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आधी रात की आखिरी बस (last part-3)

पढ़ने का समय : 10 मिनट

आरव खिड़की से बाहर देखता रह गया।

 

सड़क के बीचोंबीच एक दूसरी बस खड़ी थी।

 

उसके आगे साफ लिखा था—

 

रूट नंबर 13

 

लेकिन वह बस पुरानी नहीं थी।

 

वह बिल्कुल नई थी।

 

उसकी खिड़कियां चमक रही थीं और अंदर की सीटें खाली थीं।

 

आरव ने गौर से देखा।

 

फिर उसका दिल जोर से धड़कने लगा।

 

बस की हर सीट पर…

 

उसी के जैसे चेहरे वाला एक आदमी बैठा था।

 

किसी की आंखें बंद थीं।

 

कोई खिड़की से बाहर देख रहा था।

 

कोई सिर झुकाकर बैठा था।

 

लेकिन सभी का चेहरा आरव जैसा था।

 

“ये क्या है?”

 

आरव की आवाज़ कांप रही थी।

 

ड्राइवर ने कहा—

 

“तुम्हारे जितने अधूरे जीवन हैं… उतने चेहरे।”

 

“मैं समझा नहीं।”

 

“हर बार जब कोई इंसान मरने से पहले कोई बड़ा फैसला अधूरा छोड़ देता है, उसका एक रास्ता इस बस में बन जाता है।”

 

आरव ने पूछा—

 

“तो मैं कौन हूं?”

 

ड्राइवर ने उसकी तरफ देखा।

 

“तुम वह आरव हो जिसने अपनी मौत स्वीकार नहीं की।”

 

अचानक आरव के दिमाग में यादों का तूफान आने लगा।

 

बारिश की रात।

 

सड़क पर उसकी बाइक।

 

सामने से आती तेज़ रोशनी।

 

ब्रेक फेल होना।

 

फिर पुल।

 

फिर जोरदार टक्कर।

 

आरव को याद आया कि एक्सीडेंट से कुछ सेकंड पहले उसने अपनी मां को फोन किया था।

 

“मां… मैं जल्दी घर आ रहा हूं।”

 

मां ने कहा था—

 

“बेटा, रास्ते में सावधान रहना।”

 

आरव ने जवाब दिया था—

 

“चिंता मत करो।”

 

फिर फोन कट गया था।

 

और कुछ ही सेकंड बाद उसकी बाइक पुल से नीचे गिर गई थी।

 

उसकी आखिरी इच्छा थी—

 

“मुझे घर पहुंचना है।”

 

यही इच्छा उसे रूट नंबर 13 की बस तक ले आई थी।

 

आरव ने धीरे से कहा—

 

“तो मैं मर चुका हूं?”

 

ड्राइवर ने सिर हिलाया।

 

“हां।”

 

आरव की आंखों से आंसू निकल आए।

 

“लेकिन मेरी मां?”

 

“वह तुम्हारा इंतजार कर रही है।”

 

“मैं उससे मिलना चाहता हूं।”

 

ड्राइवर चुप रहा।

 

फिर बोला—

 

“मिल सकते हो।”

 

आरव ने उम्मीद से पूछा—

 

“कैसे?”

 

“बस से उतर जाओ।”

 

आरव ने दरवाज़े की तरफ देखा।

 

“फिर?”

 

“फिर तुम्हारी आखिरी याद पूरी हो जाएगी।”

 

आरव आगे बढ़ा।

 

लेकिन तभी सावित्री उसके सामने आ गई।

 

अब वह फिर बूढ़ी दिखाई दे रही थी।

 

“मत जाना।”

 

आरव रुक गया।

 

“आपने ही तो कहा था कि मुझे अपनी मौत स्वीकार करनी होगी।”

 

सावित्री ने सिर हिलाया।

 

“हां।”

 

“लेकिन पहले तुम्हें एक बात जाननी होगी।”

 

आरव ने पूछा—

 

“क्या?”

 

सावित्री ने पीछे खड़ी दूसरी बस की तरफ देखा।

 

“इस बस का ड्राइवर हमेशा मर चुका होता है।”

 

आरव ने ड्राइवर की तरफ देखा।

 

“तो?”

 

सावित्री बोली—

 

“बीस साल पहले इस बस का पहला ड्राइवर मेरा पति था।”

 

आरव चौंक गया।

 

“आपके पति?”

 

“हां।”

 

“उसने क्या किया था?”

 

“वह लोगों को उनकी मौत के बाद घर पहुंचाने का काम करता था।”

 

“लेकिन एक दिन उसने एक यात्री को बचाने के लिए नियम तोड़ दिया।”

 

“उस यात्री को उसकी मां से मिलना था।”

 

“उसने बस रोक दी।”

 

“यात्री उतर गया।”

 

“लेकिन उसकी जगह किसी और को बस में आना पड़ा।”

 

आरव ने पूछा—

 

“किसे?”

 

सावित्री ने धीरे से कहा—

 

“मेरे बेटे मोहन को।”

 

आरव की आंखें फैल गईं।

 

“क्या?”

 

सावित्री रोने लगी।

 

“मेरे पति ने मोहन को बचाने के लिए बस के साथ सौदा किया।”

 

“उस दिन से मोहन इस बस में फंस गया।”

 

“और मेरे पति ड्राइवर बन गए।”

 

“लेकिन फिर…”

 

सावित्री की आवाज़ टूट गई।

 

“एक रात मेरे पति ने बस से भागने की कोशिश की।”

 

“बस ने उन्हें भी निगल लिया।”

 

आरव चुप रहा।

 

अब उसे समझ आ रहा था कि यह बस सिर्फ मृत लोगों को नहीं ले जाती थी।

 

यह उन लोगों को कैद करती थी जो किसी और की जिंदगी बदलने की कोशिश करते थे।

 

ड्राइवर ने अचानक कहा—

 

“बहुत बातें हो गईं।”

 

उसने दरवाज़ा खोला।

 

“आरव, तुम्हारे पास दो रास्ते हैं।”

 

“पहला—बस से उतर जाओ और अपनी मौत स्वीकार कर लो।”

 

“दूसरा—ड्राइवर की सीट पर बैठ जाओ।”

 

आरव ने पूछा—

 

“अगर मैं ड्राइवर बन गया तो?”

 

ड्राइवर मुस्कुराया।

 

“तुम्हें हर रात उन लोगों को उनके आखिरी पड़ाव तक पहुंचाना होगा।”

 

“और अगर मैंने मना किया?”

 

ड्राइवर की मुस्कान गायब हो गई।

 

“तो बस तुम्हें हमेशा के लिए अपने अंदर रखेगी।”

 

आरव ने अपनी मां को याद किया।

 

फिर उसने दरवाज़े की तरफ कदम बढ़ाया।

 

सावित्री ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“तुम्हें फैसला बहुत सोचकर करना।”

 

आरव ने कहा—

 

“मैं अपनी मां को एक बार देखना चाहता हूं।”

 

वह बस से नीचे उतर गया।

 

जैसे ही उसके पैर जमीन पर पड़े…

 

पूरा संसार बदल गया।

 

बारिश बंद हो गई।

 

सड़क पर कोई बस नहीं थी।

 

न सावित्री।

 

न ड्राइवर।

 

न रूट नंबर 13।

 

सिर्फ एक अस्पताल था।

 

आरव अंदर गया।

 

उसने रिसेप्शन पर अपनी मां का नाम पूछा।

 

नर्स ने कहा—

 

“वह ICU में हैं।”

 

आरव दौड़कर वहां पहुंचा।

 

कांच के दूसरी तरफ उसकी मां बिस्तर पर लेटी थी।

 

उसकी आंखें बंद थीं।

 

मशीनें चल रही थीं।

 

आरव ने कांच पर हाथ रखा।

 

“मां…”

 

अचानक उसकी मां ने आंखें खोल दीं।

 

आरव की सांस रुक गई।

 

उसने धीरे से कहा—

 

“मां।”

 

उसकी मां ने आसपास देखा।

 

फिर बहुत धीमी आवाज़ में बोली—

 

“आरव?”

 

आरव रोने लगा।

 

“हां मां।”

 

मां की आंखों से आंसू निकल आए।

 

“तुम आ गए?”

 

आरव ने मुस्कुराते हुए कहा—

 

“हां।”

 

मां ने हाथ बढ़ाया।

 

लेकिन उनके बीच कांच था।

 

आरव ने कांच पर अपना हाथ रखा।

 

मां ने दूसरी तरफ अपना हाथ रख दिया।

 

कुछ पल दोनों वैसे ही खड़े रहे।

 

फिर उसकी मां ने कहा—

 

“अब घर आ जाओ बेटा।”

 

आरव की आंखें बंद हो गईं।

 

उसे महसूस हुआ कि उसका शरीर हल्का हो रहा है।

 

जैसे वह हवा में घुल रहा हो।

 

उसे लगा अब सब खत्म हो जाएगा।

 

लेकिन तभी…

 

अस्पताल की सारी लाइटें बंद हो गईं।

 

एक आवाज़ आई—

 

“आरव…”

 

वह मुड़ा।

 

गलियारे के आखिरी छोर पर रूट नंबर 13 की बस खड़ी थी।

 

उसके दरवाज़े खुले थे।

 

अंदर सावित्री बैठी थी।

 

उसके पास मोहन बैठा था।

 

और ड्राइवर की सीट खाली थी।

 

सावित्री ने कहा—

 

“आरव… हमें तुम्हारी जरूरत है।”

 

आरव ने सिर हिलाया।

 

“मैं वापस नहीं जाऊंगा।”

 

सावित्री ने कहा—

 

“अगर तुम नहीं आए… तो अगली बस तुम्हारी मां को लेने आएगी।”

 

आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।

 

“क्या?”

 

“जिस इंसान से तुम्हारा रिश्ता सबसे गहरा होता है… बस आखिर में उसे भी अपने साथ ले जाती है।”

 

आरव ने अपनी मां की तरफ देखा।

 

मशीन पर उसकी धड़कन अचानक तेज़ हो गई।

 

बीप…

 

बीप…

 

बीप…

 

आरव समझ गया।

 

अगर वह बस में वापस नहीं गया…

 

तो अगला टिकट उसकी मां का होगा।

 

उसने आखिरी बार अपनी मां को देखा।

 

“मुझे माफ करना।”

 

फिर वह बस की तरफ चल पड़ा।

 

जैसे ही वह बस में चढ़ा…

 

दरवाज़ा बंद हो गया।

 

ड्राइवर की सीट पर बैठते ही उसकी आंखों के सामने अंधेरा छा गया।

 

कुछ सेकंड बाद उसने आंखें खोलीं।

 

उसके हाथ स्टीयरिंग पर थे।

 

सामने सड़क थी।

 

घड़ी पर समय था—

 

11:47 PM

 

कंडक्टर ने पीछे से कहा—

 

“पहली यात्रा?”

 

आरव ने धीरे से सिर हिलाया।

 

“हां।”

 

कंडक्टर ने उसे टिकट मशीन दी।

 

“आज रात तीन यात्री हैं।”

 

आरव ने पीछे देखा।

 

बस में तीन लोग बैठे थे।

 

एक बूढ़ा आदमी।

 

एक जवान लड़की।

 

और एक छोटा बच्चा।

 

आरव ने बस स्टार्ट की।

 

इंजन की आवाज़ गूंजी।

 

बस आगे बढ़ी।

 

पहला यात्री बूढ़ा आदमी था।

 

उसने कहा—

 

“मुझे अपने घर जाना है।”

 

आरव ने पूछा—

 

“कहां?”

 

बूढ़े ने एक पता बताया।

 

बस वहां पहुंची।

 

दरवाज़ा खुला।

 

बाहर एक छोटा-सा घर था।

 

दरवाज़े पर एक बूढ़ी औरत खड़ी थी।

 

वह अपने पति का इंतजार कर रही थी।

 

बूढ़ा आदमी बस से उतरा।

 

उसने पीछे मुड़कर आरव को देखा।

 

“धन्यवाद।”

 

फिर वह अपनी पत्नी के पास चला गया।

 

दोनों एक-दूसरे को गले लगाकर रोने लगे।

 

और उसी पल वह दोनों गायब हो गए।

 

दूसरी यात्री एक जवान लड़की थी।

 

उसने कहा—

 

“मुझे स्टेशन जाना है।”

 

आरव ने बस स्टेशन पहुंचाई।

 

वहां एक लड़का उसका इंतजार कर रहा था।

 

लड़की बस से उतरी।

 

लड़के ने उसे देखा और मुस्कुराया।

 

दोनों एक-दूसरे के पास गए।

 

फिर दोनों भी रोशनी में गायब हो गए।

 

तीसरा यात्री छोटा बच्चा था।

 

आरव ने पीछे देखा।

 

बच्चा चुपचाप बैठा था।

 

उसने पूछा—

 

“तुम्हें कहां जाना है?”

 

बच्चे ने कहा—

 

“मेरी मां के पास।”

 

आरव ने पूछा—

 

“तुम्हारी मां कहां रहती हैं?”

 

बच्चे ने खिड़की के बाहर इशारा किया।

 

“वहां।”

 

आरव ने बस रोक दी।

 

बाहर एक घर था।

 

दरवाज़े पर एक औरत खड़ी थी।

 

वह रो रही थी।

 

बच्चे ने बस से उतरते हुए आरव को देखा।

 

“भैया… धन्यवाद।”

 

आरव ने पूछा—

 

“तुम्हारा नाम क्या है?”

 

बच्चे ने मुस्कुराकर कहा—

 

“मोहन।”

 

आरव के हाथ स्टीयरिंग पर जम गए।

 

“मोहन?”

 

बच्चा गायब हो गया।

 

बाहर सावित्री खड़ी थी।

 

उसने अपने बेटे को गले लगा लिया।

 

फिर उसने आरव की तरफ देखा।

 

उसकी आंखों में पहली बार शांति थी।

 

“अब तुम आज़ाद हो।”

 

अचानक बस की घड़ी बदल गई।

 

11:47 PM

 

से

 

11:48 PM

 

हो गई।

 

आरव ने हैरानी से घड़ी देखी।

 

बीस साल में पहली बार…

 

समय आगे बढ़ा था।

 

बस के अंदर की सारी लाइटें जल उठीं।

 

कंडक्टर ने कहा—

 

“रूट नंबर 13 की आखिरी यात्रा पूरी हो गई।”

 

आरव ने पूछा—

 

“अब?”

 

कंडक्टर मुस्कुराया।

 

“अब बस खत्म।”

 

बस धीरे-धीरे रुक गई।

 

सामने सूरज उग रहा था।

 

आरव ने दरवाज़ा खोला।

 

वह नीचे उतर गया।

 

बस के पीछे देखा।

 

वहां कोई बस नहीं थी।

 

सिर्फ खाली सड़क थी।

 

आरव ने अपनी आंखें बंद कीं।

 

उसे अपनी मां की आवाज़ सुनाई दी—

 

“अब घर आ जाओ बेटा।”

 

जब उसने आंखें खोलीं…

 

वह अस्पताल के बाहर खड़ा था।

 

सुबह हो चुकी थी।

 

वह अंदर भागा।

 

ICU के बाहर डॉक्टर खड़े थे।

 

आरव ने पूछा—

 

“मेरी मां?”

 

डॉक्टर मुस्कुराए।

 

“उनकी हालत अब खतरे से बाहर है।”

 

आरव की आंखों से आंसू बह निकले।

 

वह कमरे में गया।

 

उसकी मां ने आंखें खोलीं।

 

आरव ने उनका हाथ पकड़ लिया।

 

मां ने कमजोर आवाज़ में पूछा—

 

“तुम रात को आए थे?”

 

आरव चुप हो गया।

 

“हां।”

 

मां ने मुस्कुराकर कहा—

 

“मुझे पता था।”

 

“मैंने तुम्हें देखा था।”

 

आरव ने हैरानी से पूछा—

 

“कहां?”

 

मां ने आंखें बंद करते हुए कहा—

 

“एक बस में।”

 

आरव का दिल जोर से धड़कने लगा।

 

“कौन-सी बस?”

 

मां ने धीरे से कहा—

 

“रूट नंबर 13।”

 

आरव खामोश रह गया।

 

उसने खिड़की के बाहर देखा।

 

सड़क पर एक पुरानी बस गुजर रही थी।

 

उसके आगे कोई नंबर नहीं था।

 

लेकिन उसकी पिछली खिड़की पर किसी ने उंगली से लिखा था—

 

“धन्यवाद, आरव।”

 

बस कुछ सेकंड में गायब हो गई।

 

आरव ने अपनी मां का हाथ और कसकर पकड़ लिया।

 

उस दिन के बाद रूट नंबर 13 कभी किसी शहर में दिखाई नहीं दी।

 

लोग कहते हैं कि वह बस खत्म हो गई।

 

लेकिन कुछ बुजुर्ग आज भी कहते हैं—

 

अगर रात के 11:47 बजे आप किसी सुनसान बस स्टॉप पर अकेले खड़े हों…

 

और दूर से कोई पुरानी बस आती दिखाई दे…

 

तो उसमें मत बैठना।

 

क्योंकि हो सकता है वह बस आपको आपके घर तक पहुंचाने नहीं…

 

आपकी आखिरी याद तक पहुंचाने आई हो।

 

और अगर बस के ड्राइवर की सीट पर कोई जवान लड़का बैठा दिखाई दे…

 

तो उसका चेहरा ध्यान से मत देखना।

 

क्योंकि शायद वह…

 

आरव हो।

 

जो आज भी उन लोगों को उनके आखिरी पड़ाव तक पहुंचा रहा है…

 

जिन्हें अपने घर से आखिरी बार मिलने की इच्छा होती है।

 

समाप्त।

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