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श्रेणी: कहानी लेखन पुरस्कार प्रतियोगिता

  • बहु बनी डायन 😱 भाग 2 — हवेली के नीचे का रहस्य😱

    पढ़ने का समय : 11 मिनट

     

    •  

     

    रात के लगभग एक बज चुके थे।भैरवपुर गाँव अब पूरी तरह नींद में डूबा हुआ था, लेकिन गाँव के बाहर खड़ी वह पुरानी हवेली जाग रही थी।

     

    हवेली की टूटी हुई खिड़कियों से कभी-कभी पीली रोशनी बाहर आती और फिर अचानक गायब हो जाती।

     

    हवा में चमगादड़ों की फड़फड़ाहट थी।

     

    दूर कहीं सियार रो रहे थे।

     

    और हवेली के सामने खड़े नंदिनी, अमन और हरिदास बाबा के चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।

     

    भाग 1 में गौरी की आत्मा ने उन्हें हवेली के नीचे दफन सच खोजने का संकेत दिया था।

     

    लेकिन किसी को नहीं पता था कि उस हवेली में उनके लिए क्या इंतजार कर रहा था।

     

    अमन ने धीमी आवाज में कहा—

     

    “नंदिनी, हमें वापस चलना चाहिए।”

     

    नंदिनी ने हवेली की ओर देखते हुए कहा—

     

    “अगर हम वापस चले गए तो गौरी की आत्मा कभी शांत नहीं होगी।”

     

    हरिदास बाबा ने गंभीर आवाज में कहा—

     

    “सिर्फ गौरी ही नहीं… शायद इस गाँव में कई आत्माएँ भटक रही हैं।”

     

    अमन ने उनकी तरफ देखा।

     

    “कई आत्माएँ?”

     

    हरिदास ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उन्होंने हवेली का पुराना दरवाजा धक्का देकर खोला।

     

    चर्रररर…

     

    दरवाजा इतनी तेज आवाज के साथ खुला कि तीनों सहम गए।

     

    अंदर घना अंधेरा था।

     

    हरिदास ने लालटेन जलाई।

     

    कमरे में पुराने फर्नीचर पड़े थे।

     

    दीवारों पर जाले लटक रहे थे।

     

    छत से चमगादड़ उल्टे लटके हुए थे।

     

    लेकिन सबसे अजीब बात यह थी कि दीवार पर दर्जनों औरतों के चित्र लगे थे।

     

    हर चित्र के नीचे एक ही शब्द लिखा था—

     

    “डायन।”

     

    नंदिनी धीरे-धीरे एक चित्र के पास गई।

     

    उसने धूल साफ की।

     

    चित्र में एक बूढ़ी औरत थी।

     

    नीचे लिखा था—

     

    “सीता — डायन।”

     

    दूसरे चित्र पर—

     

    “मालती — डायन।”

     

    तीसरे पर—

     

    “कमला — डायन।”

     

    नंदिनी ने घबराकर पूछा—

     

    “ये सब कौन थीं?”

     

    हरिदास ने कहा—

     

    “गाँव की औरतें।”

     

    “लेकिन इन्हें डायन क्यों कहा गया?”

     

    हरिदास चुप रहे।

     

    नंदिनी ने उनकी तरफ देखा।

     

    “बाबा, आप सब जानते हैं।”

     

    हरिदास ने आँखें बंद कर लीं।

     

    “हाँ।”

     

    “तो बताइए।”

     

    हरिदास ने भारी आवाज में कहा—

     

    “तीस साल पहले भैरव सिंह गाँव का सबसे ताकतवर आदमी था। उसके पास जमीन थी, पैसा था और लोग उससे डरते थे।”

     

    “जो कोई उसके खिलाफ बोलता, उसे डायन या तांत्रिक कहकर बदनाम कर दिया जाता।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “लेकिन इससे उसे क्या फायदा होता था?”

     

    “जमीन।”

     

    हरिदास ने दीवार की ओर इशारा किया।

     

    “इनमें से ज्यादातर औरतों के पास जमीन थी। डर फैलाकर उन्हें गाँव से भगाया गया और उनकी जमीन भैरव सिंह ने अपने नाम कर ली।”

     

    नंदिनी की मुट्ठियाँ कस गईं।

     

    “और गौरी?”

     

    हरिदास की आँखें नम हो गईं।

     

    “गौरी ने उसके खिलाफ आवाज उठाई थी।”

     

    तभी ऊपर की मंजिल से किसी चीज के गिरने की आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    तीनों चौंक गए।

     

    अमन ने लालटेन उठाई।

     

    “ऊपर कोई है।”

     

    हरिदास ने तुरंत कहा—

     

    “हमें ऊपर नहीं जाना चाहिए।”

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि जिस रात गौरी गायब हुई थी, वह आखिरी बार इसी हवेली में देखी गई थी।”

     

    तीनों के पैरों के नीचे जैसे जमीन खिसक गई।

     

    नंदिनी ने धीरे से पूछा—

     

    “आपने यह बात पहले क्यों नहीं बताई?”

     

    हरिदास ने कहा—

     

    “क्योंकि मुझे डर था कि सच बाहर आया तो गाँव में फिर खून बह सकता है।”

     

    नंदिनी ने दृढ़ आवाज में कहा—

     

    “सच छिपाने से खून बहना बंद नहीं होता, बाबा।”

     

    तीनों सीढ़ियों की ओर बढ़े।

     

    हर कदम के साथ लकड़ी की सीढ़ियाँ कराह रही थीं।

     

    चीं… चीं… चीं…

     

    ऊपर पहुँचते ही उन्हें एक लंबा गलियारा दिखाई दिया।

     

    गलियारे के अंत में एक बंद कमरा था।

     

    उस दरवाजे पर खून से लिखा था—

     

    “गौरी यहाँ नहीं मरी।”

     

    नंदिनी ने दरवाजा खोला।

     

    कमरे के अंदर एक पुरानी मेज थी।

     

    मेज पर कुछ कागज पड़े थे।

     

    अमन ने एक कागज उठाया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “जिसे दुनिया डायन समझती है, वह असल में गवाह है।”

     

    नंदिनी ने दूसरा कागज उठाया।

     

    उस पर गाँव के कई लोगों के नाम लिखे थे।

     

    कुछ नामों के आगे लाल निशान लगा था।

     

    नंदिनी ने देखा—

     

    हरिदास का नाम भी उनमें था।

     

    लेकिन उसके आगे लिखा था—

     

    “डरा हुआ गवाह।”

     

    हरिदास ने सिर झुका लिया।

     

    “मैंने कहा था ना… मैं सब जानता था।”

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “फिर गौरी को बचाने की कोशिश क्यों नहीं की?”

     

    हरिदास की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “मैं डर गया था।”

     

    अचानक कमरे की खिड़की जोर से खुली।

     

    धड़ाम!

     

    ठंडी हवा अंदर आई।

     

    दीवार पर लगी एक तस्वीर अपने आप गिर गई।

     

    उसके पीछे एक गुप्त दरवाजा दिखाई दिया।

     

    अमन ने कहा—

     

    “यहाँ कुछ छिपा हुआ है।”

     

    नंदिनी ने दरवाजा खोला।

     

    नीचे जाने वाली सीढ़ियाँ दिखाई दीं।

     

    सीढ़ियों के नीचे घना अंधेरा था।

     

    हरिदास ने काँपते हुए कहा—

     

    “यही है…”

     

    “क्या?”

     

    “हवेली का तहखाना।”

     

    तीनों धीरे-धीरे नीचे उतरने लगे।

     

    सीढ़ियाँ खत्म हुईं तो एक बड़ा कमरा सामने था।

     

    कमरे के बीच में लोहे का संदूक रखा था।

     

    संदूक पर पुराने ताले लगे थे।

     

    नंदिनी ने उसे छुआ।

     

    अचानक कमरे में किसी लड़की की हँसी गूँजी।

     

    ही… ही… ही…

     

    अमन पीछे हट गया।

     

    “यह आवाज…”

     

    हरिदास ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “गौरी।”

     

    अचानक संदूक अपने आप खुल गया।

     

    अंदर पुराने कपड़े, कागज और तस्वीरें थीं।

     

    नंदिनी ने तस्वीरें उठाईं।

     

    एक तस्वीर देखकर उसकी साँस रुक गई।

     

    तस्वीर में भैरव सिंह खड़ा था।

     

    उसके साथ गाँव के कई बड़े लोग थे।

     

    और उनके बीच…

     

    गौरी भी थी।

     

    लेकिन गौरी के चेहरे पर डर था।

     

    तस्वीर के पीछे लिखा था—

     

    “आज रात सौदा पूरा होगा।”

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “कौन-सा सौदा?”

     

    हरिदास ने सिर हिलाया।

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    अमन ने संदूक के नीचे से एक और कागज निकाला।

     

    वह जमीन का नक्शा था।

     

    नक्शे पर हवेली, बरगद का पेड़ और गाँव के आसपास की जमीन दिखाई गई थी।

     

    लाल निशान एक खास जगह पर था।

     

    अमन ने कहा—

     

    “यह जगह कहाँ है?”

     

    हरिदास ने नक्शा देखते ही कहा—

     

    “पुराना कुआँ।”

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “वही कुआँ जहाँ गौरी गायब हुई थी?”

     

    हरिदास ने सिर हिलाया।

     

    तभी पीछे से आवाज आई—

     

    “वह वहाँ नहीं मरी थी।”

     

    तीनों ने एक साथ पीछे देखा।

     

    कमरे के कोने में एक सफेद साया खड़ा था।

     

    लंबे बाल।

     

    झुका हुआ सिर।

     

    और धीरे-धीरे ऊपर उठता हुआ चेहरा।

     

    गौरी।

     

    अमन ने डरकर आँखें बंद कर लीं।

     

    नंदिनी वहीं खड़ी रही।

     

    उसने पूछा—

     

    “अगर तुम नहीं मरी थीं… तो तुम्हारे साथ क्या हुआ?”

     

    गौरी ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसने बस अपना हाथ उठाया।

     

    और दीवार की तरफ इशारा किया।

     

    दीवार पर अचानक दरार पड़ गई।

     

    चर्ररर…

     

    फिर ईंटें गिरने लगीं।

     

    उनके पीछे एक छोटा कमरा दिखाई दिया।

     

    कमरे के अंदर एक पुराना लकड़ी का बक्सा था।

     

    नंदिनी ने बक्सा खोला।

     

    उसमें एक डायरी थी।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “यह मेरी आखिरी गवाही है।”

     

    नंदिनी ने पढ़ना शुरू किया।

     

    डायरी गौरी की थी।

     

    उसमें लिखा था कि जिस रात गाँव वालों ने उसे डायन कहकर पकड़ने की कोशिश की, वह भागकर हवेली पहुँची थी।

     

    वह भैरव सिंह से मदद माँगने आई थी।

     

    लेकिन भैरव सिंह ने उसकी मदद करने के बजाय उसे कैद कर लिया।

     

    गौरी ने वहाँ एक ऐसा राज देखा था, जिसके बारे में किसी को पता नहीं था।

     

    भैरव सिंह अकेला नहीं था।

     

    गाँव के कुछ बड़े लोग उसके साथ मिलकर लोगों की जमीन हड़पते थे।

     

    जो विरोध करता, उसके बारे में अफवाह फैलाई जाती कि वह डायन के जादू से गाँव को नुकसान पहुँचा रहा है।

     

    लेकिन डायरी का आखिरी हिस्सा सबसे ज्यादा डरावना था।

     

    गौरी ने लिखा था—

     

    “मैंने उन्हें एक ऐसी चीज करते देखा है, जिसे देखने के बाद शायद मुझे जिंदा नहीं छोड़ेंगे।”

     

    इसके आगे के पन्ने फटे हुए थे।

     

    नंदिनी ने कहा—

     

    “बाकी पन्ने कहाँ हैं?”

     

    तभी तहखाने में किसी आदमी की आवाज गूँजी—

     

    “तुम्हें बाकी पन्ने नहीं मिलेंगे।”

     

    तीनों पीछे मुड़े।

     

    सीढ़ियों के पास एक आदमी खड़ा था।

     

    वह गाँव का वर्तमान जमींदार वीरेंद्र सिंह था।

     

    भैरव सिंह का पोता।

     

    अमन ने गुस्से में कहा—

     

    “तुम यहाँ क्या कर रहे हो?”

     

    वीरेंद्र मुस्कुराया।

     

    “उस सच को बचाने आया हूँ जिसे मेरे परिवार ने तीस साल से छिपा रखा है।”

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “तुम्हें गौरी के बारे में सब पता है?”

     

    वीरेंद्र ने कहा—

     

    “मुझसे ज्यादा किसी को नहीं।”

     

    हरिदास ने काँपते हुए पूछा—

     

    “तुम्हारे दादा ने गौरी को कहाँ रखा था?”

     

    वीरेंद्र की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “तहखाने में।”

     

    नंदिनी ने कहा—

     

    “क्या उन्होंने उसे मार दिया?”

     

    वीरेंद्र ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    तीनों चौंक गए।

     

    “तो फिर?”

     

    वीरेंद्र ने कहा—

     

    “गौरी उस रात भाग गई थी।”

     

    “कहाँ?”

     

    वीरेंद्र ने बरगद के पेड़ की ओर इशारा किया।

     

    “लेकिन उसके बाद जो हुआ… वह मेरे परिवार के लिए भी रहस्य बन गया।”

     

    तभी तहखाने की दीवारों से धीमी-धीमी खरोंचने की आवाज आने लगी।

     

    खर्र… खर्र… खर्र…

     

    अमन ने चारों तरफ देखा।

     

    “ये आवाज कहाँ से आ रही है?”

     

    वीरेंद्र अचानक डर गया।

     

    “यह संभव नहीं…”

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    वीरेंद्र ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “यह आवाज… तब आती है जब वह जागती है।”

     

    “कौन?”

     

    वीरेंद्र ने जवाब नहीं दिया।

     

    अचानक तहखाने की सारी लालटेन बुझ गईं।

     

    पूर्ण अंधकार।

     

    फिर किसी ने नंदिनी का हाथ पकड़ लिया।

     

    वह चीख पड़ी।

     

    “अमन!”

     

    “मैं यहाँ हूँ!”

     

    “तो फिर मेरा हाथ किसने पकड़ा?”

     

    अमन ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    नंदिनी ने नीचे देखा।

     

    उसकी कलाई पर पाँच काली उँगलियों के निशान थे।

     

    तभी अंधेरे में एक और आवाज गूँजी।

     

    लेकिन इस बार आवाज गौरी की नहीं थी।

     

    वह किसी बूढ़ी औरत की आवाज थी।

     

    “गौरी को मैंने नहीं मारा…”

     

    हरिदास काँपने लगे।

     

    आवाज फिर आई—

     

    “उसे मैंने बनाया…”

     

    अचानक दीवार पर एक चेहरा उभर आया।

     

    वह चेहरा किसी बूढ़ी औरत का था।

     

    उसकी आँखें लाल थीं।

     

    और माथे पर गहरा काला निशान था।

     

    वीरेंद्र चीख पड़ा—

     

    “नहीं! यह नहीं हो सकता!”

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “तुम इसे जानते हो?”

     

    वीरेंद्र पीछे हटने लगा।

     

    “मेरी दादी…”

     

    हरिदास ने भयभीत होकर कहा—

     

    “रुक जाओ…”

     

    लेकिन बहुत देर हो चुकी थी।

     

    दीवार पर वह चेहरा मुस्कुराया।

     

    और बोला—

     

    “जिसे तुम गौरी की आत्मा समझते रहे… वह गौरी नहीं थी।”

     

    तभी तहखाने का दरवाजा जोर से बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    कमरे में भयंकर ठंड फैल गई।

     

    और दीवार पर धीरे-धीरे एक नया नाम उभर आया—

     

    “नंदिनी।”

     

    नंदिनी पीछे हट गई।

     

    उसके सामने अंधेरे में दो लाल आँखें चमक रही थीं।

     

    फिर एक फुसफुसाहट सुनाई दी—

     

    “अब तुम्हारी बारी है…”

     

    अचानक जमीन फट गई।

     

    नंदिनी नीचे गिरने लगी।

     

    अमन ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    लेकिन नीचे से किसी अदृश्य शक्ति ने नंदिनी को खींचना शुरू कर दिया।

     

    “अमन! मुझे बचाओ!”

     

    अमन पूरी ताकत लगा रहा था।

     

    हरिदास मंत्र पढ़ने लगे।

     

    वीरेंद्र दीवार से चिपककर खड़ा था।

     

    और तभी…

     

    गौरी की आत्मा अचानक प्रकट हुई।

     

    उसने नंदिनी की ओर हाथ बढ़ाया।

     

    एक तेज प्रकाश फैला।

     

    नंदिनी ऊपर खिंच आई।

     

    लेकिन गौरी का चेहरा अब शांत नहीं था।

     

    वह पहली बार डरती हुई दिखाई दे रही थी।

     

    उसने नंदिनी की तरफ देखा और कहा—

     

    “वह जाग चुकी है…”

     

    नंदिनी ने काँपते हुए पूछा—

     

    “कौन?”

     

    गौरी ने हवेली के नीचे अंधेरे की तरफ देखा।

     

    फिर बोली—

     

    “जिसने मुझे डायन बनाया था।”

     

    अगले ही पल हवेली की पूरी जमीन हिलने लगी।

     

    दीवारों से चीखें निकलने लगीं।

     

    सैकड़ों औरतों की आवाजें एक साथ सुनाई दीं—

     

    “हमें न्याय चाहिए…”

     

    और हवेली की सबसे ऊपरी खिड़की में एक बूढ़ी औरत खड़ी दिखाई दी।

     

    उसकी आँखें लाल थीं।

     

    उसके बाल हवा में उड़ रहे थे।

     

    और उसके चेहरे पर ऐसी मुस्कान थी जिसे देखकर वीरेंद्र घुटनों के बल गिर पड़ा।

     

    उसने काँपते हुए कहा—

     

    “दादी…”

     

    बूढ़ी औरत ने नीचे देखा।

     

    और धीरे से बोली—

     

    “तीस साल पहले मैंने एक डायन बनाई थी… अब मैं पूरे गाँव को अपना घर बनाऊँगी।”

     

    अचानक पूरी हवेली अंधेरे में डूब गई।

     

    और उसी अंधेरे में नंदिनी ने एक बात समझ ली—

     

    गौरी से डरना शायद सबसे बड़ी भूल थी।

     

    क्योंकि असली डरावनी शक्ति अभी तक छिपी हुई थी।

     

    और अब वह जाग चुकी थी।

     

    जारी रहेगा…

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • बहु बनी डायन 😱 भाग 1 — वह रात जब डायन लौटी 😱

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

     

    रात के लगभग बारह बज चुके थे।आसमान में चाँद तो था, लेकिन उसके चारों ओर इतने घने बादल छाए थे कि उसकी रोशनी जमीन तक पहुँचने के लिए संघर्ष कर रही थी। पूरे गाँव पर अजीब-सी खामोशी पसरी हुई थी।

     

    गाँव का नाम था भैरवपुर।

     

    छोटा-सा गाँव था, लेकिन पिछले कुछ महीनों से वहाँ एक ऐसी दहशत फैल चुकी थी, जिसने लोगों को रात में अपने ही घरों में कैद कर दिया था।

     

    लोग कहते थे कि गाँव के बाहर पुराने बरगद के पेड़ के नीचे एक डायन रहती है।

     

    किसी ने उसे सफेद कपड़ों में देखा था।

     

    किसी ने उसके लंबे बाल देखे थे।

     

    किसी ने दावा किया था कि आधी रात को वह पेड़ के नीचे बैठकर किसी बच्चे की तरह रोती है।

     

    और कुछ लोगों का कहना था कि जिसने भी उसकी आँखों में देख लिया, उसकी मौत निश्चित है।

     

    लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी कि पिछले एक महीने में गाँव के तीन लोग रहस्यमय तरीके से गायब हो चुके थे।

     

    उनमें से पहला था रामलाल।

     

    दूसरी थी जमुना।

     

    और तीसरा था गाँव का चौकीदार हरिया।

     

    तीनों के घरों के बाहर सुबह सिर्फ एक चीज मिलती थी—

     

    काले राख जैसे पैरों के निशान।

     

    हरिया के गायब होने के बाद गाँव के मुखिया ने घोषणा कर दी थी—

     

    “आज से सूरज ढलने के बाद कोई भी घर से बाहर नहीं निकलेगा।”

     

    लेकिन उस रात एक लड़की घर से निकल चुकी थी।

     

    उसका नाम था नंदिनी।

     

    नंदिनी शहर से अपने गाँव आई थी। वह पढ़ी-लिखी और समझदार लड़की थी। वह भूत-प्रेत और डायन जैसी बातों पर बिल्कुल विश्वास नहीं करती थी।

     

    उसके पिता की मृत्यु के बाद उसकी माँ गाँव में अकेली रहती थी, इसलिए नंदिनी कुछ दिनों के लिए गाँव आई थी।

     

    उस रात अचानक उसकी माँ की तबीयत खराब हो गई।

     

    दवा घर में नहीं थी।

     

    नंदिनी ने घड़ी देखी।

     

    बारह बजकर पाँच मिनट।

     

    उसकी माँ ने कमजोर आवाज़ में कहा—

     

    “बेटी… सुबह तक रुक जा।”

     

    नंदिनी ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “माँ, डरने की जरूरत नहीं है। मैं अभी दवा लेकर आती हूँ।”

     

    माँ ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “बाहर मत जाना।”

     

    “क्यों?”

     

    माँ की आँखें डर से फैल गईं।

     

    “वह आज रात फिर निकली है।”

     

    नंदिनी कुछ पल चुप रही।

     

    फिर बोली—

     

    “माँ, कोई डायन नहीं है। गाँव वालों ने अफवाह फैला रखी है।”

     

    माँ ने सिर हिलाया।

     

    “काश तू सही होती…”

     

    नंदिनी ने लालटेन उठाई और घर से बाहर निकल गई।

     

    गली में कदम रखते ही उसे लगा जैसे पूरा गाँव उसे देख रहा हो।

     

    हर घर का दरवाजा बंद था।

     

    खिड़कियाँ बंद थीं।

     

    कहीं कोई आवाज नहीं थी।

     

    बस दूर कहीं कुत्ते के रोने की आवाज आ रही थी।

     

    हूँऽऽऽ… हूँऽऽऽ…

     

    नंदिनी तेज कदमों से आगे बढ़ने लगी।

     

    तभी उसे अपने पीछे किसी के चलने की आवाज सुनाई दी।

     

    छप… छप… छप…

     

    वह रुक गई।

     

    आवाज भी रुक गई।

     

    उसने पीछे देखा।

     

    सड़क खाली थी।

     

    नंदिनी ने खुद को समझाया—

     

    “शायद मेरा भ्रम है।”

     

    वह फिर आगे बढ़ी।

     

    कुछ कदम बाद वही आवाज फिर सुनाई दी।

     

    छप… छप… छप…

     

    इस बार आवाज बिल्कुल उसके पीछे थी।

     

    नंदिनी ने अचानक मुड़कर देखा।

     

    एक सफेद कपड़े पहने औरत सड़क के बीच खड़ी थी।

     

    उसके बाल चेहरे पर लटक रहे थे।

     

    चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    नंदिनी का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

     

    उसने कांपती आवाज में पूछा—

     

    “कौन हो तुम?”

     

    औरत ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    नंदिनी ने लालटेन ऊपर उठाई।

     

    अचानक हवा का तेज झोंका आया।

     

    लालटेन बुझ गई।

     

    अंधेरे में एक धीमी आवाज गूँजी—

     

    “नंदिनी…”

     

    नंदिनी के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “तुम मेरा नाम कैसे जानती हो?”

     

    औरत धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ने लगी।

     

    नंदिनी पीछे हटने लगी।

     

    फिर औरत ने अपना सिर उठाया।

     

    उसका चेहरा देखकर नंदिनी की चीख निकल गई।

     

    चेहरा सफेद था।

     

    आँखें बिल्कुल काली।

     

    और होंठों पर एक अजीब मुस्कान।

     

    वह औरत फुसफुसाई—

     

    “तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था…”

     

    नंदिनी भागने के लिए मुड़ी।

     

    लेकिन तभी उसके सामने कोई आकर खड़ा हो गया।

     

    वह उसका बचपन का दोस्त अमन था।

     

    अमन ने नंदिनी का हाथ पकड़ लिया।

     

    “भागो!”

     

    दोनों पूरी ताकत से दौड़ने लगे।

     

    पीछे से उस औरत की हँसी सुनाई दे रही थी।

     

    हा… हा… हा…

     

    दोनों दौड़ते हुए पुराने मंदिर तक पहुँचे।

     

    अमन ने मंदिर का दरवाजा बंद कर दिया।

     

    कुछ पल बाद बाहर किसी के पैरों की आवाज सुनाई दी।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    नंदिनी की साँसें तेज चल रही थीं।

     

    अमन ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “वह यहाँ तक आ गई है।”

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “तुमने उसे पहले भी देखा है?”

     

    अमन ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “कब?”

     

    “तीन दिन पहले।”

     

    “फिर तुमने किसी को बताया क्यों नहीं?”

     

    अमन कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर उसने कहा—

     

    “क्योंकि उस रात मैंने उसके पीछे जाकर जो देखा था… उसके बाद से मुझे डर लगता है।”

     

    “क्या देखा?”

     

    अमन ने मंदिर के फर्श की तरफ देखा।

     

    “वह किसी इंसान की तरह चल रही थी।”

     

    नंदिनी ने कहा—

     

    “तो?”

     

    अमन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “लेकिन उसके पैर उल्टी दिशा में थे।”

     

    नंदिनी के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    अचानक मंदिर के बाहर से एक आवाज आई—

     

    “अमन…”

     

    अमन काँप गया।

     

    आवाज उसकी माँ की थी।

     

    “बेटा… दरवाजा खोलो…”

     

    अमन दरवाजे की ओर बढ़ने लगा।

     

    नंदिनी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “रुको!”

     

    “मेरी माँ बाहर है!”

     

    “नहीं।”

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    नंदिनी ने कहा—

     

    “क्योंकि तुम्हारी माँ तो पाँच साल पहले मर चुकी हैं।”

     

    अमन का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    बाहर की आवाज अचानक बदल गई।

     

    अब वह किसी बूढ़ी औरत की आवाज थी।

     

    “बहुत समझदार बनते हो…”

     

    मंदिर का दरवाजा जोर-जोर से हिलने लगा।

     

    धड़ाम! धड़ाम! धड़ाम!

     

    नंदिनी और अमन पीछे हट गए।

     

    फिर अचानक सब शांत हो गया।

     

    लगभग पाँच मिनट तक कोई आवाज नहीं आई।

     

    अमन ने धीरे से कहा—

     

    “शायद वह चली गई।”

     

    नंदिनी ने दरवाजे के पास जाकर बाहर झाँका।

     

    वहाँ कोई नहीं था।

     

    लेकिन जमीन पर कुछ लिखा हुआ था।

     

    राख से।

     

    नंदिनी नीचे बैठी और पढ़ने लगी।

     

    वहाँ लिखा था—

     

    “पहला नाम मिल गया।”

     

    नंदिनी के हाथ काँपने लगे।

     

    “पहला नाम?”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “किसका?”

     

    नंदिनी ने जवाब नहीं दिया।

     

    उसी समय मंदिर के पीछे से घंटी बजने लगी।

     

    टन… टन… टन…

     

    दोनों पीछे मुड़े।

     

    मंदिर में कोई नहीं था।

     

    फिर भी घंटी लगातार बज रही थी।

     

    अमन ने कहा—

     

    “हमें यहाँ से निकलना होगा।”

     

    दोनों मंदिर से बाहर आए।

     

    सड़क पर पहुँचते ही उन्हें गाँव का बूढ़ा पुजारी हरिदास बाबा दिखाई दिया।

     

    उसने दोनों को देखते ही कहा—

     

    “तुम लोग उसके सामने आ गए?”

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “किसके?”

     

    हरिदास ने बरगद की तरफ देखा।

     

    “गौरी के।”

     

    नंदिनी ने पहली बार वह नाम सुना था।

     

    “गौरी कौन?”

     

    हरिदास ने गहरी साँस ली।

     

    “जिसे इस गाँव ने डायन कहा था।”

     

    अमन ने घबराकर पूछा—

     

    “क्या वह सच में डायन थी?”

     

    हरिदास ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

     

    “नहीं।”

     

    दोनों चौंक गए।

     

    “तो फिर?”

     

    हरिदास ने कहा—

     

    “वह एक निर्दोष लड़की थी।”

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “फिर उसे डायन क्यों कहा गया?”

     

    हरिदास कुछ कहने ही वाला था कि अचानक बरगद के पेड़ की तरफ से किसी लड़की के रोने की आवाज आई।

     

    “मुझे बचा लो…”

     

    हरिदास का चेहरा बदल गया।

     

    उसने तुरंत दोनों से कहा—

     

    “मेरे साथ चलो।”

     

    तीनों मंदिर के अंदर वापस चले गए।

     

    हरिदास ने दरवाजा बंद किया।

     

    फिर उसने मंदिर के पुराने संदूक से एक कपड़े में लिपटी डायरी निकाली।

     

    “इसमें गौरी की कहानी है।”

     

    नंदिनी ने डायरी हाथ में ली।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “अगर कभी मेरा नाम डायन के रूप में लिया जाए, तो यह डायरी सच बताएगी।”

     

    नंदिनी ने पढ़ना शुरू किया।

     

    डायरी लगभग तीस वर्ष पुरानी थी।

     

    गौरी गाँव की सबसे गरीब लड़की थी।

     

    उसकी माँ जड़ी-बूटियों से लोगों का इलाज करती थी।

     

    गौरी ने भी अपनी माँ से वही विद्या सीखी थी।

     

    गाँव के लोग बीमार पड़ते तो गौरी उनकी मदद करती।

     

    लेकिन एक दिन गाँव में अचानक कई लोग बीमार पड़ने लगे।

     

    बच्चों को तेज बुखार आने लगा।

     

    जानवर मरने लगे।

     

    लोग डर गए।

     

    तभी गाँव के जमींदार भैरव सिंह ने कहा—

     

    “यह किसी डायन का काम है।”

     

    और उसने गौरी पर आरोप लगा दिया।

     

    गौरी ने बहुत समझाया।

     

    “मैंने किसी का बुरा नहीं किया।”

     

    लेकिन कोई उसकी बात सुनने को तैयार नहीं था।

     

    एक रात गाँव वालों की भीड़ उसके घर पहुँच गई।

     

    उन्होंने उसके घर में आग लगा दी।

     

    गौरी भागी।

     

    वह बरगद के पेड़ तक पहुँची।

     

    लेकिन वहाँ जमींदार के आदमी पहले से मौजूद थे।

     

    गौरी को पकड़ लिया गया।

     

    और उसी रात…

     

    वह गायब हो गई।

     

    डायरी यहीं खत्म हो गई थी।

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “आगे क्या हुआ?”

     

    हरिदास ने कहा—

     

    “यही तो रहस्य है।”

     

    “गौरी की लाश कभी नहीं मिली।”

     

    “लेकिन उसके बाद गाँव में एक-एक करके लोगों की मौत होने लगी।”

     

    अमन ने धीरे से पूछा—

     

    “क्या गौरी बदला लेने वापस आई?”

     

    हरिदास ने उसकी तरफ देखा।

     

    “शायद।”

     

    अचानक मंदिर की दीवार पर लगी घंटी अपने आप हिलने लगी।

     

    फिर एक काली परछाईं दीवार पर दिखाई दी।

     

    तीनों ने उस परछाईं को देखा।

     

    वह धीरे-धीरे बड़ी होती जा रही थी।

     

    फिर एक आवाज आई—

     

    “मुझे डायन बनाने वालों को… मैं कभी नहीं भूलूँगी…”

     

    दीवार पर खून जैसे लाल रंग से एक नाम उभर आया।

     

    भैरव सिंह।

     

    हरिदास के हाथ से डायरी गिर गई।

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “लेकिन भैरव सिंह तो तीस साल पहले मर चुका है।”

     

    हरिदास ने काँपते हुए कहा—

     

    “हाँ…”

     

    तभी परछाईं ने धीरे से दूसरा नाम लिखा।

     

    हरिदास।

     

    हरिदास पीछे हट गया।

     

    “नहीं…”

     

    नंदिनी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “बाबा, आपने क्या किया था?”

     

    हरिदास की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “मैंने…”

     

    वह कुछ बोल नहीं पाया।

     

    फिर मंदिर के बाहर किसी के चलने की आवाज आई।

     

    छप… छप… छप…

     

    तीनों ने दरवाजे की तरफ देखा।

     

    दरवाजे के नीचे से पानी अंदर आने लगा।

     

    लेकिन वह पानी नहीं था।

     

    वह काला था।

     

    और उसमें छोटे-छोटे लाल अक्षर तैर रहे थे।

     

    “सच बताओ…”

     

    हरिदास घुटनों के बल बैठ गया।

     

    “मैंने उसे नहीं मारा था…”

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “तो फिर आपने क्या किया?”

     

    हरिदास ने सिर झुका लिया।

     

    “मैंने देखा था।”

     

    “क्या?”

     

    “उस रात मैंने गौरी को भागते देखा था।”

     

    “और?”

     

    “मैं उसे बचा सकता था।”

     

    “फिर बचाया क्यों नहीं?”

     

    हरिदास की आवाज टूट गई।

     

    “क्योंकि मैं डर गया था।”

     

    मंदिर के अंदर अचानक तेज हवा चली।

     

    दीपक बुझ गए।

     

    पूर्ण अंधकार छा गया।

     

    और अंधेरे में एक लड़की की आवाज गूँजी—

     

    “डरने वाले भी दोषी होते हैं…”

     

    नंदिनी ने महसूस किया कि किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा है।

     

    उसने धीरे-धीरे पीछे देखा।

     

    वहाँ कोई नहीं था।

     

    लेकिन उसके कान के बिल्कुल पास किसी ने फुसफुसाया—

     

    “अब दूसरा नाम तुम्हारा है…”

     

    नंदिनी चीख पड़ी।

     

    और उसी क्षण मंदिर की सारी घंटियाँ एक साथ बज उठीं।

     

    टन… टन… टन… टन…

     

    दूर बरगद के पेड़ पर एक सफेद आकृति दिखाई दी।

     

    वह हवा में खड़ी थी।

     

    उसके बाल हवा में उड़ रहे थे।

     

    और उसके चेहरे पर एक भयानक मुस्कान थी।

     

    गौरी की आत्मा ने नंदिनी की तरफ देखा।

     

    फिर उसने अपना हाथ उठाकर गाँव के पुराने हवेली की ओर इशारा किया।

     

    और अचानक उसकी आवाज पूरे गाँव में गूँज उठी—

     

    “सच… उस हवेली के नीचे दफन है…”

     

    अगले ही पल वह गायब हो गई।

     

    नंदिनी ने अमन की तरफ देखा।

     

    अमन ने काँपते हुए पूछा—

     

    “अब?”

     

    नंदिनी ने हवेली की तरफ देखा।

     

    “अब हमें वहाँ जाना होगा।”

     

    लेकिन वे दोनों नहीं जानते थे कि उस हवेली के नीचे सिर्फ गौरी का राज नहीं दफन था।

     

    वहाँ ऐसा सच छिपा था…

     

    जिसे सामने आने के बाद पूरे गाँव की नींव हिलने वाली थी।

     

    और सबसे बड़ा सवाल अभी बाकी था—

     

    अगर गौरी निर्दोष थी, तो असली डायन कौन थी?

     

    जारी रहेगा…

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 😱 आत्मा का घर 😱 (A Complete Horror Story)

    पढ़ने का समय : 11 मिनट

     

     

    रात के ठीक बारह बजकर तेरह मिनट हुए थे।गाँव के आखिरी छोर पर खड़ा वह पुराना मकान अँधेरे में किसी मरे हुए जानवर की तरह दिखाई दे रहा था। उसकी टूटी हुई खिड़कियों से आती हवा ऐसी आवाज़ कर रही थी, जैसे कोई अंदर बैठकर धीरे-धीरे रो रहा हो।

     

    गाँव वाले उसे “आत्मा का घर” कहते थे।

     

    कहा जाता था कि उस घर में जो भी रात बिताता है, सुबह तक उसकी आँखों में डर नहीं, बल्कि मौत उतर आती है।

     

    पिछले चालीस वर्षों से उस घर का दरवाज़ा बंद था।

     

    लेकिन उस रात…

     

    दरवाज़ा अपने आप खुला।

     

    चर्ररर…

     

    अंदर से ठंडी हवा का एक झोंका निकला और गाँव की सुनसान सड़क पर खड़े अर्जुन के चेहरे से टकराया।

     

    अर्जुन ने काँपते हुए अपनी घड़ी देखी।

     

    बारह बजकर चौदह मिनट।

     

    उसके पीछे उसका दोस्त निखिल खड़ा था।

     

    “अर्जुन… वापस चलते हैं।”

     

    अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तू डर गया?”

     

    निखिल ने घर की तरफ देखा और धीमी आवाज़ में बोला, “डर नहीं लगा होता तो भी वापस चलने को कहता। इस घर के बारे में जो सुना है, वह मज़ाक नहीं है।”

     

    अर्जुन मुस्कुराया।

     

    “भूत-वूत कुछ नहीं होते। कल तक मैं खुद साबित कर दूँगा कि इस घर का रहस्य सिर्फ एक अफवाह है।”

     

    निखिल ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “और अगर अफवाह नहीं हुई तो?”

     

    अर्जुन ने अपना हाथ छुड़ाया और घर के अंदर कदम रख दिया।

     

    निखिल कुछ पल वहीं खड़ा रहा।

     

    फिर मजबूरी में उसके पीछे चला गया।

     

    जैसे ही दोनों अंदर पहुँचे, दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    दोनों के शरीर में बिजली दौड़ गई।

     

    अर्जुन ने तुरंत पीछे मुड़कर दरवाज़ा खोलने की कोशिश की।

     

    दरवाज़ा नहीं खुला।

     

    “अरे… ये क्या?”

     

    निखिल ने काँपते हुए कहा, “मैंने कहा था ना… हमें नहीं आना चाहिए था।”

     

    अर्जुन ने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई।

     

    घर के अंदर हर तरफ धूल थी। दीवारों पर पुराने चित्र टंगे थे। कुछ चित्रों के चेहरे खरोंच दिए गए थे। कमरे के कोने में टूटी हुई कुर्सियाँ पड़ी थीं।

     

    लेकिन सबसे डरावनी चीज़ थी—

     

    दीवार पर लगी एक बड़ी घड़ी।

     

    उसकी सुइयाँ बारह बजकर तेरह मिनट पर अटकी हुई थीं।

     

    अर्जुन धीरे-धीरे उसके पास गया।

     

    तभी घड़ी चलने लगी।

     

    टक… टक… टक…

     

    निखिल ने पीछे हटते हुए कहा, “अर्जुन…”

     

    अर्जुन ने उसकी बात नहीं सुनी।

     

    घड़ी की सुइयाँ उल्टी दिशा में घूमने लगीं।

     

    फिर अचानक रुक गईं।

     

    बारह बजकर तेरह मिनट।

     

    उसी क्षण ऊपर की मंजिल से किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आई।

     

    हूँ… हूँ… माँ…

     

    दोनों के चेहरे सफेद पड़ गए।

     

    निखिल ने फुसफुसाकर कहा, “यहाँ कोई बच्चा है?”

     

    अर्जुन ने हिम्मत जुटाकर कहा, “शायद कोई जानवर होगा।”

     

    “जानवर ‘माँ’ नहीं बोलते।”

     

    दोनों सीढ़ियों की तरफ बढ़े।

     

    हर कदम के साथ सीढ़ियाँ कराह रही थीं।

     

    चीं… चीं…

     

    ऊपर पहुँचकर उन्हें एक लंबा गलियारा दिखाई दिया।

     

    गलियारे के अंत में एक दरवाज़ा था।

     

    उस दरवाज़े पर लाल रंग से लिखा था—

     

    “जिसे अंदर आना हो, पहले अपना नाम बता।”

     

    अर्जुन ने उसे पढ़कर हँसने की कोशिश की।

     

    “किसी ने मज़ाक में लिखा होगा।”

     

    तभी पीछे से आवाज़ आई—

     

    “अर्जुन…”

     

    अर्जुन जम गया।

     

    आवाज़ बिल्कुल उसकी माँ जैसी थी।

     

    “अर्जुन… बेटा…”

     

    उसकी आँखों में आँसू आ गए।

     

    “माँ?”

     

    निखिल ने उसका कंधा पकड़ लिया।

     

    “रुक!”

     

    आवाज़ फिर आई।

     

    “अर्जुन… इधर आओ…”

     

    अर्जुन आगे बढ़ने ही वाला था कि निखिल ने उसका मुँह दबा दिया।

     

    “तेरी माँ तो गाँव में है ही नहीं। उन्हें गुज़रे पाँच साल हो चुके हैं।”

     

    अर्जुन का शरीर सुन्न हो गया।

     

    आवाज़ अचानक बदल गई।

     

    अब वह किसी बूढ़ी औरत की थी।

     

    “तुम दोनों… यहाँ क्यों आए हो?”

     

    गलियारे की सारी खिड़कियाँ एक साथ खुल गईं।

     

    धड़ाम! धड़ाम! धड़ाम!

     

    हवा के साथ बर्फ जैसी ठंड अंदर भर गई।

     

    और फिर दीवार पर लगे सारे चित्र नीचे गिर गए।

     

    उन चित्रों के पीछे एक और दीवार दिखाई दी।

     

    उस पर सैकड़ों नाम लिखे थे।

     

    अर्जुन ने मोबाइल की रोशनी डाली।

     

    सबसे ऊपर पुराने नाम थे।

     

    फिर नए।

     

    और सबसे नीचे…

     

    उसने अपना नाम देखा।

     

    “अर्जुन — 9 अगस्त 2026”

     

    उसका दिल रुकने जैसा हो गया।

     

    निखिल ने भी नाम देख लिया।

     

    “यह… यह कैसे हो सकता है?”

     

    अर्जुन पीछे हट गया।

     

    “किसी ने हमारा नाम पहले से लिखा है।”

     

    तभी उसके नीचे एक और नाम दिखाई दिया।

     

    “निखिल — 9 अगस्त 2026”

     

    निखिल की चीख निकल गई।

     

    उसी समय गलियारे के अंत वाला दरवाज़ा अपने आप खुल गया।

     

    अंदर एक छोटा-सा कमरा था।

     

    कमरे के बीचोंबीच लकड़ी की एक मेज थी।

     

    मेज पर एक पुरानी डायरी रखी थी।

     

    अर्जुन ने डायरी उठाई।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “मेरा नाम सावित्री है। अगर तुम यह पढ़ रहे हो, तो समझ लो कि घर ने तुम्हें अपना अगला मेहमान चुन लिया है।”

     

    अर्जुन ने अगला पन्ना पलटा।

     

    डायरी लगभग चालीस साल पुरानी थी।

     

    उसमें लिखा था कि इस घर में सावित्री अपने पति और दस साल की बेटी राधा के साथ रहती थी।

     

    एक रात गाँव में भयंकर तूफान आया।

     

    सावित्री का पति शहर गया हुआ था।

     

    राधा घर में अकेली थी।

     

    तभी घर में आग लग गई।

     

    सावित्री ने अपनी बेटी को बचाने की बहुत कोशिश की, लेकिन दोनों घर से बाहर नहीं निकल पाए।

     

    लोगों ने सुबह घर को जलता हुआ पाया।

     

    माँ और बेटी दोनों मर चुके थे।

     

    लेकिन गाँव वालों ने एक अजीब बात देखी।

     

    आग बुझने के बाद भी घर का एक कमरा बिल्कुल सही था।

     

    वही कमरा जिसमें राधा सोती थी।

     

    उस दिन के बाद उस घर से रात में रोने की आवाज़ें आने लगीं।

     

    लोगों ने कहा कि सावित्री की आत्मा अपनी बेटी को खोजती रहती है।

     

    लेकिन डायरी में अगली बात और भी डरावनी थी।

     

    “राधा की आत्मा घर में नहीं थी।”

     

    अर्जुन ने पन्ना पलटा।

     

    सावित्री ने लिखा था कि आग लगने की रात राधा ने घर के तहखाने में किसी को देखा था।

     

    एक अजनबी आदमी।

     

    वह आदमी घर में चोरी करने आया था।

     

    उसने ही गलती से आग लगाई थी।

     

    लेकिन सावित्री ने अपनी बेटी की जान बचाने की कोशिश में उस आदमी का चेहरा देख लिया था।

     

    उस आदमी ने भागने से पहले सावित्री पर हमला किया।

     

    सावित्री मर गई।

     

    राधा भी धुएँ में दम घुटने से मर गई।

     

    लेकिन मरने से पहले सावित्री ने उस आदमी का नाम दीवार पर अपने खून से लिख दिया था।

     

    अर्जुन ने घबराकर पूछा, “उसका नाम क्या था?”

     

    डायरी के अगले पन्ने पर सिर्फ एक शब्द था।

     

    “हरिनारायण।”

     

    निखिल अचानक बोला, “यह नाम तो गाँव के पुराने जमींदार का था।”

     

    अर्जुन ने उसकी ओर देखा।

     

    “था?”

     

    निखिल ने सिर हिलाया।

     

    “वह उसी रात गायब हो गया था।”

     

    अचानक कमरे की बत्ती जैसी कोई चीज़ जल उठी।

     

    कमरे के बीच एक छोटी लड़की खड़ी थी।

     

    सफेद कपड़े।

     

    लंबे काले बाल।

     

    चेहरा झुका हुआ।

     

    निखिल ने अर्जुन का हाथ कसकर पकड़ लिया।

     

    लड़की ने धीरे-धीरे अपना चेहरा ऊपर उठाया।

     

    उसकी आँखें नहीं थीं।

     

    सिर्फ दो काले गड्ढे।

     

    उसने कहा—

     

    “तुम लोग भी उसे ढूँढ़ने आए हो?”

     

    अर्जुन की आवाज़ नहीं निकली।

     

    लड़की ने अपना हाथ उठाया।

     

    उसकी उँगली तहखाने की ओर थी।

     

    “वह नीचे है।”

     

    इतना कहकर वह गायब हो गई।

     

    फिर पूरे घर में एक साथ हँसी गूँजने लगी।

     

    हा… हा… हा… हा…

     

    अर्जुन और निखिल भागते हुए सीढ़ियों से नीचे उतरे।

     

    तहखाने का दरवाज़ा बंद था।

     

    दरवाज़े पर खून से लिखा था—

     

    “सच देखने के लिए आँखें नहीं, हिम्मत चाहिए।”

     

    अर्जुन ने दरवाज़ा खोला।

     

    अंदर घुप्प अँधेरा था।

     

    दोनों नीचे गए।

     

    कुछ दूर चलने के बाद उन्हें लोहे का एक संदूक मिला।

     

    संदूक खोलते ही उसमें पुराने कागज़, कुछ तस्वीरें और एक इंसानी खोपड़ी दिखाई दी।

     

    निखिल पीछे हट गया।

     

    तस्वीरों में हरिनारायण था।

     

    लेकिन आखिरी तस्वीर देखकर अर्जुन के हाथ काँपने लगे।

     

    तस्वीर में हरिनारायण के साथ गाँव के कई सम्मानित लोग खड़े थे।

     

    उनमें अर्जुन के दादा भी थे।

     

    अर्जुन की साँस रुक गई।

     

    तस्वीर के पीछे लिखा था—

     

    “जिसने अपराध देखा और चुप रहा, वह अपराधी से कम दोषी नहीं।”

     

    अर्जुन को अचानक अपने दादा की कही एक बात याद आई।

     

    बचपन में दादा हमेशा कहते थे—

     

    “उस पुराने घर के पास कभी मत जाना।”

     

    अर्जुन समझ गया।

     

    गाँव के लोगों ने सिर्फ डर के कारण उस घटना को दबा दिया था।

     

    हरिनारायण ने अपराध किया था, लेकिन उसे सज़ा नहीं मिली।

     

    और सावित्री की आत्मा चालीस वर्षों से उसी न्याय की प्रतीक्षा कर रही थी।

     

    तभी तहखाने में किसी के कदमों की आवाज़ आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    निखिल ने मोबाइल उठाया।

     

    सामने कोई नहीं था।

     

    फिर आवाज़ पीछे से आई।

     

    दोनों ने मुड़कर देखा।

     

    एक बूढ़ा आदमी खड़ा था।

     

    चेहरा जला हुआ।

     

    आँखें लाल।

     

    वह मुस्कुराया।

     

    “इतने साल बाद कोई मुझे पहचानने आया है…”

     

    अर्जुन समझ गया।

     

    “हरिनारायण!”

     

    बूढ़े ने ज़ोर से हँसते हुए कहा—

     

    “हाँ… वही हरिनारायण।”

     

    उसने हाथ आगे बढ़ाया।

     

    “तुम्हारे दादा ने मुझे बचाया था। बदले में मैंने उन्हें अपनी जमीन का हिस्सा दिया था।”

     

    अर्जुन के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “तुम झूठ बोल रहे हो!”

     

    हरिनारायण ने उसकी तरफ देखकर कहा—

     

    “सच हमेशा सबसे ज्यादा डरावना होता है।”

     

    अचानक सावित्री की चीख पूरे तहखाने में गूँज उठी।

     

    “हरिनारायण!”

     

    बूढ़े का चेहरा विकृत हो गया।

     

    दीवारों से धुआँ निकलने लगा।

     

    चारों तरफ आग की लपटें दिखाई देने लगीं।

     

    हरिनारायण चीखने लगा।

     

    “नहीं! मुझे छोड़ दो!”

     

    एक सफेद साया उसके पीछे दिखाई दिया।

     

    सावित्री।

     

    उसके साथ वही छोटी लड़की राधा भी थी।

     

    सावित्री ने हरिनारायण की ओर देखा और कहा—

     

    “जिस घर को तुमने जलाया था, आज वही घर तुम्हारा न्याय करेगा।”

     

    अगले ही पल हरिनारायण का शरीर राख में बदल गया।

     

    आग अचानक गायब हो गई।

     

    सावित्री ने अर्जुन की तरफ देखा।

     

    उसकी आँखों में अब क्रोध नहीं था।

     

    सिर्फ दुख था।

     

    “सच को दबाने वाले भी दोषी होते हैं।”

     

    अर्जुन की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    “मुझे माफ कर दो।”

     

    सावित्री ने सिर हिलाया।

     

    “तुम्हारा अपराध नहीं था। लेकिन अब तुम्हारे हाथ में एक जिम्मेदारी है।”

     

    “क्या?”

     

    “सच गाँव वालों तक पहुँचाना।”

     

    इतना कहकर सावित्री और राधा धीरे-धीरे धुएँ में विलीन हो गईं।

     

    तहखाने का दरवाज़ा अपने आप खुल गया।

     

    अर्जुन और निखिल बाहर भागे।

     

    सुबह गाँव वालों ने दोनों को घर के बाहर बेहोश पाया।

     

    अर्जुन ने होश में आते ही सबको पुरानी डायरी और तस्वीरें दिखाईं।

     

    गाँव के बुजुर्गों ने जब तस्वीर देखी तो उनके चेहरे उतर गए।

     

    अर्जुन के दादा का सच सामने आ चुका था।

     

    गाँव वालों ने उस पुराने अपराध को स्वीकार किया।

     

    उस दिन के बाद उस घर में कभी रोने की आवाज़ नहीं आई।

     

    कहा जाता है कि उसी रात पहली बार उस घर की टूटी खिड़कियों से ठंडी हवा नहीं, बल्कि चमेली के फूलों की खुशबू आई थी।

     

    कुछ दिनों बाद गाँव वालों ने उस घर को गिराने का फैसला किया।

     

    लेकिन जब मजदूरों ने आखिरी दीवार तोड़ी, तो उसके पीछे एक छोटा-सा कमरा मिला।

     

    कमरे की दीवार पर दो नाम लिखे थे—

     

    सावित्री।

     

    राधा।

     

    और उनके नीचे एक आखिरी वाक्य—

     

    “अब हमारा घर नहीं, हमारी कहानी बची रहे।”

     

    उसके बाद उस जगह पर गाँव वालों ने एक छोटा-सा स्मारक बना दिया।

     

    लोग वहाँ दीपक जलाने लगे।

     

    और अर्जुन हर साल वहाँ जाकर एक बात जरूर कहता—

     

    “भूतों से डरने से पहले अपने कर्मों से डरना सीखो।”

     

    क्योंकि उस रात अर्जुन ने समझ लिया था कि हर डरावनी जगह के पीछे कोई आत्मा नहीं होती।

     

    कभी-कभी वहाँ दबा हुआ सच होता है।

     

    कभी किसी निर्दोष की चीख होती है।

     

    कभी किसी के साथ हुआ अन्याय होता है।

     

    और कभी-कभी…

     

    सबसे डरावना भूत हमारे अपने अपराध और हमारी चुप्पी होती है।

     

    (सीख)

    इस कहानी की सबसे बड़ी सीख यही है कि गलत होते हुए देखकर चुप रहना भी एक तरह का अपराध है।

     

    हमें किसी भी निर्दोष के साथ अन्याय होते देखकर आवाज़ उठानी चाहिए। डर, लालच या अपने स्वार्थ के कारण सच को दबाने से समस्या खत्म नहीं होती; वह और गहरी होती जाती है।

     

    और सबसे जरूरी बात—

     

    डर से भागने वाला इंसान शायद कुछ समय के लिए बच जाए, लेकिन सच से भागने वाला इंसान पूरी जिंदगी अपने भीतर डर लेकर जीता है।

     

    इसलिए अंधविश्वास से नहीं, सत्य से डरिए।

     

    क्योंकि आत्माओं के घर से ज्यादा खतरनाक वह घर होता है, जहाँ सच को दफना दिया जाता है।

     

     

    END

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • इंसानी हैवान

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    इंसानी हैवान

     

    शहर के सबसे अमीर परिवारों में अगर किसी का नाम लिया जाता था, तो सबसे पहले रुद्र प्रताप सिंह का नाम आता था।

     

    करोड़ों की संपत्ति, आलीशान हवेली और शहर में हर जगह उनका दबदबा था। लेकिन उस परिवार का बड़ा बेटा रुद्र लोगों के बीच अपनी दौलत के लिए नहीं, बल्कि अपने अजीब और डरावने व्यवहार के लिए जाना जाता था।

     

    रुद्र अपने घर में भी किसी से बात नहीं करता था।

     

    न पिता से।

     

    न मां से।

     

    न अपने छोटे भाई रोहन से।

     

    कई बार उसकी मां उसके कमरे के बाहर घंटों खड़ी रहती, लेकिन दरवाजा खुलता ही नहीं था।

     

    रोहन की शादी तय हो चुकी थी। घर में खुशी का माहौल था, लेकिन उसके माता-पिता की एक ही चिंता थी।

     

    “रोहन की शादी कैसे हो सकती है?” पिता ने कहा, “जब तक रुद्र की शादी नहीं होगी, लोग क्या कहेंगे?”

     

    मां ने धीमे से कहा, “लेकिन रुद्र को कौन लड़की पसंद करेगी?”

     

    दोनों चुप हो गए।

     

    आखिर पूरे शहर में रुद्र को लोग इंसानी हैवान कहते थे।

     

    उसकी आंखों में हमेशा एक अजीब सी कठोरता रहती थी। किसी से बात करते समय उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं आता था।

     

    फिर एक दिन उसके पिता को एक गरीब परिवार के बारे में पता चला।

     

    उस परिवार की बेटी थी मीरा।

     

    मीरा के पिता पर बहुत कर्ज था और घर की हालत खराब थी। रुद्र के पिता ने उसके परिवार के सामने शादी का प्रस्ताव रखा।

     

    “तुम्हारे सारे कर्ज हम चुका देंगे।”

     

    मीरा के पिता ने मजबूरी में हामी भर दी।

     

    मीरा को जब पता चला तो उसने पूछा, “मुझे किससे शादी करनी है?”

     

    उसकी मां की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “रुद्र से।”

     

    मीरा ने पहली बार उसका नाम सुना था।

     

    शादी हो गई।

     

    लेकिन शादी के बाद दोनों के बीच अजीब सी खामोशी थी।

     

    एक ही घर।

     

    एक ही कमरा।

     

    लेकिन दोनों के बीच जैसे कई दीवारें थीं।

     

    रुद्र रात को कमरे में आता, कुछ देर खिड़की के पास खड़ा रहता और फिर बिना कुछ कहे बाहर चला जाता।

     

    मीरा भी उससे सवाल नहीं करती।

     

    एक रात मीरा ने हिम्मत करके पूछा,

     

    “आप रात में कहां जाते हैं?”

     

    रुद्र अचानक उसकी तरफ मुड़ा।

     

    उसकी आंखों में ऐसी सख्ती थी कि मीरा सहम गई।

     

    “जहां मुझे जाना होता है।”

     

    बस इतना कहकर वह चला गया।

     

    मीरा ने उस रात पहली बार महसूस किया कि उसके पति के भीतर कुछ ऐसा था, जिसे वह किसी से छिपा रहा था।

     

    दिन बीतते गए।

     

    रुद्र का व्यवहार वैसा ही रहा।

     

    लेकिन मीरा ने एक चीज नोटिस की।

     

    हर रात ठीक बारह बजे के बाद रुद्र घर से निकलता था।

     

    और सुबह होने से पहले वापस आ जाता था।

     

    एक रात मीरा की नींद अचानक खुली।

     

    कमरे में रुद्र नहीं था।

     

    दरवाजा खुला हुआ था।

     

    मीरा उठकर बाहर आई।

     

    हवेली में पूरी तरह सन्नाटा था।

     

    तभी उसे दूर से किसी लोहे की चीज के घिसटने जैसी आवाज सुनाई दी।

     

    छन्न… छन्न…

     

    मीरा का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    उसने देखा, रुद्र पीछे के दरवाजे से बाहर जा रहा था।

     

    मीरा ने चुपचाप उसका पीछा करने का फैसला किया।

     

    रुद्र हवेली के पीछे बने पुराने हिस्से की तरफ जा रहा था।

     

    वह जगह सालों से बंद थी।

     

    मीरा एक पेड़ के पीछे छिप गई।

     

    रुद्र ने अपनी जेब से एक पुरानी चाबी निकाली और दीवार में बने छोटे से दरवाजे का ताला खोल दिया।

     

    दरवाजा खुलते ही अंदर से ठंडी हवा का झोंका आया।

     

    रुद्र अंदर चला गया।

     

    मीरा भी कुछ देर बाद डरते-डरते दरवाजे तक पहुंची।

     

    अंदर अंधेरा था।

     

    दीवारों पर नमी थी।

     

    जैसे वह कोई कमरा नहीं बल्कि पुरानी कालकोठरी हो।

     

    मीरा ने धीरे से आगे कदम बढ़ाया।

     

    तभी अंदर से लोहे की आवाज आई।

     

    छन्न…!

     

    मीरा ने सामने देखा और उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    कमरे के बीचोंबीच रुद्र बैठा था।

     

    उसके हाथ और पैर मोटी लोहे की जंजीरों से बंधे हुए थे।

     

    मीरा के मुंह से चीख निकलने ही वाली थी कि उसने अपना मुंह दबा लिया।

     

    “ये… ये क्या है?”

     

    रुद्र ने अचानक सिर उठाया।

     

    उसकी नजर मीरा पर पड़ी।

     

    कुछ सेकंड तक दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    फिर रुद्र ने बेहद धीमी आवाज में कहा,

     

    “तुम यहां क्यों आई?”

     

    मीरा डरते हुए बोली,

     

    “आप खुद को जंजीरों से क्यों बांधते हैं?”

     

    रुद्र ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    मीरा उसके पास जाने लगी।

     

    तभी दीवार के पीछे से किसी के फुसफुसाने की आवाज आई।

     

    “उसे मत खोलना…”

     

    मीरा वहीं रुक गई।

     

    उसने घबराकर चारों तरफ देखा।

     

    “कौन है?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    रुद्र ने जोर से कहा,

     

    “मीरा! यहां से चली जाओ!”

     

    लेकिन तभी कमरे के एक कोने में रखा पुराना आईना अपने आप हिलने लगा।

     

    मीरा की नजर उसमें पड़ी।

     

    आईने में उसे रुद्र दिखाई दे रहा था।

     

    लेकिन उसके पीछे…

     

    एक काली परछाई खड़ी थी।

     

    मीरा ने पलटकर देखा।

     

    वहां कोई नहीं था।

     

    उसने फिर आईने में देखा।

     

    परछाई अब रुद्र के बिल्कुल पीछे थी।

     

    मीरा चीख पड़ी।

     

    रुद्र ने अपनी जंजीर खींचते हुए कहा,

     

    “मत देखो!”

     

    लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।

     

    आईने में परछाई ने धीरे-धीरे अपना चेहरा उठाया।

     

    और मीरा ने देखा…

     

    वह चेहरा रुद्र जैसा ही था।

     

    मीरा पीछे हट गई।

     

    “ये कौन है?”

     

    रुद्र ने आंखें बंद कर लीं।

     

    काफी देर बाद उसने कहा,

     

    “वो मैं हूं।”

     

    मीरा के होश उड़ गए।

     

    “क्या?”

     

    रुद्र ने भारी आवाज में कहा,

     

    “मेरे अंदर कुछ है… जो मुझे खुद भी नहीं पता कि इंसान है या कुछ और।”

     

    मीरा चुप रही।

     

    रुद्र ने आगे कहा,

     

    “जब मैं छोटा था, इस हवेली में एक हादसा हुआ था। उसके बाद से मेरे अंदर ये अजीब बदलाव शुरू हुए। रात होते ही मुझे कुछ याद नहीं रहता। सुबह उठता हूं तो कई बार घर की चीजें टूटी मिलती हैं।”

     

    “तो आप खुद को यहां क्यों बांधते हैं?”

     

    रुद्र ने उसकी तरफ देखा।

     

    “ताकि रात में मैं किसी और को नुकसान न पहुंचा सकूं।”

     

    मीरा की आंखों में डर के साथ अब हैरानी भी थी।

     

    तभी बाहर से दरवाजा जोर से बंद होने की आवाज आई।

    धड़ाम!

    दोनों चौंक गए।

     

    रुद्र ने तुरंत कहा,“मीरा, भागो!”

    “लेकिन आप?”

    “मेरी चिंता मत करो!”

     

    अचानक जंजीरें अपने आप हिलने लगीं।

     

    छन्न… छन्न… छन्न…

    रुद्र का चेहरा बदलने लगा।

     

    उसकी आंखों में अजीब सी चमक आ गई।

     

    मीरा पीछे हट गई।

    रुद्र ने दांत भींचकर कहा,

    “मैंने कहा था… भागो!”

     

    लेकिन मीरा भागी नहीं।

    उसने देखा कि रुद्र जंजीरों को तोड़ने की कोशिश नहीं कर रहा था।

     

    बल्कि उन्हें और कसकर पकड़ रहा था।

    जैसे वह अपने ही शरीर से लड़ रहा हो।

     

    तभी दीवार पर लगी एक पुरानी तस्वीर नीचे गिर गई।

    मीरा ने तस्वीर उठाई।

     

    तस्वीर में रुद्र के पिता, मां और एक छोटा बच्चा खड़े थे।

    लेकिन तस्वीर के पीछे हाथ से कुछ लिखा था।

     

    मीरा ने पढ़ा“रुद्र वह नहीं है जिसे तुम समझ रहे हो।”

    मीरा का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    उसने तस्वीर को पलटा।

    पीछे एक और लाइन थी।

     

    “असली राज हवेली के मालिक के कमरे में छिपा है।”

    मीरा ने धीरे से रुद्र की तरफ देखा।

     

    रुद्र अब बिल्कुल शांत था।

    उसने धीमे से कहा,

     

    “अब तुम्हें सच जानना ही होगा।”

     

    मीरा ने पूछा,“कौन सा सच?”

    रुद्र ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

     

    “जिस दिन तुम इस घर में आई थीं… उसी दिन से तुम्हारी जिंदगी खतरे में थी।”

     

    मीरा के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    रुद्र ने आगे कहा,“और सबसे बड़ा सवाल ये नहीं है कि मैं रात में खुद को जंजीरों से क्यों बांधता हूं…”

     

    वह कुछ पल के लिए रुका।

     

    फिर बोला“सवाल ये है कि हर रात बारह बजे मुझे यहां कौन लाता है?”

    मीरा की नजर दरवाजे पर गई।दरवाजा बाहर से बंद था।

    और तभी बाहर किसी के कदमों की आवाज आने लगी।

    धीरे-धीरे…बहुत धीरे…

    कोई कालकोठरी की तरफ बढ़ रहा था।ठक… ठक… ठक…

    रुद्र ने पहली बार डरकर दरवाजे की तरफ देखा।

    “वो आ गया…”मीरा ने पूछा,

    “कौन?”

    रुद्र ने फुसफुसाकर कहा “मेरे पिता।”

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • Online मिला प्यार

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    ऑनलाइन मिला प्यार

     

    देहरादून की रहने वाली अनाया बहुत शांत स्वभाव की लड़की थी। उसे किताबें पढ़ना, कविताएं लिखना और खाली समय में इंटरनेट पर नई-नई चीजें देखना पसंद था। पढ़ाई और घर की जिम्मेदारियों के बीच उसकी जिंदगी काफी सीधी-सादी चल रही थी।

     

    दूसरी तरफ केरल के एक छोटे से शहर में रहने वाला आरव बिल्कुल अलग स्वभाव का था। वह हमेशा कुछ नया सीखने की कोशिश करता रहता था। पढ़ाई के साथ-साथ उसे फोटोग्राफी और अलग-अलग जगहों के बारे में जानने का बहुत शौक था।

     

    दोनों की मुलाकात इंटरनेट पर एक साहित्यिक ग्रुप में हुई।

     

    अनाया ने एक दिन अपनी लिखी हुई छोटी-सी कविता वहां पोस्ट की थी। उस कविता के नीचे रियाज ने सिर्फ एक लाइन लिखी—

     

    “शब्द कम हैं, लेकिन एहसास बहुत ज्यादा है।”

     

    अनाया ने पहली बार किसी अनजान इंसान की ऐसी बात पढ़ी तो उसे अच्छा लगा। उसने धन्यवाद कहा।

     

    वहीं से दोनों की बातचीत शुरू हुई।

     

    पहले बातें सिर्फ कविताओं और किताबों तक सीमित थीं।

     

    फिर धीरे-धीरे पढ़ाई, परिवार, पसंद-नापसंद और जिंदगी के छोटे-छोटे किस्से भी बातचीत का हिस्सा बन गए।

     

    अनाया को सबसे ज्यादा हैरानी इस बात की होती थी कि केरल में रहने वाला रियाज़ उसकी पहाड़ी जिंदगी को इतनी दिलचस्पी से सुनता था।

     

    एक दिन उसने पूछा, “तुम्हें सच में देहरादून इतना अच्छा लगता है?”

     

    रियाज़ ने जवाब दिया, “मैं वहां कभी गया नहीं हूं, लेकिन तुम्हारी बातें सुनकर लगता है जैसे वहां की बारिश और पहाड़ों को थोड़ा-बहुत समझने लगा हूं।”

     

    अनाया मुस्कुरा दी।

     

    समय बीतता गया।

     

    दोनों को महसूस होने लगा कि उनकी दोस्ती अब सिर्फ दोस्ती नहीं रह गई थी।

     

    लेकिन इसी के साथ मुश्किलें भी शुरू हो गईं।

     

    सबसे पहली परेशानी थी दूरी।

     

    देहरादून और केरल के बीच हजारों किलोमीटर का फासला था।

     

    अनाया की मां अक्सर उससे कहती थीं, “ऑनलाइन मिले लोगों पर इतनी जल्दी भरोसा मत करना। हर इंसान वैसा नहीं होता जैसा वह इंटरनेट पर दिखाई देता है।”

     

    अनाया अपनी मां की बात समझती थी, लेकिन रियाज़ पर उसका भरोसा बढ़ चुका था।

     

    उधर रियाज के परिवार को भी उसकी ऑनलाइन दोस्ती पसंद नहीं थी।

     

    उसके बड़े भाई ने एक दिन साफ कहा, “दूर बैठा कोई इंसान कितना भी अच्छा लगे, असली जिंदगी में उसे समझना आसान नहीं होता।”

     

    रियाज़ चुप रहा।

     

    उसे भी पता था कि उसके भाई की बात पूरी तरह गलत नहीं थी।

     

    फिर एक दिन छोटी-सी बात ने दोनों के बीच बड़ा झगड़ा खड़ा कर दिया।

     

    रियाज़ ने अनाया को संदेश भेजा, लेकिन वह कई घंटे तक जवाब नहीं दे पाई।

     

    वह अपने परिवार के साथ बाहर गई हुई थी।

     

    रियाज़ ने लगातार कुछ संदेश भेजे।

     

    जब अनाया ने रात में फोन देखा तो उसे कई मिस्ड मैसेज मिले।

     

    उसने लिखा, “सॉरी, आज फोन मेरे पास नहीं था।”

     

    रियाज़ ने जवाब दिया, “अगर बात नहीं करनी थी तो सीधे कह देती।”

     

    अनाया को यह बात बुरी लगी।

     

    “हर वक्त फोन मेरे हाथ में नहीं रहता। इसका मतलब ये नहीं कि मैं बात नहीं करना चाहती।”

     

    रियाज़ ने भी गुस्से में लिख दिया, “शायद मैं तुम्हें जितना महत्व देता हूं, तुम मुझे उतना नहीं देती।”

     

    अनाया ने फोन रख दिया।

     

    उस रात दोनों ने एक-दूसरे से बात नहीं की।

     

    अगले दिन आरव ने माफी मांगी।

     

    “मुझे ऐसा नहीं कहना चाहिए था। मैं बस तुम्हें खोने से डर गया था।”

     

    अनाया कुछ देर चुप रही।

     

    फिर उसने कहा, “डर की वजह से अगर हम एक-दूसरे पर शक करने लगें तो ये रिश्ता हमें खुश करने के बजाय परेशान करेगा।”

     

    रियाज ने उसकी बात समझ ली।

     

    दोनों ने तय किया कि आगे से किसी बात को लेकर गलतफहमी होगी तो गुस्से में फैसला नहीं करेंगे।

     

    लेकिन जिंदगी ने उनके लिए अभी और परीक्षाएं रखी थीं।

     

    कुछ समय बाद आरव को पढ़ाई के सिलसिले में दूसरे शहर जाना पड़ा। वहां उसका फोन और इंटरनेट दोनों सीमित हो गए।

     

    अनाया को उसकी कम बातचीत से चिंता होने लगी।

     

    उसी दौरान किसी ने अनाया से कहा कि शायद रियाज अब किसी और से बात करता है।

     

    अनाया ने बिना पूरी बात जाने रियाज से सवाल कर दिया।

     

    “क्या तुम्हारी जिंदगी में कोई और आ गया है?”

     

    रियाज यह पढ़कर हैरान रह गया।

     

    “तुमने मुझ पर इतना भी भरोसा नहीं किया?”

     

    “मैं सिर्फ पूछ रही हूं।”

     

    “नहीं, तुम शक कर रही हो।”

     

    दोनों के बीच फिर बहस हुई।

     

    इस बार बात इतनी बढ़ गई कि रियाज ने कहा, “शायद हमें कुछ समय के लिए दूर रहना चाहिए।”

     

    अनाया का दिल बैठ गया।

     

    उसने सिर्फ इतना लिखा, “अगर तुम्हें यही सही लगता है तो ठीक है।”

     

    फिर दोनों ने बातचीत बंद कर दी।

     

    दिन बीतने लगे।

     

    अनाया बाहर से सामान्य रहने की कोशिश करती, लेकिन उसके मन में लगातार वही बातें चलती रहतीं।

     

    रियाज भी खुश नहीं था।

     

    उसे एहसास हो चुका था कि दूरी सिर्फ किलोमीटर की नहीं थी। उनके बीच गलतफहमियां भी एक दूरी बनती जा रही थीं।

     

    एक शाम रियाज ने अनाया की पुरानी कविता दोबारा पढ़ी।

     

    उस कविता में एक लाइन थी—

     

    “सच्चे रिश्ते रास्ते नहीं ढूंढते, वे रास्ते बनाते हैं।”

     

    रियाज काफी देर तक उस लाइन को देखता रहा।

     

    अगले दिन उसने अनाया को एक लंबा संदेश भेजा।

     

    “हम दोनों अलग जगहों से हैं। हमारी भाषा, परिवार और जिंदगी का तरीका भी अलग है। शायद इसी वजह से हमें एक-दूसरे को समझने में समय लगेगा। लेकिन अगर हर मुश्किल पर हम पीछे हट गए तो फिर हमारी सारी बातें सिर्फ कुछ महीनों की याद बनकर रह जाएंगी। मैं तुमसे कोई वादा नहीं करना चाहता जिसे निभाना मुश्किल हो। बस इतना चाहता हूं कि हम एक-दूसरे को समझने की कोशिश बंद न करें।”

     

    अनाया ने संदेश कई बार पढ़ा।

     

    उसकी आंखों में आंसू थे।

     

    उसने जवाब दिया “मुझे भी डर लगता है। दूरी से, परिवार से और इस बात से कि कहीं हम एक-दूसरे को खो न दें। लेकिन शायद डर की वजह से किसी अच्छे रिश्ते को खत्म कर देना भी सही नहीं होगा।”

     

    उस दिन दोनों ने पहली बार अपने रिश्ते के बारे में गंभीरता से बात की।

     

    उन्होंने तय किया कि जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं करेंगे।

     

    पहले अपनी पढ़ाई पूरी करेंगे, अपने परिवारों का भरोसा जीतेंगे और फिर भविष्य के बारे में सोचेंगे।

     

    कई महीनों बाद आखिरकार वह दिन आया जब दोनों पहली बार आमने-सामने मिलने वाले थे।

     

    रियाज देहरादून आया।

     

    अनाया स्टेशन पर पहुंची तो दोनों कुछ पल एक-दूसरे को देखकर बस मुस्कुराते रहे।

     

    इतने महीनों की बातें सामने खड़ी थीं, लेकिन उस पल दोनों के पास कहने के लिए कोई शब्द नहीं था।

     

    रियाज ने हंसते हुए कहा, “तुम ऑनलाइन से ज्यादा चुप हो।”

     

    अनाया भी मुस्कुरा दी।

     

    “और तुम ऑनलाइन से ज्यादा परेशान करने वाले हो।”

     

    दोनों हंस पड़े।

     

    लेकिन उनकी मुलाकात सिर्फ खुशियों से भरी नहीं थी।

     

    कुछ ही दिनों में दोनों को एहसास हुआ कि ऑनलाइन बातचीत और असली जिंदगी में काफी फर्क होता है।

     

    रियाज को अनाया का परिवार बहुत सख्त लगा।

     

    अनाया को रियाज का हर बात पर तुरंत फैसला लेने वाला स्वभाव पसंद नहीं आया।

     

    एक दिन दोनों के बीच फिर बहस हो गई।

     

    अनाया ने कहा, “शायद हम ऑनलाइन एक-दूसरे को जितना समझते थे, असल जिंदगी में उतना आसान नहीं है।”

     

    रियाज कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर उसने कहा, “शायद प्यार का मतलब ये नहीं कि सामने वाला हमेशा हमारी उम्मीद के मुताबिक हो। शायद प्यार का मतलब है कि उसकी कमियां समझने के बाद भी हम तय करें कि हमें साथ चलना है या नहीं।”

    अनाया ने उसकी तरफ देखा।

    उसे समझ आ गया कि उनका रिश्ता किसी कहानी की तरह आसान नहीं होने वाला था।

    उन्हें दूरी से लड़ना था।

    परिवार की चिंताओं को समझना था।

    गलतफहमियों को संभालना था।

    और सबसे ज्यादा अपने गुस्से और डर पर काबू पाना था।

    जब रियाज वापस केरल जाने लगा तो अनाया उसे छोड़ने आई।

    दोनों जानते थे कि फिर दूरी शुरू होने वाली है।

    रियाज ने कहा, “अबकी बार दूरी से डरना मत।”

    अनाया मुस्कुराई।

    “और तुम भी हर देर से आए जवाब को शक की नजर से मत देखना।”

    “पक्का।”

    ट्रेन चल पड़ी।

    अनाया प्लेटफॉर्म पर खड़ी रही और रियाज दूर होता गया।

    उनकी कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी।

    बल्कि शायद असली कहानी अब शुरू हुई थी।

    क्योंकि उन्हें अब समझ आ चुका था कि ऑनलाइन मिल जाना आसान था, लेकिन एक-दूसरे को समझकर साथ निभाना असली परीक्षा थी।

     

    और देहरादून से केरल के बीच की हजारों किलोमीटर की दूरी के बावजूद, दोनों ने एक बात सीख ली थी—

     

    अगर रिश्ते में भरोसा, सम्मान और समझ हो, तो दूरी सिर्फ रास्ता होती है, मंजिल के बीच की दीवार नहीं।

     

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  • गांव की गलियों में

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    गांव की गलियों में पहला एहसास

     

    काव्या अपने माता-पिता की इकलौती बेटी थी। छोटे से परिवार में उसकी दुनिया बस उसके पापा और मां तक ही सीमित थी। उसके पापा सरकारी नौकरी करते थे और कुछ सालों से शहर में ही पोस्टेड थे। काव्या ने भी अपना बचपन उसी शहर में बिताया था।

     

    शहर की जिंदगी उसे बहुत पसंद थी। सुबह कॉलेज, शाम को अपनी सहेलियों के साथ थोड़ी बातें और रात को पढ़ाई। उसे बेवजह बाहर घूमना बिल्कुल पसंद नहीं था।

     

    लेकिन एक दिन उसके पापा घर लौटे तो उनके चेहरे पर कुछ परेशानी थी।

     

    “क्या हुआ पापा?” काव्या ने पूछा।

     

    पापा ने लंबी सांस लेते हुए कहा, “मेरा ट्रांसफर हो गया है।”

     

    “कहां?”

     

    “एक छोटे से गांव में।”

     

    काव्या कुछ पल चुप रही।

     

    “गांव में? लेकिन पापा… मेरी पढ़ाई?”

     

    “वहीं पास के कॉलेज में तुम्हारा एडमिशन करवा देंगे। बस कुछ साल की ही तो बात है।”

     

    काव्या ने कुछ नहीं कहा, लेकिन उसके चेहरे से साफ पता चल रहा था कि वह खुश नहीं थी।

     

    कुछ दिनों बाद पूरा परिवार उस छोटे से गांव में पहुंच गया।

     

    गांव शहर से बिल्कुल अलग था। यहां शाम होते ही ज्यादातर दुकानें बंद हो जाती थीं। लड़कियां ज्यादा देर तक घर से बाहर रहें तो लोग तरह-तरह की बातें बनाने लगते थे। पढ़ाई से ज्यादा लोगों को इस बात की चिंता रहती थी कि कौन किसके साथ घूम रहा है।

     

    काव्या को यह सब बहुत अजीब लगता था।

     

    एक सुबह वह अपने नए कॉलेज जाने के लिए तैयार हुई।

     

    मां ने उसके बाल ठीक करते हुए कहा, “देख बेटा, यहां का माहौल शहर जैसा नहीं है। संभलकर रहना।”

     

    “हां मां, आप चिंता मत करो।”

     

    काव्या ने अपना बैग उठाया और घर से निकल गई।

     

    कॉलेज गांव से थोड़ी दूर था। रास्ते में मिट्टी की सड़क, दोनों तरफ खेत और जगह-जगह बैठे लड़कों के छोटे-छोटे समूह नजर आते थे।

     

    काव्या ने नजरें नीचे कर लीं और चुपचाप आगे बढ़ती रही।

     

    उसी समय कॉलेज के गेट के पास खड़ा अनुराग अपने दोस्तों के साथ बातें कर रहा था।

     

    अनुराग उसी गांव का रहने वाला था। कॉलेज में उसका नाम तो था, लेकिन पढ़ाई से ज्यादा उसका ध्यान दोस्तों और घूमने-फिरने में रहता था।

     

    तभी उसकी नजर काव्या पर पड़ी।

     

    वह अचानक चुप हो गया।

     

    “क्या हुआ?” उसके दोस्त ने पूछा।

     

    अनुराग ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसकी नजर बस काव्या पर थी।

     

    काव्या बिना किसी को देखे कॉलेज के अंदर चली गई।

     

    अनुराग के दोस्त ने मुस्कुराते हुए कहा, “लगता है भाई को कोई पसंद आ गया।”

     

    अनुराग ने उसे घूरकर देखा।

     

    “चुप कर।”

     

    लेकिन उसके चेहरे की मुस्कान छिप नहीं पाई।

     

    उस दिन के बाद अनुराग की नजर अक्सर काव्या को ढूंढने लगी।

     

    काव्या बिल्कुल शांत स्वभाव की थी। वह कॉलेज आती, अपनी क्लास करती और छुट्टी होते ही घर चली जाती।

     

    न उसे किसी से ज्यादा बात करनी थी और न ही किसी के साथ बेवजह घूमना।

     

    एक दिन काव्या कॉलेज की लाइब्रेरी में बैठी अपनी किताब पढ़ रही थी। तभी उसे महसूस हुआ कि कोई उसे देख रहा है।

     

    उसने नजर उठाई।

     

    दूर अनुराग खड़ा था।

     

    दोनों की नजरें मिलीं।

     

    काव्या तुरंत अपनी किताब में देखने लगी।

     

    अनुराग मुस्कुराकर वहां से चला गया।

     

    काव्या को समझ नहीं आया कि वह लड़का उसे क्यों देख रहा था।

     

    अगले दिन भी वही हुआ।

     

    फिर अगले दिन भी।

     

    आखिर एक दिन काव्या से रहा नहीं गया।

     

    वह कॉलेज की सीढ़ियों से उतर रही थी तभी अनुराग सामने आ गया।

     

    काव्या ने पहली बार सीधे उससे पूछा,

     

    “आप मुझे रोज क्यों देखते हैं?”

     

    अनुराग कुछ पल के लिए चुप हो गया।

     

    “मैं… बस ऐसे ही।”

     

    “ऐसे ही कोई किसी को रोज नहीं देखता।”

     

    अनुराग मुस्कुराया।

     

    “सही कह रही हो।”

     

    “तो फिर?”

     

    “पता नहीं।”

     

    “क्या पता नहीं?”

     

    अनुराग ने धीरे से कहा, “शायद मुझे तुम अच्छी लगती हो।”

     

    काव्या का चेहरा लाल हो गया।

     

    उसने तुरंत नजरें झुका लीं।

     

    “मुझे ऐसी बातें पसंद नहीं हैं।”

     

    इतना कहकर वह वहां से चली गई।

     

    अनुराग उसे जाते हुए देखता रहा।

     

    उस दिन पहली बार उसे महसूस हुआ कि शायद उसकी जिंदगी में किसी के लिए सच में कुछ बदल रहा था।

     

    लेकिन काव्या के लिए बात इतनी आसान नहीं थी।

     

    वह घर लौटकर काफी देर तक सोचती रही।

     

    मां ने पूछा, “क्या हुआ? आज बहुत चुप हो।”

     

    “कुछ नहीं मां।”

     

    “कॉलेज में किसी से झगड़ा हुआ?”

     

    “नहीं।”

     

    काव्या ने मुस्कुराने की कोशिश की।

     

    लेकिन उसके मन में बार-बार वही बात घूम रही थी।

     

    “शायद मुझे तुम अच्छी लगती हो।”

     

    वह खुद से सवाल कर रही थी कि आखिर उसे उस लड़के की बात इतनी याद क्यों आ रही है।

     

    अगले कुछ दिनों तक अनुराग ने काव्या से बात करने की कोशिश नहीं की। वह दूर से उसे देखता, लेकिन उसके पास नहीं जाता।

     

    काव्या ने भी इस बदलाव को महसूस किया।

     

    एक दिन कॉलेज की छुट्टी के बाद अचानक तेज बारिश शुरू हो गई। काव्या कॉलेज के बरामदे में खड़ी होकर बारिश रुकने का इंतजार कर रही थी।

     

    तभी अनुराग वहां आया।

     

    उसके हाथ में छाता था।

     

    “तुम्हें घर जाना है?”

     

    काव्या ने सिर हिलाया।

     

    “बारिश बहुत तेज है।”

     

    अनुराग ने छाता उसकी तरफ बढ़ा दिया।

     

    “तुम ले जाओ।”

     

    “और आप?”

     

    “मैं चला जाऊंगा।”

     

    “लेकिन आपके पास छाता नहीं होगा।”

     

    “मैं भीग जाऊंगा।”

     

    काव्या ने पहली बार हल्की सी मुस्कान दी।

     

    “आप अजीब हैं।”

     

    अनुराग भी मुस्कुरा दिया।

     

    “तुम्हारे लिए शायद।”

     

    काव्या ने छाता लिया और कुछ कदम आगे बढ़ी।

     

    फिर अचानक पीछे मुड़ी।

     

    “धन्यवाद।”

     

    “इतने से धन्यवाद से काम नहीं चलेगा।”

     

    काव्या ने हैरानी से पूछा, “तो क्या चाहिए?”

     

    “बस… कभी मुझसे नाराज मत होना।”

     

    काव्या कुछ नहीं बोली।

     

    बस हल्की सी मुस्कान उसके चेहरे पर आई और वह वहां से चली गई।

     

    उस दिन के बाद दोनों के बीच एक छोटी सी दोस्ती शुरू हो गई।

     

    अनुराग अब काव्या की पढ़ाई में मदद करने लगा। काव्या भी उसे पढ़ाई के लिए समझाती।

     

    “तुम्हें कॉलेज में पढ़ने के लिए भेजा गया है, घूमने के लिए नहीं,” काव्या अक्सर कहती।

     

    अनुराग हंसकर कहता, “अब तुम बोलोगी तो पढ़ना ही पड़ेगा।”

     

    धीरे-धीरे अनुराग बदलने लगा।

     

    जो लड़का पहले कॉलेज से भागने के बहाने ढूंढता था, अब लाइब्रेरी में बैठने लगा।

     

    उसके दोस्तों को यह बदलाव समझ नहीं आ रहा था।

     

    एक दिन उसके दोस्त ने पूछा, “भाई, तू बदल कैसे गया?”

     

    अनुराग ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “किसी को देखकर अच्छा इंसान बनने का मन हो जाए, तो उसे पसंद करना कहते हैं शायद।”

     

    उधर काव्या भी अनुराग को लेकर कुछ महसूस करने लगी थी।

     

    लेकिन उसने अपने मन की बात किसी को नहीं बताई।

     

    उसे डर था कि कहीं उसके पापा को पता चल गया तो?

     

    उसके पापा बहुत सख्त थे। वह अपनी बेटी को लेकर हमेशा चिंतित रहते थे।

     

    एक शाम काव्या कॉलेज से घर लौट रही थी। रास्ते में उसने देखा कि उसके पापा घर के बाहर किसी से बात कर रहे थे।

     

    वह पास पहुंची तो उनके हाथ में एक कागज था।

     

    “क्या हुआ पापा?”

     

    पापा ने उसकी तरफ देखा और बोले,

     

    “कुछ नहीं बेटा। तुम्हारे कॉलेज के बारे में किसी ने शिकायत की है।”

     

    काव्या के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “मेरी?”

     

    “नहीं… बस गांव में कुछ लड़कों के बारे में बातें हो रही थीं। मुझे उम्मीद है तुम किसी परेशानी में नहीं पड़ोगी।”

     

    काव्या चुप रही।

     

    उसे अचानक अनुराग का चेहरा याद आ गया।

     

    उस रात वह अपने कमरे में बैठी बहुत देर तक सोचती रही।

     

    उसे समझ नहीं आ रहा था कि अपने दिल की बात सुने या अपने परिवार का डर।

     

    और उसे यह भी नहीं पता था कि अगले दिन कॉलेज में उसके और अनुराग के बीच ऐसा क्या होने वाला है, जो उनकी इस छोटी सी दोस्ती को हमेशा के लिए बदल देगा।

     

    अगली सुबह काव्या कॉलेज पहुंची तो उसका मन बिल्कुल ठीक नहीं था। पिछली रात पापा की बात उसके दिमाग में घूमती रही थी।

     

    कॉलेज के गेट पर अनुराग उसे देखते ही पास आया।

     

    “क्या हुआ? तुम इतनी परेशान क्यों हो?”

     

    काव्या ने धीरे से कहा, “पापा को हमारे बारे में पता चल गया है।”

     

    अनुराग का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    “क्या कहा उन्होंने?”

     

    “बस इतना कहा कि गांव में बातें हो रही हैं। उन्होंने मुझसे पूछा कि मैं किसी परेशानी में तो नहीं हूं।”

     

    अनुराग कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर बोला, “काव्या, अगर मेरी वजह से तुम्हें कोई परेशानी हो रही है तो मैं तुमसे दूर हो जाऊंगा।”

     

    काव्या ने तुरंत उसकी तरफ देखा।

     

    “नहीं अनुराग, बात इतनी भी बड़ी नहीं है।”

     

    “लेकिन तुम्हारे पापा तुम्हें लेकर परेशान हैं। मैं नहीं चाहता कि मेरी वजह से तुम्हारी पढ़ाई खराब हो।”

     

    काव्या कुछ नहीं बोली।

     

    तभी कॉलेज के कुछ लड़के वहां से गुजरते हुए दोनों को देखकर हंसने लगे।

     

    “देखो, शहर से आई मैडम और गांव का अनुराग।”

     

    काव्या ने नजरें झुका लीं।

     

    अनुराग को गुस्सा आया, लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उस दिन से उसने काव्या से दूरी बनानी शुरू कर दी। न वह उससे बात करता और न ही उसके पास जाता।

    काव्या को यह बदलाव बहुत बुरा लग रहा था।

    एक दिन उसने आखिर अनुराग को रोक लिया।

    “मुझसे बात क्यों नहीं कर रहे?”

    “क्योंकि तुम्हें परेशानी हो रही है।”

    “लेकिन फैसला तुम अकेले कैसे कर सकते हो?”

    अनुराग चुप रहा।

    काव्या ने कहा, “अगर तुम सच में मेरे दोस्त हो तो मुश्किल वक्त में मेरा साथ छोड़कर मत जाओ।”

    अनुराग ने पहली बार उसकी आंखों में देखा।

    “मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जा रहा काव्या। मैं बस चाहता हूं कि तुम्हारे पापा को मुझ पर भरोसा हो।”

    उसी समय काव्या के पापा कॉलेज पहुंच गए। उन्होंने दूर से दोनों को बात करते देख लिया।

    अनुराग ने उन्हें आते हुए देखा तो सीधा उनके सामने चला गया।

    “अंकल, मुझे आपसे कुछ कहना है।”

    काव्या घबरा गई।

    पापा ने गंभीर आवाज में पूछा, “क्या?”

    अनुराग बोला, “काव्या ने कभी पढ़ाई से समझौता नहीं किया। अगर गांव में कोई उसके बारे में गलत बात कह रहा है तो उसकी गलती नहीं है। और अगर मेरी वजह से आपको चिंता हुई है तो मैं माफी चाहता हूं।”

    पापा कुछ देर उसे देखते रहे।

    फिर बोले, “तुम्हें पता है मैं अपनी बेटी को लेकर इतना सख्त क्यों हूं?”

    “जी।”

    “क्योंकि मैं चाहता हूं कि वह अपने पैरों पर खड़ी हो।”

    अनुराग ने सिर हिलाया।

    “मैं भी यही चाहता हूं अंकल।”

    पापा ने पहली बार हल्की मुस्कान दी।

    “तो फिर पहले अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो। बाकी चीजों का फैसला वक्त करेगा।”

    काव्या ने राहत की सांस ली।

    अनुराग मुस्कुराया।

    उस दिन दोनों समझ गए कि उनका रिश्ता अभी किसी नाम का मोहताज नहीं था।

    बस एक भरोसा था जो धीरे-धीरे दोस्ती से बढ़कर एक खूबसूरत एहसास बन रहा था।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • अधूरी इबादत भाग~41

    अधूरी इबादत भाग~41

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~41 ये सब क्यों? 

    शाम ढलने को थी और स्टूडियो की हल्की रोशनी अब गोधूलि की परछाइयों में घुलने लगी थी।

    रेनोवेशन का काम लगभग पूरा हो चुका था….. हर दीवार अब सफेद नहीं, बल्कि उम्मीद की तरह उजली लग रही थी और हर कोना जैसे एक नई शुरुआत की सुगंध लिए हुए था।

    मगर रूहानी का चेहरा आज फिर वही पुरानी थकान ओढ़े हुए था, जिसे किसी ने फिर से भीतर तक झकझोर दिया हो।

    वो अपनी ही साँसों में उलझी हुई थी, जब अचानक मोबाइल की स्क्रीन पर एक नोटिफिकेशन चमका। एक अनजाना नंबर… और सिर्फ़ एक लाइन: “तुम मुझसे एकांश को कभी नहीं छीन सकती।”

    जैसे किसी ने उसके सीने पर ठंडा पानी डाल दिया हो। पलभर को तो उसका मन किया कि फोन वहीं दीवार पर फेंक दे। मगर फिर, जैसे आत्मा में जमी कोई पुरानी आदत जाग उठी…. खामोश रहना, जवाब न देना… सिर्फ़ महसूस करना। 

    वो थक गई थी, हर बार साबित करते करते कि वो किसी को छीनने नहीं, बस खुद को ढूँढने निकली है।

    धीरे से उसने एक स्टूल खींचा और उस पर बैठ गई। उसकी उंगलियाँ काँप रही थीं, पर उसने उन्हें रोका नहीं। फोन का कैमरा ऑन किया। फ्रेम में स्टूडियो आया…. अभी अधूरा, पर उसका।

    एक-एक करके उसने तस्वीरें खींचीं…. वो कोना जहाँ वर्क टेबल होगा, वो दीवार जहाँ स्केचिंग बोर्ड टंगेगा और वो छत जो कुछ कहती सी लगती थी।

    इंस्टाग्राम खोला, कुछ पल देखा स्क्रीन को… फिर धीरे से टाइप किया….

    Chapter 2 – Her Comeback is Her Voice. #RuhaniReturns 

    उसने पोस्ट बटन दबाया। जानती थी, फिर लोग बात करेंगे। कुछ उसे नौटंकी कहेंगे, कुछ एकांश का नाम जोड़कर तमाशा बनाएँगे।

    पर इस बार रूहानी ने खुद से कहा, “कभी-कभी जवाब देना, जीत नहीं होती… जवाब न देना, शांति होती है।”

    स्टूल पर बैठी वो लड़की उस शाम कोई एलान नहीं कर रही थी, बस अपने टूटे हिस्सों को फिर से जोड़ रही थी…. किसी आवाज़ के बिना, किसी शोर के बिना… पर बहुत कुछ कहती हुई।

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°

    कमरे का दरवाज़ा इतनी ज़ोर से बंद हुआ कि दीवारें तक काँप गईं, जैसे किसी ने भीतर छुपे तूफ़ान को बंद करने की नाकाम कोशिश की हो। 

    एकांश राठौड़ अपने ही घर में दाख़िल हुआ, लेकिन उसके क़दमों की आवाज़ में ऐसा कंपन था, जैसे वो घर नहीं, किसी जंग के मैदान में दाख़िल हो रहा हो।

    उसकी आँखों में जलन थी, पर आँसू नहीं… वो बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था कि रूहानी इतनी आसानी से उसकी ज़िंदगी से निकलकर, अब अद्वैत की ज़िंदगी में घुल गई है। 

    उसकी साँसें तेज़ थीं, लेकिन वो दौड़कर नहीं आया था, वो गुस्से से उबलते खून के साथ आया था, उस सवाल के साथ जो उसे नज़रें झुकाने नहीं दे रहा था और न ही किसी जवाब को स्वीकार करने की इजाज़त दे रहा था।

    वो ड्राइंग रूम में पहुँचा और जैसे ही उसने सामने शीशे में खुद को देखा, उसकी आँखों की नसें तनी हुई दिखीं। होंठ कसे हुए, जबड़े की मांसपेशियाँ खिंची हुईं, और आँखों में एक साया था… चोट खाई हुई मोहब्बत का, अपमानित आत्मा का, और सबसे बढ़कर, छले गए दिल का।

    “नहीं… ये नहीं हो सकता! ये… ये नहीं हो सकता!” एकांश की आवाज़ किसी टूटते हुए शीशे जैसी थी, चुभती, बिखरती और हर कोने में फैलती।

    “रूहानी… तुझे हक किसने दिया, हाँ? कौन सा वक़्त था जिसमें तूने मुझे पीछे छोड़ना मंज़ूर कर लिया?” उसके स्वर में कोई तर्क नहीं था, सिर्फ़ एक बेकाबू, बेबस चीख़ थी, जो उसके सीने से निकलकर दीवारों पर टकरा रही थी।

    “मैंने तो तुम्हें कभी बाँधने की कोशिश नहीं की, पर तुमने तो मुझे जीने भी नहीं दिया। जब तुम मेरे साथ थी, तो क्या मैं तुम्हें छूने की कोशिश करता था? करता क्या… तुमने कभी मौक़ा ही नहीं दिया। ‘शादी के बाद’ — ये तेरी टेप रिकॉर्डर वाली लाइन थी, रूहानी!” उसकी आवाज़ अब काँपती नहीं, फट रही थी।

    उसने एक कुर्सी की तरफ़ देखा, पर हाथ बढ़ाने से खुद को रोक लिया। नहीं, ये उसका घर नहीं था…. ये उसकी पत्नी का था, और उसे अपनी औक़ात याद थी।

    “मैंने तो सोचा था… जब तुम सुननोगी कि मैंने शादी कर ली है, तब तुम्हारी नींदें उड़ जाएँगी। तुम्हारे आँसू तुम्हारे गाल नहीं, तुम्हारी आत्मा से बहेंगे। तुम भागती हुई मेरे पास आओगी… पूछेगी क्यों किया ऐसा? तुम टूटी हुई होगी, पागलों की तरह… मेरी तस्वीरें देखोगी, हमारे पुराने मेसेज पढ़ोगी, रातों को जगकर खुद को कोसोगी कि क्यों मुझे छोड़ा।”

    एकांश अब आगे बढ़ा, दीवार के पास खड़ा होकर ज़ोर से घूंसा मारा। एक झन्नाटेदार आवाज़ हुई, और उसके नखूनों के नीचे से खून की पतली धार बहने लगी।

    “लेकिन नहीं… तुम तो जैसे मेरी ज़िंदगी से निकलकर सीधी अद्वैत की बाँहों में चली गई। और वो भी… कौन…. मेरा भाई। मेरा अपना खून… जिसे मैंने हमेशा भगवान की तरह चाहा, उसकी आँखों में अपने लिए इज़्ज़त देखी… और तू उसकी पत्नी बन गई?” उसकी आवाज़ अब रुकती-रुकती चल रही थी, जैसे हर शब्द कोई नश्तर हो जो ज़ुबान से निकलते ही दिल में उतर जाता हो।

    “तुम्हारे उस वादे का क्या, रूहानी? कि शादी से पहले कुछ नहीं… कुछ भी नहीं। उस दिन, जब मैंनेतुम्हे छूना चाहा था, तुमने कहा था, ‘एकांश, शादी के बाद सबकुछ तुम्हारा होगा।’ 

    “और आज? आज तुम उसके बिस्तर पर सोती हो, उसके साथ साँसें बाँटती हो? तो क्या अब तुम पूरी तरह से उसकी हो चुकी है? क्या अब तुम केवल उसके नाम से सिसकती हो?”

    उसकी आँखों की कोरें भीगने लगीं, पर ये आँसू प्यार के नहीं थे…. ये अपमान और क्रोध के थे, वो जहर जो दिल में घुला हो पर बाहर बहने की इजाज़त अब मिला हो।

    वो शीशे की तरफ़ गया, वहाँ खड़ा होकर खुद को देखा। उसका चेहरा फूला हुआ, आँखें लाल, और उंगलियों से खून बहता हुआ। उसने एक ग्लास उठाया, साफ़, बर्फ़ जैसा चमकता हुआ और उसे इतनी ज़ोर से पकड़ा कि हाथ की नसों में दर्द उभर आया।

    ग्लास उसके हाथ में धीरे-धीरे चटकने लगा। पहली दरार दिखी, फिर दूसरी। अगले ही पल एकांश की हथेली से काँच के टुकड़े चुभकर उसकी चमड़ी में समा गए। एक पल को उसने खुद को देखा….. खून गिरता हुआ, धीमी बूँदों में, जैसे हर बूँद एक टूटे रिश्ते की कहानी कह रही हो।

    “मैं तुझसे नफरत नहीं कर सकता और खुद से प्यार अब होता नहीं। मैं सिर्फ तुम्हे चाहता हूँ, रूहानी… अब भी… इस कदर कि चाहता हूँ जब तुम केवल मेरे बिस्तर पर हो और मेरे नाम से सिसकियाँ भरे। ये इश्क़ है या पागलपन, मुझे नहीं पता। पर ये जुनून अब मेरी रगों में खून से तेज़ बहता है।”

    धीरे-धीरे उसकी आवाज़ उभरी, मगर इस बार वो चीख नहीं थी, बल्कि राख से निकली कोई धीमी चिंगारी –

    “मुझे लगा था… सच में लगा था, कि तुम मेरा इंतज़ार कर रही होगी, रूहानी। कि एक दिन जब मैं तुम्हारे सामने फिर से खड़ा होऊँगा… तो तुम्हारी आँखों में वही सवाल होंगे, वही तड़प… और फिर मैं… मैं तुम्हें अपना बना लूंगा। हमेशा के लिए… बिना किसी शर्त के।”

    उसकी आवाज़ टूट गई थी, मगर उसने खुद को ज़बरदस्ती संभाला। 

    उसने एक गहरी साँस ली, घाव से खून साफ़ किया और सोफ़े पर बैठ गया। उसका चेहरा अब शांत था, पर वो शांति वैसी थी जैसे किसी शेर ने खुद को पिंजरे में बंद कर लिया हो।

    “मैं तुझे छीनना नहीं चाहता… पर खुद को खोते नहीं देख सकता। अगर तुम मेरी नहीं हो सकती… तो याद रखना, रूहानी… तुम किसी और की भी नहीं होगी, कभी नहीं….।”

    कमरे में सन्नाटा फिर से फैल गया। खिड़की के बाहर हवा चल रही थी, पर अंदर की हवा अब ठहरी हुई थी…. जैसे वो एकांश की साँसों की गवाही दे रही हो।

    वो सोफ़े पर सिर टिकाए बैठा था, आंखें बंद, और उस चेहरों की भीड़ में एक ही शक्ल थी…. रूहानी। 

    उसकी साँस, उसका घाव, उसकी चाहत… और अब… उसकी जंग।

    होंठों पर कसमसी तीखी सांसें… लेकिन भीतर कोई कोहराम अभी थमा नहीं था।

    तभी…. एक नर्म, मगर काँपती हुई आवाज़ ने सन्नाटा चीर दिया।

    “ये सब क्यों कर रहे हो, एकांश?”

    —————-

    क्या रूहानी वाक़ई भूल चुकी है… या अब भी किसी कोने में उसकी साँसें एकांश के नाम से धड़कती हैं?

    उस आवाज़ के पीछे कौन था?…. क्या वाक़ई रूहानी लौट आई थी… या ये सिर्फ़ एकांश की टूटती चेतना का धोखा था? 

    क्या अद्वैत जान पाएगा कि उसकी दुनिया में जो सबसे करीबी दो लोग हैं… वो अब एक चुपचाप तूफ़ान के बिल्कुल किनारे खड़े हैं? 

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    Soul_writer

    लिखकर रूह छूने की कोशिश….. 🥹🥹

  • रहस्मयी बोतल

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    एक घने जंगल के किनारे एक छोटा-सा गांव था। गांव से थोड़ी दूर एक बहुत पुराना पेड़ खड़ा था। इतना पुराना कि उसकी मोटी शाखाओं को देखकर लगता था जैसे उसने कई पीढ़ियों को आते-जाते देखा हो।

     

    उस पेड़ के तने में ऊपर की तरफ एक गहरा-सा खोखल था। उसी खोखल में एक छोटी-सी बोतल हमेशा से रखी हुई थी।

     

    वह बोतल देखने में बिल्कुल साधारण थी। कांच की बनी हुई, थोड़ी पुरानी और धूल से ढकी हुई।

     

    लेकिन उसमें एक अजीब बात थी।

     

    हर रात उस बोतल से हल्की सुनहरी रोशनी निकलती थी।

     

    दूर से देखने पर ऐसा लगता जैसे पेड़ के अंदर कोई छोटा-सा दीपक जल रहा हो। वह रोशनी इतनी सुंदर होती कि जंगल से गुजरने वाले लोग कुछ देर रुककर उसे देखते रहते।

     

    लेकिन जैसे ही कोई उस रोशनी के पास जाने की कोशिश करता, वह अचानक गायब हो जाती।

     

    लोगों ने कई बार उस पेड़ के पास जाकर देखा था।

     

    किसी ने कहा, “शायद ये जुगनुओं की रोशनी है।”

     

    किसी ने कहा, “नहीं, जरूर कोई जादू है।”

     

    गांव के बूढ़े लोग हमेशा बच्चों को उस पेड़ से दूर रहने की सलाह देते।

     

    “उस पेड़ के पास मत जाना। वहां कुछ ऐसा है जिसे इंसानों को देखने की इजाजत नहीं।”

     

    लेकिन किसी को यह नहीं पता था कि उस बोतल में आखिर था क्या।

     

    उसी गांव में एक लड़का रहता था, जिसका नाम था आरव।

     

    आरव बहुत शांत स्वभाव का था। कुछ समय पहले तक वह हमेशा हंसता रहता था। गांव के बच्चों के साथ खेलता, अपनी मां के काम में हाथ बंटाता और शाम को नदी के किनारे बैठकर सपने देखा करता।

     

    लेकिन पिछले कुछ दिनों से वह बिल्कुल बदल गया था।

     

    उसके पिता शहर में काम करते थे। एक दिन अचानक उनकी नौकरी चली गई। घर की हालत खराब होने लगी। मां दिन-रात चिंता करती रहती और आरव खुद को घर की परेशानी के लिए जिम्मेदार समझने लगा था।

     

    एक शाम मां ने उसे समझाते हुए कहा, “बेटा, तू इतना परेशान मत हो। वक्त हमेशा एक जैसा नहीं रहता।”

     

    आरव ने सिर झुका लिया।

     

    “मां, अगर मैं बड़ा होता तो आपके लिए कुछ कर पाता।”

     

    मां ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “तू अभी बच्चा है। तुझे अपनी जिंदगी जीनी चाहिए, हमारी चिंता नहीं करनी चाहिए।”

     

    लेकिन आरव के मन में चिंता बैठ चुकी थी।

     

    उस रात वह चुपचाप घर से निकल गया।

     

    उसे खुद नहीं पता था कि वह कहां जा रहा है।

     

    चलते-चलते वह उसी पुराने पेड़ के पास पहुंच गया, जिसके बारे में गांव में तरह-तरह की बातें होती थीं।

     

    आरव थका हुआ था।

     

    वह पेड़ के नीचे बैठ गया और अपना सिर घुटनों पर रख लिया।

     

    “काश… कोई मेरी परेशानी दूर कर देता।”

     

    उसकी आंखों से आंसू निकल पड़े।

     

    तभी कुछ अजीब हुआ।

     

    पेड़ के खोखल में रखी बोतल हल्की-सी चमकी।

     

    फिर उसकी रोशनी बढ़ने लगी।

     

    आरव ने सिर उठाया।

     

    “ये कैसी रोशनी है?”

     

    वह हैरान होकर बोतल को देखने लगा।

     

    जिस बोतल की रोशनी दूसरों को पास जाते ही दिखाई नहीं देती थी, वह इस बार आरव के सामने लगातार चमक रही थी।

     

    आरव धीरे-धीरे खड़ा हुआ।

     

    वह पेड़ के तने के करीब गया।

     

    रोशनी और तेज हो गई।

     

    उसने हाथ बढ़ाकर बोतल को बाहर निकाल लिया।

     

    जैसे ही उसकी उंगलियां बोतल से छुईं, उसके अंदर से एक हल्की-सी आवाज आई।

     

    “तुमने मुझे देख लिया…”

     

    आरव डरकर पीछे हट गया।

     

    “क-कौन?”

     

    बोतल के अंदर सुनहरी रोशनी घूमने लगी।

     

    फिर उसी रोशनी से एक छोटी-सी आकृति बनी।

     

    वह किसी बच्चे जैसी दिखाई दे रही थी, लेकिन पूरी तरह रोशनी से बनी हुई थी।

     

    आरव ने डरते हुए पूछा, “तुम कौन हो?”

     

    उस आकृति ने मुस्कुराकर कहा, “मैं इस बोतल की रखवाली करती हूं।”

     

    “और ये बोतल?”

     

    “ये इच्छा की बोतल है।”

     

    आरव की आंखें बड़ी हो गईं।

     

    “क्या इसमें कोई जादू है?”

     

    “हां। लेकिन इसका जादू हर किसी के लिए नहीं है।”

     

    आरव ने पूछा, “तो मेरे लिए क्यों?”

     

    आकृति कुछ पल चुप रही।

     

    फिर बोली, “क्योंकि तुम यहां अपनी इच्छा मांगने नहीं आए थे। तुम यहां इसलिए आए क्योंकि तुम्हारा दिल दुखी था।”

     

    आरव कुछ नहीं बोला।

     

    आकृति ने आगे कहा, “यह बोतल सिर्फ उसी इंसान के सामने चमकती है जिसके दिल में सच्चाई होती है। जो अपनी खुशी से ज्यादा अपने अपनों की चिंता करता है।”

     

    आरव की आंखों में फिर आंसू आ गए।

     

    “अगर तुम्हारे पास जादू है तो मेरे पिता की नौकरी वापस कर दो।”

     

    आकृति ने सिर हिलाया।

     

    “मैं किसी की किस्मत को सीधे नहीं बदल सकती।”

     

    आरव उदास हो गया।

     

    “तो फिर इस जादू का क्या फायदा?”

     

    आकृति मुस्कुराई।

     

    “जादू हमेशा समस्या को खत्म नहीं करता, आरव। कभी-कभी वह इंसान को रास्ता दिखाता है।”

     

    अचानक बोतल की रोशनी पेड़ के नीचे फैल गई।

     

    आरव के सामने जमीन पर कुछ चमकने लगा।

     

    वह एक छोटा-सा पुराना कागज था।

     

    आरव ने उसे उठाया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “जिसके हाथ में हुनर है, उसके लिए रास्ते कभी खत्म नहीं होते।”

     

    आरव कुछ समझ नहीं पाया।

     

    आकृति ने कहा, “तुम्हारे पिता को काम की जरूरत है। लेकिन तुम्हें उनके साथ मिलकर रास्ता ढूंढना होगा।”

     

    “लेकिन मैं क्या कर सकता हूं?”

     

    “तुम्हें अपने गांव में देखना होगा। तुम्हारे पास जो चीजें हैं, उन्हीं से शुरुआत करो।”

     

    अगली सुबह आरव घर लौट आया।

     

    उसने अपने पिता को बोतल के बारे में कुछ नहीं बताया।

     

    लेकिन उसने एक बात जरूर बताई।

     

    “पिताजी, हमारे गांव में लोग शहर से सामान खरीदने जाते हैं। अगर हम गांव में ही छोटी-सी दुकान शुरू करें तो?”

     

    पिता ने उसे देखा।

     

    “हमारे पास पैसे नहीं हैं बेटा।”

     

    आरव ने कहा, “हम छोटी शुरुआत कर सकते हैं।”

     

    दोनों ने मिलकर घर में रखी पुरानी चीजों को देखा। कुछ सामान बेचकर थोड़े पैसे जुटाए। आरव ने गांव के लोगों से बात की और पता किया कि उन्हें रोजमर्रा में किन चीजों की जरूरत पड़ती है।

     

    धीरे-धीरे उन्होंने घर के बाहर छोटी-सी दुकान शुरू कर दी।

     

    पहले दिन सिर्फ दो ग्राहक आए।

     

    दूसरे दिन चार।

     

    फिर धीरे-धीरे गांव के लोग उनकी दुकान से सामान लेने लगे।

     

    कुछ महीनों में दुकान अच्छी चलने लगी।

     

    एक रात आरव फिर उसी पेड़ के नीचे गया।

     

    उसके हाथ में वही बोतल थी।

     

    उसने मुस्कुराकर कहा, “तुमने मेरा सपना पूरा नहीं किया।”

     

    बोतल हल्की-सी चमकी।

     

    आरव हंसा।

     

    “लेकिन तुमने मुझे रास्ता जरूर दिखा दिया।”

     

    तभी रोशनी में वही छोटी आकृति दिखाई दी।

     

    “क्योंकि असली जादू बोतल में नहीं था।”

     

    आरव ने पूछा, “तो फिर कहां था?”

     

    आकृति ने उसके सीने की ओर इशारा किया।

     

    “तुम्हारे अंदर।”

     

    आरव कुछ देर तक उसे देखता रहा।

     

    “लेकिन फिर ये बोतल यहां क्यों रहती है?”

     

    आकृति मुस्कुराई।

     

    “क्योंकि हर पीढ़ी में कोई न कोई ऐसा इंसान जरूर आता है जो अंधेरे में भी उम्मीद ढूंढता है। बोतल उसी का इंतजार करती है।”

     

    इतना कहकर वह आकृति धीरे-धीरे रोशनी में बदल गई।

     

    बोतल फिर शांत हो गई।

     

    आरव ने उसे वापस उसी खोखल में रख दिया।

     

    अगली रात दूर से उस पेड़ में फिर सुनहरी रोशनी दिखाई दी।

     

    गांव वालों ने उसे देखा।

     

    एक आदमी पेड़ के पास गया।

     

    लेकिन जैसे ही वह करीब पहुंचा, रोशनी गायब हो गई।

     

    लोग हैरान होकर लौट गए।

     

    किसी को पता नहीं चला कि उस पेड़ का जादू किसके लिए था।

     

    और उस दिन के बाद आरव जब भी किसी परेशान इंसान को देखता, उसे एक ही बात कहता—

     

    “मुश्किल वक्त में जादू का इंतजार मत करना… कभी-कभी जादू हमारे अंदर ही छिपा होता है, बस हमें उसे पहचानने की जरूरत होती है।”

     

    लेकिन उस पुराने पेड़ के खोखल में वह बोतल आज भी रखी थी।

     

    और उसकी सुनहरी रोशनी आज भी दूर से दिखाई देती थी।

     

    शायद वह किसी और दुखी इंसान का इंतजार कर रही थी…

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं

    अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • अधूरी इबादत भाग~40

    अधूरी इबादत भाग~40

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~40 पन्ना नंबर तेईस 

     

    एकांश के घर से बाहर निकलते ही जैसे कमरे में ठहरे हुए हर शब्द की गर्मी भी साथ चली गई हो। रूहानी ने दरवाज़ा धीरे से बंद किया, फिर सीधे जाकर डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर बैठ गई…. जैसे उसकी टाँगों में अब खड़े रहने की ताक़त नहीं बची हो। 

    उसने एक ही साँस में पूरा गिलास पानी पिया, गले से नीचे उतरते पानी की ठंडक जैसे उसके भीतर उठ रहे तूफ़ान को थोड़ी देर के लिए थामना चाह रही थी। लेकिन उस ठंडेपन से भी उसका भीतर नहीं बुझा… आँखें अभी भी भटकी हुई थीं, जैसे कुछ खोज रही हों… या कुछ खो चुकी हों।

    उसकी नज़र सामने पड़े सैंडविच पर गई, जो अधूरी माफ़ी की तरह प्लेट में पड़ा था। अद्वैत ने बनाया था…. सादगी से भरा, न बोल सकने वाली क्षमा जो शब्दों से नहीं, हर काटे गए टुकड़े से झलक रही थी। 

    रूहानी ने उसे उठाया और खाना शुरू कर दिया, बिना अद्वैत की तरफ़ देखे। सैंडविच अब ठंडा हो चुका था, बिल्कुल उसी तरह जैसे उनके बीच की वो ऊष्मा जो कभी समझदारी से उपजी थी, अब चुप्पियों में बर्फ़ बनकर पिघल रही थी।

    अद्वैत ने कॉफ़ी का मग उठाया, कुछ कहने की हिम्मत जुटाते हुए बोला, “मैं रीहीट कर देता हूँ…”

    रूहानी की आवाज़ आयी… बहुत नर्म, मगर भीतर से साफ़ कटती हुई, “रहने दो… आइस हो फ्रिज में तो वही डाल दो।”

    वो नहीं चाहती थी कि अद्वैत कुछ पूछे….. न एकांश के बारे में और न उन दोनों के बीच के उस रिश्ते के बारे में। 

    इस घर में बहुत कुछ था जो कहे बिना भी भारी था और उन शर्तों के मुताबिक, सवाल करना मना था। 

    अद्वैत चुपचाप उठा और जैसे आदेश मिला हो, वैसे ही फ्रिज से आइस निकालकर कॉफ़ी में डाल दी। 

    रूहानी ने सैंडविच खत्म किया, भूख इतनी नहीं थी जितना बेचैनी थी, जो हर निवाले के साथ उसके गले से उतर रही थी। जब भी वो तनाव में होती थी,कुछ ज़्यादा ही भूख लगती थी उसे। 

    नाश्ता पूरा हुआ। प्लेट खाली, मग ठंडा, और उसका चेहरा पहले से ज़्यादा बुझा हुआ।

    “शाम तक लौट आऊँगी,” बस इतना कहा, और दरवाज़ा खोलकर निकल गई….. बिना पीछे देखे, बिना किसी सफ़ाई के, जैसे कोई पन्ना पलट दिया हो जिसमें अब और कुछ लिखना बाकी न हो। 

    अद्वैत वहीं खड़ा रह गया, उस अधूरे वाक्य की तरह, जिसका उत्तर कभी किसी ने माँगा ही नहीं।

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°

    रूहानी ने जैसे ही कैब का दरवाज़ा बंद किया, एक सधे हुए अंदाज़ में बैग से मोबाइल निकाला और रिनोवेशन वाले को कॉल कर दिया। उसकी आवाज़ में एक अजीब-सी ठंडक थी…. वह ठंडक जो अब उसकी पहचान बन गई थी; जैसे हर बातचीत सिर्फ एक डील हो, हर लहजा एक ऑर्डर। 

    “मैं दस मिनट में स्टूडियो पहुँच रही हूँ। टीम टाइम पर आ जाए।” कॉल कटते ही वह खिड़की की ओर मुड़ गई। ट्रैफिक की आवाज़ों के पीछे जैसे कोई पुरानी धुन चल रही थी… धीमी, शांत, बस उसी के लिए बजती हुई। वह धुन, जो उसे अतीत से जोड़ती थी और वर्तमान से काटती भी।

    स्टूडियो इस बार बड़ा था, बिल्कुल नया। एक खुली छत के नीचे फैला हॉलनुमा कमरा, जहाँ हर दीवार, हर कोना एक नई शुरुआत का इशारा दे रहा था। 

    सामने वुडन फ्लोर पर लाइट्स की वायरिंग चल रही थी, दूसरी ओर कपड़ों की कढ़ाई और डिज़ाइनिंग के लिए अलग सेक्शन बन रहा था, और एक कोना फोटोशूट और ब्रांडिंग स्टूडियो में तब्दील हो रहा था।

    दीवारों पर निशान लगते जा रहे थे, जैसे समय खुद वहाँ नए ख्वाबों की रेखाएँ खींच रहा हो। रिनोवेशन टीम अपने-अपने हिस्से का काम करने में जुटी थी…. किसी ने ब्लूप्रिंट फैलाया, कोई लैपटॉप खोलकर प्लानिंग समझाने लगा। सबकुछ योजनाबद्ध, सटीक, ठोस था।

    पर रूहानी?

    वह सबके बीच होकर भी कहीं दूर खड़ी थी…. ना दखल देती, ना कुछ रोकती, बस जैसे किसी पर्दे के पीछे से अपनी ही ज़िंदगी को एक बार फिर रंगते हुए देख रही हो। 

    कुछ देर बाद एक वर्कर ट्रे में जूस के गिलास लेकर आया। एक गिलास उसकी ओर भी बढ़ाते हुए बोला, “मैम, थोड़ा ब्रेक ले लीजिए।” 

    रूहानी ने शुक्रिया कहा, एक हल्की मुस्कान आई, जो अगले ही पल जैसे पिघल गई। स्टूडियो के काँच वाले दरवाज़े से कुछ दूरी पर रखी एक लकड़ी की बेंच पर जाकर बैठ गई।

    पहला घूँट लिया, तो गले से उतरती उस मिठास में एक कसक भी थी। बाहर की चिलचिलाती धूप के बीच, अंदर कुछ ठंडा बह रहा था… लेकिन वह ठंडक जूस की नहीं थी। वह उन यादों की थी जो समय की धूल में दबी थीं, पर अब भी साँस ले रही थीं।

    उसकी आँखें कहीं और ही चली गईं… वहीं पुरानी जगह पर, उस पहले स्टूडियो में जहाँ छत टपकती थी और दीवारें खुद-ब-खुद परतें छोड़ देती थीं। मगर उस कमरे की हवा में कभी मायूसी नहीं होती थी…..

    Flashback

    बारिश की रुक-रुककर गिरती बूंदें जैसे हर उस खामोशी को बुन रही थीं जो रूहानी के भीतर कई महीनों से बिना शब्दों के पनप रही थी। उसका पुराना स्टूडियो…. वही टूटी छत वाला, ईंटों की खुली दीवारों वाला कोना…. जहाँ वक़्त ने कई बार रुक कर साँस ली थी। 

    वहाँ आज फिर वही गंध थी — गीली मिट्टी, गीले रंग और पुराने सपनों की।द

    वो कैनवास के सामने बैठी थी, बाल रबर बैंड में बँधे, एक लट फिर भी जिद पर उतरी हुई थी… बार-बार आँखों के पास आकर उसे चिढ़ा रही थी। दीवारों पर कुछ अधूरी रेखाएँ थीं, जो अभी कहानी नहीं बनी थीं, बस किसी टूटी आत्मा की हल्की दस्तक सी लग रही थीं।

    तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। इतनी धीमी कि जैसे खुद भी यकीन नहीं था कि कोई उसे सुनेगा। रूहानी ने पलटकर देखा….. एक अनजाना चेहरा। मगर अजनबी तो बस दिखता था, उसकी आँखों में जाने-पहचाने सवाल थे।

    “तुम रूहानी हो?” आवाज़ हल्की थी और भीगी हुई।

    “हाँ…” उसने धीरे से जवाब दिया, जैसे किसी पुराने कागज़ को पलटते हुए।

    “ये तुम्हारी स्केचबुक है शायद… बस में छूट गई थी।”

    रूहानी की साँसें थम-सी गईं। वो स्केचबुक, जो वो हर रोज़ अपने दिल की धड़कनों की तरह संभालती थी…. अब उसके हाथों में नहीं, इस अजनबी के पास थी।

    उसने किताब हाथ में ली, काँपती उंगलियाँ जैसे किसी खोए हुए बच्चे को गले लगाना चाहती हों।

    “तुमने… देखा इसे?” उसने संकोच से पूछा।

    वो मुस्कुराया, एक धीमे उजाले की तरह जो किसी बहुत गहरे अंधेरे को समझता हो।

    “देखना तो नहीं चाहिए था मुझे” उसने जवाब दिया, “लेकिन ये पन्ना नंबर 23…. खुद ही अलग होकर गिर पड़ा था…. वही सबसे प्यारा लगा मुझे।”

    रूहानी ने झट से उस पन्ने को पलटकर देखा। 

    वहाँ एक अधूरी लड़की थी…. आँखें बंद, हथेलियाँ फैली हुई… जैसे कुछ माँग रही हो… शायद खुद को।

    “वो मैंने खुद को रचा है,” रूहानी के ज़हन में गूंजा, मगर होंठ चुप रहे।

    उस दिन कुछ नहीं कहा गया ज़्यादा, बस उसने उसे अंदर बुलाया और कॉफी दी। 

    “यहाँ अक्सर बारिश आती है क्या?” उसने पूछा।

    रूहानी ने सिर हिलाया। “यहाँ बारिश नहीं, पुराने दिन आते हैं… और खुद को धो जाते हैं।”

    वो हँसा नहीं, बस देखता रहा… उस दीवार की ओर जहाँ रूहानी की अधूरी स्केच टंगी थी। 

    फिर धीरे से बोला, “मैं एक डॉक्यूमेंट्री बना रहा हूँ… लोकल आर्टिस्ट्स पर। तुम्हें शूट करना चाहता हूँ।”

    रूहानी ने पहली बार किसी को इतना हल्के से अपनी दुनिया में आते देखा था…. जैसे वो दरवाज़ा नहीं खटखटाता, बल्कि साँसों के ज़रिए भीतर उतरता हो।

    “कैमरे से डर लगता है मुझे,” वो मुस्कुराई थी उस दिन।

    “क्यों?” उसने पूछा।

    “क्योंकि वो मुझे वैसी दिखा देता है, जैसी मैं खुद से भी छिपाना चाहती हूँ।”

    वो कुछ पल खामोश रहा, फिर कहा, “तो कैमरे को झूठ बोलना सिखा देंगे। या शायद… सच के लिए थोड़ा प्यार बाँट देंगे।”

    उस शाम के बाद, एकांश सिर्फ उस डॉक्यूमेंट्री का हिस्सा नहीं रहा। वो उसके स्केचों के बीच रहने लगा… कभी पन्नों में, कभी रंगों में, और धीरे-धीरे साँसों में।

    flashback ends

    वो उस दिन को भूल नहीं पाई। ना पन्ना नंबर 23 को और ना उस एकांश को जो पहली बार किसी के सपनों को लौटा कर आया था।

    “काश,” उसने बेंच पर बैठे-बैठे सोचा, “कुछ चीज़ें लौटकर सिर्फ स्केचबुक तक सीमित रहतीं… दिल तक नहीं जातीं।”

    तभी मोबाइल की स्क्रीन चमकी। एक अनजान नंबर से सिर्फ एक पंक्ति….

    “तुम मुझसे एकांश को कभी नहीं छीन सकती। वो मेरा था… और हमेशा रहेगा।” 

    उसका दिल एक लम्हे को रुक गया। उँगलियाँ स्क्रीन पर जमीं रहीं। आसपास सब कुछ चलता रहा….

    वर्कर्स की आवाज़ें, मशीनों की गूंज, ट्रैफिक का शोर….. लेकिन रूहानी के भीतर सन्नाटा उतर आया।

    उसने नंबर दोबारा देखा, पहचानने की कोशिश की… मगर न नाम, न कोई और सुराग।

    पर जो लहजा था… वो अजनबी नहीं था।

    ——————-

    वो मैसेज किसका था, जो एकांश को अपना बता गया…? 

    अगर वो लहजा अजनबी नहीं था, तो क्या रूहानी पहले ही किसी अनजाने झूठ से बंध चुकी थी…?

    क्या रूहानी सच में भूल पाई थी एकांश को… या बस खुद से झूठ बोल रही थी? 

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    लिखकर रूह छूने की कोशिश…..

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  • अधूरी इबादत भाग~39

    अधूरी इबादत भाग~39

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~39 कुछ तो छुपा है… 

     

    एकांश के कानों को यकीन नहीं हुआ… सामने खड़ी रूहानी, वही रूहानी, जिसकी आँखों में कभी उसने खुद को देखा था, जिसकी हँसी से उसकी सुबहें जगा करती थीं…. आज वही औरत, अद्वैत की पत्नी कहलाने लगी है?

    उसके ही भाई की पत्नी…..

    फिर भले ही वो आज किसी और का पति है , कोई और औरत जिसके साथ उसने अग्नि के सात फेरे लिए थे…..

    एक पल को तो उसका शरीर सुन्न हो गया, समय जैसे थम गया। उसके चारों ओर की आवाजें मद्धम पड़ गईं और आँखों के सामने सिर्फ रूहानी का चेहरा छाया हुआ था और उसकी मांग में भरा सिंदूर और गले में मंगलसूत्र….. जो चीख-चीखकर कह रहा था कि अब वह किसी और की है। 

    उसने अद्वैत की ओर देखा….. वो अद्वैत जो बचपन से ही उसका हमदर्द रहा, जिसने उसे कभी यह महसूस होने नहीं दिया कि वह उसका सगा भाई नहीं है। 

    एकांश के दिल में अद्वैत के लिए कभी कोई ईर्ष्या नहीं थी… कभी भी नहीं। लेकिन यह… यह बहुत अलग था।

    “इतनी जल्दी?” एक प्रश्न खुद-ब-खुद उसके भीतर से उठा। 

    “भाई ईशिता भाभी को इतनी जल्दी कैसे भूल सकते है? क्या सब कुछ इतना ही आसान था उनके लिए?”

    लेकिन यह सवाल सिर्फ अद्वैत के लिए नहीं था। यह सवाल खुद रूहानी के लिए भी था। 

    वो रूहानी, जिसे वह जानता था…. टूटने के बाद भी मुस्कुराने वाली, मगर भीतर से बिखरने वाली।

    क्या वो सच में इतनी जल्दी आगे बढ़ गई? इतनी जल्दी move on कर पाना क्या उसके लिए इतना आसान था? 

    एकांश के भीतर उठता सवाल जैसे खुद एक दरवाज़ा खोल गया..…. एक पुरानी गली का, जहाँ हर मोड़ पर एक मुस्कान बिखरी थी, हर दीवार पर कोई अधूरी बात टंगी थी।

    flashback 

    रूहानी और उसका वो पुराना स्टूडियो… वही ईंटों से बने कच्चे से कमरे का कोना, जहाँ धूप शाम की तरह उतरती थी और कपड़े के टुकड़ों पर रंग नहीं, सपने चिपकाए जाते थे।

    उस शाम भी कुछ ऐसा ही था। हल्की हल्की बारिश हो रही थी। बाहर का आसमान जैसे उदास था, मगर भीतर की हवा में कोई मीठा साज़ बज रहा था।

    कमरे की एक दीवार पर रूहानी के स्केच चिपके थे…. कुछ अधूरे, कुछ अनगढ़, मगर हर एक में उसका दिल धड़कता था।

    एकांश फर्श पर बैठा था, कैमरा गोद में रखे और सामने खड़ी थी रूहानी… हल्के नीले रंग की इंडो-वेस्टर्न ड्रेस में, बालों को रबर बैंड से ऊपर बाँध रखा था, कुछ लटें उसके गालों पर गिरती थी और उसकी आँखों में वो चमक थी जो केवल अपने सपनों से लड़ने वालों में होती है।

    “इतनी जल्दी क्यों भागती हो तुम हर बार कैमरे से?” एकांश ने मुस्कुराकर पूछा था, उसकी आँखों में खेलती हुई रौशनी उस पर टिकी थी।

    रूहानी ने झिझकते हुए नजर झुकाया, फिर उसके सामने चुपचाप आ खड़ी हुई, “क्योंकि तुम मुझे वैसा देख लेते हो… जैसा मैं खुद को कभी नहीं देख पाई।”

    एकांश की आँखें पल भर को ठहर गईं। उसने कैमरा नीचे रख दिया और धीमे से बोला, “और मैं तुम्हें वैसी देखना ही नहीं चाहता… जैसी तुम खुद को देखती हो।”

    रूहानी के होंठ थरथराए थे। वो कुछ कहती, उससे पहले ही एकांश ने आगे बढ़कर उसकी हथेली थाम ली। उस छोटे से स्पर्श में जो गर्माहट थी, उसने कमरे की नमी को भी छू लिया।

    “कभी-कभी लगता है…” रूहानी की आवाज़ टूटी, “तुम्हारे कैमरे में नहीं, तुम्हारी आँखों में रहना चाहती हूँ मैं।”

    एकांश कुछ पल तक उसे बस देखता रहा। रूहानी के चेहरे पर वो मासूम-सी ख्वाहिश थी, जैसे कोई बच्चा टॉफ़ी नहीं, एक घर माँग रहा हो।

    “तो रहो न,” एकांश ने फुसफुसाकर कहा, “यह आँखें तुम्हारा इंतज़ार करती हैं… हर पल।”

    वो एक क्षण… समय जैसे ठहर गया था। 

    रूहानी ने उसकी ओर देखा…. गहराई से, पूरी तरह, जैसे उसके भीतर उतर जाना चाहती हो, उस नज़्म की तरह, जिसे कोई पढ़ ले।

    रूहानी ने धीरे से कहा, “तुम्हें खो दूँगी, तो शायद सब कुछ खो जाएगा… क्योंकि अब जब दिल धड़कता है, तो लगता है बस तुम्हारे नाम पर ही ज़िंदा है।”

    वो उससे लिपट गई थी, उस पुराने स्टूडियो की भींगी हवा में, उसकी हथेलियों में अपनी साँसें भरते हुए। कोई वादा नहीं था, बस एक साँझ थी, जिसमें रूहानी ने पहली बार खुद को पूरा महसूस किया था, एकांश की बाँहों में।

    उसी शाम एकांश ने जो तस्वीरें खींचीं, वो कभी किसी को नहीं दिखाई। वो उसके स्टूडियो की सबसे नज़दीकी दराज़ में बंद रहीं… क्योंकि उनमें रूहानी नहीं, उसकी पूरी दुनिया कैद थी।

    उसका दिल अब फिर से वही खो गया… उसी स्टूडियो में, उसी हल्की बारिश में… उसी वाक्य पर…. 

    “तुम्हें खो दूँगी, तो सब कुछ खो जाएगा…”

    flashback end 

    एकांश की आँखों में अब सवालों की आग थी। हर लम्हा एक साज़िश सा लगने लगा। दिल किसी पुराने गीत की तरह बार-बार वही धुन गुनगुनाता रहा— “कुछ तो है… कुछ छुपा हुआ है…”

    अब वह पीछे नहीं हटेगा। उसे जानना होगा… हर सच, हर परत… और उस सवाल का जवाब, जो अब उसकी रातों की नींद उड़ाने वाला था।

    “भाई… आप कब रूहानी से मिले?” एकांश की आवाज़ धीमी थी, मगर भीतर से कंपकंपाती हुई निकली। जैसे किसी बंद दरवाज़े को सालों बाद खटखटाया हो। 

    अद्वैत कुछ पल के लिए चुप रह गया। उसे समझ नहीं आया कि कहाँ से शुरू करे, कौन सा सच पहले बताए और कौन सा खुद तक ही सीमित रखे। 

    लेकिन उससे पहले ही एक अजीब-सी बात उसके मन में कौंधी, एकांश ने रूहानी का नाम सीधे क्यों लिया? 

    क्या वो उसे पहले से जानता था? उसकी आँखों में सवाल तैर गए। 

    “तुम… तुम रूहानी को कैसे जानते हो, एकांश?” अद्वैत की आवाज़ अब कुछ सख़्त थी, जैसे दिल में बैठी शंका को अब ज़ुबान मिल गई हो। 

    दोनों की आँखें एक-दूसरे से टकराईं… एक में आश्चर्य था, दूसरे में छुपा हुआ डर। 

    और तभी, जैसे उन दोनों के सवालों को सुनकर कोई तीसरा जवाब देने चला हो, पीछे से एक धीमी, मगर भारी आवाज़ आई……

    दोनों भाई पलटे तो देखा, रूहानी अब धीरे-धीरे उठकर बैठ चुकी थी। उसका चेहरा उतरा हुआ था, आँखों के नीचे नींद और उलझनों की छाया साफ़ दिख रही थी।

    उसकी आवाज़ बस इतनी कि सन्नाटे ने भी कान लगाकर सुनी, “पानी…” वह बस इतना ही कह पाई।

    दोनों जैसे किसी सहज पल में लौट आए हों, बिना कुछ बोले, दोनो अलग-अलग गिलासों में पानी लेकर डाइनिंग टेबल से उसकी ओर बढ़े। 

    अद्वैत के हाथ में कांपती उंगलियाँ थी और एकांश की आँखों में हज़ार सवाल छिपे थे। 

    रूहानी ने नज़रें उठाईं, दोनों के हाथों में पकड़े पानी को देखा…. कुछ ऐसा था उस दृश्य में, जैसे अतीत और वर्तमान पहली बार आमने-सामने खड़े हों।

    पर उसने पानी नहीं पिया। वह तुरंत खड़ी हुई, अपनी कपड़े ठीक करते हुए बोली, “मुझे एक अर्जेंट काम है, निकलना होगा।” 

    और बिना किसी की ओर देखे, तेजी से अपना पर्स उठाया और दरवाज़े की ओर बढ़ गई।

    “रूहानी,” अद्वैत की आवाज़ में चिंता भी थी और असहजता भी, “नाश्ता तो करती जाओ…”

    एकांश ने एक पल सोचा, फिर संयम से कहा, “अगर जल्दी है तो मैं छोड़ देता हूँ तुम्हें… अपनी कार से।”

    रूहानी वहीं दरवाज़े के पास ठिठक गई। उसकी पीठ अब भी उनकी ओर थी, मगर भीतर कहीं कुछ जैसे टूट रहा था। 

    आँखें नम हो चुकी थीं, पर उसने पलकें मजबूती से रोके रखीं। कुछ कहना चाहती थी, पर ज़ुबान साथ नहीं दे रही थी। 

    ठीक उसी पल एकांश का मोबाइल बजा, वह जेब से निकालकर स्क्रीन की ओर देखने लगा। उसकी पत्नी का नाम चमक रहा था। 

    उसने एक हल्की-सी मुस्कान के साथ अद्वैत को गले लगाया, “ठीक है, भाई… फिर जल्दी आऊँगा। घर से कॉल आ रहा है।”

    अद्वैत ने सिर हिलाकर उसे विदा किया, लेकिन वो जो अगला वाक्य एकांश ने हवा में कहा, उसने जैसे कमरे की दीवारों को भी सिहरने पर मजबूर कर दिया।

    एकांश के आख़िरी शब्द उसके कानों में नहीं, सीधे उसकी धड़कनों में गूंजे, “आपकी वाइफ से अच्छे से मुलाकात भी तो नहीं हुई है…. इशिता भाभी को गए हुए अभी ज्यादा वक्त भी तो नहीं गुजरा है,” यह कहकर एकांश मुस्कुराया और दरवाज़े की ओर बढ़ गया। 

    अद्वैत भी बस एक हल्की मुस्कान के साथ सिर हिलाता रहा, जैसे सब कुछ सामान्य हो।

    रूहानी वहीं दरवाज़े की चौखट के पास जैसे जम-सी गई। उसकी साँसें रुक गई थीं। हाथ में पकड़ा पर्स अब हथेली में पसीने से भीग चुका था। 

    शब्द हवा में जैसे फँस गए थे और दिल की धड़कन किसी पुरानी घड़ी की तरह लड़खड़ाने लगी थी।

    “एकांश राठौड़…”

    उसने मन ही मन दोहराया, होंठों के नीचे कुछ काँपा। उसके चेहरे का रंग उड़ गया था, जैसे अचानक कोई परदा हट गया हो और अतीत की नंगी रौशनी आँखों में चुभने लगी हो।

    “अद्वैत अवस्थी का छोटा भाई…”

    वह शब्द जो अब तक केवल नाम थे, अचानक अर्थ लेने लगे थे….. भारी, जटिल, और असहनीय।

    ————–

    “आपकी वाइफ से अच्छे से मुलाकात भी तो नहीं हुई है…” क्या एकांश के शब्दों में कोई छुपा इशारा था… जो रूहानी ही समझ सकी? 

    क्या अब सच सामने आएगा… या सब कुछ और गहराई में दफ़न हो जाएगा?

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    लिखकर रूह छूने की कोशिश…..

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