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श्रेणी: प्रेम कहानी

यहां दिल को छू लेने वाली खूबसूरत कहानियां पढ़ने और लिखने के लिए साझा की जाती है।

  • ❤️ तुम बिन — भाग 2 ❤️

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

     

     

     

    राजवंशी हवेली में अब फिर से खुशियाँ लौट आई थीं।जिस आँगन में कभी आरोही अकेली बैठकर आँसू बहाया करती थी, वहीं अब उसकी हँसी गूँजती थी।

     

    काव्या अब आरोही को बेटी नहीं, अपनी जिंदगी का सबसे खूबसूरत हिस्सा मानती थी।

     

    नैना और आरोही की बहन जैसी मोहब्बत और भी गहरी हो गई थी।

     

    और अर्जुन…

     

    वह तो आरोही की दुनिया बन चुका था।

     

    सुबह आरोही की आँख खुलने से पहले अर्जुन उसके लिए चाय रख देता।

     

    “आपको कैसे पता कि मुझे आज चाय चाहिए?”

     

    अर्जुन मुस्कुराता।

     

    “तुम्हारे चेहरे को पढ़ना सीख गया हूँ।”

     

    आरोही हँसते हुए कहती,

     

    “और अगर कभी मेरा चेहरा पढ़ नहीं पाए तो?”

     

    अर्जुन उसका हाथ पकड़कर कहता,

     

    “तब तुम्हारा हाथ पकड़ लूँगा… क्योंकि तुम्हारा हाथ हमेशा सच बोलता है।”

     

    आरोही की आँखों में प्यार उतर आता।

     

    लेकिन उसे नहीं पता था…

     

    उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा रहस्य अभी खुलना बाकी था।

     

    एक रात अचानक हवेली की बिजली चली गई।

     

    पूरी हवेली अंधेरे में डूब गई।

     

    आरोही खिड़की के पास खड़ी थी।

     

    तभी उसे नीचे पुराने बरगद के पास किसी के चलने की आवाज सुनाई दी।

     

    वह चौंक गई।

     

    “इस वक्त कौन हो सकता है?”

     

    आरोही ने अर्जुन को जगाया।

     

    दोनों नीचे गए।

     

    बरगद के पास कोई नहीं था।

     

    लेकिन वहाँ जमीन पर एक पुराना लिफाफा पड़ा था।

     

    लिफाफे पर सिर्फ एक नाम लिखा था—

     

    “आरोही के लिए।”

     

    आरोही के हाथ काँपने लगे।

     

    अर्जुन ने लिफाफा उठाया।

     

    “इसे अभी मत खोलो।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    अर्जुन कुछ पल चुप रहा।

     

    “क्योंकि मुझे लगता है… इसमें तुम्हारे अतीत से जुड़ी कोई बात है।”

     

    आरोही ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “अगर अतीत में कुछ गलत हुआ है तो मुझे जानना होगा।”

     

    उसने लिफाफा खोल दिया।

     

    अंदर सिर्फ एक कागज था।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “तुम्हें जिस माँ की मौत के बारे में बताया गया था… उसकी मौत प्राकृतिक नहीं थी।”

     

    आरोही के हाथ से कागज गिर गया।

     

    “मेरी… माँ?”

     

    अर्जुन ने उसे संभाल लिया।

     

    “आरोही…”

     

    वह रोते हुए बोली,

     

    “मेरी माँ की मौत कैसे हुई थी?”

     

    अर्जुन के पास कोई जवाब नहीं था।

     

    अगली सुबह आरोही सीधे धीरेंद्र के कमरे में पहुँची।

     

    “पापा, मुझे अपनी माँ के बारे में सब कुछ जानना है।”

     

    धीरेंद्र का चेहरा अचानक बदल गया।

     

    “किसने तुमसे ये सब कहा?”

     

    आरोही ने वह कागज उनके सामने रख दिया।

     

    धीरेंद्र की आँखों में डर उतर आया।

     

    काव्या भी वहीं थी।

     

    कागज देखते ही उसके हाथ से कप गिर गया।

     

    आरोही ने पहली बार महसूस किया कि…

     

    काव्या कुछ जानती है।

     

    “माँ… आपको पता है ना?”

     

    काव्या की आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।

     

    तभी धीरेंद्र ने पुरानी अलमारी खोली और एक तस्वीर निकालकर आरोही के हाथ में रख दी।

     

    तस्वीर में उसकी माँ सविता थीं।

     

    उनके साथ एक अनजान आदमी खड़ा था।

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “ये कौन हैं?”

     

    धीरेंद्र ने धीमे स्वर में कहा,

     

    “तुम्हारे मामा।”

     

    आरोही चौंक गई।

     

    “मेरे मामा?”

     

    “हाँ… लेकिन वह कई साल पहले गायब हो गए थे।”

     

    अर्जुन ने तस्वीर को ध्यान से देखा।

     

    फिर उसकी नजर तस्वीर के पीछे लिखे शब्दों पर गई।

     

    “अगर मुझे कुछ हो जाए तो मेरी बेटी को सच बता देना।”

     

    अर्जुन का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    उसी रात अर्जुन ने अपने आदमी राघव को बुलाया।

     

    “मुझे सविता के भाई के बारे में पूरी जानकारी चाहिए।”

     

    राघव ने कहा,

     

    “मैंने पता लगाया है। उनका नाम विक्रम सिंह था।”

     

    “और अब?”

     

    “पंद्रह साल से कोई खबर नहीं।”

     

    अर्जुन ने पूछा,

     

    “क्या वह जिंदा हैं?”

     

    राघव ने कुछ सेकंड चुप रहने के बाद कहा,

     

    “एक आदमी ने दावा किया है कि उसने उन्हें कुछ महीने पहले देखा था।”

     

    अर्जुन की आँखें सिकुड़ गईं।

     

    “कहाँ?”

     

    “इसी शहर 

     

    अगली सुबह आरोही के कमरे के दरवाजे पर एक और चिट्ठी मिली।

     

    “सच के बहुत करीब मत जाना।”

     

    आरोही डर गई।

     

    लेकिन अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “अब कोई तुम्हें नुकसान नहीं पहुँचा सकता।”

     

    “अगर खतरा तुम्हारे सामने आ गया तो?”

     

    अर्जुन ने उसकी आँखों में देखकर कहा,

     

    “तो मैं तुम्हारे सामने खड़ा हो जाऊँगा।”

     

    आरोही की आँखों से आँसू बह निकले।

     

    “मुझे डर लगता है…”

     

    अर्जुन ने उसे अपनी बाँहों में ले लिया।

     

    “डरना मत। जब तक मैं हूँ, तुम्हें अकेले नहीं लड़ना पड़ेगा।”

     

    उस पल आरोही ने पहली बार महसूस किया—

     

    प्यार सिर्फ किसी के साथ हँसना नहीं होता… प्यार वह है जो डर के समय ढाल बन जाए।

     

    रात को काव्या अकेली बैठी रो रही थी।

     

    आरोही उसके पास गई।

     

    “माँ…”

     

    काव्या ने उसकी ओर देखा।

     

    “मैंने तुम्हें बहुत दर्द दिया है।”

     

    आरोही उसके पास बैठ गई।

     

    “जो बीत गया उसे भूल जाइए।”

     

    काव्या ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं बेटी… अब मुझे तुम्हें सच बताना होगा।”

     

    आरोही का दिल तेज धड़कने लगा।

     

    काव्या ने कहा,

     

    “तुम्हारी माँ की मौत के पीछे किसी और का हाथ था।”

     

    “किसका?”

     

    काव्या की आवाज काँपने लगी।

     

    “धीरेंद्र का नहीं…”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “फिर?”

     

    काव्या ने धीरे से कहा—

     

    “विक्रम का।”

     

    आरोही स्तब्ध रह गई।

     

    “मेरे मामा?”

     

    काव्या ने सिर झुका लिया।

     

    “तुम्हारे मामा को लगता था कि तुम्हारे पिता ने उनकी सारी संपत्ति छीन ली। उन्होंने बदला लेने की कोशिश की थी।”

     

    तभी दरवाजे के बाहर किसी के कदमों की आवाज आई।

     

    दोनों चुप हो गईं।

     

    दरवाजा खुला।

     

    लेकिन वहाँ कोई उसी रात हवेली के बाहर एक काली कार आकर रुकी।

     

    एक अधेड़ उम्र का आदमी कार से उतरा।

     

    उसने हवेली की तरफ देखा।

     

    उसकी आँखों में नफरत थी।

     

    “पंद्रह साल…”

     

    उसने धीमे से कहा।

     

    “अब हिसाब पूरा होगा।”

     

    लेकिन उसे नहीं पता था कि हवेली में कोई और भी था जो उसका इंतजार कर रहा था।

     

    अर्जुन।

     

    अर्जुन ने उसे दूर से देख लिया था।

     

    उसने तुरंत राघव को फोन किया।

     

    “वह वापस आ गया है।”

     

    “कौन?”

     

    अर्जुन ने कहा—

     

    “विक्रम।”

     

    उस रात अर्जुन कमरे में आया तो आरोही खिड़की के पास खड़ी थी।

     

    “आप मुझसे कुछ छिपा रहे हैं?”

     

    अर्जुन चुप रहा।

     

    आरोही उसकी तरफ मुड़ी।

     

    “आपने मुझसे वादा किया था कि मेरे सामने कभी झूठ नहीं बोलेंगे।”

     

    अर्जुन उसके करीब आया।

     

    “मैं तुमसे झूठ नहीं बोल रहा।”

     

    “फिर?”

     

    अर्जुन ने उसका हाथ थाम लिया।

     

    “मैं तुम्हें खोने से डरता हूँ।”

     

    आरोही की आँखें भर आईं।

     

    “आप मुझे खो नहीं सकते।”

     

    “क्यों?”

     

    आरोही ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “क्योंकि मैंने अपना दिल आपको दे दिया है।”

     

    अर्जुन ने उसके माथे को चूमते हुए कहा,

     

    “और मैं वादा करता हूँ… तुम्हारे इस दिल को कभी टूटने नहीं दूँगा।”अगले दिन विक्रम हवेली में घुस आया।धीरेंद्र उसे देखकर स्तब्ध रह गए।“विक्रम!”

     

    विक्रम हँसा।

     

    “हाँ… मैं जिंदा हूँ।”

     

    काव्या पीछे हट गई।

     

    आरोही ने काँपते हुए पूछा,

     

    “आप मेरी माँ के साथ क्या करने वाले थे?”

     

    विक्रम की आँखें झुक गईं।

     

    कुछ सेकंड बाद उसने कहा,

     

    “मैंने तुम्हारी माँ को नुकसान पहुँचाने की योजना बनाई थी… लेकिन मैंने उन्हें नहीं मारा।”

     

    सभी चौंक गए।

     

    “फिर?”

     

    विक्रम ने एक नाम लिया।

     

    “कबीर।”

     

    अर्जुन की आँखें फैल गईं।

     

    कबीर?

     

    जिसे वह पहले ही धोखेबाज साबित कर चुका था।

     

    विक्रम ने बताया कि कबीर ने वर्षों पहले परिवार के भीतर दुश्मनी पैदा की थी और सविता की मौत के मामले में भी उसने परिस्थितियों का फायदा उठाया था।

     

    लेकिन उसके पास पूरी सच्चाई साबित करने के लिए एक आखिरी सबूत था।

     

    एक पुरानी रिकॉर्डिंग।

     

    रिकॉर्डिंग में कबीर की आवाज साफ सुनाई दे रही थी।

     

    सच सामने आ गया।

     

    विक्रम ने सिर झुका लिया।

     

    “मैंने बदला लेने में अपनी जिंदगी बर्बाद कर दी। मुझे माफ कर दो।”

     

    धीरेंद्र ने कुछ नहीं कहा।

     

    लेकिन आरोही आगे बढ़ी।

     

    “मामा… अगर मेरी माँ होतीं तो शायद वो भी यही कहतीं कि नफरत को यहीं खत्म कर दो।”

     

    विक्रम की आँखों से आँसू बह निकले।कुछ महीनों बाद हवेली में फिर उत्सव था।इस बार कोई राज नहीं था।

     

    कोई झूठ नहीं था।

     

    सिर्फ प्यार था।

     

    धीरेंद्र ने परिवार को अपने पास बुलाया।

     

    काव्या, नैना, आरोही और अर्जुन सभी साथ बैठे थे।

     

    धीरेंद्र ने कहा,

     

    “आज से इस घर में कोई सौतेला नहीं होगा।”

     

    काव्या ने आरोही का हाथ पकड़ लिया।

     

    नैना ने दूसरी तरफ से उसका हाथ थाम लिया।

     

    और अर्जुन ने पीछे से उसकी हथेली पकड़ ली।

     

    आरोही की आँखों में आँसू थे।

     

    अर्जुन ने धीरे से पूछा,

     

    “फिर रो रही हो?”

     

    आरोही मुस्कुराई।

     

    “खुशी के आँसू हैं।”

     

    “किस बात की खुशी?”

     

    आरोही ने पूरे परिवार की ओर देखा।

     

    “इस बात की… कि अब मुझे किसी चीज की कमी नहीं।”

     

    अर्जुन ने पूछा,

     

    “और मुझसे?”

     

    आरोही ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “आपसे?”

     

    वह उसके करीब आई।

     

    “आप तो मेरी जरूरत नहीं…”

     

    अर्जुन ने हैरानी से देखा।

     

    आरोही ने उसका हाथ अपने दिल पर रख दिया।

     

    “आप मेरी जिंदगी हैं।”

     

    अर्जुन मुस्कुराया।

     

    “और तुम?”

     

    आरोही ने धीरे से कहा—

     

    “मैं… तुम्हारे बिना कुछ भी नहीं।”

     

    हवेली के आँगन में फूल बरसने लगे।

     

    परिवार हँस रहा था।

     

    और बरगद के पेड़ के नीचे दो दिल एक-दूसरे का हाथ थामे खड़े थे।

     

    उनके बीच अब कोई राज नहीं था।

     

    कोई डर नहीं था।

     

    कोई दूरी नहीं थी।

     

    सिर्फ मोहब्बत थी…

     

    क्योंकि कुछ प्रेम कहानियाँ खत्म नहीं होतीं।

     

    वे हर सच के सामने आने के बाद और मजबूत होती जाती हैं।

     

    और आरोही की जिंदगी ने उसे एक बात सिखा दी—

     

    ❤️ “जिस प्यार में साथ निभाने का वादा हो, वहाँ तूफान भी रास्ता बदल देता है।” ❤️

     

    और अर्जुन के लिए आरोही हमेशा वही रहेगी—

     

    “तुम बिन…”

     

    “मेरी हर खुशी अधूरी है।”

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 💞 तुम बिन 💞

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

     

    एक ऐसी मोहब्बत की कहानी, जहाँ रिश्ते खून से नहीं, दिल से बनते हैं…

     

    शहर से थोड़ी दूर एक ऊँची पहाड़ी पर बनी थी “राजमहल हवेली”।

     

    सफेद संगमरमर से बनी वह हवेली दूर से किसी सपने जैसी दिखाई देती थी। बड़े-बड़े झूमर, फूलों से सजा आँगन, चारों तरफ हरियाली और हवेली के बीचों-बीच लगा वह पुराना बरगद का पेड़… जिसके नीचे बैठकर कभी हवेली के मालिक धीरेंद्र राजवंशी अपनी पत्नी और दोनों बेटियों के साथ चाय पिया करते थे।

     

    धीरेंद्र शहर के सबसे अमीर और सम्मानित कारोबारियों में से एक थे।

     

    उनकी पहली पत्नी सविता बहुत शांत और सरल स्वभाव की थीं। उनकी एक बेटी थी—आरोही।

     

    आरोही बचपन से ही बेहद मासूम, समझदार और प्यार बाँटने वाली लड़की थी।

     

    लेकिन किस्मत ने धीरेंद्र से सविता को बहुत जल्दी छीन लिया।

     

    कुछ वर्षों बाद धीरेंद्र ने दूसरी शादी काव्या से की। काव्या से उन्हें एक बेटी हुई—नैना।

     

    शुरुआत में सब कुछ बहुत अच्छा था।

     

    दोनों बच्चियाँ साथ खेलतीं।

     

    आरोही नैना को अपनी छोटी बहन से भी बढ़कर चाहती थी।

     

    “दीदी, मैं बड़ी होकर आपके जैसी बनूँगी,” नैना अक्सर कहती।

     

    आरोही हँसकर उसके बालों में हाथ फेरती और कहती,

     

    “तुम मुझसे भी अच्छी बनना… क्योंकि मेरी छोटी बहन सबसे अच्छी है।”

     

    लेकिन वक्त के साथ काव्या का व्यवहार बदलने लगा।

     

    उसे अपनी बेटी नैना से बहुत प्यार था, लेकिन आरोही उसे अपनी सौतेली बेटी से ज्यादा कुछ नहीं लगती थी।

     

    धीरे-धीरे आरोही से घर के सारे काम करवाए जाने लगे।

     

    महंगे कपड़ों से भरी हवेली में आरोही के हिस्से में साधारण कपड़े आने लगे।

     

    नैना के जन्मदिन पर पूरा घर सजता, लेकिन आरोही के जन्मदिन की तारीख तक किसी को याद नहीं रहती।

     

    फिर भी आरोही के दिल में काव्या के लिए कोई शिकायत नहीं थी।

     

    एक दिन काव्या ने गुस्से में कहा,

     

    “आरोही! मेरी साड़ी अभी तक प्रेस क्यों नहीं हुई?”

     

    “माँ… अभी कर देती हूँ।”

     

    काव्या कुछ पल उसे देखती रही।

     

    “तुम मुझे माँ मत कहा करो।”

     

    आरोही की आँखें नम हो गईं।

     

    लेकिन उसने मुस्कुराकर कहा,

     

    “मेरे लिए तो आप हमेशा माँ ही रहेंगी।”

     

    काव्या ने मुँह फेर लिया।

     

    आरोही चुपचाप चली गई।

     

    उसे क्या पता था कि उसकी यही मासूम मोहब्बत एक दिन पूरे परिवार की किस्मत बदलने वाली थी।

     

    एक बरसात की रात धीरेंद्र अचानक बहुत बीमार पड़ गए।

     

    हवेली के डॉक्टर ने उन्हें देखकर कहा,

     

    “इनकी हालत गंभीर है।”

     

    आरोही पूरी रात उनके सिरहाने बैठी रही।

     

    “पापा… आप ठीक हो जाइए। मैं आपसे कुछ नहीं माँगूँगी। बस आप ठीक हो जाइए।”

     

    धीरेंद्र ने कमजोर हाथ से उसका हाथ पकड़ा।

     

    “बेटी… तूने कभी मुझसे कुछ माँगा ही नहीं।”

     

    आरोही की आँखों से आँसू गिरने लगे।

     

    “मुझे कुछ चाहिए भी नहीं पापा… बस आपका आशीर्वाद चाहिए।”

     

    धीरेंद्र मुस्कुराए।

     

    “तू मेरी बेटी नहीं… मेरा गर्व है।”

     

    कुछ दिनों बाद धीरेंद्र स्वस्थ तो हो गए, लेकिन उन्होंने महसूस किया कि हवेली में कुछ बदल चुका था।

     

    उन्हें पता चला कि काव्या धीरे-धीरे सारी संपत्ति नैना के नाम करवाने की कोशिश कर रही थी।

     

    धीरेंद्र ने पहली बार काव्या से पूछा,

     

    “तुम्हें आरोही से इतनी नफरत क्यों है?”

     

    काव्या ने कोई जवाब नहीं 

     

    कुछ साल बीत गए।

     

    आरोही अब बेहद खूबसूरत और समझदार युवती बन चुकी थी।

     

    इसी दौरान काव्या ने उसकी शादी एक गरीब युवक अर्जुन से तय कर दी।

     

    अर्जुन शांत, साधारण कपड़े पहनने वाला और बहुत कम बोलने वाला युवक था।

     

    काव्या ने धीरेंद्र से कहा,

     

    “आरोही की शादी अर्जुन से कर देते हैं। लड़का गरीब है, इसलिए हमारी संपत्ति पर उसकी नजर नहीं होगी।”

     

    धीरेंद्र ने बेटी की ओर देखा।

     

    “आरोही, क्या तुम इस शादी के लिए तैयार हो?”

     

    आरोही ने सिर झुका लिया।

     

    “अगर आप खुश हैं पापा… तो मैं भी खुश हूँ।”

     

    काव्या मन ही मन खुश हुई।

     

    उसे लगा उसने आरोही को हमेशा के लिए हवेली से दूर कर दिया।

     

    लेकिन वह एक बात नहीं जानती थी…

     

    अर्जुन गरीब था ही नहीं।

     

     

     

    शादी के बाद अर्जुन आरोही को अपने घर ले गया।

     

    आरोही ने देखा कि घर बाहर से बेहद साधारण था।

     

    वह मुस्कुराकर बोली,

     

    “हमारे पास ज्यादा कुछ नहीं है… लेकिन अगर हम दोनों साथ हैं तो मेरे लिए यही सबसे बड़ी दौलत है।”

     

    अर्जुन उसकी ओर देखने लगा।

     

    उसकी आँखों में पहली बार प्यार साफ दिखाई दिया।

     

    “आरोही, अगर तुम मेरे साथ हो… तो मुझे दुनिया की कोई दौलत नहीं चाहिए।”

     

    आरोही ने धीरे से पूछा,

     

    “आप मुझसे इतना प्यार क्यों करते हैं?”

     

    अर्जुन मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि तुम वो इंसान हो जिसे प्यार पाने के लिए कभी किसी से कुछ माँगना नहीं पड़ा… तुमने हमेशा दूसरों को प्यार दिया।”

     

    धीरे-धीरे दोनों के बीच सच्चा प्रेम जन्म लेने लगा।

     

    लेकिन अर्जुन के पास एक रहस्य था।

     

    वह कोई गरीब युवक नहीं था।

     

    वह देश की बड़ी कंपनियों में से एक राजवीर ग्रुप का मालिक था।

     

    उसने जानबूझकर अपनी पहचान छिपाई थी।

     

    क्यों?

     

    क्योंकि कुछ महीनों पहले उसे पता चला था कि धीरेंद्र की कंपनी को बर्बाद करने की साजिश चल रही है।

     

    और उस साजिश के पीछे था—

     

    कबीर मल्होत्रा।

     

    वही अमीर युवक जिसे काव्या नैना के लिए पसंद करती थी।

     

    कबीर का असली उद्देश्य नैना से शादी करके राजवंशी परिवार की पूरी संपत्ति पर कब्जा करना |

     

    एक रात अर्जुन ने अपने पुराने दोस्त राघव से कहा,

     

    “अब वक्त आ गया है कि सच सामने आए।”

     

    राघव ने पूछा,

     

    “क्या आरोही को सब पता है?”

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    अर्जुन कुछ देर चुप रहा।

     

    “क्योंकि मैं नहीं चाहता कि वह अपने परिवार को टूटते हुए देखे।”

     

    उसी रात अर्जुन ने सारे दस्तावेज इकट्ठे किए।

     

    उसे पता चला कि कबीर ने धीरेंद्र की कंपनी के कई कागजात में धोखाधड़ी की थी।

     

    कबीर का लक्ष्य सिर्फ पैसा नहीं था।

     

    वह राजवंशी हवेली भी अपने नाम करवाना चाहता था।

     

     

    कुछ दिनों बाद धीरेंद्र को बैंक से नोटिस मिला।

     

    हवेली और कंपनी पर भारी कर्ज दिखाया गया था।

     

    धीरेंद्र के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “मैंने ऐसा कोई कर्ज लिया ही नहीं!”

     

    काव्या घबरा गई।

     

    नैना रोने लगी।

     

    उसी समय हवेली के दरवाजे पर अर्जुन आया।

     

    उसके साथ कई वकील और अधिकारी थे।

     

    काव्या चौंक गई।

     

    “तुम यहाँ क्यों आए हो?”

     

    अर्जुन ने शांत आवाज में कहा,

     

    “इस घर को बचाने।”

     

    तभी पीछे से आरोही आई।

     

    “अर्जुन?”

     

    अर्जुन ने उसकी ओर देखा।

     

    “आज मुझे तुम्हारे सामने अपना सच बताना होगा।”

     

    उसने अपना परिचय दिया।

     

    पूरा परिवार स्तब्ध रह गया।

     

    धीरेंद्र की आँखें फैल गईं।

     

    “तुम… राजवीर ग्रुप के मालिक हो?”

     

    अर्जुन ने सिर झुका दिया।

     

    “जी।”

     

    नैना को विश्वास नहीं हुआ।

     

    काव्या के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    अर्जुन ने सारे दस्तावेज मेज पर रख दिए।

     

    “कबीर ने कंपनी के कागजात में धोखाधड़ी की है। वह इस परिवार की संपत्ति हड़पना चाहता था।”

     

    तभी कबीर भी वहाँ पहुँच गया।

     

    वह चिल्लाया,

     

    “ये सब झूठ है!”

     

    राघव ने तुरंत स्क्रीन पर सारे सबूत चला दिए।

     

    कबीर की सारी साजिश सामने आ गई।

     

    धीरेंद्र की आँखों में आँसू आ गए।

     

    उन्होंने अर्जुन का हाथ पकड़ लिया।

     

    “बेटा… तुमने मेरी बेटी से शादी करके सिर्फ उसका जीवन नहीं बचाया… तुमने मेरा पूरा परिवार बचा लिया।”

     

     

    काव्या चुपचाप आरोही के सामने खड़ी थी।

     

    उसकी आँखों में आँसू थे।

     

    “आरोही…”

     

    आरोही ने कुछ नहीं कहा।

     

    काव्या उसके सामने घुटनों पर बैठ गई।

     

    “मुझे माफ कर दो।”

     

    आरोही घबरा गई।

     

    “माँ… आप ये क्या कर रही हैं?”

     

    काव्या रोते हुए बोली,

     

    “जिस बेटी ने मुझे हमेशा माँ कहा… मैंने उसी बेटी को कभी बेटी नहीं माना।”

     

    आरोही की आँखें भर आईं।

     

    काव्या ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मैंने तुम्हारे साथ बहुत गलत किया। तुम्हें नौकरानी की तरह रखा… तुम्हारा प्यार नहीं समझा।”

     

    आरोही कुछ पल चुप रही।

     

    फिर उसने काव्या को उठाया और गले लगा लिया।

     

    “माँ… माँ से कोई बदला नहीं लेता।”

     

    काव्या फूट-फूटकर रो पड़ी।

     

    “तुम मुझे अब भी माँ कह रही हो?”

     

    आरोही मुस्कुराई।

     

    “क्योंकि मैंने आपको कभी सौतेली माँ माना ही नहीं।”

     

    —

     

    ❤️ एक परिवार फिर से पूरा हुआ

     

    धीरेंद्र ने अर्जुन को गले लगा लिया।

     

    “आज से तुम मेरे दामाद नहीं… मेरे बेटे हो।”

     

    नैना भी आगे आई।

     

    “दीदी… मुझे भी माफ कर दो। मैंने भी कभी आपका साथ नहीं दिया।”

     

    आरोही ने उसे गले लगा लिया।

     

    “तुम मेरी बहन हो। बहनों के बीच माफी कैसी?”

     

    हवेली में पहली बार वर्षों बाद ऐसी खुशी लौटी थी जिसमें किसी के दिल में कोई शिकायत नहीं थी।

     

    कुछ दिनों बाद धीरेंद्र ने अपनी पूरी संपत्ति का फैसला किया।

     

    उन्होंने कहा,

     

    “मेरी संपत्ति मेरी दोनों बेटियों की है। प्यार में हिस्सा नहीं होता।”

     

    काव्या ने भी सिर झुकाकर हामी भर दी।

     

    —

     

    🌹 कुछ महीनों बाद

     

    राजमहल हवेली फिर से फूलों से सज गई।

     

    इस बार कोई दुख नहीं था।

     

    आरोही और अर्जुन हवेली के उसी बरगद के नीचे बैठे थे।

     

    अर्जुन ने आरोही का हाथ अपने हाथों में लिया।

     

    “अगर उस दिन तुम्हारी शादी मुझसे नहीं होती तो?”

     

    आरोही मुस्कुराई।

     

    “तो शायद मेरी कहानी अधूरी रह जाती।”

     

    “और अगर मैं तुम्हें अपना सच पहले बता देता?”

     

    आरोही ने शरारत से कहा,

     

    “तो शायद मैं तुमसे शादी ही नहीं करती।”

     

    अर्जुन चौंका।

     

    “क्यों?”

     

    आरोही हँस पड़ी।

     

    “क्योंकि मुझे अमीर लड़का नहीं चाहिए था…”

     

    अर्जुन मुस्कुराया।

     

    “तो फिर क्या चाहिए था?”

     

    आरोही ने उसका हाथ अपने सीने पर रख दिया।

     

    “बस ऐसा इंसान चाहिए था… जिसके दिल में मेरे लिए जगह हो।”

     

    अर्जुन ने धीरे से कहा,

     

    “वो जगह तो तुम्हारे लिए हमेशा से थी।”

     

    आरोही ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “मेरे बिना रह सकते हो?”

     

    अर्जुन ने मुस्कुराकर सिर हिला दिया।

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि…”

     

    वह थोड़ा करीब आया।

     

    “तुम बिन मैं अधूरा हूँ।”

     

    आरोही की आँखों में आँसू आ गए।

     

    लेकिन इस बार वे आँसू दर्द के नहीं थे।

     

    वे उस प्यार के थे जो उसे देर से मिला था…

     

    लेकिन हमेशा के लिए मिला था।

     

    हवेली की बालकनी से धीरेंद्र, काव्या और नैना दोनों को देख रहे थे।

     

    काव्या ने धीरे से कहा,

     

    “देखिए… हमारी बेटी कितनी खुश है।”

     

    धीरेंद्र मुस्कुराए।

     

    “हाँ… क्योंकि अब इस घर में दौलत से ज्यादा प्यार है।”

     

    और उस दिन राजमहल हवेली में सिर्फ एक शादीशुदा जोड़ा नहीं था…

     

    बल्कि एक टूटा हुआ परिवार फिर से जुड़ चुका था।

     

    जहाँ कभी सौतेले रिश्तों की दीवार थी…

     

    वहाँ अब माँ-बेटी का प्यार था।

     

    जहाँ कभी संपत्ति का लालच था…

     

    वहाँ अब अपनापन था।

     

    और जहाँ कभी आरोही अकेली रोया करती थी…

     

    वहीं अब अर्जुन उसके साथ खड़ा था।

     

    क्योंकि सच्चा प्यार वही है… जो मुश्किल वक्त में हाथ छोड़े नहीं, बल्कि और मजबूती से थाम ले।

     

    और आरोही की कहानी हमेशा के लिए एक बात कह गई—

     

    **“कुछ रिश्ते खून से बनते हैं, कुछ किस्मत से…

     

    लेकिन सबसे खूबसूरत रिश्ते वो होते हैं, जो सच्चे प्यार से बनते हैं।”**

     

    तुम बिन… मैं भी अधूरा, तुम बिन… मेरी हर खुशी अधूरी। ❤️

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • आपका होना एक तरफ…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    दुनिया की हर ख़ुशी एक तरफ़, और तेरा साथ एक तरफ़,

     

    *आने वाले कल को जीत लेंगे, बस थामे रखना मेरा हाथ एक तरफ़।*💝💝

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    Rani Thakur

    NSW अनुभवी लेखक -🥇 जो हमसे दूर हुए.. हम भी उन्हें भूल गये… 🙏🙏

  • कहीं ऐसा ना हो जाए…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    अपने क़दमों के निशान मेरे रास्ते से हटा दो,

     

    *कहीं ये ना हो कि मैं चलते चलते तेरे पास आ जाऊं!!*💞

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    Rani Thakur

    NSW अनुभवी लेखक -🥇 जो हमसे दूर हुए.. हम भी उन्हें भूल गये… 🙏🙏

  • “बारिश वाली मुलाकात”

    “बारिश वाली मुलाकात”

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

    शाम का समय था। हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। सड़क किनारे एक छोटी सी चाय की दुकान पर भीड़ लगी थी। रिया भीगती हुई वहाँ आकर रुकी। उसके हाथ में किताबें थीं और चेहरे पर गुस्सा।

    “आज ही बारिश आनी थी…” उसने धीरे से कहा।

     

    तभी पास खड़े एक लड़के ने अपनी छतरी उसकी तरफ बढ़ा दी।

    “अगर चाहो तो इस्तेमाल कर सकती हो।”

     

    रिया ने उसकी तरफ देखा। लड़का मुस्कुरा रहा था। सफेद शर्ट पूरी भीग चुकी थी, लेकिन फिर भी उसके चेहरे पर अजीब सी शांति थी।

     

    “और तुम?” रिया ने पूछा।

     

    “मैं बारिश पसंद करता हूँ।” उसने हँसते हुए कहा।

     

    रिया ने बिना कुछ बोले छतरी ले ली। कुछ देर बाद दोनों एक ही बस में बैठे थे। संयोग ऐसा था कि सीट भी साथ मिली।

     

    “वैसे मैं आरव हूँ।”

     

    “रिया।”

     

    बस की खिड़की से बारिश की बूंदें अंदर आ रही थीं। दोनों छोटी-छोटी बातें करने लगे। रिया ने अपने बैग से एक नोट बुक निकाली ओर उसने कुछ लिखने लगी पता ही नहीं चला कब रास्ता खत्म हो गया। उतरते समय रिया जल्दी में थी। उसकी किताब नीचे गिर गई। आरव ने उठाकर उसे दी। तभी उसके अंदर से एक छोटा सा कागज़ गिरा।

     

    आरव ने अनजाने में उसे उठा लिया।

    उस पर हल्के नीले पेन से लिखा था—

     

    “कुछ मुलाकातें अजीब होती हैं…

    सिर्फ कुछ मिनटों में कोई इंसान अपना सा लगने लगता है…”

     

    रिया की धड़कन जैसे रुक गई। उसने जल्दी से वो कागज़ उसके हाथ से ले लिया। “वो… बस ऐसे ही लिखा था मैंने।” उसने नजरें चुराते हुए कहा।

     

    आरव कुछ पल उसे देखता रहा। फिर हल्का सा मुस्कुराया।

    “अच्छा लिखा है…” उसने धीमी आवाज़ में कहा,

    “क्योंकि मुझे भी आज कुछ ऐसा ही महसूस हुआ।”

     

    रिया ने पहली बार उसकी आँखों में देखा।

    बारिश की बूंदें अब भी गिर रही थीं, बस फर्क इतना था कि अब उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान थी।

     

    दोनो अपने अपने रस्ते की ओर चले गए दोनों बिना ये सोचे कि फिर मुलाकात होगी कि नहीं रिया अक्सर आरव के बारे में सोचने लगी वो हर बार बस उस प्लान को अपने दिमाग में दोहराती ओर ऐसा ही कुछ हाल आरव का था ऐसे ही सालों बीत गए पर रिया उस दिन के अलावा कभी आरव को सोच नहीं पाई शायद वो फिर मुलाकात नहीं उस पल में ही खुश रहना चाहती थी शायद यही होता है कुछ पल का सुकून या प्यार 

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    lovely jo

    NSW नया लेखक – 🥉

  • सबसे हसीन दुनिया है आप. 😊

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    खुद को थोड़ा समय देकर देखो,

    तुम्हारी अपनी ही दुनिया सबसे हसीन लगेगी…

    जो सुकून तुम ढूंढते फिरते हो,

    वो तुम्हारे अंदर ही मुस्कुरा रहा है!!

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    Rani Thakur

    NSW अनुभवी लेखक -🥇 जो हमसे दूर हुए.. हम भी उन्हें भूल गये… 🙏🙏

  • मे खुद को गिरफ्तार करता हु…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    तू बैठ सामने

    *मैं इश्क़ का इज़हार करता हूँ,*

     

    तू माँगे चाँद

    *मैं तारे भी तेरे नाम करता हूँ,*

     

    कभी नाराज़ मत होना मुझसे,

    मैं तेरी चाहत की ज़ंजीरों में 

    *खुद को गिरफ़्तार करता हूँ…!!*

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    Rani Thakur

    NSW अनुभवी लेखक -🥇 जो हमसे दूर हुए.. हम भी उन्हें भूल गये… 🙏🙏

  • अधूरा इश्क

    अधूरा इश्क

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

     

    अधूरा इश्क

    रागिनी को हमेशा से अंधेरे कमरों से अजीब-सी खींच महसूस होती थी।
    उसके नए किराए के घर में एक कमरा था जिसका दरवाज़ा ताला लगा था। मालिक ने कहा था “कभी मत खोलना।”

    एक रात बिजली चली और वही कमरे से हल्की दस्तक आई। रागिनी डरते हुए बोली “क…कौन?”

    अंदर से एक धीमी, टूटी आवाज़ आई “डरो मत… मैं भी कैद हूँ…”

    अगली बार बिजली जाने पर आवाज़ फिर आई।
    इस बार कमरे का ताला अपने आप गिरा।
    और अंदर था… सिर्फ़ अंधेरा।

    पर उसी अंधेरे में एक परछाई उभर रही थी एक लड़का… बेहद खूबसूरत, पर धुंध जैसा।

    उसने कहा “मेरा नाम आरव है… मैं इंसान नहीं हूँ, पर तुम्हें कोई नुक़सान नहीं पहुँचाऊँगा।”

    रागिनी चाहकर भी उस कमरे से दूर नहीं रह पाती।
    आरव उसे हर रात मिलता कभी बातों में, कभी बस खामोशी में।

    रागिनी ने महसूस किया कि वह आरव की तरफ़ खिंच रही है… डर और प्यार के बीच फँसकर।

    आरव हमेशा कहता “मेरी दुनिया में मत आना रागिनी… वो अंधेरा तुम्हें वापस नहीं लौटने देगा।”

    एक दिन रागिनी ने पूछ ही लिया “तुम कौन हो? क्या हो?”

    आरव की आँखों में अजीब-सा दर्द चमका“एक गलती ने मुझे इस दुनिया के बीच कहीं अटका दिया है… ना मैं ज़िंदा हूँ, ना मरा हुआ।”

    रागिनी उससे और गहराई से जुड़ने लगी, वह डर खत्म हो चुका था। बस एक अजीब-सी मोहब्बत जन्म ले चुकी थी।

    अब रागिनी हर दिन सूरज ढलने का इंतज़ार करती।
    रात होते ही आरव उसके पास आ जाता उसे कहानियाँ सुनाता, कभी हवा बनकर उसके बालों को छूता, कभी उसके आँसू पोंछता।

    दोनों जानते थे ये रिश्ता नामुमकिन है। पर इश्क़ कभी इजाज़त थोड़े ही पूछता है।

    एक रात कमरे में सिर्फ आरव नहीं आया… उसके पीछे कुछ और भी था।

    काली, गुर्राती परछाइयाँ जो रागिनी पर झपट पड़ीं।

    आरव चिल्लाया “भागो! ये मेरी दुनिया के भूखे साए हैं—तुम्हें ले जाएँगे!”

    आरव ने उन्हें रोक लिया… पर उसके शरीर का आधा हिस्सा अंधेरे में गायब हो गया।

    रागिनी रो पड़ी “मैं तुम्हें खो दूँगी क्या?”

    आरव बोला “मैं पहले ही खो चुका हूँ…”

    आरव कमज़ोर पड़ने लगा। वह कहने लगा “रागिनी… जब तक मैं हूँ, तुम सुरक्षित हो। पर मेरा समय ख़त्म हो रहा है। इस कमरे को छोड़कर किसी और शहर चली जाओ।”

    पर रागिनी ने साफ़ कह दिया “इश्क़ भागता नहीं, लड़ता है।”

    उस रात हवा में अजीब सरसराहट थी। कमरा खुद-ब-खुद खुल गया। अंधेरा गाढ़ा और डरावना।

    आरव ने रागिनी का हाथ पकड़ लिया पहली और आखिरी बार… उसका स्पर्श ठंडा, पर गहरा था।

    “मेरे साथ मत आना…”

    पर रागिनी ने कहा “मैं अकेली रह ही नहीं सकती तुम्हारे बिना।”

    अंधेरा दोनों के चारों तरफ घूमने लगा।

    अगली सुबह घर का दरवाज़ा खुला मिला। कमरा बिल्कुल शांत। आरव की परछाई गायब थी। रागिनी भी गायब थी।

    बस दीवार पर उभरी एक धुँधली लाइन “अंधेरों में किया इश्क़… दोनों को उजाला कभी नहीं मिला।”

    कई साल बाद, उसी घर में नए किरायेदार आते हैं।
    पहली ही रात, बिजली जाती है… और बंद कमरे से आवाज़ आती है “डरो मत… मैं भी कैद हूँ…”

    इस बार कमरे में दो परछाइयाँ दिखाई देती हैं एक धुँधला लड़का… और उसके कंधे पर सिर रखे एक लड़की।

    दोनों की आँखों में एक ही बात उनकी कहानी कभी पूरी नहीं हुई… और शायद कभी होगी भी नहीं।

    “अंधेरों का इश्क़… अधूरा ही सही, पर अमर रहा।”

     

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • कोई कुछ नहीं बोलेगा

    कोई कुछ नहीं बोलेगा

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    शीला प्रिंसिपल मैम के सवाल का जवाब देना चाहती थी। पर वो बोलकर नहीं। ये देखते हुए की कोई कुछ नहीं बोल रहा है ।तो प्रिंसिपल मैम दुबारा फिर से,एक सवाल और दुहराईं….

    ” कहीं तुम लोगों ने मिलकर कमल को, पिट पिट कर बेहोश तो नहीं कर दी हो? सच्चाई क्या है? साफ साफ हमें बताओ तुम सब.”

    प्रिंसिपल मैम ने अपनी ऊंगली चारों लड़कियों के तरफ करतीं हुई आंखों में आंखे डाल कर,आवाज ऊंची करतीं हुई बोली थी।

    जब राधा को लगा कि अब मामला बिगड़ने लगी है। तो उसने अपने आप को ज्यादा देर रोक नहीं पाई और बोल पड़ी…

    ”  ऐसा कुछ भी नहीं है मैम , जो कुछ भी आप सब के सामने है ना मैम।सच्चाई इससे कहीं बहुत अलग है । “

    राधा प्रिंसिपल मैम को देखते हुए बोली थी। और फिर एक बार सभी के नज़र राधा पर आ कर टिक गई थी।

    शीला अपने मन में कुछ सोच रही थी। वो वहां से निकल कर धीरे-धीरे बाहर के तरफ चल दी थी। वो अपने पैर में लगी चोट के कारण ठीक से चल भी नहीं पा रही थी। वो चलते हुए लंगड़ा कर चल रही थी। शीला पर कुछ लोगों को छोड़कर बाकी किसी की भी नजर नहीं थी। सभी लोगों का ध्यान कमल और उसके आसपास खड़ी लड़कीयों के उपर ही था। किसी ने भी शीला के उपर ज्यादा ध्यान नहीं दिया था। वो लंगड़ाते हुए मीटिंग हॉल से बाहर निकल गई थी। चांदनी प्रिंसिपल मैम के पास जाती है। और उनके आंखों में आंखें डाल कर धीरे से बोलतीं है ।

    ”  कमल बहुत ही घटिया लड़का है। इसके व्यवहार लड़कीयों के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं है।”

     चांदनी बात आगे बढ़ाते हुए बोली।

    ” इस ने राधा और रूपा के साथ बहुत हीं घटिया सलूक किया है।”

    जब रूपा देखी की चांदनी बात खोल दी है। तो वो भी बीच में कुद पड़ी, एक जोरदार लात कमल के कमर के पास मारी। लात लगने से कमल का शरीर हिल कर रह जाता है। यह देखकर कि रूपा ने कमल को लात मारी है। तो कुछ लोग आगे आते हैं,और रूपा को पकड़ कर साइड में कर देते हैं। रूपा का शरीर गुस्से से उबल रही थी। वो सभी को खा जाने वाली नज़रों से देख रही थी। उसके माथे पसीने से भीग गई थी। जब चांदनी प्रिंसिपल मैम से ये बात बोलीं थी। तो प्रिंसिपल मैम भी यह बात सुनकर दंग रह गईं थीं।

    और वो चांदनी के तरफ आश्चर्य से देखती हुई बोली।

    ” क्या हुआ है राधा और रूपा के साथ?बेटा तुम मुझे पुरी बात सच सच बताओ। कोई भी व्यक्ति हमारे कालेज के रूल रेगुलेशन को तोड़े,ये सब मैं बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं कर सकती हूं।”

    प्रिंसिपल मैम कड़क अंदाज में चांदनी के तरफ देखते हुए बोली थी।

    चांदनी बोली।

    ” मैं सच कह रही हूं मैम,कमल ने राधा और रूपा पर बहुत अत्याचार किया है।उन दोनों को रस्सियों से बांध कर पिटा है। बहुत बदसलूकी की है। उसके साथ  रेप करने की कोशिश किया है।” बोलते बोलते चांदनी के आंखों से आंसू बहने लगती है।

    प्रिंसिपल मैम अपने चेयर से उठ कर चांदनी के बहते आंसुओं को पोंछती है। और चांदनी को अपने गले से लगा लेती है। और बोलतीं हैं।

    ” अगर तुम्हारी बातों में सच्चाई है। तो मैं इसे छोड़ूंगी नहीं, इसे  सजा दिलवा कर रहूंगी।”

    और मुड़ कर प्रोफेसर दयानंद को आदेश देते हुए बोलती हैं।

    ” प्रोफेसर दयानंद जी। आप डाक्टर को फोन लगाइए, वो आकर कमल का चेक अप करे मामला बेहद संवेदनशील है।”

     प्रोफेसर दयानंद हड़बड़ाकर जल्दी से उठते हुए बोलता है।

    ” जी मैडम जी,अभी काल करके बात कर रहा हूं। 

    प्रिंसिपल मैम बोली।

    ” हां थोड़ा जल्दी किजिए, बच्चों के जिंदगी का सवाल है।”

    प्रोफेसर दयानंद अपने जेब में से अपना मोबाइल निकाल कर एक नम्बर डायल करता है। रिंगटोन बजने के बाद काल रिसीव होता है। प्रोफेसर दयानंद फोन पर बात करते हुए बोलता है।

    ” हैलो,हां जी डाक्टर शर्मा जी। आप कृपया करके जल्दी से कालेज में आ जाइए। यहां पर एक बच्चे की हालत गंभीर है।”

    फोन पर दूसरी तरफ से आवाज आती है।

    हैलो, प्रोफेसर दयानंद जी। हाउ आर यू क्या हुआ है? अच्छा ठीक है। मैं अभी निकलता हूं कालेज के लिए ,बस मैं जल्दी पहुंच हीं रहा हूं। आप मेरा इंतजार किजिए।”

    बोलकर डाक्टर शर्मा ने फोन कट कर दिया था।

    वहां मौजूद कुछ स्टूडेंट्स जो कमल के दोस्त थे। वो बिल्कुल भी मानने के लिए तैयार नहीं था कि कमल कभी भी यह घटिया हरकत कर सकता है। उसे लग रहा था कि, जरूर यह सब लड़कियां मिलकर कमल के साथ कोई साजिश कर रही है। उसको झूठ मूठ के जाल में फंसा रही है। एक लड़का जिसका नाम गोविंद था। वो जोर से बोल पड़ता है।

    ” नहीं यह सब झूठ है। मैं नहीं मानता इस तरह के बातों को, कमल कभी भी ऐसा घटिया हरकत कर हीं नहीं सकता है। मैं कमल को अच्छी तरह जानता हूं।”

    यह देखकर एक लड़का और उसके सपोर्ट में खड़ा हुआ और बोला।

    ” ये इन लड़कियों की साज़िश है। ये कमल को फसाना चाहतीं हैं। क्यों की कमल पैसे वाला है।”

     वह लड़का पूरी ताकत से चिल्लाकर बोल रहा था। इसका नाम विशाल है।

    ” विशाल ये तुम कैसी बातें कर रहे हो। कमल एक नंबर का कुत्ता कमीना घटिया इंसान है। वो राधा दीदी को बालात्कार करने वाला था। मेरी आंखों के सामने,सही टाइम पर आकर शीला दीदी और चांदनी दीदी ने उस राक्षस से राधा दीदी को बचा लिया। नहीं तो ये रेपिस्ट ना जाने क्या क्या करता हम दोनों के साथ।”

    रुपा विशाल को नफ़रत भरी नजरों से देखते हुए जोर से बोली थी।

    ” झूठ, तुम झूठ बोल रही हो। बहाना बना रही हो। तुम सब ने मिलकर कमल को मार मारकर बेहोश कर दी हो। अब सजा से बचने केलिए बहाने बना रही हो ।”

     विशाल रूपा के तरफ देखते हुए,वह भी ज़ोर से चीखते हुए बोल रहा था।

    ” सट अप, शांत हो जाओ तुम सब। कोई कुछ नहीं बोलेगा।”

    प्रिंसिपल मैम सभी को डांटते हुए जोर से बोली थी। सुनकर सभी लोग चुप हो गए थे। प्रिंसिपल मैम के आवाज बिना माइक के हीं पुरे मीटिंग हाल में गुंज रही थी। 

    इधर शीला मीटिंग हॉल में से बाहर निकल कर कॉलेज के दो नंबर गेट वाले रास्ते में लंगड़ाती हुई चली जा रही थी। बाहर तेज धूप निकली हुई थी। हल्की हल्की ठंडी हवा बह रही थी। जिससे शीला थोड़ा राहत महसूस कर रही थी। रास्ते के साइडों में हरे भरे पेड़ पौधे लगाए गए थे। जिससे रास्ते में कहीं कहीं छाया भी हो रही थी। शीला चलती हुई कॉलेज के दो नंबर गेट से बाहर निकल कर मार्केट वाले रास्ते में चलने लगती है। चलते चलते एक शॉप से पानी की बोतल खरीद कर आगे बढ़ गई थी। थोड़ी देर आगे चलने के बाद शीला को एक मेडिकल स्टोर दिखाई पड़ती है। शीला उसमें चली जाती है। शीला मेडिकल स्टोर के अंदर आ गई थी। अंदर आकर वो काउंटर पर बैठे आदमी के तरफ देखते हुए बोलती है।

    ” नमस्ते अंकल “

    सुनकर शीला के जवाब में वो आदमी भी बोलते हैं।

    ” नमस्ते बेटा , बोलिए बेटा क्या चाहिए आपको?”

    शीला के तरफ देखते हुए दुकान दार मुस्कुराते हुए बोला था।

    शीला अपनी पानी की बोतल काउंटर पर रख देती है।

    ” अंकल जी, मेरे फ्रेंड को न चोट लग गई है। और वो बेहोश है।ऐसी कोई मेडिसिन है। जिससे वो जल्दी से होश में आ जाए और वह ठीक हो जाए।”

    शीला दुकानदार को उनके तरफ देखते हुए बोली थी।

    ” हां ठीक है, मैं आपको एक दवाई दे रहा हूं। जिसको पिलाने से वो होश में भी आ जायेगा। और उसके बॉडी के अंदर बूस्टर का भी काम करेगा।..”

    शीला को इतना बोलकर वो दुकानदार अंकल अपने जगह से उठ कर दूसरे साइड दवाई लेने चला जाता है। शीला वहीं खड़ी होती है।

    तभी अजय दुकान में दाखिल होता है। और वो भी काउंटर पर आकर खड़ा होता है।उसका ध्यान अभी शीला पर नहीं गया था। वो डोर ओपन करके अंदर आ गया था। लेकिन उसका नजर शीला के लिए दवाई लेने जा रहे दुकानदार अंकल पर हीं था।

    आगे की कहानी पढ़िए कहानी के अगले भाग में……….. प्यार एक एहसास, नमस्ते स्टोरी वर्ल्ड पर……..

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    Manoj Divana Namaste Story World

    नमस्ते स्टोरी वर्ल्ड के लेखक। पाठकों के लिए मनोरंजक और दिल को छू लेने वाली हिंदी कहानियाँ लिखना पसंद करता हूँ।आपका स्वागत है नमस्ते स्टोरी वर्ल्ड में धन्यवाद 💐💐🌹🌹

  • बातों का विश्वास

    बातों का विश्वास

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    शीला कमल को मार मारकर उसे बेहोशी की दुनिया में पहुंचा दिया था। कमल के बेहोश होने के बाद भी शीला के लात रुक नहीं रही थी।‌‌ लगातार लातों की बारिश कर रही थी। गुस्से से शीला के चेहरे पसीने में भीग गया था। पिछे से शीला के कंधे पर दो हाथ पड़ने के आभास होता है। और शीला की तंद्रा भंग होती है। वो पिछे मुड़कर देखतीं हैं। रूपा और राधा उसकी कंधों को धिरे से सहला रही थी। दोनों के चेहरे पर एक खुशी झलक रही थी। और दोनों मुस्कुरा रही थी। वो दोनों अपने दीदी के कमल पर हुई जीत पर प्राउड फील कर रही थी।‌‌

     ” दीदी आप शांत हो जाइए,आप को चोट लगी है।”

    चांदनी धिरे धिरे शीला के तरफ बढ़ते हुए कैजुअली अंदाज में बोली थी।

    ” हां दीदी, अब तो आप हम लोगों पर छोड़ दिजिए। हम देख लेंगे की क्या करना है। इस कमिने के साथ।”

    राधा कमल के तरफ इशारा करते हुए बोली थी।

    ” अब हमें कमल को लेकर प्रिंसिपल मैम के पास चलना चाहिए।”

    रुपा अपने कमर पर हाथ रख कर मुस्कुराती हुई बोल रही थी।

    राधा चांदनी और शीला एक साथ बोलती है।

    ” हां ठीक है चलो चलते हैं।”

    कमल को होश तो था नहीं, जो वो चलकर जाता। तो अब उसे लेकर जाने की जिम्मेदारी,इन चारों सहेलियों के कंधे पर थी । चारों सहेलियों ने कमल के एक एक पैर और एक एक हाथ पकड़ कर उठाई और चल दी थी।

    इधर मीटिंग हाल में कृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव पर कालेज में फंक्शन की तैयारी करने को लेकर प्रिंसिपल स्टूडेंट प्रोफेसर के बीच बाद संवाद चल रही थी। सभी प्रोफेसर अपने स्टूडेंट को भगवान श्री कृष्ण के जीवन के बारे में तो उनके द्वारा किए गए लीला के बारे में अपने स्टूडेंट के सामने ब्यख्यान कर रहे थे।

    जब प्रोफेसर शुक्ला अपनी बात स्टूडेंट के सामने रख रहे थे। तब एक स्टूडेंट अपने कुर्सी से उठ कर प्रोफेसर शुक्ला से एक सवाल किया।

    दरअसल इस शवाल का जवाब उस स्टूडेंट के साथ साथ आप हम और उस मीटिंग हाल में मौजूद सभी लोगों को चाहिए था। वो लड़का अपनी चेयर से उठा और वो प्रोफेसर शुक्ला को बीच में रोकते हुए बोला।

    ” माफ़ किजियेगा सर, मैं आपको बीच में रोक रहा हूं। सर मैं जानना चाहता हूं। कि श्री कृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव तो हम हमारे कालेज में हर साल मनाते आ रहे हैं। तो फिर हमें इस बार और पहली बार मनाया जाएगा, ऐसा क्यों बताया जा रहा है?”

    उस लड़के ने साफ शब्दों में अपनी बात प्रोफेसर शुक्ला के सामने रख दिया था। उस लड़के की आवाज जब वहां मौजूद सभी लोगों के कानों में जाते हैं। तो सभी के ध्यान उस लड़के पर टिक जाती है। जब ये सवाल उठ हीं गई है तो इसका जवाब जानने कि कोशिश में कुछ लोग और आगे आते हैं। एक लड़की अपनी चेयर से उठ कर बोलती है।

    ” हां सर, हम लोग तो श्री कृष्ण जन्मोत्सव हर साल मनाते हैं। और कॉलेज में अवार्ड फंक्शन का भी आयोजन किया जाता है। तो फिर ये क्यों?”

    उस लड़की ने भी अपने तरफ से एक सवाल पूछ लिया था।इन सवालों के जवाब स्टूडेंट को प्रोफेसर शुक्ला देने वाले हीं थे। कि सभी की नजर मीटिंग हाल के दरवाजे पर पहुंच जाती है।देख कर सभी शौक हो जातें हैं। मीटिंग हाल के माहौल अब बदलने वाला था। जहां तक बदल ही गया था। शीला कमल चांदनी राधा रुपा को देख कर सभी स्तब्ध रह गए थे। सन्नाटा पसर गया था। एक साथ सभी लोगों के जुवान बंद हो गया था। कोई कुछ भी नहीं बोल रहे थे। सभी सीर्फ एक टक उन पांचों को देख रहे थे। अब कोई आगे आकर वेलकम तो करने वाले थे नहीं, तो चारों सहेलियों ने खुद आगे बढ़कर अंदर आने लगी थी। शीला और चांदनी कमल के एक एक हाथ पकड़ कर टांगी हुई थी तो राधा और रूपा एक एक टांग सभी चलकर स्टेज के सामने आकर खड़ी हुई थी।

    खामोशी को भंग करते हुए एक छात्रा इन सभी को देख कर बोली थी।

    ” क्या हुआ है इसे, यह बेहोश क्यों है?”

     उस छात्रा ने अपनी उंगली से कमल को प्वाइंट आऊट करते हुए बोली थी। बीच में से एक और छात्र का आवाज गुंजा।

    ” तुम लोग कमल को ऐसे टांग कर क्यों लाई हो? क्या हुआ है इसके साथ, क्या ये एक्सीडेंट किया है?” 

    उस छात्र ने चारों सहेलियों से सवाल किया था।

    इस सवाल का जवाब आप हम, और ये चारों सहेलियां जानते हैं। लेकिन यहां मीटिंग हाल में मौजूद सभी लोग नहीं जानते थे। अब एक बात और है कि क्या यह सहेलियां जो भी बात बोलेगी क्या वहां मौजूद सभी लोग क्या इनके बात का विश्वास करेंगे? अगर नहीं, तो फिर उसके लिए क्या करना पड़ेगा। वही करने के लिए शीला अपने मन में कुछ सोच कर अपने कदम आगे बढ़ा चुकी थी। सभी कमल को फर्श पर लिटा कर वहीं एक तरफ खड़े हो जाते हैं। अगर कमल की सच्चाई सबके सामने उजागर करना है। तो उसे सबसे पहले होश में लाना होगा, शीला मन-ही-मन ये सोच रही थी। बिना उसको होश में लायें या बिना उसके मुंह से उसके बातों को कोई नहीं मानेगा क्यों मानेगा कैसे मानेगा कोई नहीं मानेगा। हम भी नहीं मानेंगे और आप तो मान हीं नहीं सकते हैं। क्यों की कमल अभी भी बेहोश पड़ा था। चोट उसको लगा था। अब अगर ये चारों सहेलियां बोलेगी की कमल ने उसे परेशान किया है तो इस बात को प्रमाणित भी करना होगा। जो कि कमल के बेहोश रहते संभव नहीं था। यह सीन देख कर प्रोफेसर और प्रिंसिपल मैम भी आश्चर्य चकित रह गए थे।

    प्रिंसिपल मैम इन चारों को देख कर बोलतीं हैं।

    ” शीला चांदनी राधा रूपा क्या है ये सब? तुम सब मिलकर कमल के साथ क्या की हो?”

     थोड़ा रुक कर प्रिंसिपल मैम फिर बोलना शुरू करतीं हैं।

    ” ये बेहोश क्यों हो गया है? सब कुछ सही सही बताओ तुम सब।”

    प्रिंसिपल मैम अपने चेयर पर बैठी हुई हीं इन चारों से सवाल की थीं। शीला प्रिंसिपल मैम को उनके सवाल का जवाब देना चाहती थी। डर इस बात का था कि उसके बात का कोई विश्वास नहीं करेगा।  यही कारण था कि वो कुछ बोलने से बच रही थी। अब प्रिंसिपल मैम उससे सीधा सवाल कर ली थी। तो अब वो चुप कैसे रह सकती थी। 

    क्या होगा जब कमल को होश आयेगा? ये चारों सहेलियां कब तक चुप रहेगी? क्या कमल को होश आयेगा? जब कमल की सच्चाई सभी के सामने आयेगा फिर क्या होगा? इन सभी सवालों के जानने के लिए पढ़ें कहानी का अगला भाग ….. प्यार एक अहसास , कहानी अजय शीला की नमस्ते स्टोरी वर्ल्ड पर……

     

     

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