भाग~7 “My Life” कौन?
रूहानी का मोबाइल टेबल पर वैसे ही पड़ा था, जैसे कोई चुपचाप बम घड़ी हो, जो किसी भी पल फट सकती है। अद्वैत अब भी फर्श पर बैठा था, फर्स्ट ऐड बॉक्स एक तरफ रखा हुआ, उसका ध्यान पूरी तरह रूहानी पर था। उसकी उंगलियाँ अभी तक हवा में ठहरी हुई थीं, जैसे वे अब भी दर्द से कराहते पाँव की ओर बढ़ना चाहती हों, लेकिन रूहानी के शब्दों ने रोक दिया था।
और तभी… मोबाइल की स्क्रीन पर हल्की रौशनी फूटी और उसमें एक नाम उभरा—“My Life”।
अद्वैत की नज़र उस स्क्रीन पर जा ठहरी।
उसके चेहरे की भाव-भंगिमा धीरे-धीरे बदलने लगी। उसकी आँखें थोड़ी सिकुड़ीं, जैसे कुछ गहराई में देखने की कोशिश कर रही हों। अभी तो रूहानी ने कहा था कि उसका इस दुनिया में कोई नहीं है, तो फिर ये “My Life” कौन था? कौन हो सकता था जिसकी पहचान रूहानी ने इतनी आत्मीयता से अपने फोन में दर्ज कर रखी थी?
एक खामोशी तैरने लगी, जो पल भर में भारी होने लगी।
रूहानी की नज़र भी मोबाइल की स्क्रीन पर पड़ी, और उसने बिजली की तरह झपट कर फोन उठा लिया। कॉल कट करते हुए उसने मोबाइल अपनी हथेलियों में छिपा लिया जैसे कोई बच्चा चोरी पकड़े जाने पर अपना खिलौना छुपा लेता है।
वो जानती थी, अद्वैत कुछ पूछ सकता है, उसकी निगाहों में अब भी सवाल थे, शक था, लेकिन उसे मौक़ा दिए बिना रूहानी जल्दी से बोल पड़ी—आवाज़ में एक तरह की बनावटी सहजता थी, पर भीतर कुछ काँप रहा था।
“तो फिक्स रहा ना, मैं कुछ दिनों के लिए यहाँ रह सकती हूँ ना?” उसने जल्दी से पूछा, जैसे किसी और दिशा में ध्यान मोड़ देना चाहती हो।
अद्वैत की चेतना उस फोन स्क्रीन पर अटक गई थी, लेकिन रूहानी की बात ने उसे उस विचार से बाहर खींच लिया।
“हाँ,” अद्वैत ने एक छोटे से विराम के बाद कहा, “यहाँ रसोई से लगा हुआ एक कमरा है, उसमें रह लेना। और खबरदार जो छत पर आने की कोशिश की तो।”
उसके स्वर में आदेश था, हल्की चेतावनी थी, और कहीं भीतर एक अदृश्य दीवार भी, जो उसने खुद के और रूहानी के बीच खड़ी कर दी थी। शायद वो नहीं चाहता था कि कोई उस छत तक पहुँचे—वो छत जहाँ कई अधूरी कहानियाँ छुपी थीं।
“वैसे,” अद्वैत ने अब अपना सिर थोड़ा झुकाया, जैसे ज़्यादा सहज होने की कोशिश कर रहा हो, “तुम किराया देने की बात कर रही थी ना, तो क्या करती हो तुम… मतलब क्या प्रोफेशन है तुम्हारा?”
रूहानी की आँखों में हल्की-सी चमक आ गई। ऐसा लगा जैसे उस प्रश्न ने उसकी पहचान को फिर से छू लिया हो, जैसे एक मुरझाए फूल को हल्की सी धूप मिल गई हो।
उसने हल्का मुस्कराते हुए कहा, “वो मैं… एक स्ट्रगलिंग ड्रेस डिज़ाइनर हूं।”
उसकी आवाज़ में हल्की थकान थी, लेकिन उसके शब्दों में उम्मीद का रंग था।
“फिलहाल तो मेरा काम ठप्प पड़ा हुआ है,” उसने थोड़ी सी सांस ली, “लेकिन मेरे कुछ सेविंग्स हैं, जिसमें से मैं तुम्हें किराया दे दूंगी। कोई दिक्कत नहीं होगी।”
वो जैसे खुद को साबित करना चाह रही थी। उसके लहज़े में विनम्रता थी, पर साथ ही एक आत्म-सम्मान भी।
फिर उसने अपने कंधे हल्के से उचकाए, जैसे वो खुद से कह रही हो, “मैं अभी पूरी टूटी नहीं हूँ, अभी कुछ बचा है मुझमें।”
अद्वैत ने उसकी ओर देखा, उसकी मुस्कान को, उसके टूटे आत्मबल के बीच से झाँकते उस गर्व को। कुछ पल के लिए वो अपनी ज़ुबान से कुछ न कह सका।
वो देख रहा था उस लड़की को, जो कुछ ही घंटे पहले मौत के किनारे खड़ी थी, और अब अपने हुनर, अपने संघर्ष पर मुस्कुरा रही थी।
उसके बाद अद्वैत ने अपने हाथ में झाड़ू और डस्टपैन थामा और सावधानी से फर्श पर बिखरे कांच के टुकड़ों को समेटना शुरू किया। हर टुकड़ा जो उसने उठाया, जैसे किसी बीती कहानी का एक टुकड़ा था—चुभता हुआ, चमकता हुआ, खामोश। कमरे में कुछ नहीं बोला जा रहा था, लेकिन हर हरकत में जैसे कई अधूरी आवाज़ें गूँज रही थीं। अद्वैत की उंगलियाँ नुकीले कांच से बचती हुई फुर्ती से चल रही थीं, लेकिन उसका ध्यान अब भी रूहानी पर था, जो अब तक सोफे पर स्थिर बैठी थी।
रूहानी की साँसें थोड़ी तेज थीं, दर्द तो था, मगर उससे ज़्यादा कुछ और… कोई अंदरूनी हलचल, जो उस लम्हे से बाहर निकलने ही नहीं दे रही थी।
जब आखिरी टुकड़ा भी डस्टबिन में गिरा, तो अद्वैत वापस रूहानी के पास आया। उसका चेहरा पहले से कुछ शांत था, जैसे उसने खुद से एक लंबी बहस के बाद कोई निर्णय लिया हो। उसने अपना दायाँ हाथ उसकी ओर बढ़ाते हुए सहज स्वर में कहा, “चलो, खाना खाने।”
रूहानी ने उसकी तरफ देखा। कुछ पल के लिए उसकी आँखें उस हाथ को निहारती रहीं, जैसे किसी अजनबी की पेशकश को परख रही हों। फिर उसने धीरे से अपनी पलकों को कुछ बार झपकाया—धीरे, थमे हुए क्षण में जैसे आँखें कुछ भीगती हुई कहानियाँ पोंछ रही हों। उसके चेहरे पर अब भी दर्द था, मगर वह अद्वैत का हाथ पकड़कर, एक पैर के सहारे, खुद को खींचती हुई उठी और उसके सहारे डाइनिंग टेबल तक पहुँची।
अद्वैत ने उसे हाथ से थामे रखा, लेकिन उसने कहीं भी उसे छूने की कोशिश नहीं की। उसने रूहानी को सहारा दिया, बिना कोई अनचाहा बोझ बनें। इस दूरी में एक अनकही नज़दीकी थी, जैसे दोनों एक ही पुल पर चल रहे हों, बस अलग-अलग किनारों पर।
डाइनिंग टेबल के पास पहुँचकर अद्वैत ने कुर्सी खींची और रूहानी को बैठने में मदद की। फिर चुपचाप फ्रिज की ओर बढ़ गया, जैसे वह अपनी भावनाओं को भी वहीं किसी ठंडे कोने में रख आया हो। उसने दो प्लेटें निकालीं, माइक्रोवेव में खाना गर्म किया और फिर दोनों के सामने सादगी से परोस दिया।
रूहानी चुपचाप उसे देखती रही, उसके हर हावभाव को जैसे किसी पुरानी किताब के पन्नों की तरह पढ़ती रही। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि यही व्यक्ति कुछ घंटे पहले कितना खड़ूस और तटस्थ लग रहा था।
खाना परोसा गया और दोनों चुपचाप खाने लगे।
सन्नाटा कमरे की हवा में घुला था, जैसे हर दीवार उसे महसूस कर रही हो। रूहानी को यह खामोशी खलने लगी। वह जो आम तौर पर चुलबुली, बातूनी थी, अब खुद को किसी साए में दबा हुआ महसूस कर रही थी।
उसने एक कौर मुँह में डालते हुए धीरे से पूछा, “तुम्हें लेखक बनने का बुखार कब चढ़ा था?”
अद्वैत ने बिना सिर उठाए पहले एक पल रुक कर कौर चबाया, फिर हल्की भौंहें चढ़ाकर उसकी तरफ देखा। आँखें थोड़ी छोटी हो गईं, जैसे बात को समझने की कोशिश कर रहा हो या शायद अंदाज़ा लगाने की, कि यह सवाल मज़ाक में था या जिज्ञासा में।
रूहानी ने अपनी बात स्पष्ट की, “मीना बता रही थी कि तुम एक प्रसिद्ध लेखक हो।“
अब अद्वैत का चेहरा थोड़ा सहज हुआ, जैसे उसे अपनी किसी छुपी हुई पहचान को अब स्वीकारना पड़ रहा हो।
“दूसरी बात यह है कि मैं बहुत छोटे से ही लिखता आ रहा हूँ,” उसने शांत स्वर में कहा।
“वो….अच्छा…” रूहानी ने हौले से सिर हिलाया। लेकिन तभी उसके दिमाग में एक बात कौंधी। उसने तुरंत पूछ लिया, “तो फिर पहली बात क्या है?”
अद्वैत ने एकदम से कौर मुँह में डालते हुए कड़क स्वर में कहा, “पहली बात ये है कि खाते हुए बातें करना मुझे पसंद नहीं।”
रूहानी के होंठ थोड़ा से सिकुड़े, उसने बुदबुदाते हुए कहा, “खड़ूस नहीं तो…”
उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि शायद अद्वैत ने नहीं सुनी, या शायद जानबूझकर अनसुनी कर दी।
बाकी खाना चुपचाप ही निपटा। उस खामोशी में कहीं अद्वैत के मन का ठहराव था और रूहानी की बेचैनी। दोनों के भीतर बहुत कुछ उथल-पुथल मचा हुआ था, मगर बाहर सिर्फ सन्नाटा पसरा था।
खाना खत्म होने के बाद अद्वैत ने प्लेटें उठाईं, बिना एक शब्द कहे, और फिर वापस आकर रूहानी को सहारा देते हुए उसके कमरे तक पहुँचा दिया।
रूहानी को कमरे के भीतर पहुँचा कर उसने दरवाज़े के पास एक क्षण ठहर कर देखा। कुछ कहने की चाह चेहरे पर तैरती रही, लेकिन होंठ बंद ही रहे। वह मुड़ा और सीढ़ियों की ओर चल दिया—धीमे, शांत कदमों से, जैसे कोई अधूरी बात को पीछे छोड़ता चला गया हो।
रूहानी कमरे में अकेली रह गई। दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ के साथ ही उसने एक गहरी साँस ली, और अपनी जगह बैठते ही मोबाइल उठाया। उसकी उंगलियाँ काँप रहीं थीं। कुछ पल उसे समझ ही नहीं आया कि वो क्या कर रही है।
फिर उसने कॉल लॉग खोला, और “My Life” को दोबारा कॉल बैक कर दिया।
फोन मिलते ही दूसरी तरफ से कोई हल्की आवाज़ आई, लेकिन रूहानी की आँखों में आँसू भर आए। उसका गला रुंध गया। वो फूट पड़ी।
“किसी को पता तो नहीं है कि तुम मुझे कॉल कर रहे हो ना…” उसकी आवाज़ भारी थी, टूटी हुई।
———
आखिर ये ‘My Life’ कौन था?
अद्वैत… क्या वाकई वो सिर्फ काँच समेट रहा था, या उन टुकड़ों में रूहानी का कोई और सच भी ढूँढ़ रहा था?
अब क्या वो दोनों सिर्फ किरायेदार और मकान मालिक रहेंगे, या कोई पुराना ज़ख्म अचानक खुलने वाला है?

लिखकर रूह छूने की कोशिश…..
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