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(भाग 1 ) 😱आधी रात की आखिरी बस😱

पढ़ने का समय : 7 मिनट

रात के करीब 11:45 बज रहे थे।

 

आरव सड़क के किनारे बने छोटे-से बस स्टॉप पर अकेला खड़ा था।

 

आसमान में बादल छाए हुए थे और ठंडी हवा के साथ हल्की बारिश हो रही थी। सड़क लगभग सुनसान थी। कभी-कभी कोई कार तेज़ी से गुजरती और फिर कुछ सेकंड के लिए सड़क दोबारा बिल्कुल शांत हो जाती।

 

आरव ने अपनी घड़ी देखी।

 

11:47 PM.

 

उसे किसी भी हालत में घर पहुंचना था।

 

उसकी मां पिछले दो दिनों से बीमार थी और आज शाम उसका फोन आया था कि तबीयत अचानक ज्यादा खराब हो गई है।

 

आरव ने कई बार कैब बुक करने की कोशिश की थी, लेकिन इस सुनसान इलाके में कोई कैब नहीं मिल रही थी।

 

तभी दूर से बस की पीली रोशनी दिखाई दी।

 

आरव ने राहत की सांस ली।

 

बस धीरे-धीरे उसके सामने आकर रुकी।

 

उसने बस के आगे लगे बोर्ड को देखा।

 

“रूट नंबर 13”

 

आरव को थोड़ा अजीब लगा।

 

इस रूट की बस रात में इतनी देर तक नहीं चलती थी।

 

लेकिन उसके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था।

 

दरवाज़ा खुला।

 

कंडक्टर ने उसकी तरफ देखा।

 

“कहां जाना है?”

 

“शिवनगर।”

 

कंडक्टर ने कुछ नहीं कहा।

 

बस में चढ़ते ही आरव ने महसूस किया कि अंदर बहुत ज्यादा ठंड थी।

 

इतनी ठंड कि उसकी सांस से धुंध निकल रही थी।

 

बस लगभग खाली थी।

 

सिर्फ पीछे की सीट पर एक बूढ़ी औरत बैठी थी।

 

उसने सिर पर सफेद कपड़ा डाल रखा था और खिड़की से बाहर देख रही थी।

 

आरव आगे की सीट पर जाकर बैठ गया।

 

बस चल पड़ी।

 

कुछ मिनट तक सब सामान्य रहा।

 

फिर आरव ने देखा कि बस के अंदर लगी डिजिटल घड़ी में समय था—

 

11:47 PM

 

उसने अपनी घड़ी देखी।

 

11:53 PM.

 

फिर बस की घड़ी देखी।

 

11:47 PM.

 

उसे लगा घड़ी खराब होगी।

 

उसने मोबाइल निकाला।

 

नेटवर्क गायब था।

 

“अजीब है।”

 

तभी पीछे बैठी बूढ़ी औरत ने धीमी आवाज़ में कहा—

 

“बेटा… पहली बार इस बस में बैठे हो?”

 

आरव ने पीछे मुड़कर देखा।

 

“जी।”

 

बूढ़ी औरत ने खिड़की से नजर हटाए बिना कहा—

 

“तो एक बात याद रखना।”

 

“जी?”

 

“अगर ड्राइवर तीसरे पुल के बाद बस रोक दे… तो नीचे मत उतरना।”

 

आरव हंस पड़ा।

 

“क्यों?”

 

बूढ़ी औरत ने अब उसकी तरफ देखा।

 

उसकी आंखें बहुत डरावनी थीं।

 

“क्योंकि वहां कोई बस स्टॉप नहीं है।”

 

आरव कुछ बोलता, उससे पहले बस की लाइट दो बार झपकी।

 

फिर सामान्य हो गई।

 

बस शहर की मुख्य सड़क छोड़कर एक सुनसान रास्ते पर चली गई।

 

आरव खिड़की से बाहर देखने लगा।

 

उसे रास्ता बिल्कुल अनजान लग रहा था।

 

उसने कंडक्टर से पूछा,

 

“भाई साहब, ये बस शिवनगर जाएगी ना?”

 

कंडक्टर ने उसकी तरफ देखा।

 

उसका चेहरा बिल्कुल भावहीन था।

 

“हां।”

 

“लेकिन ये रास्ता तो शिवनगर का नहीं है।”

 

कंडक्टर चुप रहा।

 

आरव को अब बेचैनी होने लगी।

 

उसने ड्राइवर की तरफ देखा।

 

ड्राइवर का चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था क्योंकि उसके सामने अंधेरा था।

 

बस आगे बढ़ती रही।

 

करीब दस मिनट बाद सामने एक पुराना पुल दिखाई दिया।

 

बस पुल पर चढ़ी।

 

बूढ़ी औरत ने तुरंत अपनी आंखें बंद कर लीं।

 

आरव को उसकी बात याद आई।

 

“तीसरे पुल के बाद बस रोक दे… तो नीचे मत उतरना।”

 

उसने खिड़की से बाहर देखा।

 

पुल के नीचे गहरी नदी बह रही थी।

 

तभी बस अचानक रुक गई।

 

चीईईं…

 

आरव का दिल जोर से धड़कने लगा।

 

कंडक्टर अपनी सीट से उठा।

 

उसने दरवाज़ा खोल दिया।

 

बाहर घना अंधेरा था।

 

कंडक्टर ने कहा—

 

“जो उतरना चाहते हैं, उतर जाएं।”

 

आरव ने देखा।

 

बस के अंदर बैठे बाकी सभी यात्री एक साथ खड़े हो गए।

 

उसे यह देखकर झटका लगा।

 

अभी कुछ मिनट पहले बस लगभग खाली थी।

 

अब उसमें कम से कम बीस लोग बैठे थे।

 

और सबसे डरावनी बात…

 

सभी यात्री एक ही दिशा में देख रहे थे।

 

बस के खुले दरवाज़े की तरफ।

 

आरव ने बूढ़ी औरत की तरफ देखा।

 

वह अभी भी अपनी आंखें बंद किए बैठी थी।

 

उसने धीरे से कहा—

 

“मत उतरना।”

 

लेकिन तभी किसी ने आरव के कंधे पर हाथ रखा।

 

उसने पीछे मुड़कर देखा।

 

एक छोटा बच्चा खड़ा था।

 

उसकी आंखें पूरी तरह काली थीं।

 

बच्चे ने मुस्कुराकर पूछा—

 

“अंकल… आप भी हमारे साथ चलेंगे?”

 

आरव ने उसका हाथ झटक दिया।

 

“मुझे घर जाना है।”

 

बच्चा धीरे से बोला—

 

“घर?”

 

फिर वह हंसने लगा।

 

उसकी हंसी धीरे-धीरे पूरे बस में गूंजने लगी।

 

आरव डर गया।

 

वह आगे ड्राइवर के पास गया।

 

“बस चलाइए!”

 

ड्राइवर ने कोई जवाब नहीं दिया।

 

आरव ने उसका कंधा पकड़कर घुमाया।

 

और उसी क्षण उसकी चीख निकल गई।

 

ड्राइवर का चेहरा नहीं था।

 

जहां चेहरा होना चाहिए था, वहां सिर्फ काली, खाली त्वचा थी।

 

आरव पीछे गिर गया।

 

बस की सारी लाइटें बंद हो गईं।

 

अंधेरे में किसी ने फुसफुसाकर कहा—

 

“अगला स्टॉप… मौत है।”

 

फिर बस के अंदर सभी यात्रियों ने एक साथ सिर घुमाया।

 

सभी की आंखें आरव पर थीं।

 

और बूढ़ी औरत रोते हुए बोल रही थी—

 

“बेटा… तुम इस बस में चढ़े ही क्यों?”

 

आरव ने कांपते हुए पूछा—

 

“ये बस है क्या?”

 

बूढ़ी औरत ने उसकी तरफ देखा।

 

उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे।

 

“ये बस… उन लोगों को लेकर जाती है जो घर पहुंचने से पहले मर चुके होते हैं।”

 

आरव का दिल रुकने जैसा हो गया।

 

“लेकिन मैं तो जिंदा हूं!”

 

बूढ़ी औरत ने धीरे से अपना हाथ उठाया।

 

उसने आरव की तरफ इशारा किया।

 

“तुम्हें ऐसा लगता है।”

 

आरव ने तुरंत अपना मोबाइल निकाला।

 

स्क्रीन पर कोई नेटवर्क नहीं था।

 

लेकिन स्क्रीन के ऊपर एक नोटिफिकेशन चमक रहा था।

 

“मां: बेटा, जल्दी घर आना…”

 

उसके नीचे एक और मैसेज था।

 

“तुम्हारे एक्सीडेंट की खबर मिल गई है।”

 

आरव के हाथ से मोबाइल गिर गया।

 

उसने कांपते हुए बूढ़ी औरत की तरफ देखा।

 

“एक्सीडेंट…?”

 

बूढ़ी औरत ने सिर झुका लिया।

 

“तुम्हारी बाइक पुल के नीचे गिर गई थी।”

 

आरव पीछे हट गया।

 

“नहीं… ये झूठ है।”

 

तभी बस की खिड़की के बाहर उसे अपनी बाइक दिखाई दी।

 

वह पुल के नीचे पड़ी थी।

 

और उसके पास…

 

लोगों की भीड़ खड़ी थी।

 

एक एंबुलेंस थी।

 

और जमीन पर एक शरीर पड़ा था।

 

आरव ने गौर से देखा।

 

उस शरीर के कपड़े वही थे जो उसने पहने हुए थे।

 

उसका चेहरा भी…

 

उसी का था।

 

बस के अंदर बैठे सभी यात्रियों ने धीरे-धीरे कहना शुरू किया—

 

“चलो…”

 

“चलो…”

 

“चलो…”

 

आरव पीछे हटता गया।

 

तभी ड्राइवर की बिना चेहरे वाली गर्दन उसकी तरफ घूमी।

 

एक भारी आवाज़ आई—

 

“अब तुम्हारा स्टॉप आ गया है।”

 

बस का दरवाज़ा खुला।

 

बाहर घना अंधेरा था।

 

और उस अंधेरे में…

 

एक लड़की खड़ी थी।

 

वह आरव की तरफ देखकर मुस्कुरा रही थी।

 

आरव उसे पहचानता था।

 

वह उसकी छोटी बहन थी…

 

जिसकी मौत पांच साल पहले हो चुकी थी।

 

लड़की ने हाथ बढ़ाया।

 

“भैया… घर चलो।”

 

आरव की आंखों से आंसू निकल आए।

 

लेकिन तभी बूढ़ी औरत ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।

 

“उसका हाथ मत पकड़ना!”

 

आरव ने डरते हुए पूछा—

 

“क्यों?”

 

बूढ़ी औरत ने कांपती आवाज़ में कहा—

 

“क्योंकि अगर तुमने उसका हाथ पकड़ लिया… तो तुम्हारी कहानी यहीं खत्म हो जाएगी।”

 

और उसी पल…

 

बस के बाहर खड़ी लड़की ने अपना चेहरा उठाया।

 

उसका चेहरा इंसान का नहीं था।

 

उसके मुंह की जगह एक गहरा काला गड्ढा था।

 

और उस गड्ढे से एक ही आवाज़ निकल रही थी—

 

“भैया… मुझे अपने साथ ले चलो।”

 

बस का दरवाज़ा धीरे-धीरे बंद होने लगा।

 

आरव के सामने सिर्फ दो रास्ते थे—

 

बस में रहना…

 

या उस डरावनी चीज़ के साथ बाहर उतरना।

 

लेकिन उसे अभी नहीं पता था कि असली खतरा बस के बाहर नहीं…

 

बस के अंदर था।

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