भाग~40 पन्ना नंबर तेईस
एकांश के घर से बाहर निकलते ही जैसे कमरे में ठहरे हुए हर शब्द की गर्मी भी साथ चली गई हो। रूहानी ने दरवाज़ा धीरे से बंद किया, फिर सीधे जाकर डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर बैठ गई…. जैसे उसकी टाँगों में अब खड़े रहने की ताक़त नहीं बची हो।
उसने एक ही साँस में पूरा गिलास पानी पिया, गले से नीचे उतरते पानी की ठंडक जैसे उसके भीतर उठ रहे तूफ़ान को थोड़ी देर के लिए थामना चाह रही थी। लेकिन उस ठंडेपन से भी उसका भीतर नहीं बुझा… आँखें अभी भी भटकी हुई थीं, जैसे कुछ खोज रही हों… या कुछ खो चुकी हों।
उसकी नज़र सामने पड़े सैंडविच पर गई, जो अधूरी माफ़ी की तरह प्लेट में पड़ा था। अद्वैत ने बनाया था…. सादगी से भरा, न बोल सकने वाली क्षमा जो शब्दों से नहीं, हर काटे गए टुकड़े से झलक रही थी।
रूहानी ने उसे उठाया और खाना शुरू कर दिया, बिना अद्वैत की तरफ़ देखे। सैंडविच अब ठंडा हो चुका था, बिल्कुल उसी तरह जैसे उनके बीच की वो ऊष्मा जो कभी समझदारी से उपजी थी, अब चुप्पियों में बर्फ़ बनकर पिघल रही थी।
अद्वैत ने कॉफ़ी का मग उठाया, कुछ कहने की हिम्मत जुटाते हुए बोला, “मैं रीहीट कर देता हूँ…”
रूहानी की आवाज़ आयी… बहुत नर्म, मगर भीतर से साफ़ कटती हुई, “रहने दो… आइस हो फ्रिज में तो वही डाल दो।”
वो नहीं चाहती थी कि अद्वैत कुछ पूछे….. न एकांश के बारे में और न उन दोनों के बीच के उस रिश्ते के बारे में।
इस घर में बहुत कुछ था जो कहे बिना भी भारी था और उन शर्तों के मुताबिक, सवाल करना मना था।
अद्वैत चुपचाप उठा और जैसे आदेश मिला हो, वैसे ही फ्रिज से आइस निकालकर कॉफ़ी में डाल दी।
रूहानी ने सैंडविच खत्म किया, भूख इतनी नहीं थी जितना बेचैनी थी, जो हर निवाले के साथ उसके गले से उतर रही थी। जब भी वो तनाव में होती थी,कुछ ज़्यादा ही भूख लगती थी उसे।
नाश्ता पूरा हुआ। प्लेट खाली, मग ठंडा, और उसका चेहरा पहले से ज़्यादा बुझा हुआ।
“शाम तक लौट आऊँगी,” बस इतना कहा, और दरवाज़ा खोलकर निकल गई….. बिना पीछे देखे, बिना किसी सफ़ाई के, जैसे कोई पन्ना पलट दिया हो जिसमें अब और कुछ लिखना बाकी न हो।
अद्वैत वहीं खड़ा रह गया, उस अधूरे वाक्य की तरह, जिसका उत्तर कभी किसी ने माँगा ही नहीं।
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रूहानी ने जैसे ही कैब का दरवाज़ा बंद किया, एक सधे हुए अंदाज़ में बैग से मोबाइल निकाला और रिनोवेशन वाले को कॉल कर दिया। उसकी आवाज़ में एक अजीब-सी ठंडक थी…. वह ठंडक जो अब उसकी पहचान बन गई थी; जैसे हर बातचीत सिर्फ एक डील हो, हर लहजा एक ऑर्डर।
“मैं दस मिनट में स्टूडियो पहुँच रही हूँ। टीम टाइम पर आ जाए।” कॉल कटते ही वह खिड़की की ओर मुड़ गई। ट्रैफिक की आवाज़ों के पीछे जैसे कोई पुरानी धुन चल रही थी… धीमी, शांत, बस उसी के लिए बजती हुई। वह धुन, जो उसे अतीत से जोड़ती थी और वर्तमान से काटती भी।
स्टूडियो इस बार बड़ा था, बिल्कुल नया। एक खुली छत के नीचे फैला हॉलनुमा कमरा, जहाँ हर दीवार, हर कोना एक नई शुरुआत का इशारा दे रहा था।
सामने वुडन फ्लोर पर लाइट्स की वायरिंग चल रही थी, दूसरी ओर कपड़ों की कढ़ाई और डिज़ाइनिंग के लिए अलग सेक्शन बन रहा था, और एक कोना फोटोशूट और ब्रांडिंग स्टूडियो में तब्दील हो रहा था।
दीवारों पर निशान लगते जा रहे थे, जैसे समय खुद वहाँ नए ख्वाबों की रेखाएँ खींच रहा हो। रिनोवेशन टीम अपने-अपने हिस्से का काम करने में जुटी थी…. किसी ने ब्लूप्रिंट फैलाया, कोई लैपटॉप खोलकर प्लानिंग समझाने लगा। सबकुछ योजनाबद्ध, सटीक, ठोस था।
पर रूहानी?
वह सबके बीच होकर भी कहीं दूर खड़ी थी…. ना दखल देती, ना कुछ रोकती, बस जैसे किसी पर्दे के पीछे से अपनी ही ज़िंदगी को एक बार फिर रंगते हुए देख रही हो।
कुछ देर बाद एक वर्कर ट्रे में जूस के गिलास लेकर आया। एक गिलास उसकी ओर भी बढ़ाते हुए बोला, “मैम, थोड़ा ब्रेक ले लीजिए।”
रूहानी ने शुक्रिया कहा, एक हल्की मुस्कान आई, जो अगले ही पल जैसे पिघल गई। स्टूडियो के काँच वाले दरवाज़े से कुछ दूरी पर रखी एक लकड़ी की बेंच पर जाकर बैठ गई।
पहला घूँट लिया, तो गले से उतरती उस मिठास में एक कसक भी थी। बाहर की चिलचिलाती धूप के बीच, अंदर कुछ ठंडा बह रहा था… लेकिन वह ठंडक जूस की नहीं थी। वह उन यादों की थी जो समय की धूल में दबी थीं, पर अब भी साँस ले रही थीं।
उसकी आँखें कहीं और ही चली गईं… वहीं पुरानी जगह पर, उस पहले स्टूडियो में जहाँ छत टपकती थी और दीवारें खुद-ब-खुद परतें छोड़ देती थीं। मगर उस कमरे की हवा में कभी मायूसी नहीं होती थी…..
Flashback
बारिश की रुक-रुककर गिरती बूंदें जैसे हर उस खामोशी को बुन रही थीं जो रूहानी के भीतर कई महीनों से बिना शब्दों के पनप रही थी। उसका पुराना स्टूडियो…. वही टूटी छत वाला, ईंटों की खुली दीवारों वाला कोना…. जहाँ वक़्त ने कई बार रुक कर साँस ली थी।
वहाँ आज फिर वही गंध थी — गीली मिट्टी, गीले रंग और पुराने सपनों की।द
वो कैनवास के सामने बैठी थी, बाल रबर बैंड में बँधे, एक लट फिर भी जिद पर उतरी हुई थी… बार-बार आँखों के पास आकर उसे चिढ़ा रही थी। दीवारों पर कुछ अधूरी रेखाएँ थीं, जो अभी कहानी नहीं बनी थीं, बस किसी टूटी आत्मा की हल्की दस्तक सी लग रही थीं।
तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। इतनी धीमी कि जैसे खुद भी यकीन नहीं था कि कोई उसे सुनेगा। रूहानी ने पलटकर देखा….. एक अनजाना चेहरा। मगर अजनबी तो बस दिखता था, उसकी आँखों में जाने-पहचाने सवाल थे।
“तुम रूहानी हो?” आवाज़ हल्की थी और भीगी हुई।
“हाँ…” उसने धीरे से जवाब दिया, जैसे किसी पुराने कागज़ को पलटते हुए।
“ये तुम्हारी स्केचबुक है शायद… बस में छूट गई थी।”
रूहानी की साँसें थम-सी गईं। वो स्केचबुक, जो वो हर रोज़ अपने दिल की धड़कनों की तरह संभालती थी…. अब उसके हाथों में नहीं, इस अजनबी के पास थी।
उसने किताब हाथ में ली, काँपती उंगलियाँ जैसे किसी खोए हुए बच्चे को गले लगाना चाहती हों।
“तुमने… देखा इसे?” उसने संकोच से पूछा।
वो मुस्कुराया, एक धीमे उजाले की तरह जो किसी बहुत गहरे अंधेरे को समझता हो।
“देखना तो नहीं चाहिए था मुझे” उसने जवाब दिया, “लेकिन ये पन्ना नंबर 23…. खुद ही अलग होकर गिर पड़ा था…. वही सबसे प्यारा लगा मुझे।”
रूहानी ने झट से उस पन्ने को पलटकर देखा।
वहाँ एक अधूरी लड़की थी…. आँखें बंद, हथेलियाँ फैली हुई… जैसे कुछ माँग रही हो… शायद खुद को।
“वो मैंने खुद को रचा है,” रूहानी के ज़हन में गूंजा, मगर होंठ चुप रहे।
उस दिन कुछ नहीं कहा गया ज़्यादा, बस उसने उसे अंदर बुलाया और कॉफी दी।
“यहाँ अक्सर बारिश आती है क्या?” उसने पूछा।
रूहानी ने सिर हिलाया। “यहाँ बारिश नहीं, पुराने दिन आते हैं… और खुद को धो जाते हैं।”
वो हँसा नहीं, बस देखता रहा… उस दीवार की ओर जहाँ रूहानी की अधूरी स्केच टंगी थी।
फिर धीरे से बोला, “मैं एक डॉक्यूमेंट्री बना रहा हूँ… लोकल आर्टिस्ट्स पर। तुम्हें शूट करना चाहता हूँ।”
रूहानी ने पहली बार किसी को इतना हल्के से अपनी दुनिया में आते देखा था…. जैसे वो दरवाज़ा नहीं खटखटाता, बल्कि साँसों के ज़रिए भीतर उतरता हो।
“कैमरे से डर लगता है मुझे,” वो मुस्कुराई थी उस दिन।
“क्यों?” उसने पूछा।
“क्योंकि वो मुझे वैसी दिखा देता है, जैसी मैं खुद से भी छिपाना चाहती हूँ।”
वो कुछ पल खामोश रहा, फिर कहा, “तो कैमरे को झूठ बोलना सिखा देंगे। या शायद… सच के लिए थोड़ा प्यार बाँट देंगे।”
उस शाम के बाद, एकांश सिर्फ उस डॉक्यूमेंट्री का हिस्सा नहीं रहा। वो उसके स्केचों के बीच रहने लगा… कभी पन्नों में, कभी रंगों में, और धीरे-धीरे साँसों में।
flashback ends
वो उस दिन को भूल नहीं पाई। ना पन्ना नंबर 23 को और ना उस एकांश को जो पहली बार किसी के सपनों को लौटा कर आया था।
“काश,” उसने बेंच पर बैठे-बैठे सोचा, “कुछ चीज़ें लौटकर सिर्फ स्केचबुक तक सीमित रहतीं… दिल तक नहीं जातीं।”
तभी मोबाइल की स्क्रीन चमकी। एक अनजान नंबर से सिर्फ एक पंक्ति….
“तुम मुझसे एकांश को कभी नहीं छीन सकती। वो मेरा था… और हमेशा रहेगा।”
उसका दिल एक लम्हे को रुक गया। उँगलियाँ स्क्रीन पर जमीं रहीं। आसपास सब कुछ चलता रहा….
वर्कर्स की आवाज़ें, मशीनों की गूंज, ट्रैफिक का शोर….. लेकिन रूहानी के भीतर सन्नाटा उतर आया।
उसने नंबर दोबारा देखा, पहचानने की कोशिश की… मगर न नाम, न कोई और सुराग।
पर जो लहजा था… वो अजनबी नहीं था।
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वो मैसेज किसका था, जो एकांश को अपना बता गया…?
अगर वो लहजा अजनबी नहीं था, तो क्या रूहानी पहले ही किसी अनजाने झूठ से बंध चुकी थी…?
क्या रूहानी सच में भूल पाई थी एकांश को… या बस खुद से झूठ बोल रही थी?

लिखकर रूह छूने की कोशिश…..
🥹🥹

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