सुमन और उसका भाई विजय बचपन में बहुत करीब थे। विजय अपनी बहन से चार साल बड़ा था और हमेशा उसकी रक्षा करता था। स्कूल जाते समय वह उसका बैग उठाता। बारिश में उसकी छतरी पकड़ता। और जब भी कोई उसे परेशान करता, विजय उसके सामने दीवार बनकर खड़ा हो जाता। लेकिन जिंदगी ने दोनों को अलग कर दिया। पिता की मृत्यु के बाद विजय को नौकरी की तलाश में शहर जाना पड़ा। सुमन गांव में मां के साथ रह गई। समय बीतता गया। विजय शहर में मेहनत करता रहा और सुमन की शादी हो गई। दोनों की मुलाकात कम होने लगी। लेकिन रक्षाबंधन पर सुमन हमेशा भाई को राखी भेजती थी। एक साल राखी के कुछ दिन पहले सुमन को विजय का फोन आया। “बहन, इस बार राखी पर शायद मैं घर न आ पाऊं।” सुमन ने कहा, “क्यों?” “ऑफिस का काम बहुत ज्यादा है।” सुमन चुप हो गई। फिर बोली, “ठीक है भैया।” उसने फोन रख दिया। लेकिन उसे पता नहीं था कि विजय उससे एक बड़ी बात छिपा रहा था। विजय कई महीनों से गंभीर आर्थिक परेशानी में था। कर्ज बढ़ता जा रहा था। वह चाहता था कि परिवार को उसकी परेशानी का पता न चले। रक्षाबंधन के दिन सुमन ने पूजा की और भाई की तस्वीर के सामने राखी रख दी। फिर दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी। सुमन ने दरवाजा खोला। सामने विजय खड़ा था। वह हैरान रह गई। “भैया! आपने तो कहा था नहीं आएंगे।” विजय मुस्कुराया। “बहन की राखी के लिए भाई नहीं आएगा तो कौन आएगा?” सुमन ने उसकी कलाई पर राखी बांधी। फिर उसने भाई की आंखों में देखा। “आप परेशान हैं ना?” विजय चौंक गया। “नहीं तो।” “झूठ मत बोलिए।” विजय की आंखें भर आईं। उसने अपनी परेशानी बहन को बता दी। सुमन ने कहा— “आपने इतने साल मेरी मदद की। अब मेरी बारी है।” विजय बोला, “तुम क्या करोगी?” सुमन ने अपनी बचत उसके सामने रख दी। “जितना मेरे पास है, उतना ले लीजिए।” विजय ने पैसे लेने से मना कर दिया। “नहीं बहन।” सुमन बोली— “जब मैं छोटी थी और मुझे कोई परेशानी होती थी, तब आपने कभी नहीं पूछा कि मेरे पास पैसे हैं या नहीं। आपने बस मदद की थी। आज मैं भी वही कर रही हूं।” विजय ने बहन का हाथ पकड़ लिया। “लेकिन मैं ये कर्ज कैसे चुकाऊंगा?” सुमन मुस्कुराई। “पैसे वापस मत करना। बस एक वादा करना।” “क्या?” “कभी अपनी परेशानी अकेले मत सहना।” विजय ने सिर हिला दिया। उस दिन दोनों भाई-बहन देर तक बातें करते रहे। अगले कुछ महीनों में सुमन और विजय ने मिलकर विजय की आर्थिक समस्या का समाधान किया। विजय ने अतिरिक्त काम करना शुरू किया। कुछ समय बाद उसने अपना छोटा सा व्यवसाय शुरू कर लिया। व्यवसाय चल पड़ा। लेकिन उस रक्षाबंधन की बात दोनों कभी नहीं भूले। कई साल बाद सुमन की बेटी ने विजय से पूछा— “मामा, राखी का मतलब क्या होता है?” विजय ने अपनी कलाई की तरफ देखा। फिर बोला— “राखी का मतलब सिर्फ यह नहीं कि भाई बहन की रक्षा करेगा।” “फिर?” “राखी का मतलब है कि जब जिंदगी में कोई अकेला पड़ जाए, तो दूसरा उसका हाथ पकड़ ले।” सुमन पास खड़ी मुस्कुरा रही थी। विजय ने अपनी बहन की तरफ देखकर कहा— “मेरी बहन ने मुझे सिखाया कि कभी-कभी जिसे हम कमजोर समझकर उसकी रक्षा करते हैं, वही एक दिन हमारी सबसे बड़ी ताकत बन जाता है।” सुमन की आंखें नम हो गईं। उसने कहा— “भैया, भाई-बहन में कौन बड़ा और कौन छोटा, ये मायने नहीं रखता। मायने रखता है कि मुश्किल वक्त में कौन किसके साथ खड़ा है।” दोनों मुस्कुराए। उनकी कलाई पर राखी का धागा था, लेकिन उस धागे से कहीं ज्यादा मजबूत उनका रिश्ता था। सीख: रिश्तों में हमेशा एक ही व्यक्ति देने वाला और दूसरा लेने वाला नहीं होता। कभी भाई बहन की ताकत बनता है, तो कभी बहन भाई की। सच्चा रिश्ता वही है जिसमें मुश्किल समय में बिना स्वार्थ के एक-दूसरे का हाथ थामा जाए।

NSW. – अनुभवी लेखक -🥇
चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं
शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।