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श्रेणी: कहानी लेखन पुरस्कार प्रतियोगिता

  • कमरा नंबर 101😱 (Part-2)

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    इंदरजीत की आंखें उस लड़की पर जमी हुई थीं।

     

    गलियारे में अंधेरा था। सिर्फ कमरे की हल्की-सी रोशनी दरवाज़े तक पहुंच रही थी। लड़की बिल्कुल स्थिर खड़ी थी। उसके लंबे काले बाल चेहरे को पूरी तरह ढके हुए थे।

     

    लेकिन सबसे डरावनी बात उसके हाथ में मौजूद डायरी थी।

     

    वही डायरी…

     

    जो कुछ सेकंड पहले इंदरजीत के हाथ में थी।

     

    इंदरजीत का गला सूख गया।

     

    उसने धीरे से पूछा, “तुम… कौन हो?”

     

    लड़की ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसने बस डायरी का आखिरी पन्ना खोला।

     

    फिर धीरे-धीरे अपना हाथ उठाकर पन्ने पर कुछ लिखा।

     

    इंदरजीत को दूर से सिर्फ इतना दिखाई दिया—

     

    “मुझे याद करो।”

     

    अचानक गलियारे की सारी लाइटें एक साथ जल उठीं।

     

    इंदरजीत ने डर के मारे अपनी आंखें बंद कर लीं।

     

    कुछ सेकंड बाद जब उसने आंखें खोलीं…

     

    गलियारा खाली था।

     

    लड़की गायब थी।

     

    डायरी भी गायब थी।

     

    दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    इंदरजीत पीछे हट गया।

     

    उसने तुरंत दरवाज़ा खोलने की कोशिश की।

     

    लेकिन हैंडल नहीं घूम रहा था।

     

    “खुल… जा!”

     

    उसने पूरी ताकत लगाई।

     

    दरवाज़ा नहीं खुला।

     

    तभी कमरे की दीवार पर लगी घड़ी चलने लगी।

     

    टिक… टिक… टिक…

     

    उसने घड़ी की तरफ देखा।

     

    समय था—

     

    12:15 AM

     

    लेकिन कुछ अजीब था।

     

    घड़ी की सुइयां उल्टी दिशा में घूम रही थीं।

     

    12:14…

     

    12:13…

     

    12:12…

     

    और फिर अचानक घड़ी रुक गई।

     

    कमरे में तेज़ ठंड फैलने लगी।

     

    इंदरजीत के सामने दीवार पर लगी तस्वीर अपने आप नीचे गिर गई।

     

    कांच टूट गया।

     

    तस्वीर के पीछे दीवार में एक छोटा-सा काला निशान था।

     

    इंदरजीत ने पास जाकर देखा।

     

    वह निशान किसी दरवाज़े की तरह लग रहा था।

     

    उसने दीवार पर हाथ फेरा।

     

    अचानक…

     

    ठक!

     

    अंदर से आवाज़ आई।

     

    इंदरजीत पीछे हट गया।

     

    फिर वही आवाज़ दोबारा आई।

     

    ठक… ठक…

     

    दीवार के अंदर कुछ था।

     

    उसने कमरे की कुर्सी उठाई और दीवार पर मार दी।

     

    धड़ाम!

     

    प्लास्टर का एक हिस्सा टूटकर नीचे गिरा।

     

    अंदर एक छोटा लकड़ी का बॉक्स दिखाई दिया।

     

    बॉक्स पुराना था और उस पर धूल जमी हुई थी।

     

    इंदरजीत ने उसे बाहर निकाला।

     

    उस पर सिर्फ एक नंबर लिखा था—

     

    101

     

    उसने बॉक्स खोला।

     

    अंदर कुछ पुराने कागज, एक जंग लगी चाबी और एक फोटो थी।

     

    फोटो देखकर इंदरजीत की सांस रुक गई।

     

    फोटो में होटल के सामने पांच लोग खड़े थे।

     

    उनमें एक लड़की भी थी।

     

    वही सफेद कपड़े।

     

    वही लंबे बाल।

     

    वही चेहरा।

     

    इंदरजीत ने फोटो को गौर से देखा।

     

    फिर नीचे लिखी तारीख पढ़ी।

     

    17 अगस्त 2006

     

    फोटो के पीछे किसी ने नाम लिखे थे।

     

    अमित।

     

    राकेश।

     

    सुरेश।

     

    निशा।

     

    और…

     

    इंदरजीत।

     

    उसका शरीर सुन्न पड़ गया।

     

    “ये… मेरा नाम यहां कैसे?”

     

    उसने फोटो दोबारा देखी।

     

    वह पांचवां लड़का बिल्कुल उसी जैसा दिख रहा था।

     

    चेहरा।

     

    आंखें।

     

    बाल।

     

    सब कुछ।

     

    लेकिन वह तस्वीर चौदह साल पुरानी थी।

     

    इंदरजीत ने अपना मोबाइल निकाला और फोटो की तस्वीर लेने की कोशिश की।

     

    मोबाइल की स्क्रीन काली हो गई।

     

    फिर अपने आप एक वीडियो चलने लगा।

     

    वीडियो में वही होटल दिखाई दे रहा था।

     

    कैमरा किसी कमरे के अंदर था।

     

    आवाज़ें आ रही थीं।

     

    “निशा, दरवाज़ा बंद कर!”

     

    “जल्दी कर!”

     

    “वो आ रही है!”

     

    फिर किसी लड़के की आवाज़ आई—

     

    “इंदरजीत कहां है?”

     

    वीडियो में अचानक कैमरा घूम गया।

     

    एक लड़का दिखाई दिया।

     

    वह बिल्कुल इंदरजीत जैसा था।

     

    वह घबराया हुआ था।

     

    उसने कैमरे की तरफ देखा और कहा—

     

    “अगर कोई ये वीडियो देख रहा है, तो कमरे नंबर 101 में मत रुकना।”

     

    फिर पीछे से एक लड़की की आवाज़ आई।

     

    “इंदरजीत…”

     

    लड़का धीरे-धीरे पीछे मुड़ा।

     

    कैमरा जमीन पर गिर गया।

     

    वीडियो बंद हो गया।

     

    इंदरजीत का मोबाइल वापस सामान्य हो गया।

     

    वह कुछ समझ नहीं पा रहा था।

     

    तभी बॉक्स के अंदर रखे कागजों में से एक कागज नीचे गिरा।

     

    उस पर होटल के पुराने कर्मचारियों की रिपोर्ट थी।

     

    उसने पढ़ना शुरू किया।

     

    “17 अगस्त 2006 की रात होटल के कमरे नंबर 101 में पांच युवक-युवती रुके थे। सुबह कमरे में चार लोग मिले। पांचवां व्यक्ति, इंदरजीत, लापता था।”

     

    इंदरजीत की आंखें फैल गईं।

     

    “लेकिन मैं तो…”

     

    उसने कागज पलटा।

     

    अगली लाइन थी—

     

    “कमरे में मौजूद निशा ने दावा किया कि इंदरजीत गायब नहीं हुआ था। उसने कहा कि वह कमरे के आईने के अंदर चला गया।”

     

    इंदरजीत ने तुरंत आईने की तरफ देखा।

     

    आईना बिल्कुल शांत था।

     

    लेकिन उसमें…

     

    वह अकेला नहीं था।

     

    उसके पीछे चार लोग खड़े थे।

     

    अमित।

     

    राकेश।

     

    सुरेश।

     

    और निशा।

     

    चारों के चेहरे सफेद थे।

     

    इंदरजीत धीरे-धीरे पीछे मुड़ा।

     

    कमरा खाली था।

     

    उसने फिर आईने में देखा।

     

    चारों लोग अभी भी वहीं खड़े थे।

     

    निशा ने अपना हाथ उठाया।

     

    उसकी उंगली आईने के अंदर एक जगह की तरफ इशारा कर रही थी।

     

    इंदरजीत ने देखा।

     

    आईने के बीच में एक दरार दिखाई दे रही थी।

     

    वह दरार धीरे-धीरे बड़ी होने लगी।

     

    कर्क… कर्क…

     

    और फिर आईने के अंदर से एक आवाज़ आई।

     

    “इंदरजीत…”

     

    इस बार आवाज़ किसी लड़की की नहीं थी।

     

    यह उसकी अपनी आवाज़ थी।

     

    “मुझे बाहर निकालो…”

     

    इंदरजीत पीछे हट गया।

     

    “कौन हो तुम?”

     

    आईने के अंदर खड़ा इंदरजीत मुस्कुराया।

     

    “मैं वही हूं… जिसे तुम भूल चुके हो।”

     

    आईने में मौजूद चारों लोगों ने एक साथ अपना सिर नीचे कर लिया।

     

    फिर निशा ने कहा—

     

    “तुमने हमें मरने के लिए छोड़ दिया था।”

     

    इंदरजीत के दिमाग में अचानक तेज़ दर्द हुआ।

     

    उसकी आंखों के सामने कुछ तस्वीरें घूमने लगीं।

     

    एक पुराना कमरा।

     

    पांच दोस्त।

     

    शराब की बोतलें।

     

    हंसी।

     

    फिर निशा रो रही थी।

     

    किसी बात पर झगड़ा हो रहा था।

     

    और फिर…

     

    कमरे की लाइट बंद हो गई थी।

     

    अंधेरे में किसी ने चीखकर कहा था—

     

    “आईने को मत देखना!”

     

    लेकिन किसी ने आईने की तरफ देख लिया था।

     

    इंदरजीत ने अपना सिर पकड़ लिया।

     

    “ये सब… मेरे साथ क्यों हो रहा है?”

     

    निशा की आवाज़ आई—

     

    “क्योंकि तुम वापस आ गए हो।”

     

    “कहां से?”

     

    “उसी जगह से जहां तुम चौदह साल से फंसे हुए थे।”

     

    इंदरजीत ने आईने की तरफ देखा।

     

    आईने में अब वह कमरा दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    उसकी जगह एक लंबा अंधेरा गलियारा था।

     

    गलियारे के आखिर में एक दरवाज़ा था।

     

    उस पर लिखा था—

     

    101

     

    इंदरजीत को अचानक याद आया।

     

    उसने उस दरवाज़े को पहले भी देखा था।

     

    लेकिन कहां?

     

    उसके दिमाग में एक आवाज़ गूंजी—

     

    “तुम्हें सच जानना है?”

     

    उसने कांपते हुए पूछा—

     

    “हां।”

     

    “तो आईने के अंदर आओ।”

     

    “अगर मैं अंदर चला गया तो?”

     

    कुछ पल सन्नाटा रहा।

     

    फिर निशा बोली—

     

    “तुम बाहर कभी थे ही नहीं।”

     

    इंदरजीत का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    अचानक कमरे का दरवाज़ा अपने आप खुल गया।

     

    बाहर वही बूढ़ा रिसेप्शनिस्ट खड़ा था।

     

    उसने इंदरजीत को देखा और कहा—

     

    “मुझे पता था तुम वापस आओगे।”

     

    इंदरजीत दौड़कर उसके पास गया।

     

    “आप मुझे जानते हैं?”

     

    बूढ़े ने सिर हिलाया।

     

    “बहुत अच्छी तरह।”

     

    “मैं कौन हूं?”

     

    बूढ़े ने कुछ सेकंड तक उसे देखा।

     

    फिर धीरे से बोला—

     

    “तुम इंदरजीत नहीं हो।”

     

    इंदरजीत के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “क्या?”

     

    बूढ़े ने अपनी जेब से एक पुरानी फोटो निकाली।

     

    फोटो में वही पांच लोग थे।

     

    लेकिन इस बार पांचवां चेहरा साफ दिखाई दे रहा था।

     

    वह इंदरजीत नहीं था।

     

    वह एक दूसरा लड़का था।

     

    बूढ़े ने कहा—

     

    “असली इंदरजीत चौदह साल पहले मर चुका है।”

     

    इंदरजीत पीछे हट गया।

     

    “तो फिर मैं कौन हूं?”

     

    बूढ़े ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसकी नजर कमरे के आईने पर चली गई।

     

    आईने में निशा अब मुस्कुरा रही थी।

     

    फिर आईने पर धीरे-धीरे शब्द उभरे—

     

    “अब इसे सब कुछ याद आ गया है।”

     

    बूढ़े के चेहरे पर डर दिखाई देने लगा।

     

    उसने तुरंत इंदरजीत का हाथ पकड़ लिया।

     

    “भागो!”

     

    “कहां?”

     

    बूढ़े ने कांपते हुए कहा—

     

    “होटल से बाहर।”

     

    इंदरजीत सीढ़ियों की तरफ भागा।

     

    लेकिन जैसे ही वह नीचे पहुंचा, उसके सामने वही गलियारा था।

     

    कमरा नंबर 101।

     

    वह पीछे मुड़ा।

     

    फिर सामने देखा।

     

    फिर वही दरवाज़ा।

     

    101

     

    वह दूसरी तरफ भागा।

     

    फिर भी…

     

    कमरा 101।

     

    तीसरी तरफ गया।

     

    फिर भी…

     

    101।

     

    अब उसे समझ आ गया था।

     

    वह होटल में नहीं था।

     

    वह किसी और जगह फंस चुका था।

     

    तभी पीछे से किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

     

    उसने धीरे-धीरे पीछे देखा।

     

    निशा उसके बिल्कुल पीछे खड़ी थी।

     

    इस बार उसके चेहरे से बाल हटे हुए थे।

     

    और उसका चेहरा देखकर इंदरजीत की चीख निकल गई।

     

    क्योंकि निशा का चेहरा…

     

    बिल्कुल उसकी मां जैसा था।

     

    निशा ने धीरे से कहा—

     

    “बेटा… तुम्हें इतनी देर क्यों लगी मुझे पहचानने में?”

     

    और उसी क्षण पूरे होटल की सारी लाइटें बंद हो गईं।

     

    अंधेरे में सिर्फ एक आवाज़ गूंजी—

     

    “भाग 3 में सच सामने आएगा।”

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 😱कमरा नंबर 101😱–भाग 1

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    रात के करीब साढ़े ग्यारह बजे इंदरजीत उस पुराने होटल के सामने खड़ा था। बारिश इतनी तेज़ हो रही थी कि सड़क पर कुछ मीटर दूर तक भी साफ दिखाई नहीं दे रहा था। आसमान में बार-बार बिजली चमकती और कुछ सेकंड के लिए पूरा इलाका सफेद रोशनी में नहा जाता।

     

    होटल का नाम था—होटल शांति निवास।

     

    नाम सुनने में जितना शांत था, उसकी इमारत उतनी ही डरावनी लग रही थी।

     

    तीन मंज़िला वह पुरानी इमारत पिछले कई सालों से शहर के उस सुनसान हिस्से में खड़ी थी। दीवारों पर जगह-जगह सीलन थी, खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे और मुख्य दरवाज़े के ऊपर लगा बोर्ड हवा के साथ लगातार चरमराता था।

     

    इंदरजीत ने अपने बैग को कंधे पर ठीक किया और अंदर चला गया।

     

    वह शहर में नया था। उसे एक निजी कंपनी में नौकरी मिली थी और ऑफिस से नज़दीक होने के कारण उसने कुछ दिनों के लिए इसी होटल में कमरा लेने का फैसला किया था।

     

    रिसेप्शन पर एक बूढ़ा आदमी बैठा था।

     

    उसका चेहरा झुर्रियों से भरा था और उसकी आंखें कुछ अजीब तरह से स्थिर थीं।

     

    “कमरा चाहिए?” बूढ़े ने बिना इंदरजीत की तरफ देखे पूछा।

     

    “जी। एक रात के लिए।”

     

    बूढ़े ने रजिस्टर खोला।

     

    “नाम?”

     

    “इंदरजीत।”

     

    बूढ़े ने उसका नाम लिख लिया।

     

    फिर उसने चाबियों का एक गुच्छा उठाया। कुछ सेकंड तक वह चाबियों को देखता रहा और आखिर में एक चाबी अलग कर ली।

     

    उस पर पीतल की छोटी-सी प्लेट लगी थी।

     

    101

     

    इंदरजीत ने चाबी लेने के लिए हाथ बढ़ाया।

     

    लेकिन बूढ़े ने चाबी देने से पहले उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “एक बात याद रखना।”

     

    इंदरजीत ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।

     

    “जी?”

     

    बूढ़े की आवाज़ अचानक धीमी हो गई।

     

    “रात के बाद अगर कमरे के अंदर से किसी के रोने की आवाज़ आए… तो दरवाज़ा मत खोलना।”

     

    इंदरजीत कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    फिर हल्का-सा हंस दिया।

     

    “बाबा, आप मज़ाक कर रहे हैं?”

     

    बूढ़े ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसने बस चाबी इंदरजीत के हाथ में रख दी।

     

    “कमरा नंबर 101… पहली मंज़िल पर।”

     

    इंदरजीत सीढ़ियों की तरफ बढ़ गया।

     

    पीछे से बूढ़े की आवाज़ फिर सुनाई दी।

     

    “और हाँ… अगर कोई तुम्हारा नाम लेकर दरवाज़ा खटखटाए, तब भी दरवाज़ा मत खोलना।”

     

    इंदरजीत रुक गया।

     

    उसने पीछे मुड़कर देखा।

     

    लेकिन बूढ़ा अब रजिस्टर में कुछ लिख रहा था।

     

    इंदरजीत ने इसे होटल के मालिक की अजीब आदत समझकर बात वहीं छोड़ दी।

     

    पहली मंज़िल पर पहुंचकर उसने कमरा नंबर 101 खोज लिया।

     

    दरवाज़ा पुराना था। लकड़ी पर कई खरोंचें थीं।

     

    उसने चाबी लगाई।

     

    क्लिक।

     

    दरवाज़ा खुल गया।

     

    कमरे के अंदर अजीब-सी ठंड थी।

     

    बाहर इतनी उमस और बारिश होने के बावजूद कमरे में ऐसा लग रहा था जैसे कई घंटों से कोई खिड़की खुली हो।

     

    कमरे में एक पुराना पलंग, एक मेज़, एक कुर्सी और दीवार पर टंगा हुआ बड़ा-सा आईना था।

     

    इंदरजीत ने अपना बैग रखा और खिड़की बंद करने के लिए आगे बढ़ा।

     

    खिड़की पहले से बंद थी।

     

    लेकिन शीशे पर अंदर की तरफ पानी की बूंदें जमी थीं।

     

    उसने हाथ से शीशा साफ किया।

     

    बाहर अंधेरा था।

     

    अचानक बिजली चमकी।

     

    और उस एक पल की रोशनी में इंदरजीत को लगा कि सड़क के उस पार कोई लड़की खड़ी है।

     

    सफेद कपड़ों में।

     

    वह बिल्कुल स्थिर थी।

     

    इंदरजीत ने दोबारा देखा।

     

    वहां कोई नहीं था।

     

    “शायद मेरा भ्रम है।”

     

    उसने पर्दा खींच दिया।

     

    फिर वह पलंग पर लेट गया।

     

    रात के करीब बारह बजकर पंद्रह मिनट हुए होंगे कि कमरे में अचानक…

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    की आवाज़ आई।

     

    इंदरजीत उठकर बैठ गया।

     

    आवाज़ दरवाज़े से आ रही थी।

     

    उसने घड़ी देखी।

     

    12:15 AM.

     

    उसे रिसेप्शन वाले बूढ़े की बात याद आई।

     

    “किसी के नाम लेने पर भी दरवाज़ा मत खोलना।”

     

    वह कुछ देर शांत बैठा रहा।

     

    फिर बाहर से आवाज़ आई।

     

    “इंदरजीत…”

     

    उसका शरीर जैसे जम गया।

     

    आवाज़ बहुत धीमी थी।

     

    लेकिन वह साफ उसका नाम था।

     

    “इंदरजीत… दरवाज़ा खोलो।”

     

    उसने सांस रोक ली।

     

    वह दरवाज़े के पास नहीं गया।

     

    कुछ सेकंड तक सन्नाटा रहा।

     

    फिर…

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    इस बार आवाज़ और तेज़ थी।

     

    “इंदरजीत… मुझे अंदर आने दो।”

     

    उसने मोबाइल उठाया।

     

    नेटवर्क गायब था।

     

    उसने रिसेप्शन पर फोन करने की कोशिश की।

     

    फोन नहीं लगा।

     

    तभी दरवाज़े के नीचे से एक काली परछाईं दिखाई दी।

     

    किसी के पैर दरवाज़े के बाहर खड़े थे।

     

    इंदरजीत की नजरें उन पैरों पर टिक गईं।

     

    वह व्यक्ति बिल्कुल स्थिर खड़ा था।

     

    फिर धीरे-धीरे दरवाज़े के नीचे से एक हाथ दिखाई दिया।

     

    उंगलियां असामान्य रूप से लंबी थीं।

     

    वे दरवाज़े के नीचे से अंदर आने की कोशिश कर रही थीं।

     

    इंदरजीत पीछे हट गया।

     

    तभी बाहर से एक लड़की की आवाज़ आई।

     

    “तुमने मुझे पहचाना नहीं, इंदरजीत?”

     

    इंदरजीत का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

     

    वह आवाज़…

     

    उसे जानी-पहचानी लग रही थी।

     

    लेकिन वह याद नहीं कर पा रहा था कि उसने यह आवाज़ कहां सुनी थी।

     

    अचानक बाहर सब शांत हो गया।

     

    हाथ गायब हो गया।

     

    पैरों की परछाईं भी नहीं थी।

     

    इंदरजीत ने राहत की सांस ली।

     

    वह वापस पलंग पर बैठा।

     

    लेकिन तभी उसकी नजर सामने लगे आईने पर पड़ी।

     

    आईने में वह अकेला नहीं था।

     

    उसके पीछे एक लड़की खड़ी थी।

     

    सफेद कपड़े।

     

    लंबे काले बाल।

     

    चेहरा बालों से ढका हुआ।

     

    इंदरजीत ने डरते हुए पीछे मुड़कर देखा।

     

    पीछे कोई नहीं था।

     

    उसने फिर आईने में देखा।

     

    लड़की अब उसके बिल्कुल पीछे खड़ी थी।

     

    इंदरजीत चीखने ही वाला था कि आईने पर अपने आप धुंध जमने लगी।

     

    उस धुंध पर किसी ने उंगली से धीरे-धीरे लिखा—

     

    “तुम बहुत देर से आए हो।”

     

    इंदरजीत पीछे हट गया।

     

    तभी कमरे की लाइट बंद हो गई।

     

    पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया।

     

    मोबाइल की टॉर्च जलाकर उसने चारों तरफ देखा।

     

    कुछ नहीं था।

     

    फिर उसकी नजर पलंग के नीचे पड़ी।

     

    वहां से एक पुरानी डायरी बाहर निकली हुई थी।

     

    इंदरजीत ने कांपते हाथों से डायरी उठाई।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “अगर तुम्हें यह डायरी कमरा नंबर 101 में मिली है, तो समझ लो कि उसने तुम्हें भी चुन लिया है।”

     

    नीचे तारीख लिखी थी।

     

    17 अगस्त 2006

     

    इंदरजीत ने अगला पन्ना पलटा।

     

    उसमें होटल के इसी कमरे के बारे में लिखा था।

     

    “हर रात 12:15 पर वह आती है।”

     

    अगली लाइन पढ़ते ही इंदरजीत के हाथ कांपने लगे।

     

    “वह दरवाज़ा नहीं खोलती… वह इंतज़ार करती है कि तुम खुद उसे अंदर बुलाओ।”

     

    तभी कमरे के दरवाज़े पर फिर दस्तक हुई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    इंदरजीत ने डायरी बंद कर दी।

     

    बाहर से वही लड़की की आवाज़ आई।

     

    लेकिन इस बार आवाज़ बिल्कुल उसके कान के पास से आई—

     

    “इंदरजीत… दरवाज़ा तो तुमने पहले ही खोल दिया था।”

     

    इंदरजीत धीरे-धीरे पीछे मुड़ा।

     

    कमरे का दरवाज़ा…

     

    खुला हुआ था।

     

    और उसके बाहर अंधेरे गलियारे में एक लड़की खड़ी थी।

     

    उसका चेहरा अब भी बालों से ढका था।

     

    लेकिन उसके हाथ में…

     

    इंदरजीत की वही डायरी थी।

     

    वही डायरी…

     

    जो कुछ सेकंड पहले उसके हाथ में थी।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • बंद कमरे की आवाज़ भाग 3 — आखिरी दरवाज़ा

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    आरव कुछ क्षण तक अपने ही चेहरे को अंधेरे में देखता रहा।

     

    उसके सामने खड़ा व्यक्ति बिल्कुल उसी जैसा था।

     

    वही चेहरा।

     

    वही आँखें।

     

    वही कपड़े।

     

    लेकिन उसकी आँखों में कोई भाव नहीं था।

     

    कबीर पीछे हट गया।

     

    “आरव… ये क्या है?”

     

    सामने खड़ा दूसरा आरव मुस्कुराया।

     

    “तुम्हें सच जानना है?”

     

    असली आरव ने काँपते हुए पूछा—

     

    “तुम कौन हो?”

     

    दूसरा आरव धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

     

    “मैं वो हूँ जो हर बार यहाँ आने वाले लोगों की यादों से पैदा होता है।”

     

    “क्या मतलब?”

     

    “यह कमरा लोगों को मारता नहीं। यह उनकी यादों को अपने अंदर कैद करता है।”

     

    अचानक आरव के सिर में तेज़ दर्द होने लगा।

     

    उसकी आँखों के सामने पुराने दृश्य घूमने लगे।

     

    एक छोटी बच्ची।

     

    एक बंद कमरा।

     

    एक आदमी जंजीर लगा रहा था।

     

    और…

     

    एक बच्चा कमरे के बाहर खड़ा होकर रो रहा था।

     

    आरव ने सिर पकड़ लिया।

     

    “ये सब क्या है?”

     

    दूसरे आरव ने कहा—

     

    “तुमने बचपन में यह हवेली देखी थी। तुम्हें याद नहीं।”

     

    आरव को धीरे-धीरे कुछ याद आने लगा।

     

    वह लगभग पाँच साल का था।

     

    अपने नाना के साथ गाँव आया था।

     

    एक दिन वह खेलते-खेलते हवेली के अंदर चला गया था।

     

    उसी समय उसने एक बच्ची को कमरे की खिड़की से देखा था।

     

    वह बच्ची रो रही थी।

     

    उसने आरव से कहा था—

     

    “दरवाज़ा खोल दो।”

     

    लेकिन आरव डरकर भाग गया था।

     

    उस रात हवेली में आग लगी थी।

     

    मीरा गायब हो गई थी।

     

    और आरव की याददाश्त से वह पूरी घटना मिट गई थी।

     

    सामने खड़ा दूसरा आरव बोला—

     

    “तुम्हारे डर ने तुम्हारी याद को बंद कर दिया था। लेकिन कमरे ने उसे नहीं भुलाया।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “मीरा कहाँ है?”

     

    अंधेरे में एक छोटी बच्ची दिखाई दी।

     

    वही मासूम चेहरा।

     

    वही चाँदी की पायल।

     

    मीरा।

     

    उसकी आँखों में आँसू थे।

     

    “मैं यहाँ हूँ।”

     

    आरव उसके पास गया।

     

    “तुम्हें किसने बंद किया था?”

     

    मीरा ने पीछे देखा।

     

    “मेरे पिता ने।”

     

    “क्यों?”

     

    मीरा बोली—

     

    “क्योंकि मैं उस चीज़ को देख सकती थी जो दीवार के पीछे रहती थी।”

     

    अचानक सुरंग काँपने लगी।

     

    मीरा ने कहा—

     

    “वो चीज़ मेरे डर से बड़ी होती गई। हर बार जब कोई इस कमरे में आता है, वो उसकी आवाज़ चुरा लेती है। फिर उसकी याद। और आखिर में उसका चेहरा।”

     

    आरव ने सफेद आँखों वाली लड़की को याद किया।

     

    “वो क्या है?”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “उसका कोई नाम नहीं। लोग उसे अलग-अलग नाम देते रहे। लेकिन वह असल में डर है।”

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “इसे खत्म कैसे किया जा सकता है?”

     

    मीरा ने अपनी पायल उतारी।

     

    “इसे उसी जगह लौटाना होगा जहाँ से सब शुरू हुआ था।”

     

    सुरंग के अंत में एक छोटा कमरा था।

     

    कमरे के बीचोंबीच पत्थर का एक पुराना चबूतरा था।

     

    उस पर एक गोल निशान बना था।

     

    मीरा ने कहा—

     

    “यहीं मेरी पायल रख दो।”

     

    आरव ने पायल चबूतरे पर रख दी।

     

    अचानक पूरी हवेली में जोरदार चीख गूँजी।

     

    सफेद आँखों वाली लड़की सुरंग में दिखाई दी।

     

    इस बार उसका चेहरा भयानक था।

     

    उसने कहा—

     

    “तुम मुझे खत्म नहीं कर सकते।”

     

    आरव ने साहस जुटाकर कहा—

     

    “तू भूत नहीं है। तू सिर्फ हमारा डर है।”

     

    वह चीखी।

     

    “डर को खत्म नहीं किया जा सकता!”

     

    आरव ने कहा—

     

    “लेकिन उसका सामना किया जा सकता है।”

     

    अचानक सुरंग की दीवारों पर कैद सभी आवाज़ें एक साथ गूँजने लगीं।

     

    “हमें बचाओ!”

     

    “हमें बाहर निकालो!”

     

    “बहुत अंधेरा है!”

     

    कबीर ने चिल्लाकर कहा—

     

    “आरव! कुछ करो!”

     

    आरव ने चबूतरे पर हाथ रखा।

     

    उसे अचानक महसूस हुआ कि उसके भीतर वर्षों से छिपा डर बाहर निकल रहा है।

     

    उसे अपना बचपन दिखाई दिया।

     

    वह बच्चा आरव कमरे के सामने खड़ा था।

     

    मीरा अंदर से मदद माँग रही थी।

     

    बच्चा आरव डरकर भाग रहा था।

     

    इस बार उसने खुद को भागने नहीं दिया।

     

    वह उस पुराने दृश्य में वापस गया।

     

    मीरा ने हाथ बढ़ाया।

     

    “आरव… दरवाज़ा खोल दो।”

     

    इस बार आरव ने दरवाज़ा खोल दिया।

     

    कमरे के भीतर घना अंधेरा था।

     

    अंधेरे में वही सफेद आँखों वाली लड़की खड़ी थी।

     

    उसने कहा—

     

    “तुम मुझे स्वीकार करोगे तो मैं तुम्हारा हिस्सा बन जाऊँगी।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “नहीं। मैं अपने डर को स्वीकार करता हूँ… लेकिन उसे अपने ऊपर राज नहीं करने दूँगा।”

     

    उसने मीरा का हाथ पकड़ लिया।

     

    अचानक लड़की चीखने लगी।

     

    उसका शरीर धुएँ में बदलने लगा।

     

    कमरे की दीवारें टूटने लगीं।

     

    काला हाथ दीवार से अलग होकर जमीन पर गिरा।

     

    और फिर…

     

    सब कुछ शांत हो गया।

     

    सुरंग में सुबह की रोशनी फैलने लगी।

     

    मीरा आरव के सामने खड़ी थी।

     

    अब उसके चेहरे पर डर नहीं था।

     

    वह मुस्कुराई।

     

    “अब मैं जा सकती हूँ।”

     

    आरव की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “तुम्हें बहुत पहले जाना चाहिए था।”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “तुमने बहुत देर से सही… लेकिन इस बार दरवाज़ा खोल दिया।”

     

    उसका शरीर धीरे-धीरे रोशनी में बदल गया।

     

    चाँदी की पायल जमीन पर गिर गई।

     

    और मीरा गायब हो गई।

     

    कुछ ही क्षण बाद पूरी हवेली काँपने लगी।

     

    आरव और कबीर सुरंग से बाहर भागे।

     

    जैसे ही वे हवेली से बाहर निकले, पीछे से एक जोरदार आवाज़ आई।

     

    धड़ाम!

     

    पूरी पुरानी हवेली का बीच वाला हिस्सा ढह गया।

     

    कुछ देर तक धूल हवा में उड़ती रही।

     

    फिर सब शांत हो गया।

     

    गाँव वाले वहाँ इकट्ठा हो गए।

     

    नाना भी दौड़ते हुए पहुँचे।

     

    उन्होंने आरव को गले लगा लिया।

     

    “तुम ठीक हो?”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    उसने अपनी जेब से चाँदी की पायल निकाली।

     

    नाना उसे देखते ही समझ गए कि सब खत्म हो चुका है।

     

    “मीरा…”

     

    उन्होंने बस इतना कहा।

     

    उस रात आरव पहली बार बिना डर के सोया।

     

    सुबह जब वह गाँव से जाने लगा तो उसने आखिरी बार हवेली की तरफ देखा।

     

    जहाँ कभी वह काला कमरा था, वहाँ अब सिर्फ मलबा था।

     

    लेकिन तभी…

     

    उसे बहुत हल्की-सी आवाज़ सुनाई दी।

     

    “आरव…”

     

    वह रुक गया।

     

    कुछ क्षण बाद वही आवाज़ फिर आई।

     

    “धन्यवाद।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    उसे पता था कि यह मीरा की आवाज़ थी।

     

    वह कार में बैठ गया और गाँव से निकल गया।

     

    कहानी यहीं खत्म हो जानी चाहिए थी।

     

    लेकिन…

     

    उस रात शहर लौटने के बाद आरव ने अपने कमरे की अलमारी खोली।

     

    अंदर उसे वही पुरानी चाँदी की पायल दिखाई दी।

     

    जबकि वह पायल तो उसने हवेली के मलबे के पास छोड़ दी थी।

     

    आरव धीरे-धीरे उसके पास गया।

     

    पायल के नीचे एक छोटा-सा कागज़ रखा था।

     

    उस पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

     

    “हर बंद कमरा खाली नहीं होता।”

     

    आरव ने कागज़ को देखा।

     

    और तभी उसके कमरे के बंद दरवाज़े पर…

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    तीन बार दस्तक हुई।

     

    आरव ने दरवाज़े की ओर देखा।

     

    कुछ सेकंड तक सन्नाटा रहा।

     

    फिर बाहर से एक बच्ची की धीमी आवाज़ आई—

     

    “आरव…”

     

    लेकिन इस बार वह आवाज़ मीरा की नहीं थी।

     

    और कहानी यहीं समाप्त होती है।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • बंद कमरे की आवाज़ भाग 2 — कमरे के अंदर कौन था?

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    आरव पूरी ताकत से हवेली के मुख्य दरवाज़े की ओर भागा।

     

    उसने दरवाज़े को खींचा।

     

    लेकिन दरवाज़ा नहीं खुला।

     

    “खुल जा!”

     

    वह बार-बार दरवाज़ा पीटने लगा।

     

    पीछे से कदमों की आवाज़ धीरे-धीरे उसके करीब आ रही थी।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    आरव ने पलटकर देखा।

     

    गलियारा खाली था।

     

    लेकिन फर्श पर पानी के छोटे-छोटे निशान बन रहे थे।

     

    जैसे कोई अदृश्य व्यक्ति उसकी तरफ चलकर आ रहा हो।

     

    अचानक उसके कान के पास किसी ने फुसफुसाया—

     

    “भागोगे कहाँ?”

     

    आरव चीख पड़ा और पीछे हट गया।

     

    उसी समय मुख्य दरवाज़ा अचानक खुल गया।

     

    वह बिना पीछे देखे हवेली से बाहर भागा।

     

    गाँव पहुँचकर उसने किसी को कुछ नहीं बताया।

     

    लेकिन उस रात उसे नींद नहीं आई।

     

    बार-बार वही आवाज़ उसके कानों में गूँज रही थी—

     

    “अब तुमने मुझे सुन लिया है।”

     

    सुबह होते ही आरव ने अपने नाना को सब कुछ बता दिया।

     

    नाना बहुत देर तक चुप रहे।

     

    फिर उन्होंने संदूक से एक पुरानी डायरी निकाली।

     

    डायरी के पन्ने पीले पड़ चुके थे।

     

    “ये तुम्हारे परनाना की डायरी है,” नाना ने कहा।

     

    “उन्होंने उस हवेली में कई साल काम किया था।”

     

    आरव ने डायरी खोली।

     

    एक पन्ने पर लिखा था—

     

    “मीरा उस कमरे में नहीं मरी थी।”

     

    आरव की आँखें फैल गईं।

     

    अगले पन्ने पर लिखा था—

     

    “उस कमरे में मीरा के अलावा भी कोई था।”

     

    आरव ने जल्दी से अगला पन्ना पलटा।

     

    वहाँ लिखा था—

     

    “ठाकुर साहब ने एक रात मुझे कमरे के बाहर पहरा देने को कहा। उन्होंने कहा कि मीरा पागल हो चुकी है और किसी से बात करती रहती है। रात करीब बारह बजे अंदर से बच्ची के रोने की आवाज़ आई। फिर उसने कहा—’मुझे बचा लो। वो मुझे लेने आ गया है।’”

     

    अगली पंक्ति पढ़ते ही आरव का हाथ काँपने लगा।

     

    “मैंने दरवाज़ा खोलने की कोशिश की। तभी अंदर से ठाकुर साहब की आवाज़ आई—’दरवाज़ा मत खोलना। वो मीरा नहीं है।’”

     

    आरव ने डायरी बंद कर दी।

     

    “फिर क्या हुआ?”

     

    नाना बोले—

     

    “आगे पढ़ो।”

     

    अगले पन्ने पर लिखा था—

     

    “दरवाज़े के नीचे से खून बाहर आने लगा। लेकिन कमरे में मीरा के अलावा कोई नहीं था। सुबह जब दरवाज़ा खोला गया तो मीरा गायब थी। कमरे की दीवार पर एक निशान बना था—एक काले हाथ का निशान।”

     

    आरव ने तुरंत पूछा—

     

    “क्या वो निशान अभी भी है?”

     

    नाना ने कहा—

     

    “शायद।”

     

    आरव ने उसी दिन हवेली लौटने का फैसला किया।

     

    इस बार उसके साथ उसका दोस्त कबीर भी गया।

     

    कबीर को पूरी कहानी बताने के बाद दोनों हवेली में दाखिल हुए।

     

    “अगर कुछ हुआ तो तुरंत भागेंगे,” कबीर ने कहा।

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    दोनों ऊपर पहुँचे।

     

    वह काला कमरा अब खुला हुआ था।

     

    दरवाज़ा आधा टूटा था।

     

    अंदर घना अंधेरा था।

     

    कबीर ने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई।

     

    कमरा देखने में बिल्कुल साधारण था।

     

    एक पुराना लकड़ी का पलंग।

     

    टूटी हुई अलमारी।

     

    दीवार पर कुछ पुराने निशान।

     

    और सामने की दीवार पर…

     

    काला हाथ।

     

    आरव उसके करीब गया।

     

    निशान ऐसा था जैसे किसी ने काले रंग से हाथ लगाकर दीवार पर छाप छोड़ी हो।

     

    लेकिन जैसे ही उसने हाथ उसके करीब किया…

     

    दीवार से आवाज़ आई।

     

    “आरव…”

     

    कबीर पीछे हट गया।

     

    “तूने भी सुना?”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    फिर कमरे के कोने से बच्चे के रोने की आवाज़ आई।

     

    दोनों ने उधर देखा।

     

    वहाँ एक पुराना लकड़ी का बक्सा पड़ा था।

     

    बक्सा अपने आप हिल रहा था।

     

    कबीर ने कहा—

     

    “इसे मत खोलना।”

     

    लेकिन आरव ने बक्से का ढक्कन उठा दिया।

     

    अंदर एक पुरानी लाल रंग की गुड़िया थी।

     

    उसके साथ एक छोटी-सी चाँदी की पायल और एक कागज़ रखा था।

     

    कागज़ पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

     

    “मीरा ने दरवाज़ा नहीं खोला था। किसी और ने खोला था।”

     

    अचानक कमरे का दरवाज़ा बंद हो गया।

     

    कबीर ने उसे खोलने की कोशिश की।

     

    दरवाज़ा नहीं खुला।

     

    फिर कमरे की दीवारों से फुसफुसाहट आने लगी।

     

    एक नहीं…

     

    दर्जनों आवाज़ें।

     

    “हमें बाहर निकालो…”

     

    “बहुत अंधेरा है…”

     

    “हमें बचाओ…”

     

    “दरवाज़ा खोलो…”

     

    आरव ने कान बंद कर लिए।

     

    लेकिन आवाज़ें और तेज़ हो गईं।

     

    तभी दीवार पर बना काला हाथ धीरे-धीरे हिलने लगा।

     

    उसकी उँगलियाँ दीवार से अलग हुईं।

     

    कबीर चीख पड़ा।

     

    काला निशान दीवार से बाहर निकल रहा था।

     

    अब वह एक हाथ जैसा दिख रहा था।

     

    फिर दूसरा हाथ।

     

    फिर एक सिर।

     

    और धीरे-धीरे एक पूरा शरीर दीवार से बाहर आने लगा।

     

    वह वही छोटी लड़की थी जिसे आरव ने पिछली बार देखा था।

     

    लेकिन इस बार उसके चेहरे पर आँखें थीं।

     

    और उसकी आँखें…

     

    पूरी तरह सफेद थीं।

     

    उसने आरव को देखकर कहा—

     

    “तुम वापस क्यों आए?”

     

    आरव काँपते हुए बोला—

     

    “मीरा कहाँ है?”

     

    लड़की मुस्कुराई।

     

    “मीरा तो उस रात ही मर गई थी।”

     

    “फिर तुम कौन हो?”

     

    उसने अपना सिर टेढ़ा किया।

     

    “जिसे उसने कमरे में बंद किया था।”

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “किसने?”

     

    लड़की ने धीरे-धीरे कमरे की दीवार की ओर इशारा किया।

     

    “उसके पिता ने।”

     

    आरव को डायरी की बात याद आई।

     

    लड़की बोली—

     

    “मीरा ने मुझे देखा था। उसने मुझे बाहर निकालना चाहा। लेकिन उसके पिता ने दरवाज़ा बंद कर दिया।”

     

    “तुम इंसान थीं?”

     

    लड़की की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “मैं कभी इंसान नहीं थी।”

     

    अचानक कमरे की दीवारें काँपने लगीं।

     

    फर्श के नीचे से चीखें आने लगीं।

     

    आरव ने देखा कि कमरे के फर्श पर कई पुराने हाथों के निशान उभर रहे थे।

     

    लड़की आगे बढ़ी।

     

    “मीरा ने मुझे रोकने की कोशिश की थी। इसलिए मैंने उसे अपने साथ ले लिया।”

     

    “कहाँ?”

     

    लड़की ने फर्श की तरफ देखा।

     

    “नीचे।”

     

    उसी क्षण फर्श टूट गया।

     

    कबीर गिरते-गिरते बचा।

     

    नीचे एक गहरी सुरंग दिखाई दी।

     

    सुरंग के भीतर से ठंडी हवा आ रही थी।

     

    और उसी हवा में एक बच्ची की आवाज़ सुनाई दी—

     

    “आरव…”

     

    इस बार आवाज़ अलग थी।

     

    मासूम।

     

    डरी हुई।

     

    “आरव… मुझे बचा लो।”

     

    आरव ने पहचान लिया।

     

    “मीरा!”

     

    सफेद आँखों वाली लड़की अचानक चीखने लगी।

     

    “उसकी बात मत सुनो!”

     

    आरव ने सुरंग की ओर देखा।

     

    वहाँ अंधेरे में एक छोटी बच्ची खड़ी थी।

     

    उसके हाथ में वही चाँदी की पायल थी।

     

    मीरा ने कहा—

     

    “मुझे यहाँ से बाहर निकालो।”

     

    आरव सुरंग में उतरने लगा।

     

    कबीर ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तू पागल है? हमें यहाँ से निकलना चाहिए!”

     

    आरव ने कहा—

     

    “अगर मीरा सच में यहाँ है, तो हमें उसे बचाना होगा।”

     

    दोनों सुरंग में उतर गए।

     

    पीछे खड़ी सफेद आँखों वाली लड़की उन्हें देखती रही।

     

    फिर उसने बहुत धीमी आवाज़ में कहा—

     

    “जब सच जान जाओगे…”

     

    “तब तुम खुद बाहर नहीं निकलना चाहोगे।”

     

    सुरंग बहुत लंबी थी।

     

    कुछ दूर जाने के बाद उन्हें दीवार पर पुराने नाम लिखे मिले।

     

    दर्जनों नाम।

     

    और सबसे नीचे…

     

    मीरा।

     

    उसके ठीक नीचे एक और नाम लिखा था।

     

    आरव ने टॉर्च पास की।

     

    नाम देखकर उसके हाथ से मोबाइल गिर गया।

     

    वहाँ लिखा था—

     

    आरव।

     

    कबीर ने काँपते हुए पूछा—

     

    “ये कैसे हो सकता है?”

     

    तभी पीछे से सुरंग का रास्ता बंद हो गया।

     

    और अंधेरे में किसी ने फुसफुसाकर कहा—

     

    “क्योंकि तुम पहले भी यहाँ आ चुके हो।”

     

    आरव ने पलटकर देखा।

     

    अंधेरे में एक चेहरा दिखाई दिया।

     

    वह चेहरा…

     

    खुद आरव का था।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • बंद कमरे की आवाज़ भाग 1 — आधी रात की दस्तक

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    शहर से लगभग पचास किलोमीटर दूर एक छोटा-सा गाँव था—देवगढ़। गाँव के आखिरी छोर पर एक पुरानी हवेली खड़ी थी, जिसे लोग काली हवेली के नाम से जानते थे। हवेली करीब सौ साल पुरानी थी और पिछले पच्चीस वर्षों से पूरी तरह बंद पड़ी थी।

     

    गाँव के बुज़ुर्ग कहते थे कि हवेली के अंदर एक कमरा ऐसा था, जिसका दरवाज़ा कभी नहीं खोला गया। उस कमरे से रात के समय आवाज़ें आती थीं।

     

    कभी किसी बच्चे के रोने की।

     

    कभी किसी औरत के धीरे-धीरे गुनगुनाने की।

     

    और कभी…

     

    दरवाज़ा खटखटाने की।

     

    गाँव वाले उस हवेली के पास से दिन में भी गुजरने से बचते थे।

     

    लेकिन आरव को इन बातों पर विश्वास नहीं था।

     

    आरव शहर में पढ़ा-लिखा एक युवा था और कुछ दिनों के लिए अपने नाना के गाँव आया था। उसे बचपन से ही पुराने मकानों और रहस्यमयी जगहों के बारे में जानने का शौक था।

     

    एक शाम चाय की दुकान पर बैठे-बैठे उसने हवेली का जिक्र छेड़ दिया।

     

    “लोग कहते हैं उस हवेली में भूत है,” आरव ने हँसते हुए कहा, “लेकिन किसी ने देखा भी है उसे?”

     

    चाय वाले बूढ़े हरिराम ने उसकी ओर गंभीरता से देखा।

     

    “देखने की जरूरत नहीं पड़ती बेटा। कुछ चीज़ें दिखाई नहीं देतीं… महसूस होती हैं।”

     

    “और वो बंद कमरा?”

     

    हरिराम का चेहरा अचानक उतर गया।

     

    “उसके बारे में मत पूछो।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “क्यों?”

     

    हरिराम ने धीमी आवाज़ में कहा—

     

    “क्योंकि जो उस कमरे की आवाज़ सुन लेता है… वह फिर पहले जैसा नहीं रहता।”

     

    आरव ने इसे भी गाँव की कहानी समझकर टाल दिया।

     

    लेकिन उसी रात करीब दो बजे उसकी नींद अचानक खुल गई।

     

    कमरे में अजीब-सी ठंड थी।

     

    खिड़की बंद थी, फिर भी पर्दा धीरे-धीरे हिल रहा था।

     

    आरव ने उठकर खिड़की देखी।

     

    सब कुछ सामान्य था।

     

    वह वापस बिस्तर पर जाने ही वाला था कि…

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    दरवाज़े पर तीन बार दस्तक हुई।

     

    आरव रुक गया।

     

    “कौन?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    कुछ सेकंड बाद फिर आवाज़ हुई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    इस बार आवाज़ के साथ एक धीमी फुसफुसाहट भी सुनाई दी।

     

    “आरव…”

     

    उसका शरीर सिहर उठा।

     

    आवाज़ किसी बच्चे की थी।

     

    आरव धीरे-धीरे दरवाज़े के पास गया।

     

    “कौन है?”

     

    बाहर सन्नाटा था।

     

    उसने दरवाज़ा खोला।

     

    गलियारा खाली था।

     

    लेकिन फर्श पर गीले पैरों के छोटे-छोटे निशान बने हुए थे।

     

    वे निशान दरवाज़े से शुरू होकर…

     

    सीधे हवेली की दिशा में जा रहे थे।

     

    आरव ने तुरंत दरवाज़ा बंद कर लिया।

     

    सुबह उसने अपने नाना से इस बारे में पूछा।

     

    नाना कुछ देर चुप रहे।

     

    फिर बोले—

     

    “तुमने हवेली की आवाज़ सुनी है?”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “आपको कैसे पता?”

     

    नाना ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्योंकि ये पहली बार नहीं हुआ।”

     

    “क्या मतलब?”

     

    नाना ने गहरी साँस ली।

     

    “पच्चीस साल पहले उस हवेली में ठाकुर वीरेंद्र सिंह अपने परिवार के साथ रहते थे। उनकी पत्नी, उनका बेटा और उनकी छोटी बेटी—मीरा।”

     

    “फिर?”

     

    “एक रात हवेली में आग लगी। ठाकुर और उनकी पत्नी तो बाहर निकल आए, लेकिन मीरा अंदर रह गई।”

     

    आरव ने पूछा, “क्या उसकी मौत हो गई?”

     

    नाना ने सिर हिलाया।

     

    “कहते हैं कि आग लगने से पहले मीरा को हवेली के एक कमरे में बंद कर दिया गया था।”

     

    आरव का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मीरा लगातार कह रही थी कि कमरे की दीवार के पीछे से कोई उसे बुलाता है।”

     

    कुछ पल के लिए दोनों के बीच खामोशी छा गई।

     

    नाना ने आगे कहा—

     

    “लोगों ने सोचा बच्ची डर गई है। लेकिन उस रात उसने अपने पिता से कहा था—”

     

    नाना की आवाज़ काँपने लगी।

     

    “पापा… कमरे में कोई और भी है।”

     

    आरव के रोंगटे खड़े हो गए।

     

    “उसके बाद?”

     

    “सुबह कमरा खोला गया। मीरा वहाँ नहीं थी।”

     

    “क्या?”

     

    “कमरा अंदर से बंद था। खिड़की भी बंद। लेकिन बच्ची गायब थी।”

     

    आरव कुछ बोल नहीं पाया।

     

    “फिर हवेली में आग लगी।”

     

    “और उसके बाद से वह कमरा बंद है?”

     

    “हाँ।”

     

    आरव के मन में अब डर के साथ जिज्ञासा भी पैदा हो चुकी थी।

     

    उस दिन दोपहर को उसने हवेली जाने का फैसला किया।

     

    नाना ने बहुत मना किया।

     

    लेकिन आरव नहीं माना।

     

    हवेली का मुख्य दरवाज़ा जंग लगा हुआ था। उसे धक्का देते ही वह भयानक आवाज़ के साथ खुल गया।

     

    अंदर धूल, मकड़ी के जाले और सड़ती लकड़ी की गंध थी।

     

    दीवारों पर पुराने चित्र टंगे थे।

     

    आरव धीरे-धीरे आगे बढ़ता गया।

     

    ऊपर जाने वाली सीढ़ियों के पास उसे एक पुरानी तस्वीर मिली।

     

    तस्वीर में चार लोग थे।

     

    ठाकुर वीरेंद्र सिंह।

     

    उनकी पत्नी।

     

    एक छोटा लड़का।

     

    और एक छोटी लड़की।

     

    मीरा।

     

    आरव तस्वीर को ध्यान से देखने लगा।

     

    अचानक…

     

    तस्वीर में मीरा की आँखों पर उसे कुछ अजीब दिखाई दिया।

     

    ऐसा लग रहा था जैसे उसकी आँखें तस्वीर के अंदर से उसे देख रही हों।

     

    आरव ने तस्वीर नीचे रख दी।

     

    उसी समय ऊपर से किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई।

     

    धड़ाम!

     

    वह सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।

     

    ऊपर एक लंबा गलियारा था।

     

    गलियारे के आखिरी छोर पर एक काला दरवाज़ा था।

     

    दरवाज़े पर लोहे की मोटी जंजीर बंधी थी।

     

    यही था वह बंद कमरा।

     

    आरव धीरे-धीरे उसके पास गया।

     

    तभी…

     

    अंदर से आवाज़ आई।

     

    “आरव…”

     

    वह पीछे हट गया।

     

    आवाज़ बिल्कुल साफ थी।

     

    “आरव… मुझे बाहर निकालो।”

     

    आरव का गला सूख गया।

     

    वह भागना चाहता था।

     

    लेकिन तभी अंदर से एक बच्ची रोने लगी।

     

    “मुझे बहुत डर लग रहा है…”

     

    आरव ने काँपते हुए पूछा—

     

    “तुम… मीरा हो?”

     

    कुछ पल तक कोई जवाब नहीं आया।

     

    फिर अंदर से धीमी आवाज़ आई—

     

    “नहीं…”

     

    आरव की साँस रुक गई।

     

    आवाज़ फिर आई—

     

    “मीरा तो बहुत पहले चली गई।”

     

    दरवाज़े के नीचे से अचानक काला पानी जैसा कुछ बाहर आने लगा।

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    और तभी कमरे के अंदर से किसी ने जोर से दरवाज़ा पीटना शुरू कर दिया।

     

    धड़ाम!

     

    धड़ाम!

     

    धड़ाम!

     

    जंजीरें हिलने लगीं।

     

    आरव भागने के लिए मुड़ा।

     

    लेकिन सीढ़ियों के नीचे…

     

    एक छोटी लड़की खड़ी थी।

     

    उसका चेहरा नीचे झुका हुआ था।

     

    बाल उसके चेहरे को ढके हुए थे।

     

    आरव ने काँपते हुए पूछा—

     

    “तुम… कौन हो?”

     

    लड़की ने धीरे-धीरे सिर उठाया।

     

    उसके चेहरे पर आँखें नहीं थीं।

     

    सिर्फ दो गहरे काले गड्ढे थे।

     

    और उसके होंठों पर एक अजीब मुस्कान थी।

     

    उसने कहा—

     

    “तुमने दरवाज़ा क्यों खोला?”

     

    आरव ने पीछे देखा।

     

    बंद कमरे की जंजीर…

     

    अपने आप खुल चुकी थी।

     

    और कमरे के अंदर से किसी के कदमों की आवाज़ आ रही थी।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    कोई कमरे से बाहर आ रहा था।

     

    आरव ने दौड़ लगा दी।

     

    लेकिन उसके पीछे से एक आवाज़ गूँजी—

     

    “आरव…”

     

    “अब तुमने मुझे सुन लिया है।”

     

    और उसी क्षण…

     

    हवेली का मुख्य दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • कातिल कौन? भाग 3 — असली कातिल

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    रात के ठीक बारह बजे अर्जुन पुराने थिएटर के सामने खड़ा था।

     

    थिएटर वर्षों से बंद था।

     

    दरवाज़े पर जंग लगी थी और अंदर घना अंधेरा था।

     

    अर्जुन ने अपनी पिस्तौल निकाली और धीरे-धीरे अंदर प्रवेश किया।

     

    “सुमन!”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    अंदर टूटी हुई कुर्सियाँ और पुराने पोस्टर पड़े थे।

     

    अचानक पीछे से आवाज़ आई—

     

    “आपको अकेले आने को कहा था।”

     

    अर्जुन पलटा।

     

    एक आदमी अंधेरे में खड़ा था।

     

    चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    अर्जुन ने पिस्तौल तान दी।

     

    “सुमन कहाँ है?”

     

    वह आदमी हँसा।

     

    “पहले आपको यह समझना होगा कि आप किसे बचाने आए हैं।”

     

    अर्जुन ने कहा—

     

    “अपना चेहरा दिखाओ।”

     

    वह व्यक्ति धीरे-धीरे रोशनी में आया।

     

    अर्जुन की आँखें फैल गईं।

     

    वह आदमी था—

     

    इंस्पेक्टर विक्रम।

     

    अर्जुन का अपना साथी।

     

    “तुम?”

     

    विक्रम मुस्कुराया।

     

    “हाँ।”

     

    अर्जुन ने पिस्तौल सीधी कर दी।

     

    “सुमन कहाँ है?”

     

    “जिंदा है।”

     

    “उसे कहाँ रखा है?”

     

    विक्रम ने थिएटर के पीछे बने कमरे की ओर इशारा किया।

     

    “लेकिन उसे बचाने से पहले आपको पूरी कहानी सुननी होगी।”

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “तुमने विवेक और विनय को मारा?”

     

    विक्रम ने कुछ क्षण उसे देखा।

     

    फिर कहा—

     

    “हाँ।”

     

    अर्जुन कुछ नहीं बोला।

     

    विक्रम आगे बढ़ा।

     

    “लेकिन वजह वह नहीं है जो तुम सोच रहे हो।”

     

    “तो वजह क्या है?”

     

    “दस साल पहले मेरी बहन माधवी थी।”

     

    अर्जुन का चेहरा बदल गया।

     

    माधवी…

     

    विवेक की पत्नी।

     

    विक्रम ने कहा—

     

    “माधवी को पता चल गया था कि कंपनी के दो करोड़ रुपये किसने चुराए थे।”

     

    “विवेक और विनय?”

     

    “हाँ।”

     

    “लेकिन तुमने कहा था कि विवेक ने उसे बचाने की कोशिश की थी।”

     

    विक्रम हँसा।

     

    “वह कहानी थी।”

     

    “सच क्या है?”

     

    विक्रम ने कहा—

     

    “विवेक और विनय दोनों ने पैसे चुराए थे। माधवी ने उन्हें पकड़ लिया। उसने पुलिस में जाने की धमकी दी।”

     

    “फिर?”

     

    “उन्होंने माधवी को डराने की कोशिश की। उस रात कार में उसका पीछा किया गया। उसकी कार का ब्रेक काट दिया गया।”

     

    अर्जुन ने धीमे से पूछा—

     

    “और वह मर गई।”

     

    विक्रम ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “लेकिन केस में इसे हादसा बताया गया।”

     

    “क्योंकि पुलिस रिकॉर्ड बदल दिया गया था।”

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “किसने?”

     

    विक्रम ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “उस समय के थानेदार ने।”

     

    अर्जुन चुप हो गया।

     

    विक्रम बोला—

     

    “वही थानेदार तुम्हारा पिता था।”

     

    अर्जुन के हाथ से पिस्तौल लगभग ढीली पड़ गई।

     

    “मेरे… पिता?”

     

    “हाँ।”

     

    “तुम झूठ बोल रहे हो।”

     

    “अगर झूठ है तो यह देखो।”

     

    विक्रम ने एक पुरानी फाइल अर्जुन की ओर फेंक दी।

     

    अर्जुन ने फाइल खोली।

     

    उसमें माधवी की दुर्घटना की रिपोर्ट थी।

     

    लेकिन आखिरी पन्ने पर एक नोट था—

     

    “दुर्घटना नहीं। ब्रेक से छेड़छाड़ की संभावना।”

     

    उस रिपोर्ट के नीचे उसके पिता के हस्ताक्षर थे।

     

    अर्जुन की आँखों में गुस्सा भर आया।

     

    “मेरे पिता ने केस क्यों दबाया?”

     

    विक्रम ने कहा—

     

    “क्योंकि उन्हें रिश्वत दी गई थी।”

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “किसने?”

     

    “विवेक और विनय ने।”

     

    कुछ क्षण तक दोनों के बीच सन्नाटा रहा।

     

    फिर अर्जुन ने पूछा—

     

    “तो तुमने उन्हें मार दिया?”

     

    “हाँ।”

     

    “सुमन?”

     

    “वह गवाह थी।”

     

    “उसे क्यों उठाया?”

     

    “क्योंकि वह उस रात वहाँ थी।”

     

    अर्जुन ने चौंककर पूछा—

     

    “वह क्या जानती थी?”

     

    विक्रम ने कहा—

     

    “उसने माधवी की कार को उस रात जाते देखा था।”

     

    “और उसने दस साल तक चुप्पी क्यों साधे रखी?”

     

    “क्योंकि विवेक उसे पैसे देता रहा।”

     

    अर्जुन ने गहरी साँस ली।

     

    “लेकिन राहुल?”

     

    विक्रम मुस्कुराया।

     

    “वह निर्दोष है।”

     

    “और नैना?”

     

    “वह भी।”

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “तो लाल बैग में खून क्यों था?”

     

    विक्रम ने कहा—

     

    “मैंने रखा था। राहुल को फँसाने के लिए।”

     

    “और सुमन के कमरे में खून?”

     

    “नकली।”

     

    अर्जुन ने धीरे से पूछा—

     

    “लेकिन एक बात समझ नहीं आई। विवेक की हत्या के बाद जो कागज़ मिला था—’कातिल तुम्हारे बहुत करीब है’—वह किसने लिखा?”

     

    विक्रम की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “विवेक ने।”

     

    “क्या?”

     

    “उसे पता था कि मैं उसके पीछे हूँ। उसने मरने से पहले सच का इशारा करने की कोशिश की।”

     

    अर्जुन ने कहा—

     

    “तो उसने तुम्हें पहचाना था?”

     

    “हाँ।”

     

    “फिर उसने तुम्हें अंदर क्यों आने दिया?”

     

    विक्रम कुछ पल चुप रहा।

     

    “क्योंकि वह जानता था कि मैं उसे मारने वाला हूँ।”

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “और उसने विरोध नहीं किया?”

     

    विक्रम ने कहा—

     

    “उसने सिर्फ एक बात कही थी।”

     

    “क्या?”

     

    “उसने कहा था—’तुम्हें लगता है तुम न्याय कर रहे हो, लेकिन एक दिन तुम्हें भी अपने किए का जवाब देना पड़ेगा।’”

     

    अर्जुन ने पिस्तौल नीचे नहीं की।

     

    “सुमन को बाहर लाओ।”

     

    विक्रम पीछे मुड़ा।

     

    लेकिन तभी थिएटर के पीछे से आवाज़ आई—

     

    “अर्जुन!”

     

    अर्जुन दौड़कर वहाँ पहुँचा।

     

    सुमन कुर्सी से बंधी थी।

     

    अर्जुन ने उसे खोल दिया।

     

    विक्रम भागने लगा।

     

    अर्जुन ने उसका पीछा किया।

     

    दोनों थिएटर की छत पर पहुँच गए।

     

    विक्रम ने कहा—

     

    “मैंने जो किया गलत था, लेकिन उन लोगों को सजा मिलनी चाहिए थी।”

     

    अर्जुन ने कहा—

     

    “सजा देने का अधिकार तुम्हें नहीं था।”

     

    विक्रम ने पिस्तौल निकाली।

     

    अर्जुन ने भी हथियार तान दिया।

     

    कुछ सेकंड तक दोनों आमने-सामने खड़े रहे।

     

    फिर विक्रम ने पिस्तौल नीचे कर दी।

     

    “शायद तुम सही हो।”

     

    उसने हथियार जमीन पर रख दिया।

     

    पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया।

     

    मामला अदालत पहुँचा।

     

    जाँच में पुराने रिकॉर्ड दोबारा खोले गए।

     

    माधवी की मौत को फिर से जाँचा गया।

     

    विवेक और विनय के आर्थिक घोटाले का सच भी सामने आया।

     

    राहुल और नैना को निर्दोष पाया गया।

     

    सुमन ने अदालत में गवाही दी।

     

    और कई सालों बाद माधवी के परिवार को न्याय मिला।

     

    लेकिन कहानी का सबसे दुखद हिस्सा कुछ और था।

     

    विक्रम ने अदालत में अपना अपराध स्वीकार कर लिया।

     

    सजा सुनाए जाने से पहले उसने अर्जुन से सिर्फ एक बात कही—

     

    “तुम्हारे पिता ने कानून को बेचा था। मैंने कानून को अपने हाथ में लिया। फर्क सिर्फ इतना है कि दोनों गलत थे।”

     

    अर्जुन ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    वह बाहर निकल आया।

     

    आसमान में बारिश हो रही थी।

     

    कई महीनों बाद एक शाम अर्जुन अपने घर में पुरानी फाइलें देख रहा था।

     

    उसे अपने पिता की एक पुरानी डायरी मिली।

     

    डायरी के आखिरी पन्ने पर लिखा था—

     

    “माधवी की मौत का असली सच मैं जानता हूँ। लेकिन अगर मैंने सच बताया तो मेरा परिवार खत्म हो जाएगा।”

     

    अर्जुन कुछ देर तक उस पन्ने को देखता रहा।

     

    फिर उसने डायरी बंद कर दी।

     

    उसे समझ आ गया था कि इस कहानी में सिर्फ एक कातिल नहीं था।

     

    एक ने लालच में अपराध किया।

     

    एक ने सच छिपाया।

     

    एक ने बदला लेने के लिए हत्या की।

     

    और कई लोगों ने डर के कारण चुप्पी साध ली।

     

    लेकिन कानून की नजर में…

     

    कातिल सिर्फ एक था।

     

    इंस्पेक्टर विक्रम।

     

    और आखिरकार…

     

    कातिल पकड़ा गया।

     

    कहानी समाप्त।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • कातिल कौन? भाग 2 — दूसरा शिकार

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    दूसरी सुबह पुलिस को शहर के पुराने रेलवे गोदाम से एक फोन आया।

     

    गोदाम कई वर्षों से बंद पड़ा था।

     

    अंदर एक आदमी की लाश मिली थी।

     

    इंस्पेक्टर अर्जुन राठौड़ तुरंत वहाँ पहुँचा।

     

    लाश देखकर वह कुछ क्षण के लिए चुप रह गया।

     

    मृत व्यक्ति की पहचान हुई—

     

    विनय कपूर।

     

    विनय एक प्राइवेट कंपनी में मैनेजर था।

     

    अर्जुन ने उसकी जेब की तलाशी ली।

     

    एक छोटी चाबी मिली।

     

    और उसके साथ एक कागज़।

     

    कागज़ पर लिखा था—

     

    “पहली मौत सिर्फ शुरुआत थी।”

     

    अर्जुन के चेहरे पर चिंता साफ दिखाई देने लगी।

     

    दो हत्याएँ।

     

    दोनों के बीच कोई संबंध जरूर था।

     

    विनय के फोन की जाँच की गई।

     

    उसकी आखिरी कॉल भी विवेक के नंबर पर थी।

     

    लेकिन वह कॉल हत्या से तीन दिन पहले की थी।

     

    अर्जुन ने अपनी टीम से कहा—

     

    “विवेक और विनय के बीच संबंध खोजो।”

     

    कुछ घंटों बाद एक पुरानी फाइल सामने आई।

     

    दोनों लगभग दस साल पहले एक ही कंपनी में काम करते थे।

     

    और उस कंपनी में एक महिला भी काम करती थी।

     

    माधवी।

     

    वही माधवी जो विवेक की पत्नी थी।

     

    अर्जुन के लिए अब मामला और गंभीर हो गया।

     

    उसने पुराने रिकॉर्ड निकलवाए।

     

    दस साल पहले कंपनी में आर्थिक घोटाला हुआ था।

     

    कंपनी के खाते से लगभग दो करोड़ रुपये गायब हुए थे।

     

    जाँच में विवेक और विनय दोनों के नाम सामने आए थे।

     

    लेकिन मामला दबा दिया गया।

     

    क्यों?

     

    क्योंकि कंपनी के मालिक ने अचानक शिकायत वापस ले ली थी।

     

    अर्जुन ने मालिक से पूछताछ की।

     

    उसने कहा—

     

    “मुझे इस मामले के बारे में कुछ नहीं पता।”

     

    अर्जुन ने सामने फाइल रख दी।

     

    “दस साल पुरानी रिपोर्ट में आपका हस्ताक्षर है।”

     

    मालिक चुप हो गया।

     

    “सच बताइए।”

     

    वह आखिरकार बोला—

     

    “माधवी को सब पता था।”

     

    “क्या?”

     

    “उसे पता था कि पैसे किसने चुराए थे।”

     

    “किसने?”

     

    वह डरते हुए बोला—

     

    “विनय।”

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “और विवेक?”

     

    “विवेक ने उसे बचाने की कोशिश की थी।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि विवेक भी इसमें शामिल था।”

     

    अर्जुन को जैसे पूरा मामला समझ आने लगा।

     

    लेकिन तभी एक और बात सामने आई।

     

    विनय की हत्या वाली जगह के पास लगे पुराने कैमरे की फुटेज मिली।

     

    रात 1:14 बजे एक व्यक्ति गोदाम के अंदर जाता दिखाई दिया।

     

    उसने चेहरा ढक रखा था।

     

    कद मध्यम था।

     

    वह व्यक्ति कुछ देर बाद बाहर आया।

     

    लेकिन उसके हाथ में एक चीज थी—

     

    एक लाल रंग का बैग।

     

    अर्जुन ने फुटेज को बार-बार देखा।

     

    फिर उसे कुछ अजीब दिखाई दिया।

     

    वह व्यक्ति चलते समय हल्का-सा लंगड़ा रहा था।

     

    अर्जुन को तुरंत एक नाम याद आया—

     

    राहुल।

     

    राहुल के दाहिने पैर में पुरानी चोट थी।

     

    पुलिस उसके घर पहुँची।

     

    राहुल वहाँ नहीं था।

     

    कमरे की तलाशी ली गई।

     

    अलमारी में एक लाल बैग मिला।

     

    उसमें खून से सना कपड़ा था।

     

    और एक पुराना मोबाइल।

     

    अर्जुन ने मोबाइल चालू किया।

     

    उसमें सिर्फ एक वीडियो था।

     

    वीडियो में विवेक बैठा था।

     

    उसके सामने कैमरा रखा था।

     

    विवेक कह रहा था—

     

    “अगर मेरी हत्या हो जाए तो समझ लेना कि मैंने जो सच छिपाया था, वह अब किसी के लिए खतरा बन चुका है।”

     

    वीडियो अचानक बंद हो गया।

     

    अर्जुन ने तुरंत राहुल की तलाश शुरू कर दी।

     

    रात करीब दस बजे राहुल खुद पुलिस स्टेशन पहुँचा।

     

    उसने कहा—

     

    “मैंने किसी को नहीं मारा।”

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “फिर तुम्हारा बैग हत्या की जगह क्यों मिला?”

     

    राहुल का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    “तुम विनय को जानते थे?”

     

    “हाँ।”

     

    “क्यों?”

     

    राहुल चुप रहा।

     

    अर्जुन ने कहा—

     

    “तुम्हारे पास दो विकल्प हैं। सच बताओ या गिरफ्तार हो जाओ।”

     

    राहुल ने आखिरकार कहा—

     

    “विनय ने मेरे भाई को ब्लैकमेल किया था।”

     

    “किस बात पर?”

     

    “दस साल पुराने घोटाले पर।”

     

    “और तुम्हारे भाई ने पैसे दिए?”

     

    “हाँ।”

     

    “कितने?”

     

    “हर साल।”

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “तुम्हें यह सब कैसे पता?”

     

    राहुल ने कहा—

     

    “क्योंकि मैं खुद विनय से मिला था।”

     

    “कब?”

     

    “विवेक की हत्या से एक दिन पहले।”

     

    अर्जुन ने उसे घूरा।

     

    “तुमने यह बात पहले क्यों नहीं बताई?”

     

    राहुल ने सिर झुका लिया।

     

    “क्योंकि मुझे डर था।”

     

    “किससे?”

     

    राहुल ने जवाब नहीं दिया।

     

    उसी समय पुलिस स्टेशन के बाहर गोली चलने की आवाज़ आई।

     

    सभी अधिकारी बाहर भागे।

     

    सड़क पर कोई नहीं था।

     

    लेकिन जमीन पर एक लिफाफा पड़ा था।

     

    अर्जुन ने उसे उठाया।

     

    अंदर एक कागज़ था—

     

    “गलत आदमी को पकड़ रहे हो।”

     

    और नीचे लिखा था—

     

    “अगली लाश तुम्हारे बहुत करीब होगी।”

     

    अर्जुन का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    उसने तुरंत नैना और सुमन को पुलिस सुरक्षा देने का आदेश दिया।

     

    लेकिन रात करीब दो बजे पुलिस स्टेशन में बिजली चली गई।

     

    सिर्फ दस सेकंड के लिए।

     

    जब रोशनी वापस आई…

     

    सुमन गायब थी।

     

    उसके कमरे का दरवाज़ा अंदर से बंद था।

     

    खिड़की बंद थी।

     

    लेकिन कमरे के फर्श पर खून की कुछ बूंदें थीं।

     

    अर्जुन ने दरवाज़ा तोड़कर अंदर प्रवेश किया।

     

    सुमन वहाँ नहीं थी।

     

    टेबल पर सिर्फ एक कागज़ पड़ा था।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “वह मरने वाली नहीं थी। उसे सच बोलने के लिए ले जाया गया है।”

     

    अर्जुन ने तुरंत आसपास के कैमरों की फुटेज देखी।

     

    करीब 1:58 बजे एक व्यक्ति पुलिस स्टेशन के पीछे दिखाई दिया।

     

    उसने सुमन को बाहर ले जाते समय अपना चेहरा छिपाया हुआ था।

     

    लेकिन कैमरे ने उसके हाथ की घड़ी साफ रिकॉर्ड की।

     

    काली घड़ी।

     

    अर्जुन को याद आया—

     

    वही घड़ी उसने नैना के हाथ में देखी थी।

     

    अगली सुबह नैना को हिरासत में लिया गया।

     

    उसने कोई विरोध नहीं किया।

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “सुमन कहाँ है?”

     

    नैना ने कहा—

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    “तुम्हारी घड़ी कैमरे में दिखाई दी है।”

     

    नैना कुछ सेकंड चुप रही।

     

    फिर बोली—

     

    “हाँ। मैं वहाँ थी।”

     

    अर्जुन ने टेबल पर हाथ मारा।

     

    “तो सुमन को तुमने उठाया?”

     

    नैना ने धीरे से कहा—

     

    “नहीं।”

     

    “तो कौन?”

     

    नैना ने उसकी आँखों में देखा।

     

    और बहुत धीमी आवाज़ में बोली—

     

    “आप जिसे खोज रहे हैं… वह आपसे एक कदम आगे है।”

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “कौन है?”

     

    नैना ने कहा—

     

    “आपके अपने विभाग में कोई।”

     

    अर्जुन के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “क्या मतलब?”

     

    नैना ने कहा—

     

    “विवेक की हत्या के बाद सबसे पहले घटनास्थल पर कौन पहुँचा था?”

     

    अर्जुन चुप हो गया।

     

    नैना मुस्कुराई।

     

    “आप।”

     

    उसी क्षण अर्जुन के फोन पर एक संदेश आया।

     

    एक अज्ञात नंबर से।

     

    संदेश में एक तस्वीर थी।

     

    तस्वीर में सुमन एक अंधेरे कमरे में बंधी हुई थी।

     

    उसके पीछे एक व्यक्ति खड़ा था।

     

    चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    लेकिन हाथ में वही काली घड़ी थी।

     

    नीचे लिखा था—

     

    “अगर कातिल को पकड़ना है, तो आज रात पुराने थिएटर में अकेले आना।”

     

    अर्जुन ने फोन बंद किया।

     

    अब उसे यकीन था—

     

    कातिल पुलिस से एक कदम आगे था।

     

    लेकिन उसे यह नहीं पता था कि पुराने थिएटर में उसका सामना सिर्फ कातिल से नहीं…

     

    बल्कि दस साल पुराने उस राज से होने वाला था, जिसके कारण पहली हत्या हुई थी।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • कातिल कौन? भाग 1 — पहली लाश

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    रात के करीब साढ़े ग्यारह बजे शहर के पुराने इलाके में अचानक बिजली चली गई।

     

    पूरी गली अंधेरे में डूब गई।

     

    उसी समय विवेक मिश्रा अपने घर की बालकनी में खड़ा फोन पर किसी से बात कर रहा था।

     

    “मैंने कहा ना, मुझे अब किसी से डर नहीं लगता,” उसने धीमी आवाज़ में कहा।

     

    दूसरी तरफ से कुछ कहा गया।

     

    विवेक का चेहरा अचानक बदल गया।

     

    “तुम… ये कैसे जानते हो?”

     

    कुछ सेकंड वह चुप रहा।

     

    फिर बोला—

     

    “ठीक है। कल सुबह मिलते हैं। लेकिन आज रात मुझे फोन मत करना।”

     

    उसने फोन काट दिया।

     

    विवेक ने कमरे की खिड़की बंद की और पर्दा खींच दिया।

     

    उसे क्या पता था कि अगले कुछ घंटों में उसकी जिंदगी खत्म होने वाली थी।

     

    सुबह करीब छह बजे उसकी पड़ोसी सुमन ने पुलिस को फोन किया।

     

    “साहब… विवेक जी के घर का दरवाज़ा खुला है। अंदर कुछ गड़बड़ लग रही है।”

     

    पुलिस कुछ ही मिनटों में वहाँ पहुँच गई।

     

    इंस्पेक्टर अर्जुन राठौड़ ने घर के अंदर कदम रखा।

     

    विवेक अपने अध्ययन कक्ष में जमीन पर पड़ा था।

     

    उसकी मौत हो चुकी थी।

     

    कमरे में सामान बिखरा हुआ था, लेकिन चोरी के कोई स्पष्ट निशान नहीं थे।

     

    टेबल पर एक गिलास पानी रखा था।

     

    उसके पास एक कागज़ पड़ा था।

     

    कागज़ पर सिर्फ चार शब्द लिखे थे—

     

    “कातिल तुम्हारे बहुत करीब है।”

     

    अर्जुन ने कागज़ को ध्यान से देखा।

     

    “फिंगरप्रिंट?”

     

    फोरेंसिक अधिकारी ने कहा—

     

    “कुछ निशान हैं, लेकिन अभी स्पष्ट नहीं हैं।”

     

    अर्जुन ने कमरे का निरीक्षण किया।

     

    खिड़की अंदर से बंद थी।

     

    मुख्य दरवाज़े पर जबरदस्ती घुसने के निशान नहीं थे।

     

    मतलब विवेक ने हत्यारे को खुद अंदर आने दिया था।

     

    पुलिस ने विवेक के फोन की जाँच शुरू की।

     

    आखिरी कॉल रात 11:32 बजे हुई थी।

     

    नंबर सेव नहीं था।

     

    अर्जुन ने नंबर पर फोन किया।

     

    फोन बंद था।

     

    जाँच आगे बढ़ी तो पता चला कि विवेक एक स्थानीय कंपनी में अकाउंटेंट था।

     

    उसकी जिंदगी देखने में बिल्कुल सामान्य थी।

     

    पत्नी की दो साल पहले मृत्यु हो चुकी थी।

     

    उनकी एक बेटी थी—नैना, जो दूसरे शहर में पढ़ती थी।

     

    विवेक का छोटा भाई राहुल उसी शहर में रहता था।

     

    पुलिस ने राहुल से पूछताछ की।

     

    “आपके भाई से आखिरी बार कब बात हुई?”

     

    राहुल ने कहा—

     

    “कल शाम। करीब आठ बजे।”

     

    “किस बारे में?”

     

    “कुछ खास नहीं।”

     

    अर्जुन ने उसे गौर से देखा।

     

    “आप परेशान लग रहे हैं।”

     

    राहुल ने नजरें झुका लीं।

     

    “भाई से मेरा कुछ समय से झगड़ा चल रहा था।”

     

    “किस बात पर?”

     

    “पैसों को लेकर।”

     

    “कितने पैसे?”

     

    राहुल चुप रहा।

     

    अर्जुन ने दोबारा पूछा—

     

    “कितने?”

     

    “दस लाख।”

     

    कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।

     

    राहुल ने बताया कि उनके पिता की पुरानी जमीन बेचकर मिले पैसे विवेक के पास थे। राहुल अपना हिस्सा मांग रहा था।

     

    “लेकिन मैंने उसे नहीं मारा,” उसने कहा।

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “आप रात में कहाँ थे?”

     

    “अपने घर पर।”

     

    “कोई गवाह?”

     

    “नहीं।”

     

    यही बात राहुल को पहला संदिग्ध बना रही थी।

     

    लेकिन पुलिस को एक और नाम मिला।

     

    सुमन।

     

    वही पड़ोसी जिसने पुलिस को फोन किया था।

     

    अर्जुन ने उससे पूछा—

     

    “आपको कैसे पता चला कि विवेक के घर कुछ हुआ है?”

     

    सुमन ने कहा—

     

    “सुबह मैंने दरवाज़ा खुला देखा।”

     

    “क्या आपने अंदर जाकर देखा?”

     

    “नहीं। मैं डर गई थी।”

     

    अर्जुन ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “लेकिन आपने पुलिस को फोन करने से पहले किसे फोन किया था?”

     

    सुमन चौंक गई।

     

    “मैंने… किसी को नहीं।”

     

    अर्जुन ने अपना फोन उसकी तरफ किया।

     

    कॉल रिकॉर्ड में रात 11:47 बजे सुमन की विवेक को कॉल दिखाई दे रही थी।

     

    सुमन का चेहरा पीला पड़ गया।

     

    “हाँ… मैंने फोन किया था।”

     

    “क्यों?”

     

    “बस… एक जरूरी बात करनी थी।”

     

    “क्या बात?”

     

    सुमन चुप रही।

     

    अर्जुन ने सख्त आवाज़ में पूछा—

     

    “आपने रात में विवेक को क्यों फोन किया था?”

     

    सुमन ने आखिरकार कहा—

     

    “क्योंकि उसने मुझे धमकी दी थी।”

     

    “किस बात की?”

     

    “उसने कहा था कि अगर मैंने किसी को सच बता दिया तो वह मुझे बर्बाद कर देगा।”

     

    अर्जुन चौंक गया।

     

    “कौन सा सच?”

     

    सुमन ने जवाब नहीं दिया।

     

    इसी बीच पुलिस को विवेक के घर से एक पुरानी डायरी मिली।

     

    डायरी के आखिरी पन्ने पर तीन नाम लिखे थे—

     

    राहुल।

     

    सुमन।

     

    और…

     

    नैना।

     

    तीनों के सामने एक-एक सवाल लिखा था।

     

    राहुल के सामने—

     

    “पैसे?”

     

    सुमन के सामने—

     

    “उस रात का सच?”

     

    नैना के सामने—

     

    “माँ की मौत?”

     

    अर्जुन की नजर वहीं टिक गई।

     

    विवेक की पत्नी की मौत दो साल पहले हुई थी।

     

    क्या वह हादसा था?

     

    या हत्या?

     

    अर्जुन ने नैना को तुरंत शहर बुलाया।

     

    अगली शाम नैना पुलिस स्टेशन पहुँची।

     

    वह शांत थी।

     

    बहुत ज्यादा शांत।

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “तुम्हारे पिता की हत्या हुई है।”

     

    नैना ने बिना किसी भाव के कहा—

     

    “मुझे पता है।”

     

    “तुम आखिरी बार उनसे कब मिली थीं?”

     

    “तीन दिन पहले।”

     

    “क्या तुम्हारा उनसे झगड़ा हुआ था?”

     

    “हाँ।”

     

    “किस बात पर?”

     

    नैना ने कुछ सेकंड उसे देखा।

     

    फिर बोली—

     

    “मेरी माँ की मौत के बारे में।”

     

    अर्जुन आगे झुका।

     

    “तुम्हें क्या लगता है, तुम्हारी माँ की मौत कैसे हुई थी?”

     

    नैना ने धीमी आवाज़ में कहा—

     

    “मेरे पिता ने उन्हें नहीं मारा था…”

     

    वह कुछ पल रुकी।

     

    फिर बोली—

     

    “लेकिन वह उन्हें बचा भी सकते थे।”

     

    अर्जुन चौंक गया।

     

    “क्या मतलब?”

     

    नैना ने कहा—

     

    “मेरी माँ की मौत कोई हादसा नहीं था। मेरे पिता जानते थे कि उस रात क्या हुआ था।”

     

    “और तुमने उनसे सच पूछा?”

     

    “हाँ।”

     

    “उन्होंने क्या कहा?”

     

    नैना की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “उन्होंने कहा कि अगर मैंने सच जान लिया… तो मैं उस कातिल को पहचान जाऊँगी।”

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “किस कातिल को?”

     

    नैना ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “मैं नहीं जानती।”

     

    उसी समय पुलिस स्टेशन में एक कांस्टेबल दौड़ता हुआ आया।

     

    “सर! विवेक के घर से एक और चीज मिली है।”

     

    “क्या?”

     

    उसने एक छोटा-सा लिफाफा अर्जुन को दिया।

     

    लिफाफे के अंदर एक तस्वीर थी।

     

    तस्वीर में विवेक, उसकी पत्नी और तीन लोग खड़े थे।

     

    राहुल।

     

    सुमन।

     

    और एक तीसरा व्यक्ति…

     

    जिसका चेहरा काले मार्कर से मिटा दिया गया था।

     

    तस्वीर के पीछे लिखा था—

     

    “इन चारों में से एक कातिल है।”

     

    अर्जुन ने तस्वीर को पलटा।

     

    पीछे एक और लाइन थी—

     

    “लेकिन असली कातिल वही है जिस पर कोई शक नहीं करेगा।”

     

    अर्जुन ने कमरे में मौजूद तीनों संदिग्धों की तस्वीरें सामने रखीं।

     

    राहुल।

     

    सुमन।

     

    नैना।

     

    फिर उसने धीरे से कहा—

     

    “खेल अभी शुरू हुआ है।”

     

    उसे नहीं पता था कि अगले दिन…

     

    इस केस में दूसरी लाश मिलने वाली थी।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 😱भानगढ़ का किला😱 भाग 3 — श्राप का अंत😱

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

     

    सूरज की पहली किरण आसमान पर दिखाई दे चुकी थी।

     

    लेकिन गोपाल का कोई पता नहीं था।

     

    आदित्य खाई के किनारे खड़ा था।

     

    “गोपाल!”

     

    उसकी आवाज़ पहाड़ियों से टकराकर वापस आई।

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    मीरा रोते हुए बोली—

     

    “वह गिर गया होगा।”

     

    कबीर ने नीचे देखने की कोशिश की।

     

    लेकिन खाई इतनी गहरी थी कि कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    तभी पीछे से एक धीमी हँसी सुनाई दी।

     

    तीनों ने पलटकर देखा।

     

    काली परछाईं अब पहले से छोटी हो चुकी थी।

     

    उसकी आवाज़ कमजोर थी।

     

    “सूरज…”

     

    “मुझे रोक नहीं सकता।”

     

    आदित्य समझ गया कि पायल अभी तक नष्ट नहीं हुई थी।

     

    “गोपाल पायल लेकर कहाँ गया?”

     

    परछाईं मुस्कुराई।

     

    “जहाँ से सब शुरू हुआ था।”

     

    “कहाँ?”

     

    “किले के नीचे।”

     

    अचानक जमीन काँपी।

     

    किले की दीवार का एक हिस्सा टूटकर नीचे गिरा।

     

    उसके पीछे एक सीढ़ी दिखाई दी।

     

    सीढ़ियाँ जमीन के अंदर जा रही थीं।

     

    आदित्य ने कहा—

     

    “हमें नीचे जाना होगा।”

     

    मीरा ने डरते हुए पूछा—

     

    “लेकिन सूरज निकल चुका है।”

     

    आदित्य ने कहा—

     

    “तभी तो।”

     

    तीनों सीढ़ियों से नीचे उतरने लगे।

     

    जितना नीचे जाते, हवा उतनी ठंडी होती जाती।

     

    कुछ देर बाद वे एक विशाल भूमिगत कमरे में पहुँचे।

     

    कमरे के बीच में एक पत्थर का चबूतरा था।

     

    उस पर गोपाल बैठा था।

     

    उसके हाथ में पायल थी।

     

    लेकिन उसकी आँखें बंद थीं।

     

    आदित्य दौड़कर उसके पास गया।

     

    “गोपाल!”

     

    गोपाल ने आँखें खोलीं।

     

    “तुम यहाँ क्यों आए?”

     

    आदित्य ने कहा—

     

    “तुम्हें लेने।”

     

    गोपाल ने सिर हिलाया।

     

    “मैं नहीं जा सकता।”

     

    “क्यों?”

     

    गोपाल ने अपनी हथेली दिखाई।

     

    उसकी नसें काली पड़ चुकी थीं।

     

    “पायल ने मुझे पकड़ लिया है।”

     

    मीरा ने पायल की ओर देखा।

     

    उसमें से काला धुआँ निकल रहा था।

     

    गोपाल ने कहा—

     

    “रूहानी ने हमें आधा सच बताया था।”

     

    “क्या मतलब?”

     

    “पायल तोड़ने से श्राप खत्म नहीं होगा।”

     

    आदित्य चौंका।

     

    “फिर?”

     

    “पायल को उस जगह रखना होगा जहाँ रूहानी ने पहली बार तांत्रिक का सामना किया था।”

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “वह जगह कहाँ है?”

     

    गोपाल ने सामने की दीवार की ओर इशारा किया।

     

    वहाँ एक पत्थर का दरवाज़ा था।

     

    दरवाज़े पर वही निशान बना था।

     

    आदित्य उसके पास गया।

     

    जैसे ही उसने हाथ लगाया, दरवाज़ा खुल गया।

     

    अंदर एक छोटा कमरा था।

     

    कमरे में सिर्फ एक पुरानी मूर्ति थी।

     

    उसके सामने राख से बना गोल घेरा था।

     

    और उस घेरे के बीच एक पत्थर पर लिखा था—

     

    “डर को खत्म करने के लिए उसे पहचानना पड़ता है।”

     

    अचानक कमरे में रूहानी दिखाई दी।

     

    इस बार उसका चेहरा शांत था।

     

    उसने कहा—

     

    “मैंने तांत्रिक को नहीं मारा था।”

     

    आदित्य ने कहा—

     

    “लेकिन हमने देखा था।”

     

    रूहानी ने सिर हिलाया।

     

    “वह दृश्य झूठ था।”

     

    तीनों चौंक गए।

     

    “झूठ?”

     

    रूहानी बोली—

     

    “तांत्रिक ने अपनी मौत का भ्रम पैदा किया था। उसने मेरे डर का इस्तेमाल किया। उसने मुझे विश्वास दिलाया कि मैंने उसे मार दिया है।”

     

    “फिर असली घटना क्या थी?”

     

    रूहानी ने कहा—

     

    “उस रात उसने मुझे पायल पहनाई। वह पायल कोई साधारण चीज़ नहीं थी। उसमें उसकी आत्मा का एक हिस्सा बंद था।”

     

    “और तुम?”

     

    “मैंने पायल उतारने की कोशिश की। लेकिन उसने मुझे रोक लिया।”

     

    रूहानी की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “उसने कहा था कि जब तक कोई उसके डर को स्वीकार नहीं करेगा, वह इस किले में रहेगा।”

     

    आदित्य ने पूछा—

     

    “तो इतने वर्षों से जो लोग डरते रहे…”

     

    “उनका डर उसे शक्ति देता रहा।”

     

    कबीर ने कहा—

     

    “लेकिन अगर हम उससे नहीं डरें तो?”

     

    रूहानी मुस्कुराई।

     

    “तभी उसका अंत होगा।”

     

    अचानक पूरा कमरा अंधेरे से भर गया।

     

    काली परछाईं फिर सामने आ गई।

     

    इस बार वह बहुत विशाल थी।

     

    उसकी आवाज़ पूरे कमरे में गूँजने लगी—

     

    “तुम मुझे खत्म नहीं कर सकते!”

     

    आदित्य पीछे हट गया।

     

    लेकिन फिर उसे दीवार पर लिखा वाक्य याद आया।

     

    डर को खत्म करने के लिए उसे पहचानना पड़ता है।

     

    उसने परछाईं की ओर देखा।

     

    “तू तांत्रिक नहीं है।”

     

    परछाईं रुक गई।

     

    “तू सिर्फ हमारा डर है।”

     

    वह चीखी।

     

    “मैं इस किले का मालिक हूँ!”

     

    आदित्य ने कहा—

     

    “नहीं। तू तभी शक्तिशाली है जब हम तुझसे डरते हैं।”

     

    मीरा आगे बढ़ी।

     

    “और अब हम नहीं डरेंगे।”

     

    कबीर भी उनके साथ खड़ा हो गया।

     

    गोपाल ने पायल उठाई।

     

    काली परछाईं अचानक उसकी तरफ झपटी।

     

    गोपाल ने आँखें बंद कर लीं।

     

    “आज नहीं।”

     

    उसने पायल पत्थर के घेरे में फेंक दी।

     

    जैसे ही पायल जमीन पर गिरी…

     

    एक जोरदार विस्फोट जैसी आवाज़ हुई।

     

    काले धुएँ ने पूरे कमरे को भर दिया।

     

    परछाईं चीखने लगी।

     

    दीवारें काँपने लगीं।

     

    किले के ऊपर पत्थर गिरने लगे।

     

    रूहानी ने चिल्लाकर कहा—

     

    “भागो!”

     

    आदित्य ने गोपाल को उठाया।

     

    चारों सुरंग की ओर भागे।

     

    पीछे से परछाईं की अंतिम चीख सुनाई दी—

     

    “तुम मुझे रोक नहीं सकते!”

     

    रूहानी की आवाज़ आई—

     

    “आज से कोई तुम्हें याद भी नहीं करेगा।”

     

    एक तेज़ सफेद रोशनी कमरे में फैल गई।

     

    फिर…

     

    सब शांत हो गया।

     

    चारों किसी तरह सीढ़ियों से ऊपर पहुँचे।

     

    बाहर सुबह पूरी तरह हो चुकी थी।

     

    भानगढ़ का किला पहली बार उन्हें डरावना नहीं लग रहा था।

     

    हवा शांत थी।

     

    पक्षियों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।

     

    गोपाल जमीन पर बैठ गया।

     

    उसके हाथ की काली नसें गायब हो चुकी थीं।

     

    उसने हैरानी से अपनी हथेली देखी।

     

    “मैं बच गया।”

     

    मीरा की आँखों में आँसू थे।

     

    “रूहानी?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    आदित्य ने पीछे मुड़कर महल की ओर देखा।

     

    ऊपर की टूटी हुई खिड़की में एक महिला खड़ी थी।

     

    रूहानी।

     

    उसने हल्की मुस्कान के साथ हाथ हिलाया।

     

    फिर धीरे-धीरे धूप में विलीन हो गई।

     

    कुछ दिनों बाद आदित्य ने अपनी डॉक्यूमेंट्री पूरी की।

     

    लेकिन उसने उसमें रूहानी और उस रात की सारी घटना शामिल नहीं की।

     

    लोग शायद विश्वास नहीं करते।

     

    या शायद…

     

    बहुत ज्यादा विश्वास कर लेते।

     

    उसने सिर्फ इतना बताया कि भानगढ़ की असली कहानी डर की नहीं…

     

    बल्कि उन लोगों की है जो डर को सच मान लेते हैं।

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “तू सच में मानता है कि सब खत्म हो गया?”

     

    आदित्य ने कहा—

     

    “हाँ।”

     

    गोपाल चुपचाप बैठा रहा।

     

    फिर उसने अपनी जेब से कुछ निकाला।

     

    वह वही चाँदी की पायल थी।

     

    आदित्य का चेहरा बदल गया।

     

    “ये तुम्हारे पास कैसे आई?”

     

    गोपाल ने कहा—

     

    “जब हम बाहर निकले थे, ये मेरी जेब में थी।”

     

    मीरा ने डरते हुए पूछा—

     

    “तो क्या श्राप अभी भी…”

     

    गोपाल ने पायल को ध्यान से देखा।

     

    पायल अब काली नहीं थी।

     

    वह बिल्कुल साफ और चमकदार थी।

     

    गोपाल ने कहा—

     

    “नहीं।”

     

    उसी समय पायल से एक बहुत हल्की आवाज़ आई।

     

    छन…

     

    चारों चुप हो गए।

     

    फिर दूसरी आवाज़ आई।

     

    छन…

     

    और उसके बाद जैसे किसी महिला ने बहुत धीमे से कहा—

     

    “धन्यवाद।”

     

    आदित्य मुस्कुरा दिया।

     

    उसने पायल को एक कपड़े में लपेटकर सुरक्षित रख दिया।

     

    उस दिन के बाद भानगढ़ के किले में उन्हें फिर कभी कोई अजीब आवाज़ सुनाई नहीं दी।

     

    न कोई पायल।

     

    न किसी के रोने की आवाज़।

     

    न किसी के कदम।

     

    और न ही वह काली परछाईं।

     

    रूहानी आखिरकार आज़ाद हो चुकी थी।

     

    लेकिन जाते-जाते उसने एक बात सच साबित कर दी—

     

    हर भूत बुरा नहीं होता।

     

    कभी-कभी जिसे हम भूत समझते हैं…

     

    वह खुद किसी पुराने डर का कैदी होता है।

     

    और जब डर खत्म हो जाता है…

     

    तो श्राप भी खत्म हो जाता है।

     

    समाप्त।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 😱भानगढ़ का किला😱 भाग 2 — रूहानी का रहस्य😱

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

     

    गीले पैरों के निशान किले के पुराने महल की ओर जा रहे थे।

     

    रात पूरी तरह उतर चुकी थी।

     

    आसमान पर बादल थे और चाँद दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    आदित्य आगे चल रहा था।

     

    उसके पीछे मीरा, कबीर और गोपाल थे।

     

    कुछ दूरी पर जाकर निशान अचानक एक पत्थर की दीवार के सामने खत्म हो गए।

     

    गोपाल ने दीवार को ध्यान से देखा।

     

    “यहाँ कभी रास्ता हुआ करता था।”

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “अब?”

     

    “अब बंद है।”

     

    आदित्य ने दीवार पर हाथ रखा।

     

    उसे अंदर से हल्की धड़कन जैसी आवाज़ सुनाई दी।

     

    धक… धक… धक…

     

    उसने हाथ तुरंत पीछे खींच लिया।

     

    “इस दीवार के पीछे कुछ है।”

     

    गोपाल ने कहा—

     

    “हमें यहाँ नहीं रुकना चाहिए।”

     

    लेकिन मीरा ने दीवार के एक हिस्से पर हाथ रखा।

     

    अचानक पत्थर अपने आप पीछे हट गया।

     

    दीवार के अंदर एक संकरा रास्ता खुल गया।

     

    अंदर से ठंडी हवा बाहर आई।

     

    और साथ ही किसी महिला के रोने की आवाज़ सुनाई दी।

     

    गोपाल ने आँखें बंद कर लीं।

     

    “यही है…”

     

    “क्या?”

     

    “रूहानी का कमरा।”

     

    वे अंदर चले गए।

     

    कमरा बहुत पुराना था।

     

    बीच में पत्थर की एक चौकी थी।

     

    उस पर एक टूटा हुआ आईना रखा था।

     

    दीवारों पर अजीब निशान बने थे।

     

    और एक कोने में लोहे का संदूक पड़ा था।

     

    आदित्य ने संदूक खोला।

     

    अंदर कुछ पुराने कागज़ और एक डायरी थी।

     

    डायरी पर लिखा था—

     

    “रूहानी की आखिरी रात।”

     

    आदित्य ने डायरी खोल दी।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “मेरा नाम रूहानी है। मैं राजमहल में नृत्य करती हूँ। लेकिन पिछले कुछ दिनों से महल में एक तांत्रिक आया है। वह मुझे अपने वश में करना चाहता है।”

     

    अगले पन्ने पर लिखा था—

     

    “मैंने उसे मना कर दिया। उसने कहा कि वह मुझे इस किले की दीवारों में कैद कर देगा।”

     

    मीरा ने पूछा—

     

    “क्या वही तांत्रिक किले के श्राप का कारण था?”

     

    गोपाल ने कहा—

     

    “आगे पढ़ो।”

     

    आदित्य ने अगला पन्ना पलटा।

     

    “आज रात तांत्रिक ने मुझे एक मंत्र दिखाया। उसने कहा कि इस मंत्र से मेरी आत्मा हमेशा के लिए किले से बंध जाएगी। मैंने उसकी बात नहीं मानी।”

     

    अगले पन्ने पर स्याही फैली हुई थी।

     

    बस एक वाक्य साफ दिखाई दे रहा था—

     

    “मैंने उसे नहीं मारा। लेकिन किसी और ने उसे मार दिया।”

     

    सब चुप हो गए।

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “किसी और ने?”

     

    आदित्य ने डायरी के अगले पन्ने पलटे।

     

    वहाँ सिर्फ एक चित्र था।

     

    चित्र में एक महिला थी।

     

    उसके पीछे एक काला साया।

     

    साए के नीचे लिखा था—

     

    “वह जो महल के नीचे रहता है।”

     

    अचानक कमरे का आईना हिलने लगा।

     

    मीरा पीछे हट गई।

     

    आईने में चारों दिखाई दे रहे थे।

     

    लेकिन उनके पीछे…

     

    एक पाँचवीं आकृति खड़ी थी।

     

    लंबे बाल।

     

    सफेद चेहरा।

     

    रूहानी।

     

    कबीर ने पलटकर देखा।

     

    पीछे कोई नहीं था।

     

    फिर आईने में देखा।

     

    रूहानी अभी भी वहीं थी।

     

    इस बार वह मीरा के बिल्कुल पीछे खड़ी थी।

     

    मीरा चीख पड़ी।

     

    आईना अचानक टूट गया।

     

    काँच के टुकड़े फर्श पर बिखर गए।

     

    और उनमें से एक टुकड़े पर खून जैसा लाल निशान दिखाई दिया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “रूहानी कातिल नहीं थी।”

     

    गोपाल ने धीरे से कहा—

     

    “तो फिर असली कातिल कौन था?”

     

    अचानक कमरे का दरवाज़ा बंद हो गया।

     

    आदित्य ने उसे खोलने की कोशिश की।

     

    दरवाज़ा नहीं खुला।

     

    फिर दीवारों से फुसफुसाहट आने लगी।

     

    “रूहानी…”

     

    “रूहानी…”

     

    “रूहानी…”

     

    एक आवाज़ बाकी आवाज़ों से अलग थी।

     

    वह पुरुष की थी।

     

    “तुमने मेरा रहस्य क्यों खोला?”

     

    कमरे की दीवार पर एक काली परछाईं उभरने लगी।

     

    वह धीरे-धीरे इंसान के आकार में बदल गई।

     

    गोपाल काँपने लगा।

     

    “ये वही है…”

     

    आदित्य ने पूछा—

     

    “कौन?”

     

    “तांत्रिक।”

     

    परछाईं हँसी।

     

    “सदियाँ बीत गईं…”

     

    “फिर भी लोग मेरा नाम ढूँढते हैं।”

     

    आदित्य ने साहस करके पूछा—

     

    “तुमने रूहानी को श्राप दिया था?”

     

    परछाईं ने कहा—

     

    “नहीं।”

     

    चारों एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    “तो किसने दिया?”

     

    परछाईं ने जवाब दिया—

     

    “उसने खुद को बचाने के लिए जो किया… वही उसका श्राप बन गया।”

     

    तभी कमरे में तेज़ हवा चली।

     

    दीवार पर एक दृश्य दिखाई देने लगा।

     

    रूहानी उसी कमरे में खड़ी थी।

     

    तांत्रिक उसके सामने मंत्र पढ़ रहा था।

     

    लेकिन अचानक रूहानी ने जमीन से एक पत्थर उठाया और तांत्रिक के सिर पर मार दिया।

     

    तांत्रिक जमीन पर गिर गया।

     

    रूहानी डर गई।

     

    वह भागने लगी।

     

    लेकिन जाते-जाते उसने देखा कि तांत्रिक अभी जिंदा था।

     

    उसने एक आखिरी मंत्र पढ़ा।

     

    उसकी आत्मा एक काले धुएँ में बदल गई।

     

    और रूहानी की चाँदी की पायल से जा चिपकी।

     

    तांत्रिक ने कहा—

     

    “जब तक यह पायल इस किले में रहेगी, मैं भी रहूँगा।”

     

    रूहानी ने पायल उतारने की कोशिश की।

     

    लेकिन पायल उसके पैर से चिपक चुकी थी।

     

    वह चीखने लगी।

     

    “मुझे बचाओ!”

     

    तभी दृश्य समाप्त हो गया।

     

    मीरा रोने लगी।

     

    “तो रूहानी भी फँसी हुई थी।”

     

    गोपाल ने कहा—

     

    “और तांत्रिक उसकी आत्मा का इस्तेमाल करके लोगों को डराता रहा।”

     

    आदित्य ने पूछा—

     

    “तो इसे खत्म कैसे करें?”

     

    परछाईं फिर सामने आ गई।

     

    “पायल तोड़ दो।”

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “बस?”

     

    परछाईं हँसी।

     

    “पायल टूटेगी तो मेरी शक्ति खत्म हो जाएगी। लेकिन…”

     

    “लेकिन क्या?”

     

    “जिसके हाथ से पायल टूटेगी, उसका डर हमेशा के लिए इस किले में कैद हो जाएगा।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

     

    आदित्य ने पायल उठाई।

     

    “मैं इसे तोड़ूँगा।”

     

    मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “नहीं!”

     

    आदित्य ने कहा—

     

    “अगर हमने इसे नहीं तोड़ा तो ये लोगों को हमेशा डराता रहेगा।”

     

    गोपाल ने अचानक कहा—

     

    “रुको।”

     

    उसकी आवाज़ काँप रही थी।

     

    “पायल तोड़ने के लिए सिर्फ हिम्मत नहीं चाहिए।”

     

    “क्या चाहिए?”

     

    गोपाल ने कहा—

     

    “जिसने रूहानी को धोखा दिया था, उसका खून।”

     

    आदित्य चौंका।

     

    “वो आदमी तो सदियों पहले मर चुका है।”

     

    गोपाल ने धीरे-धीरे उसकी तरफ देखा।

     

    “वह आदमी नहीं…”

     

    “उसका वंश।”

     

    गोपाल ने बताया कि किले के आसपास रहने वाले एक पुराने परिवार के बारे में कहा जाता था कि वे उसी तांत्रिक के वंशज थे।

     

    और संयोग से…

     

    गोपाल का परिवार भी उसी वंश से जुड़ा था।

     

    कबीर ने उसकी तरफ देखा।

     

    “मतलब?”

     

    गोपाल ने अपनी जेब से चाकू निकाला और अपनी हथेली पर हल्का-सा कट लगाया।

     

    एक बूंद खून पायल पर गिर गई।

     

    अचानक पायल लाल रोशनी से चमकने लगी।

     

    कमरा काँपने लगा।

     

    काली परछाईं चीख उठी—

     

    “नहीं!”

     

    रूहानी की आत्मा आईने के टूटे हुए टुकड़ों में दिखाई दी।

     

    उसने कहा—

     

    “अब आखिरी काम बाकी है।”

     

    आदित्य ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    रूहानी ने कहा—

     

    “पायल को किले की सबसे ऊँची दीवार से नीचे फेंक दो।”

     

    गोपाल ने कहा—

     

    “लेकिन वहाँ पहुँचना असंभव है।”

     

    रूहानी बोली—

     

    “अगर सूर्योदय से पहले पायल किले से बाहर चली गई…”

     

    “तो श्राप समाप्त हो जाएगा।”

     

    अचानक काली परछाईं उन पर झपटी।

     

    कमरे की दीवार टूट गई।

     

    चारों भागे।

     

    पीछे से भयानक चीखें आने लगीं।

     

    आदित्य पायल लेकर आगे दौड़ रहा था।

     

    कबीर और मीरा उसके साथ थे।

     

    गोपाल पीछे मुड़कर देख रहा था।

     

    काली परछाईं उनका पीछा कर रही थी।

     

    वे किले की ऊँची दीवार के पास पहुँचे।

     

    लेकिन वहाँ पहुँचते ही रास्ता बंद हो गया।

     

    सामने सिर्फ एक गहरी खाई थी।

     

    आदित्य ने नीचे देखा।

     

    सूरज उगने में कुछ ही मिनट बाकी थे।

     

    काली परछाईं उनके पीछे खड़ी थी।

     

    उसने कहा—

     

    “तुम पायल बाहर नहीं ले जा सकते।”

     

    आदित्य ने पायल को कसकर पकड़ लिया।

     

    तभी गोपाल ने पीछे से आवाज़ दी—

     

    “आदित्य!”

     

    आदित्य पलटा।

     

    गोपाल मुस्कुरा रहा था।

     

    उसने कहा—

     

    “किसी एक को यहीं रहना होगा।”

     

    और इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता…

     

    गोपाल ने पायल आदित्य के हाथ से छीन ली।

     

    वह खाई की ओर भागा।

     

    काली परछाईं उसके पीछे दौड़ी।

     

    गोपाल ने आखिरी बार पीछे देखा।

     

    फिर चिल्लाया—

     

    “भागो!”

     

    और वह पायल लेकर अंधेरे में गायब हो गया।

     

    सूरज की पहली किरण आसमान पर दिखाई देने लगी।

     

    लेकिन आदित्य, मीरा और कबीर के सामने अब सिर्फ एक सवाल था—

     

    क्या गोपाल सच में मर गया था… या वह खुद किले का अगला हिस्सा बन चुका था?

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।