भाग ~45 रूहानी, सब ठीक है?
कमरे की नीली रौशनी में, मोबाइल अब भी कान से सटा था। रूहानी की आँखें उस जली हुई स्केच की राख पर टिकी थीं, जैसे उस राख में से एक आवाज़ उठ रही हो… एकांश की।
कॉल अब भी चालू था, पर दोनों तरफ़ खामोशी पसरी हुई थी। एक बेचैन, धड़कनों से भरी खामोशी।
फिर… एक गहरी साँस की आवाज़ आई दूसरी ओर से।
“रूहानी…” आवाज़ टूटी हुई थी, जैसे किसी ने बरसों से दबे ज़ख्म को फिर से छुआ हो।
रूहानी की आँखें भीगने लगीं, पर आवाज़ में कोई कंपन नहीं आया। वो जानती थी, वो एक शब्द… सिर्फ एक … उसे फिर उसी दलदल में घसीट सकता था, जहाँ से उसने खुद को बड़ी मुश्किल से खींचा था।
और तभी…&
रूहानी के बंद दरवाज़े के उस पार से एक और आवाज़ आई। भारी, स्थिर, लेकिन एकदम साफ़।
‘रूहानी, सब ठीक है?’ अद्वैत की ज़ोर से, जिसे एकांश ने भी साफ़-साफ़ सुना।`
उसकी आवाज़ सुनते ही रूहानी जैसे एकदम यथार्थ में लौट आई। दिल में अचानक एक अजीब सी सरसराहट उठी।
फोन के उस छोर पर एकांश का दिल ज़ोर से धड़क उठा।_
उसने अपने गले को साफ़ किया, जैसे कुछ कहने वाला हो…. कुछ पूछने….. पर रूहानी की आवाज़ उससे पहले आई।
थोड़ी धीमी, पर पत्थर सी सख्त।
“अब कभी मत कॉल करना, एकांश। “मैं तुम्हें कभी माफ़ नहीं करने वाली।”
और बिना किसी और शब्द, बिना किसी झिझक के, उसने कॉल काट दिया।
दूसरी ओर, एकांश का हाथ अब भी हवा में था। स्क्रीन पर “Call Ended” लिखा चमक रहा था…. जैसे किसी फैसले की मुहर लग गई हो।
वो धीमे से सोफे पर से गिर पड़ा। पीठ फर्श से टकराई और उसकी आँखें टकटकी लगाए छत को देखने लगीं।
उसके अंदर कुछ सचमुच टूट गया था….. पहली बार।
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रूहानी ने दरवाज़ा खोला। उसके चेहरे पर एक थकी हुई उदासी की परत साफ़ दिख रही थी, फिर भी उसने होठों पर एक भिनी, बनावटी मुस्कान थमी हुई थी…. मानो उस कभी न भूले गए दर्द को अब भी सज़ा के रखा हो, जैसे वो टीस अब उसकी पहचान बन गई हो।
उसकी नज़र सीधी जाकर अद्वैत की आँखों से टकराई, जो दरवाज़े पर खड़ा था। उसकी आँखों में चिंता थी, पर आवाज़ बेहद नर्म थी।
“क्या हुआ रूहानी… मैं बस पानी लेने आया था… लेकिन तुम्हारे कमरे से कुछ जलने की गंध आ रही है। तुम ठीक तो हो ना? कुछ हुआ तो नहीं?”
रूहानी ने एक लंबी साँस ली, जैसे अंदर कुछ भारी था जिसे वो शब्दों में हल्का करना चाहती थी। उसका लहजा थका हुआ, मगर बेहद शालीन था। “तुम्हें अपने ही घर में मेरी वजह से परेशानी हुई… इसके लिए I’m really sorry…”
वो पल भर को रुकी, फिर निगाहें झुकाकर बोली, “कुछ ख़ास नहीं था… कुछ बेकार, पुराने sketches थे। जिनकी अब कोई ज़रूरत नहीं रही… वही जल रहे थे… जिसकी smell तुम्हें आ गई होगी।”
अद्वैत वहीं दरवाज़े पर खड़ा था, पर उसकी आँखें बार-बार कमरे के भीतर झाँक रही थीं। वहाँ एक हल्की रोशनी थी, जलते कागज़ की लपटें धीमी लय में हिल रही थीं, जैसे हर चित्र अपने अंदर कोई चीख़ लिए जा रहा हो। तभी उसकी नज़र उस अधजले sketch पर पड़ी… जिसमें रूहानी ने एकांश का चेहरा बनाया था।
वो पल अचानक खिंच गया। हवा भारी हो गई। अद्वैत की साँसें धीमी पड़ गईं, और उसकी निगाह उस चेहरे से हट नहीं रही थी…. वो चेहरा जो अब रूहानी के अतीत की राख बन चुका था।
रूहानी ने उसकी चुप्पी भांप ली। उसकी आवाज़ में कोई उलाहना नहीं था, सिर्फ एक शांत सवाल:
“कोई और बात भी है क्या, अद्वैत?”
अद्वैत जैसे किसी गहरे ख्याल से बाहर निकला, हल्का मुस्कुराया, “नहीं… नहीं, और कुछ नहीं। Good night.
और जैसे ही वो आगे बढ़ा, रूहानी ने दरवाज़ा बिना एक पल गंवाए बंद कर लिया, जैसे अब किसी और सवाल
लिए कोई जगह न हो।
उधर, अद्वैत सीढ़ियाँ चढ़ते-चढ़ते बार-बार उसी जलते हुए sketch के बारे में सोच रहा था। वो चेहरा, वो आग की लपटों में लिपटा एकांश… उसका सौतेला छोटा भाई।
रूहानी एकांश को कैसे जानती है? और अगर जानती है, तो अब उसके चेहरे को आग के हवाले क्यों कर रही है?
उसका हर क़दम अब किसी पुराने रहस्य के बोझ तले दबता जा रहा था… और दिल के किसी कोने में, एक अनजानी बेचैनी करवटें लेने लगी थी।
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दोपहर से ही रूहानी, अद्वैत, मीना और इवेंट प्लानर की टीम “Stitch & Soul” के स्टूडियो में जैसे अपनी सांसें बुन रही थी… हर टांका, हर मोड़, एक नए सफ़र का हिस्सा बनता जा रहा था।
ये सिर्फ एक स्टूडियो की ओपनिंग नहीं थी, ये एक दिल का दोबारा धड़कना था… और साथ ही मीना की 11-12 साल की बेटी गुनगुन का जन्मदिन भी।
थीम थी…. Canvas of Dreams।
स्टूडियो की हर दीवार पर नए सपनों की ख़ामोश दस्तक थी। फेयरी लाइट्स दीवारों से लिपटी थीं, जैसे किसी जादुई जंगल में चमकते जुगनू। छत से लटकते छोटे-छोटे origami stars और butterflies हवा में डोल रहे थे, मानो बच्चों के ख्वाबों ने कोई आकार ले लिया हो।
हर बच्चे को जैसे ही रंग-ब्रश और छोटा सा कैनवस थमाया गया, उनकी आँखें चमक उठीं।
रूहानी ने कहा, “जो भी ख्वाब देखो… उसे यहाँ उतार दो। कोई नियम नहीं है…. सिर्फ इमेजिनेशन।”
गुनगुन ने pastel-colored gown पहना हुआ था, जो रूहानी ने खुद डिजाइन किया था…. वो फ्रॉक जैसे मीना की याद में गूंथा हुआ हो। उसमें लाल और सुनहरे रंग की कलियाँ थीं, चुनरी एकदम हल्की और मोतियों की बारिश जैसी। उसके बालों में छोटे-छोटे सफेद फूल सजे थे, और माथे पर एक नन्हीं सी रंगीन बिंदी — बिल्कुल कहानी की परी की तरह। वो जैसे हल्के पाँव ज़मीन पर उड़ती आ रही हो, और हँसी उसकी सबसे प्यारी जादू की छड़ी हो।
मीना के चेहरे पर एक अलग ही सुकून था। उसे शायद यकीन नहीं हो रहा था कि उसकी बेटी आज इस महफिल की centerpiece है।
किचन के कोने में सजे थे cupcakes — हर एक पर एक अलग रंग का दिल। छोटे से rainbow cake पर बड़े प्यार से लिखा था: “To Gungun, with all the colors of the world.”
रूहानी ने गुनगुन को एक sketchbook दी थी, उसके पहले पन्ने पर लिखा, “हर रंग तुम्हारा अपना है… दुनिया से छिपाना मत।”
अद्वैत एक कोने में खड़ा था, लेकिन उसके भीतर कुछ बह रहा था। उसकी नज़रें बार-बार रूहानी की तरफ लौट जातीं। वो वहाँ मेहमान की तरह खड़ा था, पर महसूस कुछ और कर रहा था…. जैसे किसी पुराने संगीत के टुकड़े को फिर से सुनना, जिसे कभी दिल ने बारीकी से सीखा था।
रूहानी की आँखों में अब softness थी, पर वो softness कमज़ोरी नहीं थी वो वो ताक़त थी जो सिर्फ टूटकर संभलने वालों को मिलती है।
cake-cutting की तैयारी हो चुकी थी। मैं cake के पास आई, वो बीच में खड़ी थी, बाईं ओर मीना, दाईं ओर उसका भाई चीकू। पास में अद्वैत और रूहानी, दोनों के चेहरों पर हल्की सी मुस्कान। *
रूहानी ने हाथ में lighter लिया, मोमबत्तियाँ कि…..
दरवाज़े के पास से एक जानी-पहचानी आई, नहीं बुलाया गया इस खास इवेंट में?”
रूहानी का हाथ रुक गया। मोमबत्तियों की लौ काँपी। Adwait ने पीछे मुड़कर देखा, और उसकी भौंहें सिकुड़ गईं।
दरवाज़े पर कोई था, जिसे सबने कहीं न कहीं दफ़न कर दिया था… लेकिन वो आज लौट आया था… जैसे7 अधूरी स्केच की परछाई अचानक कैनवस के बीच उतर आए।
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क्या वाक़ई रूहानी ने अतीत को जलाकर ख़त्म कर दिया था… या वो राख किसी नई आग की शुरुआत थी?
जिसे सबने दफ़न कर दिया था, वो दरवाज़े पर क्यों लौट आया था? क्या वो बस एक परछाई था… या कोई ऐसा सच जो अब सामने आना ही था?
क्या गुनगुन के जन्मदिन की ये रंगीन शाम किसी और की काली रात में बदलने वाली थी?

लिखकर रूह छूने की कोशिश…..
🥹🥹

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