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श्रेणी: प्रेम कहानी

यहां दिल को छू लेने वाली खूबसूरत कहानियां पढ़ने और लिखने के लिए साझा की जाती है।

  • मुश्किल में जान

    मुश्किल में जान

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    ” जा चला जा अब क्यों पिटाई खा रहा है।”
    राधा कमल को बहर के  रास्ते के तरफ इशारा करते हुए बोली थी।
    ” अब ये नहीं जाएगा दीदी, इसको ऐसे जाने नहीं दुंगी ।”
    रूपा बात को आगे बढाते हुए फिर बोलती है।
    ” इसको ऐसा सबक सिखाऊंगी, की ये ज़िन्दगी भर नहीं भूलेगा।”
    बोलकर रूपा फिर कमल के उपर अटैक करना चाहती है। पर राधा का इसारा पा कर रूक जाती है।
    कमल जो दोनो की बात सुन रहा था । वो एक दम से पिछे मुड़ता है, और गेट के तरफ बढ़ जाता है। दरवाजा खोलकर बाहर निकल जाता है। पर दरवाजे को बाहर से बंद कर देता है ! और आगे बढ़ जाता है। आपको क्या लगता है। की कमल चला गया? क्या वो फीर वापस आयेगा? चलिए कहानी के तरफ चलते हैं, और जनने की कोशिश करते हैं।
    राधा और रूपा एक दुसरे को आशचर्य से देखने लगती है।
    ” चलो बाहर चलते है “
    राधा बोलती है, और रूपा का हांथ पकड़ कर दरवाजे के तरफ जाने लगती है। दोनो चलकर दरवाजे पास आती है और दरवाजे के हेन्डल पकड़ कर अन्दर के तरफ खींचती है। उसे एहसास होती है की दरवाजा बाहर से लॉक है।
    ” दीदी कमल ने दरवाजा बाहर से बंद कर दिया है।”
    रूपा राधा के तरफ देखते हुए बोली थी। जब दोनो ने देखा की दरवाजा बाहर से बंद है। तो फिर दोनो के मन में डर और भी ज्यादा बढ़ गया था। दोनो यही सोच सोच कर परेशान हो रही थी, की अब क्या होगा। ना जाने कब उसका कमल जैसे आफत से छुटकारा मिलेगा।
    ” मोबाइल भी नहीं है, कि जिससे दीदी को कॉल करके बता देती।”
    रूपा ने खामोशी तोड़ते हुए बोली थी।
    ” हां दीदी भी परेशान होगी, वो भी क्या सोच रहीं होंगी की ये दोनो कहां रह गयी।”
    राधा रुआंसे स्वर में बोली थी ।
    इधर शीला और चांदनी के भी कदम तेजी से क्लास रूम के तरफ बढ़ रहे थे। उसे नहीं पता था की क्लास रूम में इतनी बड़ी लड़ाई चल रही थी। परेशानी दोनो के चेहरे पर साफ झलक रही थी।
    ” चांदनी, राधा और रूपा बहुत बड़ी मुसिबत में है। मेरा दिल बहुत घबरा रहा है।”
    शीला बोली और चांदनी के हांथ पकड़ कर खींचते हुए भागने लगी थी।
    ” हां, मुझे भी लगता है। की कुछ तो गड़बड़ है।”
    चांदनी शीला से बोली और ये भी शीला के साथ दौड़ने लगी थी।

    क्लास रूम का दरवाजा एक बार फीर से खुलता है। और कमल क्लास रूम में ऐन्टर करता है। इस बार कमल का हाव भाव चेहरे का एक्सप्रेशन बॉडी लोंगबेज पुरी तरह से बदल गया था। उसका चेहरा एक दम से डरावना हो गया था। लाल लाल आंख बिखरे बाल एक हांथ में डंडा तो दुसरे हांथ में फोल्ड किया हुआ मोटी मोटी दो रस्सी लिए कमल क्लास रूम में प्रवेश किया था।
    ” अब क्यों आये हो कमल, क्या लेने आये हो दुबारा। चलो हटो मेरे रास्ते से मुझे जाना है।”
    रूपा कमल के तरफ अपनी उंगली प्वाइंट ऑट करते हुए बोली थी।
    ” कमल रास्ता छोड़ो मेरा, मैं कह देती हूं। अच्छा नहीं होगा।”
    राधा भी कमल को गुस्से से बोली और रूपा के हांथ को मजबूती से पकड़ कर आगे बढ़ी।
    ” अरे रूक जा, इतनी भी जल्दी क्या है। तुम लोगों को जाने की।”
    बिना रूके कमल फीर बोला
    ” अभी तो तुम लोगों को बहुत सारा हिसाब देना है।”
    बोलकर कमल राधा और रूपा के तरफ लपका 
    राधा और रूपा अचानक हुए इस हमले से सम्भल नहीं पाई थी। इसी बात का कमल को फायदा मिला वो राधा और रूपा को पकड़ चुका था। वो बात अलग था कि उसके शरीर मे इतना ताकत नहीं था। की दोनो लड़कीयों से ये अकेला एक साथ मुकाबला कर सके, लेकिन इस बार कमल अपने लिए ज्यादा पॉजीटीव था।  शरीर को चुस्त दिमाग दुरुस्त कर के आया था। वो अपने दिमाग के घोड़े को तेज गती से दौड़ाने लगा था। वो मन हीं मन सोच लिया था की इन दोनो लड़कियों से एक साथ मुकाबला करना आसान नहीं है। इस लिए वो एक प्लान तैयार किया था कि,ये दोनो को किसी तरह अलग करना पड़ेगा। नहीं तो फिर इन दोनो के हाथों मार खाना पड़ सकता है।
    ” रूक जा शाली, मैं तुम दोनो को अभी बताता हूं।”
    बोलते हुए कमल राधा को एक जोरदार थप्पड़ मार देता है। थप्पड़ खा कर राधा सीधे फर्श पर जा गिरती है।राधा सम्भल पाये उस से पहले कमल के पैर राधा के कमर पर पड़ता है। चोट इतनी जोर की लगी की राधा की चीख निकल गई थी। रूपा का हांथ कमल नहीं छोड़ा था इसका भी कारण है। आपने देखा नहीं कि, थोड़ी देर पहले रूपा कैसे कमल की बैण्ड बजाई थी। यही कारण था कि कमल राधा पर अटैक कर रहा था। और रूपा पर कंट्रॉल बनाना चाह रहा था। दो चार लात और राधा को मारता है। राधा बेहोश हो जाती है।अब बारी थी रूपा की।
    ” शाली हरामजादी,तुने मुझे मारा था। अब रूक मैं तेरा क्या हाल करता हूं।”
    कमल अपना दांत पीस कर रूपा से बोला था।
    ” क्या करेगा तू मेरा,हां, इतना जल्दी भुल गया की मैं तेरा क्या हालत किया था।”
    रूपा कमल पर गुस्से से चिल्लाते हुए जोर से बोलती है।और कमल के घुटने के नीचे पैर पर एक जोरदार लात मार देती है। कमल दर्द के मारे कराह देता है।
    ‘ आ आ आ ह “
    रूपा इतना हीं पर नहीं रूकती है। कमल जो रूपा के दोनो हांथ पकड़े हुए था। रूपा तेज झटके के साथ अपना एक हांथ कमल के पकड़ से आजाद करा चुकी थी। आजाद हीं नहीं ताबड़ तोड़ छः सात चमाटे भी लगा चुकी थी। ऐसा लग रहा था अब सिचुएशन पुरी तरह से रूपा के कंट्रोल में आ गयी थी। राधा अभी भी फर्श पर बेहोश परी थी। रूपा सोच रही थी की, अगर हमें राधा दीदी को सेफ करना है। तो इस कमल रूपी रावण को एक अच्छा सा सबक सीखाना हीं पड़ेगा। वो दुबारा पैर से अटैक करना चाहती थी। जैसे हीं वो अपना पैर अटैक करने के लिए उठाई एक जोर दार मुक्का उसकी सीना पर आ कर लगी मुक्के का भार इतना जबर्दस्त था। रूपा हिल गई थी। दर्द इतना तेज हुआ की रूपा दर्द के मारे कांप गई थी। रूपा का शरीर थर थर कांपने लगा था। इसी वक्त का कमल फायदा उठाया। रूपा के कान के बगल में लगातार थप्पड़ मारा जिससे रूपा और लाचार हो गई थी। होती भी क्यों नहीं इतनी मार जब किसी लड़के को पर जाए तो वो हिल जाये फीर भी ये तो एक लड़की थी। वो भी 17 वर्ष की
    ‘ अब मैं तुझे बताउंगा कि मुझ पर हांथ उठाने का अंजाम क्या होता है।”
    कमल रूपा पर चिल्ला कर बोला था। रूपा को बहुत ज़ोर कि दर्द हो रही थी। वो कुछ बोली नहीं सिर्फ कमल को गुस्से से देखती रही।
    ” बहुत ज्यादा उर रही थी तब से, अब दिखा अपनी ताकत और स्टाइल “
    कमल बोलते हुए रस्सी हांथ में उठा लेता है। और रूपा के कमर में रस्सी लपेटा देता है। दोनो हांथ पीछे करके रूपा का हांथ रस्सी से बांध दिया था। और उसे बाल से खींचते हुए एक बैंच पर ले जाकर बिठा दिया था। इतने में राधा को होश आने  लगा था। उसके हांथ पैर हिलने लगे थे। राधा का आंख धीरे धीरे खुलता है। और राधा की नजर बंधी हुई रूपा पर पड़ती है। वो सहम जाती है। और वो मन में सोचने लगती है। की रूपा कितनी अच्छी है। उसने मेरे लिये अपनी जान की बाजी लगा दी है। शायद इस जगह मेरी अपनी सगी बहन भी होती तो शायद ये सब नहीं करती वो अपनी जान की परवाह किए बगैर हमारा साथ दे रहीं है। कमल से लड़ रही है। ये सब सोच सोच कर राधा रूपा पर प्राऊड फील कर रही थी। और उसके आंख में आंसू आ गई थी ! वो हिम्मत कर के उठ कर बैठती है।
    ” कमल ये क्या हरकत है तुम्हारा, तुमने रूपा को बांध क्यों रखे हो खोल,खोल, खोल कमीने मेरी बहन को।”
    राधा कमल को गुस्से से हुई अपनी लाल आंख दिखाते हुए बोली थी।
    ” अच्छा, तो तुम होश में आ गई हो। रूक मैं आता हूं। तेरी भी खबर लेने।”
    .बोलकर कमल राधा के पास आता है। राधा कुछ कर पाती उससे पहले कमल उसकी कमर में रस्सी लपेट चुका था । कमल राधा को एक हांथ खुला  छोड़ कर  बाकी कमर और एक हांथ को बांध दिया था। कहानी का अगला भाग और मजेदार होने वाली है। तो पढिए पुरी कहानी केवल , नमस्ते स्टोरी वर्ल्ड डॉट कॉम पर।
     

  • ब्लाइंड डेट से मिला प्यार एपिसोड 2

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

    एपिसोड 2: बॉस का इंतकाम या दिलचस्प शुरुआत?

    मुंबई की रात कभी नहीं सोती। सड़कों पर शोर था, ट्रैफ़िक का शोर, लोगों की आवाज़ें… लेकिन AK Industries की 25वीं मंज़िल पर एक अलग ही खामोशी पसरी थी। वहां सिर्फ कीबोर्ड की ‘टैप-टैप’ सुनाई दे रही थी। कांच की बड़ी खिड़की के पीछे एक शख्स अंधेरे में डूबा, लैपटॉप की रोशनी में काम कर रहा था।

    तभी, भारी दरवाज़ा एक झटके से खुला। शख्स की उंगलियां कीबोर्ड पर रुकीं। उसने बिना पीछे मुड़े, अपनी घड़ी देखी—रात के 11 बज रहे थे।

    “तो… कैसी रही तुम्हारी ब्लाइंड डेट?” एक गहरी और रौबदार आवाज़ गूंजी।

    दरवाज़े पर खड़ा शख्स, विजय, हंसते हुए अंदर आया और सामने वाली चेयर पर बैठ गया। “भाई! डेट तो ऐसी थी कि तुझे ज़िंदगी भर अफ़सोस होगा कि तू क्यों नहीं गया!”

    काम में डूबे उस शख्स ने लैपटॉप बंद किया। यह अक्षय खन्ना था। 25 साल का हैंडसम, कामयाब और थोड़ा सा ‘वर्कहोलिक’ बिज़नेस टाइकून। उसके लिए काम ही उसकी दुनिया थी, और उसकी एक नज़र लड़कियों का दिल धड़काने के लिए काफी थी।

    अक्षय ने कुर्सी पीछे झुकाई और ठंडे अंदाज़ में पूछा, “इतनी तारीफ? क्या खास था उसमें?”

    विजय ने मेज़ पर झुकते हुए कहा, “खास वो नहीं, उसकी बातें थीं! उसे पता नहीं था कि वो ‘अक्षय खन्ना’ के सबसे पक्के दोस्त के साथ बैठी है। वो बेचारी तो अपने बॉस की धज्जियां उड़ा रही थी।”

    अक्षय की एक भौंह ऊपर उठी। “बॉस की?”

    “हाँ!” विजय ने मजे लेते हुए कहा, “कह रही थी कि उसका बॉस ‘चलता-फिरता टेंशन’ है। हिटलर का दूसरा अवतार! और सुन… उसने ये भी कहा कि अगर पैसों की मजबूरी न होती, तो वो उस ‘खड़ूस’ की कंपनी में एक पल न रुकती।”

    अक्षय के चेहरे पर कोई भाव नहीं आया, पर उसकी आंखों में एक चमक जागी। “मेरी कंपनी की एम्प्लॉई है?”

    “बिलकुल! बातों-बातों में उसने AK Industries का नाम ले लिया। नाम तो नहीं बताया उसने अपना, पर भाई… लड़की में दम है। तुझे ‘हिटलर’ बोलकर निकल गई!” विजय ठहाका मारकर हंसा।

    अक्षय की उंगलियां टेबल पर ताल देने लगीं। उसके होंठों पर एक शातिर मुस्कान आई। “मेरे ही नमक का हक अदा कर रही है और मुझे ही हिटलर कह रही है? दिलचस्प है…”

    उसने अपना फोन उठाया और एक नंबर डायल किया। “कल सुबह 9 बजे तक मुझे अपनी कंपनी की हर फीमेल एम्प्लॉई की लिस्ट चाहिए। हर एक की।”

    दूसरी तरफ: आरोही का घर

    आरोही ने अपने घर का दरवाज़ा खोला। सामने सोफे पर रोशनी बैठी थी, जिसके पैर पर पट्टी बंधी थी, पर हाथ में चिप्स का पैकेट था।

    आरोही थककर सोफे पर गिरी। “पैर कैसा है अब तेरा? या सिर्फ मेरी खिंचाई करने के लिए पट्टी बांधी है?”

    रोशनी हंसी, “अरे यार, दर्द तो है, पर तेरी डेट की कहानी सुनने की एक्साइटमेंट ज़्यादा है। बता, लड़का कैसा था? उसने तुझे रिजेक्ट किया या तूने उसे भगाया?”

    आरोही ने टीवी का रिमोट उठाते हुए चैन की सांस ली। “मैंने काम तमाम कर दिया। साफ़ कह दिया कि मेरा बॉयफ्रेंड है। अब वो कभी पलटकर नहीं आएगा। वैसे… लड़का बुरा नहीं था, काफी सुलझा हुआ था। पर मुझे इन सब पचड़ों में नहीं पड़ना।”

    रोशनी ने उसे कोहनी मारते हुए कहा, “देख लेना आरोही, कहीं वो लड़का तेरा पीछा न करने लगे।”

    आरोही ने लापरवाही से कहा, “अरे छोड़! मुंबई इतनी बड़ी है, वो दोबारा कभी नहीं मिलेगा। और कल सुबह मुझे ऑफिस जल्दी जाना है, वो ‘हिटलर’ बॉस कल कोई नई आफत न खड़ी कर दे।”

    वापस अक्षय के केबिन में… अक्षय अंधेरे में खिड़की से बाहर मुंबई की लाइट्स देख रहा था। उसके दिमाग में विजय की बातें गूंज रही थीं—”चलता फिरता टेंशन।”

    उसने धीरे से बुदबुदाया, “कल ऑफिस में मिलते हैं, मिस्टीरियस एम्प्लॉई। देखते हैं कल तुम अपनी ‘टेंशन’ को कैसे झेलती हो।”

    उसकी आंखों में अब एक अलग ही शिकार वाली चमक थी।

  • ब्लाइंड डेट से मिला प्यार

    ब्लाइंड डेट से मिला प्यार

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

    एपिसोड 1 

    राज होटल में आज मुंबई शहर का सबसे चर्चित ब्लाइंड डेट इवेंट था। शाम के ठीक पाँच बजे होटल का मुख्य हॉल हल्की नीली रोशनी और गहरे साए में डूबा हुआ था। वेटर्स ने अपने चेहरों पर काले मास्क पहन रखे थे और एंट्रेंस पर लंबी लाइन लगी थी। हर गेस्ट का कार्ड चेक किया जा रहा था, फिर उनकी आंखों पर पट्टी बांधकर उन्हें अलग-अलग कमरों की ओर ले जाया जा रहा था। माहौल में हल्का म्यूज़िक और अनजाना सा रोमांच घुला हुआ था।

    उसी लाइन में खड़ी थी आरोही। हाथ में डायमंड वीआईपी पास और दिमाग में अनगिनत सवाल। वह यहां अपनी दोस्त रोशनी की जगह आई थी, बस थोड़ी देर के लिए। वह बार-बार अपने फोन की स्क्रीन देख रही थी, जैसे खुद से ही पूछ रही हो — क्या सच में अंदर जाना चाहिए?

    तभी उसका फोन बजा। स्क्रीन पर रोशनी का नाम चमक रहा था। आरोही ने तुरंत कॉल उठाई और धीमी आवाज में बोली, “कहां है तू? तेरी बारी आने वाली है।” उधर से दर्द भरी आवाज आई, “सॉरी यार, मैं घर से निकलने ही वाली थी कि मेरा पैर मुड़ गया। अभी हॉस्पिटल में हूं। प्लीज तू मेरी जगह चली जा।”

    आरोही ने झुंझलाते हुए कहा, “मुझे इन सब में कोई इंटरेस्ट नहीं है, और वैसे भी मेरे पास बॉयफ्रेंड बनाने का टाइम नहीं है।”

    रोशनी ने लगभग विनती करते हुए कहा, “प्लीज… आखिरी बार। तुझे मेरी कसम।”

    बस यही वो शब्द थे जिन पर आरोही हमेशा हार जाती थी। उसने गहरी सांस ली और कहा, “ठीक है, पर ये आखिरी बार है। तू मुझे हर बार ऐसे ही फंसा लेती है। बता यहां मुझे करना क्या है?”

    रोशनी चहकते हुए बोली,

    “कुछ खास नहीं, बस जैसी तू है वैसे ही रहना। और हां… लड़का मुझे ना कह दे, आगे मैं अपनी मॉम को संभाल लूंगी।”

    कुछ ही देर बाद उसकी बारी आ गई। उसने हल्की सी मुस्कान के साथ अपना पास दिखाया। दो स्टाफ मेंबर्स उसके पास आए, उसकी आंखों पर काली पट्टी बांधी और उसे धीरे-धीरे एक शांत, अंधेरे कमरे तक ले गए। कुर्सी पर बैठाकर पट्टी हटा दी गई। कमरे में हल्की सी पीली रोशनी थी, इतनी कि सामने बैठे शख्स की परछाईं दिखे, चेहरा नहीं।

    कुछ क्षणों तक खामोशी रही। फिर सामने से एक गहरी और संतुलित आवाज आई, “हेलो।”

    आरोही ने भी जवाब दिया, “हाय।”

    शुरुआती बातचीत औपचारिक थी, लेकिन धीरे-धीरे माहौल सहज होने लगा। आरोही का रुखापन भी थोड़ा कम होने लगा। जब उसने पूछा, “आप क्या करते हैं?” तो सामने वाले ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया, “बस… बिज़नेस।”

    “अच्छा है,” आरोही ने हंसते हुए कहा, “कम से कम आप अपने बॉस को रोज़ नहीं झेलते होंगे। मेरा बॉस तो… क्या बताऊं, चलता-फिरता टेंशन है। अगर पैसों की जरूरत ना होती तो उसकी कंपनी में एक दिन भी काम ना करती।”

    सामने बैठा शख्स हल्का सा हंसा, “इतना बुरा है?”

    आरोही बातों में इतनी खो गई कि उसने अपनी कंपनी का नाम भी बोल दिया — “AK Industries में काम करना कोई आसान बात नहीं है।”

    जैसे ही ये शब्द उसके मुंह से निकले, सामने बैठे शख्स की उंगलियां कुर्सी के हैंडल पर हल्के से थम गईं। उसकी मुस्कान थोड़ी गहरी हुई, पर उसने अपनी प्रतिक्रिया छुपा ली।

    बातचीत आगे बढ़ती रही। दोनो यहां वहा की बाते कर रहे थे ।

    इवेंट खत्म होने का संकेत मिला तो सामने वाले ने शांत स्वर में पूछा, “क्या हम फिर मिल सकते हैं?”

     लेकिन आरोही ने शांत स्वर में मना करते हुए कहा,

    “मेरा पहले से एक बॉयफ्रेंड है। मैं यहां बस अपनी मॉम की वजह से आई थी… इसलिए शायद हमें आगे नहीं मिलना चाहिए। यही हमारे लिए बेहतर है।”

    वह उठी, दरवाज़ा खोला और बिना पीछे देखे बाहर चली गई।

    कमरे में कुछ पल सन्नाटा रहा। फिर उसी अंधेरे में बैठा वह शख्स हल्के से मुस्कुराया और बहुत धीमी आवाज में बोला, “AK Industries… दिलचस्प।”

     

    उसकी आंखों में अब हल्की सी चमक थी।

  • बेवजह की मोहब्बत

    बेवजह की मोहब्बत

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    बेवजह की मोहब्बत

     

    मेरी लाइफ एकदम सॉर्टेड थी। अच्छी जॉब (सीनियर मैनेजर, गुड़गांव), एक प्यारी वाइफ (नेहा) और एक फ्लैट जिसकी ईएमआई (EMI) हर महीने मेरे अकाउंट को खाली करने की कसम खाती थी। मैं 32 साल का था, मैरिड था, और लाइफ की बोरियत को ‘सफलता’ मान चुका था।

    फिर आई रिया। फेसबुक के एक रैंडम ग्रुप पर हमारी बहस हुई,  “क्या चाय कॉफी से बेहतर है?” इस बेवकूफी भरे टॉपिक से शुरू हुई बात कब मैसेंजर से व्हाट्सएप और फिर वॉयस कॉल तक पहुँच गई, पता ही नहीं चला।

    “शादीशुदा होने का मतलब यह नहीं है कि आपका दिल धड़कना बंद कर देता है, बस वह गलत दिशा में धड़कने का रिस्क नहीं लेना चाहता।” पर मेरा दिल उस समय एडवेंचर के मूड में था।

    रिया मुझसे सात साल छोटी थी। बैंगलोर में रहती थी। उसकी आवाज़ में वो जादू था जो गुड़गांव के ट्रैफिक में भी मुझे सुकून देता था।

     

    शुरुआत में   सब ‘फ्रेंडली’ था। लेकिन धीरे-धीरे हमारी बातें ‘गुड मॉर्निंग’ से ‘आई मिस यू’ तक पहुँच गईं। नेहा (मेरी वाइफ) को लगता था कि मैं ऑफिस के कॉल्स पर बिजी हूँ। और एक तरह से मैं बिजी ही था, अपनी दूसरी लाइफ को मैनेज करने में।

    रिया और मेरे बीच घंटों वॉयस कॉल्स होते थे। जब रात को घर के सब लोग सो जाते, मैं बालकनी में जाकर उससे बात करता।

    “तुम शादीशुदा क्यों हो, अर्जुन?” वह अक्सर पूछती।

    “क्योंकि मैं तुमसे पहले नेहा से मिला था। टाइमिंग का खेल है सब,” मैं मज़ाक में कहता।

    लेकिन यह सिर्फ़ मज़ाक नहीं था। हमारे बीच खुलकर रोमांस होने लगा था। चैट पर वो बातें होती थीं जो शायद मैंने नेहा से कभी नहीं की थीं। वॉयस कॉल पर उसकी सांसों की आवाज़ सुनकर मुझे लगता था कि यही ‘सच्चा प्यार’ है। हमने हज़ारों वादे किए। हमने प्लान बनाया कि हम गोवा में मिलेंगे। वह कहती थी, अर्जुन, तुम मेरे सोलमेट हो। मुझे फर्क नहीं पड़ता कि तुम मैरिड हो, मुझे बस तुम चाहिए।”

    मुझे लगा कि रिया वो ‘मिसिंग पीस’ है जो मेरी लाइफ की पहेली को पूरा कर देगी।

     

    सब कुछ परफेक्ट चल रहा था, जैसे किसी बॉलीवुड फिल्म का पहला हाफ। फिर अचानक रिया के मैसेज कम होने लगे।

    “बिजी हूँ,” “काम का प्रेशर है,” “मम्मी पास में हैं”, ये सब बहाने आम हो गए।

    फिर एक हफ्ता ऐसा आया जब उसने मेरा कोई कॉल नहीं उठाया। मैं पागल हो रहा था। गुड़गांव की सड़कों पर कार चलाते हुए मैं बार-बार फोन चेक करता। नेहा को लगा कि ऑफिस में कुछ बड़ा पंगा हुआ है। उसे क्या पता था कि मेरा ‘दिल का ऑफिस’ बंद होने की कगार पर है।

    “प्यार में ‘इंतज़ार’ करना अच्छा लगता है, लेकिन ‘इग्नोर’ होना दुनिया की सबसे गन्दी फीलिंग है।”

    आठ दिन बाद उसका फोन आया। मेरी जान में जान आई।

    “रिया! कहाँ थी तुम? मैं मर रहा था तुम्हारे बिना!”

    दूसरी तरफ से जो आवाज़ आई, वो रिया की तो थी, पर उसमें वो ‘इश्क’ नहीं था।

    “सुनो अर्जुन, मुझे लगता है हमें अब बात नहीं करनी चाहिए,” उसने बहुत ही ठंडे अंदाज़ में कहा।

     

    मैं यह सुनकर सुन्न रह गया। “क्या? क्यों? क्या हुआ?”

    “कुछ नहीं हुआ। बस मुझे रियलाइज हुआ कि यह सब ‘बेवजह’ है। तुम मैरिड हो। तुम्हारा फ्यूचर नेहा के साथ है। मैं अपनी लाइफ में आगे बढ़ना चाहती हूँ,” उसने ऐसे कहा जैसे वह किसी क्लाइंट को प्रेजेंटेशन दे रही हो।

    उसका अंदाज़ एकदम बदल गया था। वो रिया, जो कॉल पर रो पड़ती थी अगर मैं पाँच मिनट लेट फोन करूँ, अब पत्थर बन चुकी थी।

    “लेकिन रिया, तुमने कहा था कि तुम मुझसे प्यार करती हो? गोवा का प्लान? हमारी वो बातें?”

    “वो सब एक क्रेज था, अर्जुन। अब मैं मैच्योर हो गई हूँ। प्लीज, मुझे कॉल मत करना।”

    उसने फोन काट दिया। मैंने दोबारा मिलाया। ब्लॉक। व्हाट्सएप चेक किया। ब्लॉक। इंस्टाग्राम? ब्लॉक।

     

    मैंने हार नहीं मानी। मैंने अपने एक दोस्त के फोन से उसे कॉल किया। उसने उठाया।

    “रिया, प्लीज एक बार बात कर लो। मैं अपनी शादी छोड़ दूंगा, मैं बैंगलोर आ जाऊंगा,” मैं गिड़गिड़ा रहा था। एक 32 साल का शादीशुदा आदमी, जो अपनी लाइफ में सब कुछ अचीव कर चुका था, एक 25 साल की लड़की के सामने भीख मांग रहा था।

    “अर्जुन, तुम पैथेटिक लग रहे हो। गेट अ लाइफ!” रिया की आवाज़ में नफरत थी।

    “पर क्यों? कम से कम वजह तो बताओ? कोई और मिल गया क्या?”

    “वजह यह है कि मुझे अब तुममें कोई इंटरेस्ट नहीं है। ख़त्म।”

    उसने फिर से ब्लॉक कर दिया। मैंने ईमेल लिखे, लंबे-लंबे पैराग्राफ लिखे। मैंने उसे वो वॉयस नोट्स याद दिलाए जो उसने मुझे भेजे थे। मैंने उसे हमारी वो ‘हॉट चैट्स’ याद दिलाईं। पर कोई जवाब नहीं।

    मुझे समझ नहीं आ रहा था कि जो इंसान कल तक मेरे बिना सांस नहीं ले सकता था, वो आज मुझे कचरा कैसे समझ सकता है?

     

    कुछ हफ़्तों बाद, एक कॉमन फ्रेंड के ज़रिए मुझे पता चला कि रिया की सगाई हो गई है। एक एनआरआई (NRI) लड़के के साथ। वो लड़का अनमैरिड था, अमीर था और अमेरिका में रहता था।

    सब कुछ साफ़ हो गया। रिया के लिए मैं कोई ‘सोलमेट’ नहीं था। मैं बस एक ‘टाइमपास’ था, एक ‘फिलर’ था। जब तक उसे अपनी लाइफ का असली ‘हीरो’ नहीं मिला, वह मेरे साथ डिजिटल रोमांस का नाटक करती रही। मेरी शादीशुदा लाइफ उसके लिए एक सुरक्षा कवच थी, उसे पता था कि मैं कभी उस पर शादी का दबाव नहीं बनाऊंगा, इसलिए वह खुलकर एन्जॉय कर रही थी।

    जैसे ही उसकी लाइफ में ‘सेटल’ होने का मौका आया, उसने मुझे ‘डिलीट’ कर दिया जैसे हम फोन से कोई फालतू ऐप डिलीट कर देते हैं।

     

    आज मैं अपनी बालकनी में खड़ा हूँ। नेहा अंदर आरव (मेरा बेटा, जो अब हो गया है) को सुला रही है। लाइफ फिर से वही है, ईएमआई, ऑफिस और बोरियत।

    रिया अब अमेरिका में है। शायद वह अपने पति के साथ वैसी ही बातें करती होगी जैसी मुझसे करती थी। या शायद नहीं।

    यह कहानी एक लेसन पर खत्म होती है। मेरा लेसन यह था, ऑनलाइन प्यार अक्सर एक ‘फ्री ट्रायल’ की तरह होता है। जैसे ही सब्सक्रिप्शन लेने का टाइम आता है, कंपनी (या लड़की) हाथ खींच लेती है।”

    मोहब्बत बेवजह नहीं होती, उसके पीछे हमेशा एक वजह होती है। कभी वो वजह ‘अकेलापन’ होती है, तो कभी ‘लालच’। रिया के लिए वजह ‘मनोरंजन’ थी, और मेरे लिए वजह ‘भटकाव’ था।

    मैंने अपना फोन निकाला, रिया का नंबर जो आज भी मेरे ‘ब्लॉक लिस्ट’ में सबसे ऊपर था, उसे हमेशा के लिए डिलीट कर दिया। लाइफ सॉर्टेड तो नहीं हुई, पर अब कम से कम ‘हैंग’ नहीं हो रही थी।

     

    लेखक का सन्देश और आभार

    मेरे प्यारे और दिल टूटे (या जुड़े हुए) पाठकों,

    इस मॉडर्न, बेबाक और कड़वे सच से भरी शैली में रचित इस कहानी “बेवजह की मोहब्बत” को पढ़ने के लिए आप सभी का तहे दिल से शुक्रिया! यह कहानी हमें सिखाती है कि डिजिटल दुनिया के वादे अक्सर ‘नेटवर्क’ की तरह होते हैं, जो कभी भी गायब हो सकते हैं।

    शादीशुदा लाइफ में जब हम बाहर सुकून ढूंढते हैं, तो अक्सर हम ‘सुकून’ नहीं, बल्कि ‘तूफान’ को दावत देते हैं। उम्मीद है कि अर्जुन की यह कहानी आपको अपनी प्राथमिकताओं को समझने में मदद करेगी।

    क्या अर्जुन के साथ जो हुआ, वो सही था? क्या रिया ने जो किया, वह आज के समय की कड़वी सच्चाई है? अपनी राय और एक्सपीरियंस नीचे कमेंट सेक्शन में ज़रूर साझा करें।

    यदि इस डिजिटल लव-स्टोरी और ब्रेकअप ने आपके दिल को छुआ हो, तो कृपया स्टिकर  भेजकर अपना प्यार और समर्थन दें।

    आपकी हर प्रतिक्रिया मुझे और भी ज़्यादा आधुनिक लाइफस्टाइल और मानवीय रिश्तों पर कहानियाँ लिखने की प्रेरणा देती है।

     

    प्यार करो तो ‘लॉगिन’ संभलकर करना, क्योंकि ‘लॉगआउट’ अक्सर दर्दनाक होता है!

     

     

  • बेवजह की मोहब्बत

    बेवजह की मोहब्बत

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    बेवजह की मोहब्बत  

     

     

     

     

     

    रात के लगभग ढाई बजे थे, अंधेरे कमरे में बस मोबाइल की हल्की नीली रोशनी थी, और उस रोशनी में बैठा था विवेक, एक शादीशुदा आदमी, जिसकी ज़िंदगी बाहर से बिल्कुल परफेक्ट लगती थी।

     

    एक अच्छी नौकरी, एक समझदार पत्नी, एक छोटा सा बच्चा… सब कुछ था उसके पास।

     

    फिर भी… उसे लगता था, कि कुछ कमी है।

     

    और उस कमी का नाम उसे तब तक नहीं पता था, जब तक कि एक दिन उसकी ज़िंदगी में “नेहा” नहीं आई।

     

     

     

     

    नेहा का एक मैसेज, जो विवेक की जिदंगी में सब बदल गया

     

    वो एक सामान्य दिन था। ऑफिस के काम के बीच विवेक ने फेसबुक खोला, और उसमें  एक नोटिफिकेशन आया

     

    “Hi… क्या आप सच में उतने ही serious हैं, जितने आपकी पोस्ट दिखती हैं?”

     

    विवेक ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, शायद उससे थोड़ा ज्यादा…

     

    बस, यहीं से शुरू हुई एक कहानी, जो जितनी जल्दी बनी, उतनी ही जल्दी टूट भी गई।

     

     

     

     

    नेहा आज की माडर्न लड़की थी, उसकी सोच अलग थी, उसकी बातें… उसकी सोच… सब कुछ ऐसा था जो विवेक को नेहा कि ओर खींचता चला गया।

     

    पहले तो शुरुआत में हल्की-फुल्की बातें हुईं, काम, जिंदगी, सपने… ज्यादातर काम की सीरियस बात उन दोनों के बीच होती थी।

     

    फिर धीरे-धीरे बातें गहरी होने लगीं।

     

    नेहा विवेक से कहती तुमसे बात करके सुकून मिलता है…”

     

    विवेक हँसकर जवाब देता, मुझे भी…”

     

    लेकिन दोनों जानते थे, ये सिर्फ “सुकून” नहीं था।

     

     

     

     

    धीरे-धीरे उनके बीच बातचीत की सीमा टूटने लगी

     

    विवेक शादीशुदा था, ये बात उसने पहले ही दिन नेहा को बता दी थी।

     

    नेहा यह सुनकर कुछ पल के लिए चुप हुई थी…

    फिर बोली—

    “दिल का क्या करें… वो तो किसी से भी लग सकता है…”

     

    उस दिन के बाद से दोनों के बीच एक अनकहा रिश्ता बन गया।

     

    ना नाम था, ना कोई वादा… लेकिन दोनों के बीच एहसास गहरे और सच्चे थे।

     

     

    अब उनकी बातें सिर्फ चैट तक सीमित नहीं रहीं।

     

    रात होते ही कॉल शुरू हो जाती।

     

    धीरे-धीरे वो कॉल्स लंबी होने लगीं—

    कभी एक घंटा, कभी दो…

     

    और फिर वो पल आया, जब दोनों ने अपनी झिझक छोड़ दी।

     

    अब उनकी आवाज़ों में सिर्फ बातें नहीं थीं…

    उनमें एहसास था, चाहत थी।

     

    नेहा की हँसी में एक अपनापन था,

    और विवेक की आवाज़ में एक अपनापन।

     

    वो कहते—

    “काश… हम पहले मिले होते…”

     

    और हर बार ये “काश” उनकी दूरी को और गहरा कर देता।

     

     

    उनके बीच अब झिझक की कोई दीवार नहीं बची थी।

     

    चैट में, कॉल में, दोनों खुलकर अपनी भावनाएँ जताते।

     

    नेहा विवेक से कहती जब तुम ‘miss you’ कहते हो ना… दिल सच में भर आता है…”

     

    विवेक जवाब देता, तुम मेरी आदत बन गई हो…”

     

    उनकी बातें कभी-कभी इतनी गहरी हो जातीं कि लगता हि नही था, कि ये रिश्ता सिर्फ ऑनलाइन है, दिल से जुड़ा हुआ नही है।

     

    लेकिन शायद यही विवेक का सबसे बड़ी गलती थी।

    एक दिन 1-2  हफ्ते के लिए अपने  ऑफिस के काम में कुछ ज्यादा ब्यस्त हो गया, तो वह नेहा को कुछ कम समय दे पा रहा था, जिससे नेहा नाराज रहने लगी।

     

    बाद मे जब विवेक अपने काम से फुर्सत पाया तो उसने नेहा से बात करने का कोशिश किया…  लेकिन अचानक से नेहा का व्यवहार बहुत बदल गया।

     

    धीरे-धीरे नेहा का मैसेज विवेक को कम आने लगा।

     

    कॉल्स छोटी हो गईं, और फिर… अचानक एक दिन वह बंद ही हो गया।

     

    पहले दिन जब  विवेक ने  सुबह दोपहर शाम को अभिवादन का मैसेज किया, जिसका कोई जबाब नही आया तो विवेक सोचा, शायद किसी काम में व्यस्त होगी।”

    दूसरे दिन, जब यही सिलसिला जारी रहा तो, विवेक सोचने लगा, शायद वह किसी बात से नाराज़ है…

    तीसरे दिन भी जब मैसेज  नही आया, तो विवेक अपने आप में सोचने लगा कि क्या मैंने कुछ गलत कहा?”

     

    उसने नेहा को  मैसेज किया सब ठीक है?”

    लेकिन कोई  जवाब  नही,  तब विवेक को नेहा कि फिक्र होने लगा, उसका मन किसी अनहोनी की आशंका से भर गया, वह उससे बात करने, तथा उसका हाल जानने के लिए  उसका मन तड़प गया।

    तब विवेक ने उसके और नेहा के बीच कुछ काॅमन दोस्त थे, उनसे चर्चा किया, नेहा के बारे में उसके कुछ देर बाद नेहा का मैसेज आया।

    मैसेज के शब्द बहुत ही उत्साहहीन था, एकदम बदलता हुआ अंदाज अब वह नेहा पहले जैसी नहीं रही।

     

    वो पहले घंटों बात करती थी,

    अब मिनटों में “busy हूँ” कहकर चली जाती थी।

     

    विवेक हर दिन कोशिश करता, नए तरीके से बात शुरू करने की, उसे हँसाने की…

     

    लेकिन हर बार जवाब वही मिलता “मूड नहीं है…”

     

     

     

     

    विवेक ने हार नहीं मानी।

     

    उसने खुद को दिल से और ज्यादा झोंक दिया उस रिश्ते में।

     

    वो हमेशा पूछता कुछ हुआ है क्या?”

     

    नेहा हमेशा अपने जबाब में  कहती कुछ नहीं…”

     

    वो कहता “तुम पहले जैसी क्यों नहीं हो?” क्योंकि विवेक को तो चुलबुली और नटखट नेहा की आदत थी, लेकिन यहां नेहा एक दम चुप हो गई थी।

     

    नेहा  ज्यादातर सवालों के जवाब में अब चुप हो जाती।

     

    उसकी चुप्पी…  विवेक को सबसे ज्यादा दर्द देती थी।

     

     

     

    एक सच, जो धीरे-धीरे सामने आया, एक दिन, बहुत कोशिश के बाद नेहा ने कहा विवेक… शायद ये सब गलत है…”

     

    विवेक का दिल धड़क उठा, और उसने पुछा

    “गलत? क्या?”

     

    नेहा बोली ये रिश्ता… ये बातें… सब कुछ…”

     

    विवेक ने समझाने की कोशिश की लेकिन ये रिस्ता तो  सच्चा है…”

     

    नेहा ने जवाब दिया “सच्चा है… लेकिन सही नहीं है…”

     

     

     

    उस दिन के बाद, नेहा विवेक से और दूर हो गई।

     

    अब वो खुद से बात शुरू नहीं करती थी।

     

    विवेक हर दिन एक नया मैसेज भेजता, कैसी हो?”

    “आज क्या किया?”

     

    लेकिन जवाब… या तो देर से आता,

    या आता ही नहीं।

     

    एक रात, विवेक ने हिम्मत जुटाई।

     

    उसने कॉल किया।

     

    काफी देर बाद नेहा ने उठाया।

     

    आवाज़ में वही अपनापन नहीं था।

     

    विवेक ने कहा नेहा, हम ये सब खत्म क्यों कर रहे हैं?”

     

    नेहा कुछ पल चुप रही…

    फिर बोली “क्योंकि ये कभी शुरू ही नहीं होना चाहिए था…”

     

     

    अलविदा… बिना शोर के

     

    विवेक ने आखिरी बार कहा—

    “मैं इसे संभाल सकता हूँ… हम इसे सही बना सकते हैं…”

     

    नेहा की आवाज़ धीमी थी—

    “कुछ चीजें सही नहीं बनतीं… बस खत्म हो जाती हैं…”

     

    और फिर… कॉल कट।

     

    उसके बाद नेहा ने खुद से कभी मैसेज नहीं किया।

     

     

    विवेक के पास सब कुछ था…

    फिर भी  उसे लग रहा था, कि जैसे कुछ नहीं था।

     

    उसकी जिंदगी वही थी, ऑफिस, घर, परिवार…

     

    लेकिन अब हर चीज में एक खालीपन था।

     

    वो  मिनट मिनट पर फोन उठाता… नेहा के मैसेज को देखता, लेकिन वहां सब कुछ खाली ही था।

    उसके दिनचर्या में एक अध्याय नेहा का इंतज़ार भी जुड गया।

     

    लेकिन रियल में क्योंकि अब कोई “नेहा” नहीं थी

     

    कुछ रिश्ते वजह से नहीं बनते…

    और इसलिए ही बिना वजह खत्म हो जाते हैं।

     

    विवेक और नेहा का रिश्ता भी ऐसा ही था।

     

    ना कोई शुरुआत का सही कारण,

    ना कोई अंत का सही जवाब।

     

    बस एक एहसास था, जो आया… और चला गया।

     

    एक दिन, महीनों बाद, विवेक ने अपने पुराने चैट पढ़े।

     

    हर मैसेज… हर कॉल…

    सब कुछ जैसे फिर से जिंदा हो गया।

     

    उसने मुस्कुराते हुए फोन बंद किया और सोचा, शायद वो सही थी…

    ये सच्चा था… लेकिन सही नहीं था…”

     

    बेवजह की मोहब्बत… दिल को बहुत कुछ देती है

    कुछ खूबसूरत यादें, कुछ अधूरे सवाल… और एक गहरा सन्नाटा।

     

    “कुछ लोग हमारी जिंदगी में आते हैं,

    हमें खुद से मिलवाने के लिए…

    और फिर चले जाते हैं, 

    हमें अधूरा छोड़कर,

    लेकिन थोड़ा मजबूत बनाकर…”

     

    इस कहानी को पढ़ने के लिए आपको दिल से धन्यवाद ❤️

    अगर कहानी ने आपके दिल को छुआ हो, तो उत्साहवर्धन के लिए स्टिकर जरूर भेजें 😊

     

     

  • अधूरी दास्तान

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

    शहर की हल्की बारिश की बूँदें सड़कों पर गिर रही थीं। रिया अपने अपार्टमेंट की बालकनी में खड़ी थी, हाथ में चाय का कप, और मन में एक अजीब सी उदासी। वह उस दिन से सोच रही थी, जब उसने आर्यन को आखिरी बार देखा था। वह आर्यन ही था—उसका पहला प्यार, उसका पहला सपना।

    कॉलेज की यादें अचानक ताजा हो गईं। लाइब्रेरी में किताबों की खुशबू, कैफेटेरिया में हँसी का शोर, और बारिश की उन छुप-छुप कर की मुलाकातों में जो मुस्कानें थी, वे सब कुछ आज भी उसकी आँखों के सामने जीवित थीं। आर्यन हमेशा कहते, “रिया, अगर तुम्हारे ख्वाबों में कोई जगह हो, तो मैं वहीं रहना चाहता हूँ।” रिया की आँखों में चमक आ जाती थी, और उसे लगता था कि उसका पूरा जीवन उसी मुस्कान में समा गया है।

    लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, कॉलेज की दुनिया छोड़कर असली जीवन में कदम रखने का समय आया। आर्यन को विदेश में नौकरी मिली, और रिया को शहर में ही रहना पड़ा। पहले तो दोनों ने हर रोज़ फोन किए, पत्र लिखे, और मिलने की कोशिश की, लेकिन दूरी और जिम्मेदारियों ने उनके बीच एक अदृश्य दीवार खड़ी कर दी।

    और फिर वह दिन आया। आर्यन ने संदेश भेजा, “मुझे लगता है हमें अपनी राहें अलग करनी चाहिए। मैं हमेशा तुम्हें याद रखूँगा।” रिया का दिल टूट गया। उसने सारी उम्मीदें, सारे सपने और शायद खुद पर विश्वास तक खो दिया।

    सालों बाद, रिया अब एक सफल आर्ट डायरेक्टर थी। लेकिन मन में वह अधूरापन अभी भी था। एक दिन, उसे अपने पुराने कॉलेज के दोस्त का निमंत्रण मिला। समारोह में पहुँचते ही उसकी नजरें एक व्यक्ति पर टिक गईं—आर्यन। समय की रेत पर शायद हर चीज बदल जाती है, लेकिन उसकी मुस्कान अब भी वैसी ही थी।

    आर्यन भी उसे देखकर चौंका। थोड़ी देर के लिए जैसे समय ठहर गया। दोनों के बीच वही पुरानी गर्माहट और नज़ाकत की आभा फिर से जाग उठी। लेकिन अब वह बातचीत में नहीं, सिर्फ नजरों की खामोशी में थी।

    समारोह के बाद, दोनों पार्क में टहलते हुए पुराने दिनों की बातें करने लगे। वह वही बातें कर रहे थे, जो कभी चुपचाप अपने दिल में महसूस करते रहे थे। अब उनके शब्दों में अनुभव और समझ थी।

    आर्यन ने कहा, “रिया, उस दिन मैं बहुत छोटा और डरपोक था। मैंने अपने डर और जिम्मेदारियों के बीच तुम्हें खो दिया।”

    रिया ने मुस्कुराते हुए कहा, “और मैं भी खुद को दोष देती रही, सोचती रही कि शायद मैं तुम्हारे लिए पर्याप्त नहीं थी।”

    बारिश की बूँदें फिर से गिरने लगीं। रिया ने महसूस किया कि पुराने दर्द में अब कोई कड़वाहट नहीं थी, सिर्फ स्मृतियों की मिठास थी।

    लेकिन इस बार भी कहानी पूरी नहीं हो रही थी। जीवन की जटिलताओं और जिम्मेदारियों ने उन्हें अलग करने का फैसला किया। आर्यन को विदेश लौटना था, और रिया अपने शहर में नई प्रोजेक्ट्स में व्यस्त थी।

    लेकिन इस बार, अलगाव में भी आशा थी। उन्होंने एक-दूसरे को गले लगाया, और इस बार बिना किसी खामोशी के, अपने दिल की भावनाओं को साझा किया। आर्यन ने कहा, “हमारे बीच की दूरी अब फिर से मायने नहीं रखती। जब भी तुम्हारी याद आएगी, मैं तुम्हारे पास महसूस करूंगा।”

    रिया ने हँसते हुए जवाब दिया, “और मैं जानती हूँ कि अब अधूरी दास्तान भी अपने तरीके से पूरी हो रही है। हमारी यादें, हमारी बातें, हमारे सपने—ये सब अब हमारे दिलों में हमेशा के लिए रहेंगे।”

    समारोह खत्म हुआ। रिया अपने अपार्टमेंट की बालकनी में खड़ी थी। बारिश धीमी हो गई थी। उसने अपने दिल में तय किया कि अधूरी दास्तान में भी खूबसूरती हो सकती है। वह अधूरी नहीं रही, क्योंकि उसने इसे अपने अनुभवों और यादों में पूरा कर लिया।

    अगली सुबह, रिया ने अपने फोन में एक संदेश देखा—आर्यन का।

    “रिया, जीवन हमें अलग रास्तों पर ले जा सकता है, लेकिन मेरे दिल में तुम्हारे लिए हमेशा एक जगह है। शायद हम साथ नहीं हैं, लेकिन इस अधूरी दास्तान की मिठास हमेशा हमारे बीच रहेगी। कभी कहीं, कभी किसी रूप में, हम फिर मिलेंगे।”

    रिया ने मुस्कुराते हुए बाहर देखा। सूरज की किरणें अब बरसात की बूँदों पर चमक रही थीं। उसने महसूस किया कि अधूरी दास्तान में भी एक तरह की पूर्णता होती है। कभी-कभी प्रेम का मतलब केवल साथ रहना नहीं, बल्कि अपने दिलों में उसकी याद को संजोना भी होता है।

    वह बालकनी पर खड़ी, बारिश की बची बूँदों को देखते हुए सोच रही थी—शायद जीवन की हर अधूरी कहानी में भी उम्मीद और सुंदरता छिपी होती है। और इस अधूरी दास्तान ने उसे यही सिखाया कि कभी-कभी अधूरापन ही प्रेम की सबसे बड़ी ताकत बन जाता है।

    रिया ने धीरे से कहा, “शायद हमारी दास्तान अधूरी है, लेकिन यही अधूरापन इसे सबसे खास बनाता है।”

    और इस तरह, अधूरी दास्तान ने अपने अंतिम पन्ने पर एक नया अध्याय छोड़ दिया—एक अध्याय जो पूरी तरह प्रेम, यादों, और उम्मीद से भरा था।

  • भाग – 1 इश्क का पैगाम

    भाग – 1 इश्क का पैगाम

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

     

     

     

     

     

    • भाग – 1 इश्क का पैगाम

    सकरी की माटी और रूह की पहली प्यास

     

    बिहार राज्य के पूर्णिया जिला के सकरी गाँव की सरहद पर जब शाम उतरती है, तो ऐसा लगता है मानो किसी नवयौवना ने अपनी सिंदूरी साड़ी का पल्लू पूरे आकाश पर फैला दिया हो। वह धूल भरी पगडंडी, जिसके दोनों ओर बाँस के झुरमुट हवा में धीरे-धीरे सरसराते थे, जैसे कोई पुराना आशिक अपनी प्रेमिका के कान में कोई गुप्त मंत्र फूँक रहा हो। इसी पगडंडी पर धूल उड़ाती हुई जब ईशान की काली जीप रुकी, तो पूरे गाँव के सन्नाटे में एक अजीब सी हलचल मच गई।

     

    ईशान, जिसके चेहरे पर दिल्ली की भागदौड़ और ‘ब्रेकअप्स’ की थकान साफ़ झलक रही थी, जीप से नीचे उतरा। उसने चश्मा हटाया और एक लम्बी साँस ली। हवा में नीम के पत्तों की कड़वाहट और जलते हुए उपलों की वह सोंधी महक थी, जिसे बहुत से लेखक ने अपनी कहानियों में अमर कर दिया था। ईशान के लिए यह केवल एक ‘लोकेशन’ नहीं थी; यह एक ऐसी दुनिया थी जहाँ प्रेम आज भी अपनी आदिम शुद्धता में जीवित था।

    “यही है सकरी…” ईशान बुदबुदाया। उसके हाथ में कैमरा था, लेकिन मन में एक ऐसी बेचैनी थी जिसे वह खुद समझ नहीं पा रहा था। वह यहाँ एक डॉक्यूमेंट्री शूट करने आया था, लेकिन उसके भीतर का आधुनिक युवा, जो केवल ‘शॉर्ट-टर्म’ रिश्तों और ‘कैजुअल डेटिंग’ का आदी था, यहाँ की शांति से डर रहा था। उसे क्या पता था कि सकरी की यह शांति किसी बड़े तूफान के आने की आहट है।

    गाँव के बीचों-बीच एक पुराना पोखर था, जिसे लोग ‘हंसिया पोखर’ कहते थे। शाम का वक्त था। गाँव की औरतें और लड़कियाँ अपने घड़ों में पानी भरने वहीं जुटती थीं। ईशान टहलता हुआ उधर ही निकल गया। वहीं उसकी मुलाकात मंजरी से हुई।

    मंजरी… वह कोई मामूली लड़की नहीं थी। वह सकरी की धूप और बारिश से बनी एक ऐसी मूरत थी, जिसे देखकर पत्थर भी पिघल जाए। उसने हलके नीले रंग की सूती साड़ी पहनी थी, जिसका पल्लू उसके कंधे से ढलक कर उसकी सुडौल कमर पर आ टिका था। जब वह पानी भरने के लिए पोखर की सीढ़ियों पर झुकी, तो उसकी साड़ी का एक हिस्सा भीग गया। वह भीगा हुआ कपड़ा उसके जिस्म से इस तरह चिपक गया था, मानो साड़ी ने उसके शरीर की हर वक्रता (curve) को चूमने की कसम खा ली हो।

    ईशान का कैमरा हाथ में ही रह गया। उसने कई बार फैशन शोज़ में अधनंगी मॉडल को देखा था, लेकिन मंजरी के उस भीगे हुए रूप में जो ‘शुद्ध कामुकता’ थी, उसने ईशान के पैरों तले की ज़मीन खिसका दी। वह आकर्षण केवल शारीरिक नहीं था; वह रूह की एक ऐसी पुकार थी जिसे ईशान ने पहले कभी महसूस नहीं किया था। मंजरी के गोरे और सुडौल बदन पर पानी की छोटी-छोटी बूंदें सूरज की आखिरी किरणों में ऐसे चमक रही थीं, जैसे किसी कलाकार ने सोने की राख बिखेर दी हो।

    मंजरी ने जैसे ही आहट पाकर पीछे मुड़कर देखा, उसकी आँखें ईशान की आँखों से टकराईं। वह क्षण जैसे अनंत काल के लिए थम गया। मंजरी की आँखों में वह ग्रामीण लज्जा तो थी, लेकिन साथ ही एक ऐसी आग भी थी जो सीधे कलेजे को चीर कर पार निकल जाए। प्रेम की भाषा में कहें तो, “मंजरी की चितवन में वह जादू था, जो सावन की पहली फुहार में मिट्टी से उठने वाली उस महक में होता है, जो मन को पागल कर देती है।

    उसने अपनी पायल की छन-छन के साथ एक कदम पीछे हटाया। उसके भीगे बदन की सिहरन दूर खड़े ईशान तक पहुँच रही थी। ईशान के भीतर का आधुनिक पुरुष, जो हमेशा शब्दों और तर्कों से खेलता था, आज गूंगा हो गया था। उसे अपनी रगों में खून की गति तेज होती महसूस हुई। वह मंजरी के करीब जाना चाहता था, उसे छूना चाहता था, यह देखना चाहता था कि क्या यह हाड़-मांस की बनी कोई इंसान है या सिर्फ उसका कोई सपना।

    “कौन हैं आप?” मंजरी की आवाज़ में कोई डर नहीं था, बल्कि एक अजीब सा अधिकार था। उसकी आवाज़ ऐसी थी जैसे पुरानी बांसुरी से कोई विरह का राग निकल रहा हो।

    ईशान ने खुद को संभाला। “मैं… मैं शहर से आया हूँ। कुछ तस्वीरें खींचने।”

    मंजरी हल्का सा मुस्कुराई। उस मुस्कुराहट ने उसके चेहरे पर वह नूर बिखेरा कि ईशान को लगा जैसे पूरी कायनात सिमट कर वहीं आ गई हो। “तस्वीरें? हमारी क्या तस्वीरें खींचिएगा बाबू? यहाँ तो सब कुछ पुराना है, धूल भरा है।”

    “नहीं…” ईशान ने आगे बढ़कर कहा, उसकी आवाज़ में एक गहरी हूक थी, “यहाँ वो है, जो मेरी दुनिया में खो चुका है। यहाँ ‘इश्क’ अपनी असली शक्ल में है।”

    मंजरी ने अपनी नज़रें झुका लीं। उसके गालों पर गुलाबी रंग उभर आया, जो शायद उस शाम की लाली से भी ज्यादा गहरा था। वह अपनी गागर उठाकर जाने लगी, लेकिन उसका भीगा आँचल रास्ते में पड़ी एक झाड़ी में फँस गया। जैसे ही उसने उसे छुड़ाने के लिए ज़ोर लगाया, साड़ी का वह भीगा हिस्सा और भी तन गया, जिससे उसके शरीर की बनावट ईशान के सामने पूरी तरह स्पष्ट हो गई। ईशान का गला सूखने लगा। आज की ‘फास्ट लाइफ’ में जहाँ सेक्स सिर्फ एक ज़रूरत थी, यहाँ उसे महसूस हुआ कि एक स्पर्श की प्यास क्या होती है।

    मंजरी ने शरमाते हुए आँचल छुड़ाया और एक बार पीछे मुड़कर ईशान को देखा। उस एक नज़र में हज़ारों पैगाम थे, आमंत्रण भी, डर भी और एक अनकही चाहत भी।

    उस रात, सकरी के डाक-बंगले में लेटे हुए ईशान को नींद नहीं आई। बाहर झींगुरों का शोर था और दूर कहीं कोई बिरहा गा रहा था। उसे बार-बार मंजरी का वह भीगा बदन, उसकी सुराहीदार गर्दन पर थमी पानी की वो बूंद और उसकी आँखों की वो आग याद आ रही थी। उसने महसूस किया कि उसका शहरी दिल, जो अब तक केवल ‘डेटिंग ऐप्स’ के छोटे-छोटे पैगामों में खुशी ढूँढता था, अब एक बड़ी आग में जलने को तैयार है।

    सकरी की वह रात गवाह थी कि एक आधुनिक प्रेमी और एक ग्रामीण प्रेमिका के बीच की वह दीवार अब टूटने वाली थी। यह केवल एक प्रेम कहानी की शुरुआत नहीं थी; यह दो अलग-अलग दुनियाओं के टकराने और एक होने की दास्तान थी, जहाँ जिस्म की प्यास और रूह की तलाश एक दूसरे में मिलने वाली थी।

    जारी…..

     

    मेरे प्यारे पाठकों, “इश्क का पैगाम” का यह पहला भाग आपको कैसा लगा? क्या सकरी गाँव की माटी की महक और मंजरी की वो पहली सिहरन आपके दिल तक पहुँची?

    पढ़ने के लिए आप सभी का तहे दिल से शुक्रिया! ❤️

    यह एक लम्बी और रोमांचक यात्रा है। आपकी हर एक टिप्पणी (Comment) और प्रतिक्रिया मुझे आगे लिखने की ऊर्जा देगी। कृपया  अपने विचार जरूर लिखें और कहानी पसंद आये, तो उपहार स्वरूप स्टीकर भेजकर प्रोत्साहित करें।

    सधन्यवाद 

     

     

  • फाइटर बेटियां

    फाइटर बेटियां

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    चलो ठिक है तो हम दोनो जा रहे हैं ! तुम बैठो क्लास रूम मे…राधा बोली और जाने लगी….रूको राधा तुम ऐसे नहीं जा सकती मेरे सवाल का जबाव दिए बगैर…कमल को गुस्सा आने लगा था !

    ” मैं क्या जबाव दूं ..कौनसी बात का जबाव दूं, हां “

    राधा डांटते हुए कमल से बोली थी। बिना रूके फीर बोली…

    ” देखो, मैं ना तो तुम्हें चाहती हूं। ना हीं मेरे मन मे तुम्हारे लिए कुछ है। ना था ना है ना रहेगा “

    राधा अपने तरफ से बात साफ करते हुए बोली थी।

    ” तुम्हें समझ में नही आता क्या कुछ भी?,जब दीदी मना कर रही है, तो तुम क्यो पागलों जैसी हरकत कर रहे हो।”

    रूपा कमल को समझाने की कोशिश की थी।

    ” देखो तुम्हें जो समझना है समझो, पर आज मैं तुम्हे पाकर रहूंगा राधा “

     अपनी उंगलियों से चुटकियां बजाते हुए कमल, अपना डिसीजन क्लियर कर दिया था ।

    ” तुम बहुत गलत कर रहे हो कमल, तुम्हें पता भी है, कि तुम क्या कह रहे हो। जिस बात का कोई मतलब हीं नही है।”

    राधा कमल को, समझा बुझा कर उससे अपना पिछा छुड़वाना चाह रही थी । 

    ” क्या तुम्हे मुझसे प्यार नहीं है? “

    कमल राधा के आंखों से आंख मिलाकर बोला था।

    ” बिल्कुल नहीं “

    राधा कमल को जबाव देते हुए बोली थी।

    ” जब दीदी बोल दी है नही, तो अब तुम्हारा यहां रूकने का कोई मतलब हीं नही बनता है। अब तुम जा सकते हो,जाओ जल्दी यहां से “

    रूपा कमल को गुस्से से देखते डांट कर जोर से हुए बोली थी।

     

    क्लास बिल्डिंग रास्ता 

     

    इधर चांदनी रूपा के नम्बर पर कॉल लगा रही थी। रिंग बजकर कॉल रिसीव नहीं हुआ तो, दुबारा से नम्बर डायल कर दी थी। इस बार भी कॉल रिसीव नहीं हुआ तो, हैरानी से शीला के तरफ देखी।

    ” ये भी कॉल नही उठा रही है । “

     चांदनी शीला से बोली।

    ” चलो चलकर देखते हैं।अब वहीं जाकर पता चलेगा, की आखिर बात क्या है। “

    शीला चांदनी से बोली और आगे चलने लगी थी।

    ” ठीक चलो वही चलते हैं। “

    बोलते हुए चांदनी भी चल पड़ी थी। आज पहली बार हुआ था की राधा और रूपा इन दोनो के कॉल रिसीव नही की थी ।इससे पहले जब भी ये दोनो, राधा या रूपा को कॉल करती थी।तो कॉल रिसीव होते हीं उनके चहकती हुई खनखनाती हुई आवाजों से इनका स्वागत होता था। पड़ ना जाने आज क्या हो गया था ,की कॉल रिसीव हीं नही हो रही थी। यही सोचते हुए दोनो आगे बढ़ रही थी।

     

    क्लास रूम 

     

    ” रूपा जुवान सम्भल कर बात करो, तुम्हें बीच में बोलने के लिए किसने बोला है। अगर तुमको जाना है, तो तुम जा सकती हो।राधा कहीं नहीं जा रही है। मैं बोल दिया तो बोल दिया। “

    कमल रूपा को आंख दिखाते हुए बोला था ।

    ” अबे मजनू के औलाद, तुम्हे बात कुछ समझ में आता है की नहीं। बहुत बात से  समझा लिया तुमको, अब शायद  तुम लात खाके हीं मानोगे। “

    रूपा कमल पर चिल्ला कर गुस्से से चीखते हुए बोली थी।

    ” कमल तुम जाओ यहां से,मैं तुम्हे बार बार बोल रही हूं। मुझे छोड़ दो, मेरे मन में तुम्हारे लिए कुछ भी नहीं है। तुम क्या, किसी भी लड़के के लिए मेरे दिल में कुछ भी नहीं है। समझो बात को, और जाओ यहां से। “

    राधा बोली,राधा बोल रही थी। इतने में कमल राधा का हांथ पकड़ लेता है। राधा झटक कर कमल से अपना हांथ छुड़ा लेती है। कमल जितना भी राधा के पास आना चाह रहा था। राधा कमल से उतनी हीं दुर जा रही थी। यह देखकर कमल का सब्र का बांध टुटता जा रहा था। कहते हैं, लोग प्यार में पागल हो जाता है। और जब प्यार एक तरफा हो तो पागल पंती और भी ज्यादा बढ़ जाती है। यही सब कमल के साथ अभी हो रहा था। कमल को गुस्सा इस बात से नहीं था। की राधा ने उसे रिजेक्ट किया था। बल्की गुस्सा इस बात से था।की वो ऐसा कर कैसे सकती है। मैं हेंडसम हूं। पढा लिखा हूं। पैसा प्रोपर्टी है हमारे पास, फीर भी मुझे ये रिजेक्ट कर रही है। यही कारण है। की प्यार रिस्पेक्ट आदर से शुरूआत हुई बात अब जोर जबर्दस्ती नीच पंती तक पहुंच गयी थी। 

    ” समझा समझा कर थक गयी हूं तुम्हे, पर तुम हो की समझने का नाम हीं नहीं ले रहे हो। “

    राधा बोली और अपनी आंख लाल करते हुए कमल को देखी।

    ” मुझे कुछ नहीं समझना है। अब जो भी समझना है। सिर्फ और सिर्फ तुन्हें समझना है। बोलकर कमल राधा के गाल को हांथ लगाना चाहता है। पर इससे पहले की कमल का हांथ राधा के गाल को टच करता उससे पहले हीं कमल के गाल पर एक जोरदार थप्पड़ पड़ा थप्पड़ के साउंड इतना तेज था। की पूरा क्लास रूम गन गना गया था। थप्पड़ खा कर जब कमल पिछे मुरा तो देखा, रूपा अपनी कमर पर हांथ रखी हुई कमल के तरफ देख रही थी। 

    ” तुम, तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझे थप्पड़ मारने की “

    कमल रूपा को गुस्से से देखते हुए बोला था। अभी भी कमल का हांथ उसके गाल पर हीं था।

    ” वैसे हीं, जैसे तुम्हारा हिम्मत हुआ।  मेरी दीदी के साथ बदसलूकी करने का “

    बोलकर रूपा कमल को घुरने लगी थी।

    ” महंगा पड़ेगा, तुम लोगों को ये थप्पड़ । समझी तुम.”

    कमल रूपा पर गुर्राया।

    ” क्या महंगा पड़ेगा बे “

    बोलकर रूपा  तेजी से झपट कर कमल के कमर पर एक लात मारी कमल अपने आप को सम्भाल पाता इससे पहले रूपा ताबड़तोड़ मुक्का बरसाने लगी। अब जब कमल को मार पर हीं गया था। तो वो भी कहां पिछे रहने वाला था। उसने रूपा के गाल पर जोरदार तमाचा मारा रूपा हिल गयी थी।  पर वो रूकी नही अब पहले से और भी ताकत के साथ कमल पर अटैक करी थी।

    ” ले मजनू की औलाद, ये ले, और ले “

    रूपा लगातार कमल के पेट में पंच कर रही थी। 

    ” रूपा तुम ज्यादा उड़ रही हो तुम,  पड़ कुचलना पड़ेगा तुम्हारी। समझी रूपा की बच्ची। “

    कमल दांत पीस कर रूपा के तरफ देखते हुए बोला था।

    ” पड़ कुचलेगा हराम खोर, तेरी तो मैं जान निकाल दूंगी। मेरी दीदी को परेशान करता है। अब तो तुझे उपर वाला भी नही बचा सकता है। ले, ये ले लात खा कमीने। सुधर तो तुम सकते नहीं, तो मर जायेगा ऐसे हीं।  तुम्हारे खानदान में सारे कमीने ही होंगे इस लिए तुम ऐसी नीच वाला हरकत करता है। “

    बोलते हुए रूपा कमल को बेसुध पिटाई कर रही थी।मार खाते हुए कमल कराह रहा था। राधा जो ये सब देख रही थी। रूपा को रोकना चाह रही थी। पर कमल के हरकत से उसे भी बहुत दु:ख पहुंचा था।चाहकर भी वो रूपा को नही रोक पायी वो भी कमल के ठीक सामने आकर खरी हो गयी थी।

    ”  चला भी जा अब, जा,क्यों पिटाई खा रहा है। “

    राधा कमल को रूपा के हाथों पिटते हुए कमल पर दया दिखाते हुए गंभीर स्वर में बोली थी।

    क्या कमल पिटाई खा कर चला गया?या उसने कोई चाल चली। क्या रूपा कमल के चंगुल से राधा को बचा पाई?या रूपा भी फंस गई। क्या शीला और चांदनी राधा और रूपा के पास पहूंच पाई ? क्या होगा राधा और रूपा के साथ? क्या होगा कमल का अगली चाल इन्हीं सभी सवालों के जवाब जानने के लिए बने रहिए इस कहानी के साथ। आगे की कहानी पढ़िए अगले भाग में…..।

  • तुम और मैं- एक प्रेम कहानी ❤️

    तुम और मैं- एक प्रेम कहानी ❤️

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

    बारिश की हल्की-हल्की बूंदें खिड़की के शीशे पर गिर रही थीं। हवा में एक अजीब सी ठंडक थी, जो दिल के अंदर तक उतर रही थी। आरव अपनी कॉफी के कप को थामे खिड़की के पास खड़ा था, जैसे किसी का इंतज़ार कर रहा हो। शायद किसी ऐसे इंसान का, जो उसकी जिंदगी में कभी था… और अब नहीं था।

    उसकी नजरें बाहर सड़क पर टिकी थीं, लेकिन उसका मन अतीत की गलियों में भटक रहा था।

    “तुम और मैं… क्या सच में बस एक कहानी बनकर रह गए?” उसने खुद से धीमे से कहा।

     

    तीन साल पहले…

    कॉलेज का पहला दिन था। भीड़, शोर, नए चेहरे—सब कुछ नया और थोड़ा डराने वाला भी। आरव हमेशा की तरह चुप रहने वाला लड़का था। उसे भीड़ में रहना पसंद नहीं था।

    तभी अचानक किसी से टकरा गया।

    “ओह सॉरी!” एक मीठी सी आवाज आई।

    आरव ने नजर उठाई—सामने एक लड़की थी, बड़ी-बड़ी आँखें, चेहरे पर हल्की मुस्कान, और बाल हवा में लहराते हुए।

    “कोई बात नहीं,” उसने धीमे से कहा।

    “मैं नंदिनी हूँ,” उसने मुस्कुराते हुए हाथ बढ़ाया।

    आरव ने थोड़ा हिचकिचाते हुए हाथ मिलाया—“आरव।”

    उस दिन बस इतना ही हुआ। लेकिन शायद वही एक पल था, जब उनकी कहानी शुरू हो चुकी थी।

     

    दिन बीतते गए, और नंदिनी धीरे-धीरे आरव की जिंदगी का हिस्सा बन गई। वह उसकी खामोशी को समझती थी, और उसकी हर छोटी-बड़ी बात पर ध्यान देती थी।

    “तुम इतना चुप क्यों रहते हो?” एक दिन नंदिनी ने पूछा।

    “पता नहीं… आदत है,” आरव ने जवाब दिया।

    “तो बदलो आदत। मैं हूँ ना, बातें करने के लिए,” उसने हंसते हुए कहा।

    और सच में, नंदिनी के साथ रहते-रहते आरव बदलने लगा। अब वह मुस्कुराता था, हंसता था, और कभी-कभी बेवजह बातें भी करता था।

    दोनों साथ में कैंटीन जाते, लाइब्रेरी में घंटों बैठते, और कभी-कभी बिना किसी वजह के बस कॉलेज के गार्डन में घूमते रहते।

    एक दिन बारिश हो रही थी—ठीक वैसे ही जैसे आज।

    “चलो भीगते हैं!” नंदिनी ने उत्साह से कहा।

    “पागल हो क्या? बीमार हो जाओगी,” आरव ने कहा।

    “तुम साथ हो ना, कुछ नहीं होगा,” उसने उसका हाथ पकड़ लिया।

    और उस दिन पहली बार आरव ने खुद को पूरी तरह खुला हुआ महसूस किया। बारिश की बूंदें, नंदिनी की हंसी, और दिल में एक अनकहा सा एहसास…

    शायद यही प्यार था।

     

    एक शाम, कॉलेज के गार्डन में बैठकर आरव बहुत देर तक कुछ सोचता रहा।

    “क्या हुआ?” नंदिनी ने पूछा।

    “कुछ कहना है…” उसने धीरे से कहा।

    “तो कहो ना,” उसने मुस्कुराते हुए कहा।

    आरव ने गहरी सांस ली—“नंदिनी… मुझे लगता है मैं तुमसे… प्यार करने लगा हूँ।”

    कुछ पल के लिए खामोशी छा गई।

    नंदिनी ने उसे देखा… और फिर हल्के से मुस्कुरा दी।

    “मुझे लगा तुम कभी नहीं कहोगे,” उसने कहा।

    “मतलब?” आरव ने हैरानी से पूछा।

    “मतलब… मैं भी तुमसे प्यार करती हूँ,” उसने धीरे से कहा।

    उस दिन, उनकी कहानी ने एक नया मोड़ लिया—दोस्ती से प्यार तक का सफर पूरा हो चुका था।

     

    अब हर दिन खास होता था। छोटी-छोटी बातें भी बड़ी खुशियाँ बन जाती थीं।

    “जब तुम साथ होती हो ना, सब आसान लगने लगता है,” आरव ने एक दिन कहा।

    “और जब तुम साथ होते हो, दुनिया अच्छी लगने लगती है,” नंदिनी ने जवाब दिया।

    दोनों ने साथ में सपने देखे—एक साथ जिंदगी बिताने के, हर मुश्किल को साथ पार करने के।

    लेकिन जिंदगी हमेशा वैसी नहीं होती, जैसी हम सोचते हैं।

    दूरी

    कॉलेज खत्म होने वाला था।

    एक दिन नंदिनी बहुत चुप थी।

    “क्या हुआ?” आरव ने पूछा।

    “मुझे एक जॉब ऑफर मिला है… दूसरे शहर में,” उसने धीमे से कहा।

    आरव कुछ पल के लिए चुप रह गया।

    “तो जाओ ना… ये तो अच्छी बात है,” उसने जबरदस्ती मुस्कुराते हुए कहा।

    “और तुम?” नंदिनी की आंखों में सवाल था।

    “मैं यहीं रहूंगा… मेरी फैमिली…” आरव ने जवाब दिया।

    दोनों जानते थे—ये फैसला आसान नहीं था।

    टूटन

    दिन बीतते गए, और दूरी बढ़ती गई। फोन कॉल्स कम हो गए, मैसेजेस में वो गर्माहट नहीं रही।

    एक दिन नंदिनी ने कहा—“शायद हमें थोड़ा स्पेस चाहिए…”

    आरव ने कुछ नहीं कहा।

    वो समझ गया था—ये ‘स्पेस’ असल में ‘दूरी’ बन चुका था।

    धीरे-धीरे बात करना बंद हो गया।

    और एक दिन, सब खत्म हो गया।

     

    तीन साल बाद…

    आरव अभी भी उसी शहर में था, उसी खिड़की के पास खड़ा।

    तभी दरवाजे की घंटी बजी।

    उसने दरवाजा खोला…

    सामने नंदिनी खड़ी थी।

    वही मुस्कान, वही आंखें… लेकिन अब उनमें एक अलग सी गहराई थी।

    “हाय,” उसने धीरे से कहा।

    “नंदिनी… तुम?” आरव हैरान था।

    “अंदर आ सकती हूँ?” उसने पूछा।

    फिर से

    दोनों चुपचाप बैठे रहे कुछ देर तक।

    “कैसे हो?” नंदिनी ने पूछा।

    “ठीक हूँ… तुम?” आरव ने जवाब दिया।

    “ठीक नहीं थी… इसलिए वापस आ गई,” उसने कहा।

    आरव ने उसकी तरफ देखा—“क्यों?”

    नंदिनी की आंखों में आंसू थे—“क्योंकि मैंने समझ लिया… कि जिंदगी में सब कुछ मिल सकता है, लेकिन सच्चा प्यार नहीं।”

    “और तुम?” उसने पूछा।

    आरव ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—“मैंने कभी तुम्हें भुलाया ही नहीं।”

    नई शुरुआत

    बारिश फिर से शुरू हो गई थी।

    नंदिनी खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गई—“याद है? हम पहली बार ऐसे ही भीगे थे।”

    “हाँ… और तुमने कहा था—‘तुम साथ हो ना, कुछ नहीं होगा’,” आरव ने मुस्कुराते हुए कहा।

    नंदिनी ने उसकी तरफ देखा—“अब भी कह सकती हूँ?”

    आरव उसके पास आया, उसका हाथ थाम लिया—“अब तो हमेशा साथ रहूंगा।”

    दोनों खिड़की के पास खड़े होकर बारिश को देखते रहे।

    इस बार, कोई डर नहीं था। कोई दूरी नहीं थी।

    बस दो लोग थे—जो कभी एक-दूसरे से बिछड़ गए थे, लेकिन फिर से मिल गए।

     

    “तुम और मैं…” नंदिनी ने कहा।

    “एक कहानी नहीं… एक जिंदगी,” आरव ने उसकी बात पूरी की।

    बारिश की बूंदें अब भी गिर रही थीं, लेकिन इस बार वो ठंडक नहीं, बल्कि एक नई गर्माहट लेकर आई थीं।

    शायद कुछ कहानियां खत्म नहीं होतीं…

    वो बस थोड़ा रुकती हैं, ताकि फिर से शुरू हो सकें।

    और ये कहानी भी… अब शुरू हुई थी। ❤️

  • कुछ तो है

    कुछ तो है

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    राधा और रूपा का इंतजार  करते करते  शीला और चांदनी को बहुत देर हो जाती है तो परेशान होकर दोनो सहेली क्लास के रूम के तरफ भागती है….शीला के क्लास वाले बिल्डिंग से मीटिंग हॉल बीच में चार बिल्डिंग छोड़कर थी ! दोनो तेजी से दौर कर अपने क्लास रूम पहुंच जाना चाहती थी।

    ” क्या हुआ नही हुआ एक बार फोन करके भी बता देती..”

    शीला बोली बोलते हुए शीला हांफ भी रही थी। तेजी से दौड़ने से शीला के सांस  चढ़ गई थी। यही हाल चांदनी की भी थी।

    ” हां उसे कॉल कर लेना चाहिए.”

    चांदनी बोली और अपना मोबाईल अपने जेब से निकालने लगी….

    ” मैं ही कर लेती हूं कॉल रूको शीला ऐसे में तुम बीमार पर जाओगी……चांदनी बोली और रूक गई…

    “.मेरी छोड़ो पहले उसको फोन लगाओ जल्दी”

    शीला बोलकर वो भी रूक जाती है ! चलते चलते दोनो तीन बिल्डिंग क्रोस कर गई थी ! अब दोनो की चिंता और भी ज्यादा बढ़ गई थी ! “ना जाने क्या हुआ है उन दोनो के साथ क्लास में कोई स्टूडेंटस भी नहीं थे “

     चांदनी बोलकर नम्बर डायल कर दी थी ! रिंग होने लगी थी अब दोनो कॉल रिसीव होने का इंतजार करने लगी थी। फुल रींग होने के बाद भी कॉल रिसीव नहीं होती है ! 

    “नही उठाई”

    शीला चांदनी को मायूसी से देखी और बोली..

    ” नही”

    चांदनी बोली।

    ” रूपा के नम्बर पे लगाओ कॉल “

    शीला बोली शीला का दिल बैठा जा रहा था ! सेम कंडिशन से चांदनी भी गुजर रही थी।

    ” हां हां लगाती हूं “

     चांदनी बोली और स्क्रोल डाउन करने लगी चांदनी और शीला के चेहरा साफ उतर गया था ! ऐसा लग रहा था अब रो देगी दोनो ! फोन लगाकर अपने कान मे सटा लेती है ! चांदनी और शीला एक दूसरे को देख रही है। और मन हीं मन दोनो सोच रही थी की

     कुछ तो है..

     

    क्लास रूम

     

    ” देखो कमल मुझे जाने दो तुम्हारी ये हरकत मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं है ! दीदी वेट कर कर के परेशान हो गई होंगी….राधा बोली और कमल के हांथ से अपना हांथ को झटक कर झटका मार कर छुड़ाना चाहा पर पकड़ इतनी मजबूत थी की छुड़ा नहीं पाई…

    ” अरे मेरी जान, तुम्हें छोड़ने के लिए थोड़े हीं ना पकड़ा हूं ! बहुत दिन से तुम्हे पकड़ना चाह रहा था पर तुम तो हांथ हीं नही लगती थी आज जब मौका मिला है तो तुम नखरा हीं ज्यादा करने लगी है ” कमल बोलता है…..

    ” कुत्ते हरामजादे छोड़ मेरी बहन को छोड़ कमीने छोड़..”

    रूपा बहुत गुस्से मे कमल से बोलती है.।

    ” तुम क्यों फड़ फड़ा रही है तुम्हें मैं कुछ नहीं करूंगा तुम बस शान्ती से तमाशा देखती जा “

    कमल रूपा को डांटते हुए बोला था।

    ” कमीने करेगा तो तब जब तू कुछ करने के लायक बचेगा, तब ना ..हमें बांधकर हिरो बन रहा है।अगर इतना हीं पावर है तुझमें तो खोल के दिखा मुझे फीर मैं बताती हूं की तू कहां का हिरो है ” बोलकर रूपा कमल को ललकारी ! बंधी तो राधा भी थी ! लेकिन राधा का एक हांथ कमल खोल रखा था ! जीसे पकड़ कर राधा को कमल बार बार अपने से चिपकाने की कोशिश करता रहता था ! 

    ” देख राधा आज तुम्हें मुझसे कोई नहीं बचा सकता है ! चाहे तुम जितनी भी कोशिश कर लो “

    कमल घमंड में चुर होकर राधा से बोला था ! 

    ” तुम बिल्कुल भी ठीक नहीं कर रहे हो कमल, मैने क्या बिगाड़ा है तुम्हारा जो तुम मेरे साथ ये सब कर रहे हो। देखो खोल दो हम दोनो को और जाने दो हमें,कहीं ऐसा ना हो की तुम्हें बाद में चलकर पछताना पड़े”

    राधा कमल को समझाते हुए बोली थी।

    ” नहीं मैं तुम्हें आज ऐसे कभी नहीं जाने दुंगा,आज तुम्हे मेरी होनी पड़ेगी “

    कमल राधा को गुस्से से देखते हुए बोला था। 

    ” तेरी इतनी मजाल की तू दीदी से इस तरह बात करेगा “

    रूपा बात आगे बढाते हुए फिर बोली…

    ” अपनी शक्ल देखा है कभी आईने में बड़ा आया है मेरी दीदी का लवर बनने वाला “

    बोलकर रूपा अपने बदन को गुस्से में कस मसाने लगती है ! 

    ” देख कमल मैं तेरी शिकायत प्रिंसीपल मैम से करूंगी अगर मेरी बात नहीं माना तो”

    राधा कमल को समझाने कि कोशिश की

    ” हरामजादी अभी तक तेरी गर्मी शांत नही हुआ है ! बहुत उछल रही है ना रूक अब मैं तुम्हें ऐसे नहीं छोड़ूंगा अब तेरा रेप होगा “

    कमल दांत पीसकर गुस्से से आंख लाल करते हुए बोला था ! रेप का नाम सुनकर राधा और रूपा दोनो बहुत घबरा गई थी !

    दोनो मन हीं मन सोच रही थी की कहां फस गई मैं  वे दोनो फोन भी नहीं कर सकती थी की शीला और चांदनी उन दोनो को मदद कर सके इन दोनो के फोन कमल छीन कर साइलेंट मोड में डालकर अलग रख दिया था ! कमल का नजर काफी समय से राधा पर था ! वो राधा को चाह रहा था ये बात अलग है की कभी भी कमल राधा को सामने से प्रपोज नहीं किया था ! राधा भी कभी इस बात को नोटिस नही किया था ! वैसे भी राधा प्यार मोहब्बत के लफड़े से दूर हीं रहना चाहती थी ! बस उसका मकसद था की पढाई लिखाई कर के अपना फ्यूचर बनाना उसको इन सब से कोई भी मतलब नहीं था। कमल भी अपने दिल में राधा को बसाये एक तरफा मोहब्बत लिए घुम रहा था। वो राधा को बताने वाला था की वो उससे प्यार करता है ! कई बार बात करने की कोशिश किया भी पर नहीं कर पाया था। क्यों की राधा कभी अकेली रहती हीं नहीं थी। चारो सहेलियां हमेशा साथ रहती थी कॉलेज में ! इसी लिए कमल को मौका नहीं मिल पाता था ! आज मीला भी तो सिच्यूशन हीं कुछ अलग बन गई थी। अब आप कहेंगे की ये क्लास रूम में कैसे पहुंचा तो बता दें दर असल कमल राधा और रूपा को मैन गेट से हीं पिछा कर रहा था ! जब देखा वो दोनो क्लास रूम में गई है तो पिछे पिछे कमल भी क्लास रूम में चला गया था। जब राधा और रूपा ने देखा तो 

    ” तुम,तुम यहां क्या कर रहे हो कमल?”

    .राधा कमल को उंगली से प्वाइंट  करते हुए बोली थी 

    ” मैं, मैं यहां तुमसे मिलने आया था।”

     कमल बोला और दोनो के पास आकर बैंच पर बैठ गया था ! 

    ” तुम जाओ यहां से हम लोग भीं जा रहें हैं मीटिंग हॉल में “

    रूपा कमल से बोली और उठने लगी…

    ” ठिक है तुम जाओ, हमे राधा से अकेले में कुछ बात करना है।”

    कमल रूपा से बोला था।

    क ,क क्या क्या, बात करना है तुमको मुझसे?”

     राधा हकलाते हुए आशचर्य से कमल को देख कर बोली थी।

    ” राधा रूको ना थोड़ी देर बात कर लो फीर चली जाना “

     कमल राधा से बोला और मुस्कुराने लगा…

    ” नही मुझे नही करनी है तुमसे कोई भी बात तुम चले जाओ यहां से  “

    .राधा कमल पर चिल्लाते हुए बोली थी।

    ” हां तुम जाओ यहां से मैं बोल देती हूं नहीं तो अच्छा नहीं होगा “

    रूपा गरज कर बोली..

    ” तुम लोग बेकार में ऐसी बातें कर रही हो “

    कमल शांत होते हुए बोला था !

    ”  मैं कहती हूं ना तुम जाओ यहां से तो जाओ मुझे परेशान मत करो “

    राधा बोली और उठकर जाने लगी…

    अरे खा म खा तुम लोग हाइपर हो रही हो कुछ भी ऐसी वैसी बात नही है “

    कमल दोनो को देखते हुए बोला था।

    ” चलो ठिक है, तो हम दोनो जा रहे हैं। ठिक है, तुम बैठो क्लास रूम में “

    राधा बोली और उठकर जाने लगी…. आगे की कहानी पढ़िए अगले भाग में ….