🔐 लॉग-इन या रजिस्टर करें  

Dil sabhal ja jara part – 10

पढ़ने का समय : 5 मिनट

Part – 10 aarav ka chhupa huaa pakch 

कॉलेज का सेशन अब अंतिम चरण में था। एग्जाम नजदीक थे, लेकिन ठाकुर हाउस में एक नई हलचल थी। प्रिया विक्रांत की फैमिली स्टोरी से इतनी प्रभावित हुई थी कि उसने रिया से कहा, “यार, हम सबके राज़ खुल रहे हैं। लेकिन आरव भैया के बारे में हमें क्या पता? वो तो हमेशा प्रोटेक्टिव रहते हैं, अपनी बात कभी नहीं बताते।”

 

रिया ने आंखें चमकाईं। “सच में! चल, आज भैया से पूछते हैं। पूरी फैमिली हिस्ट्री।”

 

शाम को ठाकुर हाउस के बड़े ड्राइंग रूम में सब इकट्ठे थे। राजेश पापा न्यूज पढ़ रहे थे, आदित्य अंकल (प्रिया के असली पिता) चाय पी रहे थे, कमला दाई किचन से समोसे लेकर आईं। आरव लैपटॉप पर होटल्स का काम देख रहा था। प्रिया और रिया सोफे पर बैठीं।

 

रिया ने सीधा हमला किया। “आरव भैया, अब आपकी बारी! हमने विक्रांत की पूरी राजघराना स्टोरी सुनी। प्रिया की तो पूरी जिंदगी फिल्म बन गई। अब आप बताओ – ठाकुर फैमिली की असली हिस्ट्री क्या है? सिर्फ होटल्स और प्रॉपर्टी नहीं, पूरा बैकग्राउंड!”

 

आरव ने लैपटॉप बंद किया और मुस्कुराया। “रिया, तू कभी नहीं सुधरेगी। ठीक है, आज बताता हूं। लेकिन ये लंबी कहानी है।”

 

सब ध्यान से सुनने लगे। आरव ने गहरी सांस ली और शुरू किया।

 

“ठाकुर फैमिली की जड़ें हिमाचल के पुराने राजपूत खानदान से हैं। मेरे परदादाजी – ठाकुर हरि सिंह – 1900 के आसपास शिमला के पास एक छोटी रियासत के मुखिया थे। ब्रिटिश टाइम में वो राजा नहीं थे, लेकिन जमींदार जरूर थे। बड़े-बड़े सेब के बागान, जंगल, और शिमला में दो-तीन पुराने बंगले। ब्रिटिश अफसरों से अच्छे रिश्ते थे, इसलिए प्रिवी पर्स मिलता था। परदादाजी बहुत शौकीन थे – शिकार, घुड़सवारी, और पोलो। शिमला के मॉल रोड पर उनका बंगला आज भी है – वो जो अब म्यूजियम बन गया है।”

 

प्रिया हैरान थी। “भैया, ये तो पता नहीं था!”

 

आरव हंसा। “सुन तो पूरी। आजादी के बाद प्रिवी पर्स खत्म हुआ। परदादाजी ने समझदारी दिखाई। सेब के बागानों को कमर्शियल बना दिया। 1960 में मेरे दादाजी – ठाकुर विजय सिंह – ने पहला होटल खोला – ‘ठाकुर पैलेस’। वो शिमला का पहला लग्जरी होटल था। विदेशी टूरिस्ट आते थे। दादाजी बहुत सख्त थे। आर्मी बैकग्राउंड था उनका। 1962 के इंडो-चाइना वॉर में फाइट किया। लेकिन घर में अनुशासन इतना कि कोई बोलने की हिम्मत नहीं करता था।”

 

राजेश पापा ने सिर हिलाया। “तेरे दादाजी ने मुझे भी सिखाया था बिजनेस।”

 

आरव आगे बोला, “दादाजी की दो शादियां हुईं। पहली पत्नी से कोई बच्चा नहीं। दूसरी शादी से पापा (राजेश ठाकुर) पैदा हुए। लेकिन दूसरी पत्नी को घर वाले नहीं अपनाते थे। दादाजी की मौत 1988 में हुई – हार्ट अटैक। उसके बाद होटल्स का बिजनेस पापा ने संभाला। पापा ने चेन बढ़ाई – अब शिमला, मनाली, धर्मशाला में 5 होटल्स हैं। लेकिन मम्मी (रानी) से शादी लव मैरिज थी। मम्मी गरीब फैमिली से थीं – दिल्ली की। दादाजी-दादी को पसंद नहीं थी। फिर भी पापा ने शादी की। मैं तब 10 साल का था।”

 

प्रिया की आंखें नम हो गईं। आरव ने उसकी तरफ देखा और धीरे से कहा, “मम्मी बहुत अच्छी थीं। मुझे और तुझे बहुत प्यार करती थीं। लेकिन घर में तनाव रहता था। विक्रम की मां (मेरी सौतेली मां) हमेशा जलती थीं। प्रॉपर्टी का लालच था। मम्मी की मौत के बाद सब बदल गया। पापा टूट गए। मैं अकेला हो गया। कॉलेज गया दिल्ली, फिर बिजनेस संभालने लगा। लेकिन अंदर से हमेशा कमी महसूस होती थी – छोटी बहन की।”

 

रिया ने पूछा, “भैया, और कोई राज़? जैसे विक्रांत की दादी वाला?”

 

आरव चुप हुआ। फिर बोला, “हां, एक बड़ा राज़ है। ठाकुर और राठौर फैमिली की पुरानी दुश्मनी। 1940 के दशक में परदादाजी और विक्रांत के परदादाजी (महाराजा विक्रम सिंह) के बीच जमीन का विवाद था। शिमला के पास एक बड़ा जंगल – दोनों दावा करते थे। कोर्ट केस चला। आखिर में ठाकुर फैमिली हार गई। परदादाजी ने बदला लिया – राठौर की एक प्रॉपर्टी पर कब्जा करने की कोशिश की। बात इतनी बढ़ी कि दोनों खानदानों में सालों दुश्मनी रही। शादियां तक रुक गईं।”

 

प्रिया चौंकी। “तो विक्रांत और हमारी फैमिली… दुश्मन?”

 

आरव ने सिर हिलाया। “हां। इसलिए जब विक्रांत कॉलेज में आया तो मुझे शक हुआ। लेकिन अब लगता है वो अच्छा लड़का है। पुरानी बातें पुरानी रहनी चाहिए।”

 

कमला दाई ने कहा, “बेटा, तेरे दादाजी ने एक गलती और की थी। रानी बहू को अपनाने से इंकार किया। कहा कि गरीब घर की लड़की ठाकुर खानदान में नहीं आएगी। लेकिन राजेश ने नहीं मानी।”

 

राजेश पापा ने पहली बार खुलकर बोला। “मैंने रानी से प्यार किया था। लेकिन गलती की कि उसे फैमिली के प्रेशर से बचा नहीं सका। प्रिया के लापता होने के बाद मैंने खुद को कभी माफ नहीं किया।”

 

आरव ने आगे कहा, “और मेरा अपना राज़ – मैं होटल्स नहीं संभालना चाहता था। बचपन में आर्मी जॉइन करना चाहता था। लेकिन पापा की तबीयत खराब होने लगी तो जिम्मेदारी ले ली। अब NGO चलाता हूं चुपके से – अनाथ बच्चों के लिए। शिमला के बाहर एक छोटा सा आश्रम सपोर्ट करता हूं।”

 

प्रिया की आंखें चमक उठीं। “भैया… ये तो पता नहीं था!”

 

आरव शर्मा गया। “बस, छोटा सा काम। ताकि कोई और प्रिया जैसा अकेला न महसूस करे।”

 

रिया ने ताली बजाई। “वाह भैया! हीरो हो तुम। लेकिन प्रिया, अब समझी क्यों आरव इतना प्रोटेक्टिव है? बहन के लिए कुछ भी!”

 

सब हंसे। लेकिन प्रिया के मन में नया सवाल – अगर ठाकुर और राठौर की दुश्मनी है, तो विक्रांत और वो करीब कैसे आएंगे?

 

रात को प्रिया बालकनी में खड़ी थी। आरव आया। “क्या सोच रही है?”

 

“भैया, तुमने इतना कुछ सहा। लेकिन कभी शिकायत नहीं की।”

 

आरव ने उसके कंधे पर हाथ रखा। “तू आ गई ना। अब सब ठीक है।”

 

प्रिया मुस्कुराई। भाई का प्यार – सबसे बड़ा सहारा। रोमांस? विक्रांत अच्छा है, लेकिन अभी दोस्ती ही काफी थी।

 

अगले दिन कॉलेज में अवनी ने विक्रांत को कोने में लिया। “विक्रांत, प्रिया से दूर रह। ठाकुर और राठौर कभी एक नहीं हो सकते।”

 

विक्रांत ने पूछा, “क्यों?”

 

अवनी मुस्कुराई। “क्योंकि तेरे दादाजी ने ठाकुर की जमीन छीनी थी। और अब प्रिया सब वापस लेना चाहती है।”

 

 

Comments

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *