🔐 लॉग-इन या रजिस्टर करें  

टैग: #horror#dar

  • PAPO KA SHAHAR (भाग 5 )आखिरी पाप

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

    मंदिर के अंदर खड़ा आदमी धीरे-धीरे प्रकाश में आया।

    अर्जुन की साँस रुक गई।

    “पापा…?”

    सामने खड़ा आदमी बिल्कुल उसके पिता जैसा था।

    वही चेहरा।

    वही आँखें।

    वही आवाज।

    लेकिन उसके पिता की मृत्यु को पाँच साल हो चुके थे।

    अर्जुन पीछे हट गया।

    “तुम मेरे पिता नहीं हो।”

    आदमी मुस्कुराया।

    “तुम्हें सच और झूठ में फर्क करना अभी भी नहीं आता।”

    अर्जुन ने पूछा—

    “तुम कौन हो?”

    उस आदमी ने मंदिर की मूर्ति की तरफ देखा।

    “मैं वह हूँ जिसने इस शहर के पापों को इतने सालों तक संभालकर रखा।”

    अचानक मंदिर की सारी मूर्तियों की आँखें लाल हो गईं।

    मीरा अर्जुन के पास आकर खड़ी हो गई।

    उसने फुसफुसाकर कहा—

    “इसे मत सुनना।”

    “क्यों?”

    “क्योंकि यह तुम्हारे डर से बात करता है।”

    वह आदमी हँसा।

    “मीरा… तुम अभी भी अधूरी कहानी हो।”

    मीरा की आँखों में गुस्सा आ गया।

    “तुमने मुझे खत्म करने की कोशिश की थी।”

    “लेकिन तुम बच गईं।”

    “क्योंकि सच को मारना आसान नहीं।”

    आदमी ने हाथ उठाया।

    मंदिर की दीवारों पर दृश्य उभरने लगे।

    सूरजपुर नहीं।

    कालपुर।

    सालों पहले का कालपुर।

    गरीब लोग भूखे थे।

    अमीर लोग धन जमा कर रहे थे।

    पुलिस अपराधियों से मिली थी।

    नेता झूठ बोल रहे थे।

    लोग सब जानते थे।

    लेकिन कोई कुछ नहीं करता था।

    फिर उस आदमी की आवाज आई—

    “यहीं से मेरा जन्म हुआ।”

    अर्जुन ने पूछा—

    “तुम कौन हो?”

    “मैं किसी एक इंसान का नाम नहीं।”

    उसने अपना चेहरा बदलना शुरू किया।

    पहले वह बूढ़ा बना।

    फिर जवान।

    फिर बच्चा।

    फिर महिला।

    फिर अर्जुन।

    फिर मीरा।

    अर्जुन डर गया।

    “तुम…?”

    “मैं इस शहर के हर पाप का चेहरा हूँ।”

    मीरा ने कहा—

    “यह कालपुर की आत्मा है।”

    आदमी हँसा।

    “आत्मा नहीं।”

    उसने अर्जुन की तरफ देखा।

    “मैं इंसानों की इच्छाओं से पैदा हुआ हूँ।”

    अर्जुन समझ गया।

    लालच।

    झूठ।

    विश्वासघात।

    हिंसा।

    और चुप्पी।

    ये सब मिलकर इस डरावनी शक्ति को जन्म देते रहे थे।

    लेकिन एक सवाल अभी भी बाकी था।

    “मेरा सातवाँ पाप क्या है?”

    आदमी मुस्कुराया।

    “तुमने सोचा था कि तुम्हारा पाप हत्या है।”

    “लेकिन वह तो दुर्घटना थी।”

    “हाँ।”

    “तो फिर?”

    वह धीरे-धीरे अर्जुन के पास आया।

    “तुम्हारा सबसे बड़ा पाप है… सच जानते हुए भी खुद को निर्दोष मानना।”

    अर्जुन चुप हो गया।

    उसके जीवन की सारी घटनाएँ उसकी आँखों के सामने घूमने लगीं।

    वह खबर जिसे उसने पैसे लेकर दबाया।

    वह आदमी जिसे उसने बिना पूरी जाँच के दोषी बताया।

    वह दुर्घटना जिसे उसके पिता ने छिपाया।

    और वह समय जब उसने अपने पिता पर सवाल नहीं उठाए।

    हर बार उसने खुद को समझाया था—

    “मेरी गलती नहीं।”

    लेकिन वह सच नहीं था।

    उसने धीरे से कहा—

    “हाँ।”

    काली शक्ति रुक गई।

    “क्या कहा?”

    “मैं दोषी हूँ।”

    मंदिर में अचानक सन्नाटा छा गया।

    अर्जुन ने आगे कहा—

    “मैंने लोगों के सच से अपना फायदा उठाया।”

    “मैंने अपनी गलतियों से आँखें बंद कीं।”

    “मैंने अपने पिता को सवालों से बचाया।”

    “मैंने नैना के मामले में सच खोजने की कोशिश नहीं की।”

    “और मैंने कई बार दूसरों को दोषी ठहराया, जबकि खुद निर्दोष नहीं था।”

    काली शक्ति पीछे हटने लगी।

    मीरा ने कहा—

    “यही इसकी कमजोरी है।”

    अर्जुन ने पूछा—

    “क्या?”

    “सच।”

    काली शक्ति चीखने लगी।

    मंदिर की दीवारें काँपने लगीं।

    शहर की सारी घंटियाँ एक साथ बजने लगीं।

    टन! टन! टन!

    लोग सड़कों पर गिरने लगे।

    उनके हाथों से पैसे और कागज गिर गए।

    लाल आँखें सामान्य होने लगीं।

    काली शक्ति का शरीर टूटने लगा।

    उसने अर्जुन की तरफ हाथ बढ़ाया।

    “तुम मुझे खत्म नहीं कर सकते!”

    अर्जुन ने कहा—

    “मैं तुम्हें खत्म नहीं कर रहा।”

    “फिर?”

    “मैं तुम्हें स्वीकार कर रहा हूँ।”

    काली शक्ति चीख पड़ी।

    उसके शरीर से धुआँ निकलने लगा।

    फिर वह हजारों छोटे-छोटे काले टुकड़ों में टूट गई।

    हर टुकड़ा किसी इंसान की परछाईं बनकर जमीन पर गिरा।

    मीरा की आँखों में आँसू थे।

    अर्जुन ने पूछा—

    “अब सब खत्म?”

    मीरा ने सिर हिलाया।

    “नहीं।”

    “क्यों?”

    “क्योंकि पाप खत्म नहीं होते।”

    “फिर?”

    “इंसान उन्हें पहचानना सीखता है।”

    सुबह हुई।

    कालपुर पहली बार कई वर्षों बाद शांत था।

    लोग अपने घरों से बाहर आए।

    उन्हें पिछली रात की पूरी घटना याद नहीं थी।

    लेकिन हर किसी के दरवाजे पर एक कागज रखा था।

    उस पर सिर्फ एक सवाल लिखा था—

    “अगर कोई तुम्हें न देख रहा हो, तो तुम क्या करोगे?”

    अर्जुन ने अपना कागज देखा।

    उसने उसे मोड़कर जेब में रख लिया।

    मीरा उसके पास खड़ी थी।

    “तुम अब क्या करोगे?”

    अर्जुन ने कहा—

    “सच लिखूँगा।”

    “चाहे उसमें मेरा अपना नाम क्यों न हो?”

    “हाँ।”

    मीरा मुस्कुराई।

    धीरे-धीरे उसका शरीर धुंध में बदलने लगा।

    अर्जुन घबरा गया।

    “तुम जा रही हो?”

    “अब मुझे रुकने की जरूरत नहीं।”

    “तुम्हें इंसाफ मिल गया?”

    मीरा ने कहा—

    “इंसाफ तब मिला जब लोगों ने मेरी कहानी पर विश्वास किया।”

    और वह गायब हो गई।

    कुछ देर बाद अर्जुन मंदिर से बाहर निकला।

    कालपुर की सड़कें अब सामान्य थीं।

    लेकिन शहर के बीचोंबीच लगी पुरानी घड़ी अब भी खड़ी थी।

    अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

    सुइयाँ बारह बजने से एक मिनट पहले रुकी हुई थीं।

    वह आगे बढ़ गया।

    तभी…

    घड़ी की सुइयाँ चलने लगीं।

    टिक… टिक… टिक…

    अर्जुन रुक गया।

    घड़ी ने बारह बजाए।

    एक…

    दो…

    तीन…

    चार…

    पाँच…

    छह…

    सात…

    आठ…

    नौ…

    दस…

    ग्यारह…

    बारह…

    अर्जुन ने राहत की साँस ली।

    लेकिन फिर—

    तेरहवीं घंटी।

    उसने धीरे से पीछे मुड़कर देखा।

    घड़ी के नीचे एक छोटा बच्चा खड़ा था।

    उसके हाथ में लाल गुब्बारा था।

    बच्चे ने अर्जुन को देखकर मुस्कुराया।

    और बोला—

    “अंकल… कालपुर में एक पाप अभी भी बाकी है।”

    अर्जुन के चेहरे का रंग उड़ गया।

    “कौन सा?”

    बच्चे ने धीरे से कहा—

    “पापों को देखकर भी चुप रहना।”

    और अगले ही पल बच्चा गायब हो गया।

    सड़क पर सिर्फ लाल गुब्बारा रह गया।

    अर्जुन ने उसे उठाया।

    उस पर खून से एक आखिरी शब्द लिखा था—

    “जारी…”

    समाप्त। :::

  • पापों का शहर (भाग 4)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    “हत्या…”

     

    काली आकृति की आवाज पूरे तहखाने में गूँज उठी।

     

    अर्जुन के कानों में जैसे किसी ने हजारों घंटियाँ बजा दी हों।

     

    उसके सामने वही दृश्य बार-बार घूम रहा था।

     

    एक सुनसान सड़क।

     

    तेज बारिश।

     

    एक कार।

     

    और सड़क के बीच खड़ा एक बच्चा।

     

    अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।

     

    “नहीं… मुझे कुछ याद नहीं।”

     

    काली आकृति हँसी।

     

    “यादें कभी मरती नहीं। इंसान सिर्फ उन्हें दफना देता है।”

     

    अचानक तहखाने की दीवारें गायब हो गईं।

     

    अर्जुन फिर उसी सड़क पर खड़ा था।

     

    बारिश उसके चेहरे पर पड़ रही थी।

     

    सड़क के किनारे एक छोटी-सी लड़की खड़ी थी।

     

    उसके हाथ में लाल गुब्बारा था।

     

    अर्जुन ने उसे पहचानने की कोशिश की।

     

    “तुम कौन हो?”

     

    लड़की ने कुछ नहीं कहा।

     

    दूर से कार की हेडलाइट दिखाई दी।

     

    कार तेजी से उसकी तरफ आ रही थी।

     

    अर्जुन चिल्लाया—

     

    “हटो!”

     

    लेकिन लड़की वहीं खड़ी रही।

     

    कार करीब आई।

     

    और अचानक अर्जुन ने देखा—

     

    कार चला कोई और नहीं, वह खुद था।

     

    उसने ब्रेक लगाने की कोशिश की।

     

    लेकिन ब्रेक काम नहीं कर रहे थे।

     

    एक जोरदार टक्कर हुई।

     

    लड़की हवा में उछली।

     

    लाल गुब्बारा आसमान में चला गया।

     

    और सड़क पर खामोशी छा गई।

     

    अर्जुन चीख उठा।

     

    “नहीं!”

     

    दृश्य बदल गया।

     

    अब वह अस्पताल में था।

     

    एक डॉक्टर किसी से कह रहा था—

     

    “बच्ची की हालत बहुत गंभीर है।”

     

    फिर एक आदमी अंदर आया।

     

    अर्जुन ने उसे देखा।

     

    वह उसका पिता था।

     

    उसने डॉक्टर से कहा—

     

    “इस मामले को यहीं खत्म कर दीजिए।”

     

    अर्जुन ने अपने पिता की तरफ देखा।

     

    “आपने ऐसा क्यों किया?”

     

    उसके पिता ने कहा—

     

    “क्योंकि अगर यह बात बाहर गई, तो तुम्हारी जिंदगी खत्म हो जाएगी।”

     

    अर्जुन के चेहरे पर भय उतर आया।

     

    “तो… वह लड़की?”

     

    “वह मर गई।”

     

    अर्जुन ने सिर पकड़ लिया।

     

    “मैंने उसे मारा?”

     

    पीछे से मीरा की आवाज आई—

     

    “नहीं।”

     

    अर्जुन ने पलटकर देखा।

     

    मीरा खड़ी थी।

     

    “तुमने उसे नहीं मारा।”

     

    “फिर?”

     

    “तुम्हारे पिता ने तुम्हें उस रात की पूरी सच्चाई कभी नहीं बताई।”

     

    अचानक दृश्य फिर बदला।

     

    इस बार अर्जुन ने देखा कि दुर्घटना से कुछ मिनट पहले कार में वह अकेला नहीं था।

     

    उसके साथ एक आदमी बैठा था।

     

    उस आदमी ने अर्जुन को शराब पिलाई थी।

     

    और फिर…

     

    उसने कार की ब्रेक लाइन काट दी थी।

     

    अर्जुन की आँखें फैल गईं।

     

    “यह कौन था?”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “कालपुर का वह आदमी जिसने तुम्हारे पिता को ब्लैकमेल किया था।”

     

    “कौन?”

     

    मीरा ने जवाब नहीं दिया।

     

    काली आकृति आगे बढ़ी।

     

    “सच के पास पहुँचकर भी इंसान डरता है।”

     

    उसने हाथ उठाया।

     

    अर्जुन के सामने उस आदमी का चेहरा दिखाई दिया।

     

    गोविंद।

     

    अर्जुन पीछे हट गया।

     

    “नहीं…”

     

    उसने गोविंद की तरफ देखा।

     

    बूढ़ा चुप खड़ा था।

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “आपने मेरी कार की ब्रेक काटी थीं?”

     

    गोविंद की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    “हाँ।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि तुम्हारे पिता ने मुझे धोखा दिया था।”

     

    “उस बच्ची का क्या दोष था?”

     

    गोविंद चुप रहा।

     

    मीरा ने कहा—

     

    “यही कालपुर का सबसे बड़ा पाप है।”

     

    अर्जुन ने गुस्से में गोविंद को पकड़ लिया।

     

    “तुमने उसे क्यों मारा?”

     

    गोविंद चीख पड़ा—

     

    “मैंने उसे मारना नहीं चाहा था!”

     

    “लेकिन वह मर गई!”

     

    “हाँ!”

     

    गोविंद जमीन पर बैठ गया।

     

    “और उस दिन से मैं हर रात उसकी चीख सुनता हूँ।”

     

    अचानक लाल गुब्बारा हवा में दिखाई दिया।

     

    वह धीरे-धीरे अर्जुन के सामने आकर रुक गया।

     

    उस पर खून से एक नाम लिखा था—

     

    “नैना।”

     

    अर्जुन की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “उस बच्ची का नाम नैना था?”

     

    मीरा ने सिर हिलाया।

     

    “और वह सिर्फ एक हादसे में नहीं मरी थी।”

     

    “फिर?”

     

    “उसे मरने के बाद भी इंसाफ नहीं मिला।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि कालपुर के लोगों ने उसकी मौत को छिपा दिया।”

     

    अर्जुन ने चारों तरफ देखा।

     

    दीवारों पर हजारों चेहरे उभर आए।

     

    हर चेहरा उस रात को देख रहा था।

     

    किसी ने पुलिस को नहीं बताया।

     

    किसी ने गवाही नहीं दी।

     

    किसी ने उसके परिवार की मदद नहीं की।

     

    हर कोई चुप रहा।

     

    काली आकृति ने कहा—

     

    “हत्या सिर्फ वह नहीं करता जो किसी की जान लेता है।”

     

    “कई बार हत्या वह भी करता है जो सच जानते हुए चुप रहता है।”

     

    अर्जुन ने सिर झुका लिया।

     

    तभी तहखाने में एक तेज आवाज हुई।

     

    धड़ाम!

     

    सारी दीवारें हिलने लगीं।

     

    काली आकृति पीछे हट गई।

     

    मीरा ने अर्जुन से कहा—

     

    “अब पाँचवाँ पाप जाग रहा है।”

     

    “कौन सा?”

     

    “लालच।”

     

    अचानक शहर के हर घर में एक साथ रोशनी जल उठी।

     

    लोग अपने घरों से बाहर निकलने लगे।

     

    लेकिन उनके हाथों में सोने के सिक्के थे।

     

    जमीन के कागज थे।

     

    नोटों की गड्डियाँ थीं।

     

    और हर व्यक्ति दूसरे से ज्यादा पाने के लिए लड़ रहा था।

     

    अर्जुन समझ गया—

     

    कालपुर सिर्फ लोगों के पाप दिखा नहीं रहा था।

     

    वह उन्हें जगा रहा था।

     

    मीरा ने कहा—

     

    “जल्दी करो।”

     

    “कहाँ?”

     

    “शहर के पुराने मंदिर में।”

     

    “वहाँ क्यों?”

     

    “क्योंकि पाँचवें पाप की जड़ वहीं है।”

     

    अर्जुन और मीरा सुरंग से बाहर निकलने लगे।

     

    पीछे गोविंद बैठा रो रहा था।

     

    अर्जुन ने उसे देखा।

     

    “आप नहीं आएँगे?”

     

    गोविंद ने कहा—

     

    “मेरी सजा अभी बाकी है।”

     

    अर्जुन आगे बढ़ गया।

     

    लेकिन जैसे ही वह सुरंग से बाहर निकला, उसे एहसास हुआ कि पूरा शहर बदल चुका था।

     

    सड़क पर कोई इंसान जैसा नहीं दिख रहा था।

     

    हर व्यक्ति की आँखें लाल थीं।

     

    हर हाथ में पैसा था।

     

    और सब एक ही चीज के लिए लड़ रहे थे—

     

    और ज्यादा।

     

    दूर मंदिर की घंटी बजने लगी।

     

    एक…

     

    दो…

     

    तीन…

     

    और फिर तेरहवीं घंटी।

     

    मंदिर के दरवाजे अपने आप खुल गए।

     

    अंदर एक विशाल मूर्ति के सामने कोई खड़ा था।

     

    वह आदमी अर्जुन को देखकर मुस्कुराया।

     

    “आ गए?”

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “तुम कौन हो?”

     

    वह धीरे-धीरे प्रकाश में आया।

     

    अर्जुन के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    वह आदमी…

     

    उसके पिता थे।

     

    लेकिन उनके पिता तो पाँच साल पहले मर चुके थे।

  • पापों का शहर (part -1)

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

     

     

    शहर का नाम था कालपुर।नक्शे पर वह एक छोटा-सा शहर था, लेकिन आसपास के गाँवों में उसके बारे में अजीब-अजीब बातें कही जाती थीं। लोग कहते थे कि कालपुर में रात होने के बाद कोई अकेला बाहर नहीं निकलता।

     

    क्योंकि वहाँ रात सिर्फ अँधेरा लेकर नहीं आती थी।

     

    वह इंसान के पापों को जगा देती थी।

     

    शहर के बीचोंबीच एक पुरानी घड़ी लगी थी। वह घड़ी दिन में ठीक चलती थी, लेकिन रात के बारह बजते ही उसकी सुइयाँ रुक जाती थीं।

     

    ठीक बारह बजे।

     

    और उसी समय पूरे शहर में एक घंटी बजती थी।

     

    टन… टन… टन…

     

    कहा जाता था कि घंटी की तेरहवीं आवाज सुनने वाला व्यक्ति अपने जीवन का सबसे बड़ा पाप देख लेता था।

     

    इसी शहर में एक रात अर्जुन पहुँचा।

     

    अर्जुन पेशे से पत्रकार था। उसे कालपुर में हो रही रहस्यमयी घटनाओं की खबर मिली थी। पिछले छह महीनों में शहर से सात लोग गायब हो चुके थे।

     

    अजीब बात यह थी कि उनके घरों के दरवाजे अंदर से बंद मिले थे।

     

    किसी घर में चोरी नहीं हुई।

     

    किसी घर में संघर्ष के निशान नहीं थे।

     

    बस एक चीज हर जगह मिली—

     

    काली राख।

     

    अर्जुन ने शहर के पुराने होटल में कमरा लिया।

     

    होटल का मालिक एक बूढ़ा आदमी था, जिसका नाम गोविंद था।

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “यहाँ लोग गायब क्यों हो रहे हैं?”

     

    गोविंद ने उसकी तरफ देखा और धीमे से बोला—

     

    “आप बाहर से आए हैं, इसलिए आपको अभी कुछ पता नहीं।”

     

    “क्या?”

     

    “कालपुर में लोग नहीं गायब होते।”

     

    “फिर?”

     

    “उनके पाप उन्हें ले जाते हैं।”

     

    अर्जुन हँस पड़ा।

     

    “मैं भूत-प्रेत की कहानियों पर विश्वास नहीं करता।”

     

    गोविंद ने कहा—

     

    “कल रात बारह बजे तक कर लीजिएगा।”

     

    अर्जुन ने बात को मजाक समझकर छोड़ दिया।

     

    रात करीब ग्यारह बजे वह अपने कमरे में बैठकर पुराने दस्तावेज पढ़ रहा था।

     

    बाहर बिल्कुल सन्नाटा था।

     

    अचानक दूर से घड़ी की घंटी सुनाई दी।

     

    टन…

     

    अर्जुन ने घड़ी देखी।

     

    12:00 बजे थे।

     

    टन…

     

    दूसरी घंटी।

     

    टन…

     

    तीसरी।

     

    वह गिनने लगा।

     

    आठ…

     

    नौ…

     

    दस…

     

    ग्यारह…

     

    बारह…

     

    फिर कुछ सेकंड की खामोशी।

     

    अर्जुन ने सोचा कि अब सब खत्म।

     

    लेकिन तभी—

     

    टन…

     

    तेरहवीं घंटी।

     

    कमरे का तापमान अचानक गिर गया।

     

    अर्जुन की साँस से धुआँ निकलने लगा।

     

    उसके सामने रखा लैपटॉप अपने आप बंद हो गया।

     

    फिर कमरे के कोने में किसी बच्चे के रोने की आवाज आई।

     

    “मुझे बचाओ…”

     

    अर्जुन धीरे-धीरे उस दिशा में बढ़ा।

     

    वहाँ कोई नहीं था।

     

    लेकिन दीवार पर एक काली परछाईं दिखाई दे रही थी।

     

    परछाईं धीरे-धीरे एक आदमी का आकार लेने लगी।

     

    अर्जुन पीछे हट गया।

     

    तभी परछाईं ने कहा—

     

    “तुम सच खोजने आए हो?”

     

    अर्जुन ने काँपते हुए पूछा—

     

    “कौन हो?”

     

    परछाईं ने जवाब दिया—

     

    “सच से ज्यादा डरावनी चीज यहाँ कुछ नहीं।”

     

    अचानक कमरे की दीवार पर कई दृश्य दिखाई देने लगे।

     

    एक आदमी पैसे चुरा रहा था।

     

    एक महिला किसी निर्दोष पर झूठा आरोप लगा रही थी।

     

    एक पुलिस वाला रिश्वत ले रहा था।

     

    एक डॉक्टर किसी गरीब मरीज को पैसे के लिए मना कर रहा था।

     

    और फिर…

     

    अर्जुन ने खुद को देखा।

     

    तीन साल पहले की एक घटना।

     

    उसके हाथ में एक फाइल थी।

     

    उसने एक अपराधी के खिलाफ सबूत छिपा दिए थे।

     

    क्योंकि उस अपराधी ने उसे पैसे दिए थे।

     

    अर्जुन का चेहरा पीला पड़ गया।

     

    “नहीं…”

     

    परछाईं हँसी।

     

    “हर आदमी दूसरों के पाप गिनता है।”

     

    “लेकिन अपने?”

     

    अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।

     

    जब उसने आँखें खोलीं, कमरा सामान्य था।

     

    सुबह होते ही वह होटल से बाहर निकला।

     

    लेकिन बाहर का दृश्य देखकर उसके कदम रुक गए।

     

    सड़क के बीचोंबीच एक आदमी खड़ा था।

     

    वही आदमी जिसे अर्जुन ने रात को दीवार पर देखा था।

     

    लेकिन अब वह आदमी असली था।

     

    लोग उसके चारों तरफ खड़े थे।

     

    अचानक वह आदमी चीखने लगा—

     

    “मैंने नहीं किया!”

     

    फिर उसके मुँह से खून निकलने लगा।

     

    वह जमीन पर गिर पड़ा।

     

    लोग पीछे हट गए।

     

    और जहाँ वह गिरा था, वहाँ राख का एक काला निशान रह गया।

     

    गोविंद अर्जुन के पास आया।

     

    “अब समझे?”

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “यह कौन था?”

     

    गोविंद ने कहा—

     

    “शहर का सबसे बड़ा साहूकार।”

     

    “उसने क्या किया?”

     

    गोविंद ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

     

    “गरीबों की जमीन हड़पता था।”

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “उसे किसने मारा?”

     

    गोविंद ने घड़ी की तरफ देखा।

     

    “किसी ने नहीं।”

     

    “फिर?”

     

    बूढ़े ने धीमे से कहा—

     

    “कालपुर ने।”

     

    अर्जुन के हाथ में पकड़ी फाइल जमीन पर गिर गई।

     

    और उसी समय उसके पीछे किसी ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “अभी छह पाप बाकी हैं।”

     

    अर्जुन ने पलटकर देखा।

     

    वहाँ कोई नहीं था।

     

    लेकिन सड़क की दीवार पर काले अक्षरों में लिखा था—

     

    “पापों का शहर तुम्हारा इंतजार कर रहा है।”

  • भूत बंगला — पार्ट 5

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

     

    अमन अपनी परछाई को देखकर पत्थर की तरह खड़ा रह गया।

     

    उसकी परछाई जमीन पर थी, लेकिन वह अमन जैसी नहीं थी। उसके सिर पर दो लंबे सींग थे और उसकी गर्दन असामान्य रूप से लंबी दिखाई दे रही थी।

     

    अमन धीरे-धीरे पीछे हटने लगा।

     

    “ये… ये मेरी परछाई नहीं है।”

     

    समीर उसके सामने आकर खड़ा हो गया।

     

    उसके चेहरे पर अब वह डर नहीं था जो कुछ देर पहले दिखाई दे रहा था।

     

    वह बिल्कुल शांत था।

     

    “तुम्हें आखिरी कमरा खोलना होगा।”

     

    अमन ने पूछा, “अगर मैंने कमरा नहीं खोला तो?”

     

    समीर की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “तो तुम्हारे पिता हमेशा के लिए वहीं कैद रहेंगे।”

     

    अमन ने बंगले की तरफ देखा।

     

    उसके मन में हजारों सवाल घूम रहे थे।

     

    अगर उसके पिता सच में इस बंगले में थे, तो इतने सालों से कहाँ थे?

     

    और अगर वह जिंदा थे, तो उन्होंने कभी घर लौटने की कोशिश क्यों नहीं की?

     

    अचानक पीछे से बच्चे की आवाज आई—

     

    “क्योंकि वह जिंदा नहीं हैं।”

     

    अमन ने मुड़कर देखा।

     

    ठाकुर का बच्चा उसके पीछे खड़ा था।

     

    “तुम झूठ बोल रहे हो,” अमन ने कहा।

     

    बच्चे ने सिर हिलाया।

     

    “तुम्हारे पिता की आत्मा यहाँ है। उनका शरीर बहुत पहले खत्म हो चुका है।”

     

    अमन की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “तो मुझे बंगले में क्यों जाना है?”

     

    बच्चे ने कहा—

     

    “क्योंकि उनकी आत्मा के पास तुम्हारी आखिरी परछाई है।”

     

    उसी समय जंगल में तेज हवा चलने लगी।

     

    पेड़ों की शाखाएँ एक-दूसरे से टकराने लगीं।

     

    दूर बंगले का दरवाजा अपने आप खुल गया।

     

    किर्रर्र…

     

    अंदर से पीली रोशनी बाहर आ रही थी।

     

    अमन ने फैसला कर लिया।

     

    “मैं जाऊँगा।”

     

    समीर ने कहा, “मैं भी।”

     

    दोनों बंगले की तरफ चल पड़े।

     

    बंगले के पास पहुँचते ही अमन ने महसूस किया कि हवा बिल्कुल शांत हो गई थी।

     

    इतनी शांति थी कि उनके कदमों की आवाज बहुत तेज सुनाई दे रही थी।

     

    वे अंदर गए।

     

    मुख्य हॉल पहले जैसा नहीं था।

     

    दीवारों पर लगी तस्वीरें गायब थीं।

     

    उनकी जगह काले पर्दे लगे थे।

     

    हॉल के बीचोंबीच एक पुरानी घड़ी थी।

     

    घड़ी की सुइयाँ उल्टी दिशा में घूम रही थीं।

     

    अचानक घड़ी ने बारह बार घंटी बजाई।

     

    टन… टन… टन…

     

    हर घंटी के साथ कमरे की एक-एक खिड़की बंद होती गई।

     

    बारहवीं घंटी के बाद अंधेरा छा गया।

     

    फिर सामने एक दरवाजा दिखाई दिया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “केवल वही अंदर आए, जिसने अपनी परछाई खोई हो।”

     

    अमन ने दरवाजा खोला।

     

    अंदर एक लंबा गलियारा था।

     

    गलियारे के अंत में एक लाल दरवाजा था।

     

    दरवाजे के पीछे से किसी आदमी के रोने की आवाज आ रही थी।

     

    “अमन…”

     

    अमन वहीं रुक गया।

     

    यह आवाज उसके पिता की थी।

     

    वही आवाज जो उसने बचपन में सुनी थी।

     

    “पापा?”

     

    अंदर से जवाब आया—

     

    “बेटा… मुझे यहाँ से निकालो।”

     

    अमन ने दरवाजा खोल दिया।

     

    कमरे के बीच में एक कुर्सी थी।

     

    कुर्सी पर एक आदमी बैठा था।

     

    उसका चेहरा झुका हुआ था।

     

    बाल सफेद हो चुके थे।

     

    अमन की सांस रुक गई।

     

    “पापा…”

     

    आदमी ने धीरे-धीरे सिर उठाया।

     

    चेहरा बिल्कुल उसके पिता जैसा था।

     

    अमन उसके पास दौड़ा।

     

    लेकिन समीर ने उसे रोक लिया।

     

    “रुको!”

     

    अमन चिल्लाया—

     

    “ये मेरे पापा हैं!”

     

    समीर ने कहा—

     

    “पहले उनकी परछाई देखो।”

     

    अमन ने जमीन की तरफ देखा।

     

    कुर्सी पर बैठे आदमी की कोई परछाई नहीं थी।

     

    अचानक आदमी हँसने लगा।

     

    उसकी आवाज बदल गई।

     

    “तुम्हें अब भी विश्वास नहीं होता?”

     

    उसका चेहरा धीरे-धीरे विकृत होने लगा।

     

    त्वचा काली पड़ गई।

     

    आँखें लाल हो गईं।

     

    और उसके पीछे वही काली औरत दिखाई दी।

     

    वह औरत आगे बढ़ी।

     

    “तुम्हारे पिता ने अपनी परछाई देकर तुम्हें बचाया था।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “किससे?”

     

    औरत ने कहा—

     

    “मुझसे नहीं… उससे।”

     

    कमरे की दीवार अचानक फट गई।

     

    दीवार के पीछे एक विशाल काली आकृति दिखाई दी।

     

    उसका शरीर धुएँ से बना था।

     

    उसके चेहरे पर कोई आँखें नहीं थीं।

     

    फिर भी वह अमन को देख रही थी।

     

    अमन समझ गया।

     

    यही वह शक्ति थी जिसे पचास साल पहले ठाकुर ने बंद किया था।

     

    काली आकृति ने कहा—

     

    “पाँचवीं परछाई पूरी हो चुकी है।”

     

    अमन के पैरों के नीचे उसकी सींगों वाली परछाई फैलने लगी।

     

    कमरे में रखे सारे आईने टूटने लगे।

     

    समीर ने चिल्लाकर कहा—

     

    “अमन! अपनी परछाई से मत डरना!”

     

    “मैं क्या करूँ?”

     

    “उसे स्वीकार मत करना!”

     

    अमन ने आँखें बंद कर लीं।

     

    उसे अपने पिता की बातें याद आने लगीं।

     

    बचपन में पिता अक्सर कहते थे—

     

    “डर हमेशा अंधेरे में नहीं होता, बेटा। कभी-कभी डर हमारे अंदर छिपा होता है।”

     

    अमन ने आँखें खोलीं।

     

    उसने अपनी परछाई की तरफ देखा।

     

    वह अब धीरे-धीरे उसके शरीर से अलग हो रही थी।

     

    अमन ने जमीन पर हाथ रख दिया।

     

    “तू मेरी नहीं है।”

     

    परछाई रुक गई।

     

    अमन ने जोर से कहा—

     

    “मेरी परछाई मेरे डर की नहीं, मेरी पहचान है।”

     

    अचानक कमरे में तेज रोशनी फैल गई।

     

    काली आकृति पीछे हटने लगी।

     

    औरत चीखने लगी।

     

    दीवारें कांपने लगीं।

     

    फिर एक जोरदार आवाज हुई।

     

    धड़ाम!

     

    पूरा कमरा सफेद रोशनी से भर गया।

     

    अमन ने देखा कि उसके पिता की आत्मा उसके सामने खड़ी थी।

     

    उन्होंने मुस्कुराकर कहा—

     

    “मुझे तुम पर गर्व है।”

     

    अमन रो पड़ा।

     

    “पापा, मेरे साथ चलिए।”

     

    उसके पिता ने सिर हिलाया।

     

    “अब मेरा समय खत्म हो चुका है।”

     

    “नहीं!”

     

    “बेटा, घर जाना।”

     

    उन्होंने हाथ उठाया।

     

    अमन की सींगों वाली परछाई अचानक गायब हो गई।

     

    उसकी जगह उसकी सामान्य परछाई वापस आ गई।

     

    काली आकृति चीखते हुए दीवार के अंदर खिंच गई।

     

    बंगला जोर-जोर से हिलने लगा।

     

    समीर ने अमन का हाथ पकड़ा।

     

    “हमें अभी निकलना होगा!”

     

    दोनों बाहर की तरफ भागे।

     

    बाहर पहुंचते ही पूरा बंगला पीछे से धूल के बादल में बदलने लगा।

     

    ऊपरी मंजिल की खिड़की में वही औरत आखिरी बार दिखाई दी।

     

    उसने अमन की तरफ देखा।

     

    लेकिन इस बार उसके चेहरे पर डर नहीं था।

     

    उसने मुस्कुराकर हाथ जोड़ दिए।

     

    फिर बंगला धीरे-धीरे जमीन के अंदर धँस गया।

     

    सुबह जब गाँव वाले वहाँ पहुंचे तो जंगल के बीच सिर्फ एक खाली मैदान था।

     

    न बंगला।

     

    न खंडहर।

     

    न कुआँ।

     

    बस जमीन पर एक पुरानी तस्वीर पड़ी थी।

     

    अमन ने तस्वीर उठाई।

     

    तस्वीर में ठाकुर का परिवार खड़ा था।

     

    उनके पीछे अब कोई काली परछाई नहीं थी।

     

    लेकिन तस्वीर के एक कोने में अमन और उसके पिता खड़े थे।

     

    अमन ने हैरानी से तस्वीर देखी।

     

    “ये कैसे…?”

     

    समीर ने कुछ नहीं कहा।

     

    अमन ने तस्वीर पलट दी।

     

    पीछे सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

     

    “दरवाजा बंद हो गया है… लेकिन कहानी खत्म नहीं हुई।”

     

    अमन ने ऊपर आसमान की तरफ देखा।

     

    सूरज निकल चुका था।

     

    सब कुछ सामान्य लग रहा था।

     

    लेकिन तभी उसकी नजर जमीन पर पड़ी।

     

    उसकी परछाई बिल्कुल सामान्य थी।

     

    समीर की भी।

     

    फिर अमन ने धीरे से पूछा—

     

    “कबीर कहाँ है?”

     

    समीर का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    दोनों ने पीछे मुड़कर जंगल की तरफ देखा।

     

    दूर एक पेड़ के नीचे कबीर खड़ा था।

     

    वह मुस्कुरा रहा था।

     

    अमन ने राहत की सांस ली और उसकी तरफ बढ़ा।

     

    लेकिन जैसे ही कबीर ने अपना चेहरा ऊपर उठाया…

     

    उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

     

    और उसके पीछे जमीन पर पाँच परछाइयाँ खड़ी थीं।

     

    तभी जंगल के अंदर से एक धीमी आवाज गूँजी—

     

    “एक बंगला खत्म हुआ है… दूसरा अभी बाकी है।”

     

    और उसी क्षण दूर किसी अनजान जगह पर…

     

    एक पुराने दरवाजे के खुलने की आवाज आई।

     

    किर्रर्र…

     

    समाप्त।

  • भूत बंगला — पार्ट 3

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    कमरे का दरवाजा बंद होते ही अमन ने पूरी ताकत से उसे खींचा, लेकिन दरवाजा जैसे पत्थर का हो गया था।

     

    सामने कुर्सी पर बैठा असली राघव कांप रहा था। उसके हाथ रस्सी से बंधे थे और चेहरे पर चोट के निशान थे।

     

    अमन उसके पास पहुंचा।

     

    “राघव, ये सब क्या है?”

     

    राघव ने जवाब देने के बजाय अपनी उंगली होंठों पर रख दी।

     

    “धीरे बोल… वह सुन रही है।”

     

    अमन ने कमरे में चारों तरफ देखा।

     

    कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    तभी छत से पानी की एक बूंद उसके माथे पर गिरी।

     

    उसने हाथ लगाया।

     

    पानी नहीं था।

     

    खून था।

     

    अमन ने ऊपर देखा।

     

    छत खाली थी।

     

    लेकिन कुछ ही सेकंड बाद छत से एक लड़की के लंबे बाल नीचे लटकने लगे।

     

    अमन पीछे हट गया।

     

    राघव ने घबराकर कहा, “नीचे मत देखना!”

     

    अमन ने उसकी बात नहीं मानी।

     

    जैसे ही उसने नीचे देखा, कमरे के फर्श पर एक औरत खड़ी थी।

     

    उसका चेहरा बालों से ढका हुआ था।

     

    वह बिल्कुल अमन के पीछे खड़ी थी।

     

    अमन चीखते हुए पीछे मुड़ा।

     

    वहाँ कोई नहीं था।

     

    राघव चिल्लाया—

     

    “उसकी तरफ मत देखना!”

     

    लेकिन देर हो चुकी थी।

     

    कमरे की सारी खिड़कियाँ अचानक खुल गईं।

     

    तेज हवा अंदर आने लगी।

     

    दीवारों पर लगी पुरानी तस्वीरें एक-एक करके जमीन पर गिरने लगीं।

     

    धड़ाम! धड़ाम! धड़ाम!

     

    अचानक एक तस्वीर अमन के पैरों के पास आकर गिरी।

     

    उसने तस्वीर उठाई।

     

    तस्वीर में ठाकुर रुद्रप्रताप, उसकी पत्नी, उनका बच्चा और नौकर खड़े थे।

     

    लेकिन अब तस्वीर में एक और चीज दिखाई दे रही थी।

     

    उन सबके पीछे एक काली परछाई खड़ी थी।

     

    उस परछाई का चेहरा नहीं था।

     

    अमन ने तस्वीर पलट दी।

     

    पीछे पुराने अक्षरों में लिखा था—

     

    “जिस दिन पाँचवीं परछाई जन्म लेगी, बंगला फिर से जाग जाएगा।”

     

    अमन ने राघव की ओर देखा।

     

    “पाँचवीं परछाई का मतलब क्या है?”

     

    राघव ने धीरे-धीरे कहा—

     

    “मैं नहीं जानता। लेकिन मुझे इतना पता है कि इस बंगले में जो भी मरता है, उसकी आत्मा यहाँ कैद हो जाती है।”

     

    “और वह औरत?”

     

    “वह आत्मा नहीं है।”

     

    अमन की धड़कन रुक-सी गई।

     

    “तो फिर क्या है?”

     

    राघव ने कहा—

     

    “वह इस बंगले की मालकिन नहीं… इस बंगले की रक्षक है।”

     

    अमन कुछ समझ नहीं पाया।

     

    राघव ने बताया कि उसके दादा ने मरने से पहले उसे इस बंगले के बारे में बताया था।

     

    पचास साल पहले ठाकुर रुद्रप्रताप ने जंगल में एक पुरानी सुरंग खोजी थी। उस सुरंग के अंदर उसे एक पत्थर की मूर्ति मिली थी।

     

    कहा जाता था कि वह मूर्ति किसी प्राचीन शक्ति की थी।

     

    ठाकुर ने उस मूर्ति को बंगले में ला दिया।

     

    उसके बाद घर में अजीब घटनाएँ शुरू हो गईं।

     

    रात में किसी के चलने की आवाज आती।

     

    बंद कमरों से रोने की आवाजें सुनाई देतीं।

     

    और सबसे डरावनी बात—

     

    घर में रहने वाले लोगों की परछाइयाँ कभी-कभी उनके शरीर से अलग होकर चलने लगती थीं।

     

    एक रात ठाकुर ने उस शक्ति को हमेशा के लिए रोकने की कोशिश की।

     

    लेकिन वह असफल रहा।

     

    उस रात ठाकुर की पत्नी ने अपने बच्चे को बचाने के लिए खुद को बलिदान कर दिया।

     

    मरने से पहले उसने उस शक्ति को बंगले के अंदर बंद कर दिया।

     

    लेकिन उसे रोकने के लिए एक शर्त थी।

     

    हर पचास साल में पाँच लोगों की परछाइयाँ उस शक्ति को फिर से जागने से रोकती थीं।

     

    “तो फिर हम यहाँ क्यों आए?” अमन ने पूछा।

     

    राघव ने डरते हुए कहा—

     

    “क्योंकि इस बार पाँचवीं परछाई के लिए हमें चुना गया है।”

     

    अमन ने पूछा, “कौन-से पाँच?”

     

    राघव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम… मैं… समीर… कबीर… और…”

     

    वह अचानक चुप हो गया।

     

    अमन ने पूछा, “और कौन?”

     

    राघव ने धीरे से कमरे के कोने की तरफ देखा।

     

    “वह।”

     

    कमरे का बल्ब अचानक जल उठा।

     

    कोने में एक छोटा बच्चा खड़ा था।

     

    करीब आठ साल का।

     

    उसने पुराने जमाने के कपड़े पहन रखे थे।

     

    उसका चेहरा बिल्कुल सफेद था।

     

    अमन ने धीरे से पूछा—

     

    “तुम कौन हो?”

     

    बच्चे ने सिर उठाया।

     

    “मैं ठाकुर का बेटा हूँ।”

     

    अमन का शरीर सुन्न हो गया।

     

    “लेकिन तुम तो पचास साल पहले मर चुके हो।”

     

    बच्चे ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “मैं मरा नहीं था।”

     

    राघव ने घबराकर कहा—

     

    “अमन, इसके पास मत जाना।”

     

    लेकिन बच्चा अचानक अमन के बिल्कुल पास आ गया।

     

    उसने अमन के कान में फुसफुसाकर कहा—

     

    “तुम्हारे दोस्तों में से एक पहले ही मर चुका है।”

     

    अमन ने डरते हुए पूछा—

     

    “कौन?”

     

    बच्चे ने जवाब नहीं दिया।

     

    वह बस पीछे हट गया।

     

    अचानक कमरे की दीवार पर पाँच परछाइयाँ दिखाई दीं।

     

    पहली अमन की थी।

     

    दूसरी राघव की।

     

    तीसरी किसी ऐसे व्यक्ति की थी जो कमरे में था ही नहीं।

     

    चौथी बहुत छोटी थी।

     

    और पाँचवीं…

     

    वह छत पर उल्टी लटकी हुई थी।

     

    अमन ने ऊपर देखा।

     

    वहाँ वही औरत थी।

     

    इस बार उसके बाल चेहरे से हटे हुए थे।

     

    अमन की चीख निकल गई।

     

    उसका चेहरा देखकर वह समझ गया कि वह औरत कौन थी।

     

    वह अमन की माँ जैसी दिख रही थी।

     

    और तभी उस औरत ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “बेटा… इतनी देर क्यों कर दी?”

     

    अमन के हाथ से टॉर्च गिर गई।

     

    राघव चीख पड़ा—

     

    “यह तुम्हारी माँ नहीं है!”

     

    औरत धीरे-धीरे छत से नीचे उतरने लगी।

     

    उसके पैर जमीन को छू ही नहीं रहे थे।

     

    अमन पीछे हटता गया।

     

    तभी बाहर से किसी के भागने की आवाज आई।

     

    समीर और कबीर की आवाज सुनाई दी—

     

    “अमन! जल्दी बाहर आ!”

     

    अमन ने दरवाजे की तरफ देखा।

     

    राघव ने कहा—

     

    “रुको!”

     

    लेकिन अमन ने दरवाजा खोल दिया।

     

    बाहर समीर और कबीर खड़े थे।

     

    दोनों बुरी तरह डरे हुए थे।

     

    समीर ने अमन का हाथ पकड़ा।

     

    “हमें अभी जंगल से बाहर निकलना होगा।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “तुम दोनों इतने समय कहाँ थे?”

     

    कबीर ने कहा—

     

    “हम भागकर पुराने कुएँ तक गए थे।”

     

    “फिर?”

     

    कबीर ने कांपते हुए कहा—

     

    “वहाँ हमें राघव मिला था।”

     

    अमन के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    उसने पीछे मुड़कर कमरे की तरफ देखा।

     

    अंदर राघव अभी भी कुर्सी से बंधा था।

     

    तो फिर…

     

    कुएँ के पास राघव कौन था?

     

    अमन कुछ समझ पाता, उससे पहले समीर ने उसका हाथ जोर से पकड़ लिया।

     

    “अमन, चल!”

     

    तीनों जंगल की तरफ भागने लगे।

     

    कुछ दूर जाने के बाद अमन ने पीछे मुड़कर बंगले की तरफ देखा।

     

    ऊपरी खिड़की में पाँच लोग खड़े थे।

     

    राघव।

     

    ठाकुर का बच्चा।

     

    वह रहस्यमयी औरत।

     

    एक काली परछाई।

     

    और…

     

    अमन खुद।

     

    अमन ने घबराकर अपनी छाती पर हाथ रखा।

     

    उसका दिल धड़क रहा था।

     

    लेकिन उसी क्षण उसके पैरों के नीचे जमीन पर उसकी परछाई नहीं थी।

     

    और पीछे बंगले की खिड़की में खड़ी उसकी परछाई धीरे-धीरे मुस्कुरा रही थी।

     

    फिर जंगल के अंधेरे से एक आवाज आई—

     

    “अब असली खेल शुरू होगा।”

  • रात की आखिरी ट्रेन — पार्ट 3: टिकट चेकर

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    काली आकृति धीरे-धीरे आरव की तरफ बढ़ रही थी।

     

    उसके हाथ में पुरानी टिकट पंच करने वाली मशीन थी।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    हर कदम के साथ ट्रेन का फर्श कांप रहा था।

     

    आरव पीछे हटता गया।

     

    “तुम कौन हो?”

     

    आकृति ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसका चेहरा पूरी तरह खाली था। न आँखें, न नाक, न होंठ।

     

    लेकिन फिर भी आरव को महसूस हो रहा था कि वह उसे देख रही है।

     

    बूढ़े ने आरव के कान में कहा—

     

    “अपना टिकट मत देना।”

     

    “लेकिन आपने ही कहा था कि टिकट पंच करवाना होगा।”

     

    “हाँ… लेकिन उससे नहीं।”

     

    आरव ने टिकट अपनी मुट्ठी में कस लिया।

     

    काली आकृति उसके सामने आकर रुक गई।

     

    उसने हाथ आगे बढ़ाया।

     

    उसकी उंगलियाँ असामान्य रूप से लंबी थीं।

     

    फिर उसके हाथ से एक आवाज निकली—

     

    “टिकट।”

     

    आरव चुप रहा।

     

    आकृति ने फिर कहा—

     

    “टिकट।”

     

    इस बार उसकी आवाज इतनी भारी थी कि डिब्बे की खिड़कियाँ कांपने लगीं।

     

    अचानक पीछे से नैना की आवाज आई—

     

    “भैया, उसे टिकट दे दो।”

     

    आरव ने पीछे देखा।

     

    नैना दरवाजे पर खड़ी थी।

     

    लेकिन बूढ़ा जोर से चिल्लाया—

     

    “उसकी बात मत सुनना!”

     

    नैना का चेहरा अचानक बदल गया।

     

    उसकी आँखें काली हो गईं।

     

    “तुम हमेशा मेरी बात नहीं मानते थे, भैया।”

     

    आरव की आँखों में डर उतर आया।

     

    “तुम नैना नहीं हो।”

     

    वह हँसने लगी।

     

    “तो पहचान लिया?”

     

    उसका शरीर धीरे-धीरे धुएँ में बदल गया।

     

    कुछ ही सेकंड बाद वहाँ एक लंबी औरत खड़ी थी।

     

    उसने काली साड़ी पहन रखी थी।

     

    उसके बाल जमीन तक पहुंच रहे थे।

     

    बूढ़े ने कहा—

     

    “यही इस ट्रेन की मालकिन है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “इसका नाम क्या है?”

     

    बूढ़े ने बहुत धीमी आवाज में कहा—

     

    “निशा।”

     

    निशा ने हाथ उठाया।

     

    पूरी ट्रेन की लाइटें बंद हो गईं।

     

    अंधेरे में सिर्फ उसकी आवाज गूँजी—

     

    “तुम्हें लगता है तुम इस ट्रेन से बाहर जा सकते हो?”

     

    आरव ने जवाब दिया—

     

    “हाँ।”

     

    निशा हँसी।

     

    “हर यात्री यही सोचता है।”

     

    अचानक ट्रेन की दीवारों पर तस्वीरें दिखाई देने लगीं।

     

    आरव ने देखा—अलग-अलग लोग ट्रेन में बैठे थे।

     

    कुछ रो रहे थे।

     

    कुछ मदद मांग रहे थे।

     

    कुछ खिड़की से बाहर देख रहे थे।

     

    फिर हर तस्वीर में एक ही चीज हुई।

     

    उन सभी लोगों ने धीरे-धीरे अपनी परछाई खो दी।

     

    बूढ़े ने कहा—

     

    “यह ट्रेन लोगों को नहीं मारती।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तो?”

     

    “यह उनकी यादें खा जाती है।”

     

    “फिर?”

     

    “जब उन्हें अपने बारे में कुछ याद नहीं रहता, वे हमेशा के लिए इस ट्रेन के यात्री बन जाते हैं।”

     

    आरव ने अपनी जेब टटोली।

     

    उसे अचानक एहसास हुआ कि उसे अपनी माँ का चेहरा याद नहीं आ रहा था।

     

    उसने आँखें बंद कीं।

     

    उसे माँ की आवाज याद थी।

     

    लेकिन चेहरा…

     

    खाली।

     

    “नहीं…”

     

    वह घबराकर सिर पकड़कर बैठ गया।

     

    “मुझे माँ का चेहरा क्यों याद नहीं आ रहा?”

     

    बूढ़े ने कहा—

     

    “क्योंकि निशा तुम्हारी यादें ले रही है।”

     

    आरव ने टिकट देखा।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “वापसी — एक अवसर।”

     

    उसे कुछ याद आया।

     

    उसकी माँ ने स्टेशन पर जाते समय कहा था—

     

    “बेटा, अगर कभी डर लगे तो अपने बचपन की पहली याद याद करना।”

     

    आरव ने आँखें बंद कर लीं।

     

    उसे एक छोटा सा घर दिखाई दिया।

     

    बारिश हो रही थी।

     

    माँ उसे गोद में लेकर खिड़की के पास खड़ी थीं।

     

    फिर एक आवाज आई—

     

    “आरव, मेरी तरफ देखो।”

     

    आरव ने आँखें खोलीं।

     

    निशा सामने खड़ी थी।

     

    “तुम्हें अपनी यादें चाहिए?”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “तो मेरे साथ चलो।”

     

    निशा ट्रेन के आखिरी डिब्बे की ओर बढ़ गई।

     

    बूढ़े ने आरव को रोकने की कोशिश की।

     

    “मत जाना!”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “अगर मैं नहीं गया तो?”

     

    “तुम्हारी सारी यादें चली जाएंगी।”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर वह निशा के पीछे चल पड़ा।

     

    आखिरी डिब्बे में पहुंचकर निशा एक पुराने दरवाजे के सामने रुकी।

     

    दरवाजे पर लिखा था—

     

    “यादों का डिब्बा।”

     

    उसने दरवाजा खोला।

     

    अंदर सैकड़ों छोटे-छोटे शीशे हवा में तैर रहे थे।

     

    हर शीशे के अंदर किसी इंसान की एक याद थी।

     

    कहीं कोई बच्चा हँस रहा था।

     

    कहीं कोई माँ अपने बेटे को गले लगा रही थी।

     

    कहीं कोई बूढ़ा अपनी पत्नी का हाथ पकड़कर बैठा था।

     

    आरव ने एक शीशे में देखा।

     

    उसमें उसकी माँ दिखाई दी।

     

    “माँ!”

     

    वह शीशे की तरफ दौड़ा।

     

    लेकिन निशा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “यह याद तुम्हारी नहीं है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “फिर किसकी है?”

     

    निशा ने कहा—

     

    “उस आदमी की, जो तुम्हारे पहले इस ट्रेन में आया था।”

     

    तभी एक शीशा टूट गया।

     

    उसमें से एक बूढ़ी औरत की चीख निकली।

     

    निशा ने कहा—

     

    “हर यात्री की याद मेरे पास रहती है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तुम ऐसा क्यों करती हो?”

     

    निशा कुछ पल चुप रही।

     

    फिर बोली—

     

    “क्योंकि मैं भी कभी यात्री थी।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “क्या?”

     

    निशा ने अपनी कहानी बताई।

     

    दस साल पहले वह इसी ट्रेन में बैठी थी। उसके साथ उसका छोटा भाई था। ट्रेन में एक हादसा हुआ। उसका भाई मर गया, लेकिन निशा की आत्मा इस ट्रेन से बंध गई।

     

    तब से वह दूसरों की यादें चुराकर अपनी यादों को जिंदा रखती रही।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तो तुम्हें आजाद कैसे किया जा सकता है?”

     

    निशा मुस्कुराई।

     

    “किसी को अपनी सबसे प्यारी याद खुद छोड़नी होगी।”

     

    “कौन-सी याद?”

     

    “वही जिसे खोने से तुम्हें सबसे ज्यादा डर लगता है।”

     

    आरव समझ गया।

     

    उसे अपनी माँ की याद छोड़नी होगी।

     

    लेकिन तभी ट्रेन में जोरदार झटका लगा।

     

    सारे शीशे टूटने लगे।

     

    बूढ़े की आवाज आई—

     

    “आरव! जल्दी करो!”

     

    निशा ने कहा—

     

    “तुम्हारे पास केवल एक मिनट है।”

     

    आरव ने आँखें बंद कर लीं।

     

    उसने अपनी माँ का चेहरा याद किया।

     

    माँ मुस्कुरा रही थीं।

     

    फिर उसने धीरे से कहा—

     

    “माँ… मैं आपको भूलना नहीं चाहता।”

     

    उसकी आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “लेकिन अगर मेरी याद की वजह से कोई और हमेशा कैद रहेगा… तो मैं इसे छोड़ दूँगा।”

     

    उसने हाथ आगे बढ़ाया।

     

    एक चमकता हुआ शीशा उसके सामने आया।

     

    उसमें उसकी माँ का चेहरा था।

     

    आरव ने उसे छू लिया।

     

    शीशा टूट गया।

     

    पूरी ट्रेन रोशनी से भर गई।

     

    निशा चीखने लगी।

     

    और उसी पल ट्रेन की घंटी बजी—

     

    टन… टन… टन…

     

    लाउडस्पीकर से आवाज आई—

     

    “अगला स्टेशन… मृत्यु जंक्शन।”

     

    बूढ़े ने घबराकर कहा—

     

    “यह स्टेशन आ गया तो सब खत्म!”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “अब क्या होगा?”

     

    बूढ़े ने बाहर देखा।

     

    “अब हमें ट्रेन के इंजन तक जाना होगा।”

     

    “क्यों?”

     

    बूढ़े ने कहा—

     

    “क्योंकि इस ट्रेन को चलाने वाला कोई इंसान नहीं है।”

     

    “तो कौन है?”

     

    बूढ़े ने कांपते हुए कहा—

     

    “तुम्हारे पिता।”

  • रात की आखिरी ट्रेन — पार्ट 1: प्लेटफॉर्म नंबर 6

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    रात के करीब साढ़े ग्यारह बज रहे थे।शहर का पुराना रेलवे स्टेशन लगभग खाली हो चुका था। प्लेटफॉर्म पर इक्का-दुक्का यात्री ही दिखाई दे रहे थे। ठंडी हवा के कारण स्टेशन की पीली लाइटें बार-बार झपक रही थीं।

     

    आरव प्लेटफॉर्म नंबर 6 पर अकेला बैठा अपनी घड़ी देख रहा था।

     

    उसकी ट्रेन रात 11:55 पर आने वाली थी।

     

    आरव को अपने गाँव जाना था। उसकी माँ की तबीयत अचानक खराब हो गई थी, इसलिए वह ऑफिस से सीधे स्टेशन पहुंचा था।

     

    उसने मोबाइल निकाला।

     

    नेटवर्क गायब था।

     

    “अजीब है,” उसने खुद से कहा।

     

    स्टेशन पर इतनी भीड़ होने के बावजूद उसके फोन में नेटवर्क नहीं था।

     

    तभी लाउडस्पीकर से आवाज आई—

     

    “यात्रियों से अनुरोध है कि प्लेटफॉर्म नंबर 6 पर आने वाली ट्रेन के लिए तैयार रहें।”

     

    आरव ने राहत की सांस ली।

     

    लेकिन अगले ही पल उसे कुछ अजीब लगा।

     

    स्टेशन की बाकी सभी घड़ियाँ 11:55 दिखा रही थीं।

     

    उसकी घड़ी में भी 11:55 था।

     

    लेकिन ट्रेन नहीं आई।

     

    पाँच मिनट बीते।

     

    दस मिनट।

     

    फिर आधा घंटा।

     

    प्लेटफॉर्म धीरे-धीरे खाली होने लगा।

     

    आरव ने टिकट काउंटर की तरफ देखा।

     

    वहाँ बैठा कर्मचारी भी गायब था।

     

    चाय की दुकान बंद हो चुकी थी।

     

    सफाई करने वाला आदमी भी चला गया था।

     

    पूरा प्लेटफॉर्म सुनसान हो गया।

     

    आरव ने मोबाइल देखा।

     

    समय अभी भी 11:55 था।

     

    उसने घड़ी उतारी।

     

    घड़ी की सुइयाँ चल रही थीं।

     

    लेकिन समय आगे नहीं बढ़ रहा था।

     

    अचानक स्टेशन के दूसरे छोर से ट्रेन के आने की आवाज सुनाई दी।

     

    छुक… छुक… छुक…

     

    आरव खड़ा हो गया।

     

    दूर अंधेरे में एक ट्रेन दिखाई दी।

     

    उसकी सारी खिड़कियाँ काली थीं।

     

    कोई लाइट नहीं।

     

    कोई हॉर्न नहीं।

     

    ट्रेन धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म पर आकर रुक गई।

     

    दरवाजा अपने आप खुला।

     

    अंदर बैठे यात्रियों ने आरव की तरफ देखा।

     

    सभी बिल्कुल शांत थे।

     

    किसी के चेहरे पर कोई भाव नहीं था।

     

    आरव ने अपना टिकट देखा।

     

    टिकट पर ट्रेन का नाम लिखा था—

     

    “निशा एक्सप्रेस”

     

    लेकिन उसने ऐसी किसी ट्रेन का नाम पहले कभी नहीं सुना था।

     

    फिर भी उसके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था।

     

    वह ट्रेन में चढ़ गया।

     

    जैसे ही वह अंदर गया, दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

     

    डिब्बे में करीब बीस लोग बैठे थे।

     

    सभी लोग सीधे सामने देख रहे थे।

     

    कोई बात नहीं कर रहा था।

     

    आरव ने एक खाली सीट देखकर बैठने की कोशिश की।

     

    तभी सामने बैठे एक बूढ़े आदमी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “यहाँ मत बैठो।”

     

    आरव घबरा गया।

     

    “क्यों?”

     

    बूढ़े ने धीमी आवाज में कहा—

     

    “क्योंकि यह सीट किसी और की है।”

     

    आरव ने सीट की तरफ देखा।

     

    सीट खाली थी।

     

    “किसकी?”

     

    बूढ़े ने खिड़की की तरफ देखा।

     

    “जो अभी आएगा।”

     

    आरव ने मजाक समझकर बात टाल दी।

     

    कुछ देर बाद ट्रेन चल पड़ी।

     

    लेकिन बाहर कोई स्टेशन, शहर या सड़क दिखाई नहीं दे रही थी।

     

    सिर्फ घना अंधेरा।

     

    आरव ने मोबाइल निकाला।

     

    अब उसमें नेटवर्क था।

     

    लेकिन स्क्रीन पर एक अजीब मैसेज आया—

     

    “आपका गंतव्य: मृत्यु जंक्शन।”

     

    आरव के हाथ कांपने लगे।

     

    उसने मैसेज हटाया।

     

    कुछ सेकंड बाद वही मैसेज फिर आया।

     

    फिर तीसरी बार।

     

    तभी सामने बैठे बूढ़े आदमी ने कहा—

     

    “पहली बार आए हो?”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “आपको कैसे पता?”

     

    बूढ़ा मुस्कुराया।

     

    “जो पहली बार आता है, वही मोबाइल देखता है।”

     

    “आप कितनी बार आए हैं?”

     

    बूढ़े ने जवाब नहीं दिया।

     

    उसने सिर्फ अपनी कलाई दिखाई।

     

    उसकी कलाई पर टिकट की तरह एक काला निशान बना हुआ था।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “ये क्या है?”

     

    बूढ़े ने कहा—

     

    “वापसी का टिकट।”

     

    आरव कुछ समझ पाता, उससे पहले ट्रेन अचानक रुक गई।

     

    चीईईईं…

     

    सभी यात्री एक साथ अपनी सीट से उठ खड़े हुए।

     

    दरवाजे खुल गए।

     

    बाहर स्टेशन था।

     

    लेकिन स्टेशन का नाम देखकर आरव के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    बोर्ड पर लिखा था—

     

    “भैरव घाट स्टेशन”

     

    आरव ने मोबाइल में समय देखा।

     

    11:55

     

    अब भी वही समय।

     

    सामने बैठे बूढ़े ने धीरे से कहा—

     

    “अब फैसला करना होगा।”

     

    “कैसा फैसला?”

     

    बूढ़े ने ट्रेन के बाहर देखा।

     

    “अगर तुम इस स्टेशन पर उतर गए… तो वापस कभी नहीं चढ़ पाओगे।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “और अगर नहीं उतरा?”

     

    बूढ़े ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

     

    “तो ट्रेन तुम्हें वहाँ ले जाएगी जहाँ से कोई वापस नहीं आता।”

     

    तभी प्लेटफॉर्म पर एक लड़की दिखाई दी।

     

    उसने सफेद कपड़े पहने थे।

     

    वह बिल्कुल स्थिर खड़ी थी।

     

    आरव ने उसे देखा।

     

    लड़की ने धीरे-धीरे अपना चेहरा उठाया।

     

    उसका चेहरा देखकर आरव की सांस रुक गई।

     

    वह लड़की…

     

    आरव की छोटी बहन जैसी दिख रही थी, जिसकी मौत दस साल पहले हो चुकी थी।

     

    लड़की ने मुस्कुराकर हाथ हिलाया।

     

    फिर उसके होंठ हिले—

     

    “भैया… मुझे लेने क्यों नहीं आए?”

     

    आरव सीट से उठ गया।

     

    बूढ़े ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मत उतरना!”

     

    लेकिन आरव ने उसकी पकड़ छुड़ा दी।

     

    और जैसे ही उसने ट्रेन के दरवाजे की तरफ कदम बढ़ाया…

     

    पूरे डिब्बे में बैठे यात्रियों ने एक साथ उसकी तरफ देखा।

     

    उन सबके चेहरे पर अब मुस्कान थी।

     

    और बूढ़े ने आखिरी बार कहा—

     

    “अब तुम भी उनमें से एक हो।”

  • काला साया — भाग 3

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

     

     

    अगली रात दोनों दोस्त टॉर्च लेकर पुराने मकान के सामने खड़े थे।

     

    आसमान में बादल थे। हवा ठंडी थी और पेड़ों की शाखाएँ लगातार खिड़कियों से टकरा रही थीं।

     

    कबीर ने कहा, “अगर कुछ भी अजीब लगे तो हम तुरंत वापस चले जाएँगे।”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    दरवाज़ा पहले से खुला था।

     

    दोनों अंदर गए।

     

    अंदर वही सन्नाटा था।

     

    लेकिन इस बार दीवारों पर लगी तस्वीरें अलग लग रही थीं।

     

    कबीर ने टॉर्च एक तस्वीर पर डाली।

     

    वह साया की तस्वीर थी।

     

    फिर उसने दूसरी तस्वीर देखी।

     

    उसमें साया अपने पति के साथ खड़ी थी।

     

    लेकिन तस्वीर में पति का चेहरा काले धब्बे से ढका हुआ था।

     

    “ये किसने किया होगा?” कबीर ने पूछा।

     

    आरव ने डायरी का नक्शा निकाला।

     

    “नीचे जाना है।”

     

    दोनों फर्श के एक पुराने हिस्से तक पहुँचे। नक्शे में बने निशान से जगह मिलती थी।

     

    कबीर ने लकड़ी हटाई।

     

    नीचे जाने वाली सीढ़ियाँ दिखाई दीं।

     

    जैसे ही वे नीचे उतरे, हवा अचानक बर्फ जैसी ठंडी हो गई।

     

    कमरे के अंदर पुरानी वस्तुएँ पड़ी थीं।

     

    बीच में एक लोहे का संदूक था।

     

    आरव ने उसे खोला।

     

    अंदर कई पुराने कागज़, कुछ तस्वीरें और एक लाल कपड़े में बंधी डायरी थी।

     

    कबीर ने डायरी खोली।

     

    उसमें साया की लिखावट थी।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “जिस रात मैं यह लिख रही हूँ, मुझे पता है कि शायद मैं सुबह तक जीवित न रहूँ।”

     

    दोनों ध्यान से पढ़ने लगे।

     

    साया ने लिखा था कि उसका पति उसे उस पुराने कमरे में ले गया था। उसने बताया था कि वर्षों पहले उनके परिवार ने धन और शक्ति पाने के लिए एक तांत्रिक से अनुष्ठान करवाया था।

     

    लेकिन अनुष्ठान के दौरान एक आत्मा को बुलाया गया और फिर उसे वापस भेजने का तरीका पूरा नहीं किया गया।

     

    उस आत्मा को “काला साया” कहा जाता था।

     

    वह आत्मा किसी एक व्यक्ति की नहीं थी।

     

    वह उन लोगों के डर, लालच और हिंसा से बनी एक भयावह शक्ति थी, जो वर्षों से उस मकान में मरते रहे थे।

     

    साया के पति ने उस आत्मा का इस्तेमाल लोगों को डराने और जमीन हड़पने के लिए किया था।

     

    लेकिन साया को सब पता चल गया।

     

    उसने विरोध किया।

     

    उस रात उसके पति ने उसे इसी कमरे में बंद कर दिया।

     

    डायरी के अगले पन्ने पर शब्द काँपती हुई लिखावट में थे—

     

    “मैंने दरवाज़े के पीछे उसे देखा। वह इंसान नहीं था। सिर्फ़ काली परछाईं थी। उसने मुझसे कहा कि अगर मैं उसका नाम भूल गई तो वह मुझे हमेशा के लिए अपने साथ बाँध लेगी।”

     

    फिर लिखा था—

     

    “मैंने आखिरी कोशिश की। मैंने उसकी परछाईं को शीशे में बंद कर दिया। लेकिन मुझे अपनी जान देनी पड़ी।”

     

    आरव ने काँपते हुए पूछा, “तो साया मर गई थी?”

     

    कबीर ने अगला पन्ना पढ़ा।

     

    “हाँ।”

     

    कमरे में अचानक किसी के चलने की आवाज़ आई।

     

    छन…

     

    छन…

     

    छन…

     

    दोनों पीछे मुड़े।

     

    दरवाज़े पर साया खड़ी थी।

     

    इस बार उसका चेहरा साफ़ दिखाई दे रहा था।

     

    वह डरावनी कम और दुखी ज़्यादा लग रही थी।

     

    उसकी आँखों से काले आँसू बह रहे थे।

     

    उसने धीरे से कहा—

     

    “मैंने तुम्हें इसलिए बुलाया क्योंकि मेरा सच किसी ने नहीं सुना।”

     

    आरव ने पूछा, “तुम्हें मुक्ति क्यों नहीं मिली?”

     

    साया ने कमरे के एक कोने की तरफ़ देखा।

     

    वहाँ एक टूटा हुआ आईना रखा था।

     

    “काला साया अभी भी उस आईने में कैद है।”

     

    कबीर ने आईना उठाया।

     

    उसमें दोनों की परछाईं दिखाई दी।

     

    लेकिन उनके बीच एक तीसरी परछाईं भी थी।

     

    लंबी।

     

    टेढ़ी।

     

    और बिना चेहरे की।

     

    अचानक आईना काँपने लगा।

     

    कमरे की सारी बत्तियाँ, जो बंद थीं, एक साथ जल उठीं।

     

    तीसरी परछाईं आईने से बाहर निकलने लगी।

     

    कबीर ने आईना छोड़ दिया।

     

    शीशा टूट गया।

     

    और कमरे में काला धुआँ फैल गया।

     

    धुएँ के बीच एक आवाज़ गूँजी—

     

    “तुमने मुझे फिर जगा दिया…”

     

    आरव ने डायरी के आखिरी पन्ने को देखा।

     

    वहाँ एक तरीका लिखा था।

     

    काले साये को मुक्त करने के लिए उस कमरे में रखे पुराने दीपक को जलाना था, साया का असली नाम लेना था और उसके साथ हुए अपराध का सच गाँव के सामने बताना था।

     

    लेकिन एक शर्त थी।

     

    जिस व्यक्ति ने सच पढ़ा है, उसे उस आत्मा का डर स्वीकार करना होगा।

     

    आरव ने दीपक उठाया।

     

    उसने माचिस जलाई।

     

    दीपक जलते ही काला धुआँ पीछे हट गया।

     

    साया की आत्मा कुछ पल के लिए शांत हो गई।

     

    उसने आरव से कहा—

     

    “सच बाहर लाओ… तभी मैं जा पाऊँगी।”

     

    फिर वह गायब हो गई।

     

    कमरे में सिर्फ़ टूटा हुआ आईना पड़ा था।

     

    लेकिन आईने के टुकड़े में अब भी वह काली परछाईं दिखाई दे रही थी।

     

    और उसकी आँखें आरव को घूर रही थीं।

     

    अब आखिरी काम बाकी था।

     

    उन्हें सुबह होते ही पूरे गाँव के सामने साया की कहानी बतानी थी।

     

    लेकिन उन्हें नहीं पता था कि काला साया उन्हें इतनी आसानी से जाने देगा या नहीं।

  • काला साया — भाग 2

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    अगली सुबह बारिश रुक चुकी थी, लेकिन आरव के मन में रात का डर अब भी जिंदा था।

     

    उसने कलाई पर बने काले निशान को कई बार साबुन से धोया, मगर वह निशान ज़रा भी हल्का नहीं हुआ। उसकी माँ ने पूछा तो उसने कह दिया कि बाइक से गिरने के कारण चोट लग गई है।

     

    लेकिन आरव जानता था कि वह झूठ बोल रहा है।

     

    दोपहर में उसका बचपन का दोस्त कबीर घर आया। आरव ने उसे पिछली रात की पूरी घटना बताई।

     

    कबीर कुछ देर चुप रहा।

     

    “तुमने उस घर में साया की तस्वीर देखी थी?”

     

    “हाँ।”

     

    कबीर का चेहरा बदल गया।

     

    “आरव, वह घर बीस साल से बंद है।”

     

    “लेकिन वहाँ कोई रहता था?”

     

    “रहता नहीं था… रहती थी।”

     

    “कौन?”

     

    कबीर ने धीमी आवाज़ में कहा, “साया।”

     

    साया गाँव की रहने वाली एक लड़की थी। लगभग बीस साल पहले उसकी शादी शहर में हुई थी। लेकिन शादी के कुछ महीनों बाद वह अचानक गायब हो गई।

     

    गाँव वालों ने कहा था कि वह अपने पति के साथ भाग गई।

     

    लेकिन कहानी इतनी आसान नहीं थी।

     

    साया की छोटी बहन ने बताया था कि शादी के बाद साया कई बार अपने घर लौटना चाहती थी। वह कहती थी कि उसके ससुराल के पास एक पुराना मकान है, जहाँ रात को कोई उसे बुलाता है।

     

    एक दिन उसने अपनी बहन से कहा था—

     

    “वहाँ मेरा साया नहीं है… किसी और का साया है।”

     

    इसके बाद साया गायब हो गई।

     

    कुछ दिनों बाद गाँव के लोगों ने उसी पुराने मकान के पास उसकी चूड़ियाँ और पायल पाई थीं।

     

    फिर मकान बंद कर दिया गया।

     

    कबीर ने कहा, “लोग कहते हैं कि साया की आत्मा वहीं भटकती है।”

     

    आरव ने अपनी कलाई का निशान दिखाया।

     

    कबीर का चेहरा पीला पड़ गया।

     

    “यह निशान… मैंने पहले भी देखा है।”

     

    “कहाँ?”

     

    “पुरानी हवेली के चौकीदार के हाथ पर।”

     

    दोनों उसी शाम गाँव के सबसे बुज़ुर्ग व्यक्ति ठाकुर दीनदयाल के पास पहुँचे।

     

    उन्होंने साया का नाम सुनते ही दरवाज़ा बंद कर दिया।

     

    “तुम दोनों वहाँ गए थे?”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    बुज़ुर्ग ने लंबी साँस ली।

     

    “तो अब वह तुम्हें जाने नहीं देगी।”

     

    “क्यों?” आरव ने पूछा।

     

    दीनदयाल ने बताया कि साया की मौत साधारण नहीं थी।

     

    शादी के बाद उसके पति ने गाँव के बाहर बने उस मकान को अपने कारोबार के लिए इस्तेमाल करना शुरू किया था। लेकिन वहाँ पहले से ही एक पुराना कमरा था, जिसे हमेशा बंद रखा जाता था।

     

    साया ने एक रात वह कमरा खोल दिया था।

     

    अंदर उसे एक पुरानी डायरी मिली थी।

     

    डायरी में लिखा था कि कई साल पहले एक तांत्रिक ने उस घर में किसी आत्मा को बाँधने की कोशिश की थी। लेकिन अनुष्ठान अधूरा रह गया था। आत्मा पूरी तरह बंधी भी नहीं और मुक्त भी नहीं हुई।

     

    उस आत्मा को लोग काला साया कहते थे।

     

    वह किसी इंसान के शरीर पर अपना प्रभाव डाल सकती थी।

     

    दीनदयाल ने कहा, “साया ने उस कमरे का राज़ जान लिया था। उसके बाद वह बदलने लगी।”

     

    “क्या उसके पति ने उसे मार दिया?” आरव ने पूछा।

     

    बुज़ुर्ग ने उत्तर नहीं दिया।

     

    कुछ देर बाद उन्होंने कहा, “अगर सच जानना है तो उस घर में वापस जाना होगा।”

     

    आरव डर गया।

     

    उसी रात उसके कमरे की खिड़की पर तीन बार दस्तक हुई।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    आरव ने पर्दा हटाया।

     

    बाहर कोई नहीं था।

     

    फिर उसने नीचे देखा।

     

    कीचड़ में दो पैरों के निशान थे।

     

    वे निशान खिड़की के नीचे से शुरू होकर घर के अंदर जाने वाले दरवाज़े तक जा रहे थे।

     

    आरव ने पीछे देखा।

     

    उसकी माँ सो रही थी।

     

    तभी उसके कमरे के कोने से किसी लड़की के रोने की आवाज़ आई।

     

    “मुझे… बाहर निकालो…”

     

    आरव ने कमरे की बत्ती जलाई।

     

    कोई नहीं था।

     

    लेकिन उसके बिस्तर पर वही पुरानी डायरी पड़ी थी।

     

    जिसे उसने कभी देखा तक नहीं था।

     

    उसने डायरी खोली।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “अगर यह डायरी तुम्हारे हाथ में है, तो साया ने तुम्हें चुन लिया है।”

     

    आरव के हाथ काँपने लगे।

     

    अगले पन्ने पर एक नक्शा बना था।

     

    उसमें उसी पुराने मकान का चित्र था और नीचे एक निशान।

     

    निशान के पास लिखा था—

     

    “नीचे का कमरा।”

     

    अचानक डायरी के पन्ने अपने आप पलटने लगे।

     

    आखिरी पन्ने पर सिर्फ़ एक वाक्य लिखा था—

     

    “मेरी आत्मा को नहीं, मेरे सच को मुक्त करो।”

     

    उसी क्षण कमरे की खिड़की अपने आप खुल गई।

     

    बाहर फिर बारिश शुरू हो चुकी थी।

     

    बारिश की बूंदों के बीच आरव ने दूर पुराने मकान की छत पर एक औरत को खड़े देखा।

     

    काले कपड़े।

     

    खुले बाल।

     

    सफ़ेद आँखें।

     

    साया उसे देख रही थी।

     

    और फिर उसने अपनी उँगली से नीचे की तरफ़ इशारा किया।

     

    उस पुराने मकान के नीचे।

     

    उस बंद कमरे की तरफ़।

     

    आरव समझ गया कि अगली रात उसे वहाँ वापस जाना होगा।

     

    लेकिन इस बार वह अकेला नहीं जाएगा।

     

    कबीर उसके साथ होगा।

     

    और उन्हें उस कमरे में छिपा सच ढूँढना होगा।

     

    क्योंकि अब सवाल सिर्फ़ साया की आत्मा का नहीं था।

     

    सवाल यह था कि काला साया आखिर किसका था।

  • आहट — उस बंद कमरे का राज़ (part-4)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

     

     

    दीनानाथ की बात सुनकर आरव कुछ पल तक उसे देखता रहा।

     

    “देवेंद्र वापस आ गया है… इसका मतलब क्या है?”

     

    दीनानाथ ने दरवाज़ा बंद किया और धीरे से कहा—

     

    “जिसे तुमने तहखाने में देखा, वह देवेंद्र की आत्मा थी।”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं। मैंने उसे देखा था। वह इंसान की तरह था।”

     

    “यही तो उसकी ताकत है।”

     

    दीनानाथ ने जेब से एक पुरानी चाबी निकाली।

     

    “लेकिन अब हमारे पास ज्यादा समय नहीं है।”

     

    “कहाँ जाना है?”

     

    “तुम्हारे पिता के कमरे में।”

     

    दोनों हवेली के दूसरी मंज़िल पर पहुँचे।

     

    दीनानाथ ने एक पुराने कमरे का ताला खोला।

     

    कमरे में एक बड़ी मेज़, पुरानी किताबें और लकड़ी की अलमारी थी।

     

    आरव ने दीवार पर अपने पिता की तस्वीर देखी।

     

    उसके नीचे एक तारीख लिखी थी—

     

    18 जुलाई 1998।

     

    दीनानाथ ने कहा—

     

    “तुम्हारे पिता ने मीरा को मारने की कोशिश नहीं की थी। वह उसे बचाना चाहते थे।”

     

    “तो फिर मीरा मरी कैसे?”

     

    दीनानाथ कुछ देर चुप रहा।

     

    “उस रात देवेंद्र को पता चल गया था कि मीरा माँ बनने वाली है।”

     

    आरव ध्यान से सुनने लगा।

     

    “देवेंद्र तुम्हारे पिता का बड़ा भाई था। उसे लगता था कि परिवार की सारी संपत्ति उसी की होगी। लेकिन तुम्हारे दादा ने अपनी वसीयत बदल दी थी। उन्होंने तय किया था कि पूरी संपत्ति उस बच्चे के नाम होगी जो मीरा से पैदा होने वाला था।”

     

    आरव की आँखें फैल गईं।

     

    “इसलिए उसने बच्चे को मारने की कोशिश की?”

     

    “हाँ।”

     

    “फिर?”

     

    दीनानाथ ने एक पुरानी डायरी मेज़ पर रख दी।

     

    “यह तुम्हारे पिता की डायरी है।”

     

    आरव ने डायरी खोली।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “17 जुलाई की रात।”

     

    “आज मीरा को प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। डॉक्टर को हवेली तक आने में देर हो रही है। देवेंद्र लगातार घर के आसपास घूम रहा है। मुझे डर है कि वह कुछ कर सकता है।”

     

    अगले पन्ने पर लिखा था—

     

    “रात 11:40 बजे।”

     

    “बच्चा पैदा हो चुका है। मीरा और बच्चा सुरक्षित हैं। लेकिन देवेंद्र ने दरवाज़ा तोड़ने की कोशिश शुरू कर दी है।”

     

    फिर एक पन्ना खाली था।

     

    उसके बाद लिखा था—

     

    “रात 12:05 बजे।”

     

    “देवेंद्र अंदर आ गया। उसने बच्चे को छीनने की कोशिश की। मीरा ने बच्चे को बचाने के लिए खुद को उसके सामने खड़ा कर दिया।”

     

    आरव की आँखों में आँसू आ गए।

     

    अगले शब्द पढ़ते हुए उसके हाथ काँपने लगे।

     

    “देवेंद्र ने मीरा को धक्का दिया। उसका सिर पत्थर की मेज़ से टकराया। वह वहीं गिर गई।”

     

    आरव ने डायरी बंद कर दी।

     

    “और मेरे पिता?”

     

    दीनानाथ ने कहा—

     

    “तुम्हारे पिता देवेंद्र से लड़ने लगे। लेकिन तब तक मीरा की साँसें बंद हो चुकी थीं।”

     

    आरव की आँखों के सामने मीरा का चेहरा घूमने लगा।

     

    “फिर मुझे किसने बचाया?”

     

    दीनानाथ ने उत्तर दिया—

     

    “तुम्हारे पिता ने।”

     

    “लेकिन मेरी परवरिश तो मेरी माँ ने की थी।”

     

    दीनानाथ ने धीरे से कहा—

     

    “जिसे तुम माँ समझते रहे… वह मीरा की बड़ी बहन थी।”

     

    आरव के पैरों के नीचे से जैसे जमीन निकल गई।

     

    “क्या?”

     

    “मीरा की बहन ने तुम्हें अपना बच्चा बनाकर पाला। तुम्हारे पिता ने तुम्हारी पहचान छिपा दी ताकि देवेंद्र तुम्हें कभी ढूँढ़ न सके।”

     

    आरव कुछ बोल नहीं पाया।

     

    तभी कमरे की खिड़की अपने आप बंद हो गई।

     

    धड़ाम!

     

    दीनानाथ ने तुरंत पीछे देखा।

     

    कमरे के कोने में किसी की परछाईं खड़ी थी।

     

    “वह आ गया।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कौन?”

     

    परछाईं धीरे-धीरे आगे बढ़ी।

     

    वही आदमी।

     

    देवेंद्र।

     

    उसका चेहरा अब पहले से भी ज्यादा डरावना था।

     

    “तुम्हें सच नहीं जानना चाहिए था।”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    दीनानाथ ने बंदूक उठाई और गोली चला दी।

     

    धाँय!

     

    गोली देवेंद्र के शरीर से आर-पार निकल गई।

     

    लेकिन वह वहीं खड़ा रहा।

     

    उसने दीनानाथ की ओर देखा।

     

    “तुमने उस रात भी मुझे रोकने की कोशिश की थी।”

     

    दीनानाथ काँपने लगा।

     

    “मैंने गलती की थी।”

     

    देवेंद्र हँसा।

     

    “गलती?”

     

    अचानक कमरे का दरवाज़ा बंद हो गया।

     

    दीनानाथ हवा में उठ गया और दीवार से जा टकराया।

     

    आरव ने चिल्लाकर कहा—

     

    “उसे छोड़ दो!”

     

    देवेंद्र उसकी ओर मुड़ा।

     

    “तुम्हारे पिता ने मुझे हराने की कोशिश की थी। उन्होंने मुझे इस हवेली के तहखाने में बंद कर दिया था। लेकिन वे यह नहीं जानते थे कि मैं मरने के बाद भी वापस आ सकता हूँ।”

     

    “तुम मुझसे क्या चाहते हो?”

     

    देवेंद्र मुस्कुराया।

     

    “तुम्हारा खून।”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि संपत्ति का अधिकार तुम्हारे पास है। तुम्हारे मरते ही वह अधिकार खत्म हो जाएगा।”

     

    देवेंद्र ने हाथ उठाया।

     

    आरव अचानक जमीन से उठने लगा।

     

    उसकी साँस रुकने लगी।

     

    तभी कमरे में मीरा की आवाज़ गूँजी—

     

    “उसे मत छूना!”

     

    देवेंद्र रुक गया।

     

    कमरे में ठंडी हवा फैल गई।

     

    मीरा की आत्मा आरव और देवेंद्र के बीच खड़ी थी।

     

    “तुमने मेरा बच्चा मुझसे छीना था।”

     

    देवेंद्र हँसा।

     

    “और अब मैं उसे भी छीन लूँगा।”

     

    मीरा की आँखें लाल हो गईं।

     

    अचानक दीवारों से कई हाथ निकलने लगे।

     

    देवेंद्र पीछे हट गया।

     

    “नहीं!”

     

    मीरा ने आरव से कहा—

     

    “भागो!”

     

    आरव ने दीनानाथ को उठाया और दोनों दरवाज़े की ओर दौड़े।

     

    लेकिन दरवाज़ा खुलने से पहले ही मीरा ने चीखकर कहा—

     

    “आरव, अपने पिता की कब्र के नीचे देखना!”

     

    दरवाज़ा खुल गया।

     

    आरव और दीनानाथ बाहर निकल गए।

     

    कुछ देर बाद पीछे से जोरदार धमाका हुआ।

     

    पूरी हवेली काँप उठी।

     

    आरव ने पीछे देखा।

     

    तीसरी मंज़िल की खिड़की में मीरा खड़ी थी।

     

    उसने हाथ उठाकर आरव को इशारा किया।

     

    फिर खिड़की के पीछे अंधेरा छा गया।

     

    दीनानाथ ने कहा—

     

    “अब तुम्हें अपने पिता की कब्र पर जाना होगा।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि इस पूरी कहानी का आखिरी सच वहीं छिपा है।”

     

    अगली सुबह दोनों कब्रिस्तान पहुँचे।

     

    आरव अपने पिता की कब्र के सामने खड़ा था।

     

    उसने मिट्टी हटानी शुरू की।

     

    कुछ देर बाद फावड़ा किसी लोहे की चीज़ से टकराया।

     

    ठन!

     

    आरव ने मिट्टी हटाई।

     

    वहाँ एक लोहे का छोटा संदूक था।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “आरव के लिए — जब वह सच जानने के योग्य हो जाए।”

     

    आरव ने संदूक खोला।

     

    अंदर एक वीडियो कैमरा, कुछ कागज़ और एक छोटी सी चाबी थी।

     

    लेकिन सबसे ऊपर एक चिट्ठी रखी थी।

     

    आरव ने काँपते हाथों से चिट्ठी खोली।

     

    पहली लाइन पढ़ते ही उसकी साँस रुक गई—

     

    “आरव, अगर तुम यह पढ़ रहे हो, तो समझ लो कि मीरा अब तुम्हें बचाने के लिए वापस आ चुकी है।”

     

    लेकिन चिट्ठी की आखिरी लाइन ने आरव को अंदर तक हिला दिया—

     

    “देवेंद्र से तुम्हारा रिश्ता जितना तुम सोचते हो, उससे कहीं ज्यादा गहरा है।”

     

    आरव ने सिर उठाकर दीनानाथ की ओर देखा।

     

    दीनानाथ के चेहरे पर डर था।

     

    “इसका मतलब क्या है?”

     

    दीनानाथ ने काँपती आवाज़ में कहा—

     

    “इसका मतलब… देवेंद्र सिर्फ तुम्हारे चाचा नहीं थे।”

     

    अचानक पीछे से वही आहट सुनाई दी।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    आरव ने पलटकर देखा।

     

    कब्रिस्तान में कोई नहीं था।

     

    लेकिन उसके पिता की कब्र के पीछे एक नई कब्र दिखाई दे रही थी।

     

    उस पर नाम लिखा था—

     

    “देवेंद्र राघव सिंह।”

     

    और नीचे तारीख थी—

     

    17 जुलाई 1998।

     

    आरव के हाथ से चिट्ठी गिर गई।

     

    क्योंकि उसी क्षण उसके पीछे किसी ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “बेटा…”

     

    आरव ने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा।

     

    और वहाँ…

     

    उसका अपना पिता खड़ा था।