भाग~36 तुम… यहाँ क्यों?
रूहानी की नज़रें उस अलमारी से हटकर अब पूरे कमरे को टटोल रही थीं, जैसे हर चीज़ से एक जवाब माँग रही हो। उसकी उंगलियाँ धीरे-धीरे मेज़, दराज़, और किताबों की कतारों पर फिसलती चली गईं, हर पल उम्मीद और बेचैनी की लहरों से भीगती।
तभी उसकी नज़र कमरे के सबसे पिछले कोने में पड़ी—जहाँ एक पुरानी किताबों की गठरी पड़ी थी, धूल की चादर ओढ़े हुए। वह झुकी, और जैसे ही उसने गठरी हटाई, एक फाइलनुमा डायरी उसके हाथों में आ गई… वही हल्का नीला कवर, और किनारे से झांकता हुआ इशिता का नाम।
उस पल रूहानी के भीतर जैसे कोई सील टूट गई। सांसें तेज़ हो गईं, और उंगलियाँ काँपने लगीं।
“यही है…” उसने बुदबुदाकर खुद से कहा, जैसे किसी अपराध की स्वीकारोक्ति कर रही हो।
कमरे की नीरवता अब और भारी हो गई थी, मानो अद्वैत की मौजूदगी कहीं दीवारों में गूंज रही हो। और वहीं दूसरी ओर, कहीं दूर, एक अनकही सच्चाई उसके इंतज़ार में थी, किसी अधूरे पन्ने की तरह जो खुला तो बहुत कुछ बदल सकता था… शायद सब कुछ।
रूहानी ने जैसे ही पुरानी किताब का पन्ना खोला, उसमें से एक मोड़ा हुआ ख़त निकल आया। कमरे में हल्की-सी पीली रौशनी थी, चांदनी खिड़की से फर्श पर उतर रही थी और पूरा कमरा एक सन्नाटे की चादर ओढ़े था। दीवार घड़ी की टिक-टिक और बाहर किसी कुत्ते की दूर जाती आवाज़ के सिवा कुछ भी न था।
उसने गहरी साँस ली, ख़त को खोला और धीमे-धीमे पढ़ने लगी।
“मुझे आज भी वो दिन साफ़ याद है जब तुमने कहा था कि तुम मुझसे प्यार करोगे। उस दिन, अनजाने में तुमने मेरी कलाई थाम ली थी जब समुद्र की लहरें किनारे से टकरा रही थीं लेकिन उनका शोर भी मेरे दिल की धड़कनों के आगे फीका पड़ गया था।
मैंने कोशिश की थी, सच में, हज़ारों बार उस दिन को भूल जाने की। लेकिन यह दिल… यह नहीं चाहता कि उस पल को जाने दे। वो पल जब मुझे लगा कि मैं ताउम्र तुमसे मोहब्बत करने वाली हूँ। और मैं चाहती हूँ कि तुम जानो… मैं आज भी तुमसे मोहब्बत करती हूँ, और करती रहूँगी।”
पढ़ते-पढ़ते रूहानी की उंगलियाँ कांपने लगीं। उसने किताब को बंद किया, ख़त को सावधानी से वापस मोड़ा, और फिर कमरे की खिड़की बंद कर दी। हवा अब भी बाहर बह रही थी, पर कमरे के अंदर जैसे कोई सूनापन घुस आया हो।
उसने ख़त को उसी किताब के भीतर वापस रखा, लेकिन वो बेचैनी अब उसकी सांसों से उतरकर उसके दिल में टिक चुकी थी।
वो उठी और वापिस दबे पाँव सीढ़ियों से नीचे उतरकर कमरे में पहुँची, फिर धीरे-धीरे बिस्तर की ओर बढ़ी। बिस्तर पर गिरते ही वह एकटक छत को घूरने लगी, जैसे वहाँ कोई जवाब छिपा हो।
दिल की धड़कनें इतनी तेज़ थीं मानो कोई अंदर से छटपटा रहा हो। गले में अटकी हुई सिसकियाँ अब आँखों से बहकर गालों तक पहुँच गईं।
रूहानी को खुद नहीं पता था कि वो रो क्यों रही है। पर ये खालीपन, ये टूटापन… किसी तरह सुकून दे रहा था। जैसे एक घाव जो अब खुलकर बह रहा हो।
उसे लगा, शायद ये उस एहसास की चुभन है कि वो किसी के लिए भी कभी “काफ़ी” नहीं रही।
न अपने घर के लिए।
न उसके लिए जिन्हें उसने अपना सब कुछ मान लिया था।
“उसने ही तो मुझे धोखा दिया था… मेरा करियर, मेरा विश्वास…. सबकुछ तोड़ दिया,” रूहानी ने धीमे से खुद से कहा।
उसकी आँखों में अब आँसू नहीं, बस एक थकी हुई चमक थी… जैसे रो लेने के बाद भी सुकून नहीं, सिर्फ़ थकावट मिली हो।
रात के उस पहर में, कमरे की दीवारें भी जैसे उसके भीतर की चीखें चुपचाप सुन रही थीं…
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रात भर अद्वैत करवटें बदलता रहा, जैसे हर अंग अपने किए पर शर्मिंदा हो। कमरे की दीवारें भी उसके साथ जाग रही थीं, और हर साँस एक बोझ की तरह उसके सीने में उतर रही थी।
उसके भीतर एक बेचैनी थी — नहीं, सिर्फ़ इस बात की नहीं कि उसने दरवाज़ा बिना इजाज़त खोला… बल्कि इस डर की कि रूहानी ने उसे वैसा देखा जैसा वो कभी होना नहीं चाहता था।
उसके ख्यालों में बार-बार रूहानी की वो नज़रें तैरतीं, जो चोट खाई थीं…. न चिल्लाईं, न तोड़ीं, बस चुपचाप उतर गईं उसकी आत्मा तक।
सुबह जब हल्की धूप खिड़की के कोनों से सरकती हुई फर्श पर फैल रही थी, अद्वैत बिस्तर छोड़ चुका था। रसोई में जाकर उसने पहला काम किया — इंटरनेट पर सर्च किया: “How to make sandwich and coffee for someone you’ve hurt.”
उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं, पर दिल में एक अजीब सी ठान थी। उसे खाना बनाना नहीं आता था, पर उसे एहसास आता था। उसने ब्रेड निकाली, टमाटर धीरे-धीरे काटे, चीज़ को बहुत एहतियात से रखा… जैसे हर परत में वह अपनी गलती का इकरार रख रहा हो।
कॉफी बनाते वक्त उसकी आँखों में नमी थी। भाप से ढँके उसके चश्मे के शीशों में रूहानी की परछाईं थी, वो जो अब दूर लगती थी, पर जिस तक पहुँचने की कोशिश अब भी जारी थी।
टेबल पर उसने सब कुछ अच्छे से सजाया, कप के पास एक छोटा सा नोट भी रखा, “अगर मेरी खामोशी ने ज़ख़्म दिए, तो ये सुबह मेरी पहली कोशिश है उन्हें भरने की।”
और ठीक तभी, जैसे वक़्त ने उसकी पुकार सुन ली हो, रूहानी आ गई।
उसकी चाल में अब भी वही चुप्पी थी, और आँखों में एक अजनबीपन — जैसे रात की नमी अब तक उसकी पलकों पर टिक गई हो।
उसने टेबल पर नज़र डाली, फिर अद्वैत की ओर, और कुछ पल तक कुछ नहीं बोली। मगर उन नज़रों में एक सवाल अब नहीं था, सिर्फ एक थकी हुई स्वीकृति थी — कि शायद कुछ रिश्ते माफ़ी से नहीं, कोशिशों से जुड़ते हैं।
अद्वैत की नज़र जैसे ही रूहानी के चेहरे पर पड़ी, उसका दिल एक पल को थम-सा गया। उसकी आँखों के नीचे हलकी सूजन थी, जैसे कोई चुपचाप पूरी रात अपने आँसुओं से भीगता रहा हो।
वो दर्द जो ज़ुबान नहीं कहती, मगर चेहरा छुपा भी नहीं पाता….. अद्वैत ने वो सब कुछ उसकी आँखों में पढ़ लिया था। उसके दिल में एक हूक-सी उठी, जैसे किसी ने उसकी साँसों पर बोझ रख दिया हो।
एक बेचैनी, एक आत्मग्लानि, कि वो भी कहीं न कहीं इस उदासी का हिस्सा बन गया है। वो कुछ कह नहीं पाया, बस एक निगाह डाली — नम और शर्मिंदा।
रूहानी ने धीरे से पूछा, “मीना नहीं आई आज काम पे?”
अद्वैत थोड़ा झिझका, फिर बोला, “उसके काम करने का टाइमिंग बदल दिया है मैंने…”
रूहानी ने उसे थोड़ा संदेह से देखा, जैसे दिल में कोई अनकहा सवाल उठ रहा हो।
अद्वैत ने तुरंत बात सँभाली, उसकी आँखों में डूबते हुए बोला — ‘अगर तुम रोज़ नीचे वाले कमरे में सोओगी, वहीं से तैयार होकर निकलोगी… तो उसे शक हो जाएगा न। और फिर, उसके दोनों बच्चे तो सुबह-सुबह ही स्कूल निकल जाते हैं…’
उसके लहजे में कोई चालाकी नहीं थी, सिर्फ एक मासूम-सी फ़िक्र थी कि वो इस रिश्ते की परतों को सबके लिए उतना ही अनदेखा रखना चाहता है, जितना कि रूहानी खुद चाहती थी।
मगर रूहानी की आँखें उस पल कुछ और ढूँढ रही थीं… शायद कोई जवाब, या शायद ये जानना कि क्या अद्वैत की ये परवाह सिर्फ दिखावे की है… या कहीं उसमें कोई और परत भी छुपी है, जो धीरे-धीरे उजागर हो रही है।
दोनों नाश्ते की मेज पर अभी बैठे ही थे। टेबल पर अद्वैत के हाथों से बनाए गए सैंडविच की खुशबू और कॉफी की भाप धीरे-धीरे कमरे में फैल रही थी। एक अजीब-सी चुप्पी थी दोनों के बीच बोझिल, मगर टूटी नहीं हुई।
रूहानी ने कॉफी का प्याला उठाया ही था कि अचानक दरवाज़े की घंटी बजी।
“मैं देखता हूँ,” अद्वैत कुर्सी से उठने लगा, मगर रूहानी ने उसे हल्के से रोक दिया।
“मैं देखती हूँ,” उसने धीरे से कहा, उसकी आँखों में अब भी पिछली रात की थकान और आज की उलझनें तैर रही थीं।
वो दरवाज़े की ओर बढ़ी, कदम थोड़े संकोच भरे थे जैसे दिल कुछ अनहोनी का संकेत दे रहा हो। उसने कुंडी खोली, और जैसे ही दरवाज़ा पूरा खुला… उसके सामने खड़ा था – एकांश राठौर
वही चेहरा, वही तीखी नज़रें… जो एक समय उसकी रगों में लावा बनकर दौड़ती थीं… अब दरवाज़े पर यूँ खड़ी थीं जैसे वक़्त को चीरकर लौट आई हों।
“त-तुम…. यहाँ?” रूहानी की आवाज़ उसकी साँसों में ही घुल गई।
उसका दिमाग एक पल के लिए शून्य हो गया… शब्द गायब, सोचें धुंध में डूबीं और दिल की धड़कन जैसे किसी दूसरे युग में पहुँच गई हो।
अंदर से अद्वैत ने आवाज़ लगाई, “रूहानी, कौन है?”
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क्या रूहानी के अतीत की परछाई, उसके आज की चौखट पर दस्तक देने आई है?
अद्वैत… क्या वो जान पाएगा कि ये दस्तक सिर्फ अतीत की नहीं, एक नए तूफ़ान की शुरुआत है?
अब जब तीन धड़कनों का वक़्त एक ही कमरे में समा गया है, तो क्या कोई रिश्ता बचेगा… या सब बिखर जाएगा?

लिखकर रूह छूने की कोशिश…..
🥹🥹

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