बस का दरवाज़ा धीरे-धीरे बंद हो रहा था।
आरव की नजर बाहर खड़ी उस लड़की पर थी।
वह उसकी छोटी बहन जैसी दिख रही थी।
वही चेहरा।
वही आंखें।
वही आवाज़।
“भैया… मुझे अपने साथ ले चलो।”
आरव का दिल टूटने लगा।
उसकी बहन रिया की मौत पांच साल पहले एक सड़क दुर्घटना में हुई थी।
तब आरव उसे बचा नहीं पाया था।
आज पहली बार उसे लगा जैसे किस्मत उसे दूसरा मौका दे रही हो।
वह दरवाज़े की तरफ बढ़ा।
लेकिन बूढ़ी औरत ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“मत जाना!”
आरव ने हाथ छुड़ाने की कोशिश की।
“ये मेरी बहन है!”
बूढ़ी औरत चीखी—
“नहीं!”
उसकी आवाज़ इतनी तेज़ थी कि पूरी बस शांत हो गई।
“ये तुम्हारी बहन नहीं है।”
बाहर खड़ी लड़की अचानक हंसने लगी।
उसकी हंसी इंसान जैसी नहीं थी।
उसका चेहरा धीरे-धीरे बदलने लगा।
पहले आंखें काली हुईं।
फिर उसकी त्वचा राख जैसी हो गई।
और आखिर में उसका मुंह असामान्य रूप से फैल गया।
आरव पीछे हट गया।
“ये क्या है?”
बूढ़ी औरत बोली—
“ये वो है जो हर यात्री को उसके सबसे प्यारे इंसान का चेहरा दिखाकर बस से बाहर बुलाती है।”
“अगर कोई उसके पीछे चला जाए… तो कभी वापस नहीं आता।”
दरवाज़ा बंद हो गया।
बाहर खड़ी वह चीज़ अचानक गायब हो गई।
बस फिर चल पड़ी।
आरव कांप रहा था।
उसने बूढ़ी औरत की तरफ देखा।
“आप कौन हैं?”
औरत ने कुछ देर तक उसे देखा।
“मेरा नाम सावित्री है।”
“आप इस बस में कब से हैं?”
सावित्री ने खिड़की के बाहर देखा।
“मुझे नहीं पता।”
“क्या मतलब?”
“शायद बीस साल।”
आरव चौंक गया।
“बीस साल?”
“हां।”
“आपकी उम्र कितनी है?”
सावित्री हल्का-सा मुस्कुराई।
“जब मैं इस बस में चढ़ी थी, तब मेरी उम्र पैंतीस साल थी।”
आरव ने गौर से उसका चेहरा देखा।
वह लगभग सत्तर साल की लग रही थी।
“तो आप बूढ़ी कैसे हुईं?”
सावित्री ने जवाब नहीं दिया।
बस एक अंधेरी सड़क से गुजर रही थी।
कुछ देर बाद बस के अंदर की घड़ी फिर दिखाई दी।
11:47 PM
आरव ने अपनी घड़ी देखी।
उसकी घड़ी में 12:32 AM था।
वह परेशान हो गया।
“ये घड़ी हमेशा 11:47 क्यों दिखा रही है?”
सावित्री बोली—
“क्योंकि इस बस में समय आगे नहीं बढ़ता।”
“यहां हर रात वही रात होती है।”
“11:47 से 12:15 तक।”
आरव ने पूछा—
“तो फिर हम कब निकलेंगे?”
सावित्री ने उसकी आंखों में देखा।
“जब तुम्हें अपना सच याद आ जाएगा।”
अचानक बस झटके से रुकी।
सभी यात्री अपनी सीटों पर सीधे बैठ गए।
कंडक्टर धीरे-धीरे गलियारे में चलने लगा।
उसके हाथ में टिकटों का बंडल था।
वह हर यात्री के पास जाकर टिकट काट रहा था।
जब वह आरव के पास पहुंचा तो उसने पूछा—
“टिकट?”
आरव ने कहा,
“मेरे पास पैसे नहीं हैं।”
कंडक्टर मुस्कुराया।
“यहां पैसे नहीं लगते।”
“फिर?”
“एक याद।”
आरव ने पूछा,
“क्या?”
कंडक्टर ने अपनी जेब से छोटा-सा पंचिंग मशीन निकाला।
“हर यात्री एक याद देता है।”
“और बदले में उसे एक टिकट मिलता है।”
“अगर यादें खत्म हो जाएं?”
कंडक्टर उसकी तरफ झुककर बोला—
“तो तुम भी खत्म।”
आरव ने टिकट लेने से मना कर दिया।
कंडक्टर की मुस्कान गायब हो गई।
“फिर तुम यहां से कभी नहीं उतर पाओगे।”
वह आगे बढ़ गया।
आरव ने सावित्री से पूछा,
“आपने कौन-सी याद दी थी?”
सावित्री की आंखों में आंसू आ गए।
“मेरे बेटे की।”
“क्या?”
“मैंने अपने बेटे की पूरी जिंदगी की याद इस बस को दे दी।”
“अब मुझे उसका चेहरा भी याद नहीं।”
आरव ने उसकी तरफ देखा।
“फिर आप यहां क्यों हैं?”
सावित्री बोली—
“क्योंकि मैं अपने बेटे को ढूंढ रही हूं।”
“क्या वह भी इस बस में था?”
“हां।”
“क्या वह मर गया था?”
सावित्री ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
आरव चौंक गया।
“तो फिर?”
सावित्री ने धीरे से कहा—
“उसे इस बस ने मारा था।”
आरव समझ नहीं पाया।
सावित्री ने अपनी कहानी बतानी शुरू की।
बीस साल पहले सावित्री अपने बेटे मोहन के साथ इसी रास्ते से घर जा रही थी।
रात 11:47 पर उनकी बस एक सुनसान जगह पर खराब हो गई।
ड्राइवर ने कहा कि बस ठीक होने में समय लगेगा।
तभी एक दूसरी बस वहां आई।
उस पर लिखा था—
रूट नंबर 13।
ड्राइवर ने सावित्री और मोहन को उसमें बैठने के लिए कहा।
बस में सिर्फ कुछ लोग थे।
कुछ देर बाद मोहन ने खिड़की से बाहर देखा।
उसे सड़क के किनारे एक आदमी दिखाई दिया।
वह आदमी मोहन को बुला रहा था।
मोहन ने कहा—
“मां, मैं अभी आया।”
और बस से उतर गया।
सावित्री भी उसके पीछे जाने लगी।
लेकिन बस का दरवाज़ा बंद हो गया।
मोहन बाहर खड़ा रह गया।
बस चल पड़ी।
सावित्री चीखती रही।
लेकिन ड्राइवर ने बस नहीं रोकी।
कुछ मिनट बाद उसने खिड़की से बाहर देखा।
मोहन गायब था।
उस रात से सावित्री इस बस में फंसी हुई थी।
“मैं हर रात उसे ढूंढती हूं।”
आरव ने पूछा—
“क्या आपको कभी वो मिला?”
सावित्री ने कहा—
“आज तक नहीं।”
तभी बस के पीछे से किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आई।
सावित्री अचानक खड़ी हो गई।
“मोहन!”
वह पीछे भागी।
आरव भी उसके पीछे गया।
बस के आखिरी हिस्से में एक छोटा बच्चा बैठा था।
उसकी पीठ उनकी तरफ थी।
सावित्री उसके पास गई।
“मोहन?”
बच्चा धीरे-धीरे मुड़ा।
सावित्री खुशी से रो पड़ी।
“बेटा!”
लेकिन आरव को कुछ अजीब लगा।
बच्चे की आंखें पूरी तरह सफेद थीं।
वह सावित्री की तरफ देखकर बोला—
“मां… तुमने मुझे इतनी देर क्यों लगाई?”
सावित्री ने उसे गले लगा लिया।
आरव चीखा—
“रुकिए!”
लेकिन देर हो चुकी थी।
बच्चे के हाथ सावित्री की पीठ के आर-पार चले गए।
सावित्री का शरीर हवा में उठ गया।
उसने आरव की तरफ देखा।
“भागो!”
फिर वह धुएं की तरह गायब हो गई।
आरव अकेला खड़ा रह गया।
बस में बैठे सभी यात्री उसे देखने लगे।
तभी ड्राइवर की आवाज़ आई—
“अगला स्टॉप…”
बस की घड़ी पर समय था—
12:15 AM
ड्राइवर ने कहा—
“आरव का घर।”
आरव चौंक गया।
बस उसके घर के सामने आकर रुक गई।
दरवाज़ा खुला।
बाहर उसकी मां खड़ी थी।
वह रो रही थी।
“आरव… बेटा!”
आरव की आंखों में आंसू आ गए।
वह नीचे उतरने ही वाला था कि उसे कुछ याद आया।
उसकी मां अस्पताल में थी।
वह घर पर कैसे हो सकती थी?
आरव ने खिड़की से बाहर देखा।
उसका घर दिखाई दे रहा था।
लेकिन खिड़की में कोई रोशनी नहीं थी।
फिर उसकी नजर सामने सड़क पर गई।
वहां पुलिस की गाड़ी खड़ी थी।
कुछ लोग जमा थे।
और जमीन पर…
एक मोटरसाइकिल पड़ी थी।
आरव समझ गया।
वह अभी भी अपने एक्सीडेंट के बाद की दुनिया में था।
तभी उसके पीछे किसी ने कहा—
“आरव…”
उसने मुड़कर देखा।
सावित्री खड़ी थी।
लेकिन अब वह बूढ़ी नहीं थी।
वह लगभग पैंतीस साल की थी।
उसकी गोद में एक छोटा बच्चा था।
मोहन।
सावित्री ने कहा—
“तुम्हें बस से उतरना है तो पहले इसका राज़ समझना होगा।”
आरव ने पूछा—
“कौन-सा राज़?”
सावित्री ने बच्चे की तरफ देखा।
“यह बस मरने वालों को नहीं ले जाती।”
“तो किसे ले जाती है?”
सावित्री ने कहा—
“यह उन लोगों को ले जाती है जो मरना स्वीकार नहीं करते।”
आरव चुप हो गया।
“और जो लोग अपने मरने को स्वीकार कर लेते हैं…”
“उन्हें बस छोड़ देती है।”
अचानक ड्राइवर की सीट से आवाज़ आई—
“गलत!”
सभी लोग उसकी तरफ देखने लगे।
ड्राइवर धीरे-धीरे अपनी सीट से उठा।
उसका बिना चेहरा वाला सिर आरव की तरफ घूम गया।
“बस किसी को छोड़ती नहीं।”
“बस सिर्फ एक यात्री को छोड़ती है।”
आरव ने पूछा—
“कौन?”
ड्राइवर ने पहली बार अपना हाथ उठाया।
उसकी उंगली आरव की तरफ थी।
“वही… जो अगली बस चलाएगा।”
आरव के चेहरे का रंग उड़ गया।
कंडक्टर ने टिकट मशीन उठाई।
“तुम्हारी बारी आ गई।”
बस की सारी लाइटें बंद हो गईं।
अंधेरे में सिर्फ आरव की आवाज़ गूंजी—
“मैं ड्राइवर नहीं बनूंगा!”
ड्राइवर हंसा।
“तुम्हें बनना नहीं है।”
“तुम पहले से हो।”
अचानक आरव के दिमाग में एक याद चमकी।
एक पुरानी बस।
एक सड़क।
बारिश।
और वह खुद…
ड्राइवर की सीट पर बैठा हुआ।
उसके हाथ स्टीयरिंग पर थे।
और पीछे बैठे यात्रियों में…
सावित्री भी थी।
आरव की सांस रुक गई।
उसे अचानक सब याद आने लगा।
रूट नंबर 13 का पहला ड्राइवर कोई और नहीं… खुद आरव था।
लेकिन फिर सवाल था—
अगर वह पहले से ड्राइवर था…
तो वह यात्री बनकर इस बस में दोबारा क्यों आया?
और उसी क्षण बस के शीशे पर अपने आप एक तारीख लिखी गई—
13 अगस्त 2026।
आज की तारीख।
नीचे एक और लाइन उभरी—
“आज आखिरी यात्रा है।”
और ड्राइवर ने धीरे से कहा—
“क्योंकि आज रात… इस बस को एक नया ड्राइवर नहीं, एक नया शिकार चाहिए।”
आरव ने खिड़की से बाहर देखा।
सड़क के बीचोंबीच एक और बस खड़ी थी।
उसके आगे लिखा था—
रूट नंबर 13
लेकिन वह बस बिल्कुल नई थी।
और उसके अंदर…
आरव के जैसे दिखने वाले दर्जनों लोग बैठे थे।

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।
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