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अधूरी इबादत भाग~35

पढ़ने का समय : 7 मिनट

भाग~35 आँखें जो शर्मिंदा हैं 

 

अद्वैत वहीं दरवाज़े पर जड़ हो गया था, जैसे वक़्त उसकी साँसों के साथ थम गया हो। कमरे की हल्की पीली रौशनी रूहानी के नम बालों पर पड़कर उसे किसी बारिश में भीगी, अनकही कविता की तरह बना रही थी। 

उसकी गर्दन से बहकर पायजामे के कपड़े तक पहुँचती पानी की बूंदें, हर उस भावना की गवाही दे रही थीं जो उसने आज तक दबा रखी थीं। 

मगर अद्वैत के लिए यह दृश्य कोई आम क्षण नहीं था….. यह ऐसा था जैसे किसी पुराने, भरे हुए घाव पर अचानक धूप पड़ जाए। आँखों ने देखा जो दिल कहने से कतराता रहा।

रूहानी का चेहरा जब आइने में उसकी अपनी परछाई से टकराया और उसने अद्वैत की मौजूदगी को महसूस किया, तो एक सिहरन सी दौड़ गई उसकी रूह तक। 

वह चौंकी नहीं, मगर उसकी आंखों में एक ऐसी परत चढ़ गई जो शर्म और उलझन दोनों की थी। उसने तुरंत तौलिया उठाकर खुद को ढक लिया, जैसे कोई लहर जो तट से टकराकर लौटती है। 

उसकी नज़रों में सवाल था, पर ज़ुबान पर सिर्फ वही एक वाक्य निकला, “ऐसे क्या देख रहे हो?”

उसके स्वर में वो अजनबीपन था, जो दो अजनबियों के बीच बने रिश्ते की दीवार बन जाता है, चाहे वो एक ही छत के नीचे क्यों न रहते हों। 

अद्वैत को समझ नहीं आया कि वो क्या कहे। उसकी पलकें झपकना भूल गई थीं और दिल एक लय में धड़कना बंद कर चुका था।

“मैं… माफ़ करना, मैं बस… बस ये पूछने आया था कि… डिनर करोगी क्या?” उसकी आवाज़ जैसे किसी थके हुए दिल से निकली हो, टूटी, हकलाती हुई…. मानो हर शब्द अपने ही अपराध की गवाही दे रहा हो। 

आँखें ज़मीन पर थीं, जैसे वहाँ खुद को दफना देना चाहता हो, और साँसें बोझिल, जैसे हर पल अपने किए पर शर्म की परतें चढ़ा रहा हो। 

रूहानी ने उसकी तरफ देखा, आँखों में कहीं हल्का सा कांपता गुस्सा और कहीं एक मौन सी मायूसी तैरती थी। 

“अद्वैत, हम दोनों जानते हैं कि इस शादी में हमारी अपनी-अपनी सीमाएँ हैं। इस तरह बिना नॉक किए…” वह रुकी, जैसे शब्द गले में अटक गए हों।

अद्वैत ने कुछ कहने के लिए कदम बढ़ाया, मगर फिर रुक गया। “मैंने दरवाज़ा खटखटाया था… शायद तुमने सुना नहीं।”

उसके स्वर में कोई सफाई नहीं थी, बस एक बेकसी थी। जैसे कोई खुद से भी नज़रें नहीं मिला पा रहा हो।

“चाहे कुछ भी हो, हमारी ये… इस कॉन्ट्रैक्ट मैरिज में, निजता सबसे ज़रूरी है,” रूहानी की आवाज़ अब संयत थी, लेकिन उसमें एक थरथराहट थी जो अद्वैत को चीरती चली गई।

और फिर एक लंबा मौन पसरा, जैसे वक्त खुद भी इस तनाव में घुटने लगा हो।

अद्वैत ने उसकी आँखों में देखा, उन आँखों में कोई औरत नहीं थी, जो उससे नज़दीकियाँ चाहती हो। वहाँ सिर्फ एक इंसान था, जो खुद को सम्हालने में जुटा था। 

उसे वह सब याद आ गया…. इशिता की मुस्कान, उसकी आखिरी साँसें और वो वादा कि वो कभी किसी और को अपनी दुनिया में इतनी जगह नहीं देगा।

फिर भी आज, उस हल्की गीली खुशबू में, रूहानी की मौजूदगी ने उसकी दीवारों में एक दरार डाल दी थी।

“माफ़ कर देना,” उसने धीरे से कहा और मुड़कर चला गया।

रूहानी वहीं खड़ी रही, आइने में खुद को देखते हुए, जैसे पहली बार अपने ही चेहरे को समझने की कोशिश कर रही हो।

अंदर कुछ टूटने जैसा था, मगर उससे भी ज़्यादा कुछ जुड़ने जैसा भी। मगर ये जुड़ाव कोई प्रेम नहीं था… ये सिर्फ दो जिंदगियों के बीच के मौन का पहला शब्द था।

और बाहर, अद्वैत की चाल में एक ऐसा बोझ था जो उसने खुद अपने लिए चुना था… प्यार की कब्र पर खड़ा होकर किसी और की साँसें महसूस करना।

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डिनर टेबल पर दोनों आमने-सामने बैठे थे, लेकिन उनके बीच की खामोशी किसी अथाह गहराई जैसी थी….. ठंडी, स्थिर और बोझिल। कमरे की रौशनी हल्की थी, और हर चम्मच की आवाज़ दीवारों से टकराकर लौटती थी जैसे कोई सूनी पुकार। 

अद्वैत की निगाहें थाली में थीं, पर वो कुछ देख नहीं रहा था। हर निवाला जैसे एक गवाही था उसके अंदर के अपराधबोध की, उस एक पल की जब उसने रूहानी की निजता के आँगन में बिना अनुमति कदम रख दिया था।

रूहानी चुपचाप खा रही थी, मगर उसके चेहरे पर कहीं कोई जीवन नहीं था। उसकी पलकों की झपक भी जैसे भारी हो गई थी, जैसे वह अपने ही भीतर की बेचैनी को छिपाने की कोशिश कर रही हो। 

उसके जेहन में अभी भी अद्वैत की वो नज़रें थी…. गहराई तक जाती, पर न समझती, सिर्फ देखती हुई। वह नज़र जो इंसान को समझने नहीं, बस छूने आई थी, और वह छुअन… किसी आँधी जैसी थी…. तेज, असहज, और बिना चेतावनी।

अद्वैत ने भीतर ही भीतर कई बार कोशिश की कि कुछ कह सके। कोई माफ़ी, कोई स्पष्टीकरण, कोई ऐसा शब्द जो इन तनों हुई नसों को थोड़ा ढीला कर दे। मगर हर बार कुछ अजीब-सा डर उसके शब्दों को गला देता। जैसे किसी पुराने वादे की लाश उसके गले में फँसी हो। 

वह जानता था, उसके अतीत की परछाइयाँ आज भी उसके वर्तमान में साँस ले रही थीं…. उसकी पहली पत्नी की छवि, उसकी यादें, और उसका वादा कि वह किसी और को उस जगह तक नहीं पहुँचने देगा।

रूहानी ने बिना कुछ कहे धीरे से अपनी प्लेट सरकाई और उठ खड़ी हुई। कुर्सी की आवाज़ जैसे उस सन्नाटे को तोड़ने की एक बेकार कोशिश थी। 

अद्वैत ने सिर उठाया और उनकी नज़रों की टकराहट ने एक पल को वक्त रोक दिया। उसमें कोई शब्द नहीं थे, बस भाव थे… टूटी उम्मीदें, अनकही शिकायतें, और कोई अजनबी सी आत्मीयता जिसे दोनों ने पहचानने से इनकार कर दिया।

“मैं थक गई हूँ,” रूहानी ने बहुत धीमे, बहुत संयत स्वर में कहा। मगर इस थकान में नींद नहीं थी, इस थकान में टूटन थी — उस बोझ की, जिसे वो रोज़ ढो रही थी, उस रिश्ते की जो काग़ज़ पर था, मगर दिलों में कभी नहीं बसा।

अद्वैत कुछ कहना चाहता था, बहुत कुछ। मगर शब्द उसकी ज़ुबान तक आते-आते जल जाते। वह सिर्फ उसे जाते हुए देखता रहा, जैसे कोई धुंध में लिपटा साया पीछे छूट रहा हो।

टेबल पर रखी दो अधूरी थालियाँ अब भी वहीं थीं…. ठंडी, चुप, और गवाह उस रात की, जब दो लोग साथ थे, मगर फिर भी एक-दूसरे से बहुत दूर।

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रूहानी बिस्तर पर थी, मगर मन किसी और समय में उलझा था — करवटें नहीं, अब तो जैसे आत्मा ही बेचैन थी… तकिए पर सिर रखते ही उसे अपने अंदर कोई धीमा तूफान सुनाई देता….. एक बेचैनी, जो थमती नहीं थी। नींद आँखों के किनारों तक आकर लौट जाती थी, जैसे उसे भी इस मौन की भाषा समझ न आ रही हो… बिल्कुल किसी अपने की तरह जो पास होकर भी अजनबी लगने लगे। 

हर बार जब वो आंखें मूंदती, अद्वैत की वो नज़रें सामने आ खड़ी होतीं…. नरम, संकोच भरी, लेकिन कहीं भीतर कुछ कहती हुई। वो नज़रें जिनमें कोई पुराना दुख छिपा था, कोई अधूरा वादा, और वो खामोशी जो चीखने जैसी थी।

उसने करवट ली और एकाएक उसे ख्याल आया…. सुबह जब वो पहली मंज़िल में गई थी, तो अद्वैत का स्टडी रूम लॉक नहीं था। ये बात उसे अभी याद आई, और अजीब बात ये थी कि वो कमरा हमेशा बंद रहता था। 

उसके भीतर कुछ खिंचा, कोई पुरानी डोर जैसे खुद-ब-खुद खिंचने लगी। वह उठी, बिना चप्पलों के, नंगे पाँव, और दबे क़दमों से सीढ़ियाँ चढ़ने लगी। घर की दीवारें साँसें रोककर जैसे उसका पीछा कर रही थीं।

स्टडी रूम के बाहर आकर वो रुकी। साँसें धीमी थीं, लेकिन दिल की धड़कनें जैसे कानों में गूंज रही थीं। दरवाज़ा सच में खुला था। उसका हाथ थोड़ा कांपा, उसने हँथेली दरवाज़े पर रखा, पर खोलने से पहले एक और सवाल भीतर से उठा….. 

क्या ये सही होगा? 

क्या ये भी वही गलती नहीं होगी जो आज अद्वैत ने की थी? 

क्या मैं भी उसकी निजता में झाँकने जा रही हूँ?

लेकिन वो एक पन्ना… वो किताब… और उसमें लिखा इशिता का नाम… रूहानी का मन अब पीछे हटने को तैयार नहीं था। 

उसने धीरे से दरवाज़ा खोला….. कमरे में हल्की-सी लकड़ी की महक थी, और खिड़की से आती चांदनी सीधे उस खाली खुली अलमारी पर पड़ रही थी, जहाँ वो किताब रखी जाती थी।

मगर वो खाली थी।

वहाँ कुछ नहीं था…. न किताब, न वो टुकड़ा 

जो उसके भीतर के सारे सवालों को जिंदा कर गया था। 

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तो क्या अद्वैत जानता था कि वो वहाँ आएगी?

क्या ये सिर्फ एक इत्तेफ़ाक था… या कोई अधूरी कहानी, जो खुद को छुपा रही थी?

अगर किताब वहाँ नहीं थी….. तो फिर… इशिता की यादों का बोझ अब किसके पास था? 

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