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श्रेणी: कविता

  • Maa

    Maa

    पढ़ने का समय : 2 मिनट
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    माँ…

    एक ऐसा शब्द,

    जिसमें पूरी दुनिया समा जाती है।

    जिसकी गोद में सिर रखते ही

    हर दर्द कहीं खो जाता है।

    वह खुद भूखी रह जाती है,

    पर अपने बच्चे को कभी भूखा नहीं सोने देती हैं। 

    अपने आँचल में छुपाकर भी, 

    हर मुसीबत से लड़ जाती है।

    नौ महीने कोख में रखकर,

    हर दर्द हँसकर सहती रहती है,

    और जब पहली बार बच्चा रोता है,

    तब वह आँसुओं में भी मुस्कुराती है।

    उसकी ममता किसी मंदिर की पूजा जैसी,

    उसका प्यार भगवान की दुआ जैसा है 

    वह खुद टूट जाती है,

    पर अपने बच्चे को कभी टूटने नहीं देती।

    बच्चा बीमार हो जाए,

    तो रातभर जागती है,

    अपनी नींद, अपनी खुशियाँ,

    सब उस पर वार जाती है।

    जब बच्चा चलना सीखता है,

    तो माँ का दिल भी उड़ने लगता है,

    उसकी छोटी-सी जीत पर भी

    माँ का सीना गर्व से भर जाता है।

    दुनिया साथ छोड़ दे अगर,

    तब भी माँ साथ निभाती है,

    हर हाल में, हर मोड़ पर,

    बस वही तो याद आती है।

    माँ सिर्फ रिश्ता नहीं शब्द नहीं,

    पूरी जिंदगी होती है,

    जिसके बिना हर खुशी अधूरी है। 

    हर सांस अधूरी लगती है।

    शब्द कम पड़ जाते हैं माँ को लिखने में,

    क्योंकि माँ की ममता

    किसी किताब में नहीं समाती…

    वह तो सिर्फ दिल से महसूस की जाती है। ❤️

    Lakshmi Kumari 

  • जिंदगी

    जिंदगी

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

     

    ज़िंदगी एक प्यारी कहानी,

    कभी हँसी, कभी हैरानी।

     

    कभी धूप है, कभी बरसात,

    कभी मिठास, कभी खट्टी बात।

     

    गिरकर हमें चलना सिखाती,

    आगे बढ़ने का हौसला दिलाती।

     

    सपनों को उड़ान यहाँ मिलती,

    मेहनत से पहचान यहाँ मिलती।

     

    कभी खेल है, कभी इम्तहान,

    कभी सफर, कभी अरमान।

     

    हर दिन नया सबक सिखाती,

    आशा की किरण जगाती।

     

    मुस्कान बाँटो, प्यार लुटाओ,

    ज़िंदगी को खुशियों से सजाओ।

     

    हर लम्हा जी भरकर जीना,

    ज़िंदगी का असली है नगीना।

     

     

    Lakshmi Kumari 

     

  • हमारी बुनी हुई दास्तां

    हमारी बुनी हुई दास्तां

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

     

    हमारी बुनी हुई दास्तां

    कुछ रिश्ते थे… जिन्हें हमने धीरे-धीरे बुना है।
    कुछ ख्वाहिशें थीं… जिन्हें दिल में सहेजकर रखा।
    कुछ लम्हे थे हमारे पास भी,
    जो मिलकर बन गए एक खूबसूरत सा अफसाना—
    हमारी ही बुनी हुई दास्तां का।

    कुछ ख्वाब जो आँखों में पलते रहे,
    हमने उन्हें धागों-सा जोड़ लिया।
    हकीकत में ढाल लिया,
    हर एहसास को प्यार से सजा लिया।

    क्या सुनाएँ ये दास्तां,
    हमें इश्क-मोहब्बत का शोर पसंद नहीं,

    हमने तो खामोशी से रिश्तों को संजोया है,

     

    हर टूटते धागे को फिर से जोड़ा है।

    हमें बस एक ख्वाब सजाना था,
    अपनेपन की गर्माहट से,

    जहाँ हर रिश्ता सच्चाई से चमकता रहे।

    हमारी ये बुनी हुई दास्तां भी,

    एक दिन सबकी जुबां पर होगी,
    क्योंकि इसमें दिखावा नहीं,
    बस सच्चे एहसासों की रोशनी होगी…
    जो हर दिल में हमेशा याद रहेगी।

  • गुरुर

    गुरुर

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

     

    गुरूर है मुझे खुद पर…

    मैं सबसे अलग हूँ।

    मैं सबके जैसी नहीं,

    और यही मेरी पहचान है।

    कोई चाहे या ना चाहे,

    मैं अकेले भी खुश हूँ।

    जैसी भी हूँ,

    अपने माँ-पापा की बेटी हूँ।

    मैं सबसे अलग हूँ,

    पर उनके लिए सबसे प्यारी हूँ।

    गुरूर है मुझे खुद पर…

    क्योंकि मैं जैसी हूँ, वैसी ही खुश हूँ।

  • सांझ की रोशनी में सौन्दर्य

    सांझ की रोशनी में सौन्दर्य

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    सुनो! तुम श्रृंगार ना किया करो,

    अपनी आंखों को यूं ना मुझे देख कर नीचे किया करो ,

    मैं पागल हूं तुम्हारी झील सी आंखों का

    मुझे और ना तुम्हारे लिए पागल किया करो ,

    कजरारी आंखें तुम्हारी देख कर दिल में बेताबी सी छाती है,

    सांझ की रोशनी में चमक तुम्हारे चेहरे की बढ़ जाती है,

    मैं कायल हूं तुम्हारी झील सी आंखों का,

    क्या इरादा रखती हो तुम मुझे डूब कर पार जाने का,

    ये काली घटाओं सी जुल्फ तुम्हारी,

    हार बनने को बेताब है गले का हमारी ,

    यूं जो माथे पर छोटी सी बिंदी जो

    तुम लगाती हो सच कहता हूं कि ,

    तुम जान मेरी लेकर जाती हो , 

    हल्की सी लाली लिए चेहरा तुम्हारा दमकता है,

    निकला ना करो तुम अकेले कहीं दिल मेरा डरता है ,

    ये जो हंसती हो औरों से मिलकर  ,

    नहीं जानती तुम कितना दिल मेरा जलता है ,

    मैं बंदिशों में तुम्हें नहीं बांध रहा हूं ,

    तुम इसे बंदिशें मत समझना ,

    ये दुनिया तुम्हारे लायक नहीं है,

    इसलिए मैं थोड़ा  सा ही सही तुम्हें

    लेकर सम्भल रहा हूं …!!

  • छल ….!!

    छल ….!!

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    तुम दूर हो मुझसे तो

    दूर ही रहो ना क्यों बेफिजूल की

    नजदीकियां बढा़ते हो ,क्या मिला है

    किसी को भी इश्क करके

    जो तुम मेरे पीछे पीछे आते हो,

    मै वाकिफ हूं तुमसे बेहतर ही

    फिर क्यों मुझे बहलाते हो,

    देखा है तुम्हें मैंने गैरों के संग

    भी फिर क्यों मुझे सब्जबाग

    दिखाते हो,

    माना इश्क ❤️ किया है मैंने तुमसे ,

    क्या इसलिए तुम मेरा फायदा उठाते हो,

    दूर दूर ही रहो ना तुम अब मुझसे,

    क्यों अपने झूठे इश्क का

    यकीन दिलाते हो,

    छल कपट से इश्क कभी

    मुकम्मल नहीं होता ,

    क्या हुआ जो अब मैं तन्हा हो जाऊंगी,

    बेशक दिल किलसता रहेगा

    तुम्हारे इन्तजार में ,

    फिर भी मैं भूल नहीं पाऊंगी

    तुम्हारे कपट भरे इजहार को ,

    सच्चाई सिर्फ मुझमें थी ,

    काश ! तुम भी सच्चे दिल से

    इकरार करते, मैं छोड़ देती ये

    जहां जो तुम मेरे साथ होते….!!

  • मन की बात

    मन की बात

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

     

     

     

    मन की बात

     

    मन की बात है गहरी, शब्दों में कैसे आए,

    दिल के कोने में छुपी, हर किसी को न बताए।

     

    कभी ये खुशियों की धुन, तो कभी दर्द सुनाए,

    कभी शोर मचाए मन में, तो कभी चुप रह जाए।

     

    सपनों की उड़ान इसमें, उम्मीदों की रोशनी,

    कभी बादलों से घिर जाए, कभी चमके चाँदनी।

     

    मन कहे सच बोलूं, मगर दुनिया से डरता हूँ,

    अपनों की खुशियों खातिर, हर ग़म मैं सहता हूँ।

     

    कभी बह जाए भावनाओं में, कभी बन जाए पत्थर,

    कभी झूमे सावन जैसे, कभी सूखा कोई सागर।

     

    मन की बात अधूरी है, कहो तो बोझ हल्का हो,

    न कहो तो रह जाए दिल में, और आँसू बन टपका हो।

     

    इसलिए सुनो मन की बातें, जो दिल में उमड़ती हैं,

    कभी शब्दों में बहती हैं, कभी आँखों में तैरती हैं।

  • अकेलापन….!!

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    अपनों के बीच होकर भी गैर हो गया हूं मैं,

    क्या कहूं ऐ जिन्दगी कितना मजबूर हो गया हूं मैं , 

    हंसी होंठों से जाने नहीं देता

    इस दिल से कितना बेगैरत हो गया हूं मैं ,

    यादों की लाली मेरी आंखों से जाती नहीं,

    बस कह नहीं सकता कितना टूट गया हूं मैं, 

    अकेलापन अब तो सालता है मुझे ,

    आ देख! मुझे आकर तेरे बगैर कैसे जी रहा हूं मैं ,

    अकेलापन महसूस किया है मैंने अब तेरी पनाहों में,

    क्या कहूं दिल से कितना मजबूर हो गया हूं मैं …!!

  • बदलाव…!!

    बदलाव…!!

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    घर बदलें गलियां बदलीं

    शहरों में मकां बदले,

    मौसम ने भी करवट ले कर

    अपने रंग दिखाये है ,

    तुम कहते हो बदलाव जरूरी है ,

    रिश्ते बदले लोगों ने भी

    अपने मतलब से वफादारी दिखाई है,

    तुम कहते हो बदलाव जरूरी है,

    तुम भी बदल रहे हो वक्त के हाथों,

    जब बदलाव की आंधी में

    खुद को सब बदल रहे तो

    मेरे बदलने में क्या बुराई है ,

    हवाओं का रुख भी बदला हुआ है  ,

    मैं बदलूं खुद को खुद ही की जद्दोजहद से ,

    अब नहीं परवाह करनी बेवजह

    के लोगों की ,ना ढ़लना मुझे

    औरो के कायदों में ,

    सुकून के पल खुद के लिए

    चुरा लूं जिंदगी से,

    बदलाव जरूरी है तो क्यों

    ना मैं खुद के लिए जीयूं??

    क्यों मेरे लिए ही वक्त की मारमारी है  ,

    बदलाव जरूरी है ना तो

    दुनिया के ढकोसलों को तुम्हीं सम्हालो  ,

    मैं उड़ती रहूं मदमस्त होकर गगन में …!!

  • दहलीज़ के पार…

    दहलीज़ के पार…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    अल्हड सी कन्या मुस्कान

    लिए होंठों पर आई अपने

    साजन के द्वार, कौतूहल

    और जिज्ञासा से हुआ जिसका सत्कार,

    हंसी ठिठोली हवाओं में फैली  ,

    फिर भी चेतायी गई एक बार ,

    देखो! अब तुम हो गृह लक्ष्मी

    इस घर की, इस दहलीज़

    को तुम पहचान लो,

    स्वछंद विचरण करना

    घर के कोने कोने में,

    किन्तु दहलीज़ को पार ना करना ,

    मनोकामनाएं पूर्ण होगीं सभी तुम्हारी ,

    बस दहलीज़ से दूरी बनाए

    रखना , माना आधुनिकता

    का दौर है लेकिन वो क्या है ना,

    हम सामाजिक बंधनों में बंधे हुए हैं  ,

    दहलीज़ के पार जाना ब्याहता

    नारी का ,घर के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाता है,

    अधिक शिक्षित नारी को उद्दंड बनाता है,

    दहलीज़ पे ही सम्मान टिका हुआ है

    ऐसा ढकोसले वालों को लगता है  , 

     

    नारी को सशक्त बनाना उसे उदद्दंड और अनुशासनहीन नहीं बनाता है  , खैर ये कविता रू़ढीवादी विचार धारा को दर्शाती है…!!