मंदिर के अंदर खड़ा आदमी धीरे-धीरे प्रकाश में आया।
अर्जुन की साँस रुक गई।
“पापा…?”
सामने खड़ा आदमी बिल्कुल उसके पिता जैसा था।
वही चेहरा।
वही आँखें।
वही आवाज।
लेकिन उसके पिता की मृत्यु को पाँच साल हो चुके थे।
अर्जुन पीछे हट गया।
“तुम मेरे पिता नहीं हो।”
आदमी मुस्कुराया।
“तुम्हें सच और झूठ में फर्क करना अभी भी नहीं आता।”
अर्जुन ने पूछा—
“तुम कौन हो?”
उस आदमी ने मंदिर की मूर्ति की तरफ देखा।
“मैं वह हूँ जिसने इस शहर के पापों को इतने सालों तक संभालकर रखा।”
अचानक मंदिर की सारी मूर्तियों की आँखें लाल हो गईं।
मीरा अर्जुन के पास आकर खड़ी हो गई।
उसने फुसफुसाकर कहा—
“इसे मत सुनना।”
“क्यों?”
“क्योंकि यह तुम्हारे डर से बात करता है।”
वह आदमी हँसा।
“मीरा… तुम अभी भी अधूरी कहानी हो।”
मीरा की आँखों में गुस्सा आ गया।
“तुमने मुझे खत्म करने की कोशिश की थी।”
“लेकिन तुम बच गईं।”
“क्योंकि सच को मारना आसान नहीं।”
आदमी ने हाथ उठाया।
मंदिर की दीवारों पर दृश्य उभरने लगे।
सूरजपुर नहीं।
कालपुर।
सालों पहले का कालपुर।
गरीब लोग भूखे थे।
अमीर लोग धन जमा कर रहे थे।
पुलिस अपराधियों से मिली थी।
नेता झूठ बोल रहे थे।
लोग सब जानते थे।
लेकिन कोई कुछ नहीं करता था।
फिर उस आदमी की आवाज आई—
“यहीं से मेरा जन्म हुआ।”
अर्जुन ने पूछा—
“तुम कौन हो?”
“मैं किसी एक इंसान का नाम नहीं।”
उसने अपना चेहरा बदलना शुरू किया।
पहले वह बूढ़ा बना।
फिर जवान।
फिर बच्चा।
फिर महिला।
फिर अर्जुन।
फिर मीरा।
अर्जुन डर गया।
“तुम…?”
“मैं इस शहर के हर पाप का चेहरा हूँ।”
मीरा ने कहा—
“यह कालपुर की आत्मा है।”
आदमी हँसा।
“आत्मा नहीं।”
उसने अर्जुन की तरफ देखा।
“मैं इंसानों की इच्छाओं से पैदा हुआ हूँ।”
अर्जुन समझ गया।
लालच।
झूठ।
विश्वासघात।
हिंसा।
और चुप्पी।
ये सब मिलकर इस डरावनी शक्ति को जन्म देते रहे थे।
लेकिन एक सवाल अभी भी बाकी था।
“मेरा सातवाँ पाप क्या है?”
आदमी मुस्कुराया।
“तुमने सोचा था कि तुम्हारा पाप हत्या है।”
“लेकिन वह तो दुर्घटना थी।”
“हाँ।”
“तो फिर?”
वह धीरे-धीरे अर्जुन के पास आया।
“तुम्हारा सबसे बड़ा पाप है… सच जानते हुए भी खुद को निर्दोष मानना।”
अर्जुन चुप हो गया।
उसके जीवन की सारी घटनाएँ उसकी आँखों के सामने घूमने लगीं।
वह खबर जिसे उसने पैसे लेकर दबाया।
वह आदमी जिसे उसने बिना पूरी जाँच के दोषी बताया।
वह दुर्घटना जिसे उसके पिता ने छिपाया।
और वह समय जब उसने अपने पिता पर सवाल नहीं उठाए।
हर बार उसने खुद को समझाया था—
“मेरी गलती नहीं।”
लेकिन वह सच नहीं था।
उसने धीरे से कहा—
“हाँ।”
काली शक्ति रुक गई।
“क्या कहा?”
“मैं दोषी हूँ।”
मंदिर में अचानक सन्नाटा छा गया।
अर्जुन ने आगे कहा—
“मैंने लोगों के सच से अपना फायदा उठाया।”
“मैंने अपनी गलतियों से आँखें बंद कीं।”
“मैंने अपने पिता को सवालों से बचाया।”
“मैंने नैना के मामले में सच खोजने की कोशिश नहीं की।”
“और मैंने कई बार दूसरों को दोषी ठहराया, जबकि खुद निर्दोष नहीं था।”
काली शक्ति पीछे हटने लगी।
मीरा ने कहा—
“यही इसकी कमजोरी है।”
अर्जुन ने पूछा—
“क्या?”
“सच।”
काली शक्ति चीखने लगी।
मंदिर की दीवारें काँपने लगीं।
शहर की सारी घंटियाँ एक साथ बजने लगीं।
टन! टन! टन!
लोग सड़कों पर गिरने लगे।
उनके हाथों से पैसे और कागज गिर गए।
लाल आँखें सामान्य होने लगीं।
काली शक्ति का शरीर टूटने लगा।
उसने अर्जुन की तरफ हाथ बढ़ाया।
“तुम मुझे खत्म नहीं कर सकते!”
अर्जुन ने कहा—
“मैं तुम्हें खत्म नहीं कर रहा।”
“फिर?”
“मैं तुम्हें स्वीकार कर रहा हूँ।”
काली शक्ति चीख पड़ी।
उसके शरीर से धुआँ निकलने लगा।
फिर वह हजारों छोटे-छोटे काले टुकड़ों में टूट गई।
हर टुकड़ा किसी इंसान की परछाईं बनकर जमीन पर गिरा।
मीरा की आँखों में आँसू थे।
अर्जुन ने पूछा—
“अब सब खत्म?”
मीरा ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
“क्यों?”
“क्योंकि पाप खत्म नहीं होते।”
“फिर?”
“इंसान उन्हें पहचानना सीखता है।”
सुबह हुई।
कालपुर पहली बार कई वर्षों बाद शांत था।
लोग अपने घरों से बाहर आए।
उन्हें पिछली रात की पूरी घटना याद नहीं थी।
लेकिन हर किसी के दरवाजे पर एक कागज रखा था।
उस पर सिर्फ एक सवाल लिखा था—
“अगर कोई तुम्हें न देख रहा हो, तो तुम क्या करोगे?”
अर्जुन ने अपना कागज देखा।
उसने उसे मोड़कर जेब में रख लिया।
मीरा उसके पास खड़ी थी।
“तुम अब क्या करोगे?”
अर्जुन ने कहा—
“सच लिखूँगा।”
“चाहे उसमें मेरा अपना नाम क्यों न हो?”
“हाँ।”
मीरा मुस्कुराई।
धीरे-धीरे उसका शरीर धुंध में बदलने लगा।
अर्जुन घबरा गया।
“तुम जा रही हो?”
“अब मुझे रुकने की जरूरत नहीं।”
“तुम्हें इंसाफ मिल गया?”
मीरा ने कहा—
“इंसाफ तब मिला जब लोगों ने मेरी कहानी पर विश्वास किया।”
और वह गायब हो गई।
कुछ देर बाद अर्जुन मंदिर से बाहर निकला।
कालपुर की सड़कें अब सामान्य थीं।
लेकिन शहर के बीचोंबीच लगी पुरानी घड़ी अब भी खड़ी थी।
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
सुइयाँ बारह बजने से एक मिनट पहले रुकी हुई थीं।
वह आगे बढ़ गया।
तभी…
घड़ी की सुइयाँ चलने लगीं।
टिक… टिक… टिक…
अर्जुन रुक गया।
घड़ी ने बारह बजाए।
एक…
दो…
तीन…
चार…
पाँच…
छह…
सात…
आठ…
नौ…
दस…
ग्यारह…
बारह…
अर्जुन ने राहत की साँस ली।
लेकिन फिर—
तेरहवीं घंटी।
उसने धीरे से पीछे मुड़कर देखा।
घड़ी के नीचे एक छोटा बच्चा खड़ा था।
उसके हाथ में लाल गुब्बारा था।
बच्चे ने अर्जुन को देखकर मुस्कुराया।
और बोला—
“अंकल… कालपुर में एक पाप अभी भी बाकी है।”
अर्जुन के चेहरे का रंग उड़ गया।
“कौन सा?”
बच्चे ने धीरे से कहा—
“पापों को देखकर भी चुप रहना।”
और अगले ही पल बच्चा गायब हो गया।
सड़क पर सिर्फ लाल गुब्बारा रह गया।
अर्जुन ने उसे उठाया।
उस पर खून से एक आखिरी शब्द लिखा था—
“जारी…”
समाप्त। :::

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।