उत्तर प्रदेश के एक छोटे-से गाँव देवगढ़ में शाम के बाद सन्नाटा छा जाता था। गाँव के आख़िरी छोर पर एक पुरानी हवेली थी, जिसे लोग काली हवेली कहते थे।
कहते थे कि लगभग चालीस साल पहले उस हवेली में रहने वाली एक औरत ने अपने ही घर के सात लोगों को मौत के घाट उतार दिया था। उसके बाद उसने हवेली के कुएँ में कूदकर जान दे दी।
लेकिन गाँव के बुज़ुर्ग कहते थे कि कहानी इतनी सीधी नहीं थी।
उनका कहना था कि मरने से पहले उस औरत ने श्राप दिया था—
“हर सातवीं रात मैं लौटूँगी… और इस बार कोई मुझे रोक नहीं पाएगा।”
तब से हर कुछ साल बाद गाँव में कोई न कोई अजीब मौत होती थी। और हर बार मौत से पहले सात रातों तक हवेली से घंटी बजने की आवाज़ आती थी।
लोग उस रास्ते से सूर्यास्त के बाद गुजरना तक पसंद नहीं करते थे।
इसी गाँव में कई साल बाद आरव अपने नाना की मौत के बाद वापस आया था।
आरव शहर में रहता था और भूत-प्रेत जैसी बातों पर बिल्कुल विश्वास नहीं करता था। नाना की पुरानी हवेली बेचने से पहले वह वहाँ रखे कुछ ज़रूरी कागज़ लेने आया था।
गाँव पहुँचते ही उसकी मुलाकात बचपन के दोस्त कबीर से हुई।
कबीर ने आरव को देखते ही कहा,
“तू रात में नाना के घर मत रुकना।”
आरव हँस पड़ा।
“क्यों? घर मुझे खा जाएगा?”
कबीर का चेहरा गंभीर था।
“मज़ाक मत कर। सातवीं रात शुरू हो चुकी है।”
आरव की हँसी अचानक रुक गई।
“क्या मतलब?”
कबीर ने चारों तरफ देखा और धीमी आवाज़ में कहा,
“आज पहली रात है।”
आरव ने इसे गाँव की पुरानी अफवाह समझकर टाल दिया।
रात करीब दस बजे वह नाना के घर पहुँच गया। घर बहुत पुराना था। लकड़ी के दरवाज़े, दीवारों पर जमी सीलन और लंबे गलियारे में लटकती पुरानी तस्वीरें।
बिजली बार-बार जा रही थी।
आरव ने अपना बैग रखा और नाना के कमरे में कागज़ ढूँढने लगा।
तभी उसकी नज़र एक पुरानी डायरी पर पड़ी।
डायरी के कवर पर सिर्फ़ इतना लिखा था—
“इसे सातवीं रात से पहले मत पढ़ना।”
आरव कुछ पल उसे देखता रहा।
फिर मुस्कुराकर बोला,
“नाना भी ना…”
उसने डायरी खोल ली।
पहले पन्ने पर तारीखें लिखी थीं।
पहली रात — वह दरवाज़े पर आएगी।
दूसरी रात — वह घर के अंदर होगी।
तीसरी रात — वह तुम्हारा नाम पुकारेगी।
चौथी रात — आईने में दिखाई देगी।
पाँचवीं रात — किसी अपने की आवाज़ में बात करेगी।
छठी रात — घर में कोई मर जाएगा।
और आख़िरी पन्ने पर लिखा था—
“सातवीं रात… वह तुम्हें अपने साथ ले जाएगी।”
आरव का चेहरा गंभीर हो गया।
तभी—
ठक… ठक… ठक…
मुख्य दरवाज़े पर किसी ने दस्तक दी।
आरव कुछ सेकंड तक स्थिर बैठा रहा।
फिर उसने घड़ी देखी।
रात के 12 बजकर 7 मिनट हो चुके थे।
उसने सोचा शायद कबीर होगा।
“कौन है?”
कोई जवाब नहीं आया।
फिर—
ठक… ठक… ठक…
इस बार आवाज़ और तेज़ थी।
आरव दरवाज़े के पास गया और पूछा,
“कौन?”
बाहर से एक औरत की बहुत धीमी आवाज़ आई—
“आरव…”
उसके शरीर में जैसे बिजली दौड़ गई।
आवाज़ बिल्कुल उसकी माँ जैसी थी।
लेकिन उसकी माँ शहर में थी।
आरव ने तुरंत दरवाज़ा खोलने के लिए हाथ बढ़ाया, फिर डायरी की पहली लाइन याद आ गई।
“पहली रात — वह दरवाज़े पर आएगी।”
उसने हाथ पीछे खींच लिया।
बाहर से फिर आवाज़ आई—
“बेटा… दरवाज़ा खोलो।”
आरव के माथे पर पसीना आ गया।
वह पीछे हट गया।
कुछ देर तक दरवाज़े पर दस्तक होती रही।
फिर अचानक सब शांत हो गया।
आरव ने राहत की साँस ली।
लेकिन तभी घर के अंदर से आवाज़ आई—
“आरव…”
वह धीरे-धीरे पीछे मुड़ा।
गलियारे के आख़िरी छोर पर एक औरत खड़ी थी।
सफेद साड़ी।
लंबे काले बाल।
चेहरा बालों से पूरी तरह ढका हुआ।
आरव की साँस अटक गई।
औरत ने धीरे-धीरे अपना सिर उठाया।
बालों के बीच से दो बिल्कुल काली आँखें दिखाई दीं।
फिर वह मुस्कुराई।
आरव पीछे हटते हुए दीवार से जा लगा।
औरत ने कुछ नहीं कहा।
बस अपना हाथ उठाकर ऊपर की मंज़िल की तरफ इशारा किया।
वहाँ एक पुराना दरवाज़ा था, जिसे आरव ने बचपन से बंद देखा था।
अचानक दरवाज़े के पीछे से किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आने लगी।
“मुझे बाहर निकालो…”
आरव ने काँपते हुए पूछा,
“तुम कौन हो?”
औरत गायब थी।
गलियारा खाली था।
लेकिन फर्श पर गीले पैरों के निशान बने हुए थे।
वे निशान मुख्य दरवाज़े से अंदर नहीं आए थे।
वे ऊपर वाले बंद कमरे से निकलकर सीधे आरव के कमरे तक आए थे।
आरव ने उसी रात घर छोड़ने का फैसला किया।
लेकिन जैसे ही उसने मुख्य दरवाज़ा खोला, बाहर घना कोहरा था।
और कोहरे के बीच उसे वही औरत दिखाई दी।
वह घर के बाहर खड़ी थी।
आरव पीछे हट गया।
तभी उसकी नज़र उसके हाथ में पकड़ी किसी चीज़ पर पड़ी।
वह एक पुरानी तस्वीर थी।
आरव ने ध्यान से देखा।
तस्वीर में उसके नाना के साथ वही औरत खड़ी थी।
और तस्वीर के पीछे लिखा था—
“पहली रात पूरी हुई। अब छह रातें बाकी हैं।”

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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