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श्रेणी: रक्षाबंधन स्टोरी

भाई बहन के बीच, प्यार, नोंक झोंक, मासुमियत, केयर, स्नेह से भरी कहानियां यहां पढ़ें।

  • फटी हुई राखी

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    नंदिनी और उसका बड़ा भाई दीपक शहर की एक झुग्गी बस्ती में रहते थे। उनके पिता रिक्शा चलाते थे, लेकिन एक दुर्घटना के बाद उनका पैर खराब हो गया था। माँ घरों में काम करती थीं।

     

    घर में पैसे इतने कम थे कि कई बार रात का खाना भी नहीं बनता था।

     

    दीपक सिर्फ सत्रह साल का था, लेकिन उसने पढ़ाई छोड़कर एक गैराज में काम करना शुरू कर दिया था।

     

    नंदिनी अभी स्कूल में पढ़ती थी।

     

    दीपक का सपना था कि उसकी बहन खूब पढ़े और एक दिन अपने पैरों पर खड़ी हो।

     

    वह रोज गैराज में घंटों काम करता।

     

    हाथों पर तेल लगा रहता।

     

    कपड़े हमेशा मैले रहते।

     

    लेकिन जब वह घर आता और नंदिनी को किताब लेकर बैठा देखता, तो उसके चेहरे पर मुस्कान आ जाती।

     

    एक दिन नंदिनी ने कहा—

     

    “भैया, आपकी तबीयत खराब है। आज काम पर मत जाइए।”

     

    दीपक हँसा।

     

    “अगर मैं नहीं जाऊँगा तो तेरी किताबें कौन खरीदेगा?”

     

    नंदिनी चुप हो गई।

     

    उसने भाई के हाथों को देखा।

     

    हाथों पर जगह-जगह कटे के निशान थे।

     

    उसने धीरे से कहा—

     

    “भैया, मैं पढ़ाई छोड़ देती हूँ।”

     

    दीपक ने तुरंत उसकी किताब बंद कर दी।

     

    “ये बात दोबारा मत कहना।”

     

    “लेकिन…”

     

    “तू पढ़ेगी। मेरी जिंदगी में अगर कोई सपना बचा है तो वह तू है।”

     

    नंदिनी की आँखों में आँसू आ गए।

     

    रक्षाबंधन आने वाला था।

     

    उसके पास राखी खरीदने के पैसे नहीं थे।

     

    उसने माँ से कहा—

     

    “माँ, मुझे थोड़े पैसे दे दो।”

     

    माँ ने खाली डिब्बा दिखा दिया।

     

    “बेटी, इस बार घर में कुछ नहीं है।”

     

    नंदिनी उदास हो गई।

     

    अगले दिन उसने अपनी पुरानी स्कूल ड्रेस का लाल धागा निकाला।

     

    उसने एक छोटे कपड़े के टुकड़े को मोड़कर राखी बना ली।

     

    बीच में उसने अपनी पुरानी पेंसिल की लाल रबर का छोटा टुकड़ा लगा दिया।

     

    राखी थोड़ी टेढ़ी थी।

     

    धागा भी जगह-जगह से उधड़ा हुआ था।

     

    लेकिन नंदिनी के लिए वह दुनिया की सबसे सुंदर राखी थी।

     

    रक्षाबंधन की सुबह दीपक काम पर जाने लगा।

     

    नंदिनी ने कहा—

     

    “आज काम पर मत जाओ।”

     

    “क्यों?”

     

    “आज मेरी राखी है।”

     

    दीपक मुस्कुराया।

     

    “अच्छा! तो जल्दी बाँध।”

     

    नंदिनी ने राखी बाँधी।

     

    दीपक ने अपनी जेब टटोली।

     

    उसके पास सिर्फ बीस रुपये थे।

     

    उसने बीस रुपये बहन के हाथ में रख दिए।

     

    नंदिनी ने तुरंत वापस कर दिए।

     

    “मुझे पैसे नहीं चाहिए।”

     

    “तो क्या चाहिए?”

     

    “बस एक वादा।”

     

    “बोल।”

     

    “आप कभी मुझे अकेला मत छोड़ना।”

     

    दीपक की आँखें भर आईं।

     

    उसने कहा—

     

    “जब तक मेरी साँस है, तू अकेली नहीं है।”

     

    कुछ दिनों बाद गैराज में काम करते हुए दीपक का हाथ मशीन में फँस गया।

     

    उसे अस्पताल ले जाया गया।

     

    डॉक्टर ने कहा कि हाथ में गंभीर चोट है और कुछ समय तक वह काम नहीं कर पाएगा।

     

    घर की आमदनी बंद हो गई।

     

    नंदिनी ने स्कूल के बाद घरों में काम करना शुरू कर दिया।

     

    दीपक को बहुत दुख हुआ।

     

    “मैंने तुझे पढ़ाने का वादा किया था।”

     

    नंदिनी मुस्कुराई।

     

    “आपने वादा तोड़ा नहीं है भैया। बस अब मैं भी आपका हाथ बँटा रही हूँ।”

     

    धीरे-धीरे दीपक ठीक होने लगा।

     

    लेकिन उसके हाथ में पहले जैसी ताकत नहीं रही।

     

    गैराज के मालिक ने उसे काम से निकाल दिया।

     

    दीपक टूट गया।

     

    एक रात उसने नंदिनी से कहा—

     

    “शायद अब मैं तुझे पढ़ा नहीं पाऊँगा।”

     

    नंदिनी ने उसकी हथेली पकड़ ली।

     

    “भैया, आपने मुझे किताबें नहीं दीं। आपने मुझे हिम्मत दी है। मैं खुद पढ़ूँगी।”

     

    उस दिन से नंदिनी ने दिन-रात मेहनत शुरू कर दी।

     

    वह स्कूल जाती, शाम को काम करती और रात में पढ़ाई करती।

     

    कई साल बाद उसने प्रतियोगी परीक्षा पास कर ली।

     

    उसे सरकारी नौकरी मिल गई।

     

    पहली तनख्वाह लेकर वह घर आई।

     

    उसने दीपक के सामने एक डिब्बा रखा।

     

    दीपक ने खोला।

     

    अंदर एक सुंदर घड़ी थी।

     

    “ये क्या है?”

     

    नंदिनी बोली—

     

    “आपके लिए।”

     

    दीपक ने घड़ी पहनने से मना कर दिया।

     

    “इतना महंगा सामान क्यों खरीदा?”

     

    नंदिनी मुस्कुराई।

     

    “क्योंकि आपने मेरी जिंदगी का समय बदल दिया।”

     

    दीपक की आँखों में आँसू आ गए।

     

    उसी समय नंदिनी ने अपनी अलमारी से एक पुरानी चीज निकाली।

     

    वह वही फटी हुई राखी थी।

     

    दीपक ने उसे देखते ही पहचान लिया।

     

    “तूने इसे संभालकर रखा?”

     

    नंदिनी बोली—

     

    “ये राखी नहीं है भैया। इसमें मेरा पूरा बचपन बंधा है।”

     

    दीपक ने काँपते हाथों से राखी को छुआ।

     

    उसकी आँखों से आँसू गिरने लगे।

     

    “मैंने तो सोचा था कि मैं तेरा भविष्य नहीं बना पाया।”

     

    नंदिनी ने कहा—

     

    “आपने बनाया है भैया। अगर उस दिन आप मुझे पढ़ने के लिए मजबूर नहीं करते, तो मैं आज यहाँ नहीं होती।”

     

    अगले रक्षाबंधन पर नंदिनी ने फिर भाई की कलाई पर राखी बाँधी।

     

    इस बार राखी बहुत सुंदर थी।

     

    लेकिन दीपक की नजर उसी पुरानी फटी राखी पर थी।

     

    उसने कहा—

     

    “मेरे लिए सबसे कीमती राखी यही है।”

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    दीपक ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “क्योंकि इसी ने मुझे याद दिलाया था कि गरीब आदमी के पास पैसा कम हो सकता है, लेकिन प्यार कभी कम नहीं होना चाहिए।”

     

    दोनों भाई-बहन एक-दूसरे से लिपटकर रोने लगे।

     

    उनकी झुग्गी वही थी।

     

    गरीबी पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी।

     

    लेकिन उस छोटे-से घर में अब उम्मीद बहुत बड़ी थी।

     

    सीख:

     

    रिश्तों की कीमत उनकी चमक से नहीं होती। एक फटी हुई राखी भी करोड़ों की दौलत से ज्यादा कीमती हो सकती है, अगर उसमें सच्चा प्यार और त्याग बंधा हो। जिंदगी में परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, अपने प्रियजनों का साथ और हिम्मत कभी नहीं छोड़नी चाहिए।

  • दो रोटियाँ और एक राखी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

     

    गाँव के आखिरी छोर पर एक टूटी-सी झोपड़ी थी। बरसात में जिसकी छत टपकती थी और गर्मियों में जिसके अंदर बैठना भी मुश्किल हो जाता था। उसी झोपड़ी में सोलह साल की मीरा और उसका छोटा भाई सोनू रहते थे।

     

    माँ-बाप दोनों को गुजरे कई साल हो चुके थे। रिश्तेदारों ने कुछ दिनों तक सहारा दिया, फिर सब अपने-अपने घर चले गए।

     

    मीरा ने तभी तय कर लिया था कि चाहे कुछ भी हो जाए, वह अपने भाई को कभी अकेला नहीं छोड़ेगी।

     

    सुबह होते ही मीरा गाँव के बड़े घरों में बर्तन माँजने निकल जाती। बदले में कभी उसे पैसे मिलते, कभी बची हुई रोटियाँ।

     

    सोनू भी खाली नहीं बैठता था। वह गाँव की सब्जी मंडी में बोरे उठाता और जो थोड़े पैसे मिलते, उन्हें अपनी बहन के हाथ पर रख देता।

     

    एक दिन मीरा ने कहा—

     

    “सोनू, तू अभी छोटा है। इतना काम मत किया कर।”

     

    सोनू हँसकर बोला—

     

    “और आप अकेले काम करेंगी तो मुझे अच्छा लगेगा?”

     

    मीरा ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “तू बस पढ़ाई कर। मैं चाहती हूँ तू बड़ा आदमी बने।”

     

    सोनू बोला—

     

    “मैं बड़ा आदमी नहीं बनना चाहता।”

     

    “तो क्या बनना चाहता है?”

     

    “आपका सहारा।”

     

    मीरा कुछ नहीं बोल पाई।

     

    उसने सोनू को सीने से लगा लिया।

     

    उनके पास गरीबी बहुत थी, लेकिन प्यार की कोई कमी नहीं थी।

     

    रक्षाबंधन आने वाला था।

     

    गाँव के बाजार में राखियों की दुकानें सज गई थीं।

     

    सोनू अपनी बहन के लिए राखी खरीदना चाहता था।

     

    उसने कई दिनों तक पैसे बचाए थे।

     

    एक दिन वह बाजार गया।

     

    एक सुंदर-सी राखी उसे पसंद आई।

     

    दुकानदार ने कहा—

     

    “दस रुपये की है।”

     

    सोनू ने अपनी जेब टटोली।

     

    उसके पास सिर्फ आठ रुपये थे।

     

    वह उदास होकर दुकान से लौट आया।

     

    घर पहुँचकर मीरा ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “मुझसे झूठ मत बोल।”

     

    सोनू ने धीरे से कहा—

     

    “आपके लिए राखी खरीदना चाहता था, लेकिन पैसे कम पड़ गए।”

     

    मीरा मुस्कुराई।

     

    “मेरे लिए राखी की जरूरत नहीं है।”

     

    सोनू बोला—

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि तू मेरे लिए ही तो सबसे कीमती है।”

     

    सोनू ने कहा—

     

    “लेकिन राखी तो बाँधनी पड़ेगी।”

     

    मीरा ने उसके सिर पर हाथ रखकर कहा—

     

    “ठीक है, इस बार मैं खुद बना लूँगी।”

     

    उस रात मीरा ने अपनी पुरानी लाल चुनरी का एक टुकड़ा निकाला।

     

    उसने उसे धागे में बाँधा और बीच में गेहूँ का एक छोटा-सा दाना चिपका दिया।

     

    सोनू ने देखा तो हँस पड़ा।

     

    “ये कैसी राखी है?”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “गरीबों की राखी।”

     

    सोनू ने राखी को हाथ में लिया।

     

    “नहीं दीदी, ये सबसे अमीर राखी है।”

     

    मीरा मुस्कुराई।

     

    लेकिन अगले दिन घर में खाने के लिए कुछ नहीं था।

     

    दोनों सुबह से भूखे थे।

     

    शाम को मीरा को एक घर से दो रोटियाँ मिलीं।

     

    वह रोटियाँ लेकर झोपड़ी में आई।

     

    सोनू की आँखें चमक उठीं।

     

    “दीदी, आज तो दावत है।”

     

    मीरा हँस पड़ी।

     

    “हाँ, आज दावत है।”

     

    उसने एक रोटी सोनू को दी और दूसरी खुद रख ली।

     

    सोनू ने अपनी रोटी का आधा हिस्सा तोड़कर मीरा की तरफ बढ़ाया।

     

    “आप भी खाओ।”

     

    “नहीं, मुझे भूख नहीं है।”

     

    “झूठ।”

     

    “सच कह रही हूँ।”

     

    सोनू बोला—

     

    “आप हमेशा झूठ बोलती हो जब खाना कम होता है।”

     

    मीरा चुप हो गई।

     

    उसकी आँखें भर आईं।

     

    सोनू ने रोटी का आधा टुकड़ा उसकी हथेली पर रख दिया।

     

    “आपने मुझे माँ की तरह पाला है। अब मुझे भी आपका ख्याल रखने दो।”

     

    मीरा रोते हुए रोटी खाने लगी।

     

    उस रात दोनों ने पहली बार महसूस किया कि गरीबी पेट को भूखा रख सकती है, लेकिन दिल को गरीब नहीं बना सकती।

     

    रक्षाबंधन का दिन आ गया।

     

    सुबह मीरा ने सोनू को नहलाया।

     

    घर में मिठाई नहीं थी।

     

    उसने गुड़ का छोटा-सा टुकड़ा पानी में घोलकर उसे मीठा पानी पिला दिया।

     

    फिर सोनू के सामने बैठकर उसकी कलाई पर वही राखी बाँध दी।

     

    मीरा ने कहा—

     

    “भगवान से बस यही चाहती हूँ कि तू हमेशा खुश रहे।”

     

    सोनू ने पूछा—

     

    “और आप?”

     

    “मेरी खुशी तो तू है।”

     

    सोनू ने बहन के पैर छुए।

     

    फिर अपनी जेब से कुछ निकाला।

     

    वह पाँच रुपये थे।

     

    मीरा ने पूछा—

     

    “ये क्या है?”

     

    “आपके लिए।”

     

    “मेरे पास तो सब कुछ है।”

     

    “क्या?”

     

    “तू।”

     

    सोनू मुस्कुराया।

     

    दोनों गले लग गए।

     

    कुछ महीने बाद गाँव में भयंकर बाढ़ आ गई।

     

    नदी का पानी धीरे-धीरे गाँव की ओर बढ़ने लगा।

     

    लोग अपने घर छोड़कर ऊँची जगहों पर जाने लगे।

     

    मीरा ने सोनू का हाथ पकड़ा और बोली—

     

    “चल, हमें भी निकलना होगा।”

     

    लेकिन सोनू का पैर कीचड़ में फिसल गया।

     

    वह पानी में गिर पड़ा।

     

    मीरा बिना सोचे पानी में कूद गई।

     

    उसने सोनू को पकड़ लिया।

     

    पानी का बहाव बहुत तेज था।

     

    मीरा ने पूरी ताकत लगाकर भाई को किनारे की ओर धकेला।

     

    “सोनू! भाग!”

     

    सोनू रोते हुए बोला—

     

    “दीदी, आप भी चलो!”

     

    मीरा ने उसे धक्का देकर सुरक्षित जगह पहुँचा दिया।

     

    लेकिन खुद पानी के तेज बहाव में बह गई।

     

    “दीदी!”

     

    सोनू चीखता रहा।

     

    गाँव के लोगों ने मीरा को खोजने की बहुत कोशिश की।

     

    कई घंटे बाद उसे नदी के किनारे बेहोश हालत में पाया गया।

     

    सोनू उसके पास बैठकर लगातार रो रहा था।

     

    “दीदी, आँखें खोलो…”

     

    कुछ देर बाद मीरा ने आँखें खोलीं।

     

    सोनू ने उसे गले लगा लिया।

     

    “आप मुझे छोड़कर मत जाना।”

     

    मीरा ने उसके आँसू पोंछे।

     

    “पगले, तुझे छोड़कर कहाँ जाऊँगी?”

     

    उस दिन सोनू ने मन ही मन फैसला किया कि अब वह अपनी बहन को कभी दुखी नहीं होने देगा।

     

    समय बीतता गया।

     

    सोनू ने पढ़ाई के साथ मेहनत भी की।

     

    वह बड़ा हुआ और शहर में नौकरी करने लगा।

     

    पहली तनख्वाह मिलते ही वह गाँव आया।

     

    मीरा झोपड़ी के बाहर बैठी थी।

     

    सोनू ने उसके सामने एक नया घर बनाने के कागज रख दिए।

     

    मीरा हैरान रह गई।

     

    “ये क्या है?”

     

    सोनू मुस्कुराया।

     

    “हमारा नया घर।”

     

    मीरा की आँखें भर आईं।

     

    “लेकिन इतने पैसे?”

     

    “आपने मुझे बचपन में दो रोटियाँ देकर बड़ा किया था। आज मेरी बारी है आपका पेट भरने की।”

     

    अगले रक्षाबंधन पर सोनू ने अपनी बहन के सामने एक बड़ी-सी मिठाई की दुकान से खरीदी हुई राखी रखी।

     

    मीरा ने उसे देखा और मुस्कुराकर पूछा—

     

    “इतनी महंगी राखी?”

     

    सोनू बोला—

     

    “नहीं दीदी। महंगी तो वह राखी थी जो आपने मेरी कलाई पर उस दिन बाँधी थी।”

     

    मीरा ने पूछा—

     

    “वह?”

     

    सोनू ने अपनी जेब से वही पुरानी, सूखी और थोड़ी-सी टूटी राखी निकाली।

     

    “मैंने इसे आज तक संभालकर रखा है।”

     

    मीरा की आँखों से आँसू बह निकले।

     

    सोनू बोला—

     

    “उस राखी में आपका प्यार बंधा था। और वही प्यार मुझे आज यहाँ तक लेकर आया।”

     

    मीरा ने भाई की कलाई पर नई राखी बाँधी।

     

    दोनों ने एक-दूसरे को गले लगा लिया।

     

    उस दिन उनके घर में बहुत सारी मिठाई थी।

     

    लेकिन दोनों ने सबसे पहले दो रोटियाँ बनाई।

     

    एक मीरा ने खाई।

     

    एक सोनू ने।

     

    क्योंकि उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी दौलत आज भी वही दो रोटियाँ थीं, जिनमें एक-दूसरे के लिए बचाया हुआ प्यार था।

     

    सीख:

     

    गरीबी इंसान से बहुत कुछ छीन सकती है, लेकिन सच्चा प्यार नहीं छीन सकती। भाई-बहन का रिश्ता तब और मजबूत हो जाता है जब दोनों अपनी जरूरत से पहले एक-दूसरे की जरूरत के बारे में सोचते हैं। जीवन में पैसा कम हो सकता है, लेकिन अगर घर में प्रेम और अपनापन है, तो इंसान कभी सच में गरीब नहीं होता।

  • बहन की राखी और भाई का अधूरा सपना

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    शहर से बहुत दूर एक छोटा-सा गाँव था, जहाँ कच्ची गलियों और मिट्टी के घरों के बीच एक गरीब परिवार रहता था। उस परिवार में सिर्फ दो भाई-बहन थे—अमन और उसकी छोटी बहन गुड़िया।

     

    अमन गुड़िया से पाँच साल बड़ा था। पिता के गुजर जाने के बाद घर की सारी जिम्मेदारी अमन के कंधों पर आ गई थी। माँ पहले ही बीमारी के कारण बिस्तर पर रहती थीं। घर में कमाने वाला कोई नहीं था।

     

    अमन ने पढ़ाई छोड़ दी और गाँव के पास एक ईंट-भट्ठे पर मजदूरी करने लगा।

     

    हर सुबह वह अँधेरे में उठता, सूखी रोटी पानी में भिगोकर खाता और काम पर निकल जाता।

     

    गुड़िया अक्सर दरवाजे पर खड़ी होकर उसे जाते हुए देखती।

     

    वह पूछती, “भैया, आप स्कूल क्यों नहीं जाते?”

     

    अमन मुस्कुराकर कहता, “मेरा स्कूल तो अब यही है।”

     

    गुड़िया समझ नहीं पाती थी।

     

    एक दिन उसने फिर पूछा, “आप बड़े होकर क्या बनना चाहते थे?”

     

    अमन कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर उसने मुस्कुराकर कहा, “डॉक्टर।”

     

    गुड़िया की आँखें चमक उठीं।

     

    “तो बनो ना भैया।”

     

    अमन ने उसकी ओर देखा और धीरे से बोला—

     

    “अब तू पढ़-लिखकर डॉक्टर बनना। मेरा सपना तू पूरा करना।”

     

    गुड़िया ने उस समय तो कुछ नहीं कहा, लेकिन उसके मन में भाई की बात बस गई।

     

    वह पढ़ाई में बहुत अच्छी थी।

     

    स्कूल की फीस बहुत कम थी, फिर भी उनके लिए वह रकम बड़ी थी।

     

    कई बार अमन के पास घर का राशन खरीदने तक के पैसे नहीं होते थे, लेकिन वह गुड़िया की फीस किसी न किसी तरह जमा कर देता।

     

    एक दिन गुड़िया ने देखा कि अमन के पैरों में चप्पल नहीं थी।

     

    उसने पूछा, “भैया, आपकी चप्पल कहाँ है?”

     

    अमन हँसकर बोला, “टूट गई थी।”

     

    “नई क्यों नहीं लेते?”

     

    “ले लूँगा।”

     

    लेकिन वह “ले लूँगा” कभी नहीं आया।

     

    अमन हर बार अपनी जरूरत से पहले गुड़िया की जरूरत पूरी करता।

     

    सर्दियों की रात में जब गुड़िया के पास गर्म कपड़े नहीं होते, अमन अपनी पुरानी चादर उसे दे देता।

     

    जब गुड़िया बीमार पड़ती, वह पूरी रात उसके सिरहाने बैठा रहता।

     

    और जब भी गुड़िया कहती—

     

    “भैया, आप बहुत अच्छे हो।”

     

    अमन बस इतना कहता—

     

    “तू खुश रह, बस यही मेरी कमाई है।”

     

    समय बीतता गया।

     

    गुड़िया दसवीं कक्षा में पहुँच गई।

     

    स्कूल में उसका नाम जिले के सबसे अच्छे विद्यार्थियों में आने लगा।

     

    अमन को उस पर बहुत गर्व था।

     

    लेकिन उसके मन में एक चिंता भी थी।

     

    गुड़िया की आगे की पढ़ाई के लिए शहर जाना जरूरी था।

     

    शहर में रहने, किताबों और कॉलेज की फीस के लिए बहुत पैसे चाहिए थे।

     

    एक शाम गुड़िया ने डरते हुए कहा—

     

    “भैया, अगर पैसे नहीं हैं तो मैं आगे नहीं पढ़ूँगी।”

     

    अमन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “ऐसा दोबारा मत कहना।”

     

    “लेकिन भैया…”

     

    “तू पढ़ेगी। चाहे मुझे कुछ भी करना पड़े।”

     

    उस रात अमन देर तक घर नहीं आया।

     

    अगले दिन गुड़िया ने देखा कि अमन की आँखों के नीचे काले निशान थे।

     

    वह बोली, “भैया, आप रात में सोए नहीं?”

     

    अमन मुस्कुराया।

     

    “थोड़ा काम ज्यादा था।”

     

    असलियत यह थी कि अमन ने रात में भी मजदूरी शुरू कर दी थी।

     

    दिन में ईंट-भट्ठा और रात में ट्रक से सामान उतारने का काम।

     

    उसका शरीर टूट जाता, लेकिन बहन की पढ़ाई नहीं टूटने देता।

     

    कुछ महीनों बाद गुड़िया को शहर के एक अच्छे कॉलेज में दाखिला मिल गया।

     

    वह बहुत खुश थी।

     

    लेकिन उसी दिन उसने देखा कि अमन अपनी पुरानी साइकिल बेचकर उसके लिए किताबें खरीद रहा है।

     

    गुड़िया की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “भैया, मेरी वजह से आपने अपनी साइकिल भी बेच दी?”

     

    अमन हँस पड़ा।

     

    “साइकिल तो फिर आ जाएगी। तेरी जिंदगी में मौका बार-बार नहीं आएगा।”

     

    रक्षाबंधन नजदीक था।

     

    गुड़िया शहर में थी और अमन गाँव में।

     

    गुड़िया ने फोन किया—

     

    “भैया, मैं इस बार राखी बाँधने जरूर आऊँगी।”

     

    अमन बोला—

     

    “नहीं, तू अपनी पढ़ाई कर। मैं समझ जाऊँगा।”

     

    “नहीं भैया। राखी तो मैं आपके हाथ पर ही बाँधूँगी।”

     

    लेकिन रक्षाबंधन से एक दिन पहले गुड़िया के कॉलेज में परीक्षा थी।

     

    वह चाहकर भी घर नहीं आ सकी।

     

    उसने फोन किया।

     

    “भैया, मुझे माफ कर दो। मैं इस बार नहीं आ पाऊँगी।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “पगली, परीक्षा ज्यादा जरूरी है। मेरी राखी अगले साल बाँध देना।”

     

    गुड़िया रोने लगी।

     

    “आप नाराज तो नहीं हो?”

     

    “तुझसे कभी नाराज हो सकता हूँ क्या?”

     

    फोन कट गया।

     

    अमन ने अपनी आँखें पोंछ लीं।

     

    उस रात उसने अकेले चूल्हा जलाया।

     

    एक सूखी रोटी बनाई और सामने रखी अपनी बहन की पुरानी तस्वीर देखकर बोला—

     

    “तू बस पढ़ती रह गुड़िया। मेरा सपना पूरा कर देना।”

     

    कुछ साल बीत गए।

     

    गुड़िया ने मेडिकल कॉलेज में दाखिला ले लिया।

     

    वह डॉक्टर बनने की राह पर थी।

     

    अमन के चेहरे पर गर्व था।

     

    लेकिन उसका शरीर अब पहले जैसा नहीं रहा था।

     

    लगातार मेहनत ने उसकी सेहत खराब कर दी थी।

     

    एक दिन काम करते समय वह बेहोश होकर गिर पड़ा।

     

    उसे अस्पताल ले जाया गया।

     

    डॉक्टर ने बताया कि उसे आराम की सख्त जरूरत है।

     

    गुड़िया को खबर मिली तो वह तुरंत गाँव आई।

     

    अपने भाई को अस्पताल के बिस्तर पर देखकर वह फूट-फूटकर रोने लगी।

     

    “भैया…”

     

    अमन ने कमजोर आवाज में कहा—

     

    “तू आ गई?”

     

    “हाँ।”

     

    “पढ़ाई छोड़कर तो नहीं आई?”

     

    गुड़िया ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मेरी पढ़ाई से ज्यादा जरूरी आप हो।”

     

    अमन मुस्कुराया।

     

    “नहीं। तू डॉक्टर बनेगी। यही मेरा सपना है।”

     

    गुड़िया ने उसका हाथ अपने माथे से लगा लिया।

     

    उसने रोते हुए कहा—

     

    “भैया, मैं डॉक्टर बनूँगी। लेकिन सबसे पहले आपका इलाज करूँगी।”

     

    कुछ दिनों बाद अमन की हालत सुधरने लगी।

     

    गुड़िया वापस शहर चली गई।

     

    उसने दिन-रात मेहनत की।

     

    आखिरकार वह डॉक्टर बन गई।

     

    जब वह पहली बार डॉक्टर का सफेद कोट पहनकर गाँव लौटी, तो अमन दरवाजे पर खड़ा था।

     

    गुड़िया ने दूर से ही उसे देखा और दौड़कर गले लग गई।

     

    “भैया… आपका सपना पूरा हो गया।”

     

    अमन की आँखों से आँसू बह निकले।

     

    “नहीं गुड़िया… मेरा सपना नहीं। तू मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी खुशी बन गई।”

     

    फिर गुड़िया ने अपनी जेब से एक राखी निकाली।

     

    उसने अमन की कलाई पर राखी बाँधी और बोली—

     

    “ये सिर्फ राखी नहीं है भैया। ये उस भाई के लिए है जिसने अपना सपना छोड़कर मेरी जिंदगी बना दी।”

     

    अमन ने बहन के सिर पर हाथ रखा।

     

    “अब तू उन गरीब बच्चों का इलाज करना जिनके पास पैसे नहीं हैं।”

     

    गुड़िया ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “वादा है भैया।”

     

    उस दिन दोनों की आँखों में आँसू थे।

     

    लेकिन उन आँसुओं में दर्द नहीं था।

     

    उनमें वर्षों के संघर्ष की जीत थी।

     

    सीख:—-सच्चा भाई वही है जो अपनी खुशियों और सपनों का त्याग करके बहन के भविष्य को बेहतर बनाने की कोशिश करे। रिश्तों की सबसे बड़ी दौलत पैसा नहीं, बल्कि त्याग और विश्वास है। अगर किसी अपने का सपना पूरा करने के लिए हमें अपनी कुछ इच्छाएँ छोड़नी पड़ें, तो वह त्याग कभी व्यर्थ नहीं जाता।

  • भाई की कलाई पर आखिरी राखी

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव में मिट्टी की दीवारों वाला एक छोटा-सा घर था। घर इतना गरीब था कि बरसात के दिनों में छत से पानी टपकता था और गर्मियों में मिट्टी की दीवारें भी तपने लगती थीं। उस घर में बारह साल की राधा और उसका छोटा भाई मोहन रहते थे।

     

    माँ को गुजरे पाँच साल हो चुके थे और पिता भी बीमारी के कारण दुनिया छोड़ चुके थे। अब दोनों भाई-बहन ही एक-दूसरे का सहारा थे।

     

    मोहन उम्र में राधा से दो साल छोटा था, लेकिन अपनी बहन का ख्याल बिल्कुल एक बड़े भाई की तरह रखता था।

     

    राधा गाँव के घरों में काम करके किसी तरह दोनों के लिए खाना जुटाती थी। कभी उसे दो रोटियाँ मिलतीं, कभी आधी रोटी से ही गुजारा करना पड़ता।

     

    मोहन गाँव के पास एक चाय की दुकान पर काम करता था। सुबह से शाम तक गिलास धोता, चाय पहुँचाता और बदले में उसे थोड़े-से पैसे मिलते।

     

    उनकी गरीबी बहुत थी, लेकिन दोनों के बीच प्यार उससे भी बड़ा था।

     

    रक्षाबंधन आने वाला था।

     

    गाँव की सभी लड़कियाँ बाजार से रंग-बिरंगी राखियाँ खरीद रही थीं। किसी की राखी पर मोती लगे थे, किसी पर चमकदार फूल।

     

    राधा भी बाजार के सामने से गुजरी।

     

    उसकी नजर एक सुंदर-सी लाल राखी पर जाकर रुक गई।

     

    दुकानदार ने कहा, “ले लो बिटिया, बहुत सुंदर है। सिर्फ बीस रुपये की है।”

     

    राधा ने अपनी मुट्ठी में दबे सिक्के देखे।

     

    उसके पास सिर्फ सात रुपये थे।

     

    वह मुस्कुराई और बोली, “अगली बार ले लूँगी।”

     

    दुकानदार ने उसे जाते हुए देखा, लेकिन कुछ नहीं कहा।

     

    राधा घर लौट आई।

     

    मोहन ने पूछा, “दीदी, बाजार गई थीं?”

     

    “हाँ।”

     

    “मेरे लिए राखी लाई?”

     

    राधा ने मुस्कुराकर कहा, “तुम्हें कैसी राखी चाहिए?”

     

    मोहन हँसते हुए बोला, “ऐसी राखी जिसमें सबसे ज्यादा प्यार हो।”

     

    राधा ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “फिर तो मैं तुम्हारे लिए दुनिया की सबसे अच्छी राखी बनाऊँगी।”

     

    रात को मोहन सो गया।

     

    राधा ने घर के कोने में रखे पुराने कपड़ों को देखा। उसने अपनी माँ की पुरानी लाल साड़ी का एक छोटा टुकड़ा निकाला।

     

    उसकी आँखों में आँसू आ गए।

     

    उसे माँ की याद आ गई।

     

    माँ हर रक्षाबंधन पर मोहन की कलाई में राखी बाँधते हुए कहती थीं—

     

    “मेरे बेटे, अपनी बहन का हमेशा ख्याल रखना।”

     

    राधा ने साड़ी के उस टुकड़े को धीरे-धीरे काटा और उससे राखी बनाने लगी।

     

    उसने एक पुराने धागे में लाल कपड़ा बाँधा और बीच में अपनी टूटी हुई चूड़ी का छोटा-सा टुकड़ा लगा दिया।

     

    राखी सुंदर नहीं थी।

     

    लेकिन उसमें माँ की याद, बहन का प्यार और पूरे घर की भावनाएँ बंधी थीं।

     

    रक्षाबंधन की सुबह राधा ने मोहन को नहलाया।

     

    घर में मिठाई नहीं थी।

     

    उसने चूल्हे पर थोड़ा-सा गुड़ गर्म किया और आटे की छोटी-सी मीठी रोटी बना दी।

     

    मोहन ने पूछा, “दीदी, आज इतना अच्छा खाना?”

     

    राधा मुस्कुराई।

     

    “आज रक्षाबंधन है ना।”

     

    मोहन चुप हो गया।

     

    उसने अपनी जेब से पाँच रुपये निकाले।

     

    “ये लो।”

     

    राधा ने पूछा, “कहाँ से आए?”

     

    मोहन बोला, “कल दुकान मालिक ने दिए थे।”

     

    “लेकिन तुमने अपने लिए कुछ नहीं खरीदा?”

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    मोहन ने हँसकर कहा—

     

    “मुझे क्या चाहिए? मेरी दीदी मेरे पास है, वही काफी है।”

     

    राधा की आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    उसने मोहन को अपने सामने बैठाया।

     

    उसकी कलाई पर वही लाल राखी बाँधी जो उसने माँ की साड़ी से बनाई थी।

     

    राखी बाँधते हुए राधा बोली—

     

    “भगवान से मेरी बस एक ही प्रार्थना है कि अगले जन्म में भी तू ही मेरा भाई बने।”

     

    मोहन ने तुरंत कहा—

     

    “और मैं हर जन्म में तेरा भाई बनूँगा।”

     

    दोनों गले लगकर रोने लगे।

     

    लेकिन उस दिन मोहन ने राधा से एक बात छिपाई थी।

     

    वह पिछले कई दिनों से बहुत बीमार था।

     

    चाय की दुकान पर काम करते समय उसे कई बार चक्कर आते थे। दुकान मालिक ने उसे आराम करने को कहा, लेकिन मोहन जानता था कि अगर वह काम नहीं करेगा तो घर में चूल्हा नहीं जलेगा।

     

    रक्षाबंधन के दो दिन बाद मोहन अचानक दुकान पर बेहोश होकर गिर पड़ा।

     

    दुकानदार उसे अस्पताल ले गया।

     

    डॉक्टर ने बताया कि मोहन को गंभीर बीमारी है और इलाज के लिए बहुत पैसे चाहिए।

     

    यह सुनकर राधा के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    उसने गाँव के लोगों से मदद माँगी।

     

    किसी ने पाँच रुपये दिए, किसी ने दस।

     

    लेकिन इलाज के लिए पैसे बहुत कम थे।

     

    राधा ने अपनी माँ की बची हुई आखिरी निशानी—एक छोटी-सी चाँदी की पायल—बेच दी।

     

    फिर भी पैसे पूरे नहीं हुए।

     

    एक रात मोहन ने कमजोर आवाज में कहा—

     

    “दीदी…”

     

    “हाँ भाई?”

     

    “अगर मैं ठीक न हो पाया तो रोना मत।”

     

    राधा चिल्लाई—

     

    “ऐसा मत बोल!”

     

    मोहन मुस्कुराया।

     

    “तूने मुझे हमेशा कहा है ना कि भगवान पर भरोसा रखना चाहिए।”

     

    राधा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तू ठीक होगा। मैं भगवान से लड़कर भी तुझे वापस लाऊँगी।”

     

    अगले दिन गाँव के स्कूल के शिक्षक को यह बात पता चली। उन्होंने गाँव वालों को इकट्ठा किया।

     

    सभी ने मिलकर मोहन के इलाज के लिए पैसे जमा किए।

     

    आखिरकार मोहन का इलाज शुरू हुआ।

     

    कई दिनों बाद उसकी हालत सुधरने लगी।

     

    राधा अस्पताल के बाहर बैठकर भगवान का धन्यवाद कर रही थी।

     

    उसने अपनी कलाई देखी।

     

    उसे याद आया कि मोहन ने रक्षाबंधन पर उससे कहा था—

     

    “हर जन्म में तेरा भाई बनूँगा।”

     

    राधा मुस्कुराई।

     

    उसने आसमान की ओर देखकर कहा—

     

    “भगवान, मेरा भाई मुझे दे दिया… अब मैं कुछ नहीं माँगती।”

     

    कुछ महीनों बाद मोहन पूरी तरह ठीक हो गया।

     

    वह फिर से चाय की दुकान पर जाने लगा।

     

    लेकिन इस बार गाँव के शिक्षक ने उसकी पढ़ाई की जिम्मेदारी भी ले ली।

     

    राधा को भी सिलाई का काम मिल गया।

     

    धीरे-धीरे दोनों की जिंदगी बदलने लगी।

     

    कई साल बीत गए।

     

    मोहन बड़ा होकर शहर में नौकरी करने लगा।

     

    पहली तनख्वाह मिलते ही वह गाँव आया।

     

    उसके हाथ में एक छोटा-सा डिब्बा था।

     

    राधा ने पूछा, “इसमें क्या है?”

     

    मोहन ने डिब्बा खोला।

     

    उसमें एक सुंदर चाँदी की राखी थी।

     

    मोहन ने वह राखी राधा के हाथ में रख दी।

     

    “दीदी, उस साल तूने माँ की पुरानी साड़ी से मुझे राखी बाँधी थी। आज मैं चाहता हूँ कि तू मेरी तरफ से यह राखी रख ले।”

     

    राधा की आँखें भर आईं।

     

    मोहन ने कहा—

     

    “उस दिन तूने मेरी कलाई पर सिर्फ राखी नहीं बाँधी थी। तूने मुझे जीने की वजह दी थी।”

     

    राधा ने उसे गले लगा लिया।

     

    दोनों की आँखों से आँसू बह रहे थे।

     

    लेकिन इस बार वे आँसू दुख के नहीं थे।

     

    वे उस प्यार के आँसू थे जिसने गरीबी को हरा दिया था।

     

    (सीख)

     

    भाई-बहन का रिश्ता धन-दौलत से नहीं, बल्कि प्यार, त्याग और विश्वास से मजबूत होता है। महंगी राखी या बड़े उपहार रिश्ते की कीमत तय नहीं करते। सच्चा प्यार वह है जो मुश्किल समय में बिना किसी स्वार्थ के एक-दूसरे का हाथ थामे रखे।

  • गरीब बहन की राखी

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    गरीब बहन की सबसे कीमती राखी

     

    “भैया, इस बार मेरी राखी थोड़ी सस्ती है… लेकिन इसमें प्यार पूरा है।”

     

    गुड़िया ने अपनी हथेली में रखी राखी को देखते हुए धीरे से कहा।

     

    राखी बहुत साधारण थी। कुछ रंगीन धागे थे, बीच में कागज से बना छोटा-सा फूल और किनारे पर दो मोती।

     

    बाजार से खरीदी हुई महंगी राखियों जैसी उसमें चमक नहीं थी।

     

    लेकिन उसे बनाने में गुड़िया ने अपनी पूरी रात लगा दी थी।

     

    उसका भाई मोहन शहर में एक छोटी-सी दुकान पर काम करता था। घर में मां और छोटी बहन गुड़िया ही थे।

     

    पिता का कई साल पहले निधन हो चुका था।

     

    मोहन ने तभी पढ़ाई छोड़ दी थी।

     

    उस समय गुड़िया बहुत छोटी थी।

     

    मोहन ने मां से कहा था,

     

    “आप चिंता मत करना। गुड़िया की पढ़ाई नहीं रुकेगी।”

     

    उस दिन से मोहन सुबह दुकान पर जाता और देर रात घर लौटता।

     

    गुड़िया पढ़ाई में बहुत अच्छी थी।

     

    वह हमेशा कहती,

     

    “भैया, एक दिन मैं बड़ी नौकरी करूंगी।”

     

    मोहन हंसकर कहता,

     

    “और तब मुझे काम नहीं करने देना।”

     

    गुड़िया तुरंत बोलती,

     

    “हां, सबसे पहले आपकी दुकान बंद करवाऊंगी।”

     

    दोनों हंस पड़ते।

     

    लेकिन इस साल घर की हालत पहले से ज्यादा खराब थी।

     

    माँ की दवाइयों का खर्च बढ़ गया था।

     

    मोहन कई दिनों से परेशान था।

     

    एक रात गुड़िया ने उसे मां की दवाइयों के बारे में दुकानदार से उधार मांगते हुए सुन लिया।

     

    “भाई, दो दिन का समय दे दो। पैसे मिलते ही दे दूंगा।”

     

    दुकानदार ने कहा,

     

    “मोहन, अब और उधार मुश्किल है।”

     

    गुड़िया चुपचाप कमरे में लौट आई।

     

    उसने अपनी छोटी-सी गुल्लक निकाली।

     

    गुल्लक तोड़ी।

     

    अंदर सिर्फ सत्ताईस रुपये थे।

     

    वह उन पैसों को देखकर उदास हो गई।

     

    “इनसे तो राखी भी नहीं आएगी।”

     

    फिर उसके मन में एक विचार आया।

     

    उसने पुराने धागे निकाले।

     

    दो मोती खोजे।

     

    एक पुराने गिफ्ट रैपर से कागज काटकर छोटा-सा फूल बनाया।

     

    और रातभर बैठकर अपने भाई के लिए राखी बना दी।

     

    अगली सुबह मोहन दुकान जाने लगा तो गुड़िया ने पूछा,

     

    “भैया, रक्षाबंधन पर छुट्टी मिलेगी?”

     

    मोहन ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “तेरे लिए तो छुट्टी लेनी पड़ेगी।”

     

    “सच?”

     

    “हां।”

     

    गुड़िया खुशी से बोली,

     

    “लेकिन मेरे पास आपके लिए बहुत महंगा गिफ्ट नहीं है।”

     

    मोहन ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “मुझे गिफ्ट नहीं चाहिए।”

     

    “तो क्या चाहिए?”

     

    “बस तू खुश रह।”

     

    गुड़िया मुस्कुरा दी।

     

    लेकिन उसी शाम घर में एक बड़ी परेशानी आ गई।

     

    माँ की तबीयत अचानक खराब हो गई।

     

    मोहन उन्हें अस्पताल ले गया।

     

    डॉक्टर ने कुछ जांचें लिख दीं।

     

    दवा और जांच का खर्च सुनकर मोहन परेशान हो गया।

     

    गुड़िया ने पूछा,

     

    “कितने पैसे चाहिए?”

     

    मोहन ने कहा,

     

    “तू इसकी चिंता मत कर।”

     

    लेकिन गुड़िया समझ गई कि पैसे बहुत ज्यादा हैं।

     

    उसने अपनी पढ़ाई की किताबों के बीच रखा एक लिफाफा निकाला।

     

    उसमें उसकी छात्रवृत्ति से बचाए हुए पैसे थे।

     

    उसने सारे पैसे मोहन को दे दिए।

     

    “ये ले लो।”

     

    मोहन ने हैरानी से पूछा,

     

    “ये कहां से आए?”

     

    “मेरी पढ़ाई के लिए थे।”

     

    “नहीं। ये मैं नहीं लूंगा।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि तेरी पढ़ाई ज्यादा जरूरी है।”

     

    गुड़िया ने उसकी आंखों में देखकर कहा,

     

    “भैया, आपने मेरी पूरी जिंदगी की चिंता की है। आज मुझे आपकी चिंता करने दीजिए।”

     

    मोहन चुप हो गया।

     

    अंततः इलाज हुआ।

     

    माँ कुछ दिनों में ठीक होने लगीं।

     

    लेकिन रक्षाबंधन का दिन आ गया।

     

    गुड़िया ने सुबह जल्दी उठकर पूजा की थाली सजाई।

     

    उसने वही साधारण राखी थाली में रखी।

     

    मोहन उसके सामने बैठा।

     

    गुड़िया ने तिलक लगाया।

     

    फिर राखी उठाई।

     

    “भैया, आंखें बंद करो।”

     

    मोहन ने आंखें बंद कर लीं।

     

    गुड़िया ने राखी उसकी कलाई पर बांध दी।

     

    मोहन ने आंखें खोलीं।

     

    राखी देखकर वह कुछ पल चुप रहा।

     

    “ये तूने बनाई?”

     

    गुड़िया ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    “बहुत सुंदर है।”

     

    गुड़िया हंस पड़ी।

     

    “झूठ बोल रहे हो।”

     

    “बिल्कुल नहीं।”

     

    मोहन ने अपनी जेब से एक छोटा-सा डिब्बा निकाला।

     

    गुड़िया ने पूछा,

     

    “क्या है?”

     

    “तेरे लिए।”

     

    अंदर एक सुंदर-सी किताब थी।

     

    गुड़िया की आंखें चमक उठीं।

     

    “ये तो बहुत महंगी होगी।”

     

    मोहन मुस्कुराया।

     

    “तेरी किताबों से महंगी कोई चीज नहीं।”

     

    गुड़िया किताब को सीने से लगाकर बैठ गई।

     

    फिर उसने भाई की कलाई को देखा।

     

    “भैया, एक बात बताऊं?”

     

    “बोल।”

     

    “मैंने ये राखी बहुत सस्ते सामान से बनाई है।”

     

    “तो?”

     

    “लेकिन मेरे लिए ये सबसे महंगी राखी है।”

     

    मोहन ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    गुड़िया ने धीरे से कहा,

     

    “क्योंकि इसे बनाते समय मैंने सोचा था कि अगर मेरे पास पैसे नहीं हैं, तो क्या हुआ… मेरे पास आपका प्यार तो है।”

     

    मोहन की आंखों में आंसू आ गए।

     

    उसने बहन का हाथ पकड़ लिया।

     

    “गुड़िया, तूने मुझे आज बहुत बड़ा गिफ्ट दिया है।”

     

    “क्या?”

     

    “ये याद दिलाया कि अमीर होने के लिए बहुत पैसे नहीं चाहिए।”

     

    गुड़िया मुस्कुराई।

     

    “फिर?”

     

    “बस घर में ऐसे लोग होने चाहिए, जो मुश्किल में साथ खड़े रहें।”

     

    तभी मां ने दोनों को पास बुलाया।

     

    उन्होंने राखी देखकर कहा,

     

    “मोहन, ये राखी संभालकर रखना।”

     

    मोहन ने कहा,

     

    “इसे कभी नहीं उतारूंगा।”

     

    गुड़िया हंसते हुए बोली,

     

    “कुछ दिन बाद तो धागा खुद टूट जाएगा।”

     

    मोहन ने उसकी तरफ देखकर कहा,

     

    “धागा टूटेगा… वादा नहीं।”

     

    साल बीतते गए।

     

    गुड़िया ने पढ़ाई पूरी की।

     

    उसे शहर के एक बड़े अस्पताल में नौकरी मिल गई।

     

    पहली तनख्वाह मिलने के बाद वह सीधे बाजार गई।

     

    उसने एक सुंदर डिब्बा खरीदा।

     

    घर आकर मोहन के सामने रखा।

     

    “भैया, ये आपके लिए।”

     

    मोहन ने डिब्बा खोला।

     

    अंदर एक महंगी घड़ी थी।

     

    वह चौंक गया।

     

    “इतने पैसे खर्च करने की क्या जरूरत थी?”

     

    गुड़िया मुस्कुराई।

     

    “याद है, आपने कहा था कि मैं बड़ी नौकरी करूंगी तो आपको काम नहीं करने दूंगी?”

     

    मोहन हंस पड़ा।

     

    “हां।”

     

    “तो अब दुकान बंद।”

     

    मोहन की आंखें भर आईं।

     

    “पगली…”

     

    गुड़िया ने उसकी कलाई पकड़ ली।

     

    उसकी नजर उस पुराने धागे पर पड़ी जो अब भी राखी के साथ बचा हुआ था।

     

    वह पूरी राखी नहीं थी।

     

    बस एक छोटा-सा धागा बचा था।

     

    गुड़िया ने पूछा,

     

    “आपने इसे अब तक संभालकर रखा?”

     

    मोहन ने कहा,

     

    “तूने कहा था ना, इसमें प्यार पूरा है।”

     

    गुड़िया की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    उसने भाई को गले लगा लिया।

     

    उस दिन मोहन ने महसूस किया कि उसकी बहन ने उसे कोई महंगी घड़ी नहीं दी थी।

     

    उसने तो सालों पहले ही एक ऐसी राखी दे दी थी जिसकी कीमत पैसे से नहीं लगाई जा सकती थी।

     

    क्योंकि कुछ राखियां सोने-चांदी से नहीं बनतीं।

     

    वे बनती हैं छोटे-से धागे, सच्चे प्यार और उस भरोसे से…

     

    जो कहता है—

     

    “मुश्किल चाहे कितनी भी बड़ी हो, मैं तुम्हारा साथ कभी नहीं छोड़ूंगी।”

  • एक अंजान भाई के नाम राखी

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    एक अनजान भाई के नाम राखी

     

    “दीदी, अगर आपका कोई भाई नहीं है… तो ये राखी किसके लिए है?”

     

    दस साल की छवि ने दुकान के सामने खड़े छोटे बच्चे को देखा और मुस्कुराकर बोली,

     

    “पता नहीं… शायद किसी ऐसे भाई के लिए, जो अभी मुझे मिला नहीं है।”

     

    बच्चा हंसकर आगे बढ़ गया।

     

    लेकिन छवि के हाथ में पकड़ी वह राखी उसके लिए सिर्फ राखी नहीं थी।

     

    हर साल वह एक राखी खरीदती थी।

     

    और हर साल वही सवाल उसके मन में उठता—

     

    “मेरा भाई आखिर कहां है?”

     

    छवि के पास अपने परिवार की कोई पुरानी तस्वीर नहीं थी। उसे सिर्फ इतना पता था कि बचपन में उसकी माँ के साथ एक छोटा लड़का भी रहता था।

     

    माँ उसे हमेशा “तेरा भैया” कहती थीं।

     

    लेकिन छवि को उसका चेहरा याद नहीं था।

     

    एक दिन उसने माँ से पूछा था,

     

    “माँ, मेरा भाई कहां है?”

     

    माँ की आंखें भर आई थीं।

     

    “बहुत दूर।”

     

    “कब आएगा?”

     

    “जब भगवान चाहेंगे।”

     

    बस यही जवाब उसे हमेशा मिला।

     

    साल गुजरते गए।

     

    छवि बड़ी हो गई।

     

    माँ की तबीयत भी अब पहले जैसी नहीं रहती थी।

     

    एक दिन माँ ने उसे अपने पास बुलाया।

     

    “छवि, मेरे पास तुझे देने के लिए कुछ है।”

     

    उन्होंने पुराने संदूक से एक कपड़े में लिपटा छोटा-सा डिब्बा निकाला।

     

    छवि ने डिब्बा खोला।

     

    अंदर एक पुरानी तस्वीर थी।

     

    तस्वीर में एक छोटी बच्ची और लगभग पांच साल का लड़का खड़ा था।

     

    लड़के के हाथ में राखी बंधी थी।

     

    छवि तस्वीर देखते ही चुप हो गई।

     

    “माँ… ये?”

     

    माँ ने कहा,

     

    “तेरा भाई है।”

     

    “नाम?”

     

    “आर्यन।”

     

    छवि ने तस्वीर सीने से लगा ली।

     

    “वो कहां है?”

     

    माँ की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “तेरे पिता के गुजरने के बाद हालात बहुत खराब हो गए थे। आर्यन को उसके मामा अपने साथ ले गए थे। फिर संपर्क टूट गया।”

     

    छवि ने पूछा,

     

    “आपने उसे ढूंढा नहीं?”

     

    “बहुत कोशिश की।”

     

    “फिर?”

     

    “किस्मत ने साथ नहीं दिया।”

     

    उस रात छवि ने तस्वीर अपने तकिए के नीचे रख ली।

     

    अगले दिन उसने इंटरनेट और पुराने कागजों की मदद से आर्यन को ढूंढना शुरू किया।

     

    कई नाम मिले।

     

    कई पते मिले।

     

    लेकिन कोई पक्का सुराग नहीं मिला।

     

    फिर उसे एक पुराने स्कूल रिकॉर्ड में एक नाम मिला—

     

    आर्यन मिश्रा।

     

    पता था—एक छोटे से शहर का।

     

    छवि ने तुरंत वहां जाने का फैसला किया।

     

    कई घंटों की यात्रा के बाद वह उस पते पर पहुंची।

     

    वहां अब एक छोटी-सी किताबों की दुकान थी।

     

    छवि ने दुकानदार से पूछा,

     

    “क्या यहां आर्यन नाम का कोई आदमी रहता था?”

     

    दुकानदार ने उसे गौर से देखा।

     

    “आप कौन हैं?”

     

    “मैं… उसकी बहन हूं।”

     

    दुकानदार कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसने सामने बैठे एक युवक की तरफ इशारा किया।

     

    “वो रहा।”

     

    छवि की धड़कन रुक गई।

     

    युवक लगभग तीस साल का था।

     

    सादा कपड़े, शांत चेहरा और आंखों में एक अजीब-सी उदासी।

     

    छवि धीरे-धीरे उसके पास गई।

     

    “आपका नाम आर्यन है?”

     

    उसने किताब से नजर उठाई।

     

    “जी।”

     

    छवि ने कांपते हाथों से पुरानी तस्वीर उसके सामने रख दी।

     

    आर्यन ने तस्वीर देखी।

     

    उसका चेहरा अचानक बदल गया।

     

    “ये तस्वीर… आपको कहां मिली?”

     

    “माँ के पास।”

     

    आर्यन खड़ा हो गया।

     

    “माँ?”

     

    छवि की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “हां… हमारी माँ।”

     

    आर्यन कुछ बोल नहीं पाया।

     

    छवि ने धीरे से कहा,

     

    “मैं छवि हूं।”

     

    आर्यन ने उसे देखा।

     

    कुछ पल बाद उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।

     

    “मेरी छोटी बहन?”

     

    छवि ने सिर हिला दिया।

     

    अगले ही पल आर्यन ने उसे गले लगा लिया।

     

    दोनों की आंखों से आंसू बह रहे थे।

     

    पंद्रह साल की दूरी कुछ ही सेकंड में खत्म हो गई।

     

    आर्यन ने पूछा,

     

    “माँ कैसी हैं?”

     

    “कमजोर हो गई हैं।”

     

    “मैंने उन्हें बहुत याद किया।”

     

    “उन्होंने भी।”

     

    आर्यन ने आंखें पोंछीं।

     

    “मुझे लगा था शायद वो मुझे भूल गई होंगी।”

     

    छवि ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “माँ आपको हर रक्षाबंधन याद करती थीं।”

     

    आर्यन की नजर उसके हाथ में पकड़ी राखी पर पड़ी।

     

    “ये किसके लिए है?”

     

    छवि ने राखी आगे कर दी।

     

    “आपके लिए।”

     

    आर्यन ने अपनी कलाई आगे कर दी।

     

    छवि ने राखी बांधते हुए कहा,

     

    “मैं हर साल एक राखी खरीदती थी।”

     

    आर्यन ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मुझे विश्वास था कि एक दिन मेरा भाई मुझे जरूर मिलेगा।”

     

    आर्यन की आंखों में आंसू आ गए।

     

    उसने जेब से एक पुराना कागज निकाला।

     

    “मैं भी हर साल एक राखी संभालकर रखता था।”

     

    छवि ने हैरानी से पूछा,

     

    “किसकी?”

     

    आर्यन मुस्कुराया।

     

    “तुम्हारी।”

     

    “लेकिन मैंने तो आपको कोई राखी भेजी ही नहीं।”

     

    “मुझे पता था।”

     

    “फिर?”

     

    आर्यन ने कहा,

     

    “मैं बाजार से राखी खरीदता था और खुद से कहता था कि जब मेरी बहन मिलेगी, तब उसकी कलाई पर बांधूंगा।”

     

    छवि कुछ बोल नहीं पाई।

     

    दोनों भाई-बहन उसी दुकान के बाहर बैठ गए।

     

    आर्यन ने कहा,

     

    “तुम्हें बचपन की कुछ बातें याद हैं?”

     

    छवि ने हंसकर कहा,

     

    “बस इतना कि आप मेरी चॉकलेट चुरा लेते थे।”

     

    आर्यन जोर से हंसा।

     

    “अच्छा! ये याद है?”

     

    “हां।”

     

    “तो मैं मान गया कि तू सच में मेरी बहन है।”

     

    छवि भी हंस पड़ी।

     

    कुछ देर बाद दोनों माँ के पास लौटने के लिए निकल पड़े।

     

    दरवाजा खुलते ही माँ की नजर आर्यन पर पड़ी।

     

    वह कुछ सेकंड उसे देखती रहीं।

     

    फिर उनकी आंखों से आंसू बह निकले।

     

    “आर्यन…”

     

    आर्यन उनके पैरों में बैठ गया।

     

    “माँ… देर हो गई।”

     

    माँ ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “लेकिन तू आ गया।”

     

    छवि एक तरफ खड़ी मुस्कुरा रही थी।

     

    उसने देखा कि आर्यन की कलाई पर राखी चमक रही थी।

     

    माँ ने पूछा,

     

    “तूने राखी बांधी?”

     

    छवि ने कहा,

     

    “हां।”

     

    आर्यन ने बहन की तरफ देखकर कहा,

     

    “और इस बार ये राखी कभी नहीं उतारूंगा।”

     

    छवि मुस्कुराई।

     

    “भैया, राखी कुछ दिन बाद खुद टूट जाएगी।”

     

    “तो?”

     

    “नई बांध दूंगी।”

     

    आर्यन ने कहा,

     

    “हर साल?”

     

    “हर साल।”

     

    उस दिन छवि ने अपनी जिंदगी में पहली बार महसूस किया कि उसके पास सिर्फ एक भाई नहीं था।

     

    उसके पास खोई हुई यादों का एक पूरा संसार वापस आ गया था।

     

    रात को उसने अपनी पुरानी डायरी खोली और लिखा—

     

    “आज मैंने एक अनजान इंसान की कलाई पर राखी बांधी थी। लेकिन राखी बंधते ही वह अनजान नहीं रहा। वह मेरा भाई बन गया।”

     

    फिर उसने नीचे एक और लाइन लिखी—

     

    “कभी-कभी रिश्ते जन्म से नहीं, पहचान से मिलते हैं… और कभी एक छोटी-सी राखी किसी खोए हुए रिश्ते को वापस घर ले आती है।”

     

    अगली सुबह आर्यन ने छवि को आवाज दी।

     

    “छोटी!”

     

    छवि दौड़कर आई।

     

    “क्या हुआ?”

     

    आर्यन ने एक राखी उसके हाथ में रखी।

     

    “अगली राखी के लिए इसे संभालकर रखना।”

     

    छवि ने पूछा,

     

    “इतनी जल्दी?”

     

    • आर्यन मुस्कुराया।

     

    “अब मैं तुझे सिर्फ एक रक्षाबंधन का भाई नहीं बनना चाहता।”

     

    छवि ने उसकी बात समझते हुए मुस्कुराकर कहा,

     

    “फिर?”

     

    आर्यन ने कहा,

     

    “पूरी जिंदगी का भाई।”

     

    छवि ने उसकी कलाई पकड़ ली।

     

    “वादा?”

    आर्यन ने कहा,

    “वादा।”

     

    और उस दिन एक बहन की बरसों पुरानी तलाश खत्म हुई।

     

    उसकी राखी को आखिरकार अपनी कलाई मिल गई थी।

     

    और एक भाई को…

     

    अपनी बहन।

  • बिछड़ा भाई

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    राखी के दिन मिला बिछड़ा भाई

     

    “किसी ने सही कहा है… कुछ रिश्ते कितनी भी दूर चले जाएं, दिल उन्हें ढूंढ ही लेता है।”

     

    रेलवे स्टेशन की भीड़ में पायल एक छोटे-से बच्चे का हाथ पकड़े खड़ी थी। उसकी आंखें बार-बार प्लेटफॉर्म पर जा रही थीं।

     

    आज रक्षाबंधन था।

     

    वह अपनी माँ के साथ मायके जा रही थी, लेकिन उसके मन में त्योहार की खुशी से ज्यादा एक पुरानी कमी थी।

     

    उसका भाई समीर।

     

    पंद्रह साल पहले दोनों अलग हो गए थे।

     

    तब पायल सिर्फ सात साल की थी और समीर दस साल का।

     

    उनके पिता का एक छोटे शहर में किराने का कारोबार था। घर की हालत ठीक थी, लेकिन एक दिन अचानक पिता का निधन हो गया।

     

    घर पर कर्ज बढ़ता गया।

     

    माँ ने रिश्तेदारों की मदद से किसी तरह घर चलाने की कोशिश की।

     

    लेकिन उसी दौरान एक रिश्तेदार ने बच्चों को शहर के एक आश्रम में भेजने की बात कही।

     

    माँ मजबूर थीं।

     

    पायल को रिश्तेदारों के साथ भेज दिया गया और समीर को दूसरे शहर के एक बाल गृह में।

     

    माँ ने दोनों से कहा था,

     

    “कुछ दिन की बात है बेटा। हालात ठीक होते ही मैं तुम्हें वापस ले आऊंगी।”

     

    लेकिन हालात ठीक नहीं हुए।

     

    समय बीतता गया।

     

    पायल को माँ के साथ रहने का मौका मिल गया, लेकिन समीर का पता धीरे-धीरे खो गया।

     

    किसी ने कहा वह दूसरे शहर चला गया।

     

    किसी ने कहा उसे किसी परिवार ने गोद ले लिया।

     

    और फिर एक दिन…

     

    उसका नाम सिर्फ पुरानी याद बनकर रह गया।

     

    लेकिन पायल ने कभी उसे भुलाया नहीं।

     

    हर रक्षाबंधन पर वह एक राखी खरीदती।

     

    माँ से कहती,

     

    “जब भैया मिलेंगे ना, तब मैं सारी राखियां एक साथ बांधूंगी।”

     

    माँ की आंखों में आंसू आ जाते।

     

    लेकिन वह हमेशा कहतीं,

     

    “जरूर मिलेगा।”

     

    आज पंद्रह साल बाद पायल फिर मायके जा रही थी।

     

    उसके बैग में एक राखी थी।

     

    इस बार भी वही उम्मीद थी।

     

    ट्रेन स्टेशन पर पहुंची।

     

    पायल और उसकी माँ उतरकर बाहर जाने लगीं।

     

    तभी उसकी नजर सामने बैठे एक युवक पर पड़ी।

     

    वह लगभग पच्चीस साल का था।

     

    साधारण कपड़े, हाथ में छोटा बैग और चेहरे पर थकान।

     

    पायल कुछ कदम आगे बढ़ी।

     

    फिर अचानक रुक गई।

     

    उस युवक की कलाई पर एक पुराना निशान था।

     

    बचपन में समीर के हाथ पर भी ऐसा ही निशान था।

     

    पायल का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    वह धीरे-धीरे उसके पास गई।

     

    “माफ कीजिए… आपका नाम क्या है?”

     

    युवक ने उसकी तरफ देखा।

     

    “समीर।”

     

    पायल की आंखें फैल गईं।

     

    “क्या?”

     

    “समीर।”

     

    पायल की आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    उसने कांपती आवाज में पूछा,

     

    “आपकी बहन का नाम… पायल था?”

     

    युवक अचानक चुप हो गया।

     

    “आपको मेरा नाम कैसे पता?”

     

    पायल ने अपने बैग से एक पुरानी तस्वीर निकाली।

     

    तस्वीर में दो छोटे बच्चे खड़े थे।

     

    एक लड़की और एक लड़का।

     

    लड़के के हाथ में छोटी-सी लकड़ी की कार थी।

     

    समीर ने तस्वीर देखते ही उसे अपने हाथ में ले लिया।

     

    उसका चेहरा बदल गया।

     

    “ये…”

     

    पायल रोते हुए बोली,

     

    “ये मैं हूं।”

     

    समीर कुछ बोल नहीं पाया।

     

    फिर उसकी आंखों में पहचान की चमक आई।

     

    “पायल?”

     

    पायल ने सिर हिलाया।

     

    “भैया…”

     

    अगले ही पल दोनों एक-दूसरे से लिपट गए।

     

    पंद्रह साल की दूरी उस एक पल में जैसे खत्म हो गई।

     

    समीर रोते हुए कह रहा था,

     

    “मैंने तुझे बहुत ढूंढा था।”

     

    पायल ने कहा,

     

    “मैं भी।”

     

    “मुझे लगा तू मुझे भूल गई।”

     

    “मैं हर साल तुम्हारे लिए राखी खरीदती थी।”

     

    समीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “हर साल?”

     

    पायल ने अपने बैग से राखी निकाली।

     

    “आज भी।”

     

    समीर की आंखें भर आईं।

     

    उसने अपनी कलाई आगे कर दी।

     

    “तो बांध दे।”

     

    पायल ने स्टेशन के एक कोने में ही भाई की कलाई पर राखी बांध दी।

     

    उसके हाथ कांप रहे थे।

     

    “भैया… इतने सालों से ये राखी आपके लिए बची थी।”

     

    समीर ने राखी को देखते हुए कहा,

     

    “और मैं सोचता रहा कि शायद मुझे कोई याद भी नहीं करता।”

     

    पायल ने कहा,

     

    “माँ ने कभी आपको भुलाया नहीं।”

     

    समीर ने तुरंत पूछा,

     

    “माँ?”

     

    “वो मेरे साथ हैं।”

     

    समीर कुछ पल के लिए चुप हो गया।

     

    “क्या वो मुझे पहचानेंगी?”

     

    पायल ने उसकी तरफ देखा।

     

    “माँ तुम्हें भूल सकती हैं क्या?”

     

    कुछ देर बाद तीनों घर पहुंचे।

     

    दरवाजे पर माँ खड़ी थीं।

     

    पायल ने कुछ नहीं कहा।

     

    बस पीछे हट गई।

     

    समीर धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

     

    “माँ…”

     

    माँ ने उसे देखा।

     

    पहले तो उन्हें विश्वास नहीं हुआ।

     

    फिर उनकी आंखों में आंसू आ गए।

     

    “समीर?”

     

    समीर घुटनों के बल बैठ गया।

     

    “माँ…”

     

    माँ ने उसे गले लगा लिया।

     

    तीनों रोते रहे।

     

    उस दिन घर में कोई बड़ी सजावट नहीं थी।

     

    कोई महंगी मिठाई नहीं थी।

     

    लेकिन घर में पंद्रह साल बाद एक ऐसी खुशी लौटी थी, जिसकी कीमत कोई नहीं लगा सकता था।

     

    शाम को पायल ने भाई से पूछा,

     

    “भैया, आप इतने साल कहां थे?”

     

    समीर ने धीरे-धीरे अपनी कहानी सुनाई।

     

    बाल गृह से उसे एक दूसरे शहर में काम सीखने के लिए भेज दिया गया था।

     

    वह बड़ा हुआ, काम करने लगा।

     

    कई बार उसने परिवार को ढूंढने की कोशिश की, लेकिन कोई सही पता नहीं मिला।

     

    कुछ साल पहले उसे पिता का पुराना शहर पता चला था।

     

    वह वहां गया भी था।

     

    लेकिन तब तक घर बिक चुका था।

     

    उसे लगा शायद सब लोग कहीं और चले गए।

     

    “फिर आज यहां कैसे?”

     

    पायल ने पूछा।

     

    समीर मुस्कुराया।

     

    “मैं अपनी पुरानी यादों के पीछे आया था।”

     

    “मतलब?”

     

    “आज रक्षाबंधन था। बचपन में तू कहती थी कि एक दिन मुझे बहुत बड़ी राखी बांधेगी।”

     

    पायल हंसते हुए रो पड़ी।

     

    “तो आज बांध दी।”

     

    समीर ने अपनी कलाई देखी।

     

    “हां… और शायद यही राखी मुझे यहां तक खींच लाई।”

     

    पायल ने कहा,

     

    “अब कहीं मत जाना।”

     

    समीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “नहीं जाऊंगा।”

     

    माँ ने दोनों को पास बुलाया।

     

    “एक बात कहूं?”

     

    दोनों ने उनकी तरफ देखा।

     

    माँ बोलीं,

     

    “मैंने इतने साल भगवान से सिर्फ एक चीज मांगी थी।”

     

    “क्या?”

     

    “रक्षाबंधन के दिन मेरी बेटी की राखी मेरे बेटे की कलाई पर देखना।”

     

    माँ ने दोनों के सिर पर हाथ रखा।

     

    उस रात पायल ने अपनी पुरानी राखियों का डिब्बा निकाला।

     

    उसमें पंद्रह राखियां थीं।

     

    हर साल की एक राखी।

     

    समीर ने डिब्बा देखा तो हैरान रह गया।

     

    “तूने ये सब संभालकर रखीं?”

     

    पायल मुस्कुराई।

     

    “मैंने कहा था ना… जब तुम मिलोगे, तब सारी राखियां एक साथ बांधूंगी।”

     

    समीर ने मजाक में कहा,

     

    “पंद्रह राखियां एक साथ बांधेगी तो मेरी कलाई टूट जाएगी।”

     

    पायल हंस पड़ी।

     

    “तो अगले पंद्रह साल तक धीरे-धीरे बांध दूंगी।”

     

    माँ भी हंसने लगीं।

     

    उस रात घर में बहुत सालों बाद भाई की आवाज गूंजी।

     

    पायल को लगा जैसे उसका बचपन वापस आ गया हो।

     

    वही भाई।

     

    वही हंसी।

     

    वही रिश्ता।

     

    बस वक्त बहुत आगे निकल चुका था।

     

    अगली सुबह समीर ने अपनी बहन से कहा,

     

    “पायल, एक बात समझ आई।”

     

    “क्या?”

     

    “रिश्ते खोते नहीं हैं।”

     

    “फिर?”

     

    “बस कभी-कभी उनसे मिलने में देर हो जाती है।”

     

    पायल ने उसकी कलाई पर बंधी राखी को देखा।

     

    “और कुछ राखियां रास्ता दिखाती रहती हैं।”

     

    समीर मुस्कुराया।

     

    उसने बहन के सिर पर हाथ रखा।

     

    “अब हर रक्षाबंधन पर मैं खुद तेरे सामने बैठूंगा।”

     

    पायल ने कहा,

     

    “वादा?”

     

    “वादा।”

     

    और इस बार उस वादे का गवाह कोई तस्वीर या पुरानी राखी नहीं थी।

     

    गवाह था…

     

    पंद्रह साल बाद मिला एक भाई, उसकी बहन की कलाई में बंधा प्यार और वह घर, जिसने आखिरकार अपने दोनों बच्चों को फिर से एक साथ देख लिया था।

  • एक भाई जिसे अपनी बहन याद नहीं थी

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    जिस भाई को अपनी बहन याद नहीं थी

     

    “माफ कीजिए… क्या आप मुझे जानती हैं?”

     

    ये सवाल सुनते ही अनामिका के हाथ से राखी का डिब्बा नीचे गिर गया।

     

    सामने खड़ा आदमी उसका अपना भाई विवान था।

     

    वही भाई, जिसके साथ उसने बचपन की हर छोटी-बड़ी याद बांटी थी।

     

    लेकिन आज उसकी आंखों में अनजानापन था।

     

    अनामिका ने कांपती आवाज में पूछा,

     

    “भैया… मुझे पहचान नहीं रहे?”

     

    विवान ने कुछ पल उसे देखा।

     

    फिर सिर हिलाते हुए कहा,

     

    “नहीं।”

     

    अनामिका को लगा जैसे उसके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई हो।

     

    विवान की मां यानी उनकी माँ पीछे खड़ी थीं। उनकी आंखों से आंसू बह रहे थे।

     

    कुछ महीने पहले एक दुर्घटना के बाद विवान की याददाश्त चली गई थी। डॉक्टरों ने कहा था कि उसे पुरानी बातें याद आने में समय लग सकता है।

     

    लेकिन अनामिका को उम्मीद थी कि शायद उसे देखकर उसका भाई उसे पहचान लेगा।

     

    आखिर वह उसकी छोटी बहन थी।

     

    जिसे वह बचपन में प्यार से “नन्ही” कहता था।

     

    जिसके बिना खाना नहीं खाता था।

     

    जिसे स्कूल छोड़ने रोज जाता था।

     

    लेकिन आज…

     

    उसे कुछ याद नहीं था।

     

    अनामिका ने मुस्कुराने की कोशिश की।

     

    “कोई बात नहीं भैया। मैं… आपकी बहन हूं।”

     

    विवान ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मुझे सच में कुछ याद नहीं।”

     

    अनामिका ने सिर हिला दिया।

     

    “कोई बात नहीं।”

     

    वह अपने आंसू छिपाकर बाहर चली गई।

     

    उस दिन के बाद अनामिका रोज भाई से मिलने आती।

     

    कभी उसके लिए पसंद की मिठाई लाती।

     

    कभी बचपन की तस्वीरें दिखाती।

     

    कभी पुरानी बातें सुनाती।

     

    “भैया, आपको याद है? आपने एक बार मेरी गुल्लक तोड़ दी थी।”

     

    विवान हंसता।

     

    “मैंने?”

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि आपको क्रिकेट खेलने के लिए पैसे चाहिए थे।”

     

    विवान मुस्कुराता।

     

    “फिर?”

     

    “फिर आपने अपनी सारी बचत मुझे दे दी थी और कहा था कि गुल्लक वापस खरीद लेंगे।”

     

    विवान ध्यान से सुनता, लेकिन उसके चेहरे पर कोई पहचान नहीं आती।

     

    अनामिका को दुख होता।

     

    लेकिन उसने हार नहीं मानी।

     

    रक्षाबंधन आने वाला था।

     

    माँ ने कहा,

     

    “बेटा, इस बार राखी मत बांधना। अगर उसे कुछ याद नहीं है तो उसे अजीब लगेगा।”

     

    अनामिका ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं माँ। मैं राखी जरूर बांधूंगी।”

     

    “लेकिन वह तुझे पहचानता भी नहीं।”

     

    अनामिका ने धीरे से कहा,

     

    “राखी पहचान के लिए नहीं बांधी जाती माँ… रिश्ते के लिए बांधी जाती है।”

     

    रक्षाबंधन के दिन अनामिका एक छोटी-सी थाली लेकर भाई के कमरे में गई।

     

    विवान खिड़की के पास बैठा था।

     

    अनामिका ने पूछा,

     

    “भैया, आज आपको पता है कौन-सा दिन है?”

     

    विवान ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “आज रक्षाबंधन है।”

     

    “अच्छा।”

     

    “आज बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती है।”

     

    विवान ने अपनी कलाई आगे कर दी।

     

    “तो बांध दो।”

     

    अनामिका कुछ पल उसे देखती रही।

     

    उसकी आंखों में आंसू आ गए।

     

    उसने धीरे-धीरे राखी उसकी कलाई पर बांध दी।

     

    राखी बांधते समय उसके हाथ कांप रहे थे।

     

    विवान ने पूछा,

     

    “तुम रो क्यों रही हो?”

     

    अनामिका ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “खुशी के आंसू हैं।”

     

    राखी बांधने के बाद उसने उसके सामने मिठाई रखी।

     

    विवान ने मिठाई उठाई।

     

    फिर अचानक रुक गया।

     

    उसने राखी को गौर से देखा।

     

    “ये राखी…”

     

    अनामिका का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    “क्या हुआ?”

     

    “कुछ याद आ रहा है।”

     

    अनामिका तुरंत उसके पास बैठ गई।

     

    “क्या?”

     

    विवान ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “एक छोटी लड़की…”

     

    अनामिका की सांस रुक गई।

     

    “वो बहुत रो रही है।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि उसकी राखी टूट गई है।”

     

    अनामिका की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    विवान माथे पर हाथ रखकर बोला,

     

    “मैं उसे नई राखी देने के लिए बाजार जा रहा हूं।”

     

    अनामिका ने कांपते हुए पूछा,

     

    “फिर?”

     

    विवान ने आंखें खोलीं।

     

    “वो लड़की मुझे भैया कहती है।”

     

    अनामिका रोते हुए हंस पड़ी।

     

    “हां भैया… वही लड़की मैं हूं।”

     

    विवान उसे देखने लगा।

     

    कुछ पल बाद उसकी आंखों में पहचान की हल्की चमक आई।

     

    “नन्ही?”

     

    अनामिका जैसे जम गई।

     

    उसके मुंह से आवाज नहीं निकली।

     

    फिर वह भाई के गले लगकर रो पड़ी।

     

    “भैया!”

     

    विवान भी भावुक हो गया।

     

    “नन्ही…”

     

    दोनों काफी देर तक एक-दूसरे को पकड़े रहे।

     

    माँ दरवाजे पर खड़ी रो रही थीं।

     

    लेकिन तभी विवान अचानक पीछे हट गया।

     

    उसने सिर पकड़ लिया।

     

    “मुझे सब याद नहीं आ रहा।”

     

    अनामिका ने उसका हाथ पकड़ा।

     

    “कोई बात नहीं।”

     

    “लेकिन मुझे इतना याद है कि तू मेरी बहन है।”

     

    अनामिका मुस्कुराई।

     

    “मेरे लिए इतना ही काफी है।”

     

    उस दिन के बाद विवान की याददाश्त धीरे-धीरे वापस आने लगी।

     

    कुछ बातें पहले याद आईं।

     

    फिर कुछ चेहरे।

     

    फिर घर की यादें।

     

    लेकिन सबसे ज्यादा उसे अपनी बहन की बातें याद आने लगीं।

     

    एक दिन उसने अनामिका से कहा,

     

    “तू रोज मेरे पास क्यों आती थी?”

     

    अनामिका ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “क्योंकि मुझे डर था कि अगर मैं आना बंद कर दूंगी तो शायद आपको लगेगा कि मैं सच में आपकी बहन नहीं हूं।”

     

    विवान की आंखें नम हो गईं।

     

    “तूने मुझे याद दिलाने की कोशिश क्यों नहीं छोड़ी?”

     

    “क्योंकि आप भूल सकते थे कि मैं कौन हूं… लेकिन मैं कैसे भूल जाती कि आप कौन हैं?”

     

    विवान ने बहन के सिर पर हाथ रखा।

     

    “मुझे माफ कर दे।”

     

    “किस बात के लिए?”

     

    “तुझे पहचान नहीं पाया।”

     

    अनामिका ने सिर हिलाया।

     

    “इसमें आपकी गलती नहीं थी।”

     

    “लेकिन तूने मेरा साथ नहीं छोड़ा।”

     

    “भाई को याददाश्त खोने पर बहन थोड़ी छोड़ देती है।”

     

    कुछ महीनों बाद विवान पूरी तरह ठीक होने लगा।

     

    एक दिन उसने अपनी पुरानी अलमारी खोली।

     

    अंदर एक छोटा-सा डिब्बा रखा था।

     

    उसने डिब्बा निकाला।

     

    अंदर कई पुरानी राखियां थीं।

     

    विवान ने एक राखी उठाई।

     

    “ये किसकी है?”

     

    अनामिका ने देखकर कहा,

     

    “मेरी।”

     

    “इतनी सारी?”

     

    “हर साल की।”

     

    विवान मुस्कुराया।

     

    फिर उसने अपनी कलाई आगे कर दी।

     

    “अगली राखी के लिए नई राखी मत बनाना।”

     

    अनामिका ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि इस बार मैं खुद चुनूंगा।”

     

    “क्या?”

     

    “एक ऐसी राखी जिसमें सबसे मजबूत धागा हो।”

     

    अनामिका हंस पड़ी।

     

    “इतनी मजबूत क्यों?”

     

    विवान ने उसकी तरफ देखकर कहा,

     

    “ताकि अगर मेरी याददाश्त फिर कभी मेरा साथ छोड़ दे… तो भी वो धागा मुझे तेरे रिश्ते की याद दिलाता रहे।”

     

    अनामिका की आंखें भर आईं।

     

    उसने भाई की कलाई पकड़कर कहा,

     

    “अब आपको कभी भूलने नहीं दूंगी।”

     

    विवान मुस्कुराया।

     

    “और मैं तुझे कभी अकेला नहीं छोड़ूंगा।”

     

    उस रक्षाबंधन ने दोनों को एक बात सिखा दी थी—

     

    रिश्ते सिर्फ यादों से नहीं चलते।

     

    कभी-कभी यादें चली जाती हैं, चेहरे भूल जाते हैं, नाम मिट जाते हैं…

     

    लेकिन सच्चा प्यार अपना रास्ता खुद ढूंढ लेता है।

     

    और एक छोटी-सी राखी…

     

    कभी-कभी उस रास्ते की पहली निशानी बन जाती है।

  • एक राखी हजारों यादें

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    एक राखी, हजारों यादें

     

    “भैया की अलमारी खोलने की इजाजत मुझे कभी नहीं थी।”

     

    मीरा ने अलमारी के सामने खड़े होकर धीरे से खुद से कहा।

     

    आज कई साल बाद वह अपने पुराने घर में आई थी। माँ ने उसे फोन करके कहा था कि कमरे की सफाई कर दे, क्योंकि काफी समय से बंद पड़ा था।

     

    अलमारी खोलते ही पुराने कपड़ों की खुशबू कमरे में फैल गई।

     

    मीरा कपड़े निकालकर अलग कर रही थी कि अचानक पीछे की तरफ रखा एक छोटा-सा लकड़ी का डिब्बा नीचे गिर पड़ा।

     

    उसने डिब्बा उठाया।

     

    ऊपर धूल जमी थी।

     

    मीरा ने अपनी हथेली से धूल हटाई।

     

    डिब्बे पर छोटे अक्षरों में लिखा था—

     

    “मेरी छोटी बहन के लिए।”

     

    मीरा का हाथ रुक गया।

     

    यह उसके भाई आरव की लिखावट थी।

     

    वही आरव, जो छह साल पहले घर छोड़कर चला गया था।

     

    उसके बाद कभी वापस नहीं आया।

     

    घरवालों से उसकी आखिरी मुलाकात भी बहुत अच्छी नहीं रही थी।

     

    मीरा ने डिब्बा खोला।

     

    अंदर कई पुरानी राखियां रखी थीं।

     

    कुछ टूट चुकी थीं, कुछ के रंग फीके पड़ गए थे।

     

    सबसे ऊपर एक छोटी-सी राखी रखी थी, जो शायद मीरा ने बचपन में बनाई थी।

     

    उसे अचानक अपना बचपन याद आ गया।

     

    वह आठ साल की थी और आरव उससे छह साल बड़ा था।

     

    हर रक्षाबंधन पर वह भाई के पीछे भागती थी।

     

    “भैया, हाथ आगे करो।”

     

    आरव हाथ पीछे कर लेता।

     

    “पहले बताओ गिफ्ट क्या चाहिए?”

     

    मीरा मुंह बनाकर कहती,

     

    “आप पहले राखी बंधवाओ।”

     

    “नहीं। पहले गिफ्ट।”

     

    “ठीक है, इस बार गिफ्ट नहीं दूंगी।”

     

    “तो राखी भी नहीं बंधवाऊंगा।”

     

    दोनों की नोकझोंक चलती रहती।

     

    फिर आखिर में आरव खुद हाथ आगे कर देता।

     

    “चल, बांध दे।”

     

    मीरा हंसते हुए राखी बांधती और आरव उसके सिर पर हाथ रखकर कहता,

     

    “हमेशा खुश रहना।”

     

    मीरा की आंखों में आंसू आ गए।

     

    उसने अगली राखी उठाई।

     

    उसके साथ एक छोटी-सी पर्ची थी।

     

    “ये राखी उस साल की है, जब मीरा की स्कूल फीस भरने के लिए मैंने अपनी नई साइकिल नहीं खरीदी थी।”

     

    मीरा चौंक गई।

     

    उसे वह बात कभी पता नहीं थी।

     

    उसे हमेशा लगा था कि आरव ने साइकिल खरीदी ही नहीं क्योंकि उसे साइकिल पसंद नहीं थी।

     

    उसने अगली पर्ची उठाई।

     

    “ये राखी उस साल की है, जब मीरा को तेज बुखार था और मैंने पूरी रात उसके पास बैठकर बिताई थी।”

     

    मीरा की आंखें भर आईं।

     

    उसे याद था।

     

    उस रात वह बार-बार कह रही थी,

     

    “भैया, मुझे डर लग रहा है।”

     

    आरव उसका हाथ पकड़कर कह रहा था,

     

    “मैं हूं ना। तू सो जा।”

     

    मीरा ने अगली राखी उठाई।

     

    फिर एक और।

     

    हर राखी के साथ एक याद जुड़ी थी।

     

    कहीं उसने मीरा की स्कूल फीस के लिए अपनी चीज बेची थी।

     

    कहीं उसकी किताबें खरीदी थीं।

     

    कहीं उसकी गलती छिपाकर उसे पापा की डांट से बचाया था।

     

    मीरा डिब्बे के नीचे तक पहुंच गई।

     

    वहां एक बंद लिफाफा रखा था।

     

    लिफाफे पर लिखा था—

     

    “मीरा को तभी देना, जब उसे लगे कि उसका भाई उसे छोड़कर चला गया।”

     

    मीरा के हाथ कांपने लगे।

     

    उसने लिफाफा खोला।

     

    अंदर एक पत्र था।

     

    उसने पढ़ना शुरू किया।

     

    “मीरा,

     

    अगर तू ये पत्र पढ़ रही है, तो शायद तू मुझसे बहुत नाराज होगी।

     

    तुझे लगेगा कि मैं बिना कुछ कहे घर छोड़कर चला गया।

     

    तुझे लगेगा कि मुझे तुझसे कोई प्यार नहीं था।

     

    लेकिन सच कुछ और है।

     

    पापा की बीमारी के बाद घर पर बहुत कर्ज हो गया था। मैं चाहता था कि तेरी पढ़ाई किसी भी हालत में न रुके।

     

    मुझे शहर से बाहर नौकरी मिली थी।

     

    मैं जानता था कि अगर मैं चला गया तो तू मुझसे नाराज होगी।

     

    लेकिन अगर मैं नहीं जाता, तो शायद तेरी पढ़ाई रुक जाती।

     

    इसलिए मैंने जाने का फैसला किया।

     

    माँ से कहा कि तुझे मत बताना।

     

    मैं चाहता था कि तू पढ़ाई करे और अपने सपने पूरे करे।

     

    मैंने कभी तुझे अकेला छोड़ना नहीं चाहा।

     

    बस चाहता था कि तू अपने पैरों पर खड़ी हो जाए।

     

    और हां…

     

    हर रक्षाबंधन पर मैं तेरी राखी लेने आता था।

     

    तू मुझे देख नहीं पाती थी, क्योंकि मैं दूर से माँ को राखी दे जाता था।

     

    मुझे डर था कि अगर मैं सामने आ गया तो शायद वापस जाने की हिम्मत नहीं कर पाऊंगा।

     

    तू मुझे याद करती होगी।

     

    मैं भी तुझे हर दिन याद करता हूं।

     

    तेरा भाई।”

     

    मीरा पत्र को सीने से लगाकर फूट-फूटकर रोने लगी।

     

    तभी पीछे से माँ की आवाज आई,

     

    “तुझे मिल गया?”

     

    मीरा ने पलटकर देखा।

     

    “माँ… आपने मुझसे ये सब क्यों छिपाया?”

     

    माँ की आंखें भी भर आईं।

     

    “क्योंकि ये आरव की इच्छा थी।”

     

    “वो कहां है?”

     

    माँ कुछ पल चुप रहीं।

     

    फिर बोलीं,

     

    “पता नहीं।”

     

    मीरा ने हैरानी से पूछा,

     

    “क्या मतलब?”

     

    “पिछले साल तक वह कभी-कभी फोन करता था। फिर उसका फोन बंद हो गया।”

     

    मीरा का दिल बैठ गया।

     

    उसने तुरंत भाई का पुराना नंबर मिलाया।

     

    फोन बंद था।

     

    वह पूरी रात आरव की तस्वीरें देखती रही।

     

    बचपन की तस्वीरें।

     

    स्कूल की तस्वीरें।

     

    रक्षाबंधन की तस्वीरें।

     

    हर तस्वीर में एक ही चीज दिखाई दे रही थी—

     

    आरव की कलाई पर राखी।

     

    अगली सुबह मीरा ने फैसला किया।

     

    “माँ, मैं भैया को ढूंढने जाऊंगी।”

     

    “लेकिन कहां?”

     

    “जहां से उनका आखिरी फोन आया था।”

     

    कई घंटों की तलाश के बाद उसे पता चला कि आरव जिस शहर में काम करता था, वहां एक छोटी-सी दुकान थी जहां वह अक्सर जाया करता था।

     

    मीरा वहां पहुंची।

     

    दुकानदार ने उसे देखते ही पूछा,

     

    “आप आरव की बहन हैं?”

     

    मीरा की आंखें चमक उठीं।

     

    “जी! आपको पता है वो कहां हैं?”

     

    दुकानदार मुस्कुराया।

     

    “वो कुछ महीने पहले यहां से गया था। लेकिन जाने से पहले एक चीज मेरे पास छोड़ गया था।”

     

    उसने दराज से एक छोटा डिब्बा निकाला।

     

    मीरा ने डिब्बा खोला।

     

    अंदर एक नई राखी थी।

     

    और एक छोटी-सी पर्ची।

     

    “इस बार शायद मैं घर न आ पाऊं। लेकिन मेरी बहन राखी बांधना मत भूलना।”

     

    मीरा की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    वह उसी समय घर लौट आई।

     

    माँ के सामने बैठकर उसने राखी उठाई।

     

    “भैया जहां भी होंगे, आज मैं उन्हें राखी बांधूंगी।”

     

    उसने राखी अपनी कलाई पर बांधी।

     

    फिर आंखें बंद करके बोली,

     

    “भैया, आपने कहा था ना कि मैं हमेशा खुश रहूं?”

     

    उसकी आवाज भर्रा गई।

     

    “तो आप भी जहां हैं, खुश रहना।”

     

    अचानक बाहर दरवाजे पर दस्तक हुई।

     

    माँ ने दरवाजा खोला।

     

    सामने एक आदमी खड़ा था।

     

    हाथ में छोटा-सा बैग था।

     

    चेहरे पर हल्की मुस्कान।

     

    मीरा ने उसे देखा।

     

    कुछ सेकंड तक वह उसे पहचान ही नहीं पाई।

     

    फिर उसकी आंखें फैल गईं।

     

    “भैया…!”

     

    आरव ने मुस्कुराकर हाथ आगे कर दिया।

     

    “राखी लाई है?”

     

    मीरा दौड़कर उसके गले लग गई।

     

    दोनों की आंखों से आंसू बह रहे थे।

     

    कुछ देर बाद मीरा ने उसकी कलाई पर राखी बांधी।

     

    “इतने साल कहां थे?”

     

    आरव ने धीरे से कहा,

     

    “तेरी यादों में।”

     

    मीरा ने उसकी तरफ देखा।

     

    “अब कहीं मत जाना।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “अब नहीं जाऊंगा।”

     

    मीरा ने पुराने लकड़ी के डिब्बे को देखा।

     

    उसमें पड़ी हर राखी अब उसे सिर्फ धागा नहीं लग रही थी।

     

    हर राखी में उसके भाई का एक त्याग था।

     

    एक कहानी थी।

     

    एक याद थी।

     

    और सबसे बढ़कर…

     

    एक ऐसा प्यार था, जिसे दूरी भी खत्म नहीं कर सकी।

     

    उसने डिब्बा बंद किया और मुस्कुराते हुए कहा—

     

    “भैया, अब समझ आया… एक राखी में सिर्फ एक धागा नहीं होता। उसमें बचपन की शरारतें, लड़ाइयां, आंसू, त्याग और हजारों यादें बंधी होती हैं।”

    आरव ने उसकी कलाई पर हाथ रखा।

    “और उन यादों में सबसे खूबसूरत तू है।”

    मीरा मुस्कुरा दी।

     

    उस दिन दोनों भाई-बहन ने सिर्फ राखी का त्योहार नहीं मनाया।

    उन्होंने उन छह सालों को फिर से जी लिया…

    जिनमें दूरी बहुत थी,लेकिन प्यार उससे भी ज्यादा था।

  • बहन की राखी और भाई का राज़

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    बहन की राखी और भाई का राज़

     

    शहर के एक छोटे से मोहल्ले में सिया अपनी माँ के साथ रहती थी। रक्षाबंधन में बस दो दिन बाकी थे और सिया पूरे घर को सजाने में लगी थी।

     

    लेकिन एक बात उसे अंदर ही अंदर परेशान कर रही थी।

     

    उसका बड़ा भाई आकाश पिछले कुछ महीनों से बहुत बदल गया था।

     

    पहले वह हर छोटी-बड़ी बात अपनी बहन को बताता था। सिया को कोई परेशानी होती तो सबसे पहले आकाश को फोन करती। लेकिन अब आकाश फोन तो करता था, मगर कुछ मिनट बात करके जल्दी से फोन रख देता।

     

    सिया कई बार पूछ चुकी थी,

     

    “भैया, आप मुझसे कुछ छिपा रहे हो क्या?”

     

    आकाश हर बार हंसकर कहता,

     

    “नहीं पगली, ऐसी कोई बात नहीं है।”

     

    लेकिन सिया को यकीन नहीं होता।

     

    इस बार रक्षाबंधन पर उसने आकाश के लिए खुद राखी बनाई थी। राखी के बीच में एक छोटा-सा चांदी का दिल लगा था।

     

    वह राखी हाथ में लेकर मुस्कुराई।

     

    “देखना भैया, इस बार आपसे एक बड़ा गिफ्ट लूंगी।”

     

    माँ ने पीछे से आवाज लगाई,

     

    “पहले भाई को आने तो दे।”

     

    सिया ने हंसकर कहा,

     

    “आएगा क्यों नहीं? उसने खुद कहा है कि इस बार रक्षाबंधन मेरे साथ मनाएगा।”

     

    लेकिन अगले ही दिन आकाश का फोन आया।

     

    “सिया, इस बार शायद मैं घर नहीं आ पाऊंगा।”

     

    सिया कुछ सेकंड चुप रही।

     

    “क्यों?”

     

    “काम बहुत है।”

     

    “आपने वादा किया था।”

     

    “पता है… लेकिन मजबूरी है।”

     

    “आपकी मजबूरी क्या है?”

     

    आकाश चुप हो गया।

     

    फिर बोला,

     

    “राखी संभालकर रखना। मैं जल्दी आने की कोशिश करूंगा।”

     

    फोन कट गया।

     

    सिया को गुस्सा आ गया।

     

    “हर बार यही! जरूर कुछ छिपा रहे हैं।”

     

    उस रात सिया ने तय किया कि वह खुद पता लगाएगी।

     

    अगली सुबह उसने आकाश के पुराने दोस्त करण को फोन किया।

     

    “करण भैया, आपको पता है आकाश भैया इन दिनों इतने परेशान क्यों रहते हैं?”

     

    करण कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “सिया, मुझे नहीं लगता कि मुझे तुम्हें बताना चाहिए।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि आकाश खुद चाहता है कि तुमसे ये बात छिपी रहे।”

     

    सिया का दिल धड़क उठा।

     

    “मतलब कोई बड़ी बात है?”

     

    करण ने धीरे से कहा,

     

    “तुम उससे खुद पूछो।”

     

    “आप बस इतना बता दो कि वो ठीक हैं?”

     

    करण ने जवाब दिया,

     

    “हां, वो ठीक हैं।”

     

    लेकिन इस जवाब ने सिया की चिंता और बढ़ा दी।

     

    रक्षाबंधन की सुबह आ गई।

     

    घर में मिठाई बन रही थी। माँ ने पूजा की थाली सजा दी थी। सिया ने भी नए कपड़े पहन लिए थे।

     

    लेकिन उसका भाई अब तक नहीं आया था।

     

    दोपहर हो गई।

     

    फिर शाम।

     

    सिया बार-बार दरवाजे की तरफ देखती।

     

    माँ ने समझाया,

     

    “बेटा, शायद काम में फंस गया होगा।”

     

    सिया ने धीमे से कहा,

     

    “माँ, मुझे लगता है भैया किसी परेशानी में हैं।”

     

    तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।

     

    सिया दौड़कर बाहर गई।

     

    सामने आकाश खड़ा था।

     

    चेहरे पर थकान थी, कपड़े भी सफर की वजह से थोड़े अस्त-व्यस्त थे।

     

    लेकिन हाथ में मिठाई का डिब्बा था।

     

    सिया उसे देखते ही कुछ पल चुप रही।

     

    फिर बोली,

     

    “आपने कहा था नहीं आओगे।”

     

    आकाश मुस्कुराया,

     

    “अपनी बहन की राखी छोड़कर कैसे रहता?”

     

    सिया ने उसकी तरफ ध्यान से देखा।

     

    “भैया… आप ठीक तो हो?”

     

    “बिल्कुल।”

     

    “झूठ।”

     

    आकाश हंस पड़ा।

     

    “अंदर चल।”

     

    सिया ने पूजा की थाली तैयार की।

     

    आकाश उसके सामने बैठ गया।

     

    सिया ने तिलक लगाया, आरती की और फिर अपनी बनाई हुई राखी निकाली।

     

    उसने राखी आकाश की कलाई पर बांध दी।

     

    “अब बताइए।”

     

    आकाश ने पूछा,

     

    “क्या?”

     

    “आपका राज़।”

     

    आकाश की मुस्कान अचानक गायब हो गई।

     

    माँ भी चुप हो गईं।

     

    आकाश ने कुछ देर अपनी राखी को देखा।

     

    फिर जेब से एक पुराना लिफाफा निकाला।

     

    उसने लिफाफा सिया की तरफ बढ़ाया।

     

    “इसे खोल।”

     

    सिया ने लिफाफा खोला।

     

    अंदर कुछ कागज थे।

     

    वह उन्हें पढ़ने लगी।

     

    उसकी आंखें अचानक बड़ी हो गईं।

     

    “ये क्या है?”

     

    आकाश ने धीरे से कहा,

     

    “तुम्हारे कॉलेज की फीस की रसीदें।”

     

    सिया ने हैरानी से पूछा,

     

    “लेकिन मेरी फीस तो…”

     

    “पिछले दो साल से मैं भर रहा हूं।”

     

    सिया कुछ बोल नहीं पाई।

     

    “माँ ने कहा था कि अब घर की हालत ऐसी नहीं कि तुम्हारी पढ़ाई का पूरा खर्च उठा सकें। मैंने सोचा, जब तक मैं हूं, तुम्हारी पढ़ाई नहीं रुकेगी।”

     

    सिया की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “लेकिन आपने मुझे बताया क्यों नहीं?”

     

    आकाश मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि मैं चाहता था कि तू अपनी पढ़ाई को लेकर कभी चिंता न करे।”

     

    सिया ने सिर झुका लिया।

     

    फिर अचानक उसकी नजर आकाश के हाथ पर पड़ी।

     

    उसकी कलाई पर हल्की चोट का निशान था।

     

    “ये कैसे हुआ?”

     

    आकाश ने हाथ पीछे कर लिया।

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “भैया!”

     

    आकाश चुप रहा।

     

    सिया ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “सच बताइए।”

     

    आकाश ने लंबी सांस ली।

     

    “कुछ दिन पहले काम से लौटते समय रास्ते में गिर गया था।”

     

    “और आपने मुझे बताया तक नहीं?”

     

    “तू परेशान हो जाती।”

     

    सिया की आंखों से आंसू निकल आए।

     

    “मैं आपकी बहन हूं। आपकी परेशानी में परेशान होने का हक भी मेरा है।”

     

    आकाश कुछ नहीं बोला।

     

    तभी माँ ने धीमे से कहा,

     

    “सिया, अभी एक बात और है जो तुझे नहीं पता।”

     

    सिया ने माँ की तरफ देखा।

     

    माँ ने कहा,

     

    “तेरे भैया ने पिछले महीने अपनी बाइक बेच दी।”

     

    “क्या?”

     

    सिया ने आकाश की तरफ देखा।

     

    “क्यों?”

     

    आकाश चुप रहा।

     

    माँ बोलीं,

     

    “तेरे कॉलेज की आगे की पढ़ाई और हॉस्टल की फीस के लिए।”

     

    सिया की आंखों से आंसू लगातार बहने लगे।

     

    वह आकाश के पास जाकर बैठ गई।

     

    “भैया… आपको बाइक बहुत पसंद थी ना?”

     

    आकाश मुस्कुराया।

     

    “थी।”

     

    “फिर बेच दी?”

     

    “बाइक दोबारा खरीदी जा सकती है।”

     

    “लेकिन…”

     

    “लेकिन मेरी बहन की पढ़ाई का समय दोबारा नहीं आएगा।”

     

    सिया ने अपना सिर उसके कंधे पर रख दिया।

     

    “आप इतने अच्छे क्यों हो?”

     

    आकाश ने हंसकर कहा,

     

    “क्योंकि तू इतनी परेशान करने वाली बहन है।”

     

    दोनों हंस पड़े।

     

    लेकिन सिया का मन अभी भी भारी था।

     

    उसने राखी वाली कलाई को अपने हाथों में लिया।

     

    “भैया, आज मैं भी आपको एक वादा करूंगी।”

     

    “क्या?”

     

    “मैं आपकी मेहनत बेकार नहीं जाने दूंगी।”

     

    आकाश ने उसे देखा।

     

    “मतलब?”

     

    “मैं खूब पढ़ूंगी। अपने पैरों पर खड़ी होऊंगी। और एक दिन आपको वो सब वापस दूंगी जो आपने मेरे लिए छोड़ा है।”

     

    आकाश ने सिर हिलाया।

     

    “मुझे तुझसे कुछ वापस नहीं चाहिए।”

     

    “लेकिन मुझे देना है।”

     

    “क्यों?”

     

    सिया ने उसकी राखी की तरफ देखते हुए कहा,

     

    “क्योंकि आपने मेरी कलाई पर नहीं, मेरी जिंदगी पर भरोसे का धागा बांधा है।”

     

    आकाश की आंखें भी नम हो गईं।

     

    उसने बहन के सिर पर हाथ रखा।

     

    “बस एक बात याद रखना।”

     

    “क्या?”

     

    “जिंदगी में कितनी भी मुश्किल आए, अपने सपनों से समझौता मत करना।”

     

    सिया ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “वादा।”

     

    कुछ साल बाद सिया ने अपनी पढ़ाई पूरी कर ली।

     

    उसे एक अच्छी नौकरी मिल गई।

     

    पहली तनख्वाह मिलते ही वह बाजार गई और एक डिब्बा लेकर घर लौटी।

     

    आकाश ने पूछा,

     

    “क्या लाई है?”

     

    सिया ने डिब्बा उसकी तरफ बढ़ाया।

     

    अंदर एक सुंदर घड़ी थी।

     

    आकाश ने हैरानी से पूछा,

     

    “मेरे लिए?”

     

    सिया ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “उस बाइक की जगह तो नहीं ले सकती जो आपने मेरे लिए बेच दी थी… लेकिन ये आपकी मेहनत की पहली छोटी-सी वापसी है।”

     

    आकाश की आंखें भर आईं।

     

    सिया ने उसकी कलाई देखी।

     

    वही कलाई, जिस पर सालों पहले उसने एक छोटी-सी राखी बांधी थी।

     

    उसने धीरे से कहा,

     

    “भैया, आपका राज़ मुझे बहुत देर से पता चला।”

     

    आकाश मुस्कुराया।

     

    “और अब?”

     

    “अब समझ आया कि कुछ भाई अपनी बहन को सिर्फ राखी का तोहफा नहीं देते…”

     

    वह कुछ पल रुकी।

     

    “वे अपनी जिंदगी का एक हिस्सा उसके सपनों के नाम कर देते हैं।”

     

    आकाश ने बहन के सिर पर हाथ रखा।

     

    और उस दिन सिया को एहसास हुआ—

     

    राखी का धागा कलाई पर कुछ पल के लिए बंधता है, लेकिन भाई का प्यार पूरी जिंदगी साथ रहता है।