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श्रेणी: कहानी लेखन पुरस्कार प्रतियोगिता

  • 😱भानगढ़ का किला😱 भाग 1 — किले में पहली रात😱

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

     

    राजस्थान की सूखी पहाड़ियों के बीच बसा भानगढ़ का किला दिन में भी किसी रहस्य से कम नहीं लगता था।

     

    ऊँची-ऊँची टूटी दीवारें, सुनसान गलियाँ, पुराने महल के खंडहर और दूर तक फैली वीरानी…

     

    लेकिन शाम होते ही उस जगह का माहौल पूरी तरह बदल जाता था।

     

    स्थानीय लोग कहते थे कि सूरज ढलने के बाद किले के अंदर कोई नहीं जाता।

     

    क्योंकि रात में वहाँ से पायल की आवाज़ आती थी।

     

    कभी किसी औरत के रोने की।

     

    और कभी…

     

    किसी के धीरे-धीरे अपना नाम पुकारने की।

     

    लेकिन आदित्य इन बातों पर विश्वास नहीं करता था।

     

    वह एक युवा डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता था और उसे भारत की रहस्यमयी ऐतिहासिक जगहों पर फिल्में बनाना पसंद था।

     

    उसके साथ उसकी दोस्त मीरा, कैमरा संभालने वाला कबीर और स्थानीय गाइड गोपाल थे।

     

    गोपाल ने किले के मुख्य रास्ते पर पहुँचते ही कहा—

     

    “एक बात पहले ही बता देता हूँ। सूरज डूबने के बाद हम यहाँ नहीं रुकेंगे।”

     

    कबीर हँस पड़ा।

     

    “क्यों? भूत पकड़ लेगा?”

     

    गोपाल ने उसकी तरफ देखा।

     

    “भूत से ज्यादा डर उस चीज़ का है जो खुद को भूत नहीं मानती।”

     

    कबीर की हँसी अचानक रुक गई।

     

    आदित्य ने कहा—

     

    “हमें सिर्फ कुछ फुटेज चाहिए। अगर अंधेरा होने लगेगा तो निकल जाएँगे।”

     

    गोपाल ने सिर हिला दिया।

     

    चारों किले के अंदर जाने लगे।

     

    जैसे-जैसे वे आगे बढ़े, मोबाइल नेटवर्क गायब हो गया।

     

    हवा भी अजीब तरह से ठंडी लग रही थी।

     

    किले के पुराने बाजार के खंडहरों के बीच से गुजरते हुए मीरा ने एक टूटी हुई दुकान की दीवार पर कुछ देखा।

     

    वहाँ लाल रंग से एक निशान बना था।

     

    “ये क्या है?”

     

    गोपाल ने निशान देखा और तुरंत दूसरी तरफ देखने लगा।

     

    “इसे मत छूना।”

     

    आदित्य ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    गोपाल ने जवाब नहीं दिया।

     

    कुछ दूर जाने के बाद वे महल के पास पहुँचे।

     

    महल का एक हिस्सा बाकी जगहों से अलग था।

     

    उसकी दीवारें काली थीं।

     

    गोपाल ने कहा—

     

    “यहाँ रात में कोई नहीं आता।”

     

    आदित्य ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    गोपाल ने धीरे से कहा—

     

    “कहते हैं इसी हिस्से में राजदरबार की एक दासी रहती थी। उसका नाम था रूहानी।”

     

    मीरा ने पूछा—

     

    “रूहानी?”

     

    “हाँ। लोग कहते हैं वह बहुत खूबसूरत थी। एक तांत्रिक उस पर मोहित हो गया था। उसने रूहानी को पाने के लिए जादू किया।”

     

    आदित्य मुस्कुराया।

     

    “ये तो पुरानी लोककथा है।”

     

    गोपाल बोला—

     

    “लोककथा हो या सच… लेकिन उस रात किले में बहुत कुछ हुआ था।”

     

    “क्या?”

     

    “रूहानी ने तांत्रिक का विरोध किया। तांत्रिक ने गुस्से में किले को श्राप दे दिया।”

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “फिर?”

     

    गोपाल कुछ कहता, उससे पहले अचानक ऊपर से पत्थर गिरा।

     

    धड़ाम!

     

    सभी चौंक गए।

     

    गोपाल ने कहा—

     

    “हमें वापस चलना चाहिए।”

     

    लेकिन आदित्य ने कैमरा ऊपर कर दिया।

     

    “यही तो हमें चाहिए।”

     

    उन्होंने शूटिंग जारी रखी।

     

    शाम होने लगी।

     

    आसमान नारंगी से धीरे-धीरे काला होने लगा।

     

    गोपाल बार-बार घड़ी देख रहा था।

     

    “हमें अब निकलना होगा।”

     

    लेकिन तभी कैमरे में कुछ दिखाई दिया।

     

    मीरा ने स्क्रीन देखी।

     

    “आदित्य…”

     

    “क्या हुआ?”

     

    “वहाँ कौन खड़ा है?”

     

    कैमरे में उनसे लगभग पचास मीटर दूर एक महिला खड़ी दिखाई दे रही थी।

     

    उसने सफेद कपड़े पहन रखे थे।

     

    बाल बहुत लंबे थे।

     

    चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    आदित्य ने कैमरा नीचे किया।

     

    सामने कोई नहीं था।

     

    फिर कैमरा स्क्रीन पर देखा।

     

    महिला अभी भी वहीं थी।

     

    “ये कैसे संभव है?”

     

    कबीर ने कैमरा लिया।

     

    तभी स्क्रीन पर महिला ने अपना सिर उठाया।

     

    और सीधे कैमरे की तरफ देखने लगी।

     

    कबीर के हाथ काँप गए।

     

    “आदित्य… इसे बंद कर।”

     

    स्क्रीन अचानक काली हो गई।

     

    उसी समय दूर से पायल की आवाज़ सुनाई दी।

     

    छन… छन… छन…

     

    गोपाल का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “भागो।”

     

    चारों तेजी से मुख्य द्वार की तरफ भागे।

     

    लेकिन रास्ता जैसे बदल गया था।

     

    जिस रास्ते से वे आए थे, वहाँ अब एक ऊँची दीवार खड़ी थी।

     

    आदित्य ने कहा—

     

    “ये रास्ता तो यहाँ था!”

     

    गोपाल ने घबराकर कहा—

     

    “किला रास्ते बदलता नहीं… हमें भटका रहा है।”

     

    अचानक पीछे से किसी औरत की आवाज़ आई—

     

    “रुक जाओ…”

     

    चारों जम गए।

     

    आवाज़ बहुत पास से आई थी।

     

    मीरा ने धीरे से पीछे देखा।

     

    कोई नहीं था।

     

    फिर वही आवाज़ दूसरी तरफ से आई—

     

    “मीरा…”

     

    मीरा के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “इसे मेरा नाम कैसे पता?”

     

    आदित्य ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मेरे पीछे रहो।”

     

    वे एक टूटे हुए कमरे में घुस गए।

     

    कमरे का दरवाज़ा उन्होंने अंदर से बंद कर लिया।

     

    कुछ सेकंड तक बाहर सन्नाटा रहा।

     

    फिर…

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    दरवाज़े पर तीन बार दस्तक हुई।

     

    कबीर ने फुसफुसाकर पूछा—

     

    “कौन है?”

     

    बाहर से जवाब आया—

     

    “गोपाल…”

     

    गोपाल ने घबराकर कहा—

     

    “मैं यहाँ हूँ।”

     

    दरवाज़े के बाहर से फिर आवाज़ आई—

     

    “दरवाज़ा खोलो।”

     

    गोपाल आगे बढ़ा।

     

    आदित्य ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “रुको।”

     

    “वो मेरी आवाज़ है,” गोपाल ने कहा।

     

    आदित्य ने धीरे से पूछा—

     

    “अगर तुम अंदर हो… तो बाहर कौन बोल रहा है?”

     

    गोपाल पीछे हट गया।

     

    कुछ पल बाद बाहर से वही आवाज़ बदल गई।

     

    अब वह आदित्य की आवाज़ थी।

     

    “गोपाल, दरवाज़ा खोलो।”

     

    फिर कबीर की।

     

    “जल्दी खोलो!”

     

    फिर मीरा की।

     

    “मुझे डर लग रहा है।”

     

    मीरा ने अपने कान बंद कर लिए।

     

    बाहर से अचानक जोर-जोर से हँसी आने लगी।

     

    दरवाज़ा हिलने लगा।

     

    धड़ाम!

     

    धड़ाम!

     

    धड़ाम!

     

    गोपाल ने कहा—

     

    “ये हमें अंदर आने के लिए मजबूर कर रहा है।”

     

    आदित्य ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    गोपाल ने जवाब दिया—

     

    “किले का श्राप।”

     

    अचानक कमरे की दीवार पर एक काला निशान उभर आया।

     

    वही निशान जो उन्होंने रास्ते में देखा था।

     

    लेकिन इस बार उसके नीचे एक शब्द लिखा था—

     

    “रूहानी।”

     

    मीरा ने डरते हुए कहा—

     

    “ये नाम किसका है?”

     

    गोपाल ने कहा—

     

    “जिससे हमें डरना चाहिए था।”

     

    उसी समय कमरे की छत से धूल गिरने लगी।

     

    और फर्श के नीचे से किसी महिला की धीमी आवाज़ आई—

     

    “तुम लोग बहुत देर से आए हो…”

     

    आदित्य ने नीचे देखा।

     

    फर्श के बीच एक पतली दरार बन चुकी थी।

     

    उस दरार के अंदर से सफेद रोशनी निकल रही थी।

     

    और फिर…

     

    एक हाथ धीरे-धीरे जमीन से बाहर आया।

     

    चारों चीख पड़े।

     

    हाथ के साथ एक चाँदी की पायल भी बाहर निकली।

     

    आदित्य ने पायल को देखा।

     

    उसी क्षण उसके कैमरे की स्क्रीन अपने आप चालू हो गई।

     

    स्क्रीन पर एक दृश्य दिखाई दिया।

     

    एक पुराना महल।

     

    एक महिला भाग रही थी।

     

    उसके पीछे एक आदमी मंत्र पढ़ रहा था।

     

    और महिला चिल्ला रही थी—

     

    “मुझे छोड़ दो!”

     

    फिर दृश्य बदल गया।

     

    महिला ने कैमरे की तरफ देखा।

     

    वह रूहानी थी।

     

    उसके होंठ हिले।

     

    आवाज़ बहुत धीमी थी—

     

    “मुझे श्राप नहीं दिया गया था…”

     

    फिर स्क्रीन काली हो गई।

     

    आदित्य ने कहा—

     

    “उसने क्या कहा?”

     

    मीरा ने काँपते हुए जवाब दिया—

     

    “उसने कहा… उसे श्राप नहीं दिया गया था।”

     

    बाहर अचानक तेज़ हवा चलने लगी।

     

    दरवाज़ा अपने आप खुल गया।

     

    सामने कोई नहीं था।

     

    लेकिन जमीन पर गीले पैरों के निशान बने थे।

     

    वे निशान धीरे-धीरे आगे जा रहे थे।

     

    गोपाल ने कहा—

     

    “अब हमें उस जगह जाना होगा जहाँ ये निशान जा रहे हैं।”

     

    आदित्य ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    गोपाल ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्योंकि अगर हमने रूहानी की कहानी नहीं समझी…”

     

    वह कुछ पल रुका।

     

    “तो शायद हम इस किले से कभी बाहर नहीं निकल पाएँगे।”

     

    और चारों उन रहस्यमयी पैरों के निशानों का पीछा करते हुए किले के उस हिस्से की ओर बढ़ गए…

     

    जहाँ पिछले सौ साल से कोई नहीं गया था।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 😱राजगीर की आखिरी हवेली 😱 भाग 3 — आखिरी रात😱

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    कमरे में अंधेरा गहराता जा रहा था।

     

    राघव, अमन और छोटू दीवार से सटे खड़े थे।

     

    सामने उसके पिता के रूप में खड़ा वह साया धीरे-धीरे उनकी ओर बढ़ रहा था।

     

    उसकी आवाज़ बिल्कुल सुरेश जैसी थी।

     

    “राघव… मेरे पास आओ।”

     

    राघव के कदम पीछे हट गए।

     

    “तुम मेरे पिता नहीं हो।”

     

    साया मुस्कुराया।

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    राघव ने कहा—

     

    “क्योंकि मेरे पिता मुझे कभी इस तरह नहीं बुलाते थे।”

     

    साया कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसका चेहरा विकृत होने लगा।

     

    अनामिका ने कहा—

     

    “इसे मत देखना।”

     

    राघव ने पूछा—

     

    “इसे कैसे खत्म करें?”

     

    अनामिका बोली—

     

    “हवेली के डर को खत्म करना होगा।”

     

    “कैसे?”

     

    “जिस याद से यह पैदा हुआ है, उसे स्वीकार करके।”

     

    राघव को डायरी याद आई।

     

    उसने अपने पिता की आखिरी डायरी का फटा हुआ हिस्सा ढूँढना शुरू किया।

     

    कुछ देर बाद उसे मेज के नीचे एक पुराना कागज़ मिला।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “मैंने उस बच्ची को बचाने की कोशिश नहीं की। मैं डर गया था। लेकिन मैंने उसके डर को हमेशा के लिए अपने बेटे से दूर रखने की कोशिश की।”

     

    राघव की आँखें भर आईं।

     

    “मेरे पिता…”

     

    अनामिका ने कहा—

     

    “तुम्हारे पिता बुरे नहीं थे। लेकिन उन्होंने गलती की थी।”

     

    “उन्होंने तुम्हें क्यों छोड़ा?”

     

    “क्योंकि उस रात उन्हें चुनना था। मुझे बचाना या खुद बचना।”

     

    राघव ने पूछा—

     

    “और उन्होंने खुद को चुना?”

     

    अनामिका ने सिर झुका लिया।

     

    “हाँ।”

     

    कमरे में अचानक एक जोरदार चीख गूँजी।

     

    साया दीवार से टकराया।

     

    “झूठ!”

     

    उसकी आवाज़ पूरे कमरे में फैल गई।

     

    “उसने मुझे नहीं छोड़ा था। मैंने उसे छोड़ा था।”

     

    राघव चौंका।

     

    “क्या?”

     

    अनामिका ने उसकी ओर देखा।

     

    “तुम्हारे पिता ने आखिरी समय पर मुझे बाहर निकाल दिया था।”

     

    राघव ने पूछा—

     

    “फिर?”

     

    “लेकिन जब वह मुझे लेकर भाग रहे थे, हवेली के मालिक ने उन्हें पकड़ लिया।”

     

    “फिर क्या हुआ?”

     

    “उसने तुम्हारे पिता को धमकी दी कि अगर वह मुझे बाहर ले गए तो वह तुम्हारे परिवार को नुकसान पहुँचाएगा।”

     

    राघव की साँस रुक गई।

     

    “मेरे परिवार को?”

     

    अनामिका ने कहा—

     

    “तुम तब छोटे बच्चे थे।”

     

    “इसलिए मेरे पिता ने…”

     

    “हाँ। उन्होंने मुझे वापस कमरे में बंद कर दिया।”

     

    राघव की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “और तुम मर गईं।”

     

    अनामिका ने सिर हिलाया।

     

    “लेकिन मरते समय मैंने उसे माफ कर दिया था।”

     

    साया अचानक चीखने लगा।

     

    “नहीं!”

     

    अनामिका ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हारी शक्ति मेरी नफरत से थी।”

     

    “और अब मेरे अंदर नफरत नहीं है।”

     

    साया पीछे हटने लगा।

     

    राघव को अचानक समझ आया।

     

    यह साया अनामिका की आत्मा नहीं था।

     

    यह उसके डर, गुस्से और अधूरे दर्द से पैदा हुई एक अलग शक्ति थी।

     

    राघव ने कहा—

     

    “तो हमें इसे नष्ट नहीं करना।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “फिर?”

     

    “इसे सच बताना होगा।”

     

    राघव साए के सामने खड़ा हो गया।

     

    “तुम अनामिका नहीं हो।”

     

    साया चीखा—

     

    “मैं वही हूँ!”

     

    “नहीं।”

     

    राघव ने कहा—

     

    “तुम उसके डर हो।”

     

    साया पीछे हट गया।

     

    “तुम उसके दर्द हो।”

     

    साया का शरीर काँपने लगा।

     

    “तुम उसकी मौत नहीं हो।”

     

    राघव की आवाज़ और मजबूत हो गई।

     

    “और अब कोई तुमसे नहीं डरेगा।”

     

    साया ने जोर से चीख मारी।

     

    पूरी हवेली काँपने लगी।

     

    छत से पत्थर गिरने लगे।

     

    दरवाज़े अपने आप खुलने लगे।

     

    दीवारों पर लगी सारी तस्वीरें नीचे गिर गईं।

     

    छोटू रोने लगा।

     

    अमन ने उसे पकड़ लिया।

     

    तभी कमरे के बीच अनामिका दिखाई दी।

     

    उसने राघव की ओर हाथ बढ़ाया।

     

    “मुझे बाहर ले चलो।”

     

    राघव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    उसका हाथ बर्फ जैसा ठंडा था।

     

    दोनों कमरे से बाहर निकले।

     

    अमन और छोटू उनके पीछे थे।

     

    साया लगातार उनका पीछा कर रहा था।

     

    वे सीढ़ियों से नीचे भागे।

     

    मुख्य दरवाज़ा दिखाई दे रहा था।

     

    लेकिन दरवाज़े के सामने वही काला साया खड़ा था।

     

    उसने कहा—

     

    “तुम बाहर नहीं जा सकते।”

     

    राघव रुका।

     

    अनामिका उसके पीछे खड़ी थी।

     

    उसने कहा—

     

    “राघव…”

     

    “तुम्हें मेरी एक मदद करनी होगी।”

     

    “क्या?”

     

    “मेरी आखिरी चीज़ बाहर ले जाओ।”

     

    उसने अपनी गर्दन से लॉकेट उतारकर राघव को दे दिया।

     

    “इसे उस जगह ले जाना जहाँ मेरे पिता ने मुझे पहली बार बंद किया था।”

     

    राघव ने पूछा—

     

    “वहीं क्यों?”

     

    “क्योंकि मेरी कहानी वहीं खत्म हुई थी।”

     

    “और अब?”

     

    “वहीं से मेरी कहानी आजाद होगी।”

     

    राघव ने लॉकेट कसकर पकड़ लिया।

     

    वह दरवाज़े की तरफ दौड़ा।

     

    साया उसके पीछे आया।

     

    अचानक अनामिका साए के सामने खड़ी हो गई।

     

    “इसे जाने दो।”

     

    साया गरजा—

     

    “तुम मुझे रोक नहीं सकती!”

     

    अनामिका मुस्कुराई।

     

    “मैं अकेली नहीं हूँ।”

     

    तभी हवेली की दीवारों पर लगी पुरानी तस्वीरों से एक-एक करके रोशनी निकलने लगी।

     

    उन तस्वीरों में दिखाई देने वाले सभी लोग धीरे-धीरे अनामिका के पीछे खड़े हो गए।

     

    जैसे वे वर्षों से इसी क्षण का इंतजार कर रहे हों।

     

    साया पीछे हट गया।

     

    राघव, अमन और छोटू हवेली से बाहर निकल गए।

     

    जैसे ही राघव ने लॉकेट जमीन पर रखा…

     

    पूरी हवेली के अंदर से एक जोरदार चीख सुनाई दी।

     

    फिर…

     

    सन्नाटा।

     

    कई सेकंड तक कोई आवाज़ नहीं आई।

     

    हवेली की खिड़कियों में जलती हुई रोशनी एक-एक करके बुझ गई।

     

    और फिर मुख्य दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

     

    राघव ने हवेली की ओर देखा।

     

    पहली मंजिल की खिड़की में अनामिका खड़ी थी।

     

    उसने मुस्कुराकर हाथ हिलाया।

     

    फिर वह धीरे-धीरे गायब हो गई।

     

    सुबह होने तक हवेली बिल्कुल शांत हो चुकी थी।

     

    गाँव के लोग वहाँ पहुँचे।

     

    रामजी ने हवेली को देखा और कई वर्षों बाद पहली बार उसके अंदर कदम रखा।

     

    “अब कुछ नहीं है,” उन्होंने कहा।

     

    राघव ने पूछा—

     

    “आपको कैसे पता?”

     

    रामजी मुस्कुराए।

     

    “क्योंकि इतने सालों में पहली बार मुझे यहाँ डर नहीं लग रहा।”

     

    कुछ दिनों बाद राघव पटना लौट गया।

     

    उसने इस घटना पर एक किताब लिखने का फैसला किया।

     

    लेकिन उसने कहानी का अंत बदल दिया।

     

    उसने लिखा—

     

    “हर भूत बदला लेने नहीं लौटता। कुछ आत्माएँ सिर्फ इसलिए लौटती हैं ताकि उनकी अधूरी कहानी पूरी हो सके।”

     

    कई महीनों बाद राघव को गाँव से एक पत्र मिला।

     

    पत्र में सिर्फ एक फोटो थी।

     

    वह सिंह हवेली की थी।

     

    लेकिन फोटो देखकर राघव के हाथ काँपने लगे।

     

    फोटो में हवेली बिल्कुल साफ दिखाई दे रही थी।

     

    सारी खिड़कियाँ बंद थीं।

     

    लेकिन पहली मंजिल की खिड़की पर…

     

    एक छोटी लड़की खड़ी थी।

     

    उसके चेहरे पर मुस्कान थी।

     

    फोटो के पीछे सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

     

    “अब मुझे डर नहीं लगता।”

     

    राघव समझ गया।

     

    अनामिका आखिरकार आज़ाद हो चुकी थी।

     

    और सिंह हवेली का वह डर…

     

    जिसने वर्षों तक पूरे गाँव को अपने कब्जे में रखा था…

     

    हमेशा के लिए खत्म हो गया था।

     

    लेकिन उस दिन के बाद गाँव वालों ने एक बात जरूर देखी।

     

    हवेली के बंद कमरे नंबर 13 के बाहर हर अमावस्या की रात…

     

    एक छोटी-सी लाल गुड़िया रखी मिलती थी।

     

    कोई नहीं जानता था कि उसे वहाँ कौन रखता था।

     

    लेकिन उसके साथ हमेशा एक छोटा-सा कागज़ होता था।

     

    उस पर लिखा रहता—

     

    “जिससे डरते हो, उसका सामना करो। क्योंकि कई बार अंधेरे में छिपा राक्षस नहीं… सिर्फ एक अधूरी कहानी होती है।”

     

    और इस तरह…

     

    राजगीर की उस आखिरी हवेली का रहस्य हमेशा के लिए खत्म हो गया।

     

    समाप्त।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 😱राजगीर की आखिरी हवेली😱 भाग 2 — बंद कमरे का राज😱

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

     

    राघव कुछ सेकंड तक हवेली के बंद दरवाज़े को देखता रहा।

     

    अमन ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “राघव, हमें पुलिस के पास जाना चाहिए।”

     

    राघव ने सिर हिलाया।

     

    “छोटू अंदर है।”

     

    “लेकिन हम अंदर गए तो हम भी फँस सकते हैं।”

     

    राघव ने कहा—

     

    “वह बच्चा है। मैं उसे अकेला नहीं छोड़ सकता।”

     

    दोनों फिर हवेली के अंदर चले गए।

     

    इस बार अंदर पहले से ज्यादा अंधेरा था।

     

    मुख्य दरवाज़ा उनके पीछे अपने आप बंद हो गया।

     

    अमन ने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई।

     

    “छोटू!”

     

    कोई जवाब नहीं।

     

    फिर ऊपर से आवाज़ आई—

     

    “भैया…”

     

    दोनों सीढ़ियाँ चढ़ने लगे।

     

    पहली मंजिल पर पहुँचकर राघव रुक गया।

     

    गलियारे के दोनों तरफ कई कमरे थे।

     

    लेकिन सभी दरवाज़े खुले थे।

     

    सिर्फ कमरा नंबर 13 बंद था।

     

    राघव ने पूछा—

     

    “छोटू कहाँ गया होगा?”

     

    अमन ने कहा—

     

    “शायद उसी कमरे में।”

     

    दरवाज़े के नीचे से हल्की रोशनी आ रही थी।

     

    राघव ने धीरे से दरवाज़ा खोला।

     

    कमरा खाली था।

     

    लेकिन फर्श पर छोटे-छोटे पैरों के निशान बने थे।

     

    वे निशान कमरे की पिछली दीवार तक जा रहे थे।

     

    राघव ने दीवार पर हाथ रखा।

     

    उसे अंदर से आवाज़ सुनाई दी।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    अमन ने पूछा—

     

    “दीवार के पीछे कोई है?”

     

    राघव ने जोर से दीवार थपथपाई।

     

    अंदर से जवाब आया।

     

    ठक… ठक…

     

    फिर छोटू की आवाज़—

     

    “भैया…”

     

    राघव चिल्लाया—

     

    “छोटू! डरो मत। हम तुम्हें निकालेंगे।”

     

    अंदर से छोटू रोते हुए बोला—

     

    “जल्दी करो…”

     

    “यहाँ कोई और भी है।”

     

    राघव और अमन ने दीवार के पास की पुरानी अलमारी हटाई।

     

    उसके पीछे लकड़ी का एक छोटा दरवाज़ा था।

     

    दरवाज़ा खोलते ही संकरी सुरंग दिखाई दी।

     

    अंदर से सड़ी हुई मिट्टी की गंध आ रही थी।

     

    अमन ने कहा—

     

    “ये हवेली के नीचे जाती है।”

     

    दोनों सुरंग में उतर गए।

     

    कुछ दूर जाने के बाद उन्हें छोटू दिखाई दिया।

     

    वह एक कोने में बैठा काँप रहा था।

     

    राघव उसके पास पहुँचा।

     

    “छोटू!”

     

    छोटू ने उसे पकड़ लिया।

     

    “भैया, मुझे यहाँ एक लड़की लाई थी।”

     

    “कौन लड़की?”

     

    “वही… काली आँखों वाली।”

     

    राघव ने पूछा—

     

    “उसने तुम्हारे साथ क्या किया?”

     

    छोटू ने सामने की तरफ इशारा किया।

     

    “वो वहाँ गई है।”

     

    सुरंग के आखिरी हिस्से में एक बड़ा कमरा था।

     

    कमरे की दीवारों पर दर्जनों तस्वीरें लगी थीं।

     

    कुछ बहुत पुरानी।

     

    कुछ नई।

     

    राघव ने एक तस्वीर उठाई।

     

    उसमें गाँव के लोग थे।

     

    एक तस्वीर में रामजी चायवाला भी था।

     

    दूसरी में राघव के पिता।

     

    राघव का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    “मेरे पिता यहाँ क्यों हैं?”

     

    अमन ने दूसरी तस्वीर उठाई।

     

    “देख…”

     

    तस्वीर में राघव के पिता के साथ एक छोटी लड़की खड़ी थी।

     

    वही लड़की।

     

    काली आँखों वाली।

     

    पीछे तारीख लिखी थी—

     

    1999।

     

    राघव को याद आया कि उसके पिता कई वर्षों तक इसी इलाके में काम करते थे।

     

    लेकिन उन्होंने कभी इस हवेली का जिक्र नहीं किया था।

     

    कमरे के बीच में एक पुरानी मेज थी।

     

    उस पर एक डायरी रखी थी।

     

    डायरी के पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “यह कहानी उस रात से शुरू हुई जब मैंने अपनी बेटी को खो दिया।”

     

    राघव ने डायरी पढ़ना शुरू किया।

     

    डायरी उसके पिता की थी।

     

    उसमें लिखा था—

     

    “मेरा नाम सुरेश है। वर्ष 1999 में मुझे इस हवेली में एक रात रुकना पड़ा। उस रात मैंने एक छोटी लड़की को देखा। उसका नाम था अनामिका।”

     

    राघव का हाथ काँपने लगा।

     

    आगे लिखा था—

     

    “अनामिका इस हवेली में रहने वाले परिवार की बेटी थी। लेकिन उसके माता-पिता कहते थे कि वह पैदा होने के बाद ही मर गई थी।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “तो यह लड़की कौन थी?”

     

    राघव पढ़ता गया।

     

    “मैंने उसे रात में गलियारे में खेलते देखा। उसने मुझसे कहा कि उसके माता-पिता ने उसे कमरे नंबर 13 में बंद कर दिया है।”

     

    अगला पन्ना फटा हुआ था।

     

    फिर लिखा था—

     

    “मैंने दरवाज़ा खोला। अंदर एक बच्ची थी। लेकिन जैसे ही मैंने उसका हाथ पकड़ा, उसने मेरी तरफ देखकर कहा—’आप मेरे पापा नहीं हैं।’”

     

    राघव ने पढ़ना बंद कर दिया।

     

    “फिर?”

     

    अगले पन्ने पर लिखा था—

     

    “मैंने पीछे देखा। कमरे में एक आदमी खड़ा था। उसका चेहरा बिल्कुल मेरे जैसा था।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “ये तो…”

     

    राघव ने अगला पन्ना पलटा।

     

    “उसने कहा—’जिस दिन तुमने उसे देखा, उसी दिन से वह तुम्हारे पीछे आएगी।’”

     

    इसके बाद कई पन्नों पर सिर्फ एक ही वाक्य लिखा था—

     

    “उसे घर मत ले जाना।”

     

    राघव ने डायरी बंद कर दी।

     

    तभी कमरे की लाइट अपने आप जल गई।

     

    सामने अनामिका खड़ी थी।

     

    उसने कहा—

     

    “तुम्हारे पिता ने मुझे बचाने की कोशिश की थी।”

     

    राघव ने पूछा—

     

    “फिर उन्होंने मुझे क्यों नहीं बताया?”

     

    “क्योंकि उन्होंने तुम्हें बचाने के लिए सब कुछ भूलने का फैसला किया।”

     

    “तुम कौन हो?”

     

    लड़की ने कहा—

     

    “मैं इस हवेली की बेटी नहीं हूँ।”

     

    “फिर?”

     

    उसने धीरे से कहा—

     

    “मैं वह हूँ जिसे इस हवेली ने बनाया है।”

     

    कमरे की दीवारें हिलने लगीं।

     

    अनामिका बोली—

     

    “बहुत साल पहले यहाँ एक आदमी ने अपने परिवार को धोखा दिया। उसने अपनी संपत्ति बचाने के लिए अपनी ही बेटी को कमरे में बंद कर दिया।”

     

    “वह लड़की मर गई?”

     

    “हाँ।”

     

    “और फिर?”

     

    “उसका डर हवेली में रह गया।”

     

    राघव ने पूछा—

     

    “लेकिन तुम?”

     

    अनामिका ने कहा—

     

    “मैं उसी डर का चेहरा हूँ।”

     

    अचानक उसके चेहरे की त्वचा काली पड़ने लगी।

     

    उसकी आँखें और बड़ी हो गईं।

     

    वह चीखने लगी—

     

    “हर वह व्यक्ति जो इस कमरे का दरवाज़ा खोलता है… उसका डर मेरा हिस्सा बन जाता है!”

     

    अमन ने छोटू को पीछे किया।

     

    “राघव, भाग!”

     

    लेकिन राघव वहीं खड़ा रहा।

     

    “तुम मुझे यहाँ क्यों लाई?”

     

    अनामिका शांत हो गई।

     

    उसने कहा—

     

    “क्योंकि तुम्हारे पिता ने मुझे खत्म करने की कोशिश की थी।”

     

    राघव चौंक गया।

     

    “उन्होंने क्या किया?”

     

    “उन्होंने कमरे नंबर 13 की दीवार में मेरी आखिरी याद बंद कर दी।”

     

    “कौन सी याद?”

     

    अनामिका ने सामने की दीवार की ओर देखा।

     

    वहाँ एक छोटी लकड़ी की पेटी दिखाई दी।

     

    राघव ने पेटी खोली।

     

    अंदर एक पुराना लॉकेट था।

     

    लॉकेट खोलते ही एक तस्वीर दिखाई दी।

     

    तस्वीर में एक आदमी था।

     

    राघव का पिता।

     

    और उसके साथ…

     

    अनामिका।

     

    पीछे लिखा था—

     

    “सच जानने के बाद भी मैंने उसे बचाया नहीं।”

     

    राघव की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “मेरे पिता ने उसे मरने दिया?”

     

    अनामिका ने कहा—

     

    “हाँ।”

     

    अचानक सुरंग के बाहर से कदमों की आवाज़ आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    कोई उनकी तरफ आ रहा था।

     

    अमन ने पूछा—

     

    “कौन है?”

     

    जवाब आया—

     

    “मैं सुरेश हूँ।”

     

    राघव के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

     

    उसके पिता का नाम सुरेश था।

     

    लेकिन उसके पिता की मृत्यु पाँच साल पहले हो चुकी थी।

     

    कदमों की आवाज़ और करीब आई।

     

    अंधेरे से एक आदमी बाहर आया।

     

    चेहरा…

     

    राघव के पिता जैसा।

     

    वह मुस्कुराया।

     

    “तुमने मुझे बुलाया था, बेटा?”

     

    राघव पीछे हट गया।

     

    अनामिका चीख पड़ी—

     

    “ये तुम्हारे पिता नहीं हैं!”

     

    आदमी का चेहरा अचानक बदलने लगा।

     

    उसकी आँखें काली हो गईं।

     

    मुँह असामान्य रूप से फैल गया।

     

    और उसने कहा—

     

    “लेकिन अब तुम्हें मेरे साथ रहना होगा।”

     

    सुरंग का रास्ता अचानक बंद हो गया।

     

    कमरे की दीवारों पर लाल अक्षरों में एक वाक्य उभर आया—

     

    “एक जाएगा, बाकी तीन बचेंगे।”

     

    राघव ने छोटू, अमन और अनामिका की तरफ देखा।

     

    उसे समझ आ गया था कि हवेली अब एक बलि चाहती थी।

     

    लेकिन वह यह नहीं जानता था कि इस हवेली का असली रहस्य…

     

    उसके अपने परिवार से जुड़ा हुआ था।

     

    और उस रात…

     

    उसे अपने पिता की सबसे बड़ी गलती का सामना करना था।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 😱राजगीर की आखिरी हवेली 😱 भाग 1 — हवेली से आती आवाज़😱

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    बिहार के राजगीर से कुछ दूर पहाड़ियों और घने पेड़ों के बीच एक छोटा-सा गाँव था—बरहटा।

     

    गाँव छोटा था, लेकिन उसके आखिरी छोर पर खड़ी एक पुरानी हवेली के कारण दूर-दूर तक मशहूर था।

     

    लोग उसे सिंह हवेली कहते थे।

     

    कहा जाता था कि लगभग पचास साल पहले उस हवेली में एक जमींदार परिवार रहता था। एक रात परिवार के सभी सदस्य अचानक गायब हो गए।

     

    न कोई लाश मिली।

     

    न कोई सामान चोरी हुआ।

     

    न घर के दरवाज़े टूटे।

     

    बस हवेली के अंदर एक कमरा ऐसा था, जिसे तब से हमेशा के लिए बंद कर दिया गया था।

     

    गाँव के लोग कहते थे कि रात के समय उस कमरे से किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आती है।

     

    कभी किसी बूढ़े आदमी के चलने की।

     

    और कभी…

     

    किसी महिला की आवाज़—

     

    “दरवाज़ा खोल दो…”

     

    गाँव में रहने वाला राघव इन कहानियों को हमेशा मजाक समझता था।

     

    वह पटना में रहकर पत्रकारिता करता था और कुछ दिनों के लिए अपने गाँव आया था।

     

    एक शाम चाय की दुकान पर बैठे हुए उसने हवेली की बात छेड़ दी।

     

    “लोग आज भी उस हवेली से डरते हैं?”

     

    बूढ़े दुकानदार रामजी ने उसकी तरफ देखा।

     

    “डरना चाहिए।”

     

    राघव हँस पड़ा।

     

    “आप भी?”

     

    रामजी ने चाय का गिलास नीचे रखा।

     

    “मैंने अपनी आँखों से देखा है।”

     

    “क्या?”

     

    “उस हवेली की खिड़की में एक लड़की खड़ी थी।”

     

    राघव मुस्कुराया।

     

    “कब?”

     

    “बीस साल पहले।”

     

    “फिर?”

     

    रामजी की आवाज़ धीमी हो गई।

     

    “अगले दिन जिस आदमी ने उसे देखा था… वह गायब हो गया।”

     

    राघव कुछ देर चुप रहा।

     

    उसी समय उसके दोस्त अमन का फोन आया।

     

    अमन पटना से राघव से मिलने गाँव आया था।

     

    उसने कहा—

     

    “भाई, सुना है यहाँ एक पुरानी हवेली है।”

     

    राघव ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “चलोगे?”

     

    अमन तुरंत तैयार हो गया।

     

    उनके साथ गाँव का लड़का छोटू भी चल पड़ा।

     

    तीनों शाम करीब पाँच बजे हवेली पहुँच गए।

     

    हवेली बाहर से ही डरावनी लग रही थी।

     

    ऊँची दीवारों पर बेलें चढ़ी थीं।

     

    मुख्य दरवाज़े पर जंग लगी लोहे की जंजीर लटक रही थी।

     

    राघव ने जंजीर हटाई।

     

    दरवाज़ा अपने आप थोड़ा खुल गया।

     

    क्रीईई…

     

    अमन ने कहा—

     

    “भाई, अभी भी वापस चल सकते हैं।”

     

    राघव हँसा।

     

    “डर गया?”

     

    “नहीं। लेकिन मरने की जल्दी भी नहीं है।”

     

    तीनों अंदर चले गए।

     

    हवेली के अंदर पुराने फर्नीचर पर धूल जमी थी।

     

    दीवारों पर परिवार की पुरानी तस्वीरें लगी थीं।

     

    एक तस्वीर में एक आदमी, उसकी पत्नी और दो बच्चे दिखाई दे रहे थे।

     

    नीचे तारीख लिखी थी—

     

    1978।

     

    राघव ने तस्वीर को कैमरे से रिकॉर्ड किया।

     

    तभी छोटू ने कहा—

     

    “भैया…”

     

    “क्या हुआ?”

     

    “इस तस्वीर में चार लोग हैं ना?”

     

    “हाँ।”

     

    “लेकिन दीवार पर पाँच परछाइयाँ क्यों हैं?”

     

    राघव ने तस्वीर को ध्यान से देखा।

     

    वास्तव में तस्वीर के नीचे दीवार पर पाँच परछाइयाँ दिखाई दे रही थीं।

     

    चौथी परछाईं किसी बच्चे की थी।

     

    और पाँचवीं…

     

    एक बहुत लंबे आदमी की।

     

    अमन ने तुरंत कहा—

     

    “चलो यहाँ से।”

     

    लेकिन तभी ऊपर से किसी के दौड़ने की आवाज़ आई।

     

    धड़… धड़… धड़…

     

    तीनों ने ऊपर देखा।

     

    पहली मंजिल खाली थी।

     

    राघव ने आवाज़ लगाई—

     

    “कोई है?”

     

    कोई जवाब नहीं आया।

     

    फिर ऊपर से एक बच्चे की आवाज़ आई—

     

    “भैया…”

     

    छोटू का चेहरा पीला पड़ गया।

     

    “ये आवाज़…”

     

    “क्या?”

     

    “मेरी छोटी बहन जैसी है।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “तुम्हारी बहन तो पटना में है।”

     

    छोटू ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    आवाज़ फिर आई—

     

    “छोटू…”

     

    इस बार छोटू सीढ़ियों की तरफ बढ़ गया।

     

    राघव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “रुको।”

     

    छोटू बोला—

     

    “वो मुझे बुला रही है।”

     

    राघव ने कहा—

     

    “जो भी है, ऊपर नहीं जाना।”

     

    लेकिन तभी सीढ़ियों के ऊपर एक लड़की दिखाई दी।

     

    उसने लाल रंग की पुरानी पोशाक पहनी थी।

     

    उसके लंबे बाल चेहरे पर थे।

     

    वह बिल्कुल स्थिर खड़ी थी।

     

    राघव ने कैमरा उसकी तरफ किया।

     

    कैमरे की स्क्रीन पर लड़की दिखाई नहीं दे रही थी।

     

    सिर्फ एक खाली गलियारा था।

     

    राघव का हाथ काँप गया।

     

    “ये…”

     

    अचानक लड़की ने अपना सिर उठाया।

     

    उसका चेहरा दिखाई दिया।

     

    आँखें पूरी तरह काली थीं।

     

    उसने धीरे से कहा—

     

    “तुम बहुत देर से आए हो।”

     

    लाइट अचानक बंद हो गई।

     

    तीनों चीख पड़े।

     

    कुछ सेकंड बाद लाइट वापस आई।

     

    लड़की गायब थी।

     

    लेकिन सीढ़ियों के आखिरी पायदान पर एक पुरानी चाबी पड़ी थी।

     

    राघव ने चाबी उठा ली।

     

    उस पर एक छोटा-सा नंबर लिखा था—

     

    13।

     

    अमन ने पूछा—

     

    “तेरह किस चीज़ का नंबर है?”

     

    राघव ने हवेली की ओर देखा।

     

    उसे पहली मंजिल पर एक बंद दरवाज़ा दिखाई दिया।

     

    दरवाज़े पर वही नंबर था।

     

    13।

     

    दरवाज़े पर मोटी लोहे की जंजीर लगी थी।

     

    राघव ने चाबी लगाई।

     

    जंजीर खुल गई।

     

    अमन ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “दरवाज़ा मत खोल।”

     

    राघव ने कहा—

     

    “हम इतनी दूर सिर्फ देखने आए हैं।”

     

    उसने दरवाज़ा खोल दिया।

     

    कमरे के अंदर अंधेरा था।

     

    फर्श पर पुराने खिलौने पड़े थे।

     

    एक टूटी हुई गुड़िया।

     

    लकड़ी की छोटी ट्रेन।

     

    और एक पुराना झूला।

     

    कमरे के बीच में दीवार पर एक वाक्य लिखा था—

     

    “जिसे तुम खोज रहे हो, वह तुम्हें पहले से खोज रहा है।”

     

    राघव ने दीवार को छुआ।

     

    अचानक उसके कान के पास किसी ने फुसफुसाया—

     

    “राघव…”

     

    वह पीछे हट गया।

     

    अमन ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    राघव ने कुछ नहीं कहा।

     

    तभी कमरे के कोने में रखा पुराना रेडियो अपने आप चालू हो गया।

     

    उसमें से टूटी-फूटी आवाज़ आने लगी।

     

    “आज रात…”

     

    “हवेली में…”

     

    “कोई…”

     

    “जिंदा नहीं बचेगा…”

     

    रेडियो बंद हो गया।

     

    अमन ने कहा—

     

    “हमें अभी निकलना होगा।”

     

    तीनों बाहर भागे।

     

    लेकिन जैसे ही वे मुख्य दरवाज़े के पास पहुँचे, दरवाज़ा बंद था।

     

    राघव ने उसे खींचा।

     

    नहीं खुला।

     

    अचानक ऊपर से किसी महिला के रोने की आवाज़ आई।

     

    “मेरे बच्चे को बचा लो…”

     

    फिर दूसरी आवाज़ आई—

     

    “राघव…”

     

    “तुमने दरवाज़ा खोल दिया है।”

     

    राघव ने ऊपर देखा।

     

    पहली मंजिल पर वही काली आँखों वाली लड़की खड़ी थी।

     

    इस बार उसके हाथ में एक पुरानी तस्वीर थी।

     

    उसने तस्वीर नीचे फेंक दी।

     

    राघव ने उसे उठाया।

     

    तस्वीर में वही परिवार था।

     

    लेकिन इस बार एक बात अलग थी।

     

    परिवार के चार लोगों के बीच…

     

    राघव खुद खड़ा था।

     

    राघव के हाथ से तस्वीर गिर गई।

     

    अमन ने कहा—

     

    “ये कैसे हो सकता है?”

     

    तभी पीछे से दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई।

     

    मुख्य दरवाज़ा धीरे-धीरे खुल गया।

     

    बाहर रात हो चुकी थी।

     

    लेकिन जैसे ही तीनों बाहर निकलने लगे…

     

    छोटू रुक गया।

     

    “भैया…”

     

    राघव ने पीछे देखा।

     

    छोटू गायब था।

     

    सिर्फ जमीन पर उसकी चप्पल पड़ी थी।

     

    और हवेली के अंदर से उसकी आवाज़ आ रही थी—

     

    “भैया…”

     

    “मुझे ढूँढो…”

     

    “मैं अभी जिंदा हूँ।”

     

    राघव ने हवेली की ओर देखा।

     

    दरवाज़ा अपने आप बंद हो चुका था।

     

    और उसके ऊपर दीवार पर ताजा लाल अक्षरों में लिखा था—

     

    “अब तीन नहीं… चार लोग हैं।”

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • चुनरी वाली चुड़ैल

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    घुटनों तक लटकी चुनरी वाली चुड़ैल

    राजपुर गांव में एक ऐसा रास्ता था, जिस पर दिन में भी लोग अकेले जाने से डरते थे।

    गांव से बाजार जाने वाला वही रास्ता सबसे छोटा था, लेकिन पिछले कुछ महीनों से लोग उसे छोड़कर लंबा रास्ता अपनाने लगे थे।

    क्योंकि उस रास्ते पर दोपहर के समय एक औरत दिखाई देती थी।

    लाल चुनरी ओढ़े।

    उसकी चुनरी सिर से शुरू होकर घुटनों तक लटकी रहती थी। चेहरा कभी साफ दिखाई नहीं देता था। वह बस धीरे-धीरे सड़क के बीचों-बीच चलती रहती।

    और सबसे डरावनी बात यह थी कि…

    जिसकी नजर उससे टकराती, उसकी मौत कुछ ही मिनटों में हो जाती।

    गांव में इस बात की इतनी दहशत थी कि लोग दोपहर में भी अपनी खिड़कियां बंद रखते।

    एक दिन राजपुर का रहने वाला रमेश बाजार से घर लौट रहा था।

    उसने दूर सड़क पर एक लाल चुनरी देखी।

    वह अचानक रुक गया।

    “हे भगवान…”

    वह औरत सड़क के बीच खड़ी थी।

    रमेश ने तुरंत अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।

    उसे गांव के बुजुर्गों की बात याद थी।

    “उसे देखना मत। उसकी आंखों में आंखें मत डालना।”

    रमेश सिर झुकाकर आगे बढ़ने लगा।

    तभी पीछे से धीमी आवाज आई।

    “रमेश…”

    उसके कदम वहीं रुक गए।

    उसने पलटकर नहीं देखा।

    आवाज फिर आई।

    “रमेश…”

    इस बार आवाज बिल्कुल उसके कान के पास से आई।

    रमेश का शरीर कांपने लगा।

    उसने आंखें बंद कर लीं।

    लेकिन तभी सड़क पर उसकी नजर सामने पड़े एक छोटे पत्थर पर गई।

    पत्थर के पास लाल चुनरी का एक कोना पड़ा था।

    रमेश डर गया।

    वह भागने ही वाला था कि सामने से आती हवा में चुनरी थोड़ा ऊपर उठी।

    रमेश की नजर अनजाने में उस औरत के चेहरे पर चली गई।

    बस कुछ पल के लिए।

    उसने दो चमकती हुई आंखें देखीं।

    औरत मुस्कुराई।

    रमेश के हाथ से सामान गिर गया।

    वह पीछे हटने लगा।

    “नहीं…”

    लेकिन कुछ ही मिनट बाद वह सड़क के किनारे बेहोश होकर गिर पड़ा।

    जब गांव वालों ने उसे देखा, तब तक उसकी सांसें थम चुकी थीं।

    उस दिन गांव में फिर वही सवाल उठ गया।

    आखिर वह चुड़ैल कौन थी?

    गांव के सबसे बूढ़े आदमी हरिदास ने सबको बुलाकर कहा,

    “मैंने इस औरत को पहले भी देखा है। बहुत साल पहले।”

    लोग चुप हो गए।

    हरिदास ने धीरे से कहा,

    “करीब बीस साल पहले इसी रास्ते से एक लड़की रोज अपने मायके जाया करती थी। उसका नाम था सुहानी।”

    “फिर क्या हुआ था?” किसी ने पूछा।

    हरिदास कुछ देर चुप रहा।

    “एक दिन वह इसी रास्ते पर गायब हो गई।”

    “गायब?”

    “हां। उसका कभी पता नहीं चला।”

    गांव की चंदा ने पूछा,

    “लेकिन उसका चुड़ैल से क्या संबंध है?”

    हरिदास ने उसकी ओर देखा।

    “यही तो कोई नहीं जानता।”

    अगले दिन चंदा की सहेली मीना बाजार जाने के लिए उसी रास्ते पर निकल गई।

    चंदा ने उसे रोकते हुए कहा,

    “मत जा। दूसरा रास्ता ले ले।”

    मीना हंस पड़ी।

    “दिन के उजाले में भी डरोगी?”

    चंदा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

    “मैं मजाक नहीं कर रही।”

    मीना ने हाथ छुड़ाया।

    “मैं दस मिनट में लौट आऊंगी।”

    चंदा उसे जाते हुए देखती रही।

    कुछ देर बाद गांव के बाहर से एक बच्चे की चीख सुनाई दी।

    “लाल चुनरी!”

    चंदा का दिल बैठ गया।

    वह दौड़कर बाहर आई।

    सड़क बिल्कुल खाली थी।

    लेकिन बीच रास्ते पर मीना की चप्पल पड़ी थी।

    मीना कहीं नहीं थी।

    उस रात गांव में किसी ने खाना नहीं खाया।

    हरिदास ने कहा,

    “अब हमें उस औरत का सच पता करना ही होगा।”

    चंदा ने पूछा,

    “कैसे?”

    हरिदास ने कहा,

    “सुहानी की कहानी से शुरू करेंगे।”

    अगली सुबह चंदा और हरिदास गांव के पुराने मंदिर के पीछे बने एक टूटे हुए कमरे में गए।

    हरिदास ने मिट्टी से ढका एक पुराना संदूक खोला।

    उसमें कुछ पुराने कागज और एक तस्वीर थी।

    तस्वीर में एक जवान लड़की खड़ी थी।

    सिर पर लाल चुनरी।

    चंदा तस्वीर देखते ही सिहर गई।

    “यही है…”

    हरिदास ने सिर हिलाया।

    “सुहानी।”

    तभी संदूक के अंदर से एक पुराना कागज नीचे गिरा।

    चंदा ने उसे उठाया।

    उस पर लिखा था—

    “जिस दिन मेरी लाल चुनरी सड़क पर दिखाई दे, समझ लेना मैं सच बताने वापस आ गई हूं।”

    चंदा ने घबराकर हरिदास की तरफ देखा।

    “इसका मतलब?”

    हरिदास ने कोई जवाब नहीं दिया।

    उसी समय बाहर से पायल की आवाज आई।

    छन…

    छन…

    छन…

    दोनों जम गए।

    दिन के ठीक बारह बजे थे।

    खिड़की से बाहर देखा तो सड़क पर वही लाल चुनरी वाली औरत खड़ी थी।

    इस बार वह गांव की तरफ देख रही थी।

    हरिदास ने फुसफुसाकर कहा,

    “आंखें मत मिलाना।”

    चंदा ने धीरे से पूछा,

    “अगर हम उसका चेहरा नहीं देखेंगे तो उसे कैसे रोकेंगे?”

    हरिदास ने कहा,

    “शायद रोकना ही गलत होगा। शायद हमें उसकी बात सुननी होगी।”

    अचानक औरत ने हाथ उठाया।

    उसकी उंगली गांव के पुराने कुएं की तरफ थी।

    फिर वह धीरे-धीरे चलने लगी।

    चंदा और हरिदास कुछ दूरी से उसके पीछे चल पड़े।

    औरत कुएं के पास जाकर रुक गई।

    उसने अपनी लाल चुनरी जमीन पर गिरा दी।

    पहली बार उसका चेहरा साफ दिखाई दिया।

    वह डरावना नहीं था।

    बल्कि उसकी आंखों में गहरा दुख था।

    चंदा ने कांपते हुए पूछा,

    “तुम सुहानी हो?”

    औरत ने धीरे से सिर हिलाया।

    हरिदास की आंखें फैल गईं।

    सुहानी ने कुएं की तरफ इशारा किया।

    हरिदास अचानक सब समझ गया।

    “तुम्हें यहां छिपाया गया था…”

    सुहानी की आंखों से आंसू बहने लगे।

    चंदा ने पूछा,

    “किसने?”

    सुहानी ने सड़क की तरफ देखा।

    फिर गांव के एक पुराने मकान की ओर इशारा किया।

    वह मकान गांव के सबसे अमीर आदमी के परिवार का था।

    हरिदास का चेहरा बदल गया।

    “नहीं…”

    उसी समय पीछे से एक आवाज आई।

    “तुम दोनों यहां क्या कर रहे हो?”

    दोनों पलटे।

    गांव का सरपंच खड़ा था।

    सुहानी को देखते ही उसका चेहरा पीला पड़ गया।

    उसने कांपते हुए कहा,

    “इसे देखकर भी तुम जिंदा हो?”

    चंदा ने पूछा,

    “आप इसे जानते हैं?”

    सरपंच पीछे हटने लगा।

    “नहीं…”

    हरिदास ने उसकी ओर देखा।

    “झूठ मत बोलो।”

    सरपंच चुप रहा।

    तभी सुहानी ने जमीन से लाल चुनरी उठाई और सरपंच के सामने रख दी।

    सरपंच कांपने लगा।

    “मैंने कुछ नहीं किया था…”

    हरिदास चौंका।

    “तो फिर किसने किया था?”

    सरपंच ने सिर झुका लिया।

    “उस समय गांव का जमींदार…”

    वह आगे कुछ कह पाता, उससे पहले तेज हवा चली।

    सुहानी की चुनरी हवा में लहराई।

    सड़क पर अचानक सन्नाटा छा गया।

    सरपंच घबराकर पीछे हटने लगा।

    लेकिन सुहानी ने उसे छुआ तक नहीं।

    बस उसकी ओर देखकर बोली,

    “सच बोलो।”

    सरपंच की आंखों में डर उतर आया।

    उसने सबके सामने पुराना राज खोल दिया।

    सुहानी को कभी किसी ने नहीं मारा था।

    वह उस रात गांव छोड़कर चली गई थी।

    लेकिन जाते समय उसकी लाल चुनरी कुएं के पास गिर गई थी।

    लोगों ने उसके गायब होने की कहानी को डर और अफवाहों में बदल दिया।

    और वर्षों बाद जब सुहानी की मौत दूसरे शहर में हुई, तब उसकी आखिरी इच्छा थी कि गांव वालों को सच्चाई पता चले।

    लेकिन फिर सवाल था—

    फिर रास्ते पर दिखाई देने वाली चुड़ैल कौन थी?

    हरिदास ने सुहानी की तरफ देखा।

    “अगर तुम सुहानी नहीं हो… तो तुम कौन हो?”

    लाल चुनरी वाली औरत कुछ पल चुप रही।

    फिर उसने अपनी चुनरी उठाई।

    हवा में चुनरी लहराई।

    और उसके पीछे खड़ी एक दूसरी परछाईं दिखाई दी।

    एक और लाल चुनरी।

    घुटनों तक लटकी हुई।

    चंदा के मुंह से चीख निकल गई।

    सुहानी ने धीरे से अपना सिर झुका लिया।

    दूसरी परछाईं सड़क की ओर बढ़ने लगी।

    हरिदास फुसफुसाया

    “अब समझ आया…”

    “क्या?”

    “सुहानी चुड़ैल नहीं थी…”

    वह डरते हुए बोला”वह तो लोगों को असली चुड़ैल से बचाने के लिए यहां आती थी।”

    चंदा ने सड़क की ओर देखा।

    दूसरी लाल चुनरी धीरे-धीरे उनकी तरफ बढ़ रही थी।

    और इस बार…उसके पीछे कोई चेहरा नहीं था।

    सिर्फ दो चमकती हुई आंखें थीं।

    और गांव के रास्ते पर फिर से वही आवाज गूंजी

    छन… छन… छन…

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड की खट्टी-मीठी नोक-झोंक

    गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड की खट्टी-मीठी नोक-झोंक

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

     

    Rohan और Ananya का रिश्ता ठीक वैसा ही था जैसे गरम चाय में थोड़ी सी अदरक—तीखा भी, स्वादिष्ट भी।

     

    रविवार की सुबह थी। Rohan अभी भी बिस्तर पर लेटा था। Ananya रसोई से चिल्लाई, “ओय सोने वाले राजा! उठो वरना परांठे खुद उठकर चल जाएँगे!”

     

    Rohan ने आँखें मलते हुए जवाब दिया, “तुम्हारे परांठे इतने भारी होते हैं ना… उठ ही नहीं पाते।”

     

    “क्या कहा तुमने?” Ananya चम्मच लेकर कमरे में घुस आई।

     

    Rohan मुस्कुराते हुए बोला, “मैंने कहा… तुम्हारे परांठे इतने स्वादिष्ट होते हैं कि लोग उठाकर ले जाते हैं।”

     

    Ananya ने चम्मच हवा में लहराया, “झूठ बोलना भी सीख लो थोड़ा। कल रात को कहा था ना कि मेरा बनाया खाना दुनिया का सबसे बेस्ट है… आज भारी कह रहे हो?”

     

    “कल रात मैं भूखा था। भूखा आदमी कुछ भी बोल देता है,” Rohan ने तकिया से मुँह छुपा लिया।

     

    Ananya ने तकिया छीन लिया। “अच्छा! तो अब सच्चाई बताओ—मेरा खाना कैसा है?”

     

    Rohan ने नाटकीय अंदाज में कहा, “इतना अच्छा कि मैं रोज-रोज मारने के बाद भी जिंदा हूँ।”

     

    दोनों हँस पड़े। लेकिन हँसी ज्यादा देर नहीं टिकी।

     

    थोड़ी देर बाद Ananya ने कहा, “आज शाम को मेरे कॉलेज वाले दोस्त आ रहे हैं। तुम भी रहना।”

     

    Rohan का चेहरा लटक गया। “फिर से? पिछले हफ्ते भी आए थे। और वो तेरा एक्स… नहीं आएगा ना?”

     

    Ananya ने आँखें तरेरीं। “कितनी बार कहा है—वो सिर्फ दोस्त है अब। और तुम हर बार क्यों जलते हो?”

     

    “जलता नहीं… सिर्फ परेशान होता हूँ। वो तुम्हें ‘अनु’ कहकर बुलाता है। अनु! मेरा हक है वो।”

     

    “ओहो! अब नाम पर भी कब्जा?” Ananya हँसी। “तुम ना… बहुत छोटे हो जाते हो कभी-कभी।”

     

    Rohan उठकर खड़ा हो गया। “छोटे? मैंने तुम्हारे लिए वो महँगा परफ्यूम लिया, तुम्हारे पसंदीदा शो के लिए रात-रात भर जगा… और तुम मुझे छोटा कह रही हो?”

     

    Ananya पास आकर बोली, “हाँ बोल रही हूँ। क्योंकि जब तुम जलते हो तो बहुत क्यूट लगते हो।”

     

    Rohan ने नाटक करते हुए मुँह फुला लिया। “मैं क्यूट नहीं, मैं हैंडसम हूँ।”

     

    “हैंडसम हो… लेकिन जब नाराज होते हो तो बच्चों जैसे लगते हो,” Ananya ने उसकी गाल Pinch की।

     

    Rohan ने उसका हाथ पकड़ लिया। “एक काम करो। आज शाम को तुम मेरे दोस्तों के साथ आओ। फिर देखना मैं कितना जलता हूँ।”

     

    Ananya हँस पड़ी। “नहीं जाना। तुम्हारे दोस्त सिर्फ क्रिकेट और ऑफीस की बात करते हैं। बोर हो जाऊँगी।”

     

    “और तुम्हारे दोस्त सिर्फ पुरानी यादें और ‘याद है ना जब…’ करते हैं। मैं बोर हो जाता हूँ।”

     

    दोनों आमने-सामने खड़े थे। एक पल को लगता था जैसे लड़ाई होने वाली है। लेकिन दोनों की आँखों में हँसी थी।

     

    Ananya ने अचानक कहा, “ठीक है। आज न तो मेरे दोस्त, न तुम्हारे। आज सिर्फ हम दोनों। फिल्म? या लॉन्ग ड्राइव?”

     

    Rohan ने सोचा। “लॉन्ग ड्राइव। लेकिन कंडीशन है—तू गाड़ी नहीं चलाएगी।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि पिछली बार तूने इतना जोर से ब्रेक मारा था कि मेरा दिल मुँह में आ गया था।”

     

    Ananya ने हाथ कमर पर रखे। “क्योंकि तुमने अचानक कहा था ‘आई लव यू’। झटका तो लगेगा ना!”

     

    Rohan शांत पड़ गया। फिर धीरे से बोला, “तो अब झटका नहीं लगता क्या?”

     

    Ananya ने उसकी ओर देखा। गुस्सा, नोक-झोंक, जलन… सब एक पल में गायब। वह पास आई और उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “लगता है… हर रोज। लेकिन अब मैं आदी हो गई हूँ।”

     

    Rohan मुस्कुराया। “तो फिर आज की नोक-झोंक का फैसला क्या?”

     

    Ananya ने उसकी तरफ एक परांठा थमाते हुए कहा, “फैसला यह कि तू पहले यह खा। वरना मैं नाराज हो जाऊँगी।”

     

    Rohan ने बड़ा सा निवाला लिया और बोला, “नाराज मत होना। तुम्हारी नाराजगी भी मीठी लगती है… लेकिन बहुत ज्यादा हो जाए तो खट्टी पड़ जाती है।”

     

    Ananya हँसते हुए बोली, “और तुम्हारी जलन भी प्यारी लगती है… लेकिन बहुत ज्यादा हो जाए तो मैं तुम्हें चुप कराने के लिए किस कर देती हूँ।”

     

    Rohan ने तुरंत मुँह बंद कर लिया।  

     

    Ananya ने आँखें तरेरीं। “क्या हुआ?”

     

    “चुप हूँ। किस का इंतजार है।”

     

    दोनों फिर हँस पड़े।

     

    यही उनकी कहानी थी।  

    नोक-झोंक में भी प्यार,  

    जलन में भी अपनापन,  

    और हर खट्टी बात के बाद एक मीठी मुस्कान।

     

    क्योंकि असली प्यार वही होता है  

    जहाँ लड़ाई भी हँसी में खत्म हो जाए,  

    और नाराजगी भी गले मिलने का बहाना बन जाए।

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • जन्मदिन का अनचाहा तोहफा

    जन्मदिन का अनचाहा तोहफा

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    आज मेरा बत्तीसवाँ जन्मदिन था।  

    कमरे में हल्की रोशनी थी। दीवार पर टँगी पुरानी घड़ी नौ बज रहे थे। मेज पर एक छोटा-सा केक रखा था—वही वाला, जो हर साल मैं खुद बाजार से लाता था। कोई गाना नहीं, कोई पार्टी नहीं, कोई भीड़ नहीं। सिर्फ मैं और मेरी चुप्पी।

     

    पत्नी रिया रसोई में थी। उसने कहा था, “आज कुछ स्पेशल बनाऊँगी।” लेकिन उसकी आवाज में वह पुरानी गर्माहट नहीं थी। पिछले दो साल से हमारे बीच जैसे कोई काँच की दीवार खड़ी हो गई थी। बातें होती थीं, लेकिन दिल नहीं छूती थीं। बेटा आरव स्कूल से आने के बाद अपने कमरे में चला गया था। उसने सुबह सिर्फ इतना कहा था, “पापा, हैप्पी बर्थडे,” और चले गए थे।

     

    मैं खिड़की के पास खड़ा था। बाहर हल्की बारिश हो रही थी। अचानक दरवाजे पर खटखटाहट हुई।  

    रिया चिल्लाई, “कौन है?”  

    मैंने दरवाजा खोला।  

    बाहर एक बुजुर्ग आदमी खड़ा था। उम्र साठ के करीब। हाथ में एक छोटा-सा डिब्बा। चेहरा थका हुआ, लेकिन आँखों में कोई अजीब//सी चमक।  

     

    “आप… अनुज मिश्रा हैं न?” उसने पूछा।  

     

    “हाँ।”  

     

    उसने डिब्बा मेरी ओर बढ़ाया। “यह आपके लिए है। जन्मदिन का तोहफा।”  

     

    मैंने हैरानी से देखा। “आप…?”  

     

    “मेरा नाम महेश है। मैं आपके पिताजी का पुराना दोस्त था। उन्होंने यह आपको देने को कहा था… बहुत पहले।”  

     

    पिताजी।  

    वह शब्द सुनते ही मेरा गला सूख गया। पिताजी को गए हुए ग्यारह साल हो चुके थे। अचानक दिल का दौरा। कोई चेतावनी नहीं, कोई अलविदा नहीं। बस एक सुबह अखबार पढ़ते-पढ़ते चले गए थे।  

     

    मैंने डिब्बा लिया। महेश जी मुस्कुराए और बिना और कुछ कहे चले गए। बारिश में उनकी छाया गायब हो गई।  

     

    रिया पास आकर बोली, “कौन था?”  

    “पिताजी का कोई पुराना जानने वाला… तोहफा दे गया।”  

     

    मैंने डिब्बा खोला। अंदर एक पुरानी डायरी थी। काली कवर, कोनों से घिसी हुई। पहली पृष्ठ पर पिताजी का हाथ—  

     

    *“अनुज के लिए।  

    जब तुम तैयार हो, तब खोलना।  

    —पापा”*

     

    मैंने डायरी बंद कर दी। अचानक कमरा बहुत छोटा लगने लगा।  

    रिया ने पूछा, “क्या है?”  

    “कुछ नहीं। बाद में देखूँगा।”  

     

    रात के खाने में सब चुप थे। केक काटा गया। आरव ने जल्दी-जल्दी अपना पीस खाया और कमरे में चला गया। रिया ने बर्तन धोए। मैं डायरी को टेबल पर रखे देखता रहा।  

     

    बारह बजने वाले थे। मैंने डायरी खोली।  

     

    पहला पन्ना—  

    *“बेटे, आज तुम्हारा ग्यारहवाँ जन्मदिन है। तुम सो रहे हो। मैं यह लिख रहा हूँ क्योंकि कुछ बातें कहनी हैं जो मुँह से नहीं कह पाता।”*

     

    आगे के पन्ने साल-दर-साल भरे हुए थे। हर जन्मदिन पर एक चिट्ठी।  

     

    *बारहवाँ जन्मदिन…*  

    *पंद्रहवाँ…*  

    *अठारहवाँ…*  

    *जब तुम कॉलेज गए…*  

    *जब तुम्हारी माँ बीमार पड़ीं…*  

    *जब तुमने नौकरी छोड़ दी थी और मैंने डांटा था…*  

     

    और फिर आखिरी चिट्ठी। तारीख वही थी जब पिताजी का देहांत हुआ था—एक दिन पहले की।  

     

    *“बेटे,  

    अगर तुम यह पढ़ रहे हो तो शायद मैं नहीं हूँ।  

    मुझे माफ करना।  

    मैंने तुम्हें बहुत डांटा। बहुत सख्ती की। तुम्हें लगता होगा कि मैं तुमसे प्यार नहीं करता था।  

    सच यह है कि मैं डरता था।  

    डरता था कि तुम मेरी तरह मेहनत में खो जाओगे। डरता था कि दुनिया तुम्हें तोड़ देगी।  

    मैंने प्यार को डांट में छुपा लिया।  

    आज तुम्हारा इक्कीसवाँ जन्मदिन है। मैं चाहता था कि खुद आकर कहूँ… लेकिन हिम्मत नहीं हो रही।  

    इस डायरी को मैंने महेश के पास रख दिया है। उसने वादा किया है कि जब समय आएगा, तुम्हें दे देगा।  

    अनुज,  

    तुम काफी हो।  

    तुम्हारी कमी नहीं है।  

    और हाँ… मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ।  

    हर जन्मदिन पर।  

    —पापा”*

     

    डायरी हाथ से छूटकर फर्श पर गिर गई।  

    मैं रो नहीं पाया। बस बैठ गया। सालों का गुबार एक साथ उठ आया। पिताजी की सख्ती, उनकी चुप्पी, उनकी वो आँखें जो कभी नहीं मुस्कुराती थीं… सब एक-एक करके याद आने लगा।  

     

    रिया कमरे में आई। उसने डायरी उठाई और चुपचाप पढ़ने लगी। पढ़ते-पढ़ते उसकी आँखें भी भर गईं। उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा।  

     

    “यह तोहफा अनचाहा था ना?” उसने धीरे से कहा।  

     

    मैंने सिर हिलाया। “हाँ। मैं नहीं चाहता था कि वे वापस आएँ। न यादों में, न शब्दों में।”  

     

    रिया बोली, “लेकिन कभी-कभी अनचाहा तोहफा ही सबसे जरूरी होता है।”  

     

    मैंने डायरी फिर उठाई। आखिरी पन्ने पर एक छोटी-सी नोट थी—  

     

    *“अगर एक दिन तुम्हारा बेटा तुमसे नाराज हो, तो उसे यह डायरी दिखाना।  

    ताकि वह समझे कि पिता भी इंसान होते हैं।”*

     

    मैं उठकर आरव के कमरे में गया। वह सो रहा था। मैंने उसके माथे पर हाथ रखा। फिर वापस आकर रिया के पास बैठ गया।  

     

    “रिया… क्या हम बात कर सकते हैं? सच-सच?”  

     

    उसने सिर हिलाया।  

     

    रात भर हमने बात की। सालों से जमा शिकायतें, अनकहे शब्द, थकान, डर… सब निकले। कोई चीख-पुकार नहीं हुई। बस दो थके हुए लोग एक-दूसरे को सुन रहे थे।  

     

    सुबह हुई। बारिश रुक चुकी थी।  

    मैंने केक का बचा हुआ टुकड़ा आरव को दिया। उसने हैरानी से देखा।  

    “पापा, आप रोए हैं?”  

     

    मैंने मुस्कुराते हुए कहा, “हाँ। लेकिन अच्छे आँसू थे।”  

     

    फिर मैंने उसे डायरी दिखाई।  

    आरव ने धीरे-धीरे पढ़ा। पढ़कर बोला, “दादाजी… अच्छे थे ना?”  

     

    “हाँ बेटे। बहुत अच्छे थे। बस बता नहीं पाए।”  

     

    उस जन्मदिन के बाद घर की हवा बदल गई। पूरी तरह नहीं, लेकिन काफी हद तक। रिया फिर से हँसने लगी। आरव मेरे साथ बैठकर बात करने लगा। और मैं… हर साल उस डायरी को खोलता रहा।  

     

    अब जब भी कोई पूछता है कि उस जन्मदिन पर सबसे अच्छा तोहफा क्या मिला, तो मैं कहता हूँ।

     

    “एक अनचाहा तोहफा।  

    जो मैंने कभी माँगा नहीं था।  

    लेकिन जिसने मुझे वह सब लौटा दिया जो मैंने खो दिया था  

    अपने पिता का प्यार,  

    अपने घर की गर्माहट,  

    और खुद को माफ करने की हिम्मत।”  

     

    कभी-कभी जिंदगी अनचाही चीजें देती है।  

    और वही अनचाही चीजें… सबसे ज्यादा बदल देती हैं।

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • सफर में मिली एक बच्ची

    सफर में मिली एक बच्ची

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

    ट्रेन की खिड़की से बाहर देखते हुए मैंने सोचा था कि यह सफर भी बाकी सफरों की तरह ही बीत जाएगा। दिल्ली से वाराणसी जाने वाली वह रात की ट्रेन थी। डिब्बे में भीड़ थी, लेकिन मेरी सीट खिड़की वाली होने की वजह से थोड़ी राहत थी। मैं अपने काम के सिलसिले में जा रहा था। मन भारी था। घर में माँ बीमार थीं, पत्नी से अनबन चल रही थी और ऑफिस का दबाव सिर पर सवार था। जिंदगी जैसे रुक-रुककर साँस ले रही थी।

     

    रात के करीब ग्यारह बजे ट्रेन रूकी। एक छोटा-सा स्टेशन था। कुछ यात्री उतरे, कुछ चढ़े। तभी मेरी बगल वाली सीट पर एक छोटी-सी बच्ची बैठ गई। उम्र शायद आठ-नौ साल की होगी। फटी हुई फ्रॉक पहनी हुई, बाल बिखरे हुए, पैरों में कोई चप्पल नहीं। उसके हाथ में एक फटी हुई पॉलीथीन की थैली थी, जिसमें दो-तीन सूखे रोटियाँ और एक प्लास्टिक की पानी की बोतल थी।

     

    वह चुपचाप बैठ गई। मैंने उसकी ओर देखा तो उसने भी मेरी ओर देखा। आँखें बड़ी-बड़ी थीं, लेकिन उनमें कोई बचपन वाली चमक नहीं थी। बस एक अजीब-सी थकान और कुछ छिपा हुआ दर्द।

     

    थोड़ी देर बाद ट्रेन चल पड़ी। बच्ची ने अपनी थैली खोली और एक रोटी निकालकर खाने लगी। धीरे-धीरे, जैसे कोई बहुत कीमती चीज खा रहा हो। मैंने सोचा कि शायद भूखी है। मैंने अपने बैग से बिस्किट का पैकेट निकाला और उसकी ओर बढ़ाया।

     

    “लो, खा लो।”

     

    वह झिझकी। फिर धीरे से बोली, “नहीं भैया… माँ ने कहा है पराया खाना नहीं खाना।”

     

    आवाज बहुत हल्की थी, लेकिन साफ। मैंने मुस्कुराते हुए कहा, “यह पराया नहीं है। तुम खा लो। मैं भी खाऊँगा।”

     

    उसने एक बिस्किट लिया और बहुत धीरे-धीरे खाने लगी। फिर अचानक उसने पूछा, “भैया, आप कहाँ जा रहे हो?”

     

    “वाराणसी।”

     

    “मैं भी… वाराणसी जा रही हूँ।”

     

    “अकेली?” मैंने हैरानी से पूछा।

     

    वह चुप रही। फिर बोली, “माँ स्टेशन पर उतर गई थीं… दवा लेने। कहा था कि जल्दी आ जाएँगी। लेकिन ट्रेन चल पड़ी… और माँ नहीं आईं।”

     

    मेरा दिल एक पल के लिए रुक-सा गया। “तो तुम अकेली हो?”

     

    उसने सिर हिलाया। “हाँ। लेकिन माँ आ जाएँगी। वे वादा करके गई थीं।”

     

    मैंने उसकी ओर देखा। बच्ची की आँखों में आँसू नहीं थे। बस एक अजीब-सी शांति थी, जैसे वह बहुत दिनों से इस इंतजार की आदी हो चुकी हो।

     

    मैंने धीरे से पूछा, “तुम्हारा नाम क्या है?”

     

    “गुड़िया।”

     

    “गुड़िया… तुम्हारी माँ कहाँ काम करती हैं?”

     

    वह थोड़ी देर चुप रही। फिर बोली, “माँ बीमार हैं। बहुत दिनों से। डॉक्टर साहब ने कहा था कि शहर में इलाज कराना पड़ेगा। इसलिए हम गाँव से चले। पापा… पापा तो पहले ही चले गए थे।”

     

    “पापा कहाँ गए?”

     

    गुड़िया ने रोटी का एक छोटा टुकड़ा तोड़ा और बोली, “स्वर्ग। माँ कहती हैं कि पापा स्वर्ग में हैं। वहाँ से हमें देख रहे हैं। इसलिए रोना नहीं चाहिए।”

     

    मेरी साँस अटक गई। आठ साल की बच्ची इतनी सहजता से अपने पिता की मौत की बात कर रही थी, जैसे कोई रोजमर्रा की बात हो।

     

    ट्रेन की आवाज के बीच उसकी आवाज साफ सुनाई दे रही थी। “भैया, क्या स्वर्ग में भी ट्रेन जाती है? माँ कहती हैं कि पापा हमें लेने आएंगे एक दिन। लेकिन मैं सोचती हूँ कि अगर पापा आ गए तो माँ को कौन संभालेगा? माँ तो बहुत कमजोर हो गई हैं। खड़े भी नहीं हो पातीं ठीक से।”

     

    मैं कुछ बोल नहीं पाया। गला सूख गया था।

     

    गुड़िया आगे बोली, “कल रात माँ ने मुझे गले से लगाया था। कहा था—गुड़िया, अगर कभी मैं खो जाऊँ तो तुम घबराना मत। कोई अच्छा आदमी मिल जाएगा जो तुम्हें पहुँचा देगा। और तुम हँसते रहना। क्योंकि पापा को हँसते हुए बच्चे अच्छे लगते हैं।”

     

    उसने अपनी थैली से एक पुरानी तस्वीर निकाली। फटी हुई, मुड़ी हुई। उसमें एक पतला-दुबला आदमी था, गोद में छोटी गुड़िया और बगल में एक औरत। सब मुस्कुरा रहे थे।

     

    “यह हमारे घर की है। जब पापा थे।” उसने तस्वीर दिखाते हुए कहा। “अब घर भी नहीं रहा। किराया नहीं दे पाए तो मालिक ने निकाल दिया। माँ ने कहा—चले चलो, कोई जगह मिल जाएगी।”

     

    मैं चुपचाप उसकी बातें सुन रहा था। हर शब्द दिल के किसी कोने को छू रहा था। मैंने अपनी जिंदगी के झमेलों को याद किया—माँ की बीमारी, पत्नी से अनबन, ऑफिस का तनाव—और अचानक सब कुछ बहुत छोटा लगने लगा।

     

    गुड़िया ने अचानक मेरी ओर देखा। “भैया, आप उदास क्यों हो?”

     

    मैंने मुस्कुराने की कोशिश की। “नहीं… कुछ नहीं।”

     

    “माँ कहती हैं कि उदास रहने से दिल कमजोर हो जाता है। और कमजोर दिल वाला इंसान जल्दी थक जाता है। आपको थकना नहीं चाहिए।”

     

    उसकी बात सुनकर मेरी आँखें भर आईं। मैंने चेहरा खिड़की की तरफ कर लिया ताकि वह न देख सके। लेकिन आँसू रुक नहीं रहे थे।

     

    रात गहराने लगी। गुड़िया धीरे-धीरे मेरी बाँह पर सर रखकर सो गई। उसकी साँसें हल्की-हल्की चल रही थीं। मैं उसे देखता रहा। उस छोटी-सी जिंदगी में इतना बोझ, इतनी समझ, इतनी मजबूरी… और फिर भी वह सो रही थी, जैसे उसे पूरा भरोसा हो कि सुबह माँ आ ही जाएँगी।

     

    सुबह हुई। ट्रेन वाराणसी पहुँचने वाली थी। मैंने गुड़िया को जगाया। उसने आँखें रगड़ते हुए पूछा, “माँ आईं?”

     

    मैंने सिर हिलाया। “अभी नहीं… लेकिन हम ढूँढ़ेंगे।”

     

    स्टेशन पर मैंने टीटीई को बताया। पुलिस को सूचना दी गई। घोषणा हुई। थोड़ी देर बाद एक कमजोर-सी औरत दौड़ती हुई आई। साड़ी फटी हुई, चेहरा पीला, साँसें फूल रही थीं। उसने गुड़िया को देखते ही गले लगा लिया और रोने लगी।

     

    “मैं दवा लेने गई थी… लाइन लग गई… ट्रेन छूट गई… मैंने सोचा तू खो गई…”

     

    गुड़िया ने माँ का चेहरा पोंछते हुए कहा, “माँ, मैं नहीं रोई। पापा को हँसते हुए बच्चे अच्छे लगते हैं ना?”

     

    माँ और जोर से रो पड़ी।

     

    मैं वहीं खड़ा रहा। मेरा गला भर आया। मैंने अपनी जेब से कुछ पैसे निकाले और माँ के हाथ में थमा दिए। उन्होंने मना किया, लेकिन मैंने कहा, “यह पराया नहीं है। गुड़िया की तरह ही अपना है।”

     

    ट्रेन फिर खुलने वाली थी। मैं डिब्बे में चढ़ गया। खिड़की से देखा—गुड़िया हाथ हिला रही थी। माँ भी।

     

    ट्रेन चल पड़ी। मैंने खिड़की से बाहर देखा तो आँखों से आँसू बह रहे थे। दिल भारी था, लेकिन अजीब तरह से हल्का भी।

     

    उस छोटी-सी बच्ची ने कुछ ऐसा कह दिया था जो मैं सालों से सुनना चाहता था, लेकिन किसी ने नहीं कहा था।  

    कि जिंदगी कितनी भी कठिन हो, हँसते रहना चाहिए।  

    कि वादा निभाना चाहिए।  

    कि कभी-कभी सबसे छोटे लोग सबसे बड़े सबक सिखा देते हैं।

     

    उस दिन के बाद जब भी मैं उदास होता, गुड़िया की आवाज कानों में गूंज जाती  

    “आपको थकना नहीं चाहिए।”

     

    और मेरा दिल… सच में रो उठता।  

    लेकिन इस बार आँसू दर्द के नहीं, शुक्र के होते।

     

    क्योंकि सफर में मिली उस बच्ची ने मुझे याद दिला दिया था कि जिंदगी की असली ताकत बड़े-बड़े लोगों में नहीं, छोटी-छोटी बातों और छोटे-छोटे दिलों में छिपी होती है।

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    Lakshmi Kumari

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  • बारिश से दुश्मनी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    बारिश से थी कियाना की दुश्मनी

     

    कियाना को बचपन से ही बारिश बिल्कुल पसंद नहीं थी।

     

    दूसरों के लिए बारिश मतलब ठंडी हवा, मिट्टी की खुशबू, पकौड़े और खिड़की के पास बैठकर चाय पीना था।

     

    लेकिन कियाना के लिए बारिश मतलब डर।

     

    क्योंकि उसके शरीर को बारिश की बूंदें बिल्कुल बर्दाश्त नहीं होती थीं। जैसे ही वह बारिश में भीगती, कुछ ही देर में उसके शरीर पर लाल-लाल रैशेज और तेज खुजली होने लगती। कई बार हालत इतनी खराब हो जाती कि उसे डॉक्टर के पास जाना पड़ता।

     

    बचपन में जब दूसरे बच्चे बारिश में खेलते थे, कियाना अपनी खिड़की के पीछे खड़ी होकर उन्हें देखा करती थी।

     

    उसकी मां कहतीं,

    “बेटा, बाहर मत जाना। बारिश तुम्हारे लिए ठीक नहीं है।”

     

    कियाना सिर हिला देती।

    लेकिन उसके मन में एक ही सवाल आता“आखिर मैं बाकी बच्चों जैसी क्यों नहीं हूं?”

     

    धीरे-धीरे वह बारिश से दूर होती गई।

     

    स्कूल में भी जब बारिश होती, बाकी बच्चे मैदान में दौड़ते हुए जाते और कियाना छत के नीचे अकेली खड़ी रहती।

     

    कुछ बच्चे उसे देखकर बातें भी बनाते।

     

    “इसे बारिश से एलर्जी है।”

    “अरे, इसे छूना मत कहीं तुम्हें भी न हो जाए।”

     

    कियाना जानती थी कि ऐसी बातें बेवकूफी थीं, लेकिन फिर भी हर बार उसके दिल को चोट लगती।

     

    वह कम बोलने लगी।

    फिर एक दिन उसकी मुलाकात रुद्र से हुई।

     

    रुद्र बिल्कुल कियाना के उलट था।वह हमेशा मुस्कुराता रहता था।

     

    किसी दिन परीक्षा में कम नंबर आते तो भी मुस्कुराता।

     

    किसी दोस्त से झगड़ा हो जाता तो कुछ देर बाद खुद ही हंसने लगता।

     

    और अगर कोई दुखी होता, तो उसके पास बैठकर उसे हंसाने की कोशिश करता।

     

    पहली मुलाकात कॉलेज की लाइब्रेरी में हुई।

     

    कियाना एक कोने में बैठी किताब पढ़ रही थी।

     

    अचानक सामने से रुद्र आया और उसकी किताब उठाकर बोला,

    “ये किताब इतनी गंभीर क्यों है?”

     

    कियाना ने चौंककर उसकी तरफ देखा।

    “क्या?”

     

    रुद्र हंस पड़ा।

    “मैं पूछ रहा हूं कि तुम इतनी गंभीर क्यों हो?”

     

    कियाना ने किताब वापस लेते हुए कहा,

     

    “मैं पढ़ रही हूं।”

     

    “अच्छा… तो पढ़ते समय मुस्कुराना मना है क्या?”

     

    कियाना ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    रुद्र चला गया।

     

    अगले दिन फिर आया।

     

    फिर उसके अगले दिन भी।

     

    धीरे-धीरे कियाना को उसकी आदत होने लगी।

     

    एक दिन कियाना ने पूछ ही लिया,

     

    “तुम हमेशा खुश कैसे रहते हो?”

     

    रुद्र कुछ सेकंड चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “मैं हमेशा खुश नहीं रहता।”

     

    कियाना ने उसकी तरफ देखा।

     

    रुद्र मुस्कुराया।

     

    “बस दुखी रहने के बजाय खुश रहने की कोशिश करता हूं।”

     

    कियाना को उसकी बात समझ नहीं आई।

     

    “लेकिन हर किसी की जिंदगी में परेशानियां होती हैं।”

     

    “मेरी जिंदगी में भी हैं।”

     

    “फिर?”

     

    “फिर क्या? परेशानी को अपने ऊपर इतना अधिकार क्यों दूं कि वो मेरी मुस्कान भी छीन ले?”

     

    कियाना पहली बार मुस्कुराई।

     

    उस दिन के बाद दोनों दोस्त बन गए।

     

    रुद्र को कियाना की बारिश वाली परेशानी के बारे में पता था।

     

    वह कभी उसे बारिश में बाहर आने के लिए नहीं कहता था।

     

    बल्कि जब बारिश शुरू होती तो खुद उसके लिए छाता लेकर आता।

     

    एक दिन उसने मजाक में कहा,

     

    “तुम्हारी बारिश से दुश्मनी है, लेकिन मेरी छाते से दोस्ती है।”

     

    कियाना हंस पड़ी।

     

    “तुम बहुत अजीब हो।”

     

    “और तुम बहुत ज्यादा सोचती हो।”

     

    “क्योंकि मुझे हर चीज से डर लगता है।”

     

    रुद्र ने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “डरना गलत नहीं है। लेकिन डर की वजह से जिंदगी जीना छोड़ देना गलत है।”

     

    कियाना चुप हो गई।

     

    उसे पहली बार लगा कि कोई उसकी परेशानी को देखकर उससे दूर नहीं जा रहा था।

     

    समय बीतता गया।

     

    कियाना की जिंदगी में रुद्र की मौजूदगी बढ़ती गई।

     

    जब वह उदास होती, रुद्र उसे हंसाता।

     

    जब वह अपने शरीर को लेकर परेशान होती, रुद्र उसे समझाता,

     

    “तुम्हारे शरीर पर रैशेज आ जाते हैं, इसका मतलब ये नहीं कि तुम खराब हो।”

     

    कियाना की आंखें भर आतीं।

     

    “लेकिन लोग मुझे देखकर घबरा जाते हैं।”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “लोगों की नजर से खुद को देखना बंद करो।”

     

    कियाना ने पूछा,

     

    “और तुम्हारी नजर से?”

     

    रुद्र कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “मेरी नजर में तुम वही कियाना हो जो मुझे रोज परेशान करती है।”

     

    कियाना हंस पड़ी।

     

    लेकिन उसके दिल में उस दिन कुछ बदल गया।

     

    अब वह रुद्र की मुस्कान का इंतजार करने लगी थी।

     

    फिर एक दिन कॉलेज में अचानक तेज बारिश शुरू हो गई।

     

    कियाना कैंपस के बाहर खड़ी थी।

     

    उसके पास छाता नहीं था।

     

    रुद्र कहीं दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    बारिश तेज होती जा रही थी।

     

    तभी कियाना ने देखा कि उसके सामने एक छोटा बच्चा सड़क के किनारे फंस गया था।

     

    वह भीग रहा था और रो रहा था।

     

    कियाना कुछ कदम आगे बढ़ी।

     

    फिर रुक गई।

     

    उसे पता था कि बारिश में जाना उसके लिए परेशानी खड़ी कर सकता है।

     

    लेकिन बच्चा लगातार रो रहा था।

     

    कियाना ने अपने डर को पीछे छोड़ा और दौड़कर बच्चे को पास की दुकान की छत के नीचे ले आई।

     

    कुछ ही मिनटों में उसकी त्वचा पर लाल रैशेज दिखाई देने लगे।

     

    खुजली भी शुरू हो गई।

     

    लेकिन उसने बच्चे को सुरक्षित कर दिया था।

     

    तभी पीछे से रुद्र दौड़ता हुआ आया।

     

    उसके हाथ में छाता था।

     

    उसने कियाना को देखा तो घबरा गया।

     

    “तुम बारिश में क्यों आई?”

     

    कियाना ने बच्चे की तरफ देखकर कहा,

     

    “वो अकेला था।”

     

    रुद्र ने उसकी तरफ देखा।

     

    उसकी आंखों में गुस्सा नहीं, चिंता थी।

     

    “तुम्हें पता है तुम्हारी हालत क्या हो सकती है?”

     

    कियाना ने धीरे से कहा,

     

    “हां।”

     

    “फिर भी?”

     

    कियाना मुस्कुराई।

     

    “तुमने ही तो कहा था… डर की वजह से जिंदगी जीना नहीं छोड़ना चाहिए।”

     

    रुद्र कुछ बोल नहीं पाया।

     

    उसने छाता कियाना के ऊपर कर दिया।

     

    “तुम मेरी बातें याद रखती हो?”

     

    कियाना ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “कुछ बातें याद रखने लायक होती हैं।”

     

    रुद्र भी मुस्कुरा दिया।

     

    उस दिन पहली बार कियाना को अपनी परेशानी से उतनी नफरत नहीं हुई।

     

    उसे समझ आया कि बारिश उसके लिए मुश्किल हो सकती है, लेकिन उसकी पूरी जिंदगी नहीं।

     

    कुछ दिनों बाद रुद्र उसे एक जगह लेकर गया।

     

    वह एक छोटी सी पहाड़ी थी, जहां से पूरा शहर दिखाई देता था।

     

    आसमान में बादल थे।

     

    कियाना ने डरते हुए पूछा,

     

    “यहां क्यों लाए हो?”

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “क्योंकि आज बारिश होने वाली है।”

     

    कियाना तुरंत पीछे हट गई।

     

    “तुम पागल हो?”

     

    रुद्र हंस पड़ा।

     

    “मैं तुम्हें भीगने के लिए नहीं कह रहा।”

     

    उसने अपनी जेब से एक छोटा सा कांच का जार निकाला।

     

    बारिश की पहली बूंदें उसमें गिरने लगीं।

     

    रुद्र ने कहा,

     

    “तुम बारिश को छू नहीं सकतीं, लेकिन उसे देख तो सकती हो।”

     

    कियाना जार को देखने लगी।

     

    उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।

     

    रुद्र ने पूछा,

     

    “अब भी बारिश से नफरत है?”

     

    कियाना ने सिर हिलाया।

     

    “थोड़ी।”

     

    “और जिंदगी से?”

     

    कियाना ने रुद्र की तरफ देखा।

     

    “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    कियाना मुस्कुराई।

     

    “क्योंकि अब उसमें तुम हो।”

     

    रुद्र कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर हमेशा की तरह मुस्कुरा दिया।

     

    बारिश तेज होती गई।

     

    कियाना और रुद्र छत के नीचे खड़े उसे देखते रहे।

     

    कियाना बारिश में नहीं भीगी।

     

    लेकिन पहली बार उसे ऐसा लगा जैसे उसके अंदर बरसों से जमा उदासी जरूर भीगकर धुल गई हो।

     

    उस दिन कियाना को समझ आया कि जिंदगी हमेशा हमारी पसंद के हिसाब से नहीं बदलती।

     

    कभी-कभी हमें अपनी मुश्किलों के साथ जीना सीखना पड़ता है।

     

    और अगर रास्ते में कोई ऐसा इंसान मिल जाए जो हमारी परेशानी देखकर हमसे दूर जाने के बजाय हमारा हाथ थाम ले…

     

    तो जिंदगी थोड़ी आसान जरूर हो जाती है।

     

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • बहु बनी डायन 😱 भाग 3 — असली डायन का सच और अंतिम अंत😱

    पढ़ने का समय : 10 मिनट

     

     

     

    हवेली की दीवारें काँप रही थीं।ऊपर की खिड़की में खड़ी वह बूढ़ी औरत लगातार मुस्कुरा रही थी।

     

    उसकी लाल आँखें अंधेरे में किसी जलते हुए अंगारे की तरह चमक रही थीं।

     

    नीचे तहखाने में नंदिनी, अमन, हरिदास बाबा और वीरेंद्र पत्थर की तरह खड़े थे।

     

    किसी के मुँह से आवाज नहीं निकल रही थी।

     

    वीरेंद्र की नजर अब भी ऊपर उसी बूढ़ी औरत पर थी।

     

    उसने काँपते हुए कहा—

     

    “दादी… आप तो तीस साल पहले मर गई थीं।”

     

    बूढ़ी औरत ने अपना सिर टेढ़ा किया।

     

    फिर उसकी हँसी पूरे तहखाने में गूँज उठी।

     

    “मरी थी… लेकिन तुम लोगों के लालच ने मुझे मरने नहीं दिया।”

     

    नंदिनी ने गौरी की आत्मा की तरफ देखा।

     

    “क्या यही वह औरत है?”

     

    गौरी ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “इसने तुम्हारे साथ क्या किया था?”

     

    गौरी की आँखों में वर्षों पुराना दर्द दिखाई दिया।

     

    “उसका नाम था भवानी।”

     

    हरिदास बाबा ने काँपते हुए कहा—

     

    “भवानी… भैरव सिंह की माँ।”

     

    वीरेंद्र ने सिर झुका लिया।

     

    गौरी ने अपनी कहानी शुरू की।

     

    तीस साल पहले जब गाँव में बीमारी फैली थी, तब भवानी ने लोगों के डर का फायदा उठाया था।

     

    वह तंत्र-मंत्र और अंधविश्वास की बातें करके लोगों को अपने नियंत्रण में रखती थी।

     

    भैरव सिंह जमीन हड़पता था और भवानी लोगों के मन में डर पैदा करती थी।

     

    जिस औरत के पास जमीन होती, उसे डायन कह दिया जाता।

     

    जिस परिवार ने विरोध किया, उसके घर के बाहर रात में अजीब निशान बना दिए जाते।

     

    फिर पूरे गाँव में अफवाह फैलाई जाती कि उस परिवार पर डायन का साया है।

     

    लोग डर जाते।

     

    और आखिरकार अपनी जमीन छोड़कर गाँव से चले जाते।

     

    गौरी ने इस षड्यंत्र को देख लिया था।

     

    इसीलिए उसे भी डायन बना दिया गया।

     

    लेकिन गौरी भागने में सफल हो गई।

     

    उस रात उसने भवानी और भैरव सिंह को आपस में बात करते सुन लिया था।

     

    वे किसी पुराने तहखाने में एक अनुष्ठान करने वाले थे।

     

    गौरी ने उन्हें रोकने की कोशिश की।

     

    लेकिन भवानी ने उसे पकड़ लिया।

     

    “तुमने हमारा राज देख लिया है,” भवानी ने कहा था।

     

    गौरी ने जवाब दिया—

     

    “मैं पूरे गाँव को सच बता दूँगी।”

     

    भवानी हँसी।

     

    “गाँव वाले तुम्हारी बात नहीं मानेंगे।”

     

    गौरी ने कहा—

     

    “एक दिन सच सामने जरूर आएगा।”

     

    भवानी ने उसे धमकाया।

     

    लेकिन उसी समय मंदिर की घंटियाँ बजने लगीं।

     

    गाँव वाले उस तरफ आने लगे।

     

    भवानी डर गई।

     

    उसने गौरी को तहखाने में बंद कर दिया और गाँव वालों से कहा—

     

    “गौरी डायन है। इसे पकड़ो।”

     

    गाँव वालों ने तहखाने को घेर लिया।

     

    लेकिन उसी रात अचानक भयंकर आग लग गई।

     

    अराजकता में गौरी तहखाने से बाहर निकल गई।

     

    वह बरगद के पेड़ तक पहुँची।

     

    वहाँ उसने आखिरी बार हरिदास को देखा।

     

    “बाबा, मुझे बचा लीजिए।”

     

    लेकिन हरिदास डर के कारण कुछ नहीं कर पाए।

     

    गौरी जंगल की तरफ भागी।

     

    इसके बाद किसी ने उसे जीवित नहीं देखा।

     

    कुछ दिनों बाद बरगद के पेड़ के पास उसकी चूड़ियाँ और खून से सना कपड़ा मिला।

     

    गाँव वालों ने मान लिया कि वह मर चुकी है।

     

    लेकिन सच्चाई कुछ और थी।

     

    गौरी कई वर्षों तक जंगल में छिपकर जीवित रही।

     

    उसने गाँव से दूर एक छोटी झोपड़ी बनाई।

     

    वह आज भी लोगों का इलाज करती रही।

     

    लेकिन भवानी ने उसे ढूँढ़ लिया।

     

    और एक रात…

     

    गौरी की हत्या कर दी गई।

     

    उसकी आत्मा उसी बरगद के पेड़ से बंध गई।

     

    गौरी ने कहा—

     

    “मैंने कभी किसी को नुकसान नहीं पहुँचाया। मैं सिर्फ अपना सच साबित करना चाहती थी।”

     

    नंदिनी की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “लेकिन लोग तुम्हें डायन कहते रहे।”

     

    गौरी ने कहा—

     

    “हाँ।”

     

    फिर उसने भवानी की ओर देखा।

     

    “और उसने मेरे नाम का इस्तेमाल करके डर फैलाया।”

     

    तभी ऊपर खड़ी भवानी की आत्मा जोर से हँसी।

     

    “क्योंकि इंसान डरना पसंद करता है।”

     

    अचानक हवेली की दीवारों से धुआँ निकलने लगा।

     

    भवानी नीचे उतरने लगी।

     

    उसके पैर जमीन को छू नहीं रहे थे।

     

    वह हवा में तैरती हुई सीढ़ियों से नीचे आई।

     

    हर कदम के साथ दीवारों पर लगे चित्रों से औरतों की चीखें आने लगीं।

     

    “हमें बचाओ…”

     

    “हम निर्दोष हैं…”

     

    “हमने कुछ नहीं किया…”

     

    नंदिनी ने चारों तरफ देखा।

     

    सभी चित्रों की आँखों से काले आँसू बह रहे थे।

     

    भवानी ने हाथ उठाया।

     

    अचानक अमन हवा में उठ गया।

     

    “अमन!”

     

    नंदिनी उसकी तरफ भागी।

     

    लेकिन किसी अदृश्य शक्ति ने उसे पीछे फेंक दिया।

     

    हरिदास मंत्र पढ़ने लगे।

     

    भवानी ने उनकी ओर देखा।

     

    “तुम!”

     

    हरिदास काँप गए।

     

    “मैंने क्या किया?”

     

    भवानी हँसी।

     

    “तुमने सच देखा था… फिर भी चुप रहे।”

     

    हरिदास घुटनों के बल बैठ गए।

     

    “हाँ… मेरी गलती थी।”

     

    “मैं डर गया था।”

     

    “लेकिन अब मैं सच बताऊँगा।”

     

    भवानी ने जोर से चीख मारी।

     

    पूरी हवेली हिलने लगी।

     

    लेकिन इस बार हरिदास पीछे नहीं हटे।

     

    उन्होंने ऊँची आवाज में कहा—

     

    “गौरी डायन नहीं थी!”

     

    उनकी आवाज हवेली से बाहर तक पहुँची।

     

    गाँव के कई लोग डरते-डरते हवेली के पास पहुँच चुके थे।

     

    हरिदास ने फिर कहा—

     

    “गौरी निर्दोष थी!”

     

    गाँव वाले एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

     

    वीरेंद्र अचानक आगे आया।

     

    उसने सबके सामने अपने परिवार का सच बता दिया।

     

    “मेरे दादा और मेरी दादी ने गाँव की औरतों को डायन कहकर उनकी जमीन छीनी थी।”

     

    गाँव में सन्नाटा छा गया।

     

    वीरेंद्र ने कहा—

     

    “मैंने भी वर्षों तक यह सच छिपाया।”

     

    “लेकिन अब नहीं।”

     

    उसने जमीन के सारे कागज गाँव वालों के सामने रख दिए।

     

    “जिसकी जो जमीन थी, वह वापस मिलेगी।”

     

    भवानी की आत्मा क्रोध से काँपने लगी।

     

    “तुम मेरे खिलाफ जाओगे?”

     

    वीरेंद्र ने सिर उठाकर कहा—

     

    “हाँ।”

     

    “क्योंकि मेरे परिवार ने जो किया, वह गलत था।”

     

    अचानक भवानी की शक्ति और बढ़ गई।

     

    हवेली की छत टूटने लगी।

     

    लोग बाहर भागने लगे।

     

    लेकिन नंदिनी वहीं खड़ी रही।

     

    उसने गौरी की तरफ देखा।

     

    “अब क्या करें?”

     

    गौरी ने कहा—

     

    “मेरा सच सामने आ गया है।”

     

    “लेकिन भवानी?”

     

    “उसे भी सच से ही हराया जा सकता है।”

     

    नंदिनी ने पूछा—

     

    “कैसे?”

     

    गौरी ने हवेली के बीच रखी एक पुरानी पत्थर की पटिया की ओर इशारा किया।

     

    “इसके नीचे वह चीज है जिसके लिए उसने यह सब किया।”

     

    नंदिनी, अमन और हरिदास ने मिलकर पत्थर हटाया।

     

    नीचे एक लोहे का संदूक मिला।

     

    संदूक खोलते ही उसमें पुराने दस्तावेज, सोने के सिक्के और एक काली किताब मिली।

     

    काली किताब भवानी की थी।

     

    उसमें गाँव की हर उस औरत का नाम लिखा था जिसे उसने डायन घोषित करवाया था।

     

    हर नाम के सामने उसकी जमीन का विवरण था।

     

    नंदिनी ने किताब उठाकर गाँव वालों को दिखाई।

     

    “यही है असली सबूत।”

     

    भवानी चीखने लगी।

     

    “उसे जला दो!”

     

    अचानक आग की लपटें किताब की ओर बढ़ीं।

     

    लेकिन नंदिनी ने किताब को कसकर पकड़ लिया।

     

    गौरी उसके सामने आ खड़ी हुई।

     

    दोनों आत्माएँ आमने-सामने थीं।

     

    एक निर्दोष की आत्मा।

     

    दूसरी लालच और झूठ से भरी आत्मा।

     

    भवानी ने कहा—

     

    “तुम मुझे नहीं हरा सकती।”

     

    गौरी ने शांत स्वर में कहा—

     

    “मैं तुम्हें नहीं हरा रही।”

     

    “सच तुम्हें हरा रहा है।”

     

    इतना सुनते ही हवेली के चारों तरफ तेज प्रकाश फैल गया।

     

    जिन औरतों के चित्र दीवारों पर लगे थे, वे एक-एक करके दीवार से बाहर निकलने लगे।

     

    वे सभी आत्माएँ थीं।

     

    वे गौरी के पीछे खड़ी हो गईं।

     

    भवानी पहली बार डर गई।

     

    “नहीं…”

     

    एक वृद्ध आत्मा आगे आई।

     

    “हम सबको तुमने डायन कहा।”

     

    दूसरी बोली—

     

    “हमारी जमीन छीनी।”

     

    तीसरी बोली—

     

    “हमारे परिवार उजाड़े।”

     

    चौथी ने कहा—

     

    “लेकिन अब हमारा सच सामने आ चुका है।”

     

    भवानी पीछे हटती गई।

     

    अचानक उसके पैरों के नीचे की जमीन काली पड़ने लगी।

     

    उसकी आत्मा कमजोर होने लगी।

     

    वह चीखी—

     

    “मैंने कुछ गलत नहीं किया!”

     

    गौरी ने कहा—

     

    “झूठ बोलना बंद करो।”

     

    भवानी ने आखिरी बार चीख लगाई।

     

    और फिर…

     

    उसका शरीर राख में बदल गया।

     

    हवेली में सन्नाटा छा गया।

     

    अचानक गौरी की आत्मा भी प्रकाश में बदलने लगी।

     

    नंदिनी ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम जा रही हो?”

     

    गौरी मुस्कुराई।

     

    “हाँ।”

     

    “अब मुझे किसी बदले की जरूरत नहीं।”

     

    “मुझे सिर्फ यह चाहिए था कि लोग सच जानें।”

     

    नंदिनी की आँखों से आँसू बह निकले।

     

    “क्या तुम फिर कभी वापस आओगी?”

     

    गौरी ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “जब तक लोग सच को याद रखेंगे, मुझे लौटने की जरूरत नहीं होगी।”

     

    यह कहते ही गौरी धीरे-धीरे प्रकाश में बदल गई।

     

    उसकी आत्मा आसमान की ओर उठी।

     

    और फिर पूरी तरह गायब हो गई।

     

    उसी क्षण हवेली की पुरानी घड़ी चलने लगी।

     

    टक… टक… टक…

     

    चालीस वर्षों से रुकी हुई घड़ी पहली बार आगे बढ़ी।

     

    सुबह होने लगी।

     

    सूरज की पहली किरण हवेली की टूटी खिड़की से अंदर आई।

     

    जहाँ रात भर अंधेरा था, वहाँ अब उजाला था।

     

    गाँव वालों ने उस दिन से हवेली को डर की जगह नहीं, बल्कि एक सबक की जगह बना दिया।

     

    जिन औरतों की जमीन छीनी गई थी, उनकी जमीन उनके परिवारों को वापस दी गई।

     

    गौरी के नाम पर गाँव में एक छोटा-सा स्वास्थ्य केंद्र बनाया गया, जहाँ गरीबों का मुफ्त इलाज होने लगा।

     

    बरगद के पेड़ के नीचे एक पत्थर लगाया गया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “गौरी — जिसे लोगों ने डायन कहा, लेकिन जिसने अंत तक इंसानियत नहीं छोड़ी।”

     

    हरिदास बाबा ने अपनी बाकी जिंदगी गाँव के बच्चों को यही समझाने में बिताई कि किसी भी अजीब घटना को देखकर तुरंत उसे भूत, डायन या जादू मत समझो।

     

    पहले सच खोजो।

     

    वीरेंद्र ने अपने परिवार के अपराधों को स्वीकार किया और गाँव वालों की जमीन वापस करने में मदद की।

     

    और नंदिनी?

     

    वह शहर वापस चली गई।

     

    लेकिन हर साल गौरी की बरसी पर भैरवपुर जरूर आती।

     

    एक बार उसने बरगद के पेड़ के नीचे रात बिताई।

     

    गाँव वाले उसे रोकते रहे।

     

    “रात मत रुकना।”

     

    “गौरी वापस आ सकती है।”

     

    लेकिन नंदिनी मुस्कुराई।

     

    “अगर वह आएगी भी तो मुझे उससे डर नहीं लगेगा।”

     

    रात के ठीक बारह बजकर तेरह मिनट हुए।

     

    हवा चली।

     

    बरगद के पत्ते हिले।

     

    नंदिनी ने आँखें बंद कर लीं।

     

    उसे बहुत धीमी आवाज सुनाई दी—

     

    “सच को कभी मरने मत देना…”

     

    नंदिनी ने आँखें खोलीं।

     

    सामने कोई नहीं था।

     

    बस बरगद की एक शाखा पर सफेद चमेली के फूल खिले हुए थे।

     

    वह मुस्कुराई।

     

    “मैं वादा करती हूँ।”

     

    और उसी रात पहली बार भैरवपुर में किसी ने डायन के डर से दरवाजा बंद नहीं किया।

     

    लोग बाहर निकले।

     

    बच्चे खेलते रहे।

     

    मंदिर की घंटियाँ बजीं।

     

    और वह हवेली, जो कभी डर का प्रतीक थी, अब गाँव को एक बात याद दिलाती थी—

     

    हर डर के पीछे भूत नहीं होता।

     

    कभी उसके पीछे कोई झूठ होता है।

     

    कभी लालच।

     

    कभी अज्ञान।

     

    और कभी किसी निर्दोष के साथ किया गया अन्याय।

     

    कहानी की सीख

     

    किसी भी इंसान को सिर्फ अफवाह, शक या अंधविश्वास के आधार पर डायन, भूत या बुरा इंसान मान लेना बहुत बड़ा अन्याय है।

     

    अंधविश्वास इंसान की सोचने की शक्ति छीन सकता है।

     

    गौरी को लोगों ने बिना सच जाने डायन समझ लिया और उसके साथ अन्याय किया। असली दोषी वे लोग थे जिन्होंने डर और लालच का इस्तेमाल किया।

     

    इसलिए हमें हमेशा याद रखना चाहिए—

     

    “सच जानने से पहले किसी पर विश्वास या आरोप मत लगाओ।”

     

    “डर के कारण अपनी बुद्धि मत खोओ।”

     

    और सबसे बड़ी बात—

     

    “किसी निर्दोष की चुप्पी को उसकी गलती मत समझो।”

     

    क्योंकि कभी-कभी जिसे पूरी दुनिया डायन समझती है…

     

    वह वास्तव में सबसे ज्यादा पीड़ित और सबसे ज्यादा निर्दोष इंसान होता है।

     

    और असली राक्षस किसी सुनसान जंगल या पुरानी हवेली में नहीं…

     

    इंसान के लालच, झूठ और अंधविश्वास के अंदर छिपा होता है।

     

    यहीं “बहु बनी डायन” की कहानी समाप्त होती है।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।