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हमारी बुनी हुई दास्तां

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हमारी बुनी हुई दास्तां

कुछ रिश्ते थे… जिन्हें हमने धीरे-धीरे बुना है।
कुछ ख्वाहिशें थीं… जिन्हें दिल में सहेजकर रखा।
कुछ लम्हे थे हमारे पास भी,
जो मिलकर बन गए एक खूबसूरत सा अफसाना—
हमारी ही बुनी हुई दास्तां का।

कुछ ख्वाब जो आँखों में पलते रहे,
हमने उन्हें धागों-सा जोड़ लिया।
हकीकत में ढाल लिया,
हर एहसास को प्यार से सजा लिया।

क्या सुनाएँ ये दास्तां,
हमें इश्क-मोहब्बत का शोर पसंद नहीं,

हमने तो खामोशी से रिश्तों को संजोया है,

 

हर टूटते धागे को फिर से जोड़ा है।

हमें बस एक ख्वाब सजाना था,
अपनेपन की गर्माहट से,

जहाँ हर रिश्ता सच्चाई से चमकता रहे।

हमारी ये बुनी हुई दास्तां भी,

एक दिन सबकी जुबां पर होगी,
क्योंकि इसमें दिखावा नहीं,
बस सच्चे एहसासों की रोशनी होगी…
जो हर दिल में हमेशा याद रहेगी।

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Lakshmi Kumari

NSW  अनुभवी लेखक -🥇

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