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बुढ़ापे की तन्हाई

पढ़ने का समय : 6 मिनट

“बेटा, खाना खा लिया?”

 

फ़ोन पर हर रोज़ यही पहला सवाल होता था। दूसरी तरफ़ से हमेशा वही छोटा-सा जवाब आता—

 

“हाँ माँ… अभी मीटिंग में हूँ, बाद में बात करता हूँ।”

 

और कॉल कट जाती।

 

शांति देवी कुछ पल तक मोबाइल की बुझी हुई स्क्रीन देखती रहतीं। फिर मुस्कुराने की कोशिश करतीं और धीरे से कहतीं, “चलो… कम से कम आवाज़ तो सुन ली।”

 

पास ही चारपाई पर बैठे उनके पति रामस्वरूप सब समझ जाते, लेकिन कुछ कहते नहीं।

 

 

कई साल पहले यही घर हँसी से गूंजा करता था।

 

शादी के बाद जब शांति इस घर में आई थीं, तब घर में कुछ भी नहीं था। मिट्टी का छोटा-सा मकान, टपकती छत और दो वक्त की रोटी का भी भरोसा नहीं।

 

रामस्वरूप सुबह सूरज निकलने से पहले खेतों में चले जाते और रात को थके हुए लौटते। शांति पूरे दिन घर संभालतीं, गाय का दूध निकालतीं, चूल्हा जलातीं और हर मुश्किल में अपने पति का साथ देतीं।

 

धीरे-धीरे दिन बदले।

 

भगवान ने उन्हें दो बेटे और एक बेटी का सुख दिया।

 

उनकी दुनिया अब बच्चों में बस गई।

 

खुद फटे कपड़े पहन लेते, लेकिन बच्चों के लिए नए कपड़े ज़रूर लाते।

 

खुद भूखे सो जाते, लेकिन बच्चों की थाली कभी खाली नहीं रहने देते।

 

बरसात की रातों में जब छत टपकती थी, तो दोनों पति-पत्नी पूरी रात जागकर बच्चों के बिस्तर इधर-उधर करते रहते, ताकि उनके ऊपर पानी की एक बूंद भी न गिरे।

 

उन्हें लगता था…

 

“हमारी ज़िंदगी चाहे जैसी रही हो, लेकिन हमारे बच्चों की ज़िंदगी हमसे बेहतर होगी।”

 

बस इसी उम्मीद में दोनों ने पूरी जवानी खपा दी।

 

 

समय बीतता गया।

 

बच्चे पढ़-लिखकर बड़े हो गए।

 

बेटी की शादी बड़े प्यार से कर दी।

 

दोनों बेटों को शहर में पढ़ाया। इसके लिए शांति ने अपने शादी के समय मिले सारे गहने बेच दिए।

 

रामस्वरूप ने पुश्तैनी खेत का एक हिस्सा तक बेच दिया।

 

जब लोगों ने पूछा, “बुढ़ापे का सहारा भी बेच दिया?”

 

तो रामस्वरूप मुस्कुराकर बोले—

 

“हमारा असली सहारा खेत नहीं… हमारे बच्चे हैं।”

 

उन्हें क्या पता था कि यही बात एक दिन उनकी सबसे बड़ी भूल बन जाएगी।

 

दोनों बेटों को अच्छी नौकरी मिल गई।

एक दिल्ली चला गया।

 

दूसरा मुंबई।

 

शुरुआत में हर हफ्ते फ़ोन आता था।

फिर महीने में।

फिर त्योहारों पर।

 

और धीरे-धीरे… वह भी बंद होने लगा।

शांति हर सुबह दरवाज़े की ओर देखतीं।

शायद आज कोई आ जाए…

 

रामस्वरूप रोज़ शाम को घर के बाहर वाली टूटी कुर्सी पर बैठ जाते।

 

हर बार सड़क पर आती गाड़ी देखकर उनकी आँखें चमक उठतीं।

लेकिन गाड़ी किसी और के घर चली जाती।

 

फिर वे चुपचाप अंदर लौट आते।

 

एक दिन शांति बोलीं—”सुनिए… इस बार दिवाली पर बच्चे ज़रूर आएँगे ना?”

 

रामस्वरूप ने मुस्कुराकर कहा—

“हाँ… क्यों नहीं आएँगे? आखिर अपना घर है।”

 

दोनों ने पूरे घर की सफाई की।

बेटों की पसंद की मिठाइयाँ बनाईं।

 

उनके पुराने कमरे सजाए।

 

दिवाली आ गई…

रात हो गई…

लेकिन दरवाज़ा नहीं खुला।

 

बस एक संदेश आया “इस बार छुट्टी नहीं मिली… अगली बार ज़रूर आएँगे।”

 

शांति ने मोबाइल सीने से लगा लिया।

आँखों से आँसू बह निकले।

 

लेकिन फिर भी बोलीं—

“कोई बात नहीं… काम भी तो ज़रूरी है।”

 

रामस्वरूप ने पहली बार अपना चेहरा दूसरी तरफ़ कर लिया, ताकि पत्नी उनके आँसू न देख सके।

 

अब दोनों की उम्र ढल चुकी थी।

 

चलना भी मुश्किल हो गया था।

 

रामस्वरूप की आँखों से कम दिखाई देता था।

 

शांति के घुटने जवाब दे चुके थे।

 

फिर भी दोनों एक-दूसरे का सहारा बने हुए थे।

 

अगर शांति गिर जातीं, तो रामस्वरूप काँपते हाथों से उन्हें उठाते।

 

अगर रामस्वरूप की तबीयत खराब होती, तो शांति पूरी रात उनके सिरहाने बैठी रहतीं।

दोनों जानते थे…

अब उनके पास एक-दूसरे के अलावा कोई नहीं बचा।

एक रात बिजली चली गई।

 

घर में घुप्प अँधेरा था।

शांति ने धीमे से पूछा—

“अगर मैं तुमसे पहले चली गई… तो तुम अकेले कैसे रहोगे?”

रामस्वरूप की आँखें भर आईं।

 

उन्होंने काँपते हाथों से पत्नी का हाथ पकड़ लिया और बोले—

“मैं तो आज भी तुम्हारे बिना एक पल नहीं रह सकता… अकेले कैसे जिऊँगा?”

 

दोनों देर तक चुप रहे।

 

उस रात दोनों की आँखों से नींद नहीं… आँसू बहते रहे।

कुछ महीनों बाद रामस्वरूप की तबीयत अचानक बिगड़ गई।

शांति ने बार-बार बेटों को फ़ोन किया।

 

एक ने कहा “माँ, अभी ऑफिस में हूँ।”

दूसरे ने कहा “दो दिन बाद आता हूँ।”

 

लेकिन उन दो दिनों का इंतज़ार रामस्वरूप नहीं कर सके।

 

उन्होंने शांति का हाथ कसकर पकड़ा…

 

एक आख़िरी बार घर की ओर देखा…

 

और हमेशा के लिए आँखें बंद कर लीं।

 

शांति फूट-फूटकर रोती रहीं।

 

जिस इंसान के साथ पूरी ज़िंदगी बिताई, वही उन्हें बीच रास्ते में अकेला छोड़ गया।

बेटे अगले दिन पहुँचे।

पिता की चिता जल चुकी थी।

 

उन्होंने माँ से कहा—

“चलो माँ, हमारे साथ शहर चलो।”

 

शांति ने पूरे घर को देखा।

वही आँगन…

वही नीम का पेड़…

वही चारपाई…

 

जहाँ उन्होंने पूरी ज़िंदगी अपने पति के साथ बिताई थी।

 

उन्होंने धीमे से कहा—

“जिस घर में तुम्हारे पिता की यादें साँस लेती हों… उसे छोड़कर मैं कहाँ जाऊँ?”

 

बेटे दो दिन बाद वापस लौट गए।

 

माँ फिर अकेली रह गई।

अब हर सुबह शांति दो कप चाय बनातीं।

एक खुद पीतीं…

 

दूसरा कप रामस्वरूप की तस्वीर के सामने रख देतीं।

हर शाम दरवाज़े की ओर देखतीं।

 

शायद आज बच्चे आ जाएँ…

लेकिन दरवाज़ा नहीं खुलता।

एक दिन पड़ोस की औरत उन्हें बुलाने आई।

बहुत आवाज़ दी…

कोई जवाब नहीं मिला।

जब अंदर गई तो देखा शांति अपने पति की तस्वीर को सीने से लगाए मुस्कुरा रही थीं।

लेकिन इस बार उनकी साँसें रुक चुकी थीं।

शायद…

उन्हें आखिरकार अपने जीवनसाथी का साथ मिल गया था।

उस दिन दोनों बेटे बहुत रोए।

लेकिन अब पछताने से क्या होता?

जिन माँ-बाप ने अपनी पूरी जवानी बच्चों के भविष्य पर लुटा दी…

उनके बुढ़ापे में बच्चों के पास उनके लिए दो पल भी नहीं थे।

याद रखिए…

बचपन में माँ-बाप हमारी उँगली पकड़कर चलना सिखाते हैं।

बुढ़ापे में उन्हें सिर्फ़ हमारी उँगली का सहारा चाहिए होता है।

जिस दिन हम यह सहारा छीन लेते हैं, उसी दिन उनका घर नहीं… उनका दिल सूना हो जाता है।

क्योंकि दुनिया की सबसे बड़ी गरीबी पैसे की नहीं होती…

सबसे बड़ी गरीबी बुढ़ापे की तन्हाई होती है।

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