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आज मैं तीस साल का हो गया हूँ। लोगों को जब बताता हूँ कि मैं अनाथ हूँ तो उनकी आँखों में सहानुभूति आ जाती है। कुछ कह देते हैं—“हाय राम, बेचारा।” कुछ चुपचाप सिर हिला देते हैं। लेकिन कोई नहीं पूछता कि अनाथ होने का मतलब सिर्फ माँ-बाप का न होना नहीं होता। उसका मतलब होता है—हर साँस के साथ एक सवाल लेकर जीना।
क्या अनाथ होना मेरी गलती थी?
यह सवाल मेरे बचपन से लेकर आज तक मेरे साथ है।
मेरी यादों की शुरुआत एक ठंडी रात से होती है। उम्र शायद चार साल की होगी। एक छोटी सी झोपड़ी। माँ बीमार पड़ी थी। बुखार से काँप रही थी। पिताजी कहीं मजदूरी करने गए थे। माँ ने मुझे अपनी छाती से लगाया और धीरे से कहा—“बेटा, तुम मजबूत रहना। दुनिया बड़ी कठिन है।”
सुबह होते-होते माँ नहीं रहीं।
पिताजी लौटे तो रोए। खूब रोए। फिर कुछ महीनों बाद वे भी चले गए—बीमारी से। रिश्तेदार आए। बातें हुईं। फिर मैं एक अनाथालय पहुँच गया।
अनाथालय में मेरा पहला दिन याद है। बड़ी-बड़ी चारपाईयाँ। बहुत सारे बच्चे। सबके चेहरे पर एक जैसी थकान। सुपरवाइजर मैडम ने कहा—“अब से यह तुम्हारा घर है। यहाँ सब बराबर हैं।”
लेकिन बराबर नहीं थे।
जो बच्चे कभी-कभी किसी रिश्तेदार से मिलने जाते, वे खुश लौटते। मैं किसी से नहीं मिलता था। त्योहारों पर जब कुछ बच्चों के घर से मिठाई आती तो मुझे भी बाँट दी जाती। लेकिन मिठाई में भी अकेलापन घुला होता था।
स्कूल में सबसे ज्यादा चुभता था।
शिक्षक जब अभिभावक-मीटिंग बुलाते तो मैं चुपचाप बैठता। बच्चे कहते—“तेरे माँ-बाप कहाँ हैं?”
मैं जवाब देता—“नहीं हैं।”
फिर हँसी होती। “अनाथ है। माँ-बाप ने छोड़ दिया होगा। जरूर नालायक होगा।”
रात को रोते हुए सोचता—**क्या मेरी कोई गलती थी?**
क्या मैं रोया था ज्यादा? क्या मैं बीमार पड़ा था? क्या मैंने माँ-बाप को परेशान किया था कि वे दोनों चले गए?
आठ साल की उम्र में पहली बार किसी ने सीधे कहा—“तू बोझ है। तेरी वजह से तेरे माँ-बाप परेशान होकर मर गए होंगे।”
वह एक बड़ा लड़का था। अनाथालय का ही। मैंने जवाब नहीं दिया। बस अंदर ही अंदर टूट गया।
साल बीतते गए।
मैं पढ़ने में अच्छा था। मेहनत करता। सोचता था कि अगर मैं बहुत अच्छा बन गया तो शायद कोई गोद ले लेगा। कई दंपति आते। बच्चों को देखते। मुझसे बात करते। फिर किसी छोटे, प्यारे बच्चे को चुनकर चले जाते।
हर बार वही सवाल—मेरी क्या गलती है?
पंद्रह साल का हुआ तो अनाथालय छोड़ना पड़ा। नियमों के अनुसार। थोड़ी सी मदद मिली—कुछ कपड़े, थोड़े पैसे। बाकी सब अपने दम पर।
रात को फुटपाथ पर सोया। भूखा रहा। ठंड में काँपा। लोगों ने शक की नजर से देखा—“यह लड़का इधर-उधर क्यों घूम रहा है? चोर तो नहीं?”
मैंने नौकरी की। पहले होटल में बर्तन धोए। फिर एक दुकान पर सामान उठाया। रात को पढ़ाई की।
एक दिन दुकान के मालिक ने पूछा—“तेरे घर वाले कहाँ हैं?”
मैंने सच बता दिया।
उसने तुरंत चेहरा बदल लिया। “अनाथ है? फिर तो तेरी आदतें खराब होंगी। चोरी वगेरह तो नहीं करता?”
मैंने नौकरी छोड़ दी।
उस रात बहुत रोया।
आकाश की तरफ देखकर पूछा—“भगवान, क्या अनाथ होना मेरी गलती थी? तुमने माँ-बाप क्यों छीन लिए? मैंने क्या बुरा किया था?”
जवाब नहीं आया।
सिर्फ सन्नाटा मिला।
बीस साल का हुआ तो एक ऑफिस में क्लर्क की नौकरी मिल गई। अच्छी थी। लेकिन फॉर्म में “अभिभावक का नाम” लिखने की जगह देखकर हर बार हाथ काँप जाता। मैं लिखता—“नहीं हैं।”
लोग पूछते तो मैं झूठ बोलने लगा—“दूर रहते हैं।”
झूठ बोलते-बोलते खुद से शर्म आने लगी।
फिर एक दिन दिल ने कहा—बस।
अब और नहीं।
मैंने फैसला किया कि सच से भागना बंद करूँगा।
जब कोई पूछता—“माँ-बाप?”
तो साफ कहता—“मैं अनाथ हूँ।”
पहले तो लोग सहानुभूति देते। फिर धीरे-धीरे कुछ लोग दूर हो जाते। कुछ कहते—“अनाथों का स्वभाव अलग होता है। भरोसा नहीं किया जा सकता।”
मैं चुप रहता। अंदर-अंदर वही पुराना सवाल दोहराता—क्या मेरी गलती थी?
एक दिन ऑफिस में मेरी सहकर्मी नेया ने पूछा। वह सीधी थी।
“आरव, तुम हमेशा अकेले रहते हो। कोई परिवार नहीं?”
मैंने बताया। पूरी बात। बिना छुपाए।
नेया चुप रही। फिर बोली, “अनाथ होना तुम्हारी गलती नहीं। यह तो एक हादसा था। हादसे को अपनी पहचान मत बनाओ।”
उसकी बात ने कुछ हिला दिया अंदर।
मैंने पहली बार गहराई से सोचा।
माँ बीमार हुईं। पिता मजदूरी करते-करते टूट गए। मैं चार साल का था। मैंने क्या किया होता? क्या मैं दवा ला सकता था? क्या मैं पैसे कमा सकता था?
नहीं।
मैं सिर्फ एक बच्चा था।
फिर गलती किसकी थी?
किस्मत की? समाज की? गरीबी की?
या फिर मेरी ही—कि मैं पैदा हो गया?
सालों तक मैंने खुद को दोषी माना।
हर असफलता पर सोचा—“क्योंकि मैं अनाथ हूँ, इसलिए ऐसा हुआ।”
हर अकेलेपन पर सोचा—“क्योंकि मैं अनाथ हूँ, इसलिए कोई नहीं चाहता।”
लेकिन धीरे-धीरे समझ आया।
अनाथ होना एक स्थिति है। गलती नहीं।
गलती तो वह सोच है जो समाज हमें देता है—कि बिना माँ-बाप के इंसान अधूरा है, अविश्वसनीय है, बोझ है।
आज मैं तीस साल का हूँ।
मेरी अपनी एक छोटी सी दुनिया है। एक किराये का कमरा। एक कुत्ता। कुछ अच्छे दोस्त। नेया अब मेरी पत्नी है। उसने कहा था—“मैं तुम्हारे अतीत से नहीं, तुम्हारे वर्तमान से शादी कर रही हूँ।”
कभी-कभी रात को जब अकेला बैठता हूँ तो पुराना सवाल वापस आता है।
क्या अनाथ होना मेरी गलती थी?
अब जवाब बदल चुका है।
नहीं।
मेरी गलती नहीं थी।
मेरी गलती थी कि मैंने इतने साल खुद को दोषी माना।
मेरी गलती थी कि मैंने समाज के तानों को अपनी सच्चाई मान लिया।
मेरी गलती थी कि मैंने माँ-बाप के न होने को अपनी पहचान बना लिया।
अब मैं जानता हूँ—
अनाथ होना मेरी मजबूरी थी।
लेकिन मजबूत होना मेरी जिद थी।
अकेला पड़ना मेरी कहानी थी।
लेकिन खुद को संभालना मेरी जीत थी।
आज अगर कोई बच्चा मुझसे पूछे कि अनाथ होना क्या होता है, तो मैं कहूँगा—
“बेटा, अनाथ होना माँ-बाप का न होना भर नहीं है।
अनाथ होना तब होता है जब दुनिया तुम्हें बार-बार याद दिलाती है कि तुम अधूरे हो।
लेकिन याद रखना—तुम अधूरे नहीं हो।
तुम उन लोगों से कहीं ज्यादा पूरे हो जो सिर्फ इसलिए खुद को भाग्यशाली समझते हैं क्योंकि उनके पास माँ-बाप हैं।
तुम्हारी गलती कुछ नहीं है।
गलती उन लोगों की है जो तुम्हारे घावों पर नमक छिड़कते हैं।”
मैं अब खुद से नहीं लड़ता।
मैंने माँ-बाप को खोया। यह सच है।
लेकिन मैंने खुद को नहीं खोया। यह उससे बड़ा सच है।