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No love clause part 2

पढ़ने का समय : 7 मिनट

भाग 2

दिन के करीब बारह बजे…

 

वेदा अभी भी अस्पताल के कॉरिडोर में बैठी थी। पूरी रात की जागी हुई आँखें लाल हो चुकी थीं।

 

उसके हाथ में विहान की मेडिकल रिपोर्ट थी और दिमाग में सिर्फ़ एक ही सवाल घूम रहा था, एक करोड़ बीस लाख… आएँगे कहाँ से? उसके पास तो कोई सेविंग तक नहीं है क्योंकि सब पैसे घर के खर्चों में, रेंट के और विहान की दवाइयों में ही लग जाते थे। 

 

वो गहरी सोच में बैठी थी…तभी उसके सामने एक कॉफी का कप आकर रुका। “पकड़…”

 

वेदा ने सिर उठाया। “अपर्णा…” उसकी आवाज में नमी थी। 

 

अगले ही पल वह उठकर अपनी सबसे अच्छी दोस्त के गले लग गई। जो आँसू अब तक उसने खुद में कैद कर रखे थे, वे अपर्णा के कंधे पर सिर रखते ही बह निकले।

 

अपर्णा ने बिना कुछ कहे उसकी पीठ सहलाई। “सब ठीक हो जाएगा… यार “

 

वेदा हल्का-सा मुस्कुराई, लेकिन वो मुस्कुराहट ऐसी थी जैसे वो खुद पर हँस रही हो। “झूठ बोलना आज भी नहीं आया तुझे…”

कहते हुए उसने अपर्णा को देखा।

 

फिर दोनों कुर्सी पर बैठ गई।  अपर्णा भी फीकी-सी मुस्कुराई। “ झूठ बोलने से तसल्ली तो मिलती है , अगर सच बोल दूँ तो तू और टूट जाएगी… ना यार।” 

अपर्णा ने वेदा के कंधे को सहलाते हुए कहा। 

 

उसके बाद दोनों कुछ देर चुप रहीं। फिर अपर्णा ने धीरे से पूछा, “डॉक्टर ने क्या कहा?”

 

वेदा ने काँपते हाथों से रिपोर्ट उसकी तरफ बढ़ा दी।

अपर्णा ने जैसे-जैसे रिपोर्ट पढ़ी, उसके चेहरे का रंग उड़ता चला गया।

“ यार ये तो… खर्चा कितना आएगा?”

उसने दबी हैरानी भरी आवाज में पूछा।

 

वेदा काँपते होंठों से, “एक करोड़ बीस लाख…!”

 

अपर्णा, “ क्या…? एक करोड़ बीस लाख…?”

 

वेदा ने बस सिर झुका दिया। “मेरे पास सिर्फ़ बीस दिन हैं, अपर्णा।”

 

“मैंने बैंक में बात की… लोन नहीं मिलेगा। माँ के इलाज में पहले ही सब कुछ बिक चुका है। रिश्तेदार हैं नहीं… और जिन लोगों को जानती हूँ, उनकी पूरी ज़िंदगी की कमाई भी इतनी नहीं होगी कि…”

कहते हुए उसने अपनी बात अधूरी ही रहने दी। 

 

अपर्णा कुछ पल सोचती रही। अचानक उसे कुछ याद आया।  “सुन…”

 

वेदा ने उसकी तरफ उम्मीद भरी नजरों से देखा, “हम HR से बात करते हैं। कंपनी की एम्प्लॉयी मेडिकल लोन पॉलिसी है ना… शायद कोई रास्ता निकल आए।”

 

अपर्णा की बात सुनकर वेदा को कुछ उम्मीद जागी। उसने अपने आंसू पोंछे और अपर्णा की तरफ देखा। “हाँ… कम्पनी में ये पॉलिसी है तो सही। लेकिन रकम बहुत बड़ी है।”

 

अपर्णा ने उसे हिम्मत दी, “ कोशिश करके तो देख सकते हैं, वैसे भी तू कोई मामूली पोस्ट पर नहीं है। तू बॉस की सेक्रेटरी है।”

 

वेदा ने एक गहरी साँस ली और धीरे से बोली, “चल… एक बार कोशिश करके देख लेते हैं। अगर किस्मत ने साथ दिया तो शायद…” 

 

अपर्णा तुरंत उठ खड़ी हुई। “बस यही हुई ना मेरी शेरनी वाली बात। चल, अब देर मत कर।” 

 

दोनों अस्पताल से बाहर निकल आईं।

 

——–

 

वहीं दूसरी तरफ अग्नि सिंह राजावत अपनी आलीशान और लग्जरी केबिन में अपनी लेदर की चेयर पर बैठा हुआ था।

उसकी नजर सामने टेबल पर रखी फाइल पर टिकी थी। 

 

तभी उसके केबिन का डोर नॉक हुआ।

और अगले ही पल दरवाजा खुला और अंदर अग्नि का मैनेजर निशांत आया।

 

उसके हाथ में एक फाइल थी जिसपर उसे अग्नि के अर्जेंट साइन चाहिए थे।

 

“ सर इस फाइल पर आपके साइन चाहिए।” उसने अग्नि के सामने फाइल रखते हुए कहा।

 

अग्नि ने फाइल पढ़ी और उसपर अपने साइन कर दिए फिर जैसे ही निशांत जाने लगा, 

“ वेदा को बोलो मेरे केबिन में आए।”

अग्नि ने कहा।

 

(असल में वेदा, अग्नि की कम्पनी में ही जॉब करती है और उसकी ही सेक्रेटरी है।)

 

ये सुनते ही निशांत के चेहरे पर हल्की सी घबराहट आ गई। क्योंकि उसे पता था कि वेदा आज अभी तक ऑफिस नहीं आई और उसने इसका रीजन भी कुछ नहीं बताया।

 

निशांत के चेहरे पर आई घबराहट अग्नि की तेज़ नज़रों से छिप नहीं सकी।

अग्नि ने फाइल से नज़र उठाकर उसकी तरफ देखा। “क्या हुआ?”

 

निशांत, “स… सर… वो…”

 

“Speak.” उसने सख्त लहजे में कहा।

 

निशांत बोला, “सर, मिस वेदा आज अभी तक ऑफिस नहीं आई हैं।”

यह सुनते ही अग्नि का चेहरा और सख्त हो गया।

 

“ What…! Nonsense…” उसने तेज आवाज में कहा। “ दोपहर के बारह बजने को आए हैं और तुम मुझे ये अभी बता रहे हो कि वो ऑफिस नहीं आई।”

 

“ सर मुझे लगा आपको पता होगा क्योंकि वो सुबह सबसे पहले आकर आपको ही रिपोर्टिंग करती है।” निशांत ने कहा।

 

उसकी बात सुनकर अग्नि को एहसास हुआ कि निशांत सही कह रहा है। वेदा उसकी सेक्रेटरी है और वो सुबह से उसके पास एक बार भी नहीं आई। तभी उसे महसूस हुआ कि सुबह से उसके केबिन में असामान्य-सी खामोशी थी। उसकी रोज़ की ब्रीफिंग भी नहीं हुई थी।

 

उसने दो फिंगर उठाकर निशांत को जाने का इशारा किया। निशांत तुरंत ही केबिन से बाहर चला गया। 

 

वहीं अग्नि सोचने लगा कि आखिर ऐसा क्या हुआ जो वेदा ऑफिस नहीं आई और उसने किसी को इनफॉर्म भी नहीं किया।

 

वो सोच ही रहा था तभी बिना किसी सूचना के उसके केबिन का डोर खुला।

अग्नि की आंखों में ये देख गुस्सा उतरा ही था तभी उसकी नजर सामने गई जहाँ उसका बचपन का दोस्त शुभम खन्ना खड़ा हुआ था। 

 

उसे देख अग्नि ने अपनी आँखें बंद कर ली जैसे अपना गुस्सा शांत करने की कोशिश कर रहा हो।

 

शुभम, “ क्या यार ऐसी सड़ी सी शक्ल बनाकर क्यों बैठा हुआ है?”

उसने कुर्सी खींचते हुए कहा। और फिर पूरे एटिट्यूड के साथ बैठ गया।

 

अग्नि ने अपनी नीली आंखों से उसे खा जाने वाली नजरों से देखा और बोला, “ तुझे कोई काम वाम नहीं है क्या ? जो यहाँ टाइम पास करने चला आया।”

 

शुभम ने आराम से कुर्सी पर पैर चढ़ाते हुए कहा, “काम ही तो है, तभी आया हूँ। वरना तेरी शक्ल देखने का शौक मुझे भी नहीं है।”

 

अग्नि ने भौंहें चढ़ाईं। “जो कहना है, जल्दी बोल। मेरे पास फालतू बातों के लिए वक्त नहीं है।”

 

“अरे बाबा… इतना गुस्सा किस बात का? सुबह-सुबह किसने तेरे कॉफी मग में ज़हर मिला दिया?”

 

अग्नि ने उसे घूरा। “शुभम…”

 

“ओके… ओके…” शुभम ने दोनों हाथ ऊपर कर दिए। “सीरियस हो जाता हूँ।”

 

उसने कुछ पल तक अग्नि को गौर से देखा। फिर बोला,

“अब बता भी दे… बात क्या है? तेरे चेहरे पर साफ़ लिखा है कि अंदर कुछ चल रहा है।”

 

अग्नि अपनी कुर्सी से उठकर केबिन की काँच की दीवार के सामने जाकर खड़ा हो गया। नीचे भागती हुई मुंबई की सड़कें दिखाई दे रही थीं, लेकिन उसकी नज़र कहीं और ही खोई हुई थी।

 

कुछ पल की खामोशी के बाद उसने धीमे स्वर में कहा,

 “आज शाम दादाजी ने मुझे राजावत मेंशन बुलाया है।”

 

शुभम ने सहज भाव से पूछा, “कोई खास बात?”

 

अग्नि हल्का-सा हँसा, लेकिन उस हँसी में व्यंग्य था। “खास… बहुत खास।”

 

“मुझे पूरा यकीन है कि आज फिर वही पुराना मुद्दा उठेगा…”

 

“शादी।”

 

शुभम ने गहरी साँस छोड़ी। उसे पहले से अंदाज़ा था कि बात आखिर इसी तरफ जाएगी। “तो इस बार क्या सोच रखा है?”

 

अग्नि की आँखों में ठंडक उतर आई। “जो भी होगा… मेरी शर्तों पर होगा।”

 

उसने मुड़कर शुभम की तरफ देखा। “मैं किसी रिश्ते में बंधने नहीं जा रहा…”

“अगर शादी करनी भी पड़ी… तो सिर्फ़ एक समझौता होगी, उससे ज़्यादा कुछ नहीं।”

 

शुभम ने महसूस किया कि अग्नि के मन में शादी के लिए नफरत पहले से भी गहरी हो चुकी थी।

 

उसने बात आगे नहीं बढ़ाई। उसे पता था…

 

अग्नि जब तक खुद न चाहे, उसके दिल की दीवारें कोई नहीं तोड़ सकता।

 

क्रमशः 

 

अगर आपको मेरी कहानी पसंद आ रही है तो लाइक जरूर करें।

और मैं यहां नई हूँ, इसलिए मुझे यहाँ का थोड़ा समझने में प्रॉब्लम हो रही है और कमेंट सेक्शन भी नहीं दिखा 

अगर हो तो कमेंट भी जरूर कीजिएगा।

धन्यवाद 🙏🏻

 

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Neha Goyal

मेरा नाम नेहा गोयल है। और पिछले दो वर्ष से मैं प्रतिलिपि पर कहानियां लिखती आ रही हूँ। मुझे लेखन करते हुए बहुत ही अच्छा लगता है। वैसे मुझे लिखने से पढ़ना ज्यादा पसंद है।

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