🔐 लॉग-इन या रजिस्टर करें  

अधूरी इबादत भाग~37

पढ़ने का समय : 6 मिनट

भाग~37 उसकी बाँहों में

 

दरवाज़े पर जैसे ही रूहानी ने एकांश को देखा, उसके भीतर जैसे किसी भूले हुए समय की परछाइयाँ जाग उठीं। उसकी आँखें फैल गईं, होंठ सूख गए, और साँसों ने जैसे चलना बंद कर दिया हो। 

उसके ज़ेहन में हजारों सवाल एक साथ दौड़ पड़े… “ये यहाँ कैसे? क्या ये मेरा पीछा कर रहा था? क्या अद्वैत को सब बता देगा?” दिल ने डर के थपेड़े खाए और दिमाग खाली हो गया, जैसे हर जवाब उस दरवाज़े के पीछे ही छूट गया हो।

उसके पैर लड़खड़ाए। घबराहट उसकी साँसों में जहर घोलने लगी और शरीर सुन्न होने लगा। वो गिरने ही वाली थी, जब एक पुरानी आदत की तरह एकांश की बाँहें अचानक उसके चारों ओर आ गईं। उसने बिना सोचे, बिना समझे उसे थाम लिया, जैसे कोई भूली हुई महक अचानक साँसों में लौट आई हो। 

उसकी बाँहों में रूहानी का शरीर हल्का-सा कांपा, और एकांश के हाथ, जैसे खुद-ब-खुद उसकी पीठ पर फिसलते गए, धीमे-धीमे, सहेजते हुए, जैसे पुराने दिनों की कोई आदत लौट आई हो। 

उसकी आवाज़ बेहद मुलायम हुई, “रूहानी…” वो नाम जिसे अब उसने शायद अरसो से किसी और की ज़ुबान पर नहीं सुना था, अब किसी पुराने राग की तरह उसके कानों में घुल रहा था।

अंदर से अद्वैत की आवाज़ आई, “रूहानी, कौन है?”

मगर रूहानी जवाब नहीं दे सकी। और तब, जैसे किसी अपरिचित चेतावनी से घिरा हुआ, अद्वैत दरवाज़े की ओर आया और उसने देखा।

उसकी नज़रों के सामने था…. उसकी ‘पत्नी’ किसी और की बाँहों में थी। मगर ये सिर्फ कोई और नहीं था… वो लड़का था जिसकी आँखों में उस वक़्त इतनी बेचैनी थी जैसे रूहानी को खो देने का डर फिर से उसके भीतर सुलग रहा हो। 

अद्वैत की नज़रों में कुछ टूटा… कुछ बहुत बारीक, कुछ बेहद निजी। वो खुद नहीं समझ पाया कि क्या… लेकिन पहली बार उसने महसूस किया, उसे रूहानी को यूँ किसी और की बाँहों में देखना ठीक नहीं लगा।

एकांश ने अद्वैत की ओर देखा, उसकी बाहों में अब भी रूहानी थी, जो बेहोश थी। उसकी आवाज़ थोड़ी काँपी, “मैं… मैं इसे कहाँ लिटा दूँ?”

अद्वैत कुछ कहने वाला ही था…”नीचे उसके कमरे में…” मगर अचानक, जैसे कुछ भीतर से झटका देता है उसे, और वो झूठ बोल देता है, “यहाँ सोफे पर लिटा दो।”

अद्वैत तुरंत किचन की ओर मुड़ता है, पानी लाने का बहाना बनाकर। उसकी उंगलियाँ पानी के गिलास को थामते हुए थोड़ी कांपती हैं, जैसे किसी अदृश्य दर्द से जूझ रही हों। 

जब वो वापस आता है, तो देखता है….. एकांश अब भी उसके गाल थपथपा रहा है, धीरे-धीरे, उसी अंदाज़ में जैसे कोई बहुत अपना किसी अपने को होश में लाने की कोशिश करता है।

अद्वैत वहीं ठिठक जाता है।

गिलास उसके हाथ में ठहरा रहता है, मगर उसका ध्यान कहीं और है।

क्यों चुभ रहा है ये?

वो खुद से पूछना चाहता है…. मगर कोई जवाब नहीं…..

उसकी नज़रें रूहानी के चेहरे पर ठहरती हैं और वहाँ एक अजीब-सी शांति है, जैसे उसका शरीर उस स्पर्श को पहचानता है… मानता है…

और उस क्षण अद्वैत को पहली बार अहसास होता है कि शायद उसकी इस ‘कॉन्ट्रैक्ट मैरिज’ के दायरे में अब कुछ ऐसा दाख़िल हो चुका है… जो अनुबंध से परे है।

अद्वैत ने काँपते हाथों से पानी का गिलास उठाया, और खुद से रूहानी के चेहरे पर कुछ छींटे मारे। 

एकांश अब भी वहीं बैठा था, उसका हाथ रूहानी के गाल पर था, लेकिन अद्वैत के आने से अब वो हल्के से पीछे हट चुका था, जैसे किसी पुराने हक़ को अब नए मौन से बदलना चाहता हो। 

अद्वैत के चेहरे पर अब वो शांत मुखौटा नहीं था जो उसने अक्सर दुनिया को दिखाया था। उसकी भौंहें सख़्त थीं, जबड़े भींचे हुए, और होंठों के किनारे काँप रहे थे। उसकी उंगलियाँ अब बार-बार रूहानी के माथे को छूतीं, जैसे यह यक़ीन दिलाना चाहती हों कि सब ठीक है… कि वो यहाँ है… लेकिन हर बार जब रूहानी की पलकें नहीं फड़कतीं, उसका दिल और गहराई में डूबने लगता।

“रूहानी… प्लीज़… होश में आओ,” उसकी आवाज़ फुसफुसाहट से भी धीमी थी, लेकिन इतनी सच्ची, इतनी भारी कि उस कमरे में हवा भी कुछ पल ठहर गई।

एकांश ने ये सुना। और वह पल… जिसमें उसने अद्वैत की आँखों में कुछ देखा…. कुछ ऐसा जो शब्दों में नहीं था, लेकिन चीख रहा था… डर, मोह, उलझन… और शायद… एक नामालूम-सा अधिकार। 

एकांश ने खुद को एक क़दम पीछे खींच लिया, जैसे अब ये दृश्य उसका नहीं था, जैसे कोई अदृश्य लकीर खिंच चुकी हो, जिसे लांघना अब मुमकिन नहीं।

अद्वैत अब पूरे होश में था…. उसकी गंभीरता किसी जिम्मेदारी की नहीं थी, ये कुछ ज़्यादा था। 

एकांश की आँखों ने देखा कि कैसे उसके चेहरे का रंग बदला… घबराहट उसकी पलकों पर जमा हो गई, जैसे कोई तूफ़ान आने से पहले का सन्नाटा।

“देख न एकांश,” अद्वैत की आवाज़ टूटी, “रूहानी को होश नहीं आ रहा है।”

एकांश की पलकों में चिंता झलक गई। वो तुरंत झुककर फिर से रूहानी के चेहरे के पास आया, उसकी नब्ज़ देखी, हाथ उसके गले के पास रखा, और फिर शांत स्वर में कहा, “भाई, जल्दी से डॉक्टर को बुलाओ… शॉक के कारण हो जाता है। लेकिन रिस्क नहीं ले सकते।”

अद्वैत ने फौरन फोन उठाया, डॉक्टर को कॉल लगाया, और उसकी आवाज़ में वो घबराहट थी जो दिल को सीधा चीर जाती है। उसका हाथ काँप रहा था, और आँखें बार-बार रूहानी पर टिक रही थीं, जैसे हर पल उससे कहती हों, “तुम ठीक रहो… बस ठीक रहो…”

फोन के दूसरी तरफ डॉक्टर की आवाज़ आई, “ये सिंकोप लग रहा है, शॉक के कारण। बस उसे लेटाकर पैरों को ऊपर रखो ताकि दिमाग तक खून का प्रवाह बढ़े। अगर दस मिनट में होश नहीं आता, तो क्लिनिक लाना पड़ेगा।”

अद्वैत ने बिना वक़्त गँवाए एकांश को देखा, दोनों ने एक साथ मिलकर रूहानी को सावधानी से सोफे पर उसके पैरों के नीचे कुछ कुशन रखे। 

अद्वैत अब ज़मीन पर बैठ चुका था, उसके माथे पर पसीना था, आँखें रूहानी के बंद पलकों पर टिकी थीं, जैसे उसकी हर साँस अब उसी की धड़कनों पर निर्भर हो।

एकांश कुछ कदम पीछे खड़ा रहा। उसकी आँखों में भी चिंता थी, लेकिन वो जानता था… ये जगह अब सिर्फ उसकी नहीं रही। वहाँ एक और एहसास मौजूद था — अद्वैत का, जो शायद नाम नहीं जानता था… लेकिन महसूस कर चुका था।

कमरे में अभी भी रूहानी की बेहोशी पसरी हुई थी, उसकी साँसें धीमी, लेकिन जारी थीं। उसकी पलकों पर थमे आँसू अब भी सूखने का नाम नहीं ले रहे थे। 

बाहर मौसम जैसे कमरे की हालत से मेल खा रहा था…. बादलों से ढँका आसमान, कभी-कभी हल्की बिजली की चमक, और दूर से आती गरज की गूँज। 

अद्वैत ने एक बार फिर उसकी ओर देखा, मगर इस बार उसकी नज़रें सिर्फ चिंता से भरी नहीं थीं, उनमें उलझन भी थी…. जैसे किसी पहेली के अनसुलझे टुकड़े अचानक आँखों के सामने बिखर गए हों।

एकांश ने दीवार से टिककर लंबी साँस ली, फिर धीरे-धीरे अद्वैत के पास आया। उसकी चाल में कोई बनावट नहीं थी, बस एक सालों पुरानी थकान थी जो अब बाहर निकलना चाहती थी। 

अचानक उसने आगे बढ़कर अद्वैत को बाँहों में भर लिया। एक क्षण के लिए दोनों सगे नहीं, मगर खून से बंधे हुए भाइयों की तरह एक-दूसरे के सीने से लग गए।

“भाई…” एकांश की आवाज़ टूटी, मगर सीधी दिल से निकली, “मेरी शादी की रात… आप अचानक वापस क्यों चले आए थे? बिना बताए… बिना कुछ कहे… मैं आपको पूरे फेरे भर ढूंढता रहा… आप क्यों नहीं रुके?”

अद्वैत सन्न खड़ा रह गया। उसका चेहरा ठंडा था, मगर आँखों में कुछ टूटता हुआ दिख रहा था।

————

क्या अद्वैत सच में अब महसूस करने लगा है… कुछ ऐसा जो कभी तय नहीं किया गया था?

रूहानी की बेहोशी में छुपा है कौन-सा सच… और वो होश में आकर सबसे पहला नाम किसका लेगी?

एकांश का वो सवाल… ‘मेरी शादी के वक़्त आप वापस क्यों चले आए थे?’… क्या ये सब पहले से जुड़ा हुआ था किसी अधूरी कहानी से?

Comments

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *