Part – 7 dil ki uljhane
ठाकुर हाउस की सुबह अब प्रिया के लिए नई रूटीन बन चुकी थी। वो जल्दी उठती, मां की तस्वीर के सामने दो मिनट खामोशी से खड़ी रहती, फिर किचन में पापा के लिए चाय बनाती। आरव नीचे आता तो दोनों भाई-बहन जैसे पहले की तरह हंसते-बोलते ब्रेकफास्ट करते। लेकिन अब हर हंसी के पीछे एक अनकही उलझन थी – रानी मां की डायरी का वो आखिरी पेज।
प्रिया ने अभी तक किसी को नहीं बताया कि वो दिल्ली जाकर आदित्य शर्मा को ढूंढने का प्लान बना रही है। आरव को भी नहीं। उसे डर था कि अगर आरव को पता चला कि वो खून का भाई नहीं है, तो उनका रिश्ता बदल जाएगा। और प्रिया नहीं चाहती थी कि कुछ बदले। आरव उसके लिए अब भी वही था – ढाल, सहारा, सबसे करीबी।
कॉलेज में दिन नॉर्मल चल रहे थे। विक्रांत क्लास में प्रिया के पास बैठता, नोट्स शेयर करता, लेकिन अब प्रिया थोड़ा दूर रहने लगी थी। विक्रांत की मुस्कुराहट अच्छी लगती थी, लेकिन दिल अभी किसी के लिए तैयार नहीं था। वो बस मुस्कुराकर बात टाल देती।
एक दिन लंच में विक्रांत ने कहा, “प्रिया, वीकेंड पर माल रोड पर कॉफी पीने चलेंगी? सिर्फ दोस्तों की तरह।”
प्रिया ने हिचकिचाते हुए कहा, “विक्रांत… अभी मैं थोड़ा बिजी हूं। फैमिली मैटर्स। बाद में देखते हैं।”
विक्रांत ने निराश होकर मुस्कुराया। “कोई बात नहीं। जब मन करे बताना।”
रिया ने साइड से देखकर प्रिया को चिढ़ाया, “यार, इतना अच्छा लड़का और तू मना कर रही है? कम से कम ट्राई तो कर!”
प्रिया ने धीरे से कहा, “रिया, दिल अभी कहीं और उलझा हुआ है। समझ नहीं आ रहा क्या करूं।”
रिया ने गंभीर होकर पूछा, “आरव से संबंधित?”
प्रिया चुप रही। बस सिर हिलाया।
शाम को घर लौटते वक्त आरव कार लेकर आया। “चल प्रिया, आज मैं ड्राइव करूंगा। रिया भी आ जा।”
रास्ते में रिया ने कॉमेडी शुरू की। “आरव भैया, आपकी कार में एसी क्यों नहीं चल रहा? गर्मी लग रही है!”
आरव ने शीशा नीचे किया। “रिया, हिमाचल में गर्मी? तू मुंबई की आदत से परेशान है।”
रिया ने प्रिया को कोहनी मारी। “देख प्रिया, तेरे भैया कितने कंजूस हैं। अमीर होकर भी एसी नहीं चलाते।”
प्रिया हंस पड़ी। आरव ने आईने से देखकर कहा, “रिया, अगली बार तुझे पैदल छोड़ दूंगा।”
घर पहुंचकर तीनों लॉन में बैठे। सनसेट देख रहे थे। आरव ने प्रिया से पूछा, “क्या हुआ? आज क्लास में चुप थी।”
प्रिया ने कहा, “बस थकान है भैया।”
आरव ने उसके सिर पर हाथ रखा। “प्रिया, अब तू घर में है। कोई टेंशन नहीं। जो भी हो, मुझे बता। हम साथ हैं।”
प्रिया की आंखें नम हो गईं। वो कुछ बोल नहीं पाई। बस मुस्कुराई। उस पल उसे लगा कि चाहे खून का रिश्ता हो या न हो, आरव से ज्यादा करीबी कोई नहीं। लेकिन डायरी का राज़ उसे अंदर ही अंदर खाए जा रहा था।
रात को प्रिया ने अकेले में दिल्ली के डॉक्टर आदित्य शर्मा को सर्च किया। एक पुराना आर्टिकल मिला – दिल्ली के बड़े हॉस्पिटल में कार्डियोलॉजिस्ट थे। अब रिटायर्ड। फोटो में एक सज्जन पुरुष थे, जिनकी आंखें… प्रिया से मिलती-जुलती थीं।
प्रिया ने मन ही मन फैसला किया – अकेले जाएगी दिल्ली। बिना किसी को बताए।
अगले दिन कॉलेज में अवनी ने फिर तंज कसा। “प्रिया, अब तो तू ठाकुर हाउस की मालकिन है। फिर हॉस्टल की तरह सादे कपड़े क्यों?”
रिया ने जवाब दिया, “अवनी, स्टाइल पैसे से नहीं दिल से आता है। तू कितना भी मेकअप कर ले, अंदर से खाली है।”
अवनी गुस्से में चली गई। लेकिन जाते-जाते बोली, “प्रिया, कुछ राज़ अभी बाकी हैं। जल्दी सबके सामने आएंगे।”
प्रिया को लगा अवनी कुछ जानती है। लेकिन वो इग्नोर कर गई।
शाम को आरव ने प्रिया को सरप्राइज दिया। पुरानी हवेली को रेनोवेट करवाने का प्लान। “प्रिया, वो हवेली मम्मी की फेवरेट थी। हम उसे दोबारा बनवाएंगे। तू डिजाइन कर।”
प्रिया खुश हो गई। दोनों पुरानी हवेली गए। कमला दाई भी साथ थी। वहां बैठकर पुरानी यादें शेयर कीं। आरव ने बताया कैसे छोटा होने पर मम्मी उसे और प्रिया को झूला झुलाती थीं।
प्रिया की आंखें भर आईं। “भैया… मुझे कुछ याद नहीं। लेकिन अब लगता है जैसे सब वापस आ रहा है।”
आरव ने कहा, “प्रिया, तू मेरे लिए हमेशा छोटी बहन रहेगी। चाहे कुछ भी हो।”
प्रिया ने उसे गले लगाया। उस पल दोनों के दिल में एक अजीब सा सुकून था। लेकिन प्रिया को पता था कि सच छिपाना अब ज्यादा दिन नहीं चल सकता।
रात को विक्रांत का मैसेज आया – “हाय, गुड नाइट। बस सोचा पूछ लूं सब ठीक तो है?”
प्रिया ने जवाब दिया – “हां, थैंक्स। गुड नाइट।”
बस इतना। कोई इमोजी। कोई एक्स्ट्रा बात। रोमांस अभी दूर था। दिल अभी उलझनों में था।
अगली सुबह प्रिया ने ट्रेन की टिकट बुक कर ली – दिल्ली के लिए। अकेले। रिया को भी नहीं बताया। सिर्फ एक चिट लिखी – “थोड़े दिन के लिए बाहर जा रही हूं। चिंता मत करना। जल्दी लौटूंगी।”
ट्रेन में बैठते वक्त प्रिया ने पेंडेंट छुआ। “मां… अब सच जानने का वक्त आ गया है।”
शिमला पीछे छूट रहा था। ठाकुर हाउस, आरव, रिया – सब। लेकिन प्रिया का मन भारी था। क्या दिल्ली से लौटकर सब वही रहेगा? या सब बदल जाएगा?
दूसरी तरफ ठाकुर हाउस में आरव को प्रिया की चिट मिली। वो चिंतित हो गया। “प्रिया कहां गई? अकेले?”
रिया ने कहा, “शायद कुछ पर्सनल। लेकिन भैया, तू इतना टेंशन क्यों ले रहा है? प्रिया बड़ी हो गई है।”
आरव ने गहरी सांस ली। “रिया, प्रिया मेरे लिए सिर्फ बहन नहीं… कुछ और भी है। समझ नहीं आ रहा।”
रिया चौंकी। “मतलब?”
आरव चुप हो गया। बाहर बारिश शुरू हो गई। दोनों की आंखों में एक ही सवाल – प्रिया कब लौटेगी, और लौटेगी तो क्या साथ लाएगी?
दिल्ली की ट्रेन तेज़ चल रही थी। प्रिया खिड़की से बाहर देख रही थी। नया राज़ खुलने वाला था।

NSW अनुभवी लेखक -🥇

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