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  • भाग 3 — राघव का लौटना

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

    हवेली के मुख्य दरवाजे पर लगातार दस्तक हो रही थी।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    फिर वही आवाज आई—

     

    “विवेक… बेटा, दरवाजा खोलो।”

     

    आवाज बिल्कुल किसी बूढ़े पिता जैसी थी।

     

    विवेक दरवाजे के पास खड़ा काँप रहा था।

     

    आरती ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “दरवाजा मत खोलना।”

     

    कमला जमीन पर बैठी बुदबुदा रही थी—

     

    “हे भगवान… वह वापस आ गया…”

     

    विवेक ने माँ की तरफ देखा।

     

    “माँ, आखिर सच क्या है?”

     

    कमला ने सिर उठाया।

     

    उसकी आँखों में पंद्रह साल पुराना डर फिर से लौट आया था।

     

    “तेरे पिता जिंदा थे।”

     

    “लेकिन आपने मुझे बताया कि उनकी मौत हो गई थी।”

     

    “मैंने झूठ बोला था।”

     

    “क्यों?”

     

    कमला रोने लगी।

     

    “क्योंकि अगर मैं सच बता देती तो शायद तू भी मर जाता।”

     

    आरती ने पूछा—

     

    “राघव ने नंदिनी को क्यों मारा?”

     

    कमला ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

     

    “पैसों के लिए।”

     

    हवेली के बाहर दस्तक और तेज हो गई।

     

    ठक! ठक! ठक!

     

    “विवेक… मैं तुम्हारा पिता हूँ।”

     

    विवेक ने दरवाजे की तरफ देखा।

     

    फिर माँ से पूछा—

     

    “अगर वह मेरे पिता हैं, तो आप उन्हें अंदर आने से क्यों रोक रही हैं?”

     

    कमला ने काँपती आवाज में कहा—

     

    “क्योंकि राघव अब इंसान नहीं रहा।”

     

    अचानक दरवाजे के नीचे से काला धुआँ अंदर आने लगा।

     

    आरती पीछे हट गई।

     

    धुआँ धीरे-धीरे फर्श पर फैलने लगा।

     

    उसके बीच एक आकृति बनने लगी।

     

    एक आदमी…

     

    लंबा कद…

     

    झुका हुआ चेहरा…

     

    और आँखें पूरी तरह काली।

     

    आरती चीख पड़ी।

     

    कमला ने कहा—

     

    “मत देखो उसकी आँखों में!”

     

    लेकिन देर हो चुकी थी।

     

    विवेक ने उस आकृति की तरफ देख लिया।

     

    अचानक वह आदमी गायब हो गया।

     

    और विवेक जमीन पर गिर पड़ा।

     

    आरती उसके पास पहुँची।

     

    “विवेक!”

     

    उसकी आँखें बंद थीं।

     

    लेकिन उसके होंठ हिल रहे थे।

     

    “पिताजी… मुझे माफ कर दीजिए…”

     

    आरती घबरा गई।

     

    “विवेक! होश में आओ!”

     

    कुछ सेकंड बाद विवेक ने आँखें खोलीं।

     

    उसने डरते हुए कहा—

     

    “मैंने उन्हें देखा।”

     

    “किसे?”

     

    “अपने पिता को।”

     

    “उन्होंने क्या कहा?”

     

    विवेक का चेहरा पीला पड़ गया।

     

    “उन्होंने कहा… नंदिनी को उन्होंने नहीं मारा।”

     

    कमला अचानक चिल्लाई—

     

    “झूठ!”

     

    विवेक ने माँ की तरफ देखा।

     

    “उन्होंने कहा कि नंदिनी की मौत के पीछे कोई और था।”

     

    आरती ने पूछा—

     

    “कौन?”

     

    विवेक कुछ बोलता, उससे पहले ऊपर से भारी चीज गिरने की आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    तीनों ऊपर की तरफ भागे।

     

    पुराने कमरे का दरवाजा खुला था।

     

    अंदर दीवार पर नंदिनी की तस्वीर लगी थी।

     

    लेकिन तस्वीर बदल चुकी थी।

     

    अब नंदिनी की गोद में एक छोटी बच्ची दिखाई दे रही थी।

     

    आरती के रोंगटे खड़े हो गए।

     

    “ये बच्ची कौन है?”

     

    कमला ने रोते हुए कहा—

     

    “नंदिनी की बेटी।”

     

    आरती ने चौंककर पूछा—

     

    “लेकिन आपने कहा था कि बच्चा पैदा होने से पहले ही मर गया था।”

     

    कमला ने सिर झुका लिया।

     

    “मैंने कहा था कि बच्चा मर गया था… लेकिन मुझे नहीं पता था कि सच क्या है।”

     

    तभी पीछे से नंदिनी की आवाज आई—

     

    “वह मरी नहीं थी।”

     

    कमरे में अचानक ठंडी हवा भर गई।

     

    नंदिनी सामने दिखाई दी।

     

    इस बार उसके चेहरे पर डरावनी मुस्कान नहीं थी।

     

    उसकी आँखों में माँ का दर्द था।

     

    “मेरी बेटी जिंदा थी।”

     

    आरती की आँखें भर आईं।

     

    “फिर कहाँ है वह?”

     

    नंदिनी ने अपनी उँगली हवेली के पुराने कुएँ की तरफ कर दी।

     

    “उस रात मुझे रसोई में ले जाया गया था।”

     

    उसकी आवाज काँपने लगी।

     

    “राघव ने मुझसे कहा था कि मेरे पिता पैसे नहीं देंगे, इसलिए मुझे इस घर में रहने का कोई अधिकार नहीं।”

     

    आरती सुनती रही।

     

    “मैंने उसके सामने हाथ जोड़कर कहा था कि मुझे मत मारो।”

     

    नंदिनी की आँखों से आँसू गिरने लगे।

     

    “लेकिन लालच इंसान से उसकी आत्मा छीन लेता है।”

     

    कमला रोते हुए बोली—

     

    “बस करो नंदिनी…”

     

    नंदिनी ने उसकी ओर देखा।

     

    “तुमने देखा था कमला।”

     

    कमला काँपने लगी।

     

    “हाँ… मैंने सब देखा था।”

     

    “फिर तुमने मुझे बचाया क्यों नहीं?”

     

    कमला जमीन पर गिर गई।

     

    “मैं डर गई थी।”

     

    नंदिनी की आवाज पूरे कमरे में गूँज उठी—

     

    “तुम डर गई थीं… और मेरी जिंदगी खत्म हो गई।”

     

    आरती ने नंदिनी से पूछा—

     

    “उस रात आखिर हुआ क्या था?”

     

    नंदिनी ने धीरे-धीरे कहना शुरू किया—

     

    “राघव ने मुझे रसोई में बंद कर दिया था। वह मुझसे दो लाख रुपये माँग रहा था। मैंने कहा कि मेरे पिता के पास कुछ नहीं है।”

     

    “फिर?”

     

    “उसने मेरे ऊपर मिट्टी का तेल डाल दिया।”

     

    कमरा अचानक धुएँ से भरने लगा।

     

    आरती ने अपनी नाक ढक ली।

     

    नंदिनी की आवाज और धीमी हो गई।

     

    “लेकिन आग लगने से पहले मैंने अपनी बेटी को बचा लिया।”

     

    आरती ने आश्चर्य से पूछा—

     

    “कैसे?”

     

    “मैंने उसे पुराने कपड़ों में लपेटकर पिछली खिड़की से बाहर फेंक दिया था।”

     

    आरती के आँसू निकल आए।

     

    “फिर बच्ची कहाँ गई?”

     

    नंदिनी ने कहा—

     

    “एक बूढ़ी औरत ने उसे उठा लिया।”

     

    कमला ने अचानक सिर उठाया।

     

    “नहीं…”

     

    आरती ने उसकी तरफ देखा।

     

    “आप उस बूढ़ी औरत को जानती हैं?”

     

    कमला ने कुछ नहीं कहा।

     

    तभी हवेली के बाहर किसी के चलने की आवाज आई।

     

    धीरे…

     

    बहुत धीरे…

     

    जैसे कोई लकड़ी की छड़ी के सहारे चल रहा हो।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    विवेक ने खिड़की से बाहर देखा।

     

    हवेली के कुएँ के पास एक बूढ़ी औरत खड़ी थी।

     

    उसके हाथ में एक पुराना लाल कपड़ा था।

     

    वह ऊपर देखकर हवेली की तरफ मुस्कुरा रही थी।

     

    आरती ने पूछा—

     

    “कौन है वह?”

     

    कमला के मुँह से धीरे से निकला—

     

    “वही…”

     

    “कौन?”

     

    “वही औरत… जिसने नंदिनी की बच्ची को बचाया था।”

     

    आरती नीचे जाने लगी।

     

    विवेक ने उसे रोकना चाहा।

     

    “रुको।”

     

    लेकिन आरती ने कहा—

     

    “अगर वह बच्ची आज भी जिंदा है, तो हमें उसे ढूँढना होगा।”

     

    तीनों हवेली से बाहर निकले।

     

    बूढ़ी औरत कुएँ के पास खड़ी थी।

     

    उसने आरती को देखकर कहा—

     

    “तुम नंदिनी की बहू हो?”

     

    आरती ने सिर हिलाया।

     

    बूढ़ी औरत मुस्कुराई।

     

    “नहीं… तुम उसकी बेटी जैसी हो।”

     

    आरती ने पूछा—

     

    “आप नंदिनी की बच्ची को जानती हैं?”

     

    बूढ़ी औरत ने अपनी मुट्ठी खोली।

     

    उसमें एक छोटा-सा चाँदी का लॉकेट था।

     

    “यह उसकी माँ ने मुझे दिया था।”

     

    आरती ने लॉकेट देखा।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “मेरी गुड़िया।”

     

    “वह बच्ची कहाँ है?”

     

    बूढ़ी औरत ने सामने सड़क की तरफ देखा।

     

    “बहुत दूर नहीं।”

     

    “कहाँ?”

     

    “शहर में।”

     

    “उसका नाम?”

     

    बूढ़ी औरत ने आरती की आँखों में देखा।

     

    फिर कहा—

     

    “उसका नाम… आरती है।”

     

    आरती का शरीर सुन्न पड़ गया।

     

    “क्या?”

     

    विवेक ने उसकी तरफ देखा।

     

    कमला के चेहरे पर डर जम गया।

     

    बूढ़ी औरत ने कहा—

     

    “हाँ बेटी… तुम ही नंदिनी की बेटी हो।”

     

    हवा जैसे एक पल के लिए रुक गई।

     

    आरती के हाथ से लॉकेट गिर गया।

     

    “नहीं… यह सच नहीं हो सकता।”

     

    बूढ़ी औरत ने कहा—

     

    “तुम्हारी माँ ने तुम्हें मरने से बचाया था।”

     

    आरती की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    “तो मेरे पिता कौन हैं?”

     

    बूढ़ी औरत ने जवाब देने के बजाय पीछे देखा।

     

    हवेली के दरवाजे पर एक काली आकृति खड़ी थी।

     

    राघव।

     

    वह मुस्कुरा रहा था।

     

    उसने कहा—

     

    “अब मेरी बेटी को कोई मुझसे नहीं छीन सकता।”

     

    आरती पीछे हट गई।

     

    “आप… मेरे पिता हैं?”

     

    राघव ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    आरती के भीतर वर्षों का खालीपन अचानक भर गया।

     

    लेकिन वह खुशी नहीं थी।

     

    वह डर था।

     

    नफरत थी।

     

    और सबसे बड़ा सवाल—

     

    अगर राघव उसका पिता था…

     

    तो उसने उसकी माँ को क्यों मारा?

     

    राघव धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

     

    “तुम्हारी माँ ने तुम्हें मुझसे छीन लिया था।”

     

    आरती चिल्लाई—

     

    “आपने मेरी माँ को मारा!”

     

    राघव की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “नहीं।”

     

    “तो किसने?”

     

    राघव ने हवेली की तरफ देखा।

     

    “इस घर ने।”

     

    आरती कुछ समझ नहीं पाई।

     

    राघव ने कहा—

     

    “दहेज के लालच ने नंदिनी को मारा था। लेकिन उसके पीछे सिर्फ मैं नहीं था।”

     

    कमला रोते हुए बोली—

     

    “राघव, सच मत बताओ।”

     

    राघव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “अब सच छिपाने का समय खत्म हो गया है।”

     

    वह आरती के पास आया।

     

    “तुम्हारी माँ को मारने के बाद मैंने उसकी आत्मा को हवेली में कैद कर दिया था।”

     

    आरती ने काँपते हुए पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    “ताकि उसका दर्द हमेशा इस घर में रहे।”

     

    नंदिनी अचानक प्रकट हुई।

     

    उसने राघव की तरफ देखा।

     

    “तुमने मुझे कैद नहीं किया था।”

     

    राघव पीछे हट गया।

     

    नंदिनी बोली—

     

    “मेरे दर्द को इस घर की दीवारों ने कैद किया था।”

     

    फिर उसकी नजर आरती पर पड़ी।

     

    “लेकिन अब मेरी बेटी आ गई है।”

     

    नंदिनी ने हाथ बढ़ाया।

     

    आरती धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ी।

     

    माँ और बेटी के बीच केवल कुछ कदम का फासला था।

     

    आरती ने रोते हुए कहा—

     

    “माँ…”

     

    नंदिनी ने उसे गले लगाने की कोशिश की।

     

    लेकिन उसका शरीर धुएँ में बदल गया।

     

    आरती ने हवा को पकड़ने की कोशिश की।

     

    “माँ!”

     

    नंदिनी की आवाज दूर से आई—

     

    “बेटी… मुझे मुक्त करने के लिए मेरा बदला मत लेना।”

     

    आरती रोते हुए बोली—

     

    “फिर क्या करूँ?”

     

    नंदिनी ने कहा—

     

    “दहेज के खिलाफ लड़ना।”

     

    “लोगों को बताना कि मेरी मौत सिर्फ मेरी नहीं थी।”

     

    “हर उस बेटी की आवाज बनना, जो दहेज के कारण चुप है।”

     

    अचानक हवेली में तेज रोशनी हुई।

     

    राघव जमीन पर गिर पड़ा।

     

    कमला ने पुलिस को फोन कर दिया।

     

    कुछ ही देर में पुलिस हवेली पहुँच गई।

     

    पुराने कमरे की तलाशी ली गई।

     

    दीवार के पीछे से नंदिनी की डायरी, पुराने कागजात और कई ऐसे सबूत मिले जिनसे साबित हो गया कि नंदिनी की मौत हादसा नहीं थी।

     

    राघव को गिरफ्तार कर लिया गया।

     

    कमला ने अदालत में सच बयान दिया।

     

    पंद्रह साल बाद नंदिनी को इंसाफ मिलने की उम्मीद जगी।

     

    लेकिन आरती के लिए असली लड़ाई अब शुरू हुई थी।

     

    उसने अपने पति विवेक से कहा—

     

    “मैं इस घर में नहीं रहूँगी।”

     

    विवेक ने पूछा—

     

    “फिर कहाँ जाओगी?”

     

    आरती ने नंदिनी की तस्वीर हाथ में लेते हुए कहा—

     

    “जहाँ मेरी माँ का सपना पूरा हो सके।”

     

    “मैं उन बेटियों के लिए काम करूँगी जिन्हें दहेज के नाम पर डराया जाता है।”

     

    विवेक ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मैं तुम्हारे साथ हूँ।”

     

    आरती ने हवेली की तरफ आखिरी बार देखा।

     

    ऊपर की खिड़की में नंदिनी दिखाई दी।

     

    वह मुस्कुरा रही थी।

     

    उसकी पायल की आवाज धीरे-धीरे दूर होती गई।

     

    छन…

     

    छन…

     

    छन…

     

    और फिर हवेली हमेशा के लिए शांत हो गई।

     

    लेकिन जाते-जाते आरती को एक आवाज सुनाई दी—

     

    “बेटी… अब किसी और माँ को अपनी बेटी के लिए रोने मत देना।”

     

    आरती ने आँखें बंद कर लीं।

     

    उसके आँसू गालों पर थे।

     

    लेकिन इस बार उन आँसुओं में डर नहीं था।

     

    एक संकल्प था।

     

    दहेज के खिलाफ लड़ने का संकल्प।

     

    क्रमशः… भाग 4 में।

     

    इस भाग की सीख

     

    किसी भी अन्याय को केवल इसलिए स्वीकार मत कीजिए क्योंकि वह वर्षों से चला आ रहा है।

     

    नंदिनी की सबसे बड़ी जीत यह नहीं थी कि उसके हत्यारे को सजा मिली।

     

    उसकी असली जीत यह थी कि उसकी बेटी ने उसके दर्द को अपनी ताकत बना लिया।

     

    दहेज की बेड़ियाँ तभी टूटेंगी, जब बेटियाँ अपने अधिकार के लिए आवाज उठाएँगी और परिवार उनका साथ देगा।

     

    याद रखिए—

     

    शादी दो परिवारों का रिश्ता है, सौदेबाजी नहीं।

    बेटी कोई सामान नहीं, एक इंसान है।

    और इंसान की कीमत कभी दहेज से नहीं लगाई जा सकती।

  • भाग 2 — हवेली का बंद कमरा

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    सुबह की पहली किरण हवेली की टूटी हुई खिड़की से अंदर आई, लेकिन आरती की आँखों से रात का डर अभी तक नहीं गया था।

     

    वह पूरी रात सो नहीं पाई थी।

     

    उसके सामने बार-बार वही चेहरा आ रहा था—

     

    जला हुआ चेहरा…

     

    लाल साड़ी…

     

    आँखों में आँसू…

     

    और वह आवाज—

     

    “मेरी तरह अपनी जिंदगी को दहेज की आग में मत जलने देना।”

     

    आरती ने सोचा था कि सुबह होते ही वह अपने पति विवेक को सब कुछ बता देगी।

     

    लेकिन जब वह कमरे से बाहर निकली, तो हवेली बिल्कुल सामान्य लग रही थी।

     

    रसोई में उसकी सास कमला चाय बना रही थी।

     

    विवेक अखबार पढ़ रहा था।

     

    आरती ने काँपती आवाज में पूछा—

     

    “विवेक… क्या इस घर में पहले कभी नंदिनी नाम की कोई लड़की रहती थी?”

     

    अखबार पढ़ते-पढ़ते विवेक के हाथ रुक गए।

     

    उसने धीरे से आरती की तरफ देखा।

     

    “तुमने ये नाम कहाँ सुना?”

     

    आरती समझ गई कि कुछ तो छिपाया जा रहा है।

     

    “बस ऐसे ही…”

     

    कमला अचानक जोर से बोली—

     

    “इस घर में किसी नंदिनी का नाम मत लेना!”

     

    आरती चौंक गई।

     

    कमला की आँखों में डर था।

     

    सिर्फ डर नहीं…

     

    ऐसा डर, जैसे किसी पुराने जख्म को अचानक किसी ने छू लिया हो।

     

    विवेक ने माँ को शांत करते हुए कहा—

     

    “माँ, रहने दो।”

     

    फिर आरती से बोला—

     

    “तुमने शायद सपना देखा होगा।”

     

    आरती ने कुछ नहीं कहा।

     

    लेकिन उसके मन में एक सवाल पैदा हो चुका था—

     

    अगर नंदिनी केवल सपना थी, तो माँ इतनी डर क्यों गई?

     

    उस दिन दोपहर में आरती पूरे घर में घूम रही थी।

     

    हवेली बहुत बड़ी थी।

     

    पुरानी दीवारों पर जगह-जगह सीलन थी।

     

    कई कमरों पर ताले लगे थे।

     

    एक लंबा गलियारा हवेली की पिछली तरफ जाता था।

     

    वहीं उसे लोहे का एक पुराना दरवाजा दिखाई दिया।

     

    दरवाजे पर मोटा ताला लगा था।

     

    आरती ने हाथ बढ़ाकर ताले को छूना चाहा।

     

    तभी पीछे से आवाज आई—

     

    “उस दरवाजे के पास मत जाना।”

     

    आरती पलटी।

     

    विवेक खड़ा था।

     

    “क्यों?”

     

    “बस मत जाना।”

     

    “उस कमरे में क्या है?”

     

    विवेक ने नजरें चुरा लीं।

     

    “पुराना सामान।”

     

    आरती ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

     

    “पुराने सामान से इतना डर क्यों लगता है?”

     

    विवेक चुप रहा।

     

    उस रात आरती ने फैसला किया कि वह सच्चाई जानकर रहेगी।

     

    आधी रात को जब पूरा घर सो गया, वह धीरे से उठी।

     

    उसने गलियारे में कदम रखा।

     

    हवा अचानक ठंडी हो गई।

     

    उसकी साँस से भाप निकलने लगी।

     

    फिर उसे वही आवाज सुनाई दी—

     

    छन…

     

    छन…

     

    छन…

     

    पायल की आवाज उसी बंद कमरे के पीछे से आ रही थी।

     

    आरती धीरे-धीरे दरवाजे तक पहुँची।

     

    अचानक ताला अपने आप गिर गया।

     

    धड़ाम!

     

    आरती पीछे हट गई।

     

    कुछ पल तक उसने दरवाजे को देखा।

     

    फिर साहस करके उसे खोल दिया।

     

    अंदर घना अंधेरा था।

     

    उसने मोबाइल की रोशनी जलाई।

     

    कमरे में पुराने संदूक, टूटी हुई कुर्सियाँ और धूल से ढके सामान पड़े थे।

     

    दीवार पर एक पुरानी तस्वीर लगी थी।

     

    आरती ने रोशनी तस्वीर पर डाली।

     

    वह नंदिनी की तस्वीर थी।

     

    लाल जोड़े में मुस्कुराती हुई नंदिनी।

     

    आरती की आँखें नम हो गईं।

     

    तस्वीर के नीचे कुछ लिखा था—

     

    “नंदिनी — इस घर की बहू।”

     

    लेकिन उसके ठीक नीचे किसी ने काले रंग से दूसरा वाक्य लिख दिया था—

     

    “इस घर की सबसे बड़ी गलती।”

     

    आरती का दिल काँप उठा।

     

    तभी पीछे से दरवाजा बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    आरती ने तुरंत दरवाजा खींचा।

     

    वह नहीं खुला।

     

    “कोई है?”

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    फिर कमरे में किसी के रोने की आवाज आई।

     

    “बाबा… मुझे घर ले चलो…”

     

    आरती का शरीर सुन्न पड़ गया।

     

    वह आवाज नंदिनी की थी।

     

    “बाबा… मैं घर जाना चाहती हूँ…”

     

    आरती रोने लगी।

     

    “नंदिनी… तुम यहाँ हो?”

     

    अचानक संदूक अपने आप खुल गया।

     

    उसके अंदर लाल कपड़े में लिपटी एक पुरानी डायरी पड़ी थी।

     

    आरती ने डायरी उठाई।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “अगर कोई बेटी यह डायरी पढ़ रही है, तो समझ लेना कि मेरी कहानी अभी खत्म नहीं हुई।”

     

    आरती ने काँपते हाथों से पन्ने पलटे।

     

    नंदिनी ने अपनी जिंदगी का हर दर्द उसमें लिखा था।

     

    दहेज की माँग…

     

    मारपीट…

     

    भूखे रहना…

     

    पिता से पैसे माँगने का दबाव…

     

    और फिर आखिरी पन्ने पर लिखा था—

     

    “आज उन्होंने कहा है कि अगर पिताजी ने दो लाख रुपये नहीं दिए, तो मेरी जिंदगी खत्म कर देंगे।”

     

    आरती की आँखों से आँसू गिरने लगे।

     

    अगला पन्ना आधा जला हुआ था।

     

    उस पर केवल कुछ शब्द पढ़े जा सकते थे—

     

    “मुझे रसोई में बुलाया गया है… अगर मैं वापस न आऊँ तो…”

     

    इसके बाद कुछ नहीं था।

     

    आरती ने डायरी बंद कर दी।

     

    तभी कमरे में किसी महिला की धीमी हँसी गूँजी।

     

    “सच जानना चाहती हो?”

     

    आरती ने पलटकर देखा।

     

    नंदिनी उसके सामने खड़ी थी।

     

    इस बार उसका चेहरा पहले से ज्यादा भयानक था।

     

    लेकिन उसकी आँखों में गुस्सा नहीं…

     

    दर्द था।

     

    आरती ने कहा—

     

    “तुम्हें किसने मारा?”

     

    नंदिनी ने अपना हाथ उठाया।

     

    उसकी उँगली हवेली के बाहर बने पुराने कुएँ की तरफ थी।

     

    फिर उसने कहा—

     

    “जिसे तुम अपना पति समझती हो… उसके परिवार ने मेरी जिंदगी छीनी थी।”

     

    आरती के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “विवेक?”

     

    नंदिनी ने सिर हिलाया।

     

    “विवेक उस समय पैदा भी नहीं हुआ था।”

     

    आरती ने राहत की साँस ली।

     

    लेकिन नंदिनी ने अगला वाक्य कहा—

     

    “लेकिन उसके पिता जानते हैं कि मेरे साथ क्या हुआ था।”

     

    आरती के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

     

    तभी दरवाजा खुल गया।

     

    आरती भागकर अपने कमरे में पहुँची।

     

    विवेक जाग रहा था।

     

    उसने पूछा—

     

    “तुम कहाँ गई थीं?”

     

    आरती ने डायरी उसके सामने रख दी।

     

    विवेक का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “तुम्हें ये कहाँ मिली?”

     

    “उस कमरे में।”

     

    विवेक ने डायरी उठाई।

     

    कुछ देर तक उसे देखता रहा।

     

    फिर बोला—

     

    “आरती, हमें यह घर छोड़ देना चाहिए।”

     

    “क्यों?”

     

    विवेक ने जवाब नहीं दिया।

     

    तभी नीचे से उसकी माँ की चीख सुनाई दी।

     

    “विवेक!”

     

    दोनों दौड़कर नीचे गए।

     

    कमला सीढ़ियों के पास खड़ी काँप रही थी।

     

    उसके सामने जमीन पर एक पुरानी तस्वीर पड़ी थी।

     

    वही तस्वीर जिसमें नंदिनी थी।

     

    लेकिन अब तस्वीर में नंदिनी अकेली नहीं थी।

     

    उसके पीछे एक आदमी खड़ा दिखाई दे रहा था।

     

    विवेक ने तस्वीर उठाई।

     

    उसका चेहरा बदल गया।

     

    “ये कौन है?” आरती ने पूछा।

     

    विवेक ने काँपती आवाज में कहा—

     

    “मेरे पिता।”

     

    आरती ने तस्वीर को ध्यान से देखा।

     

    तस्वीर में नंदिनी के पीछे खड़ा आदमी मुस्कुरा रहा था।

     

    लेकिन उसके हाथ में कुछ था।

     

    एक लाल रंग का कपड़ा।

     

    वही लाल कपड़ा जो नंदिनी ने अपनी डायरी में आखिरी दिन पहना था।

     

    कमला अचानक फूट-फूटकर रोने लगी।

     

    “मैंने उसे नहीं मारा था…”

     

    आरती ने कहा—

     

    “तो किसने मारा?”

     

    कमला ने सिर उठाया।

     

    उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।

     

    “तुम्हारे ससुर ने।”

     

    हवेली में सन्नाटा छा गया।

     

    “लेकिन फिर पुलिस को क्यों नहीं बताया?”

     

    कमला ने काँपते हुए कहा—

     

    “क्योंकि मैं डर गई थी।”

     

    “किससे?”

     

    कमला ने हवेली की ऊपरी मंजिल की ओर देखा।

     

    “उससे… जो नंदिनी की मौत के बाद इस घर में आया था।”

     

    आरती ने पूछा—

     

    “कौन?”

     

    कमला ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “नंदिनी की आत्मा नहीं…”

     

    वह कुछ पल रुकी।

     

    “उसका बदला।”

     

    उसी समय ऊपर से जोरदार आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    तीनों ने ऊपर देखा।

     

    पुराना बंद कमरा फिर से खुल चुका था।

     

    और अंदर से किसी बच्ची के रोने की आवाज आ रही थी।

     

    “माँ… मुझे बचा लो…”

     

    कमला के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “नहीं… ये फिर शुरू हो गया।”

     

    विवेक ने पूछा—

     

    “माँ, बच्ची कौन है?”

     

    कमला ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    आरती ने उसकी ओर देखा।

     

    “माँजी… सच बताइए।”

     

    कमला की आँखों से आँसू बह निकले।

     

    “नंदिनी मरने से पहले गर्भवती थी।”

     

    आरती के मुँह से चीख निकल गई।

     

    “क्या?”

     

    कमला ने कहा—

     

    “उस रात सिर्फ नंदिनी नहीं मरी थी… उसका अजन्मा बच्चा भी मर गया था।”

     

    अचानक हवेली की सारी खिड़कियाँ खुल गईं।

     

    तेज हवा अंदर आने लगी।

     

    ऊपर से पायल की आवाज आई।

     

    छन…

     

    छन…

     

    छन…

     

    फिर एक और आवाज गूँजी—

     

    “जिसने मेरी जिंदगी छीनी… उसकी नस्ल में कोई बेटी चैन से नहीं रहेगी।”

     

    विवेक ने आरती का हाथ पकड़ लिया।

     

    “हमें यहाँ से निकलना होगा।”

     

    दोनों दरवाजे की तरफ दौड़े।

     

    लेकिन दरवाजा बंद था।

     

    तभी आरती ने देखा—

     

    दीवार पर धीरे-धीरे लाल अक्षरों में कुछ लिखा जा रहा था।

     

    “भागने से पहले सच पूरा जानो।”

     

    और उसके नीचे एक नाम उभर आया—

     

    “राघव।”

     

    वही राघव…

     

    नंदिनी का पति।

     

    विवेक का पिता।

     

    जिसे पंद्रह साल पहले हवेली से गायब बताया गया था।

     

    आरती ने विवेक की तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे पिता मरे नहीं थे?”

     

    विवेक की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “नहीं…”

     

    “तो कहाँ हैं?”

     

    विवेक ने काँपते हुए कहा—

     

    “यही तो मैं आज तक नहीं जानता था।”

     

    उसी क्षण हवेली के बाहर से किसी के दरवाजा खटखटाने की आवाज आई।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    तीनों जम गए।

     

    फिर बाहर से एक बूढ़ी आवाज आई—

     

    “दरवाजा खोलो… मैं राघव हूँ।”

     

    कमला ने चीखते हुए अपने कान बंद कर लिए।

     

    आरती ने विवेक की तरफ देखा।

     

    विवेक धीरे-धीरे दरवाजे की ओर बढ़ा।

     

    लेकिन जैसे ही उसने कुंडी पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया…

     

    उसके पीछे नंदिनी खड़ी थी।

     

    उसने धीरे से कहा—

     

    “दरवाजा मत खोलना।”

     

    विवेक रुक गया।

     

    नंदिनी की आँखों से आँसू बह रहे थे।

     

    उसने कहा—

     

    “क्योंकि बाहर खड़ा आदमी तुम्हारा पिता नहीं है।”

     

    अचानक बाहर से वही आवाज फिर आई—

     

    “विवेक… दरवाजा खोलो बेटा…”

     

    और इस बार आवाज के पीछे किसी और की धीमी हँसी सुनाई दी।

     

    एक ऐसी हँसी…

     

    जिसमें इंसानियत का नामोनिशान नहीं था।

     

    क्रमशः… भाग 3 में।

     

    इस भाग की सीख

     

    दहेज केवल एक परिवार की समस्या नहीं है। यह चुप रहने वाले हर व्यक्ति की जिम्मेदारी बन जाती है।

     

    नंदिनी की सबसे बड़ी पीड़ा यह नहीं थी कि उससे पैसे माँगे गए। उसकी सबसे बड़ी पीड़ा यह थी कि लोग जानते थे कि उसके साथ गलत हो रहा है, फिर भी डर के कारण चुप रहे।

     

    इसलिए जब भी किसी बेटी पर दहेज का दबाव बनाया जाए, उसे अकेला मत छोड़िए।

     

    गलत के सामने चुप रहना भी कभी-कभी गलत का साथ देना बन जाता है।

     

    और याद रखिए—

     

    बेटी की कीमत दहेज से नहीं, उसके सपनों से होती है।

    जिस घर को बेटी की जरूरत है, उसे दहेज की जरूरत नहीं होनी चाहिए।

  • भाग 1 — दहेज की पहली बेड़ियाँ

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    रात के करीब बारह बज रहे थे।गाँव के आखिरी छोर पर बनी उस पुरानी हवेली में आज फिर वही आवाज गूँज रही थी—

     

    “मुझे मेरा दहेज वापस चाहिए…”

     

    हवेली की दीवारें जैसे उस आवाज को पकड़कर बार-बार दोहरा रही थीं।

     

    “मेरा दहेज… मेरा जीवन… मेरा इंसाफ…”

     

    लेकिन इस आवाज की कहानी आज से नहीं, लगभग पंद्रह साल पहले शुरू हुई थी।

     

    उस समय उस गाँव में रहने वाले रामदीन की बेटी नंदिनी की शादी तय हुई थी।

     

    नंदिनी बहुत साधारण लड़की थी। चेहरे पर हमेशा मुस्कान, आँखों में बड़े-बड़े सपने और दिल में अपने माता-पिता के लिए अथाह प्रेम।

     

    रामदीन गरीब किसान था। उसके पास ज्यादा जमीन नहीं थी, लेकिन उसने अपनी बेटी को कभी किसी चीज की कमी महसूस नहीं होने दी।

     

    शादी की तारीख नजदीक आती गई।

     

    एक शाम लड़के वालों का फोन आया।

     

    “देखिए रामदीन जी,” लड़के के पिता ने कहा, “हमने तो कुछ माँगा नहीं है, लेकिन आजकल समाज में इज्जत भी कोई चीज होती है।”

     

    रामदीन चुप रहा।

     

    “बस एक मोटरसाइकिल, थोड़ा सोना और पचास हजार रुपये… इससे ज्यादा कुछ नहीं।”

     

    रामदीन के हाथ से फोन लगभग छूट गया।

     

    उसने धीमी आवाज में कहा, “भाई साहब… मैं गरीब आदमी हूँ। इतना सब कहाँ से लाऊँगा?”

     

    दूसरी तरफ कुछ पल खामोशी रही।

     

    फिर जवाब आया—

     

    “तो फिर शादी भी कहाँ से होगी?”

     

    फोन कट गया।

     

    उस रात रामदीन अपनी चारपाई पर बैठकर देर तक रोता रहा।

     

    नंदिनी ने पिता को देख लिया।

     

    “बाबा… क्या हुआ?”

     

    रामदीन ने आँसू पोंछते हुए कहा, “कुछ नहीं बेटी।”

     

    “आप मुझसे झूठ बोल रहे हैं।”

     

    रामदीन ने सिर झुका लिया।

     

    “तेरी शादी में दहेज माँग रहे हैं।”

     

    नंदिनी कुछ पल बिल्कुल शांत रही।

     

    फिर उसने पिता का हाथ पकड़कर कहा—

     

    “बाबा, अगर मेरी खुशी की कीमत आपकी जिंदगी है, तो मुझे ऐसी शादी नहीं करनी।”

     

    रामदीन ने बेटी की ओर देखा।

     

    “लेकिन समाज क्या कहेगा?”

     

    नंदिनी मुस्कुराई।

     

    “समाज मेरे साथ दुख बाँटने नहीं आएगा बाबा। फिर समाज के डर से मैं अपना जीवन क्यों बर्बाद करूँ?”

     

    रामदीन की आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    लेकिन तभी नंदिनी की माँ बोली—

     

    “बेटी, बात इतनी आसान नहीं है। अगर रिश्ता टूट गया तो लोग तुझे ही दोष देंगे।”

     

    नंदिनी चुप हो गई।

     

    कुछ दिनों बाद रामदीन ने अपनी छोटी-सी जमीन का एक हिस्सा बेच दिया।

     

    मोटरसाइकिल खरीदी गई।

     

    गहने बनवाए गए।

     

    पचास हजार रुपये का इंतजाम करने के लिए उसने साहूकार से भारी ब्याज पर कर्ज लिया।

     

    शादी हो गई।

     

    ढोल बजे।

     

    बारात आई।

     

    नंदिनी लाल जोड़े में विदा हुई।

     

    लेकिन किसी को नहीं पता था कि जिस घर में वह दुल्हन बनकर जा रही थी, वही घर उसकी जिंदगी की सबसे डरावनी कैद बनने वाला था।

     

    ससुराल में पहले कुछ दिन सब ठीक रहा।

     

    फिर एक रात नंदिनी के पति राघव ने कहा—

     

    “पापा कह रहे थे कि तुम्हारे पिता ने कार का वादा किया था।”

     

    नंदिनी चौंक गई।

     

    “कार? बाबा ने तो अपनी जमीन बेचकर मोटरसाइकिल दी है।”

     

    राघव ने गुस्से से उसकी तरफ देखा।

     

    “मतलब तुम लोग हमें बेवकूफ बनाकर लाए हो?”

     

    उस रात पहली बार नंदिनी के चेहरे से मुस्कान गायब हुई।

     

    दिन बीतते गए।

     

    माँग बढ़ती गई।

     

    कभी कार।

     

    कभी दो लाख रुपये।

     

    कभी नया फर्नीचर।

     

    कभी सोने की चेन।

     

    नंदिनी हर बार कहती—

     

    “मेरे पिता अब कुछ नहीं दे सकते।”

     

    और हर बार उसे यही जवाब मिलता—

     

    “तो फिर तू भी यहाँ ज्यादा दिन नहीं रह पाएगी।”

     

    एक दिन नंदिनी ने अपने पिता को फोन किया।

     

    “बाबा… मुझे घर ले चलो।”

     

    रामदीन की आवाज काँप गई।

     

    “क्या हुआ बेटी?”

     

    “कुछ नहीं बाबा… बस आपकी बहुत याद आ रही है।”

     

    वह अपने पिता को सच्चाई नहीं बता पाई।

     

    क्योंकि वह जानती थी कि उसके पिता के पास अब देने के लिए कुछ नहीं था।

     

    कुछ सप्ताह बाद एक रात हवेली में जोरदार चीख सुनाई दी।

     

    “बचाओ!”

     

    फिर अचानक सब शांत हो गया।

     

    सुबह खबर फैली—

     

    नंदिनी रसोई में लगी आग में जल गई।

     

    उसकी मौत को हादसा बताया गया।

     

    रामदीन जब पहुँचा तो बेटी का चेहरा तक पहचान में नहीं आ रहा था।

     

    वह फूट-फूटकर रोया।

     

    “मेरी बेटी को जला दिया तुम लोगों ने!”

     

    लेकिन सबूत नहीं था।

     

    मामला धीरे-धीरे दब गया।

     

    हवेली फिर शांत हो गई।

     

    लेकिन नंदिनी शांत नहीं हुई।

     

    शादी के ठीक पंद्रहवें दिन से हवेली में अजीब घटनाएँ होने लगीं।

     

    रात को किसी के पायल पहनकर चलने की आवाज आती।

     

    रसोई में बंद बर्तन अपने आप गिरने लगते।

     

    और हर अमावस्या की रात हवेली की ऊपरी मंजिल से एक औरत की आवाज आती—

     

    “मेरा दहेज वापस करो…”

     

    राघव की माँ ने इसे वहम बताया।

     

    लेकिन एक रात राघव ने खुद वह आवाज सुनी।

     

    वह ऊपर गया।

     

    कमरे का दरवाजा अंदर से बंद था।

     

    उसने दरवाजा तोड़ा।

     

    कमरे में कोई नहीं था।

     

    लेकिन दीवार पर राख से लिखा था—

     

    “बेटी की कीमत लगाने वालों का घर कभी आबाद नहीं होता।”

     

    राघव डरकर पीछे हट गया।

     

    तभी उसके कान के पास किसी ने फुसफुसाया—

     

    “तुमने मेरी कीमत लगाई थी ना?”

     

    राघव पलटा।

     

    वहाँ कोई नहीं था।

     

    लेकिन फर्श पर लाल साड़ी का एक टुकड़ा पड़ा था।

     

    उसी रात हवेली की सारी खिड़कियाँ अपने आप खुल गईं।

     

    और बाहर तेज बारिश शुरू हो गई।

     

    राघव की माँ चीखती हुई नीचे भागी।

     

    तभी ऊपर से पायल की आवाज आई—

     

    छन…

     

    छन…

     

    छन…

     

    धीरे-धीरे वह आवाज सीढ़ियों से नीचे उतरने लगी।

     

    एक कदम…

     

    फिर दूसरा…

     

    फिर तीसरा…

     

    राघव और उसकी माँ दरवाजे के पास खड़े काँप रहे थे।

     

    आवाज बिल्कुल उनके सामने आकर रुक गई।

     

    फिर एक धीमी आवाज आई—

     

    “जिस घर में दहेज माँगा जाता है… वहाँ दुल्हन नहीं आती… उसकी मजबूरी आती है।”

     

    और उसी क्षण हवेली की सारी बत्तियाँ बुझ गईं।

     

    सुबह जब गाँव वाले हवेली पहुँचे, तो राघव की माँ बेहोश मिली।

     

    राघव गायब था।

     

    उस दिन के बाद वह कभी वापस नहीं आया।

     

    लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

     

    पंद्रह साल बाद एक नई दुल्हन उस हवेली में आई।

     

    उसका नाम था आरती।

     

    उसे हवेली के पुराने इतिहास के बारे में कुछ नहीं पता था।

     

    वह अपने पति के साथ कमरे में पहुँची।

     

    रात को उसने अपने सामान में से लाल साड़ी निकाली।

     

    तभी उसे कमरे के कोने से पायल की आवाज सुनाई दी।

     

    छन…

     

    छन…

     

    आरती ने पलटकर देखा।

     

    एक औरत खिड़की के पास खड़ी थी।

     

    लाल साड़ी…

     

    जला हुआ चेहरा…

     

    और आँखों से बहते आँसू।

     

    आरती चीखने ही वाली थी कि वह औरत बोली—

     

    “डर मत बेटी… मैं तुझे डराने नहीं आई।”

     

    आरती काँपते हुए बोली—

     

    “आप… कौन हैं?”

     

    औरत ने धीरे से कहा—

     

    “मैं नंदिनी हूँ।”

     

    आरती के हाथ से साड़ी गिर गई।

     

    नंदिनी ने उसकी ओर देखकर कहा—

     

    “मेरी तरह अपनी जिंदगी को दहेज की आग में मत जलने देना।”

     

    आरती रोने लगी।

     

    “लेकिन मैं क्या करूँ?”

     

    नंदिनी की आवाज कठोर हो गई—

     

    “आवाज उठाओ।”

     

    फिर वह धीरे-धीरे धुएँ में बदलने लगी।

     

    जाते-जाते उसने कहा—

     

    “जिस दिन बेटियाँ डरना बंद कर देंगी… उस दिन दहेज की बेड़ियाँ टूट जाएँगी।”

     

    आरती ने उस रात फैसला कर लिया।

     

    वह चुप नहीं रहेगी।

     

    लेकिन उसे नहीं पता था कि सुबह होते ही उसके सामने ऐसा सच आने वाला है, जो नंदिनी की मौत से भी ज्यादा भयानक था…

     

    क्रमशः… भाग 2 में।

     

    इस भाग की सीख

     

    दहेज केवल पैसों की माँग नहीं है। यह किसी बेटी के आत्मसम्मान, सपनों और जीवन की कीमत लगाने की सोच है।

     

    बेटी बोझ नहीं है। दहेज परंपरा नहीं, सामाजिक बुराई है।

     

    अगर किसी रिश्ते की शुरुआत ही लालच से हो रही है, तो वहाँ प्रेम और सम्मान की उम्मीद करना अपने जीवन के साथ अन्याय है।

     

    डरकर चुप रहना समस्या को बढ़ाता है, जबकि आवाज उठाना बदलाव की पहली सीढ़ी है।

  • काली हवेली का आख़िरी कमरा (Last part-3)

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    तेरहवीं घंटी की आवाज़ के बाद पूरी हवेली में सन्नाटा छा गया।

     

    आरव सामने खड़ी उस काली परछाईं को देख रहा था।

     

    उसकी आँखें लाल थीं और शरीर धुएँ की तरह हिल रहा था। उसके चेहरे पर कोई निश्चित आकार नहीं था। कभी वह बूढ़े आदमी जैसा दिखाई देता, कभी जवान, और कभी बिल्कुल आरव जैसा।

     

    आरव पीछे हटने लगा।

     

    “कबीर कहाँ है?”

     

    परछाईं हँसी।

     

    “जिसे तुम दोस्त समझते हो, वह अभी भी ज़िंदा है।”

     

    “तो उसे मेरे सामने लाओ!”

     

    परछाईं ने हाथ उठाया।

     

    अचानक कमरे की दीवार पर एक तस्वीर दिखाई दी।

     

    उसमें कबीर एक छोटे से कमरे में बंद था।

     

    वह दरवाज़ा पीट रहा था।

     

    “आरव! मुझे यहाँ से निकाल!”

     

    आरव ने तस्वीर पर हाथ मारा।

     

    “कबीर!”

     

    तस्वीर के अंदर कबीर ने आरव को देखा।

     

    “तेरहवीं चाबी!”

     

    आरव ने नीचे देखा।

     

    वही पुरानी चाबी उसकी मुट्ठी में थी।

     

    कबीर चिल्लाया—

     

    “दीवार के पीछे का दरवाज़ा खोलो!”

     

    तभी तस्वीर गायब हो गई।

     

    आरव ने दीवार को ध्यान से देखा।

     

    उस पर मीरा की तस्वीर बनी हुई थी।

     

    आरव ने चाबी तस्वीर के बीच लगा दी।

     

    क्लिक!

     

    दीवार दो हिस्सों में बँट गई।

     

    पीछे एक संकरी सीढ़ी थी।

     

    आरव नीचे उतरने लगा।

     

    हर सीढ़ी के साथ तापमान गिरता जा रहा था।

     

    नीचे पहुँचकर उसे एक विशाल कमरा दिखाई दिया।

     

    कमरे के बीचों-बीच कबीर बंधा हुआ था।

     

    “आरव!”

     

    आरव उसकी तरफ दौड़ा।

     

    लेकिन तभी कबीर ने चीखकर कहा—

     

    “रुको!”

     

    आरव वहीं रुक गया।

     

    कबीर के पीछे मीरा खड़ी थी।

     

    लेकिन इस बार उसके चेहरे पर डर था।

     

    “आरव, ये कबीर नहीं है।”

     

    आरव ने चौंककर कबीर को देखा।

     

    कबीर मुस्कुराने लगा।

     

    उसकी मुस्कान धीरे-धीरे फैलती गई।

     

    फिर उसका चेहरा बदलने लगा।

     

    कुछ ही सेकंड में वहाँ वही काली परछाईं खड़ी थी।

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “तुमने मेरे साथ ऐसा क्यों किया?”

     

    परछाईं ने कहा—

     

    “मैंने कुछ नहीं किया। तुम्हारे परिवार ने किया था।”

     

    तभी कमरे की दीवारों पर पुरानी घटनाएँ दिखाई देने लगीं।

     

    आरव ने देखा—

     

    तीस साल पहले रुद्र प्रताप ने इसी कमरे में एक अनुष्ठान किया था।

     

    उसकी बेटी मीरा गंभीर बीमारी से मर रही थी।

     

    रुद्र अपनी बेटी को बचाना चाहता था।

     

    उसने एक अजीब शक्ति को बुलाया।

     

    उस शक्ति ने कहा था—

     

    “मैं मीरा को जीवन दूँगा, लेकिन बदले में तुम्हारे परिवार की हर पीढ़ी से एक व्यक्ति मुझे अपना जीवन देगा।”

     

    रुद्र ने हामी भर दी।

     

    मीरा बच गई।

     

    लेकिन उसी रात रुद्र को अपनी गलती का एहसास हुआ।

     

    उसने उस शक्ति को कैद करने के लिए कमरा 13 बनवाया।

     

    लेकिन शक्ति ने पूरे परिवार को एक-एक करके मार दिया।

     

    मीरा को भी।

     

    मरने से पहले मीरा ने उस शक्ति को हवेली में बंद कर दिया।

     

    लेकिन एक शर्त थी—

     

    हर इक्कीस साल बाद रुद्र के परिवार का कोई वंशज हवेली में आएगा और उसकी जगह कैद हो जाएगा।

     

    आरव की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “तो मेरे पिता?”

     

    मीरा ने सिर झुका लिया।

     

    “तुम्हारे पिता ने तुम्हें बचाने के लिए अपना नाम और शहर बदल दिया था।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “और तुम?”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “मैंने तुम्हें यहाँ इसलिए बुलाया क्योंकि मुझे लगा था कि तुम ही इस श्राप को खत्म कर सकते हो।”

     

    परछाईं जोर से हँसी।

     

    “वह श्राप खत्म नहीं कर सकता।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    परछाईं ने उसकी तरफ देखते हुए कहा—

     

    “क्योंकि अब तुम मेरे हो।”

     

    अचानक आरव के हाथ में जलन होने लगी।

     

    उसकी हथेली पर एक काला निशान बन गया।

     

    मीरा चिल्लाई—

     

    “आरव! चाबी को आग में डालो!”

     

    कमरे के बीच एक पुरानी लोहे की भट्टी जल रही थी।

     

    आरव ने चाबी उसमें फेंक दी।

     

    आग अचानक नीली हो गई।

     

    परछाईं दर्द से चीखने लगी।

     

    “नहीं!”

     

    पूरा कमरा काँपने लगा।

     

    दीवारों में दरारें पड़ गईं।

     

    मीरा ने आरव से कहा—

     

    “जल्दी! आख़िरी दरवाज़ा खोलो!”

     

    आरव ने सामने देखा।

     

    वहाँ एक छोटा-सा लकड़ी का दरवाज़ा था।

     

    उस पर कोई ताला नहीं था।

     

    लेकिन उसके ऊपर लिखा था—

     

    “जिसे सच स्वीकार है, वही इसे खोल सकता है।”

     

    आरव ने दरवाज़े पर हाथ रखा।

     

    उसके सामने उसके पिता दिखाई दिए।

     

    वह रो रहे थे।

     

    “बेटा, मुझे माफ करना।”

     

    आरव की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “आपने मुझे क्यों छोड़ा?”

     

    उसके पिता ने कहा—

     

    “क्योंकि अगर मैं तुम्हें अपने पास रखता, तो वह तुम्हें ढूँढ लेता।”

     

    दृश्य गायब हो गया।

     

    फिर आरव ने अपनी माँ को देखा।

     

    फिर बचपन की यादें।

     

    फिर वह रात जब उसके पिता अचानक घर छोड़कर चले गए थे।

     

    आरव समझ गया कि उसके माता-पिता ने उससे नफरत नहीं की थी।

     

    वे उसे बचा रहे थे।

     

    उसने दरवाज़ा खोल दिया।

     

    अंदर कुछ नहीं था।

     

    सिर्फ एक आईना।

     

    आरव आईने के सामने खड़ा हुआ।

     

    आईने में उसे अपना चेहरा दिखाई दिया।

     

    लेकिन उसके पीछे मीरा खड़ी थी।

     

    और उसके पीछे वह काली परछाईं।

     

    मीरा ने कहा—

     

    “आरव, तुम्हें फैसला करना होगा।”

     

    “कैसा फैसला?”

     

    “या तो तुम हवेली से बाहर जाओ और श्राप हमेशा के लिए तुम्हारे परिवार के साथ रहेगा…”

     

    “या?”

     

    “या तुम यहीं रहकर इसे खत्म कर दो।”

     

    आरव ने परछाईं की तरफ देखा।

     

    “अगर मैं यहीं रह गया तो?”

     

    मीरा मुस्कुराई।

     

    “तुम्हारा शरीर नहीं रहेगा। लेकिन तुम्हारी आत्मा इस हवेली को हमेशा के लिए बंद कर देगी।”

     

    आरव कुछ सेकंड तक चुप रहा।

     

    फिर उसने फैसला कर लिया।

     

    उसने आईने को उठाया और पूरी ताकत से जमीन पर पटक दिया।

     

    छन्न्न्न!

     

    आईना टूटते ही भयंकर चीख सुनाई दी।

     

    काली परछाईं टूटने लगी।

     

    उसका शरीर धुएँ में बदल गया।

     

    “तुम नहीं जानते कि तुमने क्या किया है!”

     

    आरव ने कहा—

     

    “अब इस हवेली में कोई नहीं फँसेगा।”

     

    परछाईं ने आख़िरी बार चीखते हुए कहा—

     

    “अगर मैं खत्म हुआ… तो तुम्हारी यादें भी खत्म होंगी!”

     

    अचानक आरव के सिर में तेज दर्द हुआ।

     

    उसने अपनी आँखें बंद कर लीं।

     

    जब उसने आँखें खोलीं तो सुबह हो चुकी थी।

     

    वह जंगल के बाहर सड़क पर पड़ा था।

     

    उसके पास कबीर भी बेहोश पड़ा था।

     

    कुछ देर बाद कबीर ने आँखें खोलीं।

     

    “आरव…”

     

    “हाँ?”

     

    “हम बच गए?”

     

    आरव ने पीछे देखा।

     

    वहाँ अब कोई हवेली नहीं थी।

     

    सिर्फ एक जला हुआ खंडहर था।

     

    दोनों धीरे-धीरे सड़क की तरफ चलने लगे।

     

    लेकिन आरव को कुछ अजीब महसूस हो रहा था।

     

    उसे अपने बचपन की कोई याद नहीं आ रही थी।

     

    उसे अपने माता-पिता के चेहरे याद नहीं थे।

     

    उसे अपना पुराना घर याद नहीं था।

     

    यहाँ तक कि उसे यह भी याद नहीं था कि वह कबीर को कब से जानता था।

     

    कबीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम ठीक हो?”

     

    आरव ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “हाँ।”

     

    फिर उसने अपनी जेब में हाथ डाला।

     

    उसके हाथ में एक छोटी-सी तस्वीर थी।

     

    तस्वीर में मीरा खड़ी थी।

     

    लेकिन अब वह मुस्कुरा रही थी।

     

    तस्वीर के पीछे एक आख़िरी वाक्य लिखा था—

     

    “धन्यवाद, आरव। अब मैं आज़ाद हूँ।”

     

    आरव ने तस्वीर को सीने से लगा लिया।

     

    तभी दूर जंगल के अंदर से किसी बच्ची की हँसी सुनाई दी।

     

    आरव और कबीर दोनों रुक गए।

     

    कबीर ने घबराकर पूछा—

     

    “तुमने भी सुना?”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    दोनों ने पीछे मुड़कर जंगल की तरफ देखा।

     

    वहाँ कुछ नहीं था।

     

    सिर्फ पेड़ों के बीच हवा चल रही थी।

     

    आरव ने राहत की साँस ली और आगे बढ़ गया।

     

    लेकिन उसे पता नहीं था…

     

    कि उसकी जेब में रखी तस्वीर के अंदर मीरा अब अकेली नहीं थी।

     

    उसके पीछे एक नया चेहरा दिखाई दे रहा था।

     

    वही काली परछाईं।

     

    और तस्वीर के नीचे धीरे-धीरे नए शब्द उभर रहे थे—

     

    “हवेली खत्म हुई है… श्राप नहीं।”

     

    समाप्त।

  • काली हवेली का आख़िरी कमरा — भाग 2: तेरहवीं चाबी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    आरव पूरी रात सो नहीं पाया।

     

    उसके हाथ में वही पुरानी चाबी थी, जिस पर 13 लिखा हुआ था।

     

    सुबह होते ही उसने अपने दोस्त कबीर को फोन किया।

     

    “कबीर, मुझे तुमसे मिलना है। अभी।”

     

    दूसरी तरफ कुछ सेकंड तक खामोशी रही।

     

    फिर कबीर ने धीमी आवाज़ में पूछा—

     

    “तुम भैरवगढ़ गए थे?”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    कबीर ने जवाब नहीं दिया।

     

    बस इतना कहा—

     

    “तुम जहाँ हो, वहीं रहो। मैं आ रहा हूँ।”

     

    करीब एक घंटे बाद कबीर आरव के कमरे में पहुँचा।

     

    आरव ने बिना कुछ कहे उसके सामने चाबी रख दी।

     

    चाबी देखते ही कबीर का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “ये तुम्हें कहाँ मिली?”

     

    “काली हवेली में।”

     

    कबीर कुर्सी से उठ खड़ा हुआ।

     

    “तुम वहाँ गए थे?”

     

    आरव ने पूरी घटना बता दी।

     

    मीरा…

     

    आख़िरी कमरा…

     

    तेरह नंबर की चाबी…

     

    और वह तस्वीर।

     

    कबीर चुपचाप सुनता रहा।

     

    फिर उसने अपने बैग से एक पुरानी डायरी निकाली।

     

    “मेरे दादा ने ये डायरी मुझे मरने से पहले दी थी।”

     

    उसने डायरी खोली।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “भैरवगढ़ की हवेली में जो दिखाई देता है, वह सच नहीं होता। और जो दिखाई नहीं देता, वही सबसे खतरनाक है।”

     

    आरव ने अगला पन्ना पलटा।

     

    वहाँ रुद्र प्रताप सिंह का नाम था।

     

    कबीर बोला—

     

    “मेरे दादा इस हवेली में चौकीदार थे। उन्होंने बताया था कि रुद्र प्रताप की बेटी मीरा को बचपन से एक अजीब बीमारी थी। वह अक्सर कहती थी कि उसे घर की दीवारों के अंदर से कोई बुलाता है।”

     

    “कौन?”

     

    “उसे नहीं पता था।”

     

    कबीर ने डायरी का एक और पन्ना खोला।

     

    उसमें हवेली का नक्शा बना था।

     

    लेकिन नक्शे में एक ऐसी मंज़िल दिखाई दे रही थी जो हवेली में मौजूद ही नहीं थी।

     

    तहखाना — कमरा 13।

     

    आरव ने चाबी उठाई।

     

    “तो मुझे वहाँ जाना होगा।”

     

    कबीर ने तुरंत कहा—

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मेरे दादा ने लिखा है कि कमरा 13 का दरवाज़ा खोलने वाला कभी वापस नहीं आया।”

     

    कुछ पल दोनों के बीच खामोशी रही।

     

    फिर आरव ने कहा—

     

    “लेकिन मीरा ने मुझे बुलाया है।”

     

    कबीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “और अगर मीरा तुम्हें बचाना नहीं, फँसाना चाहती हो तो?”

     

    आरव के पास कोई जवाब नहीं था।

     

    शाम होते ही दोनों भैरवगढ़ के लिए निकल पड़े।

     

    रास्ते भर बारिश होती रही।

     

    जब वे उस जगह पहुँचे, जहाँ पिछली रात आरव को हवेली दिखाई दी थी, वहाँ अब भी सिर्फ घना जंगल था।

     

    कबीर ने डायरी निकालकर नक्शा देखा।

     

    “हवेली यहीं होनी चाहिए।”

     

    दोनों कुछ देर तक तलाश करते रहे।

     

    अचानक आरव की नजर एक पुराने कुएँ पर पड़ी।

     

    कुएँ के किनारे वही निशान बना था जो डायरी के नक्शे पर था।

     

    कबीर ने पत्थर हटाया।

     

    नीचे सीढ़ियाँ दिखाई दीं।

     

    दोनों नीचे उतरने लगे।

     

    लगभग पचास सीढ़ियों के बाद एक पत्थर की सुरंग सामने आई।

     

    सुरंग के अंत में लोहे का दरवाज़ा था।

     

    उस पर लिखा था—

     

    13

     

    आरव ने चाबी ताले में लगाई।

     

    ताला अपने आप खुल गया।

     

    दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला।

     

    अंदर एक बड़ा कमरा था।

     

    कमरे की दीवारों पर दर्जनों तस्वीरें लगी थीं।

     

    हर तस्वीर में कोई न कोई इंसान था।

     

    कुछ लोग रो रहे थे।

     

    कुछ चिल्ला रहे थे।

     

    कुछ सीधे कैमरे की तरफ देख रहे थे।

     

    कबीर ने एक तस्वीर उठाई।

     

    उसका चेहरा अचानक बदल गया।

     

    “आरव…”

     

    “क्या हुआ?”

     

    कबीर ने तस्वीर आरव को दिखाई।

     

    उसमें एक छोटे बच्चे की तस्वीर थी।

     

    नीचे नाम लिखा था—

     

    “देवेंद्र — उम्र 8 वर्ष।”

     

    कबीर काँपने लगा।

     

    “ये मेरे दादा हैं।”

     

    आरव ने तस्वीर को ध्यान से देखा।

     

    तस्वीर में छोटा देवेंद्र उसी कमरे में खड़ा था।

     

    उसके पीछे मीरा खड़ी थी।

     

    लेकिन यह तस्वीर लगभग चालीस साल पुरानी थी।

     

    “ये कैसे हो सकता है?”

     

    कबीर ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    तभी कमरे के अंदर से आवाज़ आई—

     

    “क्योंकि वह कभी यहाँ से गया ही नहीं।”

     

    दोनों ने पीछे देखा।

     

    मीरा खड़ी थी।

     

    लेकिन इस बार वह बच्ची नहीं लग रही थी।

     

    उसका चेहरा बूढ़ा दिखाई दे रहा था।

     

    बाल सफेद थे।

     

    आँखें काली।

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “तुम मीरा नहीं हो।”

     

    वह मुस्कुराई।

     

    “मैं मीरा हूँ।”

     

    “तो तुम्हारी उम्र…?”

     

    “इस हवेली में उम्र नहीं बढ़ती।”

     

    मीरा ने दीवार की तरफ इशारा किया।

     

    “यहाँ हर इंसान की एक रात बंद है।”

     

    अचानक एक तस्वीर जमीन पर गिर गई।

     

    उसमें रुद्र प्रताप सिंह थे।

     

    उनके हाथ में वही तेरह नंबर की चाबी थी।

     

    आरव ने तस्वीर उठाई।

     

    पीछे कुछ लिखा था—

     

    “रुद्र ने दरवाज़ा खोला था, लेकिन बाहर कुछ और निकला।”

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “क्या निकला?”

     

    मीरा ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे दादा जानते थे।”

     

    अचानक कमरे की दीवार पर एक दरवाज़ा दिखाई दिया।

     

    दरवाज़ा काला था।

     

    उसके ऊपर लाल अक्षरों में लिखा था—

     

    “जिसे अंदर बुलाया गया है, वही बाहर जा सकता है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “मुझे क्यों बुलाया गया?”

     

    मीरा चुप रही।

     

    फिर उसने धीरे से कहा—

     

    “क्योंकि तुम रुद्र के परिवार से जुड़े हो।”

     

    आरव के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “क्या?”

     

    कबीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुमने मुझे कभी नहीं बताया कि तुम्हारे परिवार का नाम क्या है।”

     

    आरव ने घबराकर कहा—

     

    “मेरा नाम आरव मल्होत्रा है। मेरा रुद्र प्रताप से कोई संबंध नहीं।”

     

    मीरा हँसने लगी।

     

    “नाम बदलने से खून नहीं बदलता।”

     

    कमरे की सारी तस्वीरें एक साथ हिलने लगीं।

     

    फिर एक तस्वीर दीवार से गिरकर आरव के पैरों के पास आ गिरी।

     

    उसमें एक नवजात बच्चा था।

     

    गोद में उसे पकड़े एक आदमी खड़ा था।

     

    वह आदमी रुद्र प्रताप था।

     

    और बच्चे के नीचे लिखा था—

     

    “आरव।”

     

    आरव के हाथ काँपने लगे।

     

    “ये झूठ है।”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “तुम्हारे पिता ने तुम्हें सच से दूर रखा।”

     

    कबीर ने तस्वीर पलटी।

     

    पीछे लिखा था—

     

    “जब आरव 21 साल का होगा, दरवाज़ा फिर खुलेगा।”

     

    आरव ने अपनी उम्र याद की।

     

    वह अगले दिन 21 साल का होने वाला था।

     

    उसी समय हवेली के अंदर से एक भयानक चीख सुनाई दी।

     

    फिर किसी आदमी की भारी आवाज़ गूँजी—

     

    “समय पूरा हो गया।”

     

    मीरा पीछे हट गई।

     

    उसके चेहरे पर पहली बार डर दिखाई दिया।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कौन है?”

     

    मीरा ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “वही… जिसने हम सबको कैद किया है।”

     

    अचानक काला दरवाज़ा खुल गया।

     

    अंदर घना अंधेरा था।

     

    उस अंधेरे में दो लाल आँखें चमक रही थीं।

     

    कबीर ने आरव का हाथ पकड़ा।

     

    “भागो!”

     

    दोनों पीछे मुड़े।

     

    लेकिन रास्ता गायब हो चुका था।

     

    कमरे की दीवारें धीरे-धीरे उनके करीब आने लगीं।

     

    मीरा चीखी—

     

    “आरव! अंदर जाओ!”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि अगर तुम अंदर नहीं गए, तो वह बाहर आ जाएगा!”

     

    आरव ने काले दरवाज़े की तरफ देखा।

     

    अंधेरे से एक हाथ बाहर निकला।

     

    वह हाथ इंसान जैसा था…

     

    लेकिन उसकी उंगलियाँ असामान्य रूप से लंबी थीं।

     

    आरव ने हिम्मत जुटाई और दरवाज़े के अंदर कदम रख दिया।

     

    कबीर उसके पीछे गया।

     

    दरवाज़ा उनके पीछे बंद हो गया।

     

    अंदर एक लंबा कमरा था।

     

    कमरे के बीचों-बीच एक कुर्सी रखी थी।

     

    कुर्सी पर एक आदमी बैठा था।

     

    उसका चेहरा आरव जैसा था।

     

    लेकिन उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

     

    वह धीरे से मुस्कुराया।

     

    “आख़िरकार तुम आ ही गए।”

     

    आरव ने काँपते हुए पूछा—

     

    “तुम कौन हो?”

     

    आदमी ने सिर उठाया।

     

    “मैं वही हूँ…”

     

    उसने कहा,

     

    “…जिसे तुम्हारे परिवार ने तीस साल पहले इस हवेली में बंद किया था।”

     

    आरव कुछ बोल नहीं पाया।

     

    आदमी आगे झुका।

     

    “लेकिन अब मुझे आज़ाद होने के लिए सिर्फ तुम्हारे खून की जरूरत है।”

     

    अचानक पीछे से कबीर की चीख सुनाई दी।

     

    आरव ने पलटकर देखा।

     

    कबीर गायब था।

     

    दरवाज़ा भी गायब था।

     

    और सामने बैठा वह आदमी धीरे-धीरे अपनी कुर्सी से उठ रहा था।

     

    “अब हम दोनों अकेले हैं, आरव।”

     

    तभी दूर कहीं घड़ी ने बारह बजने की आवाज़ की।

     

    टन… टन… टन…

     

    तेरहवीं घंटी बजते ही आदमी का चेहरा बदल गया।

     

    अब वह आदमी नहीं था।

     

    वह एक भयानक काली परछाईं बन चुका था।

     

    और उसके पीछे दीवार पर खून से एक वाक्य लिखा जा रहा था—

     

     

  • दो घरों के बीच बटा एक आदमी

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    दो घरों के बीच बंटा एक आदमी

     

    शहर से थोड़ा दूर बसे एक छोटे से गांव में शान अपने परिवार का सबसे बड़ा बेटा था। पिता की तबीयत अक्सर खराब रहती थी और घर की जिम्मेदारी धीरे-धीरे शान के कंधों पर आ गई थी। मां की सबसे बड़ी चिंता यही थी कि बेटे का घर बस जाए, ताकि वह भी चैन से जी सके।

     

    शान की उम्र करीब पच्चीस साल थी, जब उसकी शादी परिवार वालों ने नंदिनी से कर दी।

     

    नंदिनी बहुत साधारण परिवार की शांत और समझदार लड़की थी। वह ज्यादा बोलती नहीं थी, लेकिन उसके मन में अपने पति और नए परिवार के लिए बहुत सम्मान था।

     

    शादी के बाद शान को नौकरी के लिए दूसरे शहर जाना पड़ा।

     

    जाते समय नंदिनी ने पूछा, “आप इतनी जल्दी चले जाएंगे?”

     

    शान ने मुस्कुराकर कहा, “क्या करूं? नौकरी है। कुछ साल मेहनत कर लूं, फिर तुम्हें भी अपने पास बुला लूंगा।”

     

    नंदिनी ने विश्वास से सिर हिला दिया।

     

    “मुझे आप पर भरोसा है।”

     

    शान शहर चला गया।

     

    कुछ महीनों बाद नंदिनी ने एक बेटे को जन्म दिया। उसका नाम रखा गया आरव।

     

    शान जब घर आया और पहली बार बेटे को गोद में उठाया तो उसकी आंखों में आंसू आ गए।

     

    “इतना छोटा है…”

     

    नंदिनी मुस्कुराई।

     

    “आपका बेटा है।”

     

    शान ने बच्चे के माथे को चूमा।

     

    “मैं इसके लिए बहुत कुछ करूंगा।”

     

    समय बीतता गया।

     

    दो साल बाद उनके घर दूसरा बेटा हुआ। उसका नाम रखा गया अंश।

     

    अब नंदिनी की पूरी दुनिया अपने दोनों बच्चों और शान के इर्द-गिर्द घूमती थी।

     

    शान हर महीने पैसे भेजता था। फोन पर बच्चों से बातें करता और नंदिनी से कहता—

     

    “बस थोड़ा और वक्त। फिर मैं तुम्हें और बच्चों को अपने पास ले आऊंगा।”

     

    नंदिनी हर बार यही कहती—

     

    “ठीक है, मैं इंतजार करूंगी।”

     

    लेकिन शहर की जिंदगी ने धीरे-धीरे शान को बदलना शुरू कर दिया।

     

    उसी शहर में उसके ऑफिस में रिया नाम की एक लड़की काम करती थी। दोनों की दोस्ती हुई और धीरे-धीरे वह दोस्ती ऐसी जगह पहुंच गई, जहां शान को अपनी पहली शादी, अपने बच्चों और नंदिनी का इंतजार सब कुछ छोटा लगने लगा।

     

    एक दिन रिया ने उससे कहा—

     

    “तुम हमेशा कहते हो कि तुम्हारा परिवार गांव में है। लेकिन तुम यहां अकेले रहते हो। आखिर कब तक?”

     

    शान ने नजरें झुका लीं।

     

    “मुझे पता नहीं।”

     

    रिया ने कहा, “अगर तुम मेरे साथ रहना चाहते हो तो पुराने रिश्ते को खत्म कर दो।”

     

    शान चुप रहा।

     

    उसके मन में नंदिनी का चेहरा आया।

     

    लेकिन उसने उस आवाज को दबा दिया।

     

    कुछ ही समय बाद शान ने रिया से दूसरी शादी कर ली।

     

    उसने अपने परिवार को इसकी भनक तक नहीं लगने दी।

     

    गांव में नंदिनी अब भी उसका इंतजार कर रही थी।

     

    एक शाम दोनों बच्चे आंगन में खेल रहे थे।

     

    आरव ने पूछा, “मां, पापा कब आएंगे?”

     

    नंदिनी ने मुस्कुराकर कहा, “जल्दी आएंगे बेटा।”

     

    अंश ने मासूमियत से पूछा, “पापा हमारे लिए खिलौना लाएंगे?”

     

    नंदिनी ने दोनों को गले लगा लिया।

     

    “हां, बहुत सारे खिलौने लाएंगे।”

     

    लेकिन उस रात नंदिनी के फोन पर शान का संदेश आया—

     

    “कुछ दिनों तक मुझे फोन मत करना। काम बहुत ज्यादा है।”

     

    नंदिनी को पहली बार कुछ अजीब लगा।

     

    उसने कई बार फोन किया, लेकिन शान ने फोन नहीं उठाया।

     

    कुछ दिन बाद शान के एक पुराने दोस्त ने नंदिनी को सच बता दिया।

     

    “भाभी… शान ने शहर में दूसरी शादी कर ली है।”

     

    नंदिनी कुछ पल तक बिल्कुल शांत बैठी रही।

     

    उसे लगा जैसे किसी ने उसके कानों में गलत बात कह दी हो।

     

    “क्या?”

     

    “मुझे बहुत पहले से पता था, लेकिन हिम्मत नहीं हुई बताने की।”

     

    नंदिनी की आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    उसने अपने दोनों बच्चों को देखा।

     

    आरव और अंश अभी भी अपने पिता का इंतजार कर रहे थे।

     

    उस रात नंदिनी ने पहली बार अपने बच्चों के सामने रोने से खुद को रोक नहीं पाया।

     

    आरव उसके पास आया।

     

    “मां, आपको क्या हुआ?”

     

    नंदिनी ने जल्दी से आंसू पोंछे।

     

    “कुछ नहीं बेटा।”

     

    “पापा ने आपको कुछ कहा?”

     

    नंदिनी ने उसे सीने से लगा लिया।

     

    “नहीं… तुम्हारे पापा ने कुछ नहीं कहा।”

     

    लेकिन उसके दिल में बहुत कुछ टूट चुका था।

     

    कुछ महीनों तक नंदिनी ने शान से कोई सवाल नहीं किया।

     

    वह बस अपने दोनों बच्चों को पालती रही।

     

    उधर शान अपनी दूसरी पत्नी रिया के साथ शहर में रहने लगा।

     

    शुरुआत में उसे लगा कि उसने अपनी जिंदगी का सबसे अच्छा फैसला लिया है।

     

    लेकिन कुछ ही महीनों बाद रिया को शान की पहली शादी और बच्चों के बारे में पता चल गया।

     

    एक दिन उसने पूछा—

     

    “तुमने मुझे बताया क्यों नहीं कि तुम्हारे दो बच्चे हैं?”

     

    शान चुप रहा।

     

    रिया ने गुस्से में कहा—

     

    “तुमने मेरे साथ भी झूठ बोला।”

     

    शान के पास कोई जवाब नहीं था।

     

    जिस झूठ को वह अपनी पहली पत्नी से छिपा रहा था, वही झूठ अब उसके दूसरे रिश्ते को भी तोड़ने लगा था।

     

    एक दिन ऑफिस से लौटते समय शान को खबर मिली कि उसके पिता बहुत बीमार हैं।

     

    वह तुरंत गांव पहुंचा।

     

    घर के बाहर वही पुराना आंगन था।

     

    नंदिनी बच्चों के साथ बैठी थी।

     

    शान को देखते ही दोनों बच्चे दौड़ पड़े।

     

    “पापा!”

     

    आरव उससे लिपट गया।

     

    अंश ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “पापा, आप इतने दिनों बाद आए!”

     

    शान की आंखें भर आईं।

     

    उसने दोनों बच्चों को गले लगा लिया।

     

    फिर उसकी नजर नंदिनी पर पड़ी।

     

    वह पहले से बहुत शांत लग रही थी।

     

    शान ने धीमे से कहा—

     

    “नंदिनी…”

     

    नंदिनी ने सिर्फ इतना पूछा—

     

    “अब क्यों आए हो?”

     

    शान के पास कोई जवाब नहीं था।

     

    “पापा बीमार हैं।”

     

    “मैं जानती हूं।”

     

    कुछ देर चुप्पी रही।

     

    फिर नंदिनी ने कहा—

     

    “तुमने दूसरी शादी कर ली, यह सुनकर मुझे सबसे ज्यादा दुख इस बात का नहीं हुआ कि तुमने मुझे छोड़ दिया।”

     

    शान ने उसकी तरफ देखा।

     

    नंदिनी की आंखों में आंसू थे।

     

    “मुझे दुख इस बात का हुआ कि तुमने अपने बच्चों को भी छोड़ दिया।”

     

    शान सिर झुका कर खड़ा रहा।

     

    “आरव हर रात पूछता था कि पापा कब आएंगे। अंश तुम्हारे लिए दरवाजे पर बैठा रहता था।”

     

    शान की आंखों से आंसू गिरने लगे।

     

    नंदिनी ने कहा—

     

    “तुम्हें मुझसे प्यार नहीं था, ठीक है। लेकिन बच्चों ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था?”

     

    यह सवाल शान के दिल में उतर गया।

     

    वह पहली बार खुद को आईने में देख रहा था।

     

    उसे याद आया कि उसने कभी बच्चों से वादा किया था कि वह उनके लिए सब कुछ करेगा।

     

    लेकिन वह वादा भी वह भूल गया था।

     

    शान ने हाथ जोड़ दिए।

     

    “मुझे माफ कर दो।”

     

    नंदिनी ने सिर हिला दिया।

     

    “माफी मांगना आसान है शान। लेकिन जो साल तुमने हमसे छीन लिए, वो वापस नहीं आएंगे।”

     

    शान कुछ नहीं बोल पाया।

     

    उस दिन उसने अपने पिता के सामने भी सब सच स्वीकार कर लिया।

     

    पिता ने कमजोर आवाज में कहा—

     

    “बेटा, घर छोड़ना आसान होता है… लेकिन जिम्मेदारी से भागकर कोई खुश नहीं रह सकता।”

     

    शान के पास कोई जवाब नहीं था।

     

    वह अपने बच्चों के पास गया।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “पापा, अब आप हमारे साथ रहोगे?”

     

    शान की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    उसने बेटे को गले लगाकर कहा—

     

    “मैं तुम्हें फिर कभी अकेला महसूस नहीं होने दूंगा।”

     

    लेकिन नंदिनी ने तुरंत कहा—

     

    “बच्चों से किया वादा निभाना। मेरे लिए नहीं।”

     

    शान ने सिर झुका लिया।

     

    उसे समझ आ चुका था कि परिवार केवल एक छत के नीचे रहने का नाम नहीं है।

     

    परिवार वह रिश्ता है जिसमें किसी एक की खुशी के लिए दूसरे की पूरी जिंदगी नहीं कुचली जाती।

     

    शान ने अपनी गलतियों की जिम्मेदारी उठाने का फैसला किया।

     

    उसने दूसरी पत्नी से भी सच-सच बात की और अपने दोनों बच्चों की जिम्मेदारी स्वीकार की।

     

    नंदिनी ने उसे वापस पति के रूप में स्वीकार किया या नहीं, यह फैसला उसने तुरंत नहीं किया।

     

    लेकिन एक मां होने के नाते उसने बच्चों को उनके पिता से दूर भी नहीं किया।

     

    समय के साथ शान रोज बच्चों से मिलने लगा।

     

    वह उनके स्कूल जाता, उनके साथ बैठता और उनकी छोटी-छोटी बातें सुनता।

     

    उसे अब समझ आ चुका था कि पैसे भेज देना पिता होने की पूरी जिम्मेदारी नहीं थी।

     

    कभी-कभी बच्चों को सिर्फ पिता की जरूरत होती है।

     

    और नंदिनी?

     

    उसने खुद को फिर से संभालना सीख लिया।

     

    उसने शान को माफ करने में समय लिया, क्योंकि टूटे हुए भरोसे को जोड़ना शब्दों से नहीं, सालों की सच्चाई से होता है।

     

    शान को आखिरकार समझ आया कि उसने दूसरी शादी करके कोई नया जीवन नहीं पाया था।

     

    उसने बस अपने पुराने जीवन की जिम्मेदारियों से भागने की कोशिश की थी।

     

    और जिम्मेदारियों से भागने वाला इंसान चाहे कितनी भी दूर चला जाए…

     

    एक दिन उसे अपने किए हुए फैसलों के सामने वापस खड़ा होना ही पड़ता है।

  • Bound by fate

    Bound by fate

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    Bound by Fate

     

    भाग 3

     

    राधे राधे दोस्तों ❤️

    ✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️

     

    अगली सुबह

     

    सुबह के आठ बजे

     

    खिड़की से आती सूरज की हल्की किरणें धीरे-धीरे कमरे में फैल रही थीं। कमरे में रात की खामोशी अब भी मौजूद थी।

     

    तभी बेड पर लेटी लड़की के हाथों में हल्की-सी हरकत हुई। उसकी पलकों में कंपन हुआ। कुछ ही सेकंड बाद उसने धीरे-धीरे अपनी आंखें खोल दीं। कमरे में अभी भी हल्का अंधेरा था, बस कमरे के पर्दों से छनकर आती सूरज की किरणें कमरे को हल्की रोशनी से भर रही थीं।

     

    आंखें खुलते ही उसने छत की तरफ देखा। कुछ पल तक वह यूं ही देखती रही। फिर उसकी नजरें कमरे में घूमने लगीं। लेकिन उसे कुछ भी पहचान में नहीं आया।

     

    वह कहां थी?

     

    उसने उठकर बैठने की कोशिश की। लेकिन शरीर में इतनी कमजोरी थी कि वह ठीक से बैठ भी नहीं पाई।

     

    उसने दोबारा कोशिश की। इस बार किसी तरह उठकर बैठ गई।

     

    उसका सिर भारी था। शरीर में दर्द था और गला बिल्कुल सूख रहा था। उसने अपने कपड़ों की तरफ देखा।

     

    उसने जो लाल सूट पहना था…

     

    वो अब वहां नहीं था।

     

    उसकी जगह उसने एक मुलायम-सा ढीला कुर्ता पहन रखा था।

     

    वो घबरा गई।

     

    तभी…

     

    दरवाजा खुला।

     

    लड़की ने तुरंत नजरें उठाईं।

     

    सामने दरवाजे पर एक आदमी खड़ा था।

     

    वही आदमी…

     

    जिसने पिछली रात उसे सड़क से उठाया था।

     

    रूद्रांश शेखावत।

     

    गेहुआं रंग… लगभग छह फुट दो इंच लंबा कद… गहरी नीली आंखें… शार्प जॉलाइन… हल्की बियर्ड… सख्त चेहरे की बनावट…

     

    और चेहरे पर एक ऐसा अजीब-सा आकर्षण, जिससे नजरें हटाना आसान नहीं था।

     

    उसका शरीर बेहद फिट था और उसकी पूरी personality में एक अलग ही रौब था।

     

    वह जितना हैंडसम था…

     

    उतना ही रहस्यमयी भी।

     

    रूद्रांश की नजर जैसे ही लड़की पर पड़ी, उसने शांत स्वर में कहा,

     

    “आखिर तुम होश में आ ही गईं।”

     

    उसकी आवाज सुनकर लड़की का ध्यान टूटा। उसने घबराकर उसे देखा और अनजाने में ब्लैंकेट को अपनी मुट्ठियों में कस लिया।

     

    रूद्रांश ने तुरंत ही उसकी घबराहट नोटिस कर ली। वह कुछ कदम आगे बढ़ा, लेकिन उससे उचित दूरी बनाकर रुक गया।

     

    “हे, डरो मत।”

     

    उसकी आवाज इस बार थोड़ी नरम थी।

     

    “तुम यहां बिल्कुल सेफ हो।”

     

    लड़की की आंखों में अब भी डर और उलझन थी।

     

    उसने मुश्किल से अपनी आवाज निकाली।

     

    “आ… आप कौन हैं?”

     

    कुछ पल रुककर उसने पूछा,

     

    “और मैं यहां कैसे आई?”

     

    रूद्रांश के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आई।

     

    “ये सवाल तो मुझे तुमसे पूछना चाहिए।”

     

    फिर वह बेड के पास रखी कुर्सी पर बैठ गया और बोला,

     

    “लेकिन चलो… पहले मैं ही बता देता हूं।”

     

    उसने लड़की की तरफ देखते हुए कहा,

     

    “मेरा नाम रूद्रांश शेखावत है। शायद तुमने मेरा नाम सुना होगा।”

     

    लड़की चुप रही।

     

    रूद्रांश ने आगे पूछा,

     

    “अब तुम बताओ… तुम कौन हो?”

     

    वह कुछ पल चुप रही।

     

    जैसे अपने ही नाम को याद करने की कोशिश कर रही हो।

     

    उसके होंठ हिले।

     

    “म… मेरा नाम…”

     

    वह रुक गई।

     

    उसने अपनी आंखें बंद कीं।

     

    कुछ सोचने के बाद बहुत धीमी आवाज में बोली,

     

    “ई… ईशानी…”

     

    रूद्रांश के चेहरे के भाव सामान्य रहे।

     

    “ओके…”

     

    उसने सिर थोड़ा झुकाया।

     

    “तो मिस ईशानी… कल रात तुम उस सुनसान सड़क पर अकेली क्या कर रही थीं?”

     

    लेकिन उसकी तेज निगाहें ईशानी के चेहरे के भावों को परख रही थीं।

     

    ईशानी का चेहरा अचानक बदल गया।

     

    उसकी आंखों में बेचैनी फैल गई।

     

    वह कुछ याद करने की कोशिश करने लगी।

     

    लेकिन…

     

    कुछ भी साफ याद नहीं आया।

     

    सिर्फ धुंधली-सी तस्वीरें।

     

    उसने अपना सिर पकड़ लिया।

     

    अचानक सिर में तेज दर्द उठा।

     

    “आह…”

     

    उसके मुंह से दर्द भरी आवाज निकली।

     

    रूद्रांश तुरंत उठ खड़ा हुआ।

     

    “रिलैक्स!”

     

    उसने गंभीर लेकिन शांत आवाज में कहा,

     

    “फिलहाल, कुछ याद करने की जरूरत नहीं है।”

     

    ईशानी ने उसकी तरफ देखा।

     

    रूद्रांश कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    उसे समझ आ गया कि मामला उसकी सोच से कहीं ज्यादा उलझा हुआ था।

     

    वह अपनी जेब की तरफ हाथ ले गया।

     

    सिगरेट निकालने वाला था…

     

    लेकिन फिर रुक गया।

     

    उसने सिगरेट वापस जेब में रख दी।

     

    वो हमेशा ऐसा ही करता था।

     

    जब कोई चीज उसे परेशान करती या कोई मामला उसकी समझ से बाहर होता, तो वह सिगरेट जला लेता था।

     

    लेकिन आज…

     

    पता नहीं क्यों, उसके सामने बैठी ये लड़की उसकी उस आदत को भी रोक रही थी।

     

    रूद्रांश ने आखिरकार कहा,

     

    “शायद तुमने काफी समय से ठीक से कुछ खाया नहीं, इसलिए मैं तुम्हारे खाने के लिए कुछ भिजवा रहा हूँ। उसके बाद तुम्हें दवाई भी लेनी है।”

     

    कहकर वह कमरे से बाहर निकला और उसने दरवाजा भी बंद कर दिया।

     

    ईशानी कुछ पल तक उसी दरवाजे को देखती रही।

     

    फिर उसने धीरे से अपनी आंखें बंद कर लीं।

     

    वह याद करने की कोशिश करने लगी।

     

    कुछ…

     

    बहुत धुंधली तस्वीरें उसके दिमाग में उभरने लगीं।

     

    एक मंडप…

     

    चारों तरफ लोग…

     

    कोई उसका हाथ जबरदस्ती पकड़कर उसे खींच रहा था…

     

    उसकी चीख…

     

    किसी की तेज आवाज…

     

    फिर अंधेरा…

     

    और उसके बाद…

     

    बारिश में भागती हुई वो खुद।

     

    अचानक उसे किसी पुरुष की गुस्से से भरी आवाज सुनाई दी।

     

    “तुम कहीं नहीं जा सकतीं!”

     

    ईशानी का पूरा शरीर कांप उठा।

     

    उसने अपनी आंखें कसकर बंद कर लीं।

     

    एक पल के लिए उसे किसी के हाथ में चमकती हुई अंगूठी दिखाई दी…

     

    फिर लाल रंग…

     

    बहुत सारा लाल रंग…

     

    और उसके कानों में किसी लड़की के रोने की आवाज गूंजने लगी।

     

    लेकिन इससे पहले कि वह उस आवाज को पहचान पाती, सब कुछ फिर से धुंधला हो गया।

     

    ईशानी ने अचानक आंखें खोल दीं।

     

    उसकी सांसें तेज हो चुकी थीं।

     

    उसने अपने सीने पर हाथ रखा।

     

    दिल बहुत तेजी से धड़क रहा था।

     

    उसकी आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “मैं…”

     

    उसकी आवाज कांप रही थी।

     

    “मैं किसी से भाग रही थी…”

     

    वह कुछ पल के लिए चुप हुई।

     

    फिर उसकी आंखों में डर उतर आया।

     

    “लेकिन किससे?”

     

    उसने अपना सिर पकड़ लिया।

     

    “और… क्यों?”

     

    कमरे में उसकी कांपती आवाज गूंजकर रह गई।

     

    उसे नहीं पता था कि उसकी यादों में छिपा सच उसकी जिंदगी को दोबारा तोड़ने वाला था…

     

    या फिर उसी सच की वजह से उसे एक ऐसा

    रिश्ता मिलने वाला था, जिसकी उसने कभी कल्पना तक नहीं की थी।

     

    लेकिन एक बात तय थी…

     

    उसकी याददाश्त में छिपा हर राज उसे धीरे-धीरे उसी रात की तरफ ले जाने वाला था।

     

    और उस रात से जुड़ा एक नाम…

     

    शायद उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा सच बनने वाला था।

     

    रूद्रांश शेखावत।

    क्या रूद्रांश और ईशानी की ये मुलाकात महज एक इत्तेफाक थी…

    या तकदीर ने दोनों को एक-दूसरे से मिलाने के लिए ये खेल रचा था?

    जानने के लिए पढ़िए Bound by Fate ❤️

    आपके कीमती Likes, Reviews और Comments का इंतजार रहेगा। ❤️

     

  • अधूरी इबादत भाग~46

    अधूरी इबादत भाग~46

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~46 वो थी… वो है… 

     

    काम्या रैना अपने कमरे में आई तो दरवाज़ा बंद करते ही जैसे उसके अंदर की तमाम आवाज़ें गूँजने लगीं। उसका दिल तेज़ धड़क रहा था, पर चेहरा अब भी ठंडा, सख्त और संजीदा था…. जैसे कोई मलबे के नीचे दबे सच को पहचान गया हो।

    उसने मोबाइल उठाया, तेज़ी से Instagram खोला, वो लगभग भूल ही चुकी थी कि रूहानी कब से गायब थी सोशल मीडिया से। 

    लेकिन आज, उसने रूहानी के तीन-तीन नए पोस्ट देखे। पहली पोस्ट, जो कुछ एक हफ्ते पहले ली गई थी, किसी जमे हुए वक़्त का दरवाज़ा खोल रही थी…..

    Chapter 1 – Rebuilding Ruins #RuhaniReturns

    तस्वीरें थीं, रूहानी के पुराने स्टूडियो की….. धूल से भरी खिड़कियाँ, टूटे मनीक्विन्स, बिखरे स्केच, और एक शांत-सी रूहानी, खड़ी हुई अपने खंडहरों के बीच। 

    काम्या ने उस तस्वीर को ज़ूम करके देखा। रूहानी की आँखों में डर नहीं था, दर्द था, मगर उस दर्द में भी एक तरह की शांति थी…. जैसे किसी ने खुद को माफ़ कर दिया हो।

    दूसरी पोस्ट ने जैसे काम्या की साँसें रोक दीं। 

    Chapter 2 – Her Comeback is Her Voice. #RuhaniReturns 

    रूहानी के नए स्टूडियो की झलक, minimalist décor, dreamy pastels, mood boards से भरी दीवारें और बीच में खड़ी थी रूहानी, एक मजबूत औरत के रूप में, जो अपने हाथों से खुद को फिर से गढ़ चुकी थी। 

    रूहानी की आँखें अब पहले जैसी नहीं लग रही थीं, उनमें कोई डर या दुःख नहीं था, बल्कि चुनौती थी, खुद से भी और दुनिया से भी।

    तीसरी पोस्ट, जैसे एक तीर की तरह सीधा काम्या के दिल को चीर गया। 

    एक डिजिटल इनविटेशन, Grand Opening of Ruhani Studio – This Friday, 6 PM। 

    उसी फॉन्ट में, उसी लाल और सुनहरे रंग के कॉम्बिनेशन में, जैसा रूहानी अपने पुराने दिनों में डिज़ाइन किया करती थी।

    काम्या ने फोन को एकटक घूरा। फिर उसे लगा जैसे उसकी साँस रुक गई हो। 

    एक गुस्से की लहर उसके अंदर दौड़ी, पर वो गुस्सा सिर्फ रूहानी पर नहीं था। वो अपने आप पर भी थी… 

    उसने कैसे समझ लिया था कि रूहानी अगर उस दिन टूटी थी तो फिर कभी जुड़ेगी नहीं….. 

    कैसे मान लिया था कि एक औरत जिसे उसकी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा धोखा मिला था, वो फिर कभी नहीं उठ पाएगी।

    “Unbelievable…” काम्या के होंठों से निकला, पर वो शब्द सिर्फ तंज नहीं था, वो एक डर था… एक ऐसा डर जो किसी अतीत से उठी राख से फिर जलने वाले शोले को देखकर पैदा होता है।

    उसने खुद को आईने में देखा। 

    “She’s back… and this time, it’s not just about designs. It’s war.”

    उसके चेहरे की रंगत अब तेज़ थी। गालों पर हल्की सी जलन, माथे की नसें तन गईं थीं। 

    उसने फोन उठाया, किसी को कॉल करने के लिए…. शायद अपनी टीम को, शायद अपने PR को…. मगर उंगलियाँ ठिठक गईं।

    क्योंकि कहीं ना कहीं, काम्या जानती थी, कि जो जंग वो अब देख रही थी… उसमें रूहानी सिर्फ एक फाइटर नहीं थी। वो खुद को फिर से लिख रही थी, एक ऐसी किताब की तरह जिसे काम्या ने अधूरा समझकर बंद कर दिया था।

    और काम्या… उसे ये कतई मंजूर नहीं था। रूहानी को वापसी करते हुए देखना, फिर से….. उसकी आंखों के सामने, उसी शहर में… और शायद, उसी एकांश के दिल में एक बार फिर से जगह बनाते हुए।

    काम्या की आँखों में उस वक़्त एक अजीब सी दहशत थी…. जैसे किसी ने उसकी आत्मा के भीतर उतरकर वहाँ कुछ ऐसा बो दिया हो जो वो चाहकर भी उखाड़ नहीं सकती। 

    एकांश की जुबां से रूहानी का नाम सुनकर और उस एक नाम के पीछे की सारी भावनाएँ देखकर, काम्या के भीतर की सारी दीवारें ढह चुकी थीं। उसका आत्मविश्वास, जो सालों की मेहनत से गढ़ा गया था, पहली बार चटक गया था।

    रूहानी का अस्तित्व अब उसके लिए सिर्फ एक बीती कहानी नहीं, एक ज़िंदा चुनौती बन चुका था। वह डर गई थी…. नहीं, डर से भी कहीं गहरी कोई अनुभूति थी ये, जैसे किसी को खोने से पहले ही उसकी छाया से जलन होना।

    और उस डर में डूबी काम्या ने बिना एक पल गंवाए रूहानी को मैसेज कर दिया — “तुम मुझसे एकांश को कभी नहीं छीन सकती। वो मेरा था… और हमेशा रहेगा।”

    उसके अंदर एक बेचैनी थी, एक अंधा आवेग जो उसे चैन से बैठने नहीं दे रहा था। 

    वह तेज़ी से हॉल की ओर गई, जहाँ एकांश को देखने की बेचैनी ने उसे घेर लिया था। पर जो देखा, वो अप्रत्याशित था।

    एकांश ज़मीन पर था, सोफे से गिरा हुआ, पीठ सीधी फर्श से लगी और आँखें छत की तरफ स्थिर…. बिना पलक झपकाए। जैसे वक़्त थम गया हो उसके लिए, या जैसे कोई अदृश्य भार हो, जो उसे उठने नहीं दे रहा।

    काम्या का दिल काँप उठा। उसके होंठों से कोई आवाज़ नहीं निकली, बस कदम तेज़ी से भागे और वो एकांश के पास जा पहुँची।

    घुटनों के बल बैठकर उसने एकांश को अपनी गोद में उठाया और उसके चेहरे को दोनों हथेलियों में थामकर काँपती आवाज़ में कहा— “मेरे प्यार में ऐसी कौन सी कमी रह गई है, एकांश? मैं क्या भर नहीं पाई? मैं हर उस रूप में खुद को ढालती रही हूँ जैसी तुम्हें चाहिए थी। रूहानी… रूहानी मेरे सामने कुछ भी नहीं है। ना नाम में, ना चेहरे में, ना शोहरत में।”

    एकांश ने उसकी आँखों में देखा। उसमें आँसू नहीं थे, मगर कुछ था….. एक थकावट, एक शिकस्त, और एक गूंगी चीख़ जो शायद सालों से अंदर दब रही थी।

    काम्या ने उसे सीने से लगा लिया, जैसे किसी टूटी हुई चीज़ को समेटना चाहती हो। एकांश की साँसें थोड़ी देर में स्थिर हो गईं, और तभी काम्या ने उसके चेहरे पर हल्के-हल्के चुम्बनों की बौछार शुरू कर दी…. कपोलों पर, माथे पर, पलकों के पास। उसका हर स्पर्श इस बात का गवाह था कि वो किसी और को वहाँ जगह नहीं लेने देगी।

    और फिर, वहीं हॉल में, उनके बीच की दूरी सिमटने लगी। वो एक दुस्स्वप्न से जागे प्रेमियों की तरह एक-दूसरे में शरण लेने लगे….. बिना कहे, बिना समझाए, बस उस क्षण को थामे हुए, जिसे शब्दों में बाँधा नहीं जा सकता।

    रात के सन्नाटे में जब दोनों अपने कमरे के बिस्तर पर थे, तब एकांश गहरी नींद में खो गया था। लेकिन काम्या… अब भी जाग रही थी।

    वो एकांश के बालों में अपनी उंगलियाँ फेर रही थी, बड़े सलीके से, जैसे किसी टूटे हुए विश्वास को सहेज रही हो। उसकी आँखों में कोई आँसू नहीं था, बस एक निश्चय था….. एक ठंडी आग जो धीमे-धीमे उसकी आत्मा में जल रही थी।

    उसने मन ही मन खुद से वादा किया, “अब चाहे जो करना पड़े… मैं करूँगी। लेकिन एकांश के लबों पर दोबारा ‘रूहानी’ का नाम नहीं आने दूँगी।”

    कमरे में गहरी नींद की एक परत थी, पर काम्या के भीतर अब एक नई रात जाग चुकी थी… एक ऐसी रात, जो शायद अब कभी सुबह होने नहीं देगी।

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°

    एकांश की आंखें जैसे किसी पुराने ख्वाब के जमे हुए कांच को तोड़ रही थीं। 

    “Stitch & Soul” का बोर्ड देखते ही उसके सीने में एक अजीब सी कसक उठी थी, मगर उसने खुद को संभाल लिया था। 

    पर अब, जैसे ही दरवाज़े की दहलीज़ पार की, हवा में तैरती वही जानी-पहचानी खुशबू…. वो हल्की सी सैंडलवुड की परफ्यूम, जो रूहानी हमेशा लगाती थी…. उसकी सांसों में समा गई।

    उसके कदम थम गए। सामने, रंग-बिरंगी fairy lights के बीच, pastel shades में सजे हॉल के बीचोंबीच रूहानी खड़ी थी। उसके चेहरे पर सुकून और एक artist जैसी शांति थी।

    एकांश की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसकी उंगलियां अनायास सिहर उठीं।

    “रूहानी?” उसने लगभग फुसफुसाते हुए खुद से कहा, जैसे किसी भूली हुई धुन को फिर से सुन लिया हो।

    उसी क्षण, उसके बाजू में खड़ी काम्या ने अपना हाथ कसकर उसकी बांह में डाल दिया और तीखी मुस्कान के साथ कहा, “हमें नहीं बुलाया गया इस खास इवेंट में?”

    उसकी आवाज़ में मिठास कम और चुनौती ज़्यादा थी।

    ———————–

    क्या एकांश की साँसें वाकई थम गई थीं… या बस वक़्त ने कुछ कहने से पहले उसे रोक लिया था?

    क्या रूहानी की वापसी सिर्फ़ एक स्टूडियो की शुरुआत थी… या किसी अधूरे हिसाब का इशारा?

    काम्या की मुस्कान के पीछे जो चुप्पी थी, क्या वो किसी तूफ़ान का इंतज़ार था?

  • महादेव माता पार्वती की नोंक झोंक

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    बारिश में कैलाश की नोक-झोंक

    कैलाश पर्वत पर उस दिन सुबह से ही बादल घिरे हुए थे। ठंडी हवा चल रही थी और थोड़ी देर बाद बारिश की बूंदें गिरने लगीं। कैलाश का वातावरण और भी सुंदर हो गया था।

     

    माता पार्वती कैलाश के बाहर बैठकर बारिश देख रही थीं। उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी। तभी उन्होंने पीछे मुड़कर देखा। महादेव हमेशा की तरह शांत बैठे ध्यान में मग्न थे।

     

    पार्वती जी ने कुछ देर उन्हें देखा और फिर बोलीं,

    “महादेव!”

     

    महादेव ने आँखें नहीं खोलीं।

     

    “महादेव…!”

     

    फिर भी कोई जवाब नहीं आया।

     

    पार्वती जी थोड़ा पास गईं और बोलीं,

    “मैं आपसे बात कर रही हूँ।”

     

    महादेव ने धीरे से आँखें खोलीं।

     

    “कहो देवी।”

     

    पार्वती जी ने बाहर होती बारिश की ओर इशारा किया।

    “देखिए कितनी सुंदर बारिश हो रही है। चलिए बाहर चलते हैं।”

     

    महादेव ने शांत स्वर में कहा,

    “देवी, आप बाहर जाइए। मैं यहीं ठीक हूँ।”

     

    पार्वती जी ने भौंहें सिकोड़ लीं।

     

    “आप यहीं ठीक हैं? मतलब मेरे साथ बारिश में चलना आपको अच्छा नहीं लगता?”

     

    महादेव मुस्कुराए।

     

    “ऐसी बात नहीं है।”

     

    “तो फिर चलिए।”

     

    “लेकिन मैं अभी ध्यान कर रहा था।”

     

    पार्वती जी ने तुरंत कहा,

    “आपका ध्यान तो हर समय चलता रहता है। कभी मेरे लिए भी समय निकाल लिया कीजिए।”

     

    महादेव कुछ बोलते, उससे पहले ही माता पार्वती उठकर बाहर चली गईं।

     

    वहाँ खड़े नंदी यह सब देख रहे थे। उन्होंने महादेव की तरफ देखा और फिर धीरे से अपना सिर हिला दिया।

     

    महादेव बोले,

    “नंदी, देवी आज कुछ अधिक ही नाराज़ लग रही हैं।”

     

    नंदी ने जैसे मन ही मन कहा हो—‘स्वामी, यह तो आपको ही समझना होगा।’

     

    महादेव बाहर आए। पार्वती जी बारिश में कुछ दूर खड़ी थीं। उन्होंने महादेव को आते देखा तो मुस्कुराने लगीं, लेकिन तुरंत अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।

     

    महादेव उनके पास जाकर बोले,

    “देवी, अब तो मैं आ गया।”

     

    पार्वती जी बोलीं,

    “अब आने का क्या फायदा?”

     

    “क्यों?”

     

    “जब मैंने बुलाया था तब नहीं आए।”

     

    महादेव हँस पड़े।

     

    “तो क्या अब वापस चला जाऊँ?”

     

    पार्वती जी ने तुरंत उनकी तरफ देखा।

     

    “आपको बस मौका चाहिए वापस जाने का!”

     

    महादेव ने हँसते हुए कहा,

    “नहीं देवी, मैं तो बस पूछ रहा था।”

     

    पार्वती जी ने बारिश की बूंदों को हथेली पर लेते हुए कहा,

    “मुझे बारिश बहुत पसंद है।”

     

    महादेव बोले,

    “यह तो मैं जानता हूँ।”

     

    “फिर भी आप मेरे साथ नहीं आए।”

     

    “अब तो आ गया।”

     

    “वो भी मेरे नाराज़ होने के बाद।”

     

    महादेव कुछ पल चुप रहे।

     

    फिर बोले,

    “देवी, अगर आप नाराज़ न होतीं तो शायद मुझे अपनी गलती का पता ही नहीं चलता।”

     

    पार्वती जी का गुस्सा थोड़ा कम हुआ।

     

    “अच्छा! तो आपको मानना है कि गलती आपकी थी?”

     

    महादेव ने मुस्कुराकर कहा,

    “हाँ।”

     

    पार्वती जी ने तुरंत कहा,

    “तो फिर क्षमा माँगिए।”

     

    महादेव ने हाथ जोड़ लिए।

     

    “क्षमा कीजिए देवी।”

     

    पार्वती जी मुस्कुराने लगीं।

     

    “इतनी जल्दी?”

     

    “आपको मनाने में देर करूँगा तो बारिश खत्म हो जाएगी।”

     

    माता पार्वती हँस पड़ीं।

     

    तभी तेज हवा चली और बारिश की कुछ बूंदें महादेव के चेहरे पर पड़ीं। महादेव ने ऊपर देखा।

     

    “लगता है आज बादल भी बहुत प्रसन्न हैं।”

     

    पार्वती जी बोलीं,

    “बादल प्रसन्न हैं या आपको देखकर हँस रहे हैं?”

     

    महादेव ने पूछा,

    “मुझे देखकर क्यों?”

     

    “क्योंकि आप बारिश में भी ऐसे ही बैठे रहेंगे जैसे ध्यान में बैठे हों।”

     

    महादेव हँसने लगे।

     

    “देवी, आप आज मेरी बहुत परीक्षा ले रही हैं।”

     

    “और आप हमेशा की तरह भोले बने हुए हैं।”

     

    दोनों कुछ देर बारिश में चलते रहे।

     

    अचानक पार्वती जी ने पीछे से पानी की कुछ बूंदें महादेव पर उछाल दीं।

     

    महादेव ने पलटकर देखा।

     

    “देवी!”

     

    पार्वती जी मासूम बनकर बोलीं,

    “क्या हुआ?”

     

    “आपने मुझ पर पानी डाला?”

     

    “मैंने? नहीं तो।”

     

    महादेव ने आसपास देखा।

     

    “यह पानी फिर कहाँ से आया?”

     

    पार्वती जी हँसने लगीं।

     

    “बारिश हो रही है महादेव। पानी तो आएगा ही।”

     

    महादेव समझ गए कि यह माता की शरारत थी।

     

    उन्होंने भी हाथ से थोड़ा पानी उठाया और पार्वती जी की ओर उछाल दिया।

     

    पार्वती जी पीछे हट गईं।

     

    “महादेव! आपने मुझ पर पानी डाला?”

     

    महादेव बोले,

    “मैंने? नहीं तो।”

     

    “अभी आपने ही डाला!”

     

    “बारिश हो रही है देवी। पानी तो आएगा ही।”

     

    पार्वती जी उनकी नकल सुनकर हँस पड़ीं।

     

    “आप भी ना!”

     

    तभी नंदी दूर से यह सब देख रहे थे। महादेव ने उन्हें देखा।

     

    “नंदी, तुम भी आ जाओ।”

     

    नंदी धीरे-धीरे आगे बढ़े।

     

    पार्वती जी बोलीं,

    “नंदी को बीच में मत लाइए।”

     

    महादेव ने मुस्कुराकर कहा,

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि ये हमेशा आपका साथ देते हैं।”

     

    महादेव बोले,

    “नंदी मेरे वाहन हैं।”

     

    पार्वती जी ने कहा,

    “और मैं आपकी पत्नी हूँ।”

     

    महादेव तुरंत बोले,

    “इसमें कोई संदेह नहीं देवी।”

     

    “तो फिर कभी मेरा पक्ष भी लिया कीजिए।”

     

    महादेव ने गंभीर होकर कहा,

    “मैं तो हमेशा आपका ही पक्ष लेता हूँ।”

     

    पार्वती जी ने आश्चर्य से पूछा,

    “सच?”

     

    “हाँ।”

     

    “फिर अभी मेरी बात क्यों नहीं मान रहे थे?”

     

    महादेव कुछ क्षण चुप रहे।

     

    फिर बोले,

    “क्योंकि मैं चाहता था कि आप खुद मुझे बाहर लेकर आएँ।”

     

    पार्वती जी ने पूछा,

    “क्यों?”

     

    महादेव मुस्कुराए।

     

    “क्योंकि जब आप मुझे अपने साथ चलने के लिए कहती हैं, तब कैलाश की सारी शांति भी मुझे छोटी लगने लगती है।”

     

    पार्वती जी कुछ पल उन्हें देखती रहीं।

     

    उनके चेहरे की नाराज़गी पूरी तरह खत्म हो चुकी थी।

     

    उन्होंने धीरे से कहा,

    “आप कभी-कभी बहुत अच्छी बातें भी कर लेते हैं।”

     

    महादेव बोले,

    “कभी-कभी?”

     

    “हाँ, कभी-कभी।”

     

    महादेव हँस पड़े।

     

    बारिश अब और तेज हो चुकी थी। चारों ओर पानी की बूंदों की आवाज गूँज रही थी।

     

    पार्वती जी ने अपना हाथ आगे बढ़ाया।

     

    “महादेव, चलिए।”

     

    महादेव ने उनका हाथ थाम लिया।

     

    “कहाँ?”

     

    “बारिश में थोड़ा और घूमने।”

     

    “अभी तो आप कह रही थीं कि मैं आपके साथ नहीं आया।”

     

    “अब शिकायत खत्म।”

     

    “इतनी जल्दी?”

     

    पार्वती जी बोलीं,

    “हाँ, लेकिन एक शर्त है।”

     

    “क्या?”

     

    “आज आप ध्यान नहीं करेंगे।”

     

    महादेव मुस्कुराए।

     

    “ठीक है।”

     

    “और मुझे अकेला भी नहीं छोड़ेंगे।”

     

    “यह भी ठीक है।”

     

    “और…”

     

    महादेव ने हँसकर पूछा,

    “और कितनी शर्तें हैं देवी?”

     

    पार्वती जी भी मुस्कुरा दीं।

    “बस एक आखिरी।”

    “कहो।”

    “आज की बारिश मेरे साथ देखेंगे।”

     

    महादेव ने उनकी ओर देखा और बोले,

    “यह शर्त तो मैं हर जन्म में मान लूँगा।”

    माता पार्वती मुस्कुरा उठीं।

    कैलाश पर बारिश होती रही। नंदी कुछ दूर खड़े उन्हें देखते रहे और शायद सोच रहे थे कि दुनिया में सबसे बड़ा रहस्य कोई मंत्र नहीं, बल्कि महादेव और माता पार्वती की यह छोटी-छोटी नोक-झोंक है, जिसमें नाराज़गी भी प्रेम होती है और मनाना भी प्रेम।

     

    उस दिन कैलाश की बारिश कुछ ज्यादा ही सुंदर थी, क्योंकि उसमें बादलों की बूंदों के साथ महादेव और माता पार्वती की हँसी भी घुली हुई थी।

  • Bound by fate

    Bound by fate

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग 2

    राधे राधे दोस्तों ❤️

     

    ✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️

     

     

    करीब एक घंटे बाद…

     

    गाड़ी एक बड़े और आलीशान विला के सामने आकर रुकी।

     

    गाड़ी की हेडलाइट पड़ते ही सामने खड़ा गार्ड तुरंत चौकन्ना हो गया और उसने विला का बड़ा-सा गेट खोल दिया।

     

    गाड़ी अंदर दाखिल हुई और कुछ ही सेकंड बाद पोर्च में जाकर रुक गई। बारिश अब भी तेज थी। ड्राइवर तुरंत बाहर निकला और उसने पिछली सीट का दरवाजा खोला।

     

    रूद्रांश गाड़ी से बाहर आया। उसकी नजर लड़की पर गई। वह अब भी बेहोश थी। चेहरा हल्का पीला पड़ चुका था। होंठ सूख गए थे और भीगे हुए कपड़े उसके शरीर से चिपके हुए थे।

     

    रूद्रांश ने बिना कुछ सोचे उसे अपनी बाहों में उठा लिया।

     

    तभी पास खड़े एक नौकर ने हैरानी से पूछा, “सर… ये कौन हैं?” क्योंकि आजतक कभी किसी ने रुद्रांश के साथ किसी लड़की को नहीं देखा था। 

     

    रूद्रांश ने उसकी तरफ घूरकर देखा। “फालतू सवाल मत पूछो। जल्दी जाकर दरवाजा खोलो।”

     

    नौकर तुरंत दरवाजा खोलकर एक तरफ हट गया। रूद्रांश लड़की को लेकर अंदर चला गया। विला अंदर से बेहद शानदार था।

     

    ऊंची छतों से लटकते खूबसूरत झूमर, सफेद संगमरमर की चमचमाती फर्श, दीवारों पर लगी महंगी पेंटिंग्स और सलीके से सजाया गया विशाल हॉल…

     

    हर चीज रूद्रांश की हैसियत की कहानी बयां कर रही थी। 

    लेकिन इस वक्त उसे इनमें से किसी चीज की परवाह नहीं थी।

     

    वह सीधे सीढ़ियों से ऊपर गया और एक कमरे का दरवाजा खोलकर लड़की को बेड पर लिटा दिया। पीछे आया नौकर दरवाजे पर ही रुक गया। “साहब… डॉक्टर को बुला दूं?”

     

    रूद्रांश ने लड़की की तरफ देखते हुए कहा, “हां। और जल्दी।”

     

    “जी, साहब।” नौकर तुरंत वहां से चला गया।

     

    कमरे में अब सिर्फ रूद्रांश और वो अनजान लड़की थे। रूद्रांश कुछ पल तक उसे देखता रहा।

     

    उसने अपने गीले बालों पर हाथ फेरा और फिर अपना जैकेट उतारकर पास रखी कुर्सी पर डाल दिया।

     

    उसकी नजर लड़की के चेहरे पर टिक गई। “तुम आखिर हो कौन?”

     

    उसने धीमे से कहा। लेकिन सामने लेटी उस लड़की के पास उसके सवाल का कोई जवाब नहीं था।

     

    या शायद… उस जवाब तक पहुंचने के लिए रूद्रांश को उसकी जिंदगी के कई बंद दरवाजे खोलने पड़ने वाले थे।

     

    और उसे अभी ये अंदाजा भी नहीं था कि जिस लड़की को वह आज रात सिर्फ इंसानियत के नाते अपने घर लेकर आया है… वही लड़की बहुत जल्द उसकी पूरी जिंदगी का सबसे खूबसूरत…

     

    और सबसे दर्दनाक हिस्सा बनने वाली है। 

     

    फिर उसने कॉरिडोर में रेलिंग के पास खड़े होकर अपने विला में काम कर रही एक फीमेल हाउस हेल्प को आवाज लगाई। “जेनिफ़र!”

     

    आवाज पूरे हॉल में गूंजी। कुछ ही सेकंड में एक अधेड़ उम्र की महिला तेजी से वहां पहुंची।

     

    वो जेनिफ़र थी। पिछले कई सालों से वो रूद्रांश के विला में काम कर रही थी और उसे अच्छी तरह जानती थी।

    “जी, सर?”

     

    रूद्रांश ने कहा, ” जल्दी से मेरे रूम में आओ और उस लड़की के कापड़े चेंज कर दो। “

    जेनिफर तुरंत ऊपर आ गई।

    फिर वह कुछ पल के लिए रुका और क्लोसेट की तरफ बढ़ गया।

     

    उसने वहां से अपना एक ढीला-सा कुर्ता निकाला और जेनिफ़र की तरफ बढ़ा दिया। “ये पहना देना।”

     

    जेनिफ़र ने तुरंत कुर्ता ले लिया। उसकी नजर अब लड़की पर थी। उसके कपड़े पूरी तरह भीगे हुए थे और ठंड की वजह से उसका शरीर हल्का-हल्का कांप रहा था।

    जेनिफ़र ने ध्यान से देखा तो उसकी कलाई पर चोट के गहरे निशान नजर आए।

     

    गर्दन के पास भी खरोंचें थीं। चेहरे पर चोट के हल्के निशान अब पहले से ज्यादा साफ दिखाई दे रहे थे।

    जेनिफ़र के चेहरे पर चिंता उभर आई।

    उसे देखकर साफ लग रहा था कि इस लड़की ने सिर्फ बारिश में रात नहीं बिताई थी…

    बल्कि वो किसी बहुत बुरे दौर से गुजरकर यहां तक पहुंची थी।

     

    जेनिफ़र ने बिना कोई सवाल किए जल्दी से उसके कपड़े बदल दिए और बाहर चली गई।

     

    तब तक रूद्रांश भी अपने कपड़े बदल चुका था। कुछ देर बाद… रूद्रांश कमरे में वापस आया।

    वह बेड के सिरहाने जाकर बैठ गया और सामने लेटी लड़की को गौर से देखने लगा।

     

    अब वह पहले से ज्यादा साफ दिखाई दे रही थी। गोरा रंग… बड़ी-बड़ी आंखें, जिन पर घनी और लंबी पलकें थीं… गुलाबी होंठ… और निचले होंठ के ठीक नीचे एक छोटा-सा तिल।

     

    छोटी-सी नाक, जिसमें एक नन्ही-सी नोज पिन चमक रही थी। वो लड़की किसी मासूम-सी तस्वीर की तरह लग रही थी।

     

    रूद्रांश की नजर कुछ पल उसके चेहरे पर ठहर गई।

    उसे खुद समझ नहीं आया कि वह इस अनजान लड़की को इतनी गौर से क्यों देख रहा था। बाहर बारिश अब धीमी पड़ चुकी थी।

     

    खिड़की के शीशों पर गिरती बूंदों की आवाज कमरे में एक अजीब-सी खामोशी पैदा कर रही थी। कमरे में जल रही हल्की पीली रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी।

    चेहरा बेहद मासूम था…

     

    लेकिन उन बंद आंखों के पीछे जैसे कोई बहुत गहरा राज छिपा हुआ था। कुछ ही देर बाद डॉक्टर भी वहां पहुंच गए।

     

    रूद्रांश तुरंत उठकर एक तरफ हो गया। डॉक्टर ने अपना बैग खोला और लड़की की जांच शुरू कर दी।

    उन्होंने उसकी नब्ज चेक की। फिर उसकी कलाई, गर्दन और चेहरे पर मौजूद चोटों को ध्यान से देखा।

     

    रूद्रांश की गहरी नजरें लगातार डॉक्टर पर टिकी हुई थीं।

    जैसे वह डॉक्टर की हर बात से इस लड़की के बारे में कुछ समझ लेना चाहता हो।

     

    कुछ देर जांच करने के बाद डॉक्टर ने गहरी सांस ली।

    “मिस्टर शेखावत…”

     

    रूद्रांश की नजरें डॉक्टर पर टिक गईं। “क्या हुआ है इसे?”

     

    डॉक्टर ने गंभीर आवाज में कहा, “ऐसा लग रहा है कि इस लड़की के साथ काफी ज्यादती हुई है। इसके शरीर पर कई जगह चोटों के निशान हैं। कुछ चोटें पुरानी हैं और कुछ बिल्कुल ताजा।”

     

    रूद्रांश की आंखों में अचानक गुस्सा उतर आया।

    उसकी उंगलियां धीरे-धीरे मुट्ठी में बदल गईं।

    लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।

     

    डॉक्टर ने आगे कहा, “मुझे लगता है कि ये लड़की किसी बहुत बड़े सदमे से गुजरी है। इसी वजह से इसकी हालत ऐसी है।”

     

    रूद्रांश की नजर एक बार फिर लड़की पर चली गई।

    उसका मासूम चेहरा देखकर उसके जबड़े कस गए।

    डॉक्टर कुछ पल रुके और फिर बोले, “और एक बात…”

    रूद्रांश ने उनकी तरफ देखा। “इसे शायद कई घंटों से कुछ भी खाने को नहीं मिला है। शरीर में काफी कमजोरी है। इसी वजह से ये बेहोश हुई होगी।”

     

    डॉक्टर ने अपने बैग से एक इंजेक्शन निकाला। “मैंने इसे इंजेक्शन दे दिया है। उम्मीद है कि सुबह तक इसे होश आ जाएगा।” फिर उन्होंने कुछ दवाइयां निकालकर रूद्रांश की तरफ बढ़ा दीं। “होश में आने के बाद इसे कुछ हल्का और पौष्टिक खाना दीजिएगा। और ये दवाइयां समय पर देनी होंगी।”

     

    रूद्रांश ने बिना कुछ कहे सारी दवाइयां ले लीं।

    डॉक्टर अपना सामान समेटकर कमरे से बाहर चले गए।

    दरवाजा बंद होते ही कमरे में फिर से खामोशी छा गई।

    रूद्रांश धीरे से बेड पर बैठ गया।

    लड़की की सांसें अब पहले से थोड़ी सामान्य थीं।

    उसका चेहरा अभी भी पीला था और माथे पर हल्की शिकन थी।

     

    जैसे नींद में भी कोई बुरा सपना उसका पीछा कर रहा हो।

    रूद्रांश कुछ देर उसे देखता रहा।

    फिर धीमी आवाज में बोला, “आखिर हो कौन तुम?”

     

    कोई जवाब नहीं आया। उसने उसकी तरफ देखते हुए दोबारा कहा, “और किसने तुम्हें इस हालत में पहुंचाया?”

    खामोशी…

     

    बाहर बारिश लगभग थम चुकी थी। रात और गहरी हो गई थी। रूद्रांश ने अपनी जेब से सिगरेट निकाली।

    उसने सिगरेट होंठों के बीच रखी और लाइटर निकालने ही वाला था कि एक पल के लिए उसकी नजर सामने सो रही लड़की पर गई।

     

    कुछ सेकंड तक वह उसे देखता रहा। फिर उसने सिगरेट वापस अपनी जेब में रख ली।

    शायद उसे खुद भी नहीं पता था कि उसने ऐसा क्यों किया।

     

    रूद्रांश उठकर सोफे पर जाकर

    • लेट गया।

    वह इस अनजान लड़की के बारे में सोचता रहा।

    लेकिन कब उसकी आंखें लग गईं…

    उसे खुद पता नहीं चला।

     

    कहानी आगे जारी रहेगी…🙏🏻