सुबह होते ही आरव सीधे कबीर के पास पहुँचा।
उसने रात की सारी घटना उसे बता दी।
कबीर काफी देर तक चुप रहा।
फिर उसने कहा,
“अब वापस मत जाना।”
आरव ने पूछा,
“क्यों?”
कबीर ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा,
“क्योंकि तू पहली रात बच गया है। लेकिन श्राप अभी शुरू हुआ है।”
आरव ने नाना की डायरी उसके सामने रख दी।
कबीर ने डायरी देखते ही उसे बंद कर दिया।
“इसे मत खोल।”
“तू जानता है इसमें क्या लिखा है?”
कबीर ने धीरे से सिर हिलाया।
“मेरे दादा ने मुझे इस कहानी के बारे में बताया था।”
उसने बताया कि लगभग चालीस साल पहले हवेली में सावित्री नाम की एक औरत रहती थी। उसका पति अचानक मर गया था। गाँव वालों का मानना था कि सावित्री पर किसी आत्मा का साया था।
एक रात उसने घर के सात लोगों को मार डाला।
लेकिन मरने से पहले उसने कहा था—
“मैंने किसी को नहीं मारा। वह मुझसे करवाया गया था।”
उसके बाद उसने खुदकुशी कर ली।
कबीर ने कहा,
“उस रात से हर कुछ साल में सात रातों का सिलसिला शुरू होता है।”
आरव ने पूछा,
“और सातवीं रात?”
कबीर ने कोई जवाब नहीं दिया।
आरव ने ज़ोर देकर पूछा,
“सातवीं रात को क्या होता है?”
कबीर ने धीमी आवाज़ में कहा,
“जिसके घर में वह दिखाई देती है… वह सातवीं रात के बाद कभी नहीं मिलता।”
शाम को आरव फिर नाना के घर गया।
वह इस बार अकेला नहीं था। कबीर भी उसके साथ था।
दोनों ने घर की तलाशी शुरू की।
ऊपर वाले कमरे के सामने पहुँचते ही कबीर रुक गया।
“इसे खोलना मत।”
आरव ने पूछा,
“क्यों?”
“क्योंकि तेरे नाना ने इसे अपनी मौत से पहले बंद किया था।”
आरव ने दरवाज़े को ध्यान से देखा।
उस पर अंदर की तरफ से खरोंचों के निशान थे।
जैसे कोई कमरे के अंदर बंद होकर बाहर निकलने की कोशिश कर रहा हो।
अचानक अंदर से धीमी आवाज़ आई—
“आरव…”
दोनों पीछे हट गए।
कबीर ने कहा,
“चल यहाँ से।”
लेकिन आरव ने दरवाज़े का ताला तोड़ दिया।
दरवाज़ा खुलते ही कमरे से बर्फ जैसी ठंडी हवा बाहर आई।
कमरा खाली था।
सिर्फ़ बीच में एक पुरानी कुर्सी रखी थी।
दीवार पर दर्जनों तस्वीरें लगी थीं।
सभी तस्वीरों में वही औरत थी।
लेकिन आख़िरी तस्वीर देखकर आरव के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
उस तस्वीर में वह खुद खड़ा था।
उसके बगल में वही औरत थी।
तस्वीर बहुत पुरानी लग रही थी।
आरव ने काँपते हुए कहा,
“ये कैसे हो सकता है?”
कबीर ने तस्वीर हाथ से गिरा दी।
तभी पीछे से दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।
धड़ाम!
दोनों ने दरवाज़ा खोलने की कोशिश की।
लेकिन वह नहीं खुला।
कमरे में अचानक किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आने लगी।
“माँ… मुझे मत छोड़ो…”
आरव ने दीवार की तरफ देखा।
एक तस्वीर धीरे-धीरे हिल रही थी।
उसने तस्वीर हटाई।
पीछे दीवार में एक छोटा-सा छेद था।
छेद के अंदर एक पुराना लकड़ी का डिब्बा रखा था।
उसमें कुछ कागज़, एक चाँदी की अंगूठी और नाना की दूसरी डायरी थी।
आरव ने डायरी खोली।
पहली लाइन पढ़ते ही उसकी साँस रुक गई।
“सावित्री हत्यारी नहीं थी।”
अगले पन्ने पर लिखा था—
“उस रात हवेली में जो हुआ, उसके पीछे गाँव के कुछ लोग थे। उन्होंने सावित्री के पति की जमीन हड़पने के लिए उसे पागल साबित किया। लेकिन उन्होंने गलती से उस पुराने कुएँ को खोल दिया, जिसमें वर्षों पहले एक तांत्रिक ने किसी बुरी शक्ति को बंद किया था।”
आरव पन्ने पलटता गया।
“वह शक्ति सावित्री के शरीर में प्रवेश कर गई। उसने अपने परिवार को नहीं मारा। उसके शरीर से किसी और ने वह सब करवाया।”
फिर एक वाक्य था—
“सावित्री की आत्मा आज भी हवेली में कैद है, लेकिन असली श्राप उस चीज़ का है जो उसके भीतर आई थी।”
आरव ने डायरी बंद कर दी।
तभी कबीर ने उसकी तरफ देखा।
“आज कौन सी रात है?”
आरव ने घड़ी देखी।
रात के 12 बजकर 1 मिनट।
दूसरी रात।
अचानक कमरे में रखी कुर्सी अपने आप हिलने लगी।
फिर किसी ने फुसफुसाकर कहा—
“अब मैं घर के अंदर हूँ…”
कबीर ने आरव का हाथ पकड़ा।
दोनों किसी तरह दरवाज़ा खोलकर बाहर भागे।
सीढ़ियों से उतरते समय आरव ने नीचे देखा।
हॉल में सावित्री खड़ी थी।
लेकिन इस बार उसके बाल चेहरे पर नहीं थे।
उसका चेहरा बेहद सफेद था।
उसने हाथ उठाकर आरव की तरफ इशारा किया।
फिर उसके होंठ हिले—
“तीसरी रात… मैं तुम्हारा नाम पुकारूँगी।”
अगले ही पल सारी लाइटें बंद हो गईं।
जब लाइट वापस आई, वह गायब थी।
सुबह आरव ने नाना की डायरी फिर खोली।
उसमें एक नया वाक्य दिखाई दे रहा था, जो पहले वहाँ नहीं था।
स्याही अभी गीली थी।
“सावधान। अब वह घर के अंदर है।”
आरव ने काँपते हुए डायरी बंद कर दी।
लेकिन तभी उसके पीछे से किसी ने धीरे से कहा—
“आरव…”
वह आवाज़ बिल्कुल कबीर की थी।
आरव ने तुरंत पीछे देखा।
कबीर उसके सामने खड़ा था।
उसका चेहरा सफेद पड़ चुका था।
“क्या हुआ?” आरव ने पूछा।
कबीर ने काँपते हुए कहा,
“मैंने तुझे नहीं बुलाया।”
दोनों कुछ सेकंड तक एक-दूसरे को देखते रहे।
फिर ऊपर से किसी के चलने की आवाज़ आई।
ठक… ठक… ठक…
और उसके बाद एक और आवाज़—
“आरव…”
इस बार आवाज़ खुद आरव की थी।
लेकिन वह आवाज़ ऊपर वाले बंद कमरे से आ रही थी।
कबीर ने धीरे से कहा,
“अब तीसरी रात आने वाली है।”
और तभी हवेली की सारी खिड़कियाँ एक साथ बंद हो गईं।
धड़ाम!
बाहर आसमान में बिजली चमकी।
और हवेली की दीवार पर किसी ने खून से लिख दिया—
“छह रातें पूरी होने तक कोई नहीं बचेगा।”

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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