मुझको इतना भी ना तरसा बात करने के लिए ,
मै भी इंसान हु कोई पत्थर नहीं ।।।
मुझको इतना भी ना तरसा बात करने के लिए ,
मै भी इंसान हु कोई पत्थर नहीं ।।।
मौत से ठीक, एक दिन पहले तक,,
मैं भी सबके लिए, बुरा ही रहूंगा…✍️

हाँ हम बिहारी हैं जी,
हाँ हम बिहारी हैं जी,
थोड़े संस्कारी हैं जी…
माटी को सोना कर दें,
ऐसी कलाकारी है जी,
हाँ हम बिहारी हैं जी…
मिट्टी पर चित्र बना लेते हैं,
हर हुनर में जान डाल देते हैं,
हाँ हम बिहारी हैं जी…
मिट्टी के बर्तन से पूजा कर लेते हैं,
कम में भी खुश रह लेते हैं,
दिल से रिश्ते निभा लेते हैं,
हाँ हम बिहारी हैं जी…
सादा जीवन, ऊँचे विचार,
यही हमारी पहचान है जी,
दिल से अपनापन देने वाले,
हाँ हम बिहारी हैं जी…
किसी ने पूछा मुझसे
“पसंदीदा औरत कैसी होती है?”
मैंने हँसकर कहा
वो,
जिससे बहस करते-करते भी
आख़िर में दिल उसी की बात मान ले।
जिसकी नाराज़गी
दिन भर जेब में रखे किसी पत्थर जैसी लगे…
हर काम के बीच
चुभती हुई।
और जिसकी हँसी
थके हुए दिन पर
बारिश की पहली बूँद जैसी उतरती हो।
वो,
जिसके होते हुए
घर सिर्फ़ घर नहीं रहता,
एक सुकून बन जाता है।
जिसे दुख दो
तो सबसे पहले
अपनी ही आँखें झुक जाएँ।
जिसकी कुछ बातें
होंठों पर मुस्कान रख जाएँ,
और कुछ ख़ामोशियाँ
रात भर जगाए रखें।
पसंदीदा औरत
सिर्फ़ ख़ूबसूरत नहीं होती…
वो धीरे-धीरे
तुम्हारी आदत बन जाती है।
तुम्हारी रूह में
ऐसे उतरती है
जैसे चाय में घुली शक्कर
दिखती नहीं,
पर हर घूँट में महसूस होती है।
और फिर एक दिन
उसके बिना सब कुछ तो होता है…
मगर ज़िंदगी नहीं होती।
…….. ✍️
किसी ने बहुत खूबसूरत कहीं अपनी बातें… जहाँ भर की गहराई समेटी है सारी जज्बाते…
दुनिया मे आये है तो मुस्कुराना सीख लीजिये दोस्त.
रुलाने के लिए तो अपने रिश्तेदार ही काफ़ी है.. 🥹🥹
माँ की ममता और बलिदान की एक छोटी और भावुक कहानी:
एक बेटा अपनी माँ से बहुत नफरत करता था क्योंकि उसकी माँ की एक आँख नहीं थी। उसे अपनी माँ के ‘अधूरे चेहरे’ से शर्म आती थी। वह बड़ा हुआ, खूब पढ़ा-लिखा और शहर जाकर एक बड़ा आदमी बन गया। उसने शादी कर ली और अपनी माँ को गाँव में ही अकेला छोड़ दिया।
सालों बाद, जब माँ अपने पोते-पोतियों से मिलने शहर पहुँची, तो बेटे ने उन्हें पहचानने से इनकार कर दिया और चिल्लाकर कहा, “तुम यहाँ क्यों आई हो? तुमने मेरे बच्चों को डरा दिया, यहाँ से चली जाओ!”
माँ चुपचाप वापस लौट गई। कुछ महीनों बाद माँ की मृत्यु हो गई। जब बेटा गाँव पहुँचा, तो उसे माँ की एक चिट्ठी मिली, जिसमें लिखा था:
”मेरे प्यारे बेटे, शायद तुम्हें याद नहीं, पर जब तुम बहुत छोटे थे, तब एक एक्सीडेंट में तुम्हारी एक आँख फूट गई थी। एक माँ होने के नाते मैं तुम्हें एक आँख से नहीं देख सकती थी, इसलिए मैंने अपनी एक आँख तुम्हें दे दी। मुझे गर्व है कि तुम मेरी आँख से इस खूबसूरत दुनिया को देख रहे हो।”
बेटा फूट-फूट कर रोने लगा, लेकिन अब माँ वापस आने वाली नहीं थी।
सीख (Moral)
माँ का प्यार निस्वार्थ होता है। हम अक्सर उनकी अहमियत तब समझते हैं जब वो हमसे दूर चली जाती हैं। समय रहते उनके प्यार और बलिदान का सम्मान करें।

पढ़ने का समय : < 1 मिनट
ज़िंदगी एक प्यारी कहानी,
कभी हँसी, कभी हैरानी।
कभी धूप है, कभी बरसात,
कभी मिठास, कभी खट्टी बात।
गिरकर हमें चलना सिखाती,
आगे बढ़ने का हौसला दिलाती।
सपनों को उड़ान यहाँ मिलती,
मेहनत से पहचान यहाँ मिलती।
कभी खेल है, कभी इम्तहान,
कभी सफर, कभी अरमान।
हर दिन नया सबक सिखाती,
आशा की किरण जगाती।
मुस्कान बाँटो, प्यार लुटाओ,
ज़िंदगी को खुशियों से सजाओ।
हर लम्हा जी भरकर जीना,
ज़िंदगी का असली है नगीना।
Lakshmi Kumari

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हमारी बुनी हुई दास्तां
कुछ रिश्ते थे… जिन्हें हमने धीरे-धीरे बुना है।
कुछ ख्वाहिशें थीं… जिन्हें दिल में सहेजकर रखा।
कुछ लम्हे थे हमारे पास भी,
जो मिलकर बन गए एक खूबसूरत सा अफसाना—
हमारी ही बुनी हुई दास्तां का।
कुछ ख्वाब जो आँखों में पलते रहे,
हमने उन्हें धागों-सा जोड़ लिया।
हकीकत में ढाल लिया,
हर एहसास को प्यार से सजा लिया।
क्या सुनाएँ ये दास्तां,
हमें इश्क-मोहब्बत का शोर पसंद नहीं,
हमने तो खामोशी से रिश्तों को संजोया है,
हर टूटते धागे को फिर से जोड़ा है।
हमें बस एक ख्वाब सजाना था,
अपनेपन की गर्माहट से,
जहाँ हर रिश्ता सच्चाई से चमकता रहे।
हमारी ये बुनी हुई दास्तां भी,
एक दिन सबकी जुबां पर होगी,
क्योंकि इसमें दिखावा नहीं,
बस सच्चे एहसासों की रोशनी होगी…
जो हर दिल में हमेशा याद रहेगी।