🔐 लॉग-इन या रजिस्टर करें  

काश तुम उस दिन समय रहते पहुँच जाते…

पढ़ने का समय : 6 मिनट

 

(एक डॉक्टर की अधूरी जिंदगी की कहानी)

 

रात के लगभग साढ़े दस बजे थे।

 

शहर के सबसे बड़े अस्पताल की तीसरी मंज़िल पर ऑपरेशन थिएटर की लाल बत्ती लगातार जल रही थी। अंदर डॉक्टरों की टीम किसी मरीज की जान बचाने में लगी थी।

 

ऑपरेशन थिएटर के बीचों-बीच खड़ा था डॉ. आदित्य मेहरा।

 

शहर का सबसे मशहूर न्यूरोसर्जन। उसके माथे पर पसीना था… आँखों में थकान… लेकिन हाथों में वही आत्मविश्वास, जिसने अब तक ना जाने कितनी जिंदगियाँ बचाई थीं।

 

“सक्शन…” उसने गंभीर आवाज में कहा। नर्स ने तुरंत उपकरण पकड़ाया। मरीज की हालत बेहद नाजुक थी। ज़रा सी गलती… और सब खत्म।

 

तभी बाहर से एक जूनियर डॉक्टर तेजी से अंदर आया। “सर…” उसकी आवाज घबराई हुई थी।

 

आदित्य ने बिना नजर उठाए कहा “मैंने कहा था, ऑपरेशन के बीच कोई डिस्टर्ब नहीं करेगा।”

 

“सर… बात बहुत जरूरी है…” आदित्य झल्ला उठा “क्या है?” जूनियर डॉक्टर कुछ पल चुप रहा… फिर धीरे से बोला “सर आपके बेटे आरव का एक्सिडेंट हो गया है…”

 

आदित्य का हाथ एक पल को रुक गया। “व्हाट…?”

 

“उसे सिटी हॉस्पिटल लाया गया है… हालत गंभीर है…” कुछ सेकंड के लिए आदित्य की सांसें जैसे थम गईं।

 

“कैसे हुआ?” उसकी आवाज काँप गई। “स्कूल से लौटते वक्त… ट्रक ने बाइक को टक्कर मार दी…” आदित्य की आँखों के सामने अपने बारह साल के बेटे का चेहरा घूम गया। आरव उसकी दुनिया उसका सब कुछ।

 

 

आदित्य तुरंत बाहर जाने को हुआ… लेकिन तभी उसके सीनियर असिस्टेंट ने कहा “सर… अगर आप अभी ऑपरेशन छोड़ देंगे तो मरीज नहीं बचेगा…”

 

आदित्य रुक गया उसके सामने दो जिंदगियाँ थीं। एक… उसका बेटा दूसरी… एक अनजान मरीज उसके हाथ काँपने लगे।

 

“सर, फैसला आपको करना है…” असिस्टेंट बोला आदित्य की आँखों में दर्द उतर आया उसने दीवार का सहारा लिया।

 

उसके दिमाग में आरव की हँसी गूंज रही थी “पापा, आप दुनिया के सबसे अच्छे डॉक्टर हो…” और दूसरी तरफ ऑपरेशन टेबल पर लेटा मरीज… जिसकी सांसें हर सेकंड टूट रही थीं।

 

आदित्य ने आँखें बंद कीं फिर भारी दिल से बोला “ऑपरेशन जारी रहेगा…”

 

ऑपरेशन फिर शुरू हुआ… लेकिन अब आदित्य का ध्यान बार-बार भटक रहा था। हर पाँच मिनट बाद उसकी नजर घड़ी पर चली जाती। हर सेकंड उसे भारी लग रहा था।

 

उसने कई बार फोन उठाने की कोशिश की… लेकिन हाथ फिर ऑपरेशन में लग जाते। तीन घंटे पूरा तीन घंटे बाद ऑपरेशन खत्म हुआ। मरीज बच गया था। पूरा स्टाफ खुश था।

 

लेकिन आदित्य के चेहरे पर कोई खुशी नहीं थी। उसने जल्दी से ग्लव्स उतारे और भागते हुए बाहर निकला। उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। “भगवान… बस मेरा बेटा ठीक हो…”

 

जब आदित्य सिटी हॉस्पिटल पहुँचा… तब रात के दो बज चुके थे।

 

वह पागलों की तरह ICU की तरफ भागा। बाहर उसकी पत्नी नेहा बैठी थी। उसकी आँखें सूज चुकी थीं… चेहरा आँसुओं से भीगा हुआ था। आदित्य को देखते ही वह खड़ी हो गई।

 

“आरव कहाँ है?” आदित्य ने घबराकर पूछा। नेहा उसे बस देखती रही उसकी आँखों में दर्द था… गुस्सा था… टूटन थी। “नेहा… बोलो ना मेरा बेटा कहाँ है?” आदित्य चीख पड़ा।

 

नेहा की आँखों से आँसू बह निकले उसने काँपती आवाज में कहा “वो… चला गया आदित्य…”

 

आदित्य जैसे पत्थर बन गया। “न… नहीं…” उसके कदम लड़खड़ा गए। “मैंने बहुत कोशिश की…” नेहा रोते हुए बोली “वो बार-बार तुम्हें बुला रहा था…”

 

आदित्य की आँखों से आँसू बह निकले। “पापा आएंगे ना मम्मा…?”

नेहा ने रोते हुए आरव की आखिरी बातें दोहराईं। आदित्य वहीं जमीन पर बैठ गया। उसकी दुनिया खत्म हो चुकी थी।

 

नेहा उसके सामने आकर खड़ी हो गई। उसकी आवाज टूट रही थी… लेकिन हर शब्द तीर की तरह लग रहा था। “काश… तुम उस समय रहते पहुँच जाते…”

 

आदित्य ने सिर उठा कर उसे देखा। “नेहा…” “तुम सबकी जान बचाते रहे आदित्य…” वह चीखी “लेकिन अपने बेटे को नहीं बचा पाए…” उसके शब्दों में वर्षों का दर्द था। “उसे तुम्हारी जरूरत थी…” नेहा रो रही थी “वो आखिरी सांस तक तुम्हें बुलाता रहा…”

 

आदित्य खुद को संभाल नहीं पा रहा था। “मैं… मैं एक मरीज को छोड़ नहीं सकता था…” उसकी आवाज बिखर गई। नेहा कड़वाहट से हँसी “और आज… तुम्हारा बेटा तुम्हें छोड़ गया…”

 

आरव के अंतिम संस्कार के बाद घर पूरी तरह खामोश हो गया। जहाँ पहले हँसी गूंजती थी… अब सिर्फ सन्नाटा था। आरव का कमरा वैसे ही पड़ा था। उसके खिलौने… उसकी किताबें… उसकी अधूरी ड्रॉइंग्स… आदित्य धीरे-धीरे कमरे में गया।

 

उसने आरव की छोटी सी शर्ट उठाई… और सीने से लगा ली। उसकी आँखों के सामने वो दिन घूम गया जब आरव ने कहा था “पापा, इस बार मेरा मैच देखने जरूर आना…”

 

लेकिन आदित्य नहीं गया था। “पापा बहुत बिजी हैं…” यही कहकर हर बार वह खुद को समझा लेता था। आज वही शब्द उसे अंदर से तोड़ रहे थे।

 

 

एक रात…

 

आदित्य को आरव की स्टडी टेबल में एक छोटी डायरी मिली काँपते हाथों से उसने डायरी खोली पहले पन्ने पर लिखा था “मेरे पापा सुपरहीरो हैं…”

 

आदित्य रो पड़ा आगे लिखा था “पापा बहुत लोगों की जान बचाते हैं। मुझे उन पर गर्व है। लेकिन काश… वो मेरे साथ थोड़ा समय बिताते…”

 

आदित्य का दिल चीर गया। उसने अगले पन्ने पलटे “आज मेरा मैच था। मैं चाहता था पापा आएं… लेकिन वो फिर हॉस्पिटल चले गए…”

 

हर शब्द उसे मार रहा था। फिर आखिरी पन्ने पर लिखा था “अगर मैं बड़ा हुआ… तो पापा की तरह डॉक्टर बनूँगा। ताकि मैं लोगों की जान भी बचा सकूँ… और अपने परिवार का साथ भी दे सकूँ…”

 

डायरी उसके हाथों से गिर गई।

 

दिन गुजरते गए…

 

लेकिन आदित्य खुद को माफ नहीं कर पा रहा था। वह हर रात वही सोचता “अगर मैं उस दिन ऑपरेशन छोड़ देता तो…?” “अगर मैं थोड़ा पहले पहुँच जाता तो…?” लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।

एक दिन उसने नेहा से कहा “मैंने अपना बेटा खो दिया…”

 

नेहा की आँखें भर आईं। “हम दोनों ने खोया है आदित्य…”

“नहीं…” आदित्य रो पड़ा “तुमने उसे हादसे में खोया… और मैंने अपनी जिम्मेदारियों में…”

 

 

कुछ महीनों बाद…

 

आदित्य फिर उसी ऑपरेशन थिएटर में खड़ा था। लेकिन आज उसके अंदर कुछ बदल चुका था। ऑपरेशन खत्म होने के बाद उसने अपने जूनियर्स से कहा “याद रखो… डॉक्टर होना जरूरी है… लेकिन इंसान होना उससे भी ज्यादा जरूरी…” सब उसकी तरफ देखने लगे।

 

उसकी आँखें नम थीं। “कभी ऐसा मत होने देना… कि किसी अपने को तुम्हारी कमी महसूस हो…” रात को आदित्य आरव की कब्र के पास बैठा था। उसने धीरे से फूल रखे। “मुझे माफ कर दो बेटा…” उसकी आवाज काँप गई।

 

हवा हल्के से चली। आदित्य की आँखों से आँसू बह निकले “काश… मैं उस दिन समय रहते पहुँच जाता…” लेकिन कुछ पछतावे जिंदगी भर इंसान का पीछा नहीं छोड़ते… और कुछ आवाजें मरने के बाद भी दिल में गूंजती रहती हैं। 

Comments

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *