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कमरा नंबर 101😱 (Part-2)

पढ़ने का समय : 8 मिनट

इंदरजीत की आंखें उस लड़की पर जमी हुई थीं।

 

गलियारे में अंधेरा था। सिर्फ कमरे की हल्की-सी रोशनी दरवाज़े तक पहुंच रही थी। लड़की बिल्कुल स्थिर खड़ी थी। उसके लंबे काले बाल चेहरे को पूरी तरह ढके हुए थे।

 

लेकिन सबसे डरावनी बात उसके हाथ में मौजूद डायरी थी।

 

वही डायरी…

 

जो कुछ सेकंड पहले इंदरजीत के हाथ में थी।

 

इंदरजीत का गला सूख गया।

 

उसने धीरे से पूछा, “तुम… कौन हो?”

 

लड़की ने कोई जवाब नहीं दिया।

 

उसने बस डायरी का आखिरी पन्ना खोला।

 

फिर धीरे-धीरे अपना हाथ उठाकर पन्ने पर कुछ लिखा।

 

इंदरजीत को दूर से सिर्फ इतना दिखाई दिया—

 

“मुझे याद करो।”

 

अचानक गलियारे की सारी लाइटें एक साथ जल उठीं।

 

इंदरजीत ने डर के मारे अपनी आंखें बंद कर लीं।

 

कुछ सेकंड बाद जब उसने आंखें खोलीं…

 

गलियारा खाली था।

 

लड़की गायब थी।

 

डायरी भी गायब थी।

 

दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

 

धड़ाम!

 

इंदरजीत पीछे हट गया।

 

उसने तुरंत दरवाज़ा खोलने की कोशिश की।

 

लेकिन हैंडल नहीं घूम रहा था।

 

“खुल… जा!”

 

उसने पूरी ताकत लगाई।

 

दरवाज़ा नहीं खुला।

 

तभी कमरे की दीवार पर लगी घड़ी चलने लगी।

 

टिक… टिक… टिक…

 

उसने घड़ी की तरफ देखा।

 

समय था—

 

12:15 AM

 

लेकिन कुछ अजीब था।

 

घड़ी की सुइयां उल्टी दिशा में घूम रही थीं।

 

12:14…

 

12:13…

 

12:12…

 

और फिर अचानक घड़ी रुक गई।

 

कमरे में तेज़ ठंड फैलने लगी।

 

इंदरजीत के सामने दीवार पर लगी तस्वीर अपने आप नीचे गिर गई।

 

कांच टूट गया।

 

तस्वीर के पीछे दीवार में एक छोटा-सा काला निशान था।

 

इंदरजीत ने पास जाकर देखा।

 

वह निशान किसी दरवाज़े की तरह लग रहा था।

 

उसने दीवार पर हाथ फेरा।

 

अचानक…

 

ठक!

 

अंदर से आवाज़ आई।

 

इंदरजीत पीछे हट गया।

 

फिर वही आवाज़ दोबारा आई।

 

ठक… ठक…

 

दीवार के अंदर कुछ था।

 

उसने कमरे की कुर्सी उठाई और दीवार पर मार दी।

 

धड़ाम!

 

प्लास्टर का एक हिस्सा टूटकर नीचे गिरा।

 

अंदर एक छोटा लकड़ी का बॉक्स दिखाई दिया।

 

बॉक्स पुराना था और उस पर धूल जमी हुई थी।

 

इंदरजीत ने उसे बाहर निकाला।

 

उस पर सिर्फ एक नंबर लिखा था—

 

101

 

उसने बॉक्स खोला।

 

अंदर कुछ पुराने कागज, एक जंग लगी चाबी और एक फोटो थी।

 

फोटो देखकर इंदरजीत की सांस रुक गई।

 

फोटो में होटल के सामने पांच लोग खड़े थे।

 

उनमें एक लड़की भी थी।

 

वही सफेद कपड़े।

 

वही लंबे बाल।

 

वही चेहरा।

 

इंदरजीत ने फोटो को गौर से देखा।

 

फिर नीचे लिखी तारीख पढ़ी।

 

17 अगस्त 2006

 

फोटो के पीछे किसी ने नाम लिखे थे।

 

अमित।

 

राकेश।

 

सुरेश।

 

निशा।

 

और…

 

इंदरजीत।

 

उसका शरीर सुन्न पड़ गया।

 

“ये… मेरा नाम यहां कैसे?”

 

उसने फोटो दोबारा देखी।

 

वह पांचवां लड़का बिल्कुल उसी जैसा दिख रहा था।

 

चेहरा।

 

आंखें।

 

बाल।

 

सब कुछ।

 

लेकिन वह तस्वीर चौदह साल पुरानी थी।

 

इंदरजीत ने अपना मोबाइल निकाला और फोटो की तस्वीर लेने की कोशिश की।

 

मोबाइल की स्क्रीन काली हो गई।

 

फिर अपने आप एक वीडियो चलने लगा।

 

वीडियो में वही होटल दिखाई दे रहा था।

 

कैमरा किसी कमरे के अंदर था।

 

आवाज़ें आ रही थीं।

 

“निशा, दरवाज़ा बंद कर!”

 

“जल्दी कर!”

 

“वो आ रही है!”

 

फिर किसी लड़के की आवाज़ आई—

 

“इंदरजीत कहां है?”

 

वीडियो में अचानक कैमरा घूम गया।

 

एक लड़का दिखाई दिया।

 

वह बिल्कुल इंदरजीत जैसा था।

 

वह घबराया हुआ था।

 

उसने कैमरे की तरफ देखा और कहा—

 

“अगर कोई ये वीडियो देख रहा है, तो कमरे नंबर 101 में मत रुकना।”

 

फिर पीछे से एक लड़की की आवाज़ आई।

 

“इंदरजीत…”

 

लड़का धीरे-धीरे पीछे मुड़ा।

 

कैमरा जमीन पर गिर गया।

 

वीडियो बंद हो गया।

 

इंदरजीत का मोबाइल वापस सामान्य हो गया।

 

वह कुछ समझ नहीं पा रहा था।

 

तभी बॉक्स के अंदर रखे कागजों में से एक कागज नीचे गिरा।

 

उस पर होटल के पुराने कर्मचारियों की रिपोर्ट थी।

 

उसने पढ़ना शुरू किया।

 

“17 अगस्त 2006 की रात होटल के कमरे नंबर 101 में पांच युवक-युवती रुके थे। सुबह कमरे में चार लोग मिले। पांचवां व्यक्ति, इंदरजीत, लापता था।”

 

इंदरजीत की आंखें फैल गईं।

 

“लेकिन मैं तो…”

 

उसने कागज पलटा।

 

अगली लाइन थी—

 

“कमरे में मौजूद निशा ने दावा किया कि इंदरजीत गायब नहीं हुआ था। उसने कहा कि वह कमरे के आईने के अंदर चला गया।”

 

इंदरजीत ने तुरंत आईने की तरफ देखा।

 

आईना बिल्कुल शांत था।

 

लेकिन उसमें…

 

वह अकेला नहीं था।

 

उसके पीछे चार लोग खड़े थे।

 

अमित।

 

राकेश।

 

सुरेश।

 

और निशा।

 

चारों के चेहरे सफेद थे।

 

इंदरजीत धीरे-धीरे पीछे मुड़ा।

 

कमरा खाली था।

 

उसने फिर आईने में देखा।

 

चारों लोग अभी भी वहीं खड़े थे।

 

निशा ने अपना हाथ उठाया।

 

उसकी उंगली आईने के अंदर एक जगह की तरफ इशारा कर रही थी।

 

इंदरजीत ने देखा।

 

आईने के बीच में एक दरार दिखाई दे रही थी।

 

वह दरार धीरे-धीरे बड़ी होने लगी।

 

कर्क… कर्क…

 

और फिर आईने के अंदर से एक आवाज़ आई।

 

“इंदरजीत…”

 

इस बार आवाज़ किसी लड़की की नहीं थी।

 

यह उसकी अपनी आवाज़ थी।

 

“मुझे बाहर निकालो…”

 

इंदरजीत पीछे हट गया।

 

“कौन हो तुम?”

 

आईने के अंदर खड़ा इंदरजीत मुस्कुराया।

 

“मैं वही हूं… जिसे तुम भूल चुके हो।”

 

आईने में मौजूद चारों लोगों ने एक साथ अपना सिर नीचे कर लिया।

 

फिर निशा ने कहा—

 

“तुमने हमें मरने के लिए छोड़ दिया था।”

 

इंदरजीत के दिमाग में अचानक तेज़ दर्द हुआ।

 

उसकी आंखों के सामने कुछ तस्वीरें घूमने लगीं।

 

एक पुराना कमरा।

 

पांच दोस्त।

 

शराब की बोतलें।

 

हंसी।

 

फिर निशा रो रही थी।

 

किसी बात पर झगड़ा हो रहा था।

 

और फिर…

 

कमरे की लाइट बंद हो गई थी।

 

अंधेरे में किसी ने चीखकर कहा था—

 

“आईने को मत देखना!”

 

लेकिन किसी ने आईने की तरफ देख लिया था।

 

इंदरजीत ने अपना सिर पकड़ लिया।

 

“ये सब… मेरे साथ क्यों हो रहा है?”

 

निशा की आवाज़ आई—

 

“क्योंकि तुम वापस आ गए हो।”

 

“कहां से?”

 

“उसी जगह से जहां तुम चौदह साल से फंसे हुए थे।”

 

इंदरजीत ने आईने की तरफ देखा।

 

आईने में अब वह कमरा दिखाई नहीं दे रहा था।

 

उसकी जगह एक लंबा अंधेरा गलियारा था।

 

गलियारे के आखिर में एक दरवाज़ा था।

 

उस पर लिखा था—

 

101

 

इंदरजीत को अचानक याद आया।

 

उसने उस दरवाज़े को पहले भी देखा था।

 

लेकिन कहां?

 

उसके दिमाग में एक आवाज़ गूंजी—

 

“तुम्हें सच जानना है?”

 

उसने कांपते हुए पूछा—

 

“हां।”

 

“तो आईने के अंदर आओ।”

 

“अगर मैं अंदर चला गया तो?”

 

कुछ पल सन्नाटा रहा।

 

फिर निशा बोली—

 

“तुम बाहर कभी थे ही नहीं।”

 

इंदरजीत का चेहरा सफेद पड़ गया।

 

अचानक कमरे का दरवाज़ा अपने आप खुल गया।

 

बाहर वही बूढ़ा रिसेप्शनिस्ट खड़ा था।

 

उसने इंदरजीत को देखा और कहा—

 

“मुझे पता था तुम वापस आओगे।”

 

इंदरजीत दौड़कर उसके पास गया।

 

“आप मुझे जानते हैं?”

 

बूढ़े ने सिर हिलाया।

 

“बहुत अच्छी तरह।”

 

“मैं कौन हूं?”

 

बूढ़े ने कुछ सेकंड तक उसे देखा।

 

फिर धीरे से बोला—

 

“तुम इंदरजीत नहीं हो।”

 

इंदरजीत के पैरों तले जमीन खिसक गई।

 

“क्या?”

 

बूढ़े ने अपनी जेब से एक पुरानी फोटो निकाली।

 

फोटो में वही पांच लोग थे।

 

लेकिन इस बार पांचवां चेहरा साफ दिखाई दे रहा था।

 

वह इंदरजीत नहीं था।

 

वह एक दूसरा लड़का था।

 

बूढ़े ने कहा—

 

“असली इंदरजीत चौदह साल पहले मर चुका है।”

 

इंदरजीत पीछे हट गया।

 

“तो फिर मैं कौन हूं?”

 

बूढ़े ने कोई जवाब नहीं दिया।

 

उसकी नजर कमरे के आईने पर चली गई।

 

आईने में निशा अब मुस्कुरा रही थी।

 

फिर आईने पर धीरे-धीरे शब्द उभरे—

 

“अब इसे सब कुछ याद आ गया है।”

 

बूढ़े के चेहरे पर डर दिखाई देने लगा।

 

उसने तुरंत इंदरजीत का हाथ पकड़ लिया।

 

“भागो!”

 

“कहां?”

 

बूढ़े ने कांपते हुए कहा—

 

“होटल से बाहर।”

 

इंदरजीत सीढ़ियों की तरफ भागा।

 

लेकिन जैसे ही वह नीचे पहुंचा, उसके सामने वही गलियारा था।

 

कमरा नंबर 101।

 

वह पीछे मुड़ा।

 

फिर सामने देखा।

 

फिर वही दरवाज़ा।

 

101

 

वह दूसरी तरफ भागा।

 

फिर भी…

 

कमरा 101।

 

तीसरी तरफ गया।

 

फिर भी…

 

101।

 

अब उसे समझ आ गया था।

 

वह होटल में नहीं था।

 

वह किसी और जगह फंस चुका था।

 

तभी पीछे से किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

 

उसने धीरे-धीरे पीछे देखा।

 

निशा उसके बिल्कुल पीछे खड़ी थी।

 

इस बार उसके चेहरे से बाल हटे हुए थे।

 

और उसका चेहरा देखकर इंदरजीत की चीख निकल गई।

 

क्योंकि निशा का चेहरा…

 

बिल्कुल उसकी मां जैसा था।

 

निशा ने धीरे से कहा—

 

“बेटा… तुम्हें इतनी देर क्यों लगी मुझे पहचानने में?”

 

और उसी क्षण पूरे होटल की सारी लाइटें बंद हो गईं।

 

अंधेरे में सिर्फ एक आवाज़ गूंजी—

 

“भाग 3 में सच सामने आएगा।”

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