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दोस्ती बेमिसाल

पढ़ने का समय : 6 मिनट

दोस्ती का सबसे बड़ा तोहफ़ा

 

एक छोटे से शहर में दो दोस्त रहते थे आरव और मोहन।

 

दोनों की दोस्ती पूरे शहर में मिसाल थी। लेकिन उनकी ज़िंदगी एक-दूसरे से बिल्कुल अलग थी।

 

आरव शहर के सबसे बड़े उद्योगपति का इकलौता बेटा था। उसके पास बड़ा बंगला, महंगी गाड़ियाँ, नौकर-चाकर और हर सुख-सुविधा थी। दूसरी ओर मोहन एक बेहद गरीब परिवार से था। उसके पिता दिहाड़ी मजदूर थे और माँ लोगों के घरों में काम करती थीं। कई बार तो उनके घर में दो वक्त का खाना भी मुश्किल से बन पाता था।

 

लेकिन इन दोनों दोस्तों के बीच अमीरी और गरीबी की दीवार कभी नहीं आई।

 

बचपन से दोनों साथ स्कूल जाते, साथ खेलते और साथ ही सपने देखते थे। अगर आरव के टिफिन में पनीर की सब्ज़ी होती और मोहन के पास सिर्फ सूखी रोटी, तो दोनों आधा-आधा बाँटकर खाते।

 

स्कूल के बच्चे अक्सर मोहन का मज़ाक उड़ाते।

 

“देखो, करोड़पति का दोस्त फटे कपड़ों में आया है।”

 

लेकिन हर बार आरव उनके सामने खड़ा हो जाता।

 

“अगर मेरे दोस्त का मज़ाक उड़ाया, तो समझ लेना मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।”

 

मोहन हमेशा मुस्कुराकर कहता,

“यार, तू इतना क्यों लड़ता है?”

 

आरव हँसकर जवाब देता,

“दोस्ती निभाने के लिए लड़ना भी पड़ता है।”

 

समय बीतता गया।

 

स्कूल खत्म हुआ। आरव अपने पिता का कारोबार संभालने लगा, जबकि मोहन पढ़ाई छोड़कर मजदूरी करने लगा ताकि अपने बूढ़े माँ-बाप का सहारा बन सके।

 

अब उनकी मुलाकातें कम होने लगीं, लेकिन दिलों की दूरी कभी नहीं बढ़ी।

 

हर रविवार दोनों किसी चाय की दुकान पर बैठकर घंटों बातें करते।

 

एक दिन अचानक सब कुछ बदल गया।

 

आरव कई दिनों से थकान महसूस कर रहा था। उसका शरीर सूजने लगा था। परिवार उसे बड़े अस्पताल ले गया।

 

जाँच हुई।

 

रिपोर्ट देखकर डॉक्टर गंभीर हो गए।

 

“हमें अफसोस है… आपकी दोनों किडनियाँ लगभग काम करना बंद कर चुकी हैं। इन्हें तुरंत किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत होगी।”

 

यह सुनते ही पूरे परिवार के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

 

आरव की माँ रोने लगीं।

 

पिता ने तुरंत रिश्तेदारों से संपर्क किया।

 

एक-एक करके सभी की जाँच हुई।

 

लेकिन किसी का ब्लड ग्रुप नहीं मिला, कोई डर गया, किसी ने साफ़ मना कर दिया।

 

जिन लोगों के लिए आरव के पिता ने लाखों रुपये खर्च किए थे, वही लोग अब बहाने बनाकर दूर हो गए।

 

दिन बीतते जा रहे थे।

 

आरव की हालत बिगड़ती जा रही थी।

 

उसे हफ्ते में कई बार डायलिसिस करवाना पड़ता था।

 

एक रात उसकी माँ अस्पताल के बाहर बैठकर रो रही थीं।

 

उन्हें अचानक मोहन का ख्याल आया।

 

उन्होंने किसी को बताए बिना अगले दिन मोहन के छोटे से घर का दरवाज़ा खटखटाया।

 

मोहन ने दरवाज़ा खोला तो सामने आरव की माँ को देखकर घबरा गया।

 

“आंटी… आप यहाँ?”

 

उन्होंने अंदर आकर चारों तरफ देखा। टूटी चारपाई, मिट्टी का चूल्हा और साधारण-सा घर।

 

उनकी आँखों से आँसू बह निकले।

 

मोहन ने पानी दिया।

 

“सब ठीक है ना?”

 

कुछ पल चुप रहने के बाद उन्होंने काँपती आवाज़ में कहा,

 

“बेटा… मैं आज एक माँ बनकर नहीं, अपने बेटे की दोस्ती का वास्ता लेकर आई हूँ।”

 

मोहन समझ नहीं पाया।

 

उन्होंने रोते हुए सारी बात बता दी।

 

“आरव की दोनों किडनियाँ जवाब दे चुकी हैं… कोई भी उसे किडनी देने को तैयार नहीं है। डॉक्टर ने कहा है कि अगर जल्दी ट्रांसप्लांट नहीं हुआ तो…”

 

उनकी आवाज़ भर्रा गई।

 

कुछ देर बाद उन्होंने काँपते हाथ जोड़ दिए।

 

“बेटा… अगर तुम्हारा ब्लड ग्रुप मिल जाए… तो क्या… क्या तुम अपने दोस्त के लिए एक किडनी दे दोगे?”

 

यह सुनकर मोहन कुछ पल बिल्कुल शांत खड़ा रहा।

 

उसने बिना एक पल सोचे कहा,

 

“आंटी… आपने माँगने में देर कर दी। अगर मेरे दोस्त की जान बच सकती है, तो मेरी एक नहीं, दोनों किडनियाँ भी उसकी हैं।”

 

आंटी रो पड़ीं।

 

“नहीं बेटा… मुझे सिर्फ एक चाहिए।”

 

मोहन मुस्कुराया।

 

“दोस्ती में हिसाब नहीं होता।”

 

अगले ही दिन चुपचाप उसकी जाँच हुई।

 

रिपोर्ट आई।

 

ब्लड ग्रुप भी मिला और सभी मेडिकल परीक्षण भी सफल रहे।

 

डॉक्टर खुश हो गए।

 

लेकिन मोहन ने एक शर्त रखी।

 

“आरव को पता नहीं चलना चाहिए कि किडनी किसने दी है। अगर उसे पता चला तो वह कभी नहीं मानेगा।”

 

परिवार ने उसकी बात मान ली।

 

कुछ दिनों बाद ऑपरेशन हुआ।

 

घंटों तक चले इस ऑपरेशन के बाद डॉक्टर बाहर आए और मुस्कुराकर बोले,

 

“ऑपरेशन सफल रहा। अब दोनों खतरे से बाहर हैं।”

 

पूरा परिवार खुशी से रो पड़ा।

 

कुछ हफ्तों बाद आरव धीरे-धीरे ठीक होने लगा।

 

लेकिन उसके मन में हमेशा एक सवाल रहता।

 

“आख़िर वह कौन था जिसने मुझे नई ज़िंदगी दी?”

 

हर बार डॉक्टर यही कहते,

 

“जिसने दान किया, उसने अपना नाम गुप्त रखने की इच्छा जताई है।”

 

एक दिन अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद आरव अपने दोस्त मोहन से मिलने उसके घर पहुँचा।

 

मोहन पहले की तरह मुस्कुराकर मिला, लेकिन अब वह पहले से थोड़ा कमजोर लग रहा था।

 

आरव ने पूछा,

 

“तू इतना कमजोर क्यों हो गया?”

 

मोहन हँस पड़ा।

 

“अरे, बस काम ज्यादा कर लिया।”

 

तभी मोहन की माँ से यह राज छिप न सका।

 

उन्होंने भावुक होकर सब सच बता दिया।

 

“बेटा… जिसने तुझे नई ज़िंदगी दी है… वो कोई और नहीं, मोहन है।”

 

यह सुनते ही आरव जैसे पत्थर का हो गया।

 

उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

 

वह दौड़कर मोहन के गले लग गया।

 

“पागल… तूने मुझे बताया क्यों नहीं?”

 

मोहन मुस्कुराया।

 

“अगर बता देता तो तू कभी मानता ही नहीं।”

 

आरव फूट-फूटकर रो पड़ा।

 

“मैं तेरे इस एहसान का कर्ज़ कभी नहीं चुका सकता।”

 

मोहन ने उसके आँसू पोंछे।

 

“दोस्ती में एहसान नहीं होते। अगर आज मेरी जगह तू होता, तो क्या तू मना कर देता?”

 

आरव ने बिना सोचे सिर हिला दिया।

 

“कभी नहीं।”

 

दोनों दोस्त गले लगकर देर तक रोते रहे।

 

कुछ महीनों बाद जब आरव पूरी तरह स्वस्थ हो गया, तब उसने पूरे परिवार को बुलाया।

 

वहाँ मोहन और उसके माता-पिता भी मौजूद थे।

 

सबके सामने आरव ने एक फाइल मोहन के हाथ में रखी।

 

मोहन ने खोला तो उसके हाथ काँप गए।

 

वह संपत्ति के कागज़ थे।

 

आरव मुस्कुराकर बोला,

 

“जिस दोस्त ने मुझे अपनी ज़िंदगी का हिस्सा दिया, उसके बिना मेरी दौलत भी अधूरी है।”

 

मोहन ने तुरंत मना किया।

 

“मुझे कुछ नहीं चाहिए।”

आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“यह कोई कीमत नहीं है… यह उस रिश्ते की इज़्ज़त है जिसने मुझे दूसरी ज़िंदगी दी है।”

मोहन की आँखें भर आईं।

उसने फाइल सीने से लगा ली, लेकिन उसके लिए सबसे बड़ी दौलत आज भी वही दोस्ती थी जो बचपन में आधी रोटी बाँटने से शुरू हुई थी।

 

उस दिन आरव ने अपनी आधी जायदाद अपने गरीब दोस्त मोहन के नाम कर दी।

 

कहते हैं, पैसा इंसान को अमीर बना सकता है, लेकिन सच्ची दोस्ती इंसान को सबसे बड़ा ख़ज़ाना दे देती है। जिस दोस्ती में न अमीरी दिखाई दे, न गरीबी, बल्कि सिर्फ़ अपनापन और त्याग हो वही दोस्ती दुनिया की सबसे अनमोल दौलत होती है।

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