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कमरा नंबर 101 (Last part-3)

पढ़ने का समय : 10 मिनट

इंदरजीत की चीख पूरे होटल में गूंज उठी।

 

उसके सामने खड़ी निशा मुस्कुरा रही थी।

 

लेकिन वह चेहरा…

 

वह निशा का नहीं था।

 

वह उसकी मां का चेहरा था।

 

“बेटा…”

 

वह आवाज़ सुनकर इंदरजीत के शरीर में जैसे खून जम गया।

 

उसकी मां की मौत तब हो गई थी जब वह सिर्फ दस साल का था।

 

वह उसे आखिरी बार अस्पताल में देख पाया था।

 

फिर भी…

 

उसके सामने वही चेहरा खड़ा था।

 

इंदरजीत पीछे हटते हुए बोला,

 

“तुम मेरी मां नहीं हो।”

 

सामने खड़ी औरत की मुस्कान और चौड़ी हो गई।

 

“तुम्हें सच में कुछ याद नहीं?”

 

अचानक होटल की दीवारें कांपने लगीं।

 

लाइटें एक-एक करके जलने लगीं।

 

और जब रोशनी वापस आई…

 

वह औरत गायब थी।

 

उसकी जगह बूढ़ा रिसेप्शनिस्ट खड़ा था।

 

उसके चेहरे पर डर था।

 

“तुम्हें यहां नहीं आना चाहिए था।”

 

इंदरजीत ने उसका कॉलर पकड़ लिया।

 

“मुझे सब सच बताओ!”

 

बूढ़ा कुछ देर चुप रहा।

 

फिर उसने धीरे से कहा,

 

“ठीक है।”

 

दोनों वापस कमरा नंबर 101 में पहुंचे।

 

बूढ़े ने दरवाज़ा बंद किया और कुंडी लगा दी।

 

फिर वह आईने के सामने जाकर खड़ा हो गया।

 

“यह होटल पहले होटल नहीं था।”

 

इंदरजीत चुपचाप सुनता रहा।

 

“करीब बीस साल पहले यहां एक मानसिक अस्पताल हुआ करता था। उस अस्पताल में एक डॉक्टर था—डॉक्टर देव।”

 

“वह लोगों के दिमाग और यादों पर अजीब प्रयोग करता था।”

 

“एक दिन उसे लगा कि इंसान की यादों को आईने में कैद किया जा सकता है।”

 

इंदरजीत ने आईने की तरफ देखा।

 

बूढ़ा आगे बोला,

 

“उसने इस कमरे में एक खास आईना लगवाया। जो व्यक्ति उसके सामने ज्यादा देर तक बैठता… उसकी यादें धीरे-धीरे आईने में दिखाई देने लगती थीं।”

 

“लेकिन एक दिन प्रयोग गलत हो गया।”

 

“डॉक्टर देव की बेटी निशा उस कमरे में चली गई।”

 

इंदरजीत ने पूछा,

 

“निशा… वही लड़की?”

 

बूढ़े ने सिर हिलाया।

 

“हां।”

 

“वह आईने के सामने बैठी थी। तभी बिजली चली गई। जब बिजली वापस आई… निशा गायब थी।”

 

“लेकिन उसका शरीर कहीं नहीं मिला।”

 

इंदरजीत ने आईने को देखा।

 

“तो वह आईने में फंस गई?”

 

बूढ़े ने कहा,

 

“सिर्फ निशा नहीं।”

 

इंदरजीत की सांस रुक गई।

 

“और कौन?”

 

बूढ़े ने उसकी तरफ देखा।

 

“तुम।”

 

कमरे में सन्नाटा छा गया।

 

“2006 में पांच दोस्त यहां आए थे। वे उस समय इस होटल को एक सस्ते गेस्टहाउस के रूप में इस्तेमाल करते थे।”

 

“उनमें एक लड़का था—इंदरजीत।”

 

“उस रात उन्हें पुराने कमरे में वह आईना मिला।”

 

“मजाक-मजाक में उन्होंने आईने के सामने बैठकर एक खेल शुरू किया।”

 

“उन्होंने मोमबत्तियां जलाईं और एक-दूसरे से कहा कि जो भी आईने में अपना दूसरा चेहरा देखेगा, उसे कमरे से बाहर नहीं जाना है।”

 

इंदरजीत के दिमाग में अचानक पुरानी यादें चमकने लगीं।

 

अंधेरा।

 

मोमबत्तियां।

 

चार दोस्त।

 

और वह खुद।

 

फिर निशा की चीख।

 

“इंदरजीत! आईने की तरफ मत देखना!”

 

लेकिन देर हो चुकी थी।

 

इंदरजीत ने आईने में देखा था।

 

आईने में उसका प्रतिबिंब नहीं था।

 

उसकी जगह एक बूढ़ा आदमी खड़ा था।

 

वह मुस्कुरा रहा था।

 

फिर उसने आईने के अंदर से हाथ बढ़ाया।

 

इंदरजीत की याद अचानक टूट गई।

 

वह जमीन पर गिर पड़ा।

 

बूढ़ा उसके पास बैठ गया।

 

“तुम्हें अब सब याद आ रहा है।”

 

इंदरजीत कांपते हुए बोला,

 

“उस रात क्या हुआ था?”

 

बूढ़े ने कहा,

 

“तुमने निशा को बचाने की कोशिश की।”

 

“लेकिन आईने ने तुम दोनों को खींच लिया।”

 

“अमित, राकेश और सुरेश भाग गए।”

 

“लेकिन बाहर जाते समय उन्होंने दरवाज़ा बंद कर दिया।”

 

इंदरजीत ने हैरानी से पूछा,

 

“उन्होंने हमें बचाया क्यों नहीं?”

 

बूढ़े की आंखों में गुस्सा था।

 

“क्योंकि वे डर गए थे।”

 

“उन्होंने पुलिस को बताया कि तुम और निशा वहां थे ही नहीं।”

 

“कुछ दिनों बाद उन्होंने शहर छोड़ दिया।”

 

“लेकिन निशा और तुम…”

 

बूढ़ा आईने की तरफ देखने लगा।

 

“तुम दोनों आईने के अंदर फंस गए।”

 

इंदरजीत की आंखों में आंसू आ गए।

 

“फिर मैं यहां से बाहर कैसे आया?”

 

बूढ़ा बोला,

 

“तुम बाहर नहीं आए।”

 

“क्या?”

 

“तुम्हारा शरीर वहीं मर गया था।”

 

“लेकिन तुम्हारी यादें… तुम्हारी आत्मा… इस आईने में रह गई।”

 

इंदरजीत पीछे हट गया।

 

“तो मैं…”

 

“तुम इंसान नहीं हो।”

 

कमरे की हवा अचानक ठंडी हो गई।

 

आईने में एक चेहरा दिखाई दिया।

 

इंदरजीत का चेहरा।

 

लेकिन वह मुस्कुरा रहा था।

 

वह आईने के अंदर से बोल रहा था—

 

“अब तुम्हें सब याद आ गया।”

 

इंदरजीत ने आईने को छूने की कोशिश की।

 

उसी समय आईने की सतह पानी की तरह हिलने लगी।

 

अंदर से निशा दिखाई दी।

 

उसका चेहरा अब पहले जैसा डरावना नहीं था।

 

वह रो रही थी।

 

“इंदरजीत… मुझे यहां से निकालो।”

 

इंदरजीत ने अपना हाथ आईने के अंदर डाल दिया।

 

उसका हाथ दूसरी तरफ चला गया।

 

निशा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

अचानक कमरे में जोरदार हवा चलने लगी।

 

खिड़कियां खुल गईं।

 

दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

 

दीवारों से चीखने की आवाज़ें आने लगीं।

 

“हमें भी बाहर निकालो…”

 

इंदरजीत ने आईने के अंदर देखा।

 

वहां सिर्फ निशा नहीं थी।

 

सैकड़ों चेहरे थे।

 

बूढ़े।

 

बच्चे।

 

औरतें।

 

मर्द।

 

सब आईने के अंदर कैद थे।

 

उन सभी की आंखें इंदरजीत पर थीं।

 

निशा ने कहा,

 

“यह आईना सिर्फ यादें नहीं रखता।”

 

“यह आत्माएं रखता है।”

 

इंदरजीत ने पूछा,

 

“इसे खत्म कैसे करें?”

 

निशा ने कमरे के कोने की तरफ देखा।

 

“जिसने इसे बनाया था… उसी की मौत के साथ इसका राज़ खत्म होगा।”

 

“डॉक्टर देव?”

 

निशा ने सिर हिलाया।

 

“वह मरा नहीं था।”

 

इंदरजीत की आंखें फैल गईं।

 

“क्या?”

 

निशा ने आईने की तरफ इशारा किया।

 

आईने में एक बूढ़ा डॉक्टर दिखाई दिया।

 

सफेद कोट।

 

हाथ में पुरानी डायरी।

 

और आंखों में अजीब चमक।

 

वह डॉक्टर देव था।

 

उसने मुस्कुराकर कहा,

 

“तुम लोग सोचते रहे कि मैं मर गया।”

 

बूढ़ा रिसेप्शनिस्ट डरकर पीछे हट गया।

 

डॉक्टर देव की आवाज़ पूरे कमरे में गूंजने लगी।

 

“मैंने इंसानी यादों को अमर कर दिया है।”

 

इंदरजीत चिल्लाया,

 

“तुमने लोगों को कैद किया!”

 

डॉक्टर हंसा।

 

“कैद?”

 

“नहीं।”

 

“मैंने उन्हें मौत से बचाया।”

 

इंदरजीत ने कहा,

 

“तुम पागल हो!”

 

डॉक्टर की मुस्कान गायब हो गई।

 

“अगर तुम्हें अपनी मां से मिलना है… तो आईने में आ जाओ।”

 

इंदरजीत जम गया।

 

आईने में अचानक उसकी मां दिखाई दी।

 

वह मुस्कुरा रही थी।

 

“इंदरजीत… बेटा।”

 

उसकी आंखों में आंसू आ गए।

 

वह एक कदम आगे बढ़ा।

 

फिर दूसरा।

 

निशा चीखी—

 

“नहीं!”

 

इंदरजीत रुक गया।

 

उसे अपनी मां की एक बात याद आई।

 

जब वह बच्चा था, उसकी मां हमेशा कहती थी—

 

“सच्चा प्यार कभी तुम्हें अंधेरे में बुलाकर अकेला नहीं करता।”

 

इंदरजीत ने आईने में अपनी मां को देखा।

 

उसकी मां मुस्कुरा रही थी।

 

लेकिन उसकी आंखों में कोई भावना नहीं थी।

 

वह नकली थी।

 

इंदरजीत समझ गया।

 

“तुम मेरी मां नहीं हो।”

 

डॉक्टर देव की आंखें लाल हो गईं।

 

“तो फिर मरने के लिए तैयार हो जाओ।”

 

आईना टूटने लगा।

 

कड़ाक!

 

एक बड़ी दरार बीच से नीचे तक चली गई।

 

इंदरजीत ने जमीन पर पड़ी जंग लगी चाबी उठाई।

 

उसे याद आया कि चाबी उसी बॉक्स में थी।

 

बूढ़े ने कहा,

 

“वह चाबी कमरे के नीचे बने पुराने तहखाने की है।”

 

इंदरजीत तुरंत फर्श की तरफ गया।

 

उसने लकड़ी के एक पुराने हिस्से को हटाया।

 

नीचे सीढ़ियां थीं।

 

वह नीचे उतर गया।

 

तहखाने में अंधेरा था।

 

बीच में एक पुरानी मशीन लगी थी।

 

मशीन से कई तार निकलकर दीवार के पीछे जा रहे थे।

 

एक लोहे की प्लेट पर लिखा था—

 

PROJECT 101

 

इंदरजीत ने मशीन बंद करने की कोशिश की।

 

लेकिन डॉक्टर देव की आवाज़ आई—

 

“अगर मशीन बंद की… तो आईने में मौजूद सभी आत्माएं हमेशा के लिए खत्म हो जाएंगी।”

 

इंदरजीत रुक गया।

 

निशा की आवाज़ आई—

 

“मत रुको।”

 

“हमें आज़ाद करो।”

 

इंदरजीत ने मशीन की तरफ देखा।

 

उसने पूरी ताकत से मुख्य स्विच खींच दिया।

 

धड़ाम!

 

मशीन बंद हो गई।

 

ऊपर से आईना टूटने की आवाज़ आई।

 

सैकड़ों चीखें एक साथ सुनाई दीं।

 

फिर…

 

अचानक सब शांत हो गया।

 

इंदरजीत ऊपर भागा।

 

कमरा नंबर 101 में आईना पूरी तरह टूट चुका था।

 

कांच के हजारों टुकड़े फर्श पर पड़े थे।

 

निशा वहां खड़ी थी।

 

लेकिन अब वह डरावनी नहीं लग रही थी।

 

उसने इंदरजीत को देखा और मुस्कुराई।

 

“धन्यवाद।”

 

“अब हम जा सकते हैं।”

 

एक तेज़ सफेद रोशनी कमरे में फैल गई।

 

निशा धीरे-धीरे उस रोशनी में गायब हो गई।

 

फिर बाकी सभी आत्माएं भी।

 

इंदरजीत अकेला खड़ा रह गया।

 

बूढ़ा रिसेप्शनिस्ट दरवाज़े पर खड़ा था।

 

उसकी आंखों में आंसू थे।

 

“अब सब खत्म हो गया।”

 

इंदरजीत ने पूछा,

 

“क्या मैं भी…”

 

बूढ़े ने सिर झुका लिया।

 

“हां।”

 

इंदरजीत समझ गया।

 

उसका समय भी खत्म हो चुका था।

 

सुबह होने तक कमरा नंबर 101 खाली था।

 

पुलिस जब होटल पहुंची तो उन्हें वहां सिर्फ टूटा हुआ आईना मिला।

 

और एक पुरानी फोटो।

 

फोटो में पांच लोग खड़े थे।

 

अमित।

 

राकेश।

 

सुरेश।

 

निशा।

 

और इंदरजीत।

 

लेकिन इस बार फोटो में एक बदलाव था।

 

इंदरजीत मुस्कुरा रहा था।

 

उसके चेहरे पर डर नहीं था।

 

उसके पास निशा खड़ी थी।

 

दोनों के पीछे एक खुला हुआ दरवाज़ा था।

 

दरवाज़े के ऊपर लिखा था—

 

101

 

होटल कुछ महीनों बाद हमेशा के लिए बंद कर दिया गया।

 

लोगों ने कहा कि वहां अब कुछ नहीं होता।

 

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

 

करीब एक साल बाद एक नया होटल उसी जगह बनाया गया।

 

नई इमारत।

 

नई दीवारें।

 

नए कमरे।

 

पुरानी इमारत का कोई निशान नहीं था।

 

एक रात होटल का नया कर्मचारी कमरों की चाबियां व्यवस्थित कर रहा था।

 

उसे एक पुरानी जंग लगी चाबी मिली।

 

उस पर नंबर लिखा था—

 

101

 

उसने मैनेजर से पूछा,

 

“सर, हमारे होटल में कमरा नंबर 101 तो है ही नहीं।”

 

मैनेजर ने कहा,

 

“तो इसे फेंक दो।”

 

कर्मचारी ने चाबी कूड़ेदान में डाल दी।

 

उसी रात…

 

करीब 12:15 बजे…

 

रिसेप्शन की घंटी बजी।

 

ट्रिन… ट्रिन…

 

कर्मचारी ने फोन उठाया।

 

दूसरी तरफ से एक लड़के की आवाज़ आई।

 

बहुत धीमी आवाज़।

 

“मुझे कमरा नंबर 101 चाहिए।”

 

कर्मचारी ने कहा,

 

“सर, हमारे होटल में 101 नाम का कोई कमरा नहीं है।”

 

कुछ सेकंड तक खामोशी रही।

 

फिर दूसरी तरफ से जवाब आया—

 

“कमरा तो है।”

 

“बस… तुम्हें दिखाई नहीं देता।”

 

फोन कट गया।

 

कर्मचारी ने डरते हुए सामने लगे सीसीटीवी मॉनिटर की तरफ देखा।

 

पहली मंज़िल के गलियारे में एक दरवाज़ा दिखाई दे रहा था।

 

उस दरवाज़े पर लिखा था—

 

101

 

और दरवाज़े के सामने…

 

एक लड़का खड़ा था।

 

उसने कैमरे की तरफ देखा।

 

फिर मुस्कुराया।

 

वह इंदरजीत था।

 

उसके पीछे निशा खड़ी थी।

 

दोनों ने एक साथ कैमरे की तरफ देखा।

 

और फिर स्क्रीन काली हो गई।

 

उस रात के बाद होटल के उस गलियारे में कभी कोई कैमरा काम नहीं कर पाया।

 

लोग कहते हैं…

 

अगर किसी सुनसान होटल में रात के 12:15 बजे आपको कोई अपने नाम से पुकारे…

 

तो पीछे मुड़कर मत देखना।

 

और अगर कोई आपसे कहे—

 

“कमरा नंबर 101 खुला है…”

 

तो वहां से तुरंत चले जाना।

 

क्योंकि हो सकता है…

 

दरवाज़े के उस पार कोई कमरा न हो।

 

सिर्फ एक आईना हो।

 

और उस आईने में…

 

इंदरजीत अब भी आपका इंतज़ार कर रहा हो।

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