुर ने उस शक्ति को हमेशा के लिए रोकने की कोशिश की।
लेकिन वह असफल रहा।
उस रात ठाकुर की पत्नी ने अपने बच्चे को बचाने के लिए खुद को बलिदान कर दिया।
मरने से पहले उसने उस शक्ति को बंगले के अंदर बंद कर दिया।
लेकिन उसे रोकने के लिए एक शर्त थी।
हर पचास साल में पाँच लोगों की परछाइयाँ उस शक्ति को फिर से जागने से रोकती थीं।
“तो फिर हम यहाँ क्यों आए?” अमन ने पूछा।
राघव ने डरते हुए कहा—
“क्योंकि इस बार पाँचवीं परछाई के लिए हमें चुना गया है।”
अमन ने पूछा, “कौन-से पाँच?”
राघव ने उसकी तरफ देखा।
“तुम… मैं… समीर… कबीर… और…”
वह अचानक चुप हो गया।
अमन ने पूछा, “और कौन?”
राघव ने धीरे से कमरे के कोने की तरफ देखा।
“वह।”
कमरे का बल्ब अचानक जल उठा।
कोने में एक छोटा बच्चा खड़ा था।
करीब आठ साल का।
उसने पुराने जमाने के कपड़े पहन रखे थे।
उसका चेहरा बिल्कुल सफेद था।
अमन ने धीरे से पूछा—
“तुम कौन हो?”
बच्चे ने सिर उठाया।
“मैं ठाकुर का बेटा हूँ।”
अमन का शरीर सुन्न हो गया।
“लेकिन तुम तो पचास साल पहले मर चुके हो।”
बच्चे ने मुस्कुराकर कहा—
“मैं मरा नहीं था।”
राघव ने घबराकर कहा—
“अमन, इसके पास मत जाना।”
लेकिन बच्चा अचानक अमन के बिल्कुल पास आ गया।
उसने अमन के कान में फुसफुसाकर कहा—
“तुम्हारे दोस्तों में से एक पहले ही मर चुका है।”
अमन ने डरते हुए पूछा—
“कौन?”
बच्चे ने जवाब नहीं दिया।
वह बस पीछे हट गया।
अचानक कमरे की दीवार पर पाँच परछाइयाँ दिखाई दीं।
पहली अमन की थी।
दूसरी राघव की।
तीसरी किसी ऐसे व्यक्ति की थी जो कमरे में था ही नहीं।
चौथी बहुत छोटी थी।
और पाँचवीं…
वह छत पर उल्टी लटकी हुई थी।
अमन ने ऊपर देखा।
वहाँ वही औरत थी।
इस बार उसके बाल चेहरे से हटे हुए थे।
अमन की चीख निकल गई।
उसका चेहरा देखकर वह समझ गया कि वह औरत कौन थी।
वह अमन की माँ जैसी दिख रही थी।
और तभी उस औरत ने मुस्कुराकर कहा—
“बेटा… इतनी देर क्यों कर दी?”
अमन के हाथ से टॉर्च गिर गई।
राघव चीख पड़ा—
“यह तुम्हारी माँ नहीं है!”
औरत धीरे-धीरे छत से नीचे उतरने लगी।
उसके पैर जमीन को छू ही नहीं रहे थे।
अमन पीछे हटता गया।
तभी बाहर से किसी के भागने की आवाज आई।
समीर और कबीर की आवाज सुनाई दी—
“अमन! जल्दी बाहर आ!”
अमन ने दरवाजे की तरफ देखा।
राघव ने कहा—
“रुको!”
लेकिन अमन ने दरवाजा खोल दिया।
बाहर समीर और कबीर खड़े थे।
दोनों बुरी तरह डरे हुए थे।
समीर ने अमन का हाथ पकड़ा।
“हमें अभी जंगल से बाहर निकलना होगा।”
अमन ने पूछा—
“तुम दोनों इतने समय कहाँ थे?”
कबीर ने कहा—
“हम भागकर पुराने कुएँ तक गए थे।”
“फिर?”
कबीर ने कांपते हुए कहा—
“वहाँ हमें राघव मिला था।”
अमन के पैरों तले जमीन खिसक गई।
उसने पीछे मुड़कर कमरे की तरफ देखा।
अंदर राघव अभी भी कुर्सी से बंधा था।
तो फिर…
कुएँ के पास राघव कौन था?
अमन कुछ समझ पाता, उससे पहले समीर ने उसका हाथ जोर से पकड़ लिया।
“अमन, चल!”
तीनों जंगल की तरफ भागने लगे।
कुछ दूर जाने के बाद अमन ने पीछे मुड़कर बंगले की तरफ देखा।
ऊपरी खिड़की में पाँच लोग खड़े थे।
राघव।
ठाकुर का बच्चा।
वह रहस्यमयी औरत।
एक काली परछाई।
और…
अमन खुद।
अमन ने घबराकर अपनी छाती पर हाथ रखा।
उसका दिल धड़क रहा था।
लेकिन उसी क्षण उसके पैरों के नीचे जमीन पर उसकी परछाई नहीं थी।
और पीछे बंगले की खिड़की में खड़ी उसकी परछाई धीरे-धीरे मुस्कुरा रही थी।
फिर जंगल के अंधेरे से एक आवाज आई—
“अब असली खेल शुरू होगा।”

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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