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  • Bound by fate

    Bound by fate

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग 1

     

    राधे राधे दोस्तों ❤️

     

    ✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️

     

     

     

    दिल्ली, इंडिया

     

    रात के बारह बजे। सर्दियों की वो काली रात बारिश में पूरी तरह डूबी हुई थी। आसमान पर काले बादल छाए थे और तेज बारिश के साथ हल्का-हल्का कोहरा सड़क को अपने आगोश में लिए हुए था।

     

    मौसम ऐसा था कि कोई भी समझदार इंसान अपने घर से बाहर निकलने के बारे में सोचता तक नहीं।

     

    लेकिन… उस सुनसान सड़क के बीचों-बीच एक लड़की चली जा रही थी।

     

    सड़क ज्यादा चौड़ी नहीं थी। दोनों तरफ घना जंगल था, जिसके ऊंचे-ऊंचे पेड़ तेज हवा के साथ झूम रहे थे। बारिश की तेज आवाज़ और हवा की सनसनाहट के अलावा वहां दूर-दूर तक किसी इंसान के होने का कोई निशान नहीं था।

     

    लेकिन उस लड़की को शायद इन चीजों से कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा था। वो लगातार चलती जा रही थी।

     

    ना उसे बारिश की परवाह थी… ना ठंड की… और ना ही इस सुनसान रास्ते की।

     

    ऐसा लग रहा था जैसे वो अपनी जिंदगी से ही हार चुकी हो। शायद वो रो भी रही थी। लेकिन बारिश की तेज बूंदें उसके आंसुओं को अपने साथ बहा ले जा रही थीं। करीब से देखने पर उसके चेहरे पर हल्के-हल्के चोट के निशान साफ दिखाई दे रहे थे।

     

    उसने चटक लाल रंग का सूट पहन रखा था। वो बिल्कुल किसी नई-नवेली दुल्हन जैसी लग रही थी। लेकिन उसके कपड़े बारिश में पूरी तरह भीग चुके थे।

     

    उसकी कलाइयों में लाल चूड़ियां थीं, जिनमें से कुछ टूट चुकी थीं। हाथों पर लगी मेहंदी बारिश में फीकी पड़ चुकी थी। मांग में लगा सिंदूर लगभग धुल चुका था, लेकिन उसकी हल्की-सी लालिमा अब भी बाकी थी।

     

    और गले में… एक मंगलसूत्र था, वो लड़की बेहद खूबसूरत थी। लेकिन उस खूबसूरत चेहरे पर इस वक्त सिर्फ दर्द था। बहुत गहरा दर्द, आखिर कौन थी वो?

     

    और इतनी रात को इस सुनसान जंगल वाली सड़क पर अकेली क्यों चल रही थी?

     

    तभी… दूर से आती एक गाड़ी की हेडलाइट ने उसकी आंखों पर तेज रोशनी डाली।

     

    लड़की ने पलटकर भी नहीं देखा। गाड़ी लगातार उसकी तरफ बढ़ती चली आ रही थी।

     

    पों… पों…! ड्राइवर ने जोर-जोर से हॉर्न बजाया।

     

    लेकिन लड़की अपनी जगह से टस से मस नहीं हुई। सड़क इतनी संकरी थी कि गाड़ी को दूसरी तरफ से निकालने की कोई गुंजाइश भी नहीं थी।

     

    ड्राइवर ने आखिरी वक्त पर पूरी ताकत से ब्रेक लगा दिए।

     

    चीईईईईईई…!

     

    टायरों की तेज आवाज के साथ गाड़ी लड़की से कुछ ही इंच की दूरी पर जाकर रुकी। गाड़ी के अंदर अचानक सन्नाटा छा गया।

     

    ड्राइवर ने घबराकर पीछे की सीट की तरफ देखा।

     

    वहां बैठा आदमी पहले से ही उसे घूर रहा था। उसकी आंखों में साफ गुस्सा था।

     

    ड्राइवर सहम गया। “साहब… मेरी कोई गलती नहीं है। सामने अचानक एक लड़की रोड के बीचों-बीच खड़ी हो गई थी। अगर मैं ब्रेक नहीं लगाता तो…”

     

    वह अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया। पीछे बैठा आदमी झुंझलाकर बोला, “साला… सबको मरने के लिए मेरी कार के सामने ही आना होता है।”

     

    उसने गुस्से में अपनी घड़ी की तरफ देखा और फिर सामने खड़ी लड़की को। “अगर कुछ हो जाता ना, तो कल सुबह हर न्यूज़ चैनल पर एक ही खबर चलती…”

    उसके होंठों पर एक कड़वी मुस्कान आई। “रूद्रांश शेखावत की गाड़ी से लड़की की मौत।”

     

    ड्राइवर ने कुछ नहीं कहा। वह सामने खड़ी लड़की को देखने लगा। हेडलाइट की तेज रोशनी में अब उसका चेहरा साफ नजर आ रहा था।

     

    बारिश लगातार हो रही थी। लेकिन उसकी आंखों में उमड़ रहा दर्द शायद इस बारिश से भी ज्यादा गहरा था।

     

    रूद्रांश ने आखिरकार गुस्से में गाड़ी का दरवाजा खोला और बाहर निकल आया। बारिश की ठंडी बूंदें कुछ ही सेकंड में उसके बालों और कपड़ों को भिगोने लगीं।

     

    उसने इसकी परवाह नहीं की। महंगे जूते कीचड़ में धंस गए, लेकिन उसकी नजरें सामने खड़ी लड़की पर टिकी थीं।

     

    वह उसके पास जाकर रुक गया। “मरना है तो किसी और जगह जाकर मरो।”

    उसकी आवाज में गुस्सा था। “मेरी गाड़ी के सामने नहीं।”

     

    लड़की ने धीरे-धीरे अपना चेहरा उठाया। उसकी आंखें बुरी तरह सूजी हुई थीं, होंठ कांप रहे थे। लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।

     

    रूद्रांश ने गौर से उसे देखा। उसके चेहरे पर हल्की चोटों के निशान थे।

     

    भीगे बाल उसके चेहरे से चिपके हुए थे। पलकों पर बारिश की बूंदें ठहरी हुई थीं।

    और उसकी आंखें… जैसे बिल्कुल खाली थीं।

     

    मानो उन आंखों में रोने के लिए भी अब कुछ बाकी नहीं बचा था। रूद्रांश का गुस्सा कुछ कम हुआ।

     

    उसने दोबारा पूछा, “कौन हो तुम?”

    कोई जवाब नहीं। “इस वक्त यहां क्या कर रही हो?”

     

    लड़की ने धीरे से अपनी गर्दन दूसरी तरफ घुमा ली रूद्रांश ने गहरी सांस ली। उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर इस लड़की के साथ ऐसा क्या हुआ है।

     

    उसने अपना हाथ उसके कंधे पर रखने की कोशिश की।

    “देखो… अगर तुम्हें कोई परेशानी है, तो”

     

    लड़की ने अचानक उसका हाथ झटक दिया।

    वह एक कदम पीछे हट गई। “मुझे छोड़ दो…”

     

    उसकी आवाज इतनी धीमी थी कि बारिश के शोर में लगभग खो गई। रूद्रांश ने उसकी तरफ देखा।

    लड़की ने कांपती आवाज में दोबारा कहा, “मुझे कहीं नहीं जाना…”

     

    उस एक वाक्य में इतना दर्द था कि कुछ पल के लिए रूद्रांश भी चुप रह गया। उसने लड़की को गौर से देखा।

    लाल दुल्हन का जोड़ा… टूटी हुई चूड़ियां… धुला हुआ सिंदूर… मंगलसूत्र… और चेहरे पर चोटों के निशान।

     

    ये कोई सामान्य मामला नहीं था। रूद्रांश ने आसपास नजर दौड़ाई। चारों तरफ घना जंगल था। इतनी रात को इस सुनसान सड़क पर ये लड़की अकेली थी।

    और शायद किसी बड़ी मुसीबत से भागकर यहां तक पहुंची थी। “तुम्हें जाना तो पड़ेगा।”

     

    इस बार रूद्रांश की आवाज पहले से थोड़ी नरम थी। “लेकिन उससे पहले मुझे ये बताओ कि हुआ क्या है?”

     

    लड़की ने उसकी तरफ देखा। उसकी आंखों में अचानक डर उभर आया। उसने कुछ कहने के लिए होंठ खोले…

     

    लेकिन आवाज नहीं निकली। अगले ही पल उसका शरीर लड़खड़ाया। “अरे…”

     

    रूद्रांश ने झटके से उसे संभाल लिया। लड़की बेहोश हो चुकी थी। “अब ये और बचा था!”

     

    रूद्रांश ने झुंझलाकर कहा, लेकिन उसके हाथों की पकड़ लड़की को संभालने में बेहद सावधान थी।

     

    उसने एक नजर उसके चेहरे पर डाली। इतनी खूबसूरत लड़की… और इस हालत में। उसके चेहरे पर चोटों के निशान देखकर रूद्रांश की भौंहें सिकुड़ गईं।

     

    उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर किसने इसके साथ ऐसा किया होगा। लेकिन यहां खड़े रहना ठीक नहीं था। उसने लड़की को अपनी बाहों में उठाया और गाड़ी की तरफ बढ़ गया। ड्राइवर तुरंत नीचे उतरा और पीछे का दरवाजा खोल दिया।

     

    रूद्रांश ने लड़की को पिछली सीट पर आराम से लिटाया और खुद उसके पास बैठ गया। “गाड़ी स्टार्ट करो।”

     

    “जी, साहब।” ड्राइवर ने तुरंत गाड़ी आगे बढ़ा दी।

    गाड़ी की रफ्तार बढ़ते ही बाहर की बारिश और जंगल पीछे छूटने लगे।

     

    लेकिन रूद्रांश के दिमाग में सवालों का तूफान शुरू हो चुका था। ये लड़की कौन थी? इसके साथ आखिर हुआ क्या था? और वो इस हालत में अकेली वहां क्यों घूम रही थी?

     

    उसकी नजर बार-बार लड़की पर जा रही थी। उसके भीगे बाल चेहरे पर चिपके हुए थे। कलाई पर टूटी हुई लाल चूड़ियों के कुछ टुकड़े अब भी मौजूद थे।

     

    रूद्रांश ने एक पल के लिए उसकी तरफ देखा और फिर नजरें सामने कर लीं। उसे खुद नहीं पता था कि वह इस अनजान लड़की की मदद क्यों कर रहा था।

     

    लेकिन एक बात तय थी… आज रात उसकी जिंदगी में कुछ

    ऐसा आने वाला था, जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी।

     

    कहानी आगे जारी रहेगी। 

    प्लीज आप सब अपना साथ बनाएं रखें।

  • अधूरी इबादत भाग~45

    अधूरी इबादत भाग~45

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग ~45 रूहानी, सब ठीक है?

     

    कमरे की नीली रौशनी में, मोबाइल अब भी कान से सटा था। रूहानी की आँखें उस जली हुई स्केच की राख पर टिकी थीं, जैसे उस राख में से एक आवाज़ उठ रही हो… एकांश की। 

    कॉल अब भी चालू था, पर दोनों तरफ़ खामोशी पसरी हुई थी। एक बेचैन, धड़कनों से भरी खामोशी।

    फिर… एक गहरी साँस की आवाज़ आई दूसरी ओर से।

    “रूहानी…” आवाज़ टूटी हुई थी, जैसे किसी ने बरसों से दबे ज़ख्म को फिर से छुआ हो।

    रूहानी की आँखें भीगने लगीं, पर आवाज़ में कोई कंपन नहीं आया। वो जानती थी, वो एक शब्द… सिर्फ एक … उसे फिर उसी दलदल में घसीट सकता था, जहाँ से उसने खुद को बड़ी मुश्किल से खींचा था।

    और तभी…&

    रूहानी के बंद दरवाज़े के उस पार से एक और आवाज़ आई। भारी, स्थिर, लेकिन एकदम साफ़। 

    ‘रूहानी, सब ठीक है?’ अद्वैत की ज़ोर से, जिसे एकांश ने भी साफ़-साफ़ सुना।`

    उसकी आवाज़ सुनते ही रूहानी जैसे एकदम यथार्थ में लौट आई। दिल में अचानक एक अजीब सी सरसराहट उठी। 

    फोन के उस छोर पर एकांश का दिल ज़ोर से धड़क उठा।_

    उसने अपने गले को साफ़ किया, जैसे कुछ कहने वाला हो…. कुछ पूछने….. पर रूहानी की आवाज़ उससे पहले आई।

    थोड़ी धीमी, पर पत्थर सी सख्त।

    “अब कभी मत कॉल करना, एकांश। “मैं तुम्हें कभी माफ़ नहीं करने वाली।”

    और बिना किसी और शब्द, बिना किसी झिझक के, उसने कॉल काट दिया।

    दूसरी ओर, एकांश का हाथ अब भी हवा में था। स्क्रीन पर “Call Ended” लिखा चमक रहा था…. जैसे किसी फैसले की मुहर लग गई हो।

    वो धीमे से सोफे पर से गिर पड़ा। पीठ फर्श से टकराई और उसकी आँखें टकटकी लगाए छत को देखने लगीं।

    उसके अंदर कुछ सचमुच टूट गया था….. पहली बार।

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°

    रूहानी ने दरवाज़ा खोला। उसके चेहरे पर एक थकी हुई उदासी की परत साफ़ दिख रही थी, फिर भी उसने होठों पर एक भिनी, बनावटी मुस्कान थमी हुई थी…. मानो उस कभी न भूले गए दर्द को अब भी सज़ा के रखा हो, जैसे वो टीस अब उसकी पहचान बन गई हो। 

    उसकी नज़र सीधी जाकर अद्वैत की आँखों से टकराई, जो दरवाज़े पर खड़ा था। उसकी आँखों में चिंता थी, पर आवाज़ बेहद नर्म थी।

    “क्या हुआ रूहानी… मैं बस पानी लेने आया था… लेकिन तुम्हारे कमरे से कुछ जलने की गंध आ रही है। तुम ठीक तो हो ना? कुछ हुआ तो नहीं?”

    रूहानी ने एक लंबी साँस ली, जैसे अंदर कुछ भारी था जिसे वो शब्दों में हल्का करना चाहती थी। उसका लहजा थका हुआ, मगर बेहद शालीन था। “तुम्हें अपने ही घर में मेरी वजह से परेशानी हुई… इसके लिए I’m really sorry…”

    वो पल भर को रुकी, फिर निगाहें झुकाकर बोली, “कुछ ख़ास नहीं था… कुछ बेकार, पुराने sketches थे। जिनकी अब कोई ज़रूरत नहीं रही… वही जल रहे थे… जिसकी smell तुम्हें आ गई होगी।”

    अद्वैत वहीं दरवाज़े पर खड़ा था, पर उसकी आँखें बार-बार कमरे के भीतर झाँक रही थीं। वहाँ एक हल्की रोशनी थी, जलते कागज़ की लपटें धीमी लय में हिल रही थीं, जैसे हर चित्र अपने अंदर कोई चीख़ लिए जा रहा हो। तभी उसकी नज़र उस अधजले sketch पर पड़ी… जिसमें रूहानी ने एकांश का चेहरा बनाया था।

    वो पल अचानक खिंच गया। हवा भारी हो गई। अद्वैत की साँसें धीमी पड़ गईं, और उसकी निगाह उस चेहरे से हट नहीं रही थी…. वो चेहरा जो अब रूहानी के अतीत की राख बन चुका था।

    रूहानी ने उसकी चुप्पी भांप ली। उसकी आवाज़ में कोई उलाहना नहीं था, सिर्फ एक शांत सवाल: 

    “कोई और बात भी है क्या, अद्वैत?”

    अद्वैत जैसे किसी गहरे ख्याल से बाहर निकला, हल्का मुस्कुराया, “नहीं… नहीं, और कुछ नहीं। Good night.

    और जैसे ही वो आगे बढ़ा, रूहानी ने दरवाज़ा बिना एक पल गंवाए बंद कर लिया, जैसे अब किसी और सवाल 

    लिए कोई जगह न हो।

    उधर, अद्वैत सीढ़ियाँ चढ़ते-चढ़ते बार-बार उसी जलते हुए sketch के बारे में सोच रहा था। वो चेहरा, वो आग की लपटों में लिपटा एकांश… उसका सौतेला छोटा भाई।

    रूहानी एकांश को कैसे जानती है? और अगर जानती है, तो अब उसके चेहरे को आग के हवाले क्यों कर रही है?

    उसका हर क़दम अब किसी पुराने रहस्य के बोझ तले दबता जा रहा था… और दिल के किसी कोने में, एक अनजानी बेचैनी करवटें लेने लगी थी।

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°

    दोपहर से ही रूहानी, अद्वैत, मीना और इवेंट प्लानर की टीम “Stitch & Soul” के स्टूडियो में जैसे अपनी सांसें बुन रही थी… हर टांका, हर मोड़, एक नए सफ़र का हिस्सा बनता जा रहा था। 

    ये सिर्फ एक स्टूडियो की ओपनिंग नहीं थी, ये एक दिल का दोबारा धड़कना था… और साथ ही मीना की 11-12 साल की बेटी गुनगुन का जन्मदिन भी।

    थीम थी…. Canvas of Dreams।

    स्टूडियो की हर दीवार पर नए सपनों की ख़ामोश दस्तक थी। फेयरी लाइट्स दीवारों से लिपटी थीं, जैसे किसी जादुई जंगल में चमकते जुगनू। छत से लटकते छोटे-छोटे origami stars और butterflies हवा में डोल रहे थे, मानो बच्चों के ख्वाबों ने कोई आकार ले लिया हो।

    हर बच्चे को जैसे ही रंग-ब्रश और छोटा सा कैनवस थमाया गया, उनकी आँखें चमक उठीं।

     रूहानी ने कहा, “जो भी ख्वाब देखो… उसे यहाँ उतार दो। कोई नियम नहीं है…. सिर्फ इमेजिनेशन।”

    गुनगुन ने pastel-colored gown पहना हुआ था, जो रूहानी ने खुद डिजाइन किया था…. वो फ्रॉक जैसे मीना की याद में गूंथा हुआ हो। उसमें लाल और सुनहरे रंग की कलियाँ थीं, चुनरी एकदम हल्की और मोतियों की बारिश जैसी। उसके बालों में छोटे-छोटे सफेद फूल सजे थे, और माथे पर एक नन्हीं सी रंगीन बिंदी — बिल्कुल कहानी की परी की तरह। वो जैसे हल्के पाँव ज़मीन पर उड़ती आ रही हो, और हँसी उसकी सबसे प्यारी जादू की छड़ी हो।

    मीना के चेहरे पर एक अलग ही सुकून था। उसे शायद यकीन नहीं हो रहा था कि उसकी बेटी आज इस महफिल की centerpiece है।

    किचन के कोने में सजे थे cupcakes — हर एक पर एक अलग रंग का दिल। छोटे से rainbow cake पर बड़े प्यार से लिखा था: “To Gungun, with all the colors of the world.”

    रूहानी ने गुनगुन को एक sketchbook दी थी, उसके पहले पन्ने पर लिखा, “हर रंग तुम्हारा अपना है… दुनिया से छिपाना मत।”

    अद्वैत एक कोने में खड़ा था, लेकिन उसके भीतर कुछ बह रहा था। उसकी नज़रें बार-बार रूहानी की तरफ लौट जातीं। वो वहाँ मेहमान की तरह खड़ा था, पर महसूस कुछ और कर रहा था…. जैसे किसी पुराने संगीत के टुकड़े को फिर से सुनना, जिसे कभी दिल ने बारीकी से सीखा था।

    रूहानी की आँखों में अब softness थी, पर वो softness कमज़ोरी नहीं थी वो वो ताक़त थी जो सिर्फ टूटकर संभलने वालों को मिलती है।

    cake-cutting की तैयारी हो चुकी थी। मैं cake के पास आई, वो बीच में खड़ी थी, बाईं ओर मीना, दाईं ओर उसका भाई चीकू। पास में अद्वैत और रूहानी, दोनों के चेहरों पर हल्की सी मुस्कान। *

    रूहानी ने हाथ में lighter लिया, मोमबत्तियाँ  कि…..

    दरवाज़े के पास से एक जानी-पहचानी आई,  नहीं बुलाया गया इस खास इवेंट में?”

    रूहानी का हाथ रुक गया। मोमबत्तियों की लौ काँपी। Adwait ने पीछे मुड़कर देखा, और उसकी भौंहें सिकुड़ गईं।

    दरवाज़े पर कोई था, जिसे सबने कहीं न कहीं दफ़न कर दिया था… लेकिन वो आज लौट आया था… जैसे7 अधूरी स्केच की परछाई अचानक कैनवस के बीच उतर आए।

    ——————

    क्या वाक़ई रूहानी ने अतीत को जलाकर ख़त्म कर दिया था… या वो राख किसी नई आग की शुरुआत थी?

    जिसे सबने दफ़न कर दिया था, वो दरवाज़े पर क्यों लौट आया था? क्या वो बस एक परछाई था… या कोई ऐसा सच जो अब सामने आना ही था?

    क्या गुनगुन के जन्मदिन की ये रंगीन शाम किसी और की काली रात में बदलने वाली थी?

     

  • अधूरी इबादत भाग~44

    अधूरी इबादत भाग~44

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~44 सुलगते स्केच

     

    रूहानी ने रात के खाने के बाद मीना को फ़ोन किया। मीना से उसने अपनी बात बड़ी ही आत्मीयता से साझा की कि वह चाहती है कि मीना की बेटी का जन्मदिन उसके नए स्टूडियो की उद्घाटन समारोह के साथ मनाया जाए। 

    मीना को इस प्रस्ताव पर कोई आपत्ति नहीं थी, उसकी आवाज़ में सहमति और थोड़ी प्रसन्नता झलक रही थी। रूहानी ने मुस्कराते हुए उसे जल्दी आने के लिए कहा और फ़ोन रख दिया।

    लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई। फ़ोन रखने के बाद भी रूहानी की आंखों में नींद नहीं उतरी। बिस्तर पर करवटें बदलती रही…. एक बेचैनी, एक उलझन सी मन में थी, जैसे किसी पुरानी याद ने धीरे से दस्तक दी हो।

    अंततः, जब नींद ने उसका हाथ थामने से इनकार कर दिया, तो वह चुपचाप, बहुत धीरे-धीरे बिस्तर से उठ खड़ी हुई। मन बोझिल था, और दिल किसी अनकहे सन्नाटे से भरा हुआ। 

    उसकी चाल में थकान थी, जैसे हर कदम बीते हुए वक़्त के किसी बोझ को ढो रहा हो। बिना आवाज़ किए वह अद्वैत के स्टडी रूम की ओर बढ़ी, जहाँ अब भी उसकी ख़ुशबू, उसकी आदतें और उसका सहेजा हुआ सन्नाटा बाकी था।

    दरवाज़ा बंद कर उसने नज़रें कमरे के कोनों में दौड़ाईं, मेज़, किताबें, कागज़… और वो ख़त, जो इस बार ईशिता का नहीं, अद्वैत का था। शायद वो उसे छुपाकर रखना भूल गया था।

    उसने धीरे से ख़त उठा लिया…. लग रहा था, ये कुछ ही देर पहले लिखा गया है।

    उसने खिड़की खोली। ठंडी हवा का झोंका भीतर आया, जैसे बीते पलों की वो ख़ामोश चाँदनी साथ ले आया हो, जो कभी दो लोगों के बीच का मौन चुपचाप तोड़ जाया करती थी।

    रूहानी फर्श पर बैठ गई। चाँद की रोशनी उसके चेहरे पर गिरी और वो पल फिर से आँखों में उतर आया… जब अदालत की ठंडी मेज़ पर उसने अद्वैत के साथ दस्तख़त किए थे। न सात फेरे थे, न मंगलसूत्र, बस काग़ज़ों की चुप्पी और एक अधूरा वादा…. जो कभी “हमेशा” नहीं था, फिर भी दिल ने मान लिया था। 

    उसने गहरी साँस ली… और पढ़ना शुरू किया।

    💌 प्रिय ईशिता,

    जब तुमने कहा था—“हमेशा,” मैंने उस एक लफ़्ज़ को अपनी रूह की सबसे भीतरी दीवार पर लिख लिया था। 

    मुझे लगा था, उस दिन से लेकर आख़िरी साँस तक, मेरी दुनिया में सिर्फ़ तुम होगी…. तुम्हारे साथ जीने का सपना, तुम्हारे साथ बूढ़ा होने की ख्वाहिश।

    पर अब….. जब तुम नहीं हो मुझे शादी करनी पड़ी। 

    नहीं…. नहीं…… मात्र क़ानूनी तौर पर एक रिश्ता दर्ज है, मगर उसमें वो धड़कन नहीं है, वो तुम नहीं हो।

    इस बंधन में न तुम्हारी हँसी है, न तुम्हारी बाँहों की वो पनाह, जहाँ मैं हर बार टूटकर समेटा जाता था।

    आज भी तुम्हारी तस्वीर मेरे कमरे में है, जहाँ तुमने उसे पहली बार रखा था….. एक मुस्कान के साथ। 

    हर बार जब मेरी नज़र उस पर टिकती है, तो यूँ लगता है जैसे वो आँखें मुझसे पूछ रही हों…. 

    “क्या अब भी वही हो, अद्वैत?” 

    और सच कहूँ, हाँ… मैं अब भी वहीं हूँ। जहाँ तुमने मुझे छोड़ा था।

    रूहानी… हम्म्म… वह अब मेरी ज़िंदगी का हिस्सा है…… एक साल के लिए, एक समझौते की तरह। 

    कभी-कभी मुझे लगता है कि यह समय का एक अजीब सा खेल है। तुम तो जानती हो, मैं समझौतों में यकीन नहीं रखता था। लेकिन ज़िंदगी कभी-कभी तुम्हें ऐसे मोड़ पर ले आती है जहाँ सबसे अनचाहे रास्ते ही सबसे ज़रूरी लगने लगते हैं।

    आज उसने मुझे अपने नए स्टूडियो की ओपनिंग में बुलाया। उसकी आँखों में चमक थी, लेकिन उसकी आवाज़ में वो थकान थी जिसे शब्द छिपा नहीं पाए। 

    उसने मुस्कराकर कहा, “अगर फीस लोगे तो अपनी बचत से दूँगी।” जैसे कोई कुछ साबित करना चाहता हो, शायद मुझे नहीं… खुद को।

    तुम होती तो हँसकर कहती, “अद्वैत, तुम कभी नहीं बदलोगे।” 

    और मैं जवाब देता, “हाँ ईशिता, तुम्हारे बिना क्या बदलूँ?”

    रूहानी की आँखों में कभी-कभी तुम्हारी सी ज़िद नज़र आती है….. वही जो तुमने देखी थी जब मैंने अपनी पहली किताब लिखी थी। पर उसमें तुम्हारे जैसा सुकून नहीं है। 

    लेकिन उसकी दुनिया अलग है, उलझनों से भरी… उसके संघर्ष अलग हैं। मैं उसे देखता हूँ, वो अपने सपनों को पूरा करने की कोशिश कर रही है। कभी उसकी हँसी में एक हल्की सी उदासी झलकती है…. एक ऐसी खामोशी, जो बहुत कुछ कहती है। 

    आज रात कमरे में बस पीली रौशनी थी। वो चाहती थी कि मैं कुछ कहूँ… और मैंने चाहा कि कह पाऊँ। 

    लेकिन मेरे होंठों पर सिर्फ़ तुम थी। मेरे शब्द हमेशा तुम्हारे लिए थे, ईशिता… सिर्फ़ तुम्हारे लिए।

    लोग कहते हैं… “आगे बढ़ो।” 

    पर वो नहीं जानते कि आगे बढ़ने के लिए पीछे छूटना पड़ता है। 

    और तुम कभी पीछे नहीं छूटी… तुम तो मेरी हर साँस में बसी रही। हर सन्नाटे में, हर अधूरे वाक्य में।

    मैं नहीं जानता ये समझौता क्या रंग लाएगा, रूहानी क्या खोज रही है, और मैं कहाँ जाऊँगा… पर एक बात जानता हूँ….

    मेरी सबसे ख़ूबसूरत कहानी, 

    जो आज भी अधूरी है… 

    वो सिर्फ़ तुम्हारी है।

    तुम्हारी याद में, 

    अद्वैत

    उस ख़त की आख़िरी पंक्ति पर आते-आते, रूहानी की उंगलियाँ काँपने लगीं। उसकी आँखें ख़ामोश थीं लेकिन भीतर एक सुनामी फूट रही थी। खिड़की के पार रात अब और भी स्याह हो चुकी थी, लेकिन अंदर का अँधेरा… उससे कहीं ज़्यादा गहरा था।

    °°°°°°°°°°°°°

    अपने कमरे में लौटने के बाद रूहानी धीमे-धीमे चलती हुई अपनी अलमारी के पास पहुंची। अलमारी खोलते हुए उसकी उंगलियों में कंपन था। 

    उसने नीचे की दराज से वो पुरानी फाइल निकाली, जिसे वो छूने से भी डरती थी….. वही फाइल जिसमें वो स्केच थे, जो उसने एकांश के लिए बनाए थे।

    कुछ स्केच अधूरे थे, जैसे उनकी कहानी। कुछ के कोनों पर जले हुए निशान थे…. जैसे दिल के किसी हिस्से को समय ने धीरे-धीरे राख में बदला हो। उसने एक-एक करके उन्हें फर्श पर फैलाया, हर स्केच से जैसे कोई चीख़ बाहर आ रही थी। 

    वो मुस्कुराता चेहरा, वो आँखें जो रूहानी की आँखों में डूब जाया करती थीं, और वो अधूरा स्केच जिसमें रूहानी ने एकांश का चेहरा खत्म करने से पहले ही पेंसिल छोड़ दी थी।

    अचानक वो पल कौंध गया….. वो विश्वासघात, वो ठंडापन, जो अब भी उसकी रगों में काँपती थी। उसकी साँसें तेज़ हो गईं, चेहरा पसीने से भीग गया। 

    वो सारे स्केच को समेटी , जैसे ज़हर को एक जगह इकट्ठा कर रही हो, और फिर कमरे के कोने में उन्हें पहाड़ कर दिया। 

    “अब तुमसे जुड़ा कुछ भी मेरे पास नहीं रहेगा…” वह बुदबुदाई, और माचिस जलाकर स्केच को आग लगा दी।

    लपटें धीरे-धीरे फैलने लगीं। रूहानी की आँखें उस आग में डूब गईं, मानो वहीं अपना हर अधूरा जवाब खोज रही हो। उसके चेहरे पर आँसू नहीं थे, पर जो सूनापन था, वो किसी चीख से कम नहीं था। 

    वो उठी, और मोबाइल से उस जलते हुए पल की एक तस्वीर लेने लगी…. जैसे वो राख होते पलों को आख़िरी बार बंद करना चाहती हो।

    लेकिन तभी…

    उसका फोन कंपन करने लगा। 

    स्क्रीन पर नाम चमका…. एकांश कॉलिंग।

    रूहानी का हाथ बीच हवा में रुक गया।

    ————–

    एकांश को अभी क्यों याद आई रूहानी?

    क्या रूहानी फोन उठाएगी… या इस बार वो जवाबों को सुलगा देगी, हमेशा के लिए? 

    क्या ये रिश्ता महज़ एक समझौता है… या किसी अनजाने मोड़ पर दिल फिर से धड़कने लगेगा? 

     

  • अधूरी इबादत भाग~43

    अधूरी इबादत भाग~43

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~43 फासलों के बीच हम 

     

    काम्या रैना… एक ऐसा नाम जो किसी पहचान की मोहताज नहीं था। मशहूर फैशन डिज़ाइनर, कई national और international fashion weeks की consistent शो-स्टॉपर, luxury lifestyle magazine के कवर पर चमकता चेहरा और Pune के सबसे रईस इलाके में बने उस glass-walled penthouse की रानी… जहाँ से शहर की चकाचौंध रातों में उसकी ही तरह तन्हा चमकती दिखती थी।

    सिल्क की emerald green slit gown, six-inch high heels, diamond-studded smartwatch, curated nail art और एक flawless attitude….. ऐसा लग रह था जैसे काम्या किसी magazine shoot से निकल कर सीधी अपने रूम में आ गई हो। 

    उसके माता-पिता दूसरे शहर में रहते थे, पर दौलत और रुतबे में वो किसी राजा-रानी से कम नहीं थे। 

    और उसका पति? एकांश राठौड़….. 

    फेमस फोटो और वीडियो ग्राफर, जो कभी दुनियाभर की शादियाँ, शूट्स और फिल्म फेस्ट कवर करता था, अब शादी के बाद सिर्फ काम्या के लिए काम करता था। 

    उनकी शादी उतनी ही ग्रैंड थी, जितनी उनकी दुनिया…. लेकिन उस दुनिया के पर्दे के पीछे, कुछ अधूरा सा पल रहा था।

    जब एकांश के चीखने की आवाज़ें घर की साज़-सज्जा में दरार की तरह गूंजने लगीं, तो काम्या का धैर्य टूटा। वो अपने रूम से निकली, बालों में लगा महँगा क्लिप अब भी चमक रहा था, लेकिन चेहरे पर एक भी शिकन की जगह अब लावा बह रहा था।

    उसने देखा एकांश की उथल-पुथल में डूबा हुआ था। उसकी साँसें तेज़ थीं, आँखों में जैसे कोई भटका हुआ तूफ़ान हो जो दिशा भूल गया हो। उसका पूरा जिस्म काँप रहा था, पर वो कंपन भीतर के दर्द का नहीं, किसी खोए हुए पल को दोबारा छू लेने की बेतुकी कोशिश का था। 

    “ये सब क्यों कर रहे हो, एकांश?” उसने पूछा—आवाज़ सख्त, आँखें सवालों से भरी।

    मगर एकांश… वो जैसे किसी और ही दुनिया में था। उसकी आँखों में एक पागलपन था, चेहरा पसीने से तर, होठ बुदबुदा रहे थे। 

    वो जैसे हवा में किसी के होने का भ्रम जी रहा था। और उस भ्रम में, वो नाम निकल गया… “रूहानी।”

    बस… इतना ही सुनना था, काम्या का चेहरा गुस्से से जल उठा, उसने एक झटके में एकांश की बाँह पकड़ी और पूरे ज़ोर से झटकते हुए तमाचा जड़ दिया।

    “होश में आओ, एकांश! You dammit… what the hell is wrong with you!” उसकी आवाज़ दीवारों से टकरा रही थी।

    एकांश ठिठक गया। पलकें फड़कने लगीं। चेहरा जैसे गर्म रेत पर गिरा हो… वो एक पल को देखता रहा, फिर बुदबुदाया, “I’m sorry…” और बिना एक और शब्द बोले अपने कमरे की ओर चला गया। 

    कुछ देर बाद, कपड़े बदलकर, चेहरा धोकर, बाल सँवारकर… वो ड्रॉइंग रूम में लौटा तो देखा, काम्या वही थी, पर अब उसका चेहरा शांत था। पहली बार उसके हाथ में कोई luxury purse नहीं, बल्कि first aid box था। 

    वो professionally composed expression, जो वो runway पर रखती थी, अब भी था… बस उस calmness के नीचे कुछ टूटा हुआ तैर रहा था।

    एकांश चुपचाप उसके बगल बैठ गया। उसके चेहरे पर अब कोई ग़ुस्सा नहीं था… कोई प्यार भी नहीं। सिर्फ एक खालीपन था, जो ointment की ठंडक से भी नहीं भर पा रहा था। 

    काम्या उसके और पास खिसक आई, जैसे कई मुद्दों को hold पर रख दिया हो। उसने उसका हाथ उठाया और बहुत नर्मी से, उस जख्मी जगह पर ointment लगाने लगी। उसकी उंगलियाँ expert थीं…. न सख्त, न बहुत कोमल… बस उतनी ही कि घाव भर सके, बिना कुछ कहे।

    कमरे की हवा गाढ़ी हो चुकी थी, जैसे हर साँस किसी अधूरे वादे की राख समेटे चल रही हो। एकांश की उंगलियाँ अभी भी उस पट्टी की गर्माहट महसूस कर रही थीं, जो काम्या ने उसके जख्मी हाथ पर बांधी थी। 

    उसकी नज़रें फर्श पर जमी थीं, लेकिन ज़हन में अब भी रूहानी की छाया गूंज रही थी…. जैसे वो अभी भी वहाँ खड़ी हो, और कोई उसे ज़बरदस्ती वापस खींच रहा हो।

    काम्या के होंठों पर एक फीकी मुस्कान तैर रही थी…. वो मुस्कान जिसमें नमी नहीं, नफ़रत की नोंक छुपी थी।

    “तुम्हारे ज़ख्म की मरहम तो लगा दी, अब दिल के लिए भी कुछ चाहिए?” उसकी आवाज़ हल्की थी, लेकिन हर शब्द किसी surgical blade की तरह काटता चला गया। 

    “या वो कोई और लगाए?”

    एकांश ने आंखें उठाईं, धीमे से कहा, “काम्या… प्लीज़… अभी नहीं।”

    लेकिन उसकी बात पूरी होने से पहले ही काम्या का गुस्सा दहाड़ बनकर फूट पड़ा, “कब? जब तुम पूरी तरह उस Illusion के साथ जीने लगो?”

    उसका चेहरा अब केवल गुस्से से नहीं, अपमान की पीड़ा से भी तप रहा था। उसकी नथुने फड़फड़ा रही थीं, जैसे दिल की आग सांसों के रास्ते बाहर निकलने को मचल रही हो।

    “क्या तुम्हें ज़रा भी अंदाज़ा है कि तुम्हारी ये हालत देखकर कैसा लगता है?” उसकी आँखों में आँसू की नहीं, जवाब की मांग थी।

    एकांश ने हल्की साँस ली, जैसे भीतर कुछ जकड़ रहा हो, “मैंने कभी नहीं कहा था कि मैं परफेक्ट हूं।”

    “नहीं,” काम्या ने दाँत भींचते हुए कहा, “तुमने सिर्फ ये साबित किया है कि मैं irrelevant हूं। तुम्हारे लिए, मैं बस एक नाम हूं… एक well-dressed distraction… nothing more.”

    एकांश की निगाहें अब उसके चेहरे से हटकर सामने की दीवार पर टिक गईं। दीवार पर टँगा वो बड़ा सा मिरर अब उसके अंदर झाँक रहा था। 

    ठंडेपन से उसने कहा, “तुम्हें जो चाहिए था….. status, success, lifestyle…… सब कुछ तो है न। और मैं… एकांश राठौड़… वो भी तो मिल गया न तुम्हें। फिर शिकायत किस बात की?”

    काम्या की आँखों में कुछ काँपा, दर्द की परत में दबा हुआ सच। वो फुसफुसाई, “मैंने तुमसे सौदे नहीं किए थे, एकांश… मैंने तुमसे सच में प्यार किया….. पर तुमने मुझे कभी उस क़ीमत पर चाहा ही नहीं।”

    कुछ पल के लिए कमरे में फिर वही सन्नाटा। 

    एकांश ने नज़रें झुकाईं, जैसे अपने शब्दों की ही सच्चाई उसे कचोट रही हो। उसकी उँगलियाँ आपस में उलझ रही थीं…. जैसे सोच और शर्म एक-दूसरे से टकरा रही हों।

    उसकी आवाज़ आई, धीमी और डूबती हुई, जैसे किसी पुराने कमरे में कोई खिड़की खुली छोड़ दी गई हो और अब हवा की सिसकियाँ भीतर घुस रही हों।

    “काम्या… हर किसी का दर्द से जूझने का अपना तरीका होता है,” उसने कहा, मानो ये शब्द नहीं, कोई टूटी हुई ढाल हो जिसे वो अपने खिलाफ उठाने की कोशिश कर रहा हो।

    “मेरा तरीका… शायद थोड़ा उलझा हुआ है, लेकिन… मैं कोशिश कर रहा हूँ, सच में।”

    काम्या का चेहरा अब सख़्त था, लेकिन उसकी आँखों में कोई तूफ़ान हिलोरें मार रहा था। “तुम्हारा ‘तरीका’… एक दूसरी औरत के नाम को बड़बड़ाना है, उसे अपने hallucinations में छूना… और फिर sorry बोलकर बाथरूम में छुप जाना?”

    एकांश का सिर झटका, “रूहानी कोई ‘दूसरी औरत’ नहीं है।”

    उस एक वाक्य ने जैसे काम्या के भीतर किसी मृत volcano को जगा दिया। उसने एकदम शांत लहजे में कहा, “हां… और मैं कभी पहली नहीं थी।”

    वो उठी। हाई हील्स की खनक ने जैसे कमरे की चुप्पी को चीर दिया—हर कदम ऐसा, मानो फर्श पर नहीं, किसी गहरे राज़ पर रखा जा रहा हो। 

    एकांश वहीं बैठा रह गया….. उस खाली first-aid box के पास, जो अब पट्टी से ज़्यादा, उसके अंदर की टूट-फूट की गवाही दे रहा था।

    फिर उसने जेब से मोबाइल निकाला। उंगलियाँ काँप रही थीं, जैसे दिल और दिमाग आपस में लड़ रहे हों। उसने फोन अनलॉक किया। Contacts खोले।

    स्क्रॉल किया…

    “Ruhani 💔” 

    नाम अब भी सेव था, delete कभी कर नहीं पाया था।

    उसने स्क्रीन को कुछ सेकंड देखा, जैसे उसमें रूहानी की आँखें झाँक रही हों… पूछ रही हों,”अब क्यों?”

    थोड़ी देर वो यूँ ही बैठा रहा। कमरे में सिर्फ मोबाइल की नीली रौशनी थी और अचानक, उसने call button दबा दिया।

    Tring… tring… tring…

    हर रिंग एक heartbeat जैसी थी, धीमी, भारी, और किसी अनकही उम्मीद से भरी।

    फिर… क्लिक। call connect हो गया। पर दूसरी तरफ… सन्नाटा।

    न कोई “Hello” न कोई सांस न कोई हलचल….. बस… एक breathing silence जैसे किसी बंद कमरे में कोई अपनी साँसें रोककर सुन रहा हो।

    एकांश की उँगलियाँ काँप गईं। उसने धीमे से फुसफुसाया, “रूहानी…?”

    कोई जवाब नहीं।

    ——————————-

    क्या उस breathing silence के पीछे वाकई कोई था… या ये भी एकांश की उसी उलझी हुई दुनिया का हिस्सा था?

    अगर रूहानी सच में सुन रही थी… तो अब वो क्या सोच रही होगी?

    काम्या के हर कदम की खनक अब किसी गहरे राज़ को जगा रही है… क्या वो राज़ कभी उजाला देखेगा?

     

  • अधूरी इबादत भाग~42

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    भाग~42 क्या वो लौट आई? 

     

    रूहानी कैब की खिड़की से बाहर देख रही थी, शहर की भीड़ में खोए चेहरों को, तेज़ भागती गाड़ियों को और उन धूप की किरणों को जो शाम होते-होते सुनहरी उदासी में बदल जाती थीं। 

    मन में हल्की-सी थकावट थी, पर साथ ही एक जिद भी थी, टूटे दिन की टहनियों से उम्मीद के फूल उगाने की कोशिश।

    स्टूडियो की ओपनिंग सेरेमनी की तारीख तय हो चुकी थी, और उसने सोचा कि अगर उसी दिन मीना की बेटी गुनगुन का बर्थडे भी मना लिया जाए, तो बच्ची की आँखों में अपनापन महसूस करने की चमक भी आ जाएगी।

    “वैसे भी… मैं गुनगुन के लिए ड्रेस डिज़ाइन तो कर ही रही हूँ,” रूहानी ने खुद से बुदबुदाते हुए सोचा, एक मुलायम मुस्कान के साथ।

    कैब रुकी, वो उतरी, हाथ में कुछ सैंपल्स और पर्स थामे, और धीरे-धीरे घर की ओर कदम बढ़ाए। दरवाज़ा खोलते ही सबसे पहले हॉल की खामोशी ने उसका स्वागत किया, वो खामोशी जो किसी की कमी से ज्यादा, किसी सोच में डूबे होने का संकेत लग रही थी। 

    अद्वैत वहां नहीं था, जबकि आमतौर पर इस वक़्त वो वही होता था, कॉफी मग के साथ या किसी किताब में उलझा हुआ।

    रूहानी ने मोबाइल निकाला, कॉल लगाया। पहली ही बेल में उठा लिया अद्वैत ने।

    “कहाँ हो?” उसने सीधा पूछा।

    “स्टडी रूम में,” अद्वैत की आवाज़ आई, थोड़ी थकी हुई, पर हमेशा की तरह स्थिर।

    “नीचे हॉल में आओगे? कुछ बात करनी है,” रूहानी ने कहा, आवाज़ में ना कोई झिझक थी, ना कोई बनावट, सिर्फ़ एक सादगी थी, जिसमें रिश्तों के सारे स्पेस टंगे हुए थे।

    फोन कटते ही उसने काँच की मेज पर सैंपल्स फैला दिए, हर रंग, हर डिज़ाइन जैसे गुनगुन के चेहरे की मुस्कान की कल्पना बनकर उसके आगे बिछ गए थे। 

    मन में अब भी हल्की हिचकिचाहट थी, न जाने अद्वैत को उसका सुझाव कैसा लगेगा। पर फिर भी, वो जानती थी कि जिन रिश्तों में maturity हो, वहाँ छोटी-छोटी बातें भी बन सकती हैं।

    “काश लोग ऐसे ही छोटी खुशियों को बाँटने में उतना ही उत्साहित हों, जितना कि बड़े इवेंट्स की प्लानिंग में होते हैं,” रूहानी ने बेजान टेबल की ओर देखते हुए कहा, जैसे कोई पेंटिंग अधूरी छोड़कर रंग सोच रहा हो।

    अद्वैत जब स्टडी रूम से नीचे आया, तो उसकी चाल में हमेशा वाली थकान नहीं थी, लेकिन एक अजीब-सी उदासी उसके चेहरे पर छाई हुई थी। 

    रूहानी सोफ़े पर बैठी हुई थी, सामने मेज़ पर इनविटेशन कार्ड और कुछ सैंपल्स फैले थे। कमरा हल्के पीले लैंप की रोशनी में डूबा हुआ था, जो दोनों की मौजूदगी को और भी गहरा बनाता जा रहा था।

    अद्वैत ने सीधे रूहानी के चेहरे को देखकर पूछा, “क्या बात करनी थी अभी? डिनर का टाइम तो वैसे भी होने वाला है।”

    रूहानी ने नज़रें उठाईं, फिर शांत लहजे में कहा, “इसीलिए तो अब बात करनी सोची… क्योंकि तुम तो डिनर के टाइम कभी बात नहीं करते हो?”

    उसकी आवाज़ में शिकवा नहीं था, बस एक स्मृति थी, उन नियमों की, जो दोनों ने बिना ज़्यादा कहे बना लिए थे।

    अद्वैत थोड़ा मुस्कराया, “तो आज तुमने मुझे नियम तोड़ने से पहले बुला लिया?”

    रूहानी ने नजर झुकाकर कहा, “शायद… या शायद ये भी एक रूल है जो मैंने खुद के लिए बना लिया।”

    वो उठी और मेज़ से एक इनविटेशन कार्ड उठाकर अद्वैत की ओर बढ़ाया।

    “ये लो… तुम्हारे लिए,” उसने कहा।

    अद्वैत ने कार्ड लिया, उस पर उंगलियाँ फिराईं, जैसे हर अक्षर को महसूस करना चाहता हो।

    “Well… thank you, इतनी बड़ी रकम देने के लिए,” रूहानी बोली, “और तुमने actual reason भी नहीं पूछा, पता नहीं क्यों… लेकिन मैं ही बता देती हूँ। मैंने विमान नगर के पास धनौरी में अपना नया स्टूडियो खरीदा है stich & soul।”

    अद्वैत ने कार्ड को देखा, फिर उसकी तरफ़ नज़रें उठाईं, बिलकुल खाली, जैसे उसका मन कुछ पलों के लिए वहीं अटका हो गया हो।

    “दो दिन बाद मेरे studio की opening ceremony है,” रूहानी ने धीमे से जोड़ा।

    वो बोल रही थी, लेकिन आँखें बार-बार अद्वैत के चेहरे पर टिक जा रही थीं, जैसे कुछ खोज रही हो वहाँ।

    “तो… तुम्हें इनवाइट करना बनता है,” उसने मुस्कराते हुए कहा, “आख़िर कुछ तो रिश्ता है हमारा… नाम का ही सही।”

    फिर हल्का सा रुककर, जैसे खुद से कह रही हो, “मतलब… कुछ मर्यादाएँ तो निभानी पड़ती हैं, है न?”

    अद्वैत कुछ नहीं बोला। उसके होंठ थोड़े खुले थे, लेकिन शब्द कहीं अटक से गए थे।

    “Chief guest के तौर पर आ सकते हो,” रूहानी ने हिम्मत से कहा, “I mean… अगर तुम्हारे schedule में fit हो।”

    वो पल थोड़े अजीब थे, एक formal आमंत्रण, जो उस रिश्ते के भीतर से निकला था जिसमें कभी personal होने की इजाज़त नहीं थी।

    अद्वैत की चुप्पी देख रूहानी खुद ही हँस पड़ी, एक हल्की, almost sarcastic हँसी।

    “Oh sorry, I forget…” उसने कहा, “तुम अपनी fee भी तो लोगे, right?”

    अद्वैत की भौंहें थोड़ी उठीं, लेकिन अब भी उसने कुछ नहीं कहा।

    “So… Mr. Bestselling Writer, Mr. Adwait Awasthi… आप कितना charge करेंगे?” उसकी आवाज़ में अब एक playful taunt था, जो वो अक्सर खुद को ढाल देने के लिए इस्तेमाल करती थी।

    फिर कुछ याद आया उसे, और उसका चेहरा थोड़ा गंभीर हो गया।

    “Ouch,” उसने कहा, “मैं तो सही में भूल गई… तुम तो यही बोलोगे ना कि ‘मेरे ही पैसे मुझे वापस कर रही हो?’”

    अद्वैत की आँखें अब उसकी तरफ़ सीधी टिक चुकी थीं, पर होंठ अब भी बंद थे।

    “Don’t worry,” रूहानी ने कंधे उचकाते हुए कहा, “मेरी little savings हैं… उसमें से दे दूँगी।”

    उसके चेहरे पर एक pride थी, लेकिन उस pride में एक अकेलापन भी छुपा था, जैसे वो दुनिया को साबित करना चाहती हो कि वो खुद के लिए काफी है, पर उसके भीतर कहीं एक कोना अब भी चाहता था कि कोई बिना कहे उसे थाम ले, बिना शर्तों के।

    अद्वैत ने कार्ड को देखा, फिर उसकी ओर बढ़ा, एक पल को कुछ कहने के लिए होंठ खुले, लेकिन वो फिर रुक गया।

    कमरे की हवा थोड़ी भारी हो गई थी, जैसे शब्दों के बजाय अब खामोशियाँ ही संवाद कर रही हों।

    और रूहानी?

    वो वही खड़ी थी, अपनी बनाई हुई सीमाओं के भीतर, फिर भी उम्मीद से थोड़ा आगे… जैसे चाहती हो कि इस बार कोई रेखा पार कर जाए… सिर्फ़ एक बार… बस एक बार।

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°

    एकांश ने जैसे ही वो आवाज़ सुनी, उसकी पलकों की सिलवटें थरथरा उठीं, जैसे बरसों से सूखे पड़े किसी पुराने खत के अक्षर अचानक ज़िंदा हो उठे हों।

    गर्दन धीमी-सी हरकत में उठी, मानो उसे डर हो कि अगर ज़रा भी जल्दी की, तो वह मंज़र बिखर जाएगा। और फिर… उसने देखा।

    वो वही थी …. रूहानी।

    उसके सामने खड़ी, बिल्कुल वैसी ही जैसे उसकी यादों में थी, वही मासूम आँखें, जिनमें एक वक़्त उसकी पूरी कायनात सांस लेती थी। 

    वही धीमी साँसें, जो कभी उसके दिल की धड़कनों से ताल मिलाया करती थीं और वही हल्के मुस्कुराते होंठ, जिनमें उसकी ज़िन्दगी की सबसे गहरी तसल्ली लिपटी थी।

    “एकांश…” वो बोली, बेहद नर्मी से, जैसे किसी टूटते हुए सपने की आवाज़ हो, धीमी, लेकिन सीधी दिल में उतर जाने वाली।

    एकांश के भीतर कुछ दरक गया। उसका पूरा वजूद जैसे किसी पुराने मंदिर की मूर्ति की तरह थरथरा उठा, जिसमें सालों से किसी ने आस्था नहीं जगाई थी। 

    वो उठ खड़ा हुआ और धीमे-धीमे उसके पास गया। कांपते हाथों से उसके चेहरे को छूने लगा…. उसके गाल, उसकी ठोड़ी। हर स्पर्श में वो अपने टूटे हिस्सों को जोड़ने की कोशिश कर रहा था।

    वो रो नहीं रहा था, लेकिन उसकी आँखें… जैसे किसी अंधे कुएँ में उतरी हुई थीं….. गहरी, नम, और खोई हुईं। वो अब शब्दों में नहीं, सिर्फ स्पर्श में जी रहा था। जैसे ज़िन्दगी ने भाषा छोड़ दी हो।

    रूहानी चुप रही। ना कोई विरोध, ना कोई सवाल। जैसे वो कोई हक़ीक़त नहीं, एकांश की टूटी हुई कल्पना की सजीव मूर्ति हो…. जो सिर्फ उसके लिए वहाँ खड़ी थी।

    एकांश ने उसे बाँहों में खींच लिया। उसकी साँसें अब तेज़ थीं, अधूरी थीं। उसके होठों ने उसकी त्वचा को छुआ…. माथे से होते हुए उसकी गर्दन तक। 

    हर चुम्बन में एक अधूरा वादा था, हर साँस में एक बुझता हुआ इश्क़। एक वो इश्क़ जिसे वक़्त ने अधूरा छोड़ दिया था, और आज ये लम्हा जैसे उसे पूरा करने आया था।

    “तुम मेरी हो… हमेशा से,” वो बुदबुदाया, उसकी गर्दन में मुंह छुपाए हुए, “अब कोई फ़ासला नहीं… कोई वादा नहीं… बस तुम और मैं…”

    लेकिन…

    जैसे ही उसके होठ नीचे फिसले, जैसे ही उसका स्पर्श उस सरहद की ओर बढ़ा जहाँ इज़्ज़त और इच्छा की लकीरें धुंधली पड़ने लगती हैं…

    चटाक!!

    एक ज़ोरदार तमाचा उसकी दुनिया को झकझोर गया। जैसे कोई शीशा हो, जिसमें वो रूहानी को देख रहा था और अचानक किसी ने उसे पत्थर मार दिया हो। सब कुछ चकनाचूर।

    वो पीछे हटा। चेहरा सुलग उठा, और उसकी आँखों ने काँपते हुए सामने देखा …. 

    वो रूहानी नहीं थी।

    उसका चेहरा गुस्से से तमतमाया हुआ, आँखों में जलता हुआ तूफ़ान। उसकी नथुने फड़फड़ा रही थीं, जैसे हर साँस एक ज्वालामुखी को थामे हुए हो। उसने कसकर एकांश की बाहें झटक दीं…. जैसे किसी ज़हर को अपनी त्वचा से दूर फेंक रही हो।

    “होश में आओ, एकांश! You dammit… what the hell is wrong with you!” उसकी आवाज़ में वो सब कुछ था… जलन, गुस्सा, और टूटता हुआ भरोसा।

    एकांश वहीं खड़ा रह गया। जैसे किसी सपने से गिर पड़ा हो… हकीकत की सख़्त ज़मीन पर, नंगे पाँव, बेआवाज़।

    उसके हाथ अब भी हवा में थे… किसी को छूने की मुद्रा में, लेकिन अब वहाँ कोई नहीं था। 

    ——————

    क्या अद्वैत उस इन्विटेशन कार्ड के साथ रूहानी के जज़्बात पढ़ पाएगा, या फिर वो भी उस रिश्ते की तरह अनकहे रह जाएंगे? 

    क्या एकांश वाक़ई रूहानी को देख रहा था… या बस अपनी ही अधूरी चाहत को छूने की नाकाम कोशिश कर रहा था? 

    कौन थी वो… जो एकांश की बाँहों में थी? 

     

  • Dil sabhal ja jara part – 3

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

    Part – 3 chhupa huaa raj 

     

    सुबह की पहली किरण हॉस्टल की खिड़की से अंदर आई और प्रिया की आंखों पर पड़ी। वो रात भर सो नहीं पाई थी। वो लिफाफा… वो चिट… “तेरी मां का नाम रानी था। वो शिमला में ही मरी। मत ढूंढना, खतरा है।” ये शब्द उसके दिमाग में चक्कर काट रहे थे। उसने चिट को कई बार पढ़ा, फिर उसे डायरी के बीच में छिपा दिया। हाथ कांप रहे थे। 

     

    रिया अभी भी सो रही थी। प्रिया चुपके से उठी, चेहरा धोया और तैयार हुई। आज कॉलेज का दूसरा दिन था। लेकिन उसका मन क्लास में नहीं, उस चिट में था। मां का नाम रानी? पहली बार उसे अपनी मां का नाम पता चला। लेकिन कैसे? कौन रख गया वो लिफाफा उसके बैग में? हॉस्टल में कोई अंदर आया था? या पार्टी के दौरान? 

     

    कैंटीन में नाश्ता करते हुए प्रिया ने रिया को बताया। रिया की आंखें चौड़ी हो गईं। “क्या? यार ये तो सीरियस है! कोई तुझे जानबूझकर डरा रहा है। पुलिस को बताएं?”

     

    “नहीं रिया,” प्रिया ने धीरे से कहा। “पहले खुद समझना चाहती हूं। अगर पुलिस में गई तो शायद आश्रम वाले को पता चल जाए। सुलेखा आंटी चिंता करेंगी।”

     

    रिया ने सिर हिलाया। “ठीक है। लेकिन अकेले मत करना कुछ। मैं साथ हूं। आज शाम को लाइब्रेरी चलेंगे। शिमला के पुराने न्यूज पेपर्स देखेंगे। शायद कुछ मिल जाए ‘रानी’ नाम की औरत के बारे में।”

     

    प्रिया ने थैंक्स कहा। लेकिन अंदर से डर लग रहा था। 

     

    क्लास शुरू हुई। इंग्लिश लिटरेचर। प्रोफेसर शेकスピयर की ‘रोमियो एंड जूलियट’ पढ़ा रही थीं। प्रिया की सीट खिड़की के पास थी। वो बाहर देख रही थी – पहाड़, कोहरा। तभी उसे लगा कोई उसे देख रहा है। उसने पलटा। आरव दो बेंच पीछे बैठा मुस्कुरा रहा था। उसने एक नोट फेंका – “लंच टुगेदर?”

     

    प्रिया ने मुस्कुरा कर हां में सिर हिलाया। उसका दिल थोड़ा हल्का हुआ। आरव की मौजूदगी में उसे सुकून मिलता था। 

     

    लंच ब्रेक में रिया, आरव और उनका ग्रुप साथ बैठा। आरव ने प्रिया के लिए प्लेट में एक्स्ट्रा सैंडविच रखा। “खा ना, दुबली हो जाएगी वरना।”

     

    रिया हंस पड़ी। “आरव भाई, इतना केयर? कुछ तो गड़बड़ है।”

     

    आरव ने शरमाते हुए कहा, “बस दोस्ती। प्रिया नई है ना।”

     

    लेकिन प्रिया की नजर अवनी पर पड़ी। अवनी दूसरे टेबल से उन्हें घूर रही थी। उसकी आंखों में जलन साफ दिख रही थी। प्रिया ने नजरें झुका लीं। 

     

    लंच के बाद आरव ने प्रिया को साइड में लिया। “कल पार्टी में सॉरी। अवनी वैसी है – अमीर घर की बिगड़ी हुई। लेकिन तू मत लेना दिल पर। मैं हूं ना।”

     

    प्रिया ने पहली बार खुलकर बात की। “आरव, मुझे अच्छा लगता है जब तू बात करता है। घर जैसा फील होता है।”

     

    आरव की आंखें चमक उठीं। “सच? तो आज शाम कॉलेज के पीछे वाली हिल पर चलेंगी? सनसेट देखने। सिर्फ हम दोनों।”

     

    प्रिया हिचकिचाई। लेकिन फिर हां कह दिया। 

     

    दोपहर की क्लास के बाद प्रिया और रिया लाइब्रेरी गईं। पुरानी लाइब्रेरी थी – ऊंची अलमारियां, धूल भरी किताबें। लाइब्रेरियन अंकल ने कहा, “पुराने न्यूजपेपर्स माइक्रोफिल्म में हैं। कंप्यूटर पर देख लो।”

     

    दोनों कंप्यूटर पर बैठ गए। प्रिया ने सर्च किया – “शिमला एक्सीडेंट रानी”। कुछ पुराने आर्टिकल मिले। एक २० साल पुराना हेडलाइन – “शिमला के मशहूर ठाकुर फैमिली की बहू रानी ठाकुर की कार एक्सीडेंट में मौत। बच्ची लापता।”

     

    प्रिया का दिल बैठ गया। ठाकुर फैमिली? आरव का सरनेम भी ठाकुर था। क्या कनेक्शन?

     

    आर्टिकल में लिखा था – “रानी ठाकुर, ठाकुर होटल्स की मालकिन, देर रात कार एक्सीडेंट में मरीं। उनकी पांच साल की बेटी प्रिया कार में थी, लेकिन एक्सीडेंट के बाद लापता हो गई। पुलिस को शक है कि कोई अपहरण भी हो सकता है।”

     

    प्रिया की उंगलियां ठंडी पड़ गईं। प्रिया… पांच साल की… लापता। क्या वो वही प्रिया है? और ठाकुर फैमिली – आरव की फैमिली?

     

    रिया ने उसका हाथ थामा। “प्रिया… ये… तू ही तो है ना?”

     

    प्रिया की आंखों से आंसू छलक पड़े। “रिया… अगर ये सच है तो मैं… मैं अमीर घर की हूं? फिर मुझे अनाथ आश्रम में क्यों छोड़ा गया?”

     

    रिया ने कहा, “शायद कोई साजिश। लेकिन आरव को पता है क्या?”

     

    प्रिया ने सिर हिलाया। “मुझे नहीं पता। आज शाम उससे मिलने जा रही हूं। पूछूंगी?”

     

    “नहीं!” रिया ने डरते हुए कहा। “अगर फैमिली ने ही तुझे छोड़ा है तो खतरा हो सकता है। वो अनजान कॉल, वो चिट – सब कनेक्टेड लग रहा है।”

     

    प्रिया चुप हो गई। उसका दिमाग घूम रहा था। 

     

    शाम हुई। सनसेट का टाइम। प्रिया कॉलेज के पीछे वाली हिल पर पहुंची। आरव पहले से वहां था – हाथ में दो कॉफी कप। “हाय! ठंड है ना, कॉफी पी।”

     

    दोनों एक बड़े पत्थर पर बैठ गए। सूरज डूब रहा था – लाल-नारंगी रंग पहाड़ियों पर बिखर रहा था। आरव ने कहा, “प्रिया, मुझे तुझसे बात करके अच्छा लगता है। तू अलग है। बाकी लड़कियां सिर्फ शॉपिंग, पार्टी की बात करती हैं। तू… सपनों की बात करती है।”

     

    प्रिया ने मुस्कुराने की कोशिश की। फिर हिम्मत करके पूछा, “आरव… तेरी फैमिली में कोई रानी नाम की थी?”

     

    आरव अचानक चुप हो गया। उसका चेहरा बदल गया। “रानी? वो… मेरी मम्मी का नाम था। दो साल पहले नहीं… बीस साल पहले एक्सीडेंट में गुजर गईं। क्यों पूछ रही है?”

     

    प्रिया का दिल जोरों से धड़का। “बस ऐसे ही। सुना था कहीं।”

     

    आरव ने गहरी सांस ली। “हां… मम्मी की मौत के बाद फैमिली बिखर गई। पापा ने दूसरी शादी कर ली। और एक छोटी बहन थी… प्रिया। वो भी एक्सीडेंट में लापता हो गई। कभी नहीं मिली।”

     

    प्रिया की सांस रुक गई। वो उठ खड़ी हुई। “आरव… मैं… मुझे जाना है।”

     

    “क्या हुआ?” आरव ने उसका हाथ पकड़ा। “प्रिया, तू ठीक तो है?”

     

    प्रिया ने हाथ छुड़ाया और भागी। हॉस्टल की ओर। आंसू नहीं रुक रहे थे। अगर आरव की लापता बहन प्रिया है, तो वो खुद आरव की… बहन? नहीं, वो नहीं हो सकता। लेकिन नाम, उम्र, शिमला – सब मैच कर रहा था।

     

    हॉस्टल पहुंचते ही वो रिया के पास गई। सारी बात बताई। रिया हैरान। “यार ये तो बड़ा ट्विस्ट है! तू आरव की बहन हो सकती है?”

     

    “नहीं रिया,” प्रिया रोते हुए बोली। “अगर मैं उसकी बहन हूं तो मुझे क्यों छोड़ा गया? और वो पेंडेंट… वो फोटो… सब ठाकुर हवेली जैसा लगता है।”

     

    रिया ने कहा, “कल हम उस पुरानी हवेली के पास जाएंगे। जहां एक्सीडेंट हुआ था। शायद कुछ क्लू मिले।”

     

    रात को प्रिया सो नहीं पाई। उसने पेंडेंट को छुआ। “मां… अगर तू रानी ठाकुर थी, तो मुझे क्यों छोड़ा?”

     

    तभी उसका फोन बजा। वही अनजान नंबर। प्रिया ने रिसीव किया।

     

    “प्रिया… तू बहुत करीब पहुंच गई है। आरव से दूर रह। वो तेरा भाई है। लेकिन सच जानने की कोशिश मत करना। ठाकुर फैमिली ने तुझे मरने के लिए छोड़ा था। अगली बार तेरी बारी होगी।”

     

    फोन कट गया। प्रिया चीख पड़ी। रिया उठी। “क्या हुआ?”

     

    प्रिया रोते हुए बोली, “रिया… कोई मुझे मारना चाहता है।”

     

    बाहर बारिश शुरू हो गई थी। हवा जोरों से चल रही थी। प्रिया की जिंदगी में प्यार की शुरुआत हुई थी, लेकिन अब मौत का साया मंडरा रहा था। आरव भाई है? या कुछ और?

     और ठाकुर फैमिली का राज़ क्या है?

     

    अगली सुबह क्या होगा? प्रिया सच ढूंढेगी या भाग जाएगी?

     

  • Dil sabhal ja jara part – 2

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

    Part – 2 pahli mulakat 

    शिमला की ठंडी हवा बस की खिड़की से अंदर आ रही थी। प्रिया ने अपनी पतली शॉल कसकर लपेटी और फोन को जेब में डाल दिया। वो अनजान कॉल अभी भी उसके दिमाग में गूंज रही थी – “कॉलेज मत जाना… वरना…”। उसकी उंगलियां कांप रही थीं। उसने चारों तरफ देखा। बस में ज्यादातर लोकल लोग थे – कुछ पर्यटक, कुछ स्टूडेंट्स। कोई उसे घूर नहीं रहा था, लेकिन प्रिया को लगा जैसे कोई उसे देख रहा हो।

    बस आखिरकार शिमला बस स्टैंड पर रुकी। प्रिया उतरी। बाहर ठंड थी, लेकिन धूप निकली हुई थी। पहाड़ियों पर बर्फ की चमक दूर से दिख रही थी। शहर व्यस्त था – रिक्शा, टैक्सी, दुकानें। प्रिया ने अपना छोटा बैग कंधे पर टिकाया और कॉलेज की ओर चल पड़ी। कॉलेज बस स्टैंड से करीब दो किलोमीटर दूर था। उसने पैदल ही जाना ठाना – पैसे बचाने थे।

    रास्ते में वो बार-बार फोटो वाली डायरी छूती रही। पेंडेंट गले में झूल रहा था। “शिमला… क्या यहीं कहीं मेरा अतीत छिपा है?” उसने मन ही मन सोचा। लेकिन वो अनजान कॉल उसे चैन नहीं लेने दे रहा था।

    कॉलेज गेट पर पहुंचते ही प्रिया रुक गई। बड़ा सा लोहे का गेट, ऊपर लिखा था – “Shimla Women’s College – Established 1950″। अंदर हरे-भरे लॉन, पुरानी ब्रिटिश स्टाइल की इमारतें, और लड़कियां हंसती-बोलती घूम रही थीं। ज्यादातर लड़कियां ब्रांडेड कपड़ों में थीं – जींस, जैकेट्स, महंगे बैग। प्रिया ने अपनी सादी नीली सलवार-कमीज देखी और अचानक खुद को बहुत छोटा महसूस किया।

    एडमिशन ऑफिस में लाइन लगी थी। प्रिया ने अपना लेटर दिखाया। स्टाफ की मैडम ने मुस्कुराते हुए कहा, “प्रिया शर्मा? स्कॉलरशिप वाली? वेलकम डियर। तुम्हारा हॉस्टल रूम 204 है। दूसरी मंजिल। सामान रखो और फिर प्रिंसिपल मैम से मिलना।”

    प्रिया ने थैंक यू कहा और हॉस्टल की ओर बढ़ी। हॉस्टल बिल्डिंग कॉलेज के पीछे थी – तीन मंजिला, पुरानी लेकिन साफ-सुथरी। सीढ़ियां चढ़ते वक्त उसके पैर भारी लग रहे थे। रूम 204 के दरवाजे पर उसने दस्तक दी।

    “आ जा!” अंदर से चुलबुली आवाज आई।

    प्रिया ने दरवाजा खोला। रूम छोटा लेकिन आरामदायक था – दो बेड, दो अलमारियां, एक टेबल, और खिड़की से पहाड़ दिख रहे थे। एक बेड पर एक लड़की बैठी थी – बालों में हाईलाइट्स, लिपस्टिक लगाए, मोबाइल पर स्क्रॉल कर रही। वो देखते ही उठी और बोली, “हाय! तू नई रूममेट है? मैं रिया मेहता। मुंबई से। और तू?”

    “प्रिया… प्रिया शर्मा।” प्रिया ने शर्माते हुए कहा और बैग नीचे रखा।

    रिया ने उसे ऊपर से नीचे देखा और फिर मुस्कुराई। “क्यूट लग रही है यार! सादगी का स्टाइल। चल, सामान रख और चाय पीते हैं। कैंटीन चलेंगी?”

    प्रिया ने हां कहा। रिया बहुत बातूनी थी। रास्ते में बताती गई – “ये कॉलेज टॉप है। अमीर लड़कियां ज्यादा हैं। लेकिन पार्टीज कमाल की होती हैं। तू क्या कोर्स कर रही है? बीए?”

    “हां… इंग्लिश ऑनर्स।” प्रिया ने धीरे से कहा।

    कैंटीन में पहुंचते ही प्रिया को लगा जैसे अलग दुनिया में आ गई हो। बड़ी-बड़ी टेबल्स, कॉफी मशीन, पिज्जा-बर्गर के मेन्यू। रिया ने दो चाय और समोसे ऑर्डर किए। बैठते हुए बोली, “बता ना, तू कहां से है? फैमिली? बॉयफ्रेंड?”

    प्रिया हिचकिचाई। फिर बोली, “हिमाचल के छोटे कस्बे से। अनाथ आश्रम में पली हूं। फैमिली… कोई नहीं।”

    रिया चुप हो गई। फिर प्रिया का हाथ थामा और बोली, “सॉरी यार। मैं बेवकूफ हूं। लेकिन तू स्ट्रॉन्ग है। यहां सबके पास्ट होते हैं। मैं भी… पापा-मम्मी अलग हो गए हैं। लेकिन हम फ्यूचर बनाएंगे ना?”

    प्रिया की आंखें नम हो गईं। पहली बार किसी ने उसे जज नहीं किया। दोनों चाय पीते रहे। रिया ने कॉलेज की गॉसिप बताई – कौन सी लड़की किससे डेट कर रही, कौन सी टीचर स्ट्रिक्ट है।

    फिर क्लास का टाइम हुआ। पहली क्लास इंग्लिश की थी। हॉल बड़ा था, करीब सौ लड़कियां। प्रोफेसर ने कहा, “न्यू सेशन, न्यू स्टूडेंट्स। सब अपना इंट्रोडक्शन दें।”

    प्रिया की बारी आई। वो उठी, आवाज कांपी – “मेरा नाम प्रिया शर्मा है। मैं हिमाचल से हूं। स्कॉलरशिप पर आई हूं।”

    सब शांत। कुछ लड़कियां फुसफुसाईं। तभी पीछे से एक लड़के की आवाज आई – “प्रिया? कूल नेम। मैं आरव ठाकुर। वेलकम टू कॉलेज।”

    प्रिया ने पलटा। हॉल के आखिरी बेंच पर एक लड़का बैठा था – लंबा, गोरा, हल्की दाढ़ी, ब्रांडेड जैकेट। मुस्कुरा रहा था। आंखें गर्म। प्रिया का दिल एक पल को धड़का। लेकिन वो जल्दी से बैठ गई।

    क्लास के बाद रिया ने कहा, “वो आरव है यार। कॉलेज का क्रश। अमीर फैमिली, शिमला के बड़े बिजनेसमैन का बेटा। लेकिन घमंडी नहीं। सबको हेल्प करता है।”

    प्रिया ने कुछ नहीं कहा, लेकिन मन में कुछ हलचल हुई।

    शाम को हॉस्टल में प्रिया ने अपना सामान व्यवस्थित किया। डायरी निकाली। फोटो देखी। तभी रिया बोली, “कल फ्रेशर्स पार्टी है। तुझे ड्रेस चाहिए। मेरी अलमारी से ले ले।”

    प्रिया ने मना किया, लेकिन रिया नहीं मानी। एक ब्लू कुर्ती दी – “ये पहनना। क्यूट लगेगी।”

    रात को प्रिया सो नहीं पाई। वो अनजान कॉल सोच रही थी। उसने फोन चेक किया – नंबर सेव नहीं था। ब्लॉक कर दिया। लेकिन डर लगा।

    अगले दिन क्लास में आरव ने प्रिया के पास नोट्स रख दिए। “ये ले, अगर मिस हो गया हो तो।” प्रिया ने थैंक्स कहा। लंच में रिया ने जबरदस्ती उसे अपने ग्रुप में बिठाया। आरव भी था।

    आरव ने पूछा, “सेटल हो गई? कोई प्रॉब्लम हो तो बता। मैं सीनियर हूं।”

    प्रिया ने मुस्कुराते हुए कहा, “थैंक यू। सब ठीक है।”

    आरव ने अपनी स्टोरी शेयर की – “मेरा घर शिमला में ही है। पापा होटल बिजनेस करते हैं। लेकिन मम्मी… दो साल पहले गुजर गईं। तब से थोड़ा अकेला फील करता हूं।”

    प्रिया को लगा जैसे कोई अपना सा मिल गया। दोनों की आंखें मिलीं। एक पल को दुनिया रुक सी गई।

    शाम को फ्रेशर्स पार्टी। हॉल सजा हुआ था – लाइट्स, म्यूजिक, डांस फ्लोर। प्रिया रिया की कुर्ती में थी। पहली बार मेकअप किया था। वो आईने में खुद को देखकर शर्मा गई।

    पार्टी में एंट्री करते ही रिया ने कहा, “वाह यार! बॉम्ब लग रही है।”

    डांस शुरू हुआ। प्रिया कोने में खड़ी थी। तभी आरव आया। सफेद शर्ट, ब्लैक जैकेट। हैंडसम। उसने हाथ बढ़ाया – “डांस करेगी?”

    प्रिया हिचकिचाई। “मुझे नहीं आता।”

    “कोई नहीं। मैं सिखाता हूं।”

    आरव ने उसका हाथ पकड़ा। धीरे-धीरे डांस शुरू हुआ। संगीत रोमांटिक था। प्रिया का दिल तेज़ धड़क रहा था। पहली बार किसी लड़के ने इतना क्लोज फील किया।

    तभी एक लड़की आई – लंबे बाल, रेड ड्रेस। अवनी शर्मा। कॉलेज की क्वीन बी। वो आरव के पास आई और बोली, “आरव, डांस?” फिर प्रिया को घूरकर कहा, “स्कॉलरशिप वाली? यहां अमीरों का क्लब है बेबी। बाहर जाकर पढ़ाई कर।”

    सब हंस पड़े। प्रिया का चेहरा लाल हो गया। आंखें भर आईं। वो भागी। बाहर लॉन में अकेली बैठ गई। रोने लगी। “मैं यहां क्यों आई? सब मुझे जज करेंगे।”

    तभी आरव आया। “प्रिया… सॉरी। अवनी वैसी है। तू मत रो। तू स्पेशल है। तेरी आंखों में कुछ है… जो मुझे अच्छा लगता है।”

    प्रिया ने आंसू पोंछे। “थैंक यू आरव। लेकिन मैं… मैं अनाथ हूं। मेरे पास कुछ नहीं।”

    आरव ने उसका हाथ थामा। “मेरे पास सब है, लेकिन खुशी नहीं। तू मुझे खुशी दे सकती है।”

    प्रिया ने हाथ छुड़ाया और रूम की ओर चली गई। दिल में तूफान था – प्यार की शुरुआत? या फिर खतरे की?

    रूम में पहुंचते ही उसने बैग खोला। अंदर एक लिफाफा था – जो पहले नहीं था। अंदर एक चिट – “प्रिया, तेरी मां का नाम रानी था। वो शिमला में ही मरी। मत ढूंढना, खतरा है।”

    प्रिया कांप गई। ये लिफाफा कैसे आया? कौन रख गया? और आरव… क्या वो जानता है कुछ?

    रात गहरा गई। बाहर हवा चल रही थी। प्रिया की नई जिंदगी शुरू हो चुकी थी – दोस्ती, प्यार, और छिपे राजों के साथ।

     

  • Dil sabhal ja jara part – 1

    Dil sabhal ja jara part – 1

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    Part – 1 khoi Hui pahchan 

    हिमाचल की ऊंची पहाड़ियों के बीच बसा छोटा सा कस्बा था, जहां सर्दियों में कोहरा इतना घना होता कि दिन में भी रात जैसा लगता। इसी कस्बे के बाहरी इलाके में एक पुराना अनाथ आश्रम था – “संत जोसेफ बालिका आश्रम”। इमारत पुरानी थी, दीवारें जगह-जगह से सीलन खा चुकी थीं, और छत पर टपकती बारिश की बूंदें रात-रात भर संगीत बजाती रहतीं।

    उस रात भी बारिश हो रही थी। तेज़ हवा खिड़कियों को हिला रही थी, और बूंदें छत से टप-टप करके नीचे गिर रही थीं। प्रिया अपनी पतली सी कंबल ओढ़े बिस्तर पर लेटी थी। उसकी आंखें बंद थीं, लेकिन नींद नहीं आ रही थी। उसके दिमाग में बस एक ही सवाल घूम रहा था – आज स्कॉलरशिप का रिजल्ट आएगा। अगर मिल गई तो शिमला के बड़े कॉलेज में एडमिशन हो जाएगा। अगर नहीं मिली तो… तो फिर यही आश्रम, यही पुरानी किताबें, यही छोटी सी दुनिया।

    प्रिया अठारह साल की थी। लंबी, पतली, गेहुंआ रंग, और आंखें इतनी बड़ी कि लगता था सारी उदासी उनमें समा गई हो। आश्रम की पचास लड़कियों में वो सबसे स्मार्ट थी। टॉप करती थी हर एग्जाम में, लेकिन सबसे चुप भी थी। वो कभी शोर नहीं मचाती, कभी शिकायत नहीं करती। बस पढ़ती रहती। किताबें उसकी सबसे अच्छी दोस्त थीं।

    “प्रिया… उठ ना बेटी, सुबह की प्रेयर हो रही है,” सुलेखा आंटी की धीमी लेकिन प्यार भरी आवाज़ आई। सुलेखा आंटी आश्रम की वार्डन थीं। पचास के करीब उम्र, लेकिन चेहरा इतना शांत कि देखते ही मन को सुकून मिलता। प्रिया उनके लिए मां थीं – असली मां नहीं, लेकिन उससे कहीं ज्यादा।

    प्रिया ने धीरे से कंबल हटाई और उठ बैठी। कमरे में दस बिस्तर थे, दस लड़कियां सो रही थीं। वो सबसे कोने वाले बिस्तर पर सोती थी, खिड़की के पास। उसे खिड़की से बाहर देखना अच्छा लगता था। पहाड़, पेड़, कोहरा – सब कुछ इतना शांत।

    वो उठी, जल्दी से चेहरा धोया। ठंडा पानी चेहरे पर पड़ते ही सिहरन हुई। फिर अपनी छोटी सी अलमारी खोली। अलमारी में बस तीन सलवार-कमीज, दो स्वेटर, और एक डायरी थी। वो डायरी निकाली। उसमें सिर्फ एक पेज भरा हुआ था। बाकी पेज खाली थे, जैसे उसकी जिंदगी।

    उस पेज पर एक पुरानी फोटो चिपकी थी। फोटो में एक चार-पांच साल की छोटी लड़की थी, गुलाबी फ्रॉक पहने, किसी बड़े बगीचे में झूला झूल रही थी। बगीचे में फूलों की क्यारियां थीं, दूर एक बड़ा सा बंगला दिख रहा था। लड़की हंस रही थी, लेकिन उसकी आंखें… प्रिया की आंखें। फोटो के नीचे किसी ने पेंसिल से लिखा था – “तेरा नाम प्रिया है, लेकिन ये घर तेरा नहीं रहा।”
    ये फोटो प्रिया को तेरह साल पहले मिली थी। जब वो पांच साल की थी, तब किसी ने आश्रम के गेट पर उसे छोड़ दिया था। साथ में बस ये फोटो और एक छोटा सा सोने का पेंडेंट था – एक अनोखा डिजाइन, जिस पर “P” लिखा था। पेंडेंट अब भी उसके गले में था। वो कभी नहीं उतारती थी।

    प्रिया ने फोटो को छुआ। उंगलियां कांप रही थीं। “मैं कौन हूं?” ये सवाल उसके अंदर इतना गहरा था कि कभी-कभी रातों में नींद उड़ा देता। आश्रम की बाकी लड़कियां भी अनाथ थीं, लेकिन कम से कम उन्हें याद था कि उनके माता-पिता कैसे थे, कैसे मरे। प्रिया को कुछ याद नहीं। बस एक धुंधली सी याद – किसी की गोद, किसी की लोरी, और फिर अंधेरा।

    “प्रिया, देर हो रही है,” सुलेखा आंटी ने फिर पुकारा। प्रिया ने डायरी बंद की और प्रेयर रूम की ओर चल दी। प्रेयर रूम छोटा सा था, दीवार पर यीशु की तस्वीर, और नीचे सब लड़कियां घुटनों पर बैठी थीं। प्रिया भी बैठ गई। प्रेयर शुरू हुई। सुलेखा आंटी ने बाइबिल से एक वचन पढ़ा – “भगवान तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ता।”
    प्रिया ने आंखें बंद कीं। मन ही मन प्रार्थना की – “भगवान, आज स्कॉलरशिप मिल जाए। मुझे बाहर की दुनिया देखनी है। मुझे अपनी पहचान ढूंढनी है।”
    प्रेयर के बाद नाश्ता। सादा – रोटी, आलू की सब्जी, और चाय। प्रिया ने जल्दी-जल्दी खाया और स्कूल के लिए निकल पड़ी। स्कूल आधा किलोमीटर दूर था। रास्ते में बारिश रुक चुकी थी, लेकिन कीचड़ था। प्रिया ने अपने पुराने जूते सावधानी से रखे। जूते फटने की कगार पर थे।
    स्कूल में आज आखिरी पेपर था – इंग्लिश। प्रिया ने अच्छा लिखा। पेपर देकर जब बाहर निकली तो दिल तेज़ धड़क रहा था। अब बस रिजल्ट का इंतज़ार। स्कूल से लौटते वक्त वो आश्रम के पुराने लैंडलाइन के पास रुकी। आश्रम में सिर्फ एक फोन था, वो भी वार्डन रूम में।

    लेकिन स्कॉलरशिप का रिजल्ट ईमेल पर आने वाला था। प्रिया ने सुलेखा आंटी से कहा था कि वो चेक कर लें।
    आश्रम पहुंचते ही वो सीधे वार्डन रूम में गई। सुलेखा आंटी कंप्यूटर पर थीं – पुराना कंप्यूटर, जो कभी-कभी हैंग हो जाता।

    “आंटी… रिजल्ट?” प्रिया की आवाज़ कांपी।
    सुलेखा आंटी ने मुस्कुराते हुए स्क्रीन घुमाई। वहां लिखा था – “Congratulations, Priya Sharma. You have been selected for full scholarship at Shimla Women’s College. Admission confirmed.”

    प्रिया की आंखें भर आईं। वो चीखना चाहती थी, कूदना चाहती थी, लेकिन बस खड़ी रह गई। सुलेखा आंटी ने उसे गले लगा लिया। “बधाई हो बेटी। तूने कर दिखाया।”
    प्रिया ने रोते हुए कहा, “आंटी… मैं जा रही हूं ना? सच में?”

    “हां बेटी। अगले हफ्ते से सेशन शुरू। तुझे हॉस्टल मिल जाएगा।”
    शाम को आश्रम में उत्सव सा माहौल था। लड़कियां इकट्ठी हुईं। किसी ने गाना गाया, किसी ने नाच दिखाया। छोटी मीरा – दस साल की नटखट लड़की – प्रिया के पास आई और बोली, “प्रिया दीदी, तुम कॉलेज जाओगी तो हमें भूल मत जाना। तुम तो स्टार बनोगी ना? डॉक्टर या इंजीनियर?”

    प्रिया ने मीरा को गोद में उठाया और कहा, “नहीं भूलूंगी। और स्टार तो तुम सब बनोगी। मैं बस पढ़ने जा रही हूं।”
    लेकिन अंदर से प्रिया उदास थी। आश्रम उसकी दुनिया था। यहां सब उसे जानते थे, प्यार करते थे। बाहर की दुनिया? वो नहीं जानती थी। वहां लोग कैसे होंगे? क्या वो उसे अपनाएंगे? एक अनाथ लड़की को, जिसके पास न फैमिली है, न बैकग्राउंड।

    रात को सब सो गए। प्रिया फिर खिड़की के पास बैठी। उसने पेंडेंट को छुआ। सोने की चेन ठंडी थी। “मां… पापा… तुम कहां हो?” उसने मन ही मन पूछा। फोटो फिर निकाली। उस बगीचे को देखा। वो घर… क्या वो उसका था कभी? क्यों छोड़ा गया उसे?
    सुलेखा आंटी रात को उसके पास आईं। “सो नहीं रही?”
    “नहीं आंटी। डर लग रहा है।”

    “डर तो लगेगा बेटी। नई जगह, नए लोग। लेकिन याद रख, तेरी ताकत तेरे अंदर है। तेरी पहचान बाहर के लोग नहीं बताएंगे। तू खुद ढूंढेगी।”
    प्रिया ने सिर हिलाया। लेकिन दिल में सवाल फिर गूंजा – अगर पहचान ही खो गई तो कैसे ढूंढूंगी?

    अगले कुछ दिन तैयारी में बीते। कपड़े सिले गए – दो नई सलवार-कमीज। किताबें पैक की गईं। सुलेखा आंटी ने कुछ पैसे दिए – अपनी सेविंग से। “खर्चा करना बेटी।”
    आखिरकार वो दिन आया। सुबह-सुबह बस स्टेशन। प्रिया का बैग छोटा सा था – दो जोड़ी कपड़े, एक स्वेटर, कुछ किताबें, डायरी, और वो फोटो। सुलेखा आंटी और सारी लड़कियां छोड़ने आईं। मीरा रो रही थी। “दीदी मत जाओ।”

    प्रिया ने सबको गले लगाया। सुलेखा आंटी की आंखें भी नम थीं। “ज्यादा मत सोचना बेटी। बस पढ़ाई पर ध्यान देना। और हफ्ते में एक फोन जरूर करना।”
    बस आई। प्रिया चढ़ी। खिड़की से हाथ हिलाया। बस चली। आश्रम पीछे छूटता गया। पहाड़ियां आगे बढ़ती गईं। शिमला की ओर। नई जिंदगी की ओर।
    बस में प्रिया खिड़की सीट पर थी। बाहर का नजारा देख रही थी। पेड़, नदियां, गांव। दिल में उत्साह था, लेकिन डर भी। तभी उसका फोन बजा। आश्रम में फोन नहीं था, लेकिन सुलेखा आंटी ने एक पुराना नोकिया दिया था – सिर्फ कॉल के लिए।

    अनजान नंबर से फोन आया, प्रिया ने हेलो कहा।
    दूसरी तरफ से एक भारी, डरी हुई आवाज़ आई – “प्रिया? तुम्हें याद है वो रात? जिस रात तुम्हें छोड़ा गया था? कॉलेज मत जाना। आना मत शिमला। वरना… वरना सब खतरे में पड़ जाएगा।”

    आवाज़ कट गई। प्रिया का फोन हाथ से छूटते-छूटते बचा। दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। कौन था वो? कैसे जानता था उसका नाम? वो रात… कौन सी रात?
    बस आगे बढ़ रही थी। शिमला करीब आ रहा था। लेकिन अब प्रिया को लगा – उसका नया सफर खुशी का नहीं, खतरे का शुरुआत है।

     

  • एक राज़

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    एक राज, जिसका पता चल जाता तो उसका खात्मा हो जाता

     

    रुद्रपुर नाम का एक छोटा-सा शहर था। बाहर से देखने पर वह बिल्कुल शांत लगता था, लेकिन उस शहर के बीचों-बीच बनी एक पुरानी हवेली अपने अंदर ऐसा राज छिपाए बैठी थी, जिसके बारे में अगर किसी को पता चल जाता, तो कई लोगों की जिंदगी हमेशा के लिए बदल सकती थी।

     

    उस हवेली में रहने वाली थी काव्या।

     

    काव्या उम्र में जवान थी, शांत स्वभाव की और हमेशा अपने काम में लगी रहने वाली लड़की। शहर के लोग उसे एक साधारण लड़की समझते थे, लेकिन कोई नहीं जानता था कि पिछले सात सालों से वह एक ऐसा सच अपने सीने में दबाए घूम रही थी, जिसे जानने के लिए कई लोग कुछ भी करने को तैयार थे।

     

    उस राज की शुरुआत सात साल पहले हुई थी।

     

    तब काव्या सिर्फ सत्रह साल की थी।

     

    एक रात उसके पिता ने उसे अपने कमरे में बुलाया था। उनके चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।

     

    “काव्या, आज के बाद तुम मुझसे एक सवाल भी मत करना।”

     

    “लेकिन पापा हुआ क्या है?”

     

    उन्होंने कमरे का दरवाजा बंद किया और धीरे से बोले, “मेरे साथ कुछ भी हो जाए, इस हवेली के पीछे वाले कमरे में मत जाना। और सबसे जरूरी बात… किसी पर भरोसा मत करना।”

     

    काव्या कुछ समझ पाती, उससे पहले ही बाहर तेज आवाज हुई।

     

    उसके पिता घबरा गए।

     

    उन्होंने एक छोटी-सी लोहे की चाबी काव्या के हाथ में रखी और कहा, “इसे संभालकर रखना। जिस दिन तुम्हें लगे कि तुम्हारे आसपास के लोग तुम्हें नुकसान पहुंचाना चाहते हैं, उस दिन इस चाबी का इस्तेमाल करना।”

     

    “इससे क्या खुलेगा?”

     

    पिता ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा, “एक ऐसा सच… जिसके सामने आने से बहुत लोगों का खात्मा हो सकता है।”

     

    उस रात उसके पिता गायब हो गए।

     

    अगले दिन शहर में खबर फैली कि उनकी गाड़ी पहाड़ी रास्ते में दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी।

     

    लेकिन काव्या को कभी इस बात पर विश्वास नहीं हुआ।

     

    सात साल तक उसने उस चाबी को अपने पास छिपाकर रखा।

     

    फिर एक दिन हवेली में एक अजनबी आदमी आया।

     

    उसका नाम था विराज।

     

    वह खुद को काव्या के पिता का पुराना दोस्त बता रहा था।

     

    “तुम्हारे पिता ने मुझे तुम्हारी जिम्मेदारी दी थी,” विराज ने कहा।

     

    काव्या ने उसे गौर से देखा।

     

    “अगर आप उनके दोस्त थे, तो इतने साल कहां थे?”

     

    विराज कुछ पल चुप रहा।

     

    “क्योंकि मैं जानता था कि तुम्हारे पिता की मौत हादसा नहीं थी।”

     

    काव्या के हाथ से गिलास छूटते-छूटते बचा।

     

    “आप क्या कह रहे हैं?”

     

    विराज ने धीमे स्वर में कहा, “तुम्हारे पिता ने जिस राज को छिपाया था, वह आज भी जिंदा है।”

     

    काव्या के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “कौन-सा राज?”

     

    विराज ने चारों तरफ देखा।

     

    “यह बात यहां नहीं हो सकती।”

     

    उसी रात काव्या को पहली बार महसूस हुआ कि हवेली के बाहर कोई उसे देख रहा है।

     

    खिड़की के पास जाकर उसने देखा तो दूर सड़क पर एक काली गाड़ी खड़ी थी।

     

    गाड़ी में कोई बैठा था।

     

    काव्या ने पर्दा बंद कर दिया।

     

    सुबह वह गाड़ी वहां नहीं थी।

     

    विराज ने काव्या को समझाया कि उसे कुछ दिनों के लिए हवेली छोड़ देनी चाहिए।

     

    लेकिन काव्या ने मना कर दिया।

     

    “मैं भागती रही तो यह राज कभी सामने नहीं आएगा।”

     

    विराज ने उसकी ओर देखा।

     

    “तुम्हें पता भी है कि तुम्हारे पिता ने क्या खोजा था?”

     

    काव्या ने सिर हिलाया।

     

    विराज ने कहा, “तुम्हारे पिता ने सात साल पहले शहर के सबसे बड़े कारोबारियों और कुछ बड़े अधिकारियों के बीच चल रहे एक गुप्त सौदे का पता लगाया था। शहर के गरीब लोगों की जमीन बहुत कम कीमत में हथियाकर करोड़ों में बेची जा रही थी।”

     

    “लेकिन इसका मेरे पिता से क्या लेना-देना था?”

     

    “क्योंकि तुम्हारे पिता के पास उस पूरे खेल के सबूत थे।”

     

    काव्या की सांसें थम गईं।

     

    “और वह सबूत?”

     

    विराज ने हवेली की तरफ देखा।

     

    “यहीं कहीं छिपा है।”

     

    काव्या को अचानक अपने पिता की दी हुई चाबी याद आई।

     

    उसी रात उसने हवेली के पीछे वाले कमरे का दरवाजा खोला।

     

    कमरा वर्षों से बंद था।

     

    धूल से भरी अलमारी, पुरानी किताबें और एक टूटी मेज।

     

    काव्या ने हर जगह तलाश की, लेकिन कुछ नहीं मिला।

     

    तभी उसकी नजर फर्श पर पड़ी।

     

    एक पत्थर बाकी पत्थरों से थोड़ा अलग था।

     

    उसने उसे हटाया।

     

    नीचे एक लोहे का छोटा डिब्बा था।

     

    काव्या के हाथ कांपने लगे।

     

    उसने चाबी निकाली।

     

    चाबी ताले में बिल्कुल फिट बैठ गई।

     

    डिब्बा खुलते ही अंदर कुछ कागज, एक पुरानी डायरी और एक तस्वीर मिली।

     

    तस्वीर देखकर काव्या सन्न रह गई।

     

    उसमें उसके पिता के साथ शहर के कई बड़े लोग खड़े थे।

     

    लेकिन तस्वीर के पीछे लिखी एक लाइन ने उसके पैरों तले जमीन खिसका दी—

     

    “इनमें से किसी एक ने तुम्हारे पिता को धोखा दिया था।”

     

    तभी पीछे से आवाज आई।

     

    “तुम्हें वह डिब्बा नहीं खोलना चाहिए था।”

     

    काव्या तेजी से पलटी।

     

    दरवाजे पर विराज खड़ा था।

     

    “आप?”

     

    विराज धीरे-धीरे कमरे में आया।

     

    काव्या पीछे हट गई।

     

    “आपको कैसे पता था कि मैं यहां हूं?”

     

    विराज ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    काव्या ने डायरी अपने पीछे छिपा ली।

     

    “आप मेरे पिता के दोस्त नहीं हैं, है ना?”

     

    विराज की आंखों में अजीब-सी उदासी थी।

     

    “नहीं।”

     

    “फिर कौन हैं आप?”

     

    विराज ने कहा, “वही आदमी जिसे तुम्हारे पिता ने आखिरी बार भरोसे के लायक समझा था।”

     

    “तो आपने इतने साल मुझे सच क्यों नहीं बताया?”

     

    विराज चुप रहा।

     

    तभी बाहर से दरवाजा बंद होने की आवाज आई।

     

    दोनों चौंक गए।

     

    विराज ने खिड़की से बाहर देखा।

     

    काली गाड़ी फिर हवेली के सामने खड़ी थी।

     

    उसने तुरंत कहा, “अब हमारे पास ज्यादा समय नहीं है।”

     

    काव्या ने पूछा, “कौन लोग हैं?”

     

    विराज ने डायरी की ओर इशारा किया।

     

    “तुम्हारे पिता ने इस डायरी में असली नाम लिखा था। अगर वह डायरी गलत हाथों में चली गई, तो तुम्हारा खात्मा तय है।”

     

    काव्या ने डायरी कसकर पकड़ ली।

     

    “लेकिन मैं इसे छिपाऊंगी नहीं।”

     

    विराज ने उसकी ओर देखा।

     

    “क्यों?”

     

    काव्या की आंखों में पहली बार डर की जगह हिम्मत थी।

     

    “क्योंकि मेरे पिता इसी सच की वजह से मारे गए। मैं उनकी कुर्बानी बेकार नहीं जाने दूंगी।”

     

    अचानक हवेली के बाहर किसी ने दरवाजा पीटना शुरू कर दिया।

     

    धड़ाम!

     

    धड़ाम!

     

    विराज ने काव्या का हाथ पकड़ा।

     

    “पीछे का रास्ता अभी भी खुला है। हमें निकलना होगा।”

     

    दोनों पिछली खिड़की से बाहर निकल गए।

     

    लेकिन काव्या की नजर डायरी के आखिरी पन्ने पर पड़ी।

     

    वहां सिर्फ एक नाम लिखा था।

     

    विराज।

     

    काव्या के कदम रुक गए।

     

    विराज ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    उनकी आंखें मिल गईं।

     

    काव्या ने कांपती आवाज में पूछा—

     

    “मेरे पिता ने आपका नाम क्यों लिखा था?”

     

    विराज कुछ नहीं बोला।

     

    बस इतना कहा—

     

    “क्योंकि जिस राज को तुम बचाने निकली हो… उसकी शुरुआत मुझसे ही हुई थी।”

     

    काव्या के चेहरे पर हैरानी जम गई।

     

    और तभी पीछे से हवेली का दरवाजा खुला।

     

    किसी ने धीमे से कहा—

     

    “विराज, अब बहुत देर हो चुकी है।”

     

    काव्या ने पलटकर देखा।

     

    दरवाजे पर खड़ा आदमी वही था, जिसकी तस्वीर उसके पिता की डायरी में सबसे ऊपर लगी थी।

     

    और उस आदमी को देखकर विराज ने पहली बार डरकर कहा—

     

    “काव्या… अब तुम्हें मुझ पर भरोसा करना ही पड़ेगा।”

  • 😱 काली हवेली का आख़िरी कमरा 😱 (part-1)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    रात के करीब ग्यारह बजे आरव की कार सुनसान सड़क पर अचानक बंद हो गई।

     

    उसने कई बार चाबी घुमाई, लेकिन इंजन ने कोई आवाज़ नहीं की। चारों तरफ घना जंगल था। आसमान पर बादल इतने काले थे कि चाँद तक दिखाई नहीं दे रहा था। मोबाइल में नेटवर्क पहले ही गायब हो चुका था।

     

    आरव ने परेशान होकर कार से बाहर देखा।

     

    सड़क के दूसरी तरफ एक पुराना पत्थर लगा था, जिस पर धुंधली रोशनी में कुछ लिखा दिखाई दे रहा था—

     

    “भैरवगढ़ — 2 किलोमीटर।”

     

    आरव ने घड़ी देखी। रात के 11:07 बज रहे थे।

     

    उसे याद आया कि उसके दोस्त कबीर ने इस जगह के बारे में बताया था। भैरवगढ़ में एक पुरानी हवेली थी, जिसे लोग काली हवेली कहते थे। कहा जाता था कि लगभग तीस साल पहले उस हवेली में रहने वाला पूरा परिवार एक ही रात में गायब हो गया था।

     

    लोगों का मानना था कि परिवार का कोई सदस्य आज भी हवेली में रहता है।

     

    आरव ने इन बातों को हमेशा मज़ाक समझा था।

     

    लेकिन उस रात उसके पास हवेली के अलावा कोई विकल्प नहीं था।

     

    उसने बैग उठाया और पैदल चल पड़ा।

     

    लगभग बीस मिनट बाद जंगल खत्म हुआ।

     

    सामने एक विशाल हवेली खड़ी थी।

     

    उसकी दीवारों पर काई जमी हुई थी। खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे और मुख्य दरवाज़ा आधा खुला था।

     

    सबसे अजीब बात यह थी कि हवेली के अंदर से हल्की पीली रोशनी आ रही थी।

     

    आरव रुक गया।

     

    “यहाँ कोई रहता है?”

     

    उसने आवाज़ लगाई—

     

    “कोई है?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    वह धीरे-धीरे अंदर चला गया।

     

    दरवाज़ा उसके पीछे अपने आप बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    आरव का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    उसने पीछे मुड़कर दरवाज़ा खोलने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं खुला।

     

    “बहुत बढ़िया…”

     

    उसने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई।

     

    हॉल में पुरानी तस्वीरें लगी थीं। हर तस्वीर पर धूल की मोटी परत थी। उसने एक तस्वीर साफ की।

     

    उसमें एक आदमी, एक औरत और एक छोटी लड़की खड़ी थी।

     

    तस्वीर के नीचे नाम लिखा था—

     

    “रुद्र प्रताप सिंह — पत्नी देविका — बेटी मीरा।”

     

    आरव ने तस्वीर को ध्यान से देखा।

     

    छोटी लड़की मीरा की आँखें अजीब थीं।

     

    ऐसा लग रहा था जैसे वह कैमरे में नहीं, सीधे आरव को देख रही हो।

     

    तभी ऊपर से किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई।

     

    ठक!

     

    आरव ने फ्लैशलाइट ऊपर की।

     

    पहली मंज़िल पर एक लंबा गलियारा था।

     

    और गलियारे के आख़िरी सिरे पर एक दरवाज़ा।

     

    उस दरवाज़े के नीचे से वही पीली रोशनी बाहर आ रही थी।

     

    आरव ने सीढ़ियाँ चढ़नी शुरू कीं।

     

    पहली सीढ़ी…

     

    दूसरी…

     

    तीसरी…

     

    जैसे-जैसे वह ऊपर जा रहा था, उसे किसी बच्ची के गुनगुनाने की आवाज़ सुनाई देने लगी।

     

    “सो जा… सो जा…”

     

    आरव रुक गया।

     

    आवाज़ बंद हो गई।

     

    वह कुछ सेकंड तक खड़ा रहा।

     

    फिर आगे बढ़ा।

     

    गलियारे की दीवार पर एक घड़ी लगी थी।

     

    उसकी सुइयाँ 12 बजकर 13 मिनट पर रुकी हुई थीं।

     

    आरव ने अपनी घड़ी देखी।

     

    11:42।

     

    उसने राहत की साँस ली।

     

    लेकिन तभी घड़ी की सुइयाँ हिलने लगीं।

     

    टक… टक… टक…

     

    और अचानक वह 12:13 पर पहुँच गई।

     

    उसी क्षण हवेली की सारी लाइटें बुझ गईं।

     

    अंधेरा।

     

    पूरा अंधेरा।

     

    आरव ने मोबाइल की रोशनी जलाई।

     

    सामने वही आख़िरी कमरा था।

     

    दरवाज़ा अब खुला हुआ था।

     

    अंदर से एक बच्ची की आवाज़ आई—

     

    “आरव…”

     

    उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    उसने किसी को अपना नाम नहीं बताया था।

     

    आवाज़ फिर आई—

     

    “आरव… तुम बहुत देर से आए।”

     

    आरव पीछे हटने लगा।

     

    “क… कौन हो तुम?”

     

    कमरे के अंदर से धीमी हँसी सुनाई दी।

     

    फिर एक छोटी-सी लड़की दरवाज़े के पीछे से बाहर आई।

     

    उसने सफेद फ्रॉक पहनी थी।

     

    उसके लंबे काले बाल चेहरे पर लटक रहे थे।

     

    आरव ने काँपते हुए पूछा—

     

    “मीरा?”

     

    लड़की ने अपना चेहरा उठाया।

     

    उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

     

    वह मुस्कुराई।

     

    “तुम्हें मेरा नाम कैसे पता?”

     

    आरव के हाथ से मोबाइल गिर गया।

     

    अंधेरे में लड़की उसके करीब आई।

     

    “क्योंकि तुम मेरे पापा को ढूँढने आए हो…”

     

    आरव ने घबराकर कहा—

     

    “मैं किसी को ढूँढने नहीं आया।”

     

    मीरा की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “झूठ।”

     

    अचानक पीछे से दरवाज़ा बंद हो गया।

     

    आरव ने पूरी ताकत से उसे खींचा।

     

    लेकिन दरवाज़ा नहीं खुला।

     

    मीरा उसके बिल्कुल सामने खड़ी थी।

     

    “अगर बाहर जाना है…”

     

    वह फुसफुसाई,

     

    “…तो आख़िरी कमरा खोलना होगा।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “आख़िरी कमरा?”

     

    मीरा ने गलियारे की तरफ इशारा किया।

     

    “यह कमरा आख़िरी नहीं है।”

     

    आरव ने धीरे-धीरे पीछे देखा।

     

    गलियारे में अब पहले से कहीं ज्यादा दरवाज़े थे।

     

    दस…

     

    बीस…

     

    शायद पचास।

     

    जबकि कुछ मिनट पहले वहाँ केवल तीन दरवाज़े थे।

     

    मीरा ने कहा—

     

    “हर दरवाज़े के पीछे हमारे परिवार की एक रात बंद है।”

     

    आरव कुछ समझ पाता, उससे पहले हवेली की दीवारों से चीखें आने लगीं।

     

    एक आदमी चिल्ला रहा था।

     

    एक औरत रो रही थी।

     

    और एक बच्ची बार-बार कह रही थी—

     

    “दरवाज़ा मत खोलना…”

     

    आरव ने कान बंद कर लिए।

     

    लेकिन आवाज़ उसके सिर के अंदर गूँज रही थी।

     

    फिर मीरा ने उसके हाथ में एक पुरानी चाबी रख दी।

     

    “कल रात तक तुम्हें सच पता करना होगा।”

     

    आरव ने चाबी को देखा।

     

    उस पर खून जैसे लाल रंग से एक नंबर लिखा था—

     

    13

     

    “और अगर मैंने नहीं किया?”

     

    मीरा ने धीरे से सिर झुकाया।

     

    उसके चेहरे पर फिर वही डरावनी मुस्कान आ गई।

     

    “तो कल रात…”

     

    वह फुसफुसाई—

     

    “…तुम भी इस हवेली की तस्वीर में होंगे।”

     

    अचानक आरव की आँखों के सामने अंधेरा छा गया।

     

    जब उसकी आँख खुली, सुबह हो चुकी थी।

     

    वह हवेली के बाहर सड़क पर पड़ा था।

     

    उसकी कार बिल्कुल ठीक थी।

     

    आरव ने घबराकर हवेली की ओर देखा।

     

    वहाँ कोई हवेली नहीं थी।

     

    सिर्फ जंगल था।

     

    लेकिन उसके हाथ में अभी भी वह पुरानी चाबी थी।

     

    और चाबी पर लिखा नंबर—

     

    13

     

    उसने मोबाइल निकाला।

     

    गैलरी अपने आप खुली।

     

    उसमें एक नई तस्वीर थी।

     

    तस्वीर में वही काली हवेली दिखाई दे रही थी।

     

    और पहली मंज़िल की खिड़की में एक छोटी लड़की खड़ी थी।

     

    मीरा।

     

    लेकिन उसके पीछे एक दूसरा चेहरा भी था।

     

    एक आदमी का।

     

    जिसकी आँखें बिल्कुल काली थीं।