भाग~13 अफवाहों के घेरे में
शहर के सबसे बड़े सभागार की रोशनी आज अद्वैत के लिए खास थी। मखमली पर्दे धीमे-धीमे फड़फड़ा रहे थे, जैसे वे भी इस सुबह की थमी हुई बेचैनी को समझ रहे हों। अद्वैत मंच के ठीक बीच, विशिष्ट अतिथियों के लिए रखी गई भव्य, ऊँची पीठ वाली कुर्सी पर बैठा था, जिस पर बैठते ही किसी के भी भीतर एक छलावा सा आत्मगौरव जाग सकता था।
चारों तरफ तालियों की गूंज थी, हर मुस्कान में आदर था, हर आँख में चमक। लेखक अद्वैत अवस्थी… शब्दों का जादूगर, दिलों को छूने वाला… आज उस ऊँचाई पर था, जहाँ पहुँचने का सपना हर कलाकार देखता है।
लेकिन अद्वैत के भीतर कुछ टूट रहा था। उसके भीतर एक ऐसा शोर था जिसे कोई सुन नहीं सकता था।
जब वह तड़के ही अपने घर से निकला था, तभी से उसे कुछ अच्छा नहीं लग रहा था। मन अजीब सा घुटा-घुटा था, जैसे कोई अनकही आशंका दिल में घर बना रही हो। गाड़ी की खिड़की से बाहर बहती हवा भी आज उसे बोझिल सी लगी थी। हरियाली, सड़कें, आसमान…. सब कुछ उसे अपने से दूर-दूर सा लग रहा था। उसके भीतर एक अजीब सी वीरानी थी।
सभागार के चमचमाते लाइटों के नीचे, वह तन से तो बैठा था, मुस्कुरा भी रहा था, मगर आत्मा कहीं भटक रही थी। भीड़ की तारीफों में डूबती-उतराती उसकी पहचान भी आज उसे बोझ जैसी लग रही थी।
एक हिस्सा जैसे लगातार पूछ रहा था… क्या यही था जिसकी तलाश थी?
क्या यही संतोष था जिसकी कल्पना की थी?
किसी ने माइक पर उसका नाम पुकारा, बधाइयों के साथ। वह जैसे किसी नींद से जगा हो, धीरे से मुस्कुराया और आगे बढ़ा। कदम भारी थे, मुस्कान में बनावटी चमक थी।
स्टेज पर पहुँचकर उसने माइक थामा।
हॉल में एक गहरी ख़ामोशी छा गई। लोग उसकी अगली कहानी, उसकी अगली सीख, उसके शब्दों की गर्माहट को सुनने के लिए तत्पर थे। मगर अद्वैत के गले में जैसे कांटे उग आए थे। शब्द, जो कभी उसकी आत्मा से बहते थे, आज गले में अटके हुए थे।
“मैं…,” उसने कहना शुरू किया, फिर पल भर को रुका।
वह लोगों के चेहरों को देख रहा था। वहाँ केवल प्रशंसा थी, अपेक्षाएँ थीं, और कहीं भी उसे नहीं दिखा वह सुकून, जो शायद उसकी आत्मा मांग रही थी।
उसे अपनी पत्नी की याद आई — वो जो इतनी जल्दी उससे बिछड़ गई थी। उसकी वो मुस्कुराहटें, उसके अधूरे वादे, उनका अधूरा सपना — सब एक साथ आँखों के सामने छा गया।
और फिर… अचानक….. घर में एक बेहोश पड़ी लड़की की तस्वीर भी दिमाग के किसी कोने से उभर आई — रूहानी। वो अजनबी लड़की जो अब उसके घर की वीरानी में साँस ले रही थी। जिसे उसने बिना सोचे समझे बचा तो लिया था, पर अब उसके होने से घर में अजीब सी गूँज फैल गई थी।
शायद रूहानी के टूटे हुए टुकड़े, अद्वैत के अपने बिखरे टुकड़ों से टकरा रहे थे। शायद इसलिए दिल में ये बेचैनी थी, ये घुटन थी।
“शब्दों से दुनिया को छूना आसान है,” उसने अचानक बोलना शुरू किया, “लेकिन अपने भीतर के सन्नाटे को छूना सबसे मुश्किल।”
लोगों ने सोचा यह कोई गहरी भूमिका है, कोई नया विचार। पर अद्वैत जानता था, ये उसकी आत्मा की चीख थी, जो शब्द बनकर बाहर आ रही थी। उसकी आँखें चमक रही थीं, लेकिन वह चमक नम थी। उसने मुस्कुराने की कोशिश की, मगर होठों पर सिर्फ़ एक थकी हुई रेखा खिंच पाई।
माइक रखते हुए वह जानता था, यह तालियाँ, ये हॉल, ये चमकती बत्तियाँ — सब कुछ उसकी सच्चाई से कोसों दूर हैं। आज भी वह अकेला था….. शायद पहले से भी ज्यादा…….
शब्दों का सम्राट, दिलों का जादूगर — और फिर भी भीतर एक टूटा हुआ, बिखरा इंसान, जो बस किसी अपने की गर्माहट चाहता था लेकिन उस भीड़ में, उस सभागार में, उसे कोई अपना नहीं दिखा। केवल अजनबियों की गूँजती तालियाँ थीं, और एक थका हुआ दिल जो चुपचाप अपना बोझ ढो रहा था।
रौशनी से चमकते मंच के पीछे का कोना हलचल से भर गया था। कवि सम्मेलन के समापन के बाद रिपोर्टर और मीडिया वाले अपने अपने कैमरों और रिकॉर्डरों के साथ अद्वैत के चारों ओर इकट्ठा हो गए थे। उनके सवालों की बौछार शुरू हो चुकी थी। शुरू में बात लेखन और रचनाओं के आस-पास घूमती रही। किस कविता में कौन सी भावना, किस कहानी में कौन सा दर्द… अद्वैत संयमित मुस्कान के साथ जवाब देता रहा, जैसे वर्षों से इस तरह के सवालों का सामना करता आया हो।
लेकिन फिर अचानक सवालों की दिशा बदलने लगी। आवाजें तीखी हो गईं, नजरें चुभती हुई।
“आपकी लेखनी की प्रेरणा कौन है?” एक युवा रिपोर्टर ने पूछा, उत्सुकता से झुकते हुए।
अद्वैत ने अनायास ही बिना ज्यादा सोचे कहा, “मेरी पत्नी।”
उसके शब्दों में एक नर्म, गहरी थकान थी। वह मुस्कुराया भी नहीं, बस नजरें एक पल को झुक गईं, मानो कोई भूला-बिसरा चेहरा फिर से उसकी आँखों के सामने तैर गया हो।
लेकिन जैसे ही उसके शब्द हवा में घुले, एक और सवाल पीछे से आ गया, तीखा और बेरहम — “आपकी पत्नी तो एक साल पहले गुजर चुकी हैं, ना?”
अद्वैत का दिल एक पल को थम गया। कमरे की गर्माहट जैसे अचानक बर्फ में बदल गई।
वह कुछ कह पाता, उससे पहले ही कोई और बोल पड़ा, “या फिर वो लड़की, जिसके साथ आप इन दिनों अपने घर में रह रहे हैं, वही आपकी नई पत्नी हैं?”
यह सवाल नहीं था, यह एक वार था — सीधा दिल पर।
अद्वैत का चेहरा सफेद पड़ गया। पलकों के नीचे छुपी थकान अचानक खुल कर सामने आ गई। आँखों में जो धैर्य था, वह दरकने लगा।
भीतर एक बेचैन चुप्पी थी, जो चिल्ला रही थी, चीख रही थी, पर बाहर वह बस खड़ा था — गूंगा और अकेला।
रिपोर्टरों के कैमरों की फ्लैश लाइट्स उसके चेहरे पर चमकती रहीं। कोई जवाब न पाकर, वे और भी आक्रामक हो गए, उनके सवाल अब तीर बनकर आ रहे थे।
“कौन है वो लड़की?”
“क्या आपने फिर से शादी कर ली है?”
“क्या आप अपनी पत्नी की यादों को इतनी जल्दी भूल गए?”
अद्वैत ने गहरी साँस ली। गला सूख गया था, जैसे हर शब्द कहीं अंदर ही घुट कर मर गया हो।
उसने नजरें उठाई, सामने भीड़ थी…. उत्सुक, जिज्ञासु, और निर्मम। वहाँ कोई अपनापन नहीं था, कोई समझ नहीं थी, सिर्फ़ हड़पने की भूख थी, उसकी जिंदगी का कोई टुकड़ा, कोई सनसनी।
अद्वैत के चारों तरफ भीड़ का घेरा कसता जा रहा था। मंच के नीचे, चारों दिशाओं से कैमरे, माइक और सवाल उसकी ओर धकेले जा रहे थे। सभागार की भीतरी दीवारों पर फुसफुसाहटें गूंज रही थीं, जो धीरे-धीरे ऊँची आवाज़ों में बदलने लगी थीं। लोग उसे अब किसी और नजर से देखने लगे थे….. वही अद्वैत, जो शब्दों का जादूगर था, अब गंदी अफवाहों के घेरे में घिर गया था।
फिर अचानक मीडिया वालों ने दीवार पर प्रोजेक्टर चालू कर दिया। उजली दीवार पर एक तस्वीर उभरने लगी — एक पुल के किनारे की धुंधली शाम, जहाँ अद्वैत ने एक बेहोश लड़की को अपनी बाँहों में उठा रखा था। भीड़ सन्न रह गई। दूसरी तस्वीर में वह लड़की अद्वैत की कार में बैठी थी, और फिर उसके घर में दाखिल होती दिखाई दी।
सभागार में एक गहरी सरसराहट फैल गई। चुभती हुई निगाहें अद्वैत पर टिक गईं। सवाल अब और ज्यादा जहरीले हो चले थे।
“कौन है ये लड़की?”
“क्या ये आपकी नई प्रेमिका है?”
“कब से आपके घर में रह रही है?”
अद्वैत ने माइक थामा, उसकी आवाज अब भी वही मुलायम थी, लेकिन भीतर का दर्द उसके हर शब्द में रिस रहा था।
“मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ,” अद्वैत ने नज़रों में गहराई लाकर कहा, “जो कुछ भी आपने देखा, वह एक गलतफहमी है। वह लड़की मुश्किल में थी। अगर इंसानियत को बचाना गुनाह है, तो हाँ, मैंने गुनाह किया है।”
लेकिन मीडिया को सफाई नहीं चाहिए थी, उन्हें सनसनी चाहिए थी।
तालियों के बीच से, चुभती हुई फुसफुसाहटें उठती रहीं। भीड़ में अब जिज्ञासा नहीं, एक गहरी नफरत और गंदे मनोरंजन की भूख थी।
स्थिति बेकाबू होने लगी थी। अद्वैत का मैनेजर, जो पीछे से सब कुछ देख रहा था, तुरंत आगे बढ़ा और उसे भीड़ से बाहर निकालने का रास्ता बना दिया। दोनों बड़ी मुश्किल से भीड़ से बचते हुए कार तक पहुँचे।
कार के अंदर घुसते ही अद्वैत ने अपना सिर सीट से टिका दिया। उसकी आँखें बंद थीं, चेहरा थका और टूटा हुआ। सांसें भारी हो रही थीं, जैसे हर सांस अब एक बोझ थी।
मैनेजर ने ड्राइविंग सीट पर बैठते हुए गहरी सांस ली और फिर नरमी से कहा, “सर, इस हालात से एक ही रास्ता है बाहर निकलने का।”
अद्वैत ने आँखें खोलीं, नजरें सवालों से भरी हुई थीं।
“आपको और उस लड़की को शादीशुदा दिखाना पड़ेगा,” मैनेजर ने कहा।
अद्वैत का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। “क्या बकवास कर रहे हो तुम? मैं अपनी ज़िंदगी का तमाशा नहीं बनाऊंगा।”
मैनेजर ने संयम से बात आगे बढ़ाई, “सर, सुनिए। मैं असली शादी की बात नहीं कर रहा। पेपर पर शादी… “एक कॉन्ट्रैक्ट”। बस दिखावे के लिए। ताकि मीडिया शांत हो जाए, आपकी इमेज बर्बाद न हो।”
अद्वैत ने कार की खिड़की से बाहर देखा। अंधेरे में भागती लाइटों के बीच उसका दिल भी भाग रहा था, कहीं दूर, जहाँ उसे अपनी सच्चाई बचानी थी।
थोड़ी देर बाद उसने गहरी सांस लेते हुए कहा, “ठीक है। मैं आज ही घर जाकर उससे बात करूँगा।”
उसकी आवाज थकी हुई थी, लेकिन उसमें एक अजीब सी दृढ़ता भी थी। एक फैसला… भले ही मजबूरी में लिया गया हो, लेकिन अब उसे निभाना था।
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क्या अद्वैत सच में रूहानी को इस मजबूरी भरे सौदे में बाँध पाएगा?
क्या एक मजबूरी से शुरू हुआ समझौता, अद्वैत के दिल के जख्मों को और गहरा कर देगा?
या फिर रूहानी के अतीत का कोई ऐसा राज सामने आएगा, जो अद्वैत की आधी अधूरी दुनिया को और भी बिखेर देगा?

लिखकर रूह छूने की कोशिश…..
🥹🥹


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