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श्रेणी: कविता

  • निशब्द : अनकहे अल्फ़ाज़

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

    कोई पूछे कि कौन हूँ मैं, कह देना कोई खास नहीं,

    भीड़ बहुत है इस दुनिया में, पर मेरे कोई पास नहीं।

    पढ़ सकते हैं लफ्ज़ मेरे, पर समझें वो एहसास नहीं,

    लिखे कितने दर्द यहाँ, पर मिलते सही अल्फ़ाज़ नहीं।

     

    कोई पूछे कि कौन हूँ मैं, कह देना कोई खास नहीं,

    दिल में उठते जज़्बात कई, पर मन में कोई साज़ नहीं,

    हर चेहरा मुझको जानता है, पर मेरा कोई नाम नहीं।

    मैं टूटा हुआ वो आईना हूँ, जिसमें झूठा अंदाज़ नहीं।

     

    कोई पूछे कि कौन हूँ मैं, कह देना कोई खास नहीं,

    चलता हूँ राहों पर तनहा, साथ में कोई आस नहीं।

    धड़कन चलती रहती है बस, उसमें कोई आवाज़ नहीं।

    हँसता हूँ मैं महफ़िलों में, पर दिल में कोई राग नहीं।

     

    कोई पूछे कि कौन हूँ मैं, कह देना कोई खास नहीं,

    मंज़िल खुद पूछे मुझसे, तेरा खुद पर विश्वास नहीं?

    आईना रोज़ टटोलता है, पर देता कोई जवाब नहीं,

    चेहरे सब पहचानते हैं, पर मेरी कोई पहचान नहीं।

     

    कोई पूछे कि कौन हूँ मैं, कह देना कोई खास नहीं,

    नींदों में भी सुकून मिल सके, ऐसी कोई रात नहीं।

    मैं वो लफ़्ज़ हूँ टूटा सा, जिसकी कोई किताब नहीं,

    मैं वो दरिया हूँ सूखा सा, जिसकी कोई प्यास नहीं।

     

    कोई पूछे कि कौन हूँ मैं, कह देना कोई खास नहीं,

    भीतर जितनी रोशनी है, उतनी बाहर बात नहीं।

    कोई पूछे फिर भी मुझसे, दुनिया में कुछ खास नहीं?

    मुस्काकर बस इतना कहता हूँ, शायद मैं ही खास नहीं।

     

    ~ देव श्रीवास्तव ” दिव्यम ” ✍️

  • खुद को पाना आसान नहीं….

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    खुद को पाना आसान नहीं था जनाब,

    मैंने अपना सर्वस्व गँवाकर खुद को पाया है।

     

    आसान नहीं था इच्छाओं, आशाओं और उम्मीदों का त्याग,

    मैंने हर चाहत को दिल में दफ़नाया है।

     

    खुद को पाने की राह में बड़ी यातनाएँ सही हैं मैंने,

    हर आँसू को मुस्कान के पीछे छुपाया है।

     

    टूटकर, बिखरकर, फिर से खुद को गढ़ा है मैंने,

    तब कहीं जाकर अपने अस्तित्व को अपनाया है।

     

    खुद को पाना आसान नहीं था जनाब,

    मैंने बहुत कुछ खोकर ये मुकाम पाया

  • कागज पर थकान लिखूँगी.. ✍️✍️

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    ✍️✍️

    अगर मौका मिला कभी , तो कागज पर अपनी थकान लिखूंगी ✍️✍️

    मजबूत कंधों के पीछे छुपी,, वो छोटी सी इन्सान लिखूंगी ✍️✍️

    जो हर मुश्किल में मुस्कुरा कर कहती है सब ठीक है🥲🥲

    उस एक झूठ के पीछे छुपे , हजारों बेबस तूफान लिखूंगी ✍️✍️

    नहीं लिखूंगी मैं सिर्फ अपनी जीत के चर्चे दुनिया में ✍️

    मैं तो हार कर भी मुस्कराई,, वो लहुलुहान स्वाभिमान लिखूंगी ✍️✍️

    लिखूंगी वो रातें जब तकिया गवाह था,,मेरी सिसकियों का🥹🥹

    पर सुबह उठकर फिर से बनी,, चट्टान जैसी इन्सान लिखूंगी ✍️✍️

     

    मैं लिख पाऊं कुछ तो 

    मैं खुद को लिखूंगी ✍️✍️

    अपनी रुह के हर ज़ख्म को 

    अपना ही सम्मान लिखूंगी ✍️✍️✍️

  • कोई पत्थर नहीं…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    मुझको इतना भी ना तरसा बात करने के लिए ,

     

    मै भी इंसान हु कोई पत्थर नहीं ।।।

  • बुरा ही रहूँगा…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    मौत से ठीक, एक दिन पहले तक,,

     

    मैं भी सबके लिए, बुरा ही रहूंगा…✍️

     

  • हम बिहारी है जी

    हम बिहारी है जी

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

     

    हाँ हम बिहारी हैं जी,

    हाँ हम बिहारी हैं जी,

    थोड़े संस्कारी हैं जी…

    माटी को सोना कर दें,

    ऐसी कलाकारी है जी,

    हाँ हम बिहारी हैं जी…

    मिट्टी पर चित्र बना लेते हैं,

    हर हुनर में जान डाल देते हैं,

    हाँ हम बिहारी हैं जी…

    मिट्टी के बर्तन से पूजा कर लेते हैं,

    कम में भी खुश रह लेते हैं,

    दिल से रिश्ते निभा लेते हैं,

    हाँ हम बिहारी हैं जी…

    सादा जीवन, ऊँचे विचार,

    यही हमारी पहचान है जी,

    दिल से अपनापन देने वाले,

    हाँ हम बिहारी हैं जी… 

  • पंसदीदा औरत…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    किसी ने पूछा मुझसे 

    “पसंदीदा औरत कैसी होती है?”

     

    मैंने हँसकर कहा 

    वो,

    जिससे बहस करते-करते भी

    आख़िर में दिल उसी की बात मान ले।

     

    जिसकी नाराज़गी

    दिन भर जेब में रखे किसी पत्थर जैसी लगे…

    हर काम के बीच

    चुभती हुई।

     

    और जिसकी हँसी

    थके हुए दिन पर

    बारिश की पहली बूँद जैसी उतरती हो।

     

    वो,

    जिसके होते हुए

    घर सिर्फ़ घर नहीं रहता,

    एक सुकून बन जाता है।

     

    जिसे दुख दो

    तो सबसे पहले

    अपनी ही आँखें झुक जाएँ।

     

    जिसकी कुछ बातें

    होंठों पर मुस्कान रख जाएँ,

    और कुछ ख़ामोशियाँ

    रात भर जगाए रखें।

     

    पसंदीदा औरत

    सिर्फ़ ख़ूबसूरत नहीं होती…

    वो धीरे-धीरे

    तुम्हारी आदत बन जाती है।

     

    तुम्हारी रूह में

    ऐसे उतरती है

    जैसे चाय में घुली शक्कर 

    दिखती नहीं,

    पर हर घूँट में महसूस होती है।

     

    और फिर एक दिन

    उसके बिना सब कुछ तो होता है…

    मगर ज़िंदगी नहीं होती।

     

    …….. ✍️

     

    किसी ने बहुत खूबसूरत कहीं अपनी बातें… जहाँ भर की गहराई समेटी है सारी जज्बाते…

  • संतोष और नीतू की प्यार भरी कहानी ❤️

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

    एक छोटे से गाँव में संतोष नाम का लड़का रहता था।
    वह बहुत सीधा, मेहनती और सबकी मदद करने वाला था। उसी गाँव में नीतू नाम की लड़की रहती थी। नीतू पढ़ाई में तेज और दिल की बहुत अच्छी थी।

    दोनों की पहली मुलाकात गाँव के मेले में हुई।
    संतोष अपने दोस्तों के साथ घूम रहा था और नीतू अपनी सहेलियों के साथ आई थी। अचानक भीड़ में नीतू का दुपट्टा हवा में उड़ गया। संतोष ने तुरंत पकड़ लिया और मुस्कुराकर उसे वापस दे दिया।

    नीतू ने धीरे से कहा—

    “धन्यवाद…”

    बस वहीं से दोनों की कहानी शुरू हो गई। ❤️

    धीरे-धीरे दोनों रोज़ बात करने लगे।
    कभी खेतों के रास्ते, कभी स्कूल के पास, तो कभी मंदिर के बाहर उनकी मुलाकात हो जाती थी।

    संतोष नीतू का बहुत ख्याल रखता था।
    अगर नीतू उदास होती, तो वह उसे हँसाने की पूरी कोशिश करता।

    एक दिन संतोष ने हिम्मत करके कहा—

    “नीतू, मैं तुम्हारे बिना अपनी जिंदगी की कल्पना भी नहीं कर सकता।”

    नीतू मुस्कुराई और बोली—

    “मैं भी तुमसे बहुत प्यार करती हूँ, संतोष।”

    लेकिन उनकी राह आसान नहीं थी।
    घरवालों को यह रिश्ता पसंद नहीं था। दोनों ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने सपनों के लिए मेहनत की और अपने परिवार को समझाया।

    आखिरकार दोनों परिवार मान गए और संतोष और नीतू की शादी पूरे गाँव में धूमधाम से हुई। 🎉❤️

    सीख:
    सच्चा प्यार हमेशा धैर्य, भरोसा और सम्मान मांगता है।

     
     
     
  • अपने काफ़ी है रुलाने के लिए..

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    दुनिया मे आये है तो मुस्कुराना सीख लीजिये दोस्त.

     

    रुलाने के लिए तो अपने रिश्तेदार ही काफ़ी है.. 🥹🥹

  • माँ…

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

    माँ की ममता और बलिदान की एक छोटी और भावुक कहानी:

    ​एक बेटा अपनी माँ से बहुत नफरत करता था क्योंकि उसकी माँ की एक आँख नहीं थी। उसे अपनी माँ के ‘अधूरे चेहरे’ से शर्म आती थी। वह बड़ा हुआ, खूब पढ़ा-लिखा और शहर जाकर एक बड़ा आदमी बन गया। उसने शादी कर ली और अपनी माँ को गाँव में ही अकेला छोड़ दिया।

    ​सालों बाद, जब माँ अपने पोते-पोतियों से मिलने शहर पहुँची, तो बेटे ने उन्हें पहचानने से इनकार कर दिया और चिल्लाकर कहा, “तुम यहाँ क्यों आई हो? तुमने मेरे बच्चों को डरा दिया, यहाँ से चली जाओ!”

    ​माँ चुपचाप वापस लौट गई। कुछ महीनों बाद माँ की मृत्यु हो गई। जब बेटा गाँव पहुँचा, तो उसे माँ की एक चिट्ठी मिली, जिसमें लिखा था:

    ​”मेरे प्यारे बेटे, शायद तुम्हें याद नहीं, पर जब तुम बहुत छोटे थे, तब एक एक्सीडेंट में तुम्हारी एक आँख फूट गई थी। एक माँ होने के नाते मैं तुम्हें एक आँख से नहीं देख सकती थी, इसलिए मैंने अपनी एक आँख तुम्हें दे दी। मुझे गर्व है कि तुम मेरी आँख से इस खूबसूरत दुनिया को देख रहे हो।”

    ​बेटा फूट-फूट कर रोने लगा, लेकिन अब माँ वापस आने वाली नहीं थी।

    ​सीख (Moral)

    ​माँ का प्यार निस्वार्थ होता है। हम अक्सर उनकी अहमियत तब समझते हैं जब वो हमसे दूर चली जाती हैं। समय रहते उनके प्यार और बलिदान का सम्मान करें।