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Dil sabhal ja jara part – 14

पढ़ने का समय : 7 मिनट

Part – 14: “अनकहे वादे”

शिमला की बर्फ अब पूरी तरह जम चुकी थी। सड़कें सफेद चादर ओढ़े थीं, और ठाकुर हाउस का लॉन एक बर्फीला मैदान बन गया था। प्रिया और आरव के बीच वो रात की बात – वो अनकहा कन्फेशन – अब हवा में तैर रही थी। दोनों एक-दूसरे से बचते थे, लेकिन बचना मुश्किल हो रहा था। प्रिया कॉलेज जाती, आरव काम पर – लेकिन हर शाम घर लौटने पर नजरें मिल ही जातीं। वो नजरें जो पहले भाई-बहन वाली थीं, अब कुछ और कहने लगी थीं। प्रिया का मन उलझा था। आरव का एहसास जानकर उसे डर लगता था, लेकिन साथ ही एक अजीब सा सुकून भी मिलता। “भैया… तुम्हारा प्यार… क्या वो सच्चा है? या सिर्फ सालों की कमी का दर्द?”

आरव के लिए हर दिन एक जंग था। सुबह उठते ही वो खुद से वादा करता – “आज प्रिया से दूर रहूंगा। उसे कन्फ्यूज नहीं करूंगा।” लेकिन शाम होते-होते मन हार मान लेता। प्रिया की हंसी सुनकर, उसकी छोटी-छोटी आदतें देखकर – जैसे वो चाय बनाते वक्त बालों को पीछे करना – आरव का दिल पिघल जाता। वो जानता था कि ये एहसास गलत नहीं, लेकिन समाज, फैमिली, और प्रिया के मन का बोझ इसे मुश्किल बना रहा था। रात को वो अपनी डायरी में लिखता – “प्रिया, तू मेरी बहन थी, लेकिन अब… अब तू मेरी दुनिया है। मैं कैसे कहूं कि मैं बिना तेरे के अधूरा हूं? लेकिन अगर तू खुश नहीं हुई तो ये प्यार शाप बनेगा।”

एक सुबह ब्रेकफास्ट टेबल पर रिया ने फिर कॉमेडी शुरू की। “प्रिया, आज विक्रांत का मैसेज आया? वो तो रोज पूछता है – ‘प्रिया कहां है?’ लगता है प्रपोजल प्लान कर रहा है!”

प्रिया ने चाय का कप रखा। “रिया, चुप कर। अभी कुछ नहीं।”

राजेश पापा ने अखबार से नजरें हटाईं। “प्रिया बेटी, विक्रांत अच्छा लड़का लगता है। लेकिन जल्दबाजी मत करना। जिंदगी लंबी है।”

आदित्य अंकल ने मुस्कुराकर कहा, “हां बेटी। दिल की सुन, लेकिन दिमाग से सोच।”

आरव चुपचाप बैठा था। रिया की बात सुनकर उसका चेहरा सख्त हो गया। वो उठा और बोला, “मैं ऑफिस जा रहा हूं।”

प्रिया ने पुकारा, “भैया, ड्रॉप कर दूं कॉलेज?”

आरव ने पीठ फेरते हुए कहा, “नहीं प्रिया। तू रिया के साथ जा।”

प्रिया का दिल बैठ गया। आरव की दूरी अब दर्द दे रही थी।

कॉलेज में विक्रांत इंतजार कर रहा था। “प्रिया, कल का प्रोजेक्ट कंपलीट हो गया? चल, लाइब्रेरी में देखते हैं।”

प्रिया ने हां कहा। दोनों लाइब्रेरी के कोने में बैठे। विक्रांत ने किताबें खोलीं। “प्रिया, तू आजकल चुप क्यों लग रही है? कुछ हुआ?”

प्रिया ने मुस्कुराने की कोशिश की। “बस, फैमिली मैटर्स। एग्जाम भी हैं।”

विक्रांत ने उसका हाथ धीरे से छुआ। “प्रिया, तू मेरी सबसे अच्छी दोस्त है। अगर कुछ शेयर करना हो तो बता।”

प्रिया ने हाथ हटा लिया। विक्रांत अच्छा था – सच्चा, सपोर्टिव। लेकिन उसके स्पर्श में वो स्पार्क नहीं था जो आरव की नजरों में था। “विक्रांत, थैंक्स। लेकिन अभी… अभी सब कुछ सेटल नहीं हुआ।”

विक्रांत ने सिर हिलाया। “कोई बात नहीं। मैं इंतजार करूंगा। दोस्ती से ज्यादा कुछ मत समझना।”

दोपहर को अवनी ने फिर अपना जाल बिछाया। वो प्रिया के पास आई। “प्रिया, विक्रांत से सावधान रह। उसकी दादी ने ही तेरी मां को फंसाया था। विक्रम ने प्रूफ भेजा है – पुराना कोर्ट केस।”

प्रिया ने फाइल ली। अंदर पुराने पेपर्स थे – 1990 का एक केस, जहां राठौर फैमिली ने ठाकुर होटल्स पर जमीन हड़पने का आरोप लगाया था। लेकिन प्रिया को शक हुआ। “अवनी, ये पुरानी बातें क्यों उछाल रही हो?”

अवनी ने मुस्कुराया। “बस, सच्चाई जानना चाहती हूं। आरव को भी दिखा दे। वो तो विक्रांत से जलता ही है।”

प्रिया घर लौटी। आरव को फाइल दिखाई। आरव ने पढ़ी। उसका गुस्सा फिर भड़क गया। “प्रिया, मैंने कहा था विक्रांत से दूर रह। ये फैमिली दुश्मन है।”

प्रिया ने कहा, “भैया, ये झूठा प्रूफ लगता है। विक्रांत ने कुछ नहीं किया।”

आरव चीखा, “तू उसे बचाती क्यों है? क्या वो तुझे पसंद है?”

प्रिया रो पड़ी। “भैया… तुम्हारा गुस्सा… सिर्फ दुश्मनी का नहीं लगता।”

आरव चुप हो गया। वो कमरे से बाहर निकल गया। लॉन में खड़ा हो गया। बर्फ में कदम रखे। ठंड काट रही थी, लेकिन अंदर का दर्द ज्यादा था। “प्रिया… मैं तुझे खो दूंगा। विक्रांत को। या खुद को। ये जंग… कब खत्म होगी?”

रात को प्रिया आरव के कमरे में गई। दरवाजा खुला था। आरव डायरी लिख रहा था। प्रिया ने देखा – “प्रिया, तू मेरी कमजोरी है। मैं तुझे प्यार करता हूं, लेकिन ये प्यार मुझे मार रहा है। बहन का रिश्ता टूटने का डर, प्यार का बोझ – सब मिलकर मुझे तोड़ रहे हैं। मैं तुझे खुश देखना चाहता हूं, लेकिन खुद को क्यों नहीं बचा पा रहा?”

प्रिया की आंखें भर आईं। “भैया… ये पढ़ लिया।”

आरव चौंका। डायरी बंद की। “प्रिया… सॉरी। तू मत पढ़ती।”

प्रिया उसके पास बैठी। “भैया, तुम्हारी जंग… अकेले क्यों लड़ रहे हो? मैं भी लड़ रही हूं। तुम्हारे एहसास जानकर… मुझे भी डर लगता है। लेकिन तुम्हारे बिना… अधूरा लगता है।”

आरव ने उसकी आंखों में देखा। “प्रिया… तू क्या फील करती है?”

प्रिया ने सिर झुका लिया। “भैया… तुम मेरे लिए सब कुछ हो। पहले भाई, अब… अब कुछ और। लेकिन समाज क्या कहेगा? फैमिली? और विक्रांत?”

आरव ने उसके हाथ पकड़े। “विक्रांत… वो अच्छा है। लेकिन मेरा दिल तुझे किसी और को नहीं सौंप पा रहा। मैं जानता हूं ये सेल्फिश है। लेकिन प्रिया, मैं तुझे सालों खो चुका। अब फिर से खोने का हौसला नहीं।”

प्रिया रो पड़ी। “भैया… हम क्या करें?”

आरव ने उसे गले लगा लिया। “वक्त देंगे प्रिया। धीरे-धीरे। लेकिन मैं वादा करता हूं – तेरी खुशी के लिए सब कुछ करूंगा। चाहे खुद को दर्द देकर।”

दोनों गले लगे रहे। कमरे में सन्नाटा था। बाहर बर्फ की आवाज। आरव का कॉन्फ्लिक्ट अभी खत्म नहीं हुआ था – वो प्यार को एक्सेप्ट कर रहा था, लेकिन गिल्ट अभी भी चुभ रहा था। “क्या मैं प्रिया को दुख दूंगा? या ये प्यार हमें जोड़ेगा?”

अगले दिन रिया ने नोटिस किया। “प्रिया, तुम और भैया के बीच कुछ तो हो रहा है। बताओ ना!”

प्रिया ने मुस्कुराकर कहा, “रिया, अभी कुछ नहीं। लेकिन… सब ठीक होगा।”

विक्रांत का मैसेज आया – “प्रिया, मिलें? कुछ इम्पॉर्टेंट।”

प्रिया ने हां कहा। वो मिले। विक्रांत ने कहा, “प्रिया, अवनी के प्रूफ झूठे हैं। मैंने चेक किया। लेकिन… मुझे लगता है तू परेशान है। आरव से?”

प्रिया ने सिर हिलाया। “हां। फैमिली मैटर्स।”

विक्रांत ने कहा, “प्रिया, अगर तुझे किसी की जरूरत हो तो मैं हूं। दोस्त की तरह।”

प्रिया मुस्कुराई। “थैंक्स विक्रांत। तू सच्चा दोस्त है।”

लेकिन मन में आरव था। शाम को घर लौटकर प्रिया ने आरव को देखा। वो लॉन में बर्फ के गोले बना रहा था – बचपन जैसा। प्रिया हंस पड़ी। “भैया, क्या कर रहे हो?”

आरव ने गोला फेंका। “पकड़ प्रिया! याद है बचपन में?”

प्रिया ने पकड़ा। दोनों हंसने लगे। बर्फ की होली खेली। ठंड थी, लेकिन दिल गर्म हो गया। आरव ने प्रिया के बालों से बर्फ हटाई। “प्रिया… तू हमेशा मेरी रहेगी। चाहे जो हो।”

प्रिया ने कहा, “हां भैया। हमेशा।”

अवनी घर के बाहर खड़ी थी। फोन पर विक्रम से बात कर रही थी। “विक्रम, आरव और प्रिया करीब आ रहे हैं। लेकिन विक्रांत को इस्तेमाल कर। उसे बता कि प्रिया आरव को पसंद करती है।”

विक्रम ने हंसकर कहा, “अच्छा प्लान। अब असली ड्रामा शुरू।”

रात को आरव अकेला लॉन में था। बर्फ में लेटा। प्रिया आई। “भैया, ठंड लग जाएगी।”

आरव ने हाथ बढ़ाया। “प्रिया… आ, साथ लेट। सितारे देख।”

दोनों लेटे। बर्फ ठंडी थी, लेकिन हाथ थामे थे। आरव ने कहा, “प्रिया, मैं वादा करता हूं। तेरे एहसास का सम्मान करूंगा। धीरे-धीरे।”

प्रिया ने सिर उसके कंधे पर रखा। “हां भैया। धीरे-धीरे।”

बर्फ गिर रही थी। अनकहे वादे बन रहे थे। आरव का कॉन्फ्लिक्ट अभी था – लेकिन प्रिया के साथ, वो हल्का लग रहा था। प्यार की शुरुआत हो चुकी थी – स्लो, इमोशनल, और अनकही।

विक्रांत घर पर अकेला था। प्रिया का मैसेज पढ़ा – “थैंक्स दोस्त।” वो मुस्कुराया, लेकिन आंखें उदास। “प्रिया… क्या मैं सिर्फ दोस्त रह जाऊंगा?”

 

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